Chander Dhingra's Blog
Wednesday, December 23, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -51
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हफ्ते वार इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे .. )
( ५१ ) चार दिन कैसे बीत गए, पता ही न चला था। हम नाश्ता कर चुके थे। कुछ ही समय में हमें फ्लाइट पकड़नी थी और कलकत्ता लौट जाना था। इन दिनों हम लगातार कलकत्ता, चंडीगढ़ और दिल्ली में बातचीत करते रहे थे। मेरी माँ, कलकत्ता के सब समाचार दे देती रहती थी। उन्होंने महिला आयोग की अध्यक्षा का पद ग्रहण कर लिया था। उन्होंने बताया था कि वह राज्यपाल महोदय से भी मिलने का आवेदन कर चुकी थीं। उन्हें आशा थी कि शीघ्र ही मुलाकात की तिथि और समय की सूचना मिल जाएगी। उनकी बातचीत से स्पष्ट हो रहा था कि वह पिंकी को अपने साथ राजभवन ले जाना चाहती थी। उनकी यह इच्छा स्वाभाविक थी कि अपनी नव पुत्रवधू को प्रभावित करें। वैसे भी कोई भी पिंकी जैसी लड़की का साथ चाहेगा। पिंकी किसी को भी प्रभावित करने में सक्षम थी। मैं यह भी समझ पा रहा था कि पंजाबी-सिख परिवार से होने के कारण उसका माँ के साथ दिखना, माँ के नए पद की गरिमा बढ़ाने में सहायक था। मैं इन बातों में खुद से उलझा हुआ था कि पिंकी ने आकर, समय से चेक आउट कराने की सलाह दी। हम समय से एयरपोर्ट पहुंचे और फिर समय से ही कलकत्ता भी आ गए थे। माँ एयरपोर्ट पर आयी हुई थी। मैंने अपने बाबा के बारे में पूछा। माँ ने बताया कि उनकी ऑफिस में कोई मीटिंग चल रही थी इसलिए उनका आना संभव न था। माँ जिस कार से आयी थी, मैं उस कार को देखता रह गया। उस पर लाल बत्ती लगी थी और सामने महिला आयोग का बोर्ड था। पिंकी ने भी देखा और उसने वाह के अंदाज़ में एक मुस्कान दिखाई थी। मैं सामान कार में रखने को आगे बढ़ा ही था कि माँ ने मुझे रोक दिया। उन्होंने कहा, ' इसमें नहीं, एक और कार भी है..तुम उसमे घर जाओ.. मैं और मनप्रीत इस कार से आते हैं..' मैं कुछ समझ पाता कि उन्होंने स्पष्ट किया कि एक संस्था की महिलाओं ने उन्हें आमंत्रित किया हुआ था। समय अधिक न था इसलिए वह एयरपोर्ट पर आ गयी और मनप्रीत को सब से मिलाकर घर पहुँच जाएँगी। मैं कुछ कहता इस पहले ही पिंकी ने असंतुष्ट सा भाव देते हुए कहा, ' मैं अकेले, अभिजीत नहीं ? माँ ने कहा कि महिलाओं की गोष्ठी थी, वहाँ मेरा जाना नहीं बनता था। मैं मुस्कुराया और माँ अपनी बहू को ले निकल गयी थी। मैं घर के दरवाज़े पर पहुंचा तो देखा बाबा भी अपना ऑफिस वाला बैग लेकर आ रहे थे। वह ऑफिस से लौट रहे थे। मुझे अकेला देख उन्होंने कहा, ' हमारी बहुमा कहाँ है ? मैंने उन्हें सब बताया तो वह हंसने लगे, ' तुम्हारी माँ को अब बहू चाहिए, बेटा नहीं..' उनके मुख से बहूमा सुंनना अच्छा लगा था। एक क्षण को बंगाली परंपरा पर गर्वानुभूति हुई थी कि हम पुत्रवधू को माँ का दर्जा देते हैं। पश्चिमी संस्कृति में तो वह ' कानून से बेटी ' होती है।
हम दोनों ने एक साथ घर में प्रवेश किया। बिशाखा ने दरवाज़ा खोला और हैरान हो पूछा, ' ये क्या अकेले, बहुमा को कहाँ छोड़ आये हो ? मैं थोड़ा झुँझलाया और कहा, ' अंदर चलो और पहले चाय पिलाओ..' बिशाखा चाय लेकर आयी और जो उसने प्रश्न पूछा था उसका स्वयं से ही उत्तर देने लगी। उसने कहा, ' तुम बताओ या न बताओ, मैं समझ गयी हूँ कि माँ, हमारी बहुमा को लेकर किसी मीटिंग में चली गयी हैं..वह आज शाम की मीटिंग की बात कर रही थीं, मैंने सुना था.. ठीक पकड़ा न..' मैं बिशाखा का यह गुण जानता था। मैंने कई बार यह देखा था कि वह घर में हो रही बातों को सुन पूरा वृतांत समझ जाती थी। कई बार तो वह राजनैतिक गतिविधियों पर भी सटीक टिप्पणी कर देती थी। बाबा के स्कूल दिनों के वह लेखक और कवि दोस्त भी अचानक आ पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि वह उस तरफ से कहीं जा रहे थे सो मिलने चले आये थे। बाबा उनको देख बहुत खुश हो गए थे । उनके चेहरे पर चमक आ गयी थी। मैंने भी काका कह उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने मुझे आशीर्वाद देते हुए कहा कि मेरे पिता उन्हें तो बाराती बनाकर नहीं ले गए थे। फिर उन्होंने कहा, ' अरे ! ठीक भी है, दिल्ली की ऊँची शादी में वह कहाँ खपते ? मैंने देखा बाबा कुछ शर्मिंदगी सी महसूस कर रहे थे परन्तु दोनों मित्र एक दूसरे की स्थिति को समझ रहे थे। यही तो मित्रता होती है जो बिन कुछ कहे सब समझ जाती है। बाबा ने उन्हें बताया कि मैं अभी ही गोवा से लौटा था और मेरी पत्नी को उसकी सास कहीं लेकर गयी थी। वे दोनों मित्र हंसने लगे थे। बिना बात बढ़ाये दोनों स्थिति को समझ गए थे। मैं अनुमान लगाता रह गया कि मेरी माँ के महिला आयोग वाले पद ग्रहण की बात उठेगी परन्तु यहाँ तो जैसे सब कुछ शीत जल सा स्पष्ट था। अचानक काका ने चाय की चुस्की लेते हुए मुझसे पूछा, ' कैसा रहा तुम्हारा मधुचंद्र ? इससे पहले की मैं समझ पाता, उन्होंने खुद ही हँसते हुए अंग्रेजी में कहा, ' आई मीन हनीमून ..' मैंने सिर्फ मुस्कुराकर उत्तर दिया। उन्होंने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ' कोई तकरार तो नहीं हुई न ? गलत मत समझना, कहा जाता है कि पति-पत्नी की पहली तकरार हनीमून के दौरान ही होती है ..' मैं मुस्कुराये ही जा रहा था। मैंने सोचा बात तो उनकी सही थी। जब गोवा में पिंकी ने गुरूद्वारे जाने की बात कही थी तो मैं झुँझला गया था। मैंने उसे कहा था, ' ये क्या ? यहाँ भी गुरुद्वारा ? अब कहीं भी जाएंगे तो गुरूद्वारे जाना ही पड़ेगा ? पिंकी क्षण भर को चुप हो गयी थी और उसने कहा था कि कोई बात नहीं थी यदि मेरा मन नहीं था और मैं विश्राम करना चाहता था तो वह अकेले ही हो आयेगी। मैंने स्थिति को संभाल लिया था यह कह कर कि उस दिन नहीं, अगले दिन सुबह चलेंगे। परन्तु उस शाम हम दोनों शांत थे। रात का खाना भी बिना कुछ बात किये खाया था। क्या यही हमारी हनीमून वाली दाम्पत्य जीवन की पहली तकरार थी ?
बाबा अपने मित्र को लेकर छत पर चले गए। वह सिगरेट नहीं पीते थे परन्तु कभी अपने किसी पुराने मित्र से मिलते तो एक सिगरेट सुलगा लेते थे और नौजवान जैसे अंदाज़ में कश लगाते हुए, यादों की गलियों में खो जाने का प्रयास करने लगते थे। आज तो वह कुछ अधिक ही प्रसन्न थे क्योंकि उनकी पत्नी की आतंकी रोक-टोक न थी। मुझे भी उनका यह उन्मुक्त चेहरा अच्छा लग रहा था। ( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे, यहीं पर ..)
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