Chander Dhingra's Blog

Wednesday, February 17, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )- 59

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra                   http://chander1949.blogspot.com/?m=1  ( ५९ )  दूसरे  दिन जब हम सभी नाश्ते पर मिले तो माँ ने उस सेमिनार की बात फिर से छेड़ दी थी। उन्होंने मुझे कहा कि एक दिन का समय हाथ में था सो मुझे मनप्रीत को गाइड करना चाहिए। मैनें कहा कि उसे किसी मार्गदर्शन की आवश्यकता न थी। किंतु माँ ने कहा कि हमें मिलकर विषय का पुनर्पठन करना चाहिए। साथ ही कलकत्ता कार्पोरेशन और पश्चिम बंगाल के नियमों आदि के बारे में मुझे मनप्रीत को बताना चाहिए। मैंने पिंकी की ओर देखा तो ऐसा लगा कि वह माँ की बात से सहमत थी। मैंने कहा, ' ऊपर चलो, कुछ देख लेते हैं जो शायद कल तुम्हारे का आ जाये..' हम अपने कमरे में आ गए और मैं जहाँ तक संभव हो सका, उसे संभावित बातों और विषयों की जानकारी देता रहा था। पिंकी खुद में बहुत सुलझी हुई लड़की थी। वह किसी भी बात की पूरी जानकारी लेने में संकोच न कर रही थी। पूरा दिन उसी के साथ बीत गया था। दोपहर का खाना और शाम की चाय भी बिशाखा ऊपर ही दे गयी थी। देर से हम लोग, माँ के बुलाने पर पर नीचे आने लगे तो पिंकी ने कहा, ' एकाउंट्स पर आपकी जो पकड़ है, वह अद्भुत है..इतना सब ज्ञान कहाँ से प्राप्त किया ? उसकी प्रशंसा मुझे अच्छी लगी थी। मैंने कहा, ' तुम भी कुछ कम नहीं हो..कल तो तुम जीतकर ही आओगी.. मैं लिख कर दे सकता हूँ ..' माँ ने हम दोनों को हँसते हुए देखा तो कहा कि अब आराम करना चाहिए क्यों कि पूरा दिन हम विषय पर ही चर्चा करते रहे थे और मुझे इंटरव्यू में फ्रेश दिमाग के साथ जाना चाहिए। पिंकी ने कहा, ' हाँ, मम्मी जी, अब बस..जितना कुछ कर सकते थे कर लिया, अब बाबा का आशीर्वाद चाहिए .. ' बाबा का आशीर्वाद, यह सुन माँ ने पिंकी का माथा चूम लिया था। पिंकी ने तो अपने नानक बाबा का आशीर्वाद माँगा था किंतु माँ ने शायद इसे अपने लोक नाथ बाबा से जोड़ लिया था।  सुबह पिंकी उत्साह से भरी दिखी थी। उंसने कहा कि वह मुझे मेरे ऑफिस पर ड्राप कर इंटरव्यू  के लिए निकल जाएगी। हम दोनों समय से तैयार थे। पिंकी अपनी पंजाबी पोशाक में, किसी को भी अभिभूत कर लेने की क्षमता में थी। एक चमक थी उसके चेहरे पर जो आत्मविश्वास को साफ दिखा रही थी। उसने माँ-बाबा के पाँव छुए तो कुछ बिना कुछ बोले ही उनके आशीर्वाद के स्वर झरते दिखे थे। बाबा ने अवश्य कहा, ' तुम को असफल करे, इतना साहस किसी में न होगा.. निश्चिंत होकर जाओ..'  मैं भी जानता था कि वह निश्चय ही सफल होगी। मुझे मेरे ऑफिस के समीप उतार, वह मुस्कुरा कर कार से बाहर आयी और हमने एक-दूसरे को आलिंगन में लिया। मैंने कहा, ' आल द बेस्ट..' वह एक चुस्त-दुरुस्त एग्जीक्यूटिव की तरह, अपनी मारुती कार में आगे निकल गयी थी।  मैं ऑफिस में काफी समय तक उसके ही बारे में सोचता रहा था। फिर अपने काम में ऐसा व्यस्त हुआ कि दिन कब कट गया पता ही न चला। घर फोन किया तो बिशाखा ने बताया कि माँ-बाबा दोनों घर पर न थे और पिंकी अपने कमरे में थी। मैंने कहा, ' ठीक है.. कहना मैंने फोन किया था और मैं समय से घर पहुँच जाऊँगा..' जब मैं घर पहुंचा तो माँ-बाबा भी आ चुके थे। पिंकी उनके साथ हँसते-मुस्कुराते हुए बैठी थी। मैंने घर में घुसते ही उससे पूछा, 'कैसा रहा इंटरव्यू ? उसने मुंह बनाते हुए कहा, ' ठीक था..' उसका मुँह देख माँ-बाबा दोनों जोर से खिलखिला पड़े थे। बाबा ने कहा,' अरे ! हमारी बहू ने तो कमाल ही कर दिया है.. पूछो इससे .. ' मैंने पिंकी की ओर जिज्ञासा के साथ देखा। उसने कहा ,' ऐसा कुछ नहीं है..वे लोग मुझे कुछ एक्स्ट्रा कार्य देना चाहते हैं..मैंने अभी कुछ कहा नहीं है.. ' जब मैंने उससे विस्तार से बताने को कहा तो उसने बताया कि वे उसे फाइनेंस में केवल परियोजना का कार्य देना चाहते हैं  लेकिन उसे साथ में कॉर्पोरेट वर्ग के विशेष अतिथियों के सत्कार विभाग की ज़िम्मेदारी दे रहे हैं। मैंने कहा कि यह तो बहुत अधिक कार्य हो जायेगा और उसे ना कर देना चाहिए। माँ ने कहा,' तुरंत निर्णय नहीं लेना चाहिए ..' मैंने कहा, ' सैलेरी एक और काम दो ? यह उचित नहीं होगा। पिंकी ने कहा कि ऐसी बात नहीं है.. फिर उसने प्रस्तावित सैलेरी के बारे में बताया तो मैं सकते में आ गया था। मेरा राष्ट्रीय कृत बैंक मुझे जो दे रहा था, यह राशि उससे चौगुनी से भी कुछ अधिक थी। अब मैं भी सोचने को विवश था। मैंने कहा, ' पिंकी, तुम पर है, जैसा तुम ठीक समझो..' काफी देर तक चर्चा चलती रही थी। पिंकी ने अपने मामाजी और पापा जी को भी बता दिया था और दोनों का मत था कि उसे यह जॉब जरूर स्वीकार करना चाहिए था। अंत में यही निश्चय हुआ कि अगले दिन पिंकी अपना स्वीकृति पत्र भिजवा देगी और नया कार्य आरम्भ कर देगी। जो प्रस्ताव पत्र उसे मिला था उसमें 'तत्काल प्रभाव से' लिखा था। इसका अर्थ था कि वह चाहे तो कभी भी दायित्व संभाल  सकती थी। बाबा ने कहा कि उसे अपना पत्र तो कल भिजवा देना चाहिए और आगामी एक तारीख से ज्वाइन कर लेना चाहिए। पिंकी को भी यही ठीक लगा था। एक तारीख आने में कुछ ही दिन थे। माँ को भी यह बात ठीक लगी थी। उन्होंने कहा कि कल ही वह उसे लेकर एक आश्रम में जाएँगी और वहाँ पूजा-अर्चना करेंगी। पिंकी मुस्कुरा रही थी, उसने कहा, ' पर, मम्मी जी, कल सुबह पहले मैं आपको गुरुद्वारे लेकर जाऊँगी उसके बाद आपके आश्रम जायेंगे..' उसने मेरी ओर देखते हुए कहा, ' कल आप गुरुद्वारे में मत्था टेकते हुए, ऑफिस जाना..'  मैंने हां में सिर हिलाया और कहा,' ठीक है..'  माँ ने कहा कि मुझे भी साथ में आश्रम जाना चाहिए और एक दिन का अवकाश ले लेना चाहिए। मैंने कहा कि यह संभव नहीं था क्योंकि मुझे रोबी दा ने कुछ कार्य सौंपा हुआ था। अब यह निश्चय किया गया कि गुरुद्वारे से मैं ऑफिस चला जाऊँगा और वो दोनों घर आ जायेंगे और संध्या में उस आश्रम जायेंगे।  सब कार्य ठीक से होते चले गए थे। एक तारीख से पिंकी ने अपना कार्य संभाल लिया था। हम दोनों एक साथ घर से निकलते थे। वह मुझे ड्राप करते हुए आगे बढ़ जाती थी। एक दिन जब में ऑफिस के सामने कार से उतर रहा था तो सामने रोबी दा दिख गए थे। मैंने पिंकी को इशारे से कार से बाहर आ जाने का संकेत दिया। पिंकी ने उन्हें नमस्कार किया तो रोबी दा ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा, ' बहुत अच्छा लग रहा है, तुम दोनों को देखकर..अभिजीत ने मुझे सब कुछ बताया है..  एक साथ अपने अपने काम को निकलते हो..यह बहुत अच्छा है..पर हॉस्पिटलिटी इंडस्ट्री में शाम का लौटना ठीक नहीं होता.. बहुत ज़िम्मेदारी वाला काम होता है .. वर्ना इसे यहाँ से लेते हुए, एक साथ ही घर भी लौटते..' वह एक साँस में सब कह गए थे। पिंकी ने कहा, ' सर, अभी चलती हूँ..एक दिन आइये न हमारे घर..'  वह कार स्टार्ट कर, तेजी से आगे निकल गयी थी। मैं और रोबी दा, अपने संगठन और देश की बिगड़ती स्थिति की बातें करते हुए, अपने कार्यालय की ओर बढ़ गए थे। शाम को पिंकी से बात हुई तो उसने कहा, ' ये तुम्हारे रवि साहब मुझे पसंद नहीं.. ऐसा लगता है... बहुत पेंचदार आदमी हैं...' मैंने कहा, ' नहीं, अच्छे आदमी हैं... मेरे नाना की बहुत इज्जत करते थे और अब माँ को भी बहुत मानते हैं... काफी रुआबदार हैं... राइटर्स बिल्डिंग में बहुत पहुँच है, उनकी...'  ' हाँ, ऐसे ही लोगों की ऊपर तक पहुँच होती है... पर मुझे पसंद नहीं आ रहे, तुम्हारे ये रवि साहब...' पिंकी ने रूखे स्वर में मेरी बात का उत्तर दिया था।  ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर  ... )

No comments:

Post a Comment