Chander Dhingra's Blog

Wednesday, March 17, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) -63

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1    ( ६३ )  मेरे पीछे पीछे पिंकी भी ऊपर कमरे में आ गयी थी। उसने आते ही कहा, ' मेरी बात का बुरा मान गए क्या ? मैं तो आपके भले के लिए ही कह रही हूँ कि सिगरेट पीना ठीक नहीं होता... इसे छोड़ देना ही उचित है... जितनी देर होती जाएगी, उतना ही इस लत से छुटकारा पाना मुश्किल होता जाता जायेगा ...' मैंने कुछ उत्तर न दिया था। उसने बात को आगे करते हुए कहा , ' हमारे पड़ोस में एक गुप्ता अंकल रहते थे, उनको इस सिगरेट की लत थी...वह हार्ट और लंग्स के मरीज हो गए थे... फिर उन्हें बचाया न जा सका था...डॉक्टरों  का मानना था कि सिगरेट की लत के कारण ही उनकी यह दुर्गति हुई थी...'  मैं अब भी खामोश था। उसने कहा, ' मुझे गलत न समझना... दोस्त अपनी जगह हैं परन्तु अपना भला-बुरा आपको ही देखना है...' मुझे लगा कि वह मुझे अपने दोस्तों से एक तरह की दूरी बनाने को कह रही थी। अब मैंने कहा, ' बचपन और स्कूल के दिनों की दोस्ती है... ऐसा मैं नहीं कर सकता.. मुझे इस तरह की स्वार्थी बातें अच्छी नहीं लगती...मैं अपने दोस्तों और घर वालों से अलग नहीं हो सकता...'  पिंकी ने मुझे देखा और कहा, ' मैं दोस्तों से दूर चले जाने के लिए तो नहीं कह रही, बस उनकी बुरी आदतों से दूर हो जाने को कह रही हूँ...' मैंने कहा, ' यही तो बात है, तुम्हें सिगरेट बुरी लगती है, मुझे और मेरे दोस्तों को एक सामान्य शौक...'  ' अच्छा, मुझे ही क्यों ? किसी भी डॉक्टर से पूछ लो, वह इसे बुरी आदत ही बताएगा..वेस्टर्न वर्ड में भी अब स्मोकिंग कम होती जा रही है...'  उसने तर्क देते हुए कहा था। मैं तो झुंझलाया हुआ था ही, मैंने उसे चिढ़ाते हुए कहा, ' अच्छा, जो वेस्ट करे, वही हम भी करें... तुम भी शायद उन लोगों में हो जो गोरों को दुनिया का मार्ग-दर्शक समझते हैं...मैं सिगरेट यदकदा ही पीता हूँ...परन्तु, कभी छोडूंगा तो अपनी मर्जी से... किसी दूसरे के कहने से नहीं...अंग्रेजों के कहने से तो बिलकुल भी नहीं...' पिंकी हैरान सी थी। उसने कहा, ' मैं कोई दूसरा नहीं हूँ और न ही मैं अंग्रेज हूँ, मैं एक स्मोकर की वाइफ हूँ और मेरी बात में एक सलाह है, एक सच्ची बात है... खैर छोड़ो, अभी आपका मूड ठीक नहीं है... बताओ क्या हुआ है ? मैंने उसी अंदाज़ में बात को जारी रखते हुए कहा, ' मेरा मूड ठीक है... ऐसी कोई बात नहीं है... देर हो गयी है.. सो जाओ..' पिंकी अपने स्वभाव से बंधी थी। उसने मुस्कुराते हुए कहा, ' ऐसे कैसे सो जायें... पहले आपका मूड ठीक करेंगे, फिर सोयेंगे... बताओ क्या हुआ है, कुछ तो अवश्य हुआ है ? मैं उसकी सरलता देखता रह गया था और मुस्कुरा दिया था। उसने देखा तो कहा, ' उन मिस्टर रवि के साथ किसी मीटिंग में गए थे न ? वहीँ कुछ फ़िजूल सी बातें हुई होंगी और मूड बिगड़ गया होगा.. ठीक कहा न मैंने..' उसने शायद ठीक ही कहा था परन्तु मैं भी अपने स्वधर्म से बंधा था। मैंने कहा, ' ये रोबी दा कहाँ से बीच में आ गए ? और वह रोबी दा हैं, मिस्टर रवि नहीं..' वह मुस्कुरायी, ' मिस्टर रवि शब्द में ज्यादा दम है, रोबी दा में वो बात नहीं.. और मैं पहले ही कह चुकी हूँ कि मेरे लिए वह मिस्टर रवि हैं और मुझे एकदम पसंद नहीं हैं.. अब बताओ, उन्हीं की किसी बात से मूड ऑफ हुआ है न ? मैंने कुछ न कहते हुए मुँह घुमा लिया था। कभी कभी शब्दों से अधिक आघात आपकी भावभंगिमा कर जाती है। शायद उस दिन ऐसा ही हुआ था। पिंकी ने मेरा आचरण देखा तो वह भी नाराज़ हुई थी। उसने कहा, ' जवाब नहीं है तो मुँह फेर रहे हो...  जो करना है करो... सिगरेट पीयो, यूनियनबाजी करो...  पॉलिटिक्स करो...' हम दोनों अब चुप थे और नींद की प्रतीक्षा कर रहे थे।  सुबह, हम सो कर उठे थे या रतजगा कर, कह नहीं सकता। पिंकी हर सुबह किसी चिड़िया सी चहचाहती थी। माँ, बिशाखा उसके उठते ही स्फूर्तिमय हो जाते थे। आरम्भ के कुछ दिनों तक वह सबको गुड मॉर्निंग कहती थी... गुड मॉर्निंग मम्मी, गुड मॉर्निंग पापा और गुड मॉर्निंग बिशाखा दीदी ..परन्तु इन दिनों उसने गुड मॉर्निंग के साथ साथ, हरे कृष्णा और सत श्री अकाल भी कहना शुरू कर दिया था। सबको उसका यह अंदाज़ बहुत पसंद आया था। माँ तो सिर्फ गुड मॉर्निंग कहकर उत्तर देती थी परन्तु बाबा अत्यंत स्नेह से हरे कृष्णा और सत श्री अकाल से उसके सम्बोधन का जवाब देते थे। कभी कभी सुप्रभात, मनप्रीत देवी भी कहते थे। उस दिन की सुबह कुछ अलग थी। ये पहली बार था कि पिंकी के मुख पर हल्की सी नाराज़गी थी। मैं बीती रात के हमारे बीच हुए वार्तालाप को देख पा रहा था। वह रोज की तरह अपने काम में जुटी हुई थी परन्तु मुझे अनदेखा सा कर रही थी। मैंने सोचा वह किसी ओर को नहीं परन्तु अपने मामा को ये सिगरेट वाली बात अवश्य बताएगी और वह अपने अंदाज़ में उस पर दबाव डालेंगे कि कुछ भी हो जाये, यह सिगरेट पीना छुड़वाना ही होगा। मैंने भी एक बार फिर से सोचा, ' मामाजी कहें या उसके मम्मी-पापा, सिगरेट छोडूंगा तो अपने निर्णय पर किसी के कहने पर नहीं  ...'  समय से वह तैयार हो गयी थी और घर से निकलने को थी। उसने अब मेरी ओर देखा पर कुछ कहा नहीं। मैंने अपनी ओर से कहा, ' आज तुम चली जाओ   .. मैं बाद में कुछ देर से जाऊंगा..'  मैं भी तैयार तो था परन्तु किस लिए उसे अकेले जाने के लिए कहा था, उस समय समझ न पाया था। आज जब यादों की किताब खोलकर और सत्य की प्रतिज्ञा के साथ बैठा हूँ तो उस समय की अपनी मनस्थिति को देख पा रहा हूँ। चुपचाप उसके साथ चले जाने में, मेरी पराजय थी। मैं चाहता था कि वह कुछ ऐसा कहे कि मैं स्वयंतुष्ट और अधिकार संपन्न महसूस कर सकूँ। उसने मुस्कुराते हुए ओके कहा और निकल गयी थी। मैं बालकनी में आ गया और उसे अपनी कार की ओर बढ़ते हुए देखने लगा था। वह कार तक गयी थी, कुछ क्षण वहाँ रुकी और ऊपर आ गयी थी। मैं समझ रहा था कि वह कहेगी, ' तैयार तो हो ही गए हो, चलो साथ ही चलते हैं..' उसने ऐसा कुछ न कहा था और सीधे ऊपर वाले अपने कमरे में घुस गयी थी। मैंने सोचा जाकर पूछूं कि क्या हुआ था परन्तु मैंने ऐसा कुछ न किया और वहीं उस दिन के अखबार के साथ बैठा रहा था। बिशाखा ने माँ को सूचित किया कि न जाने क्यों बहू माँ वापिस लौट आयी थी और अपने कमरे में थी। माँ ने आवाज़ देकर मुझसे जानना चाहा तो मैंने कहा कि शायद कुछ भूल गयी होगी और लेने आयी होगी। कुछ समय बाद पिंकी को आवाज़ दी तो वह नीचे आयी और कहा कि कुछ विशेष बात नहीं थी और उसका मन ऑफिस जाने का न था। माँ को लगा कि शायद उसकी तबीयत ठीक न थी। उन्होंने जानना चाहा तो पिंकी ने कहा, ' कैसे जाऊँ मम्मी जी, कार का चक्का तो आज फिर बैठा हुआ है..' मैंने सुना तो सामान्य बनते हुए कहा, ' आज फिर ? पिंकी ने मेरी ओर ताकते हुए कहा, ' कल सामने का था और आज पीछे का..' माँ ने बिशाखा से शांतु को तुरंत बुला लाने को कहा, ' ये ऐसे कैसे रोज रोज कार का पंचर हो जाता है.. आज देखती हूँ..' बिशाखा के साथ ही शांतु आ गया था। उसने माँ की बात सुनी तो मेरी ओर देखते हुए कहा, ' कल ही तो मैं ठीक करवाकर लाया था..अब फिर से कैसे हो गया  ? उसकी इस बात पर पिंकी ने मेरी ओर ताका, उसने कहा, ' आपके अभिजीत दादा ने कल आपको आगे वाले दाएं चक्के के लिए भेजा था और आज आपको पीछे दाएं वाले चक्के के लिए भेजेंगे.. कल लेफ्ट फ्रंट और उसके अगले दिन लेफ्ट बैक..' मुझे ऐसा लगा था कि वह मुझ से ही कह रही थी कि क्या यही आदमी मिला था, इस काम के लिए और वह उससे बात छिपाने के लिए, ताना दे रही थी।  माँ ने अपना राजनैतिक दिमाग चलाया था। उन्होंने शांतु को कहा कि उसे ही हमारी कार की देखरेख करनी होगी। उन्होंने उसके भाई के जिसके पास कुछ काम न था, के लिए एक प्रस्ताव रखा कि उसे हर सुबह कार को धोना और पौंछ देना होगा और इसके लिए उसे एक मासिक मेहनताना दिया जायेगा। इसे आकर्षित करने के लिए उन्होंने एक लालच सा दिया कि अगर वह ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त कर लेता है तो भविष्य में उसे ड्राइवर का काम भी दिलवा देंगी। शांतु खुश दिखा था। उसने माँ को आश्वासन दिया था कि उनकी कार अब ठीक से रहेगी और यह उसकी जिम्मेदारी थी। माँ ने उसे कहा, ' अब जाओ, तुरंत चक्के में हवा भरवाकर लाओ.. बहूमाँ  को ऑफिस के लिए विलम्ब हो रहा है..'  पिंकी ने मुझे ऐसे देखा मानों कह रही हो, ' मम्मी जी से कुछ सीखो..ऐसे काम करवाए जाते हैं, इन छोटे लोगों से..'  शांतु, कार की चाबी लेकर चला गया था। अब पिंकी ने मुझसे बात की और कहा कि जो बात मेरी माँ ने उस गुंडे से की थी, वह असल में मुझे ही करनी चाहिए थी। मैं चुप था सिर्फ इतना कहा कि वे गरीब लोग थे और उन्हें गुंडा या बदमाश कहना ठीक न था। कुछ ही समय में शांतु आ गया और कार की चाबी दे गया था। चाबी देते समय उसने कहा, ' हां, सच में हवा ही न थी चक्के में..' माँ ने उसे शाबाशी देते हुए दस का नोट पकड़ा दिया था। पिंकी मुस्कुराते हुए मेरी ओर देख रही थी। उसने कहा, ' अब चलें रॉय साहब, आपको ऑफिस के लिए देर हो रही है.. अनुमति हो तो आपको छोड़ दूँ..'  उसकी बात सुन माँ भी मुस्कुराने लगी थी। उन्होंने एक समस्या का समाधान जो कर दिया था। ( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे, यहीं पर  ...)

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