Chander Dhingra's Blog
Wednesday, December 16, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -50
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )
( ५० ) प्रातः हम देर तक सोये रहे थे। माँ, जो घर में सभी से भोर में उठ जाने की आशा किया करती थी, आज शांत थी। हम दोनों नीचे आये तब तक दस बस चुके थे। पिंकी ने माँ के पांव छुए। माँ ने आशीर्वाद देते हुए पूछा कि नींद कैसी रही थी ? साथ ही उन्होंने यह भी पूछ लिया कि उसके घर में सब लोग कितने बजे जाग जाते थे ? माँ का दिमाग चल रहा था। असल में वह तो केवल उसी के सुबह उठ जाने का समय जानना चाहती थी और उसे यह भी बता देने चाहती थी कि उनके घर में इतनी देर तक सोया रहना स्वीकार न था। उन्होंने कहा, ' मोनप्रीत, कल रात तो विलम्ब हो गया था.. तुम थकी हुई भी थी..यहाँ सब समय से बिस्तर छोड़ देते हैं..' पिंकी को माँ के मुख से मनप्रीत शब्द को बंगाली ध्वनि में सुनना अच्छा लगा होगा। वह मुस्कुरा दी थी। उसने कहा, ' मम्मी जी, मैं तो घर में सबसे पहले उठ जाती हूँ.. मैं तो जॉगिंग के लिए भी जाती हूँ.. यहाँ भी तो वाकिंग और जॉगिंग के लिए लोग जाते होंगे, कोई आसपास पार्क तो होगा ही ? माँ ने बताया कि कुछ ही दूर पर एक सुन्दर लेक है जहाँ लोग जाते हैं और वह भी वहाँ जा सकती थी। माँ ने कहा, ' गोवा घूम आओ, मैं सब व्यवस्था कर दूंगी..' एक ओर होने पर उसने मुझसे पूछा, ' अभिजीत, मम्मी जी कौन सी व्यवस्था के बारे में कह रहीं थी ? मैंने तो जॉगिंग पर जाने के लिए कहा था.. ' मैंने उसे समझाया कि वह शायद सुबह तुम्हारे साथ जाने के लिए किसी को कहेंगी, उन्हें पता है कि मैं तो भोर में उठकर कहीं नहीं जाऊंगा। पिंकी मुस्कुरा दी, ' जॉगिंग के लिए मेरे साथ कोई ? ये क्या बात हुई ? मैं क्या बेबी हूँ ? मेरे साथ केवल तुम ही चलोगे.. वरना मैं अकेले ही जाऊँगी..' मैंने कहा कि देखा जायेगा क्योंकि मैं जानता था कि माँ शहर से अपरिचित इस लड़की को अकेले सुनसान से लेक क्षेत्र में नहीं जाने देना चाहेंगी। मैंने विषय को बदलते हुए उसे बताया कि हमें लंच के बाद ही निकल जाना होगा क्योंकि साढ़े पांच बजे की फ्लाइट थी। उसने अपना सामान पैक करना आरम्भ किया और मुझे कहा कि मैं भी अपना सब कुछ ठीक से रख लूँ। साथ ही उसने याद से स्विमऔर ट्रैक्किंग सूट रख लेने के लिए भी कहा था।
दोपहर का खाना खा हम दोनों एयरपोर्ट जाने के लिए तैयार थे। मैंने कहा, ' अभी कुछ समय रुक सकते हैं.. दिन के इस समय अधिक समय न लगेगा .. सड़कें खाली होती हैं.. ' पिंकी मुझे चलने के लिए उकसाती जा रही थी। मैंने जानना चाहा तो उसने कहा, ' मम्मी कह रही थी कि यहाँ का गुरुद्वारा बहुत अच्छा है..क्यों न वहां मत्था टेकते हुए जायें ? मैंने मुंह बना दिया और मन में सोचा कि मैं माँ के साथ मंदिर और आश्रम आदि जगहों पर जाने से कतराता रहा हूँ और अब ये गुरुद्वारा और मत्था टेकना ? क्या एक नया झमेला तो नहीं होने जा रहा मेरे जीवन में ? मेरा रूखापन देख पिंकी ने कहा, ' कोई बात नहीं.. तुम्हारा मन नहीं है तो नहीं जाते..' अब मैंने सूटकेस उठाया और कहा, ' नहीं..नहीं ऐसी बात नहीं है .. चलो चलते हैं..' मैंने बिशाखा को नीचे जाकर एक टैक्सी को रोकने के लिए कहा। मेरी यह बात पिंकी को खटकी। उसने अंग्रेजी में कहा, 'अरे, उन्हें क्यों टैक्सी के लिए भेज रहे हो, खुद ही जाओ न..' उसने यह वाक्य अंग्रेजी में इसलिए कहा था कि बिशाखा को समझ न आये लेकिन कुछ बातें जिस अंदाज़ कही जानती हैं, वे शब्दों की मोहताज़ नहीं होती, वे अर्थ स्वयं से स्पष्ट कर देती हैं। बिशाखा को हमारे घर में हर छोटे-बड़े काम के लिए यहाँ-वहाँ दौड़ाया जाता था। कभी उसकी सुविधा-असुविधा की ओर नहीं देखा जाता था। आज शायद पहली बार किसी ने उसके बारे में सोचा था। बिशाखा बात समझ गयी थी। उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी जो कह रही थी, कोई तो आया मेरा मन पढ़ने वाला। मैं टैक्सी लाने के लिए आगे बढ़ा ही था कि पिंकी बोल पड़ी, ' वैसे टैक्सी लाने की क्या जरुरत है, दो सूटकेस हैं.. एक-एक सूटकेस लेते हैं और बाहर जाकर टैक्सी ले लेते हैं .. ' मैं किसी निक्कमा सा, हूँ.. हूँ.. ही कहता रह गया और वह दोनों सूटकेस खींच लायी थी। हमने माँ को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लिया और सीढ़ी से नीचे उतर घर से बाहर निकल आये थे।
कलकत्ता की ये पीलिया टैक्सी यूँ तो आवारा छोकरों सी यहाँ-तहाँ भटकती रहती हैं पर उस पहले दिन न जाने कहाँ किसी षड्यंत्र की तरह छिप गयी थीं। मानों बाहर से आयी लड़की को अपनी असलियत बता रही हों। मैंने पिंकी को यह बात बतायी तो उसने कहा कि कलकत्ता की टैक्सियों की हालत के बारे में उसने सुन रखा था। उसने कोई नाराजगी न दिखाई बल्कि मेरे साथ-साथ, हाथ हिलाकर, आती-जाती टैक्सियों को रोकने की कोशिश करने लगी। कई टैक्सियां दाएं-बाएं हो गुजर गयी परन्तु खाली टैक्सी एक भी न दिखी। मैं निराश हो रहा था परन्तु पिंकी हर टैक्सी को रोकने का प्रयास कर रही थी। अंततः वह सफल हुई और एक टैक्सी के रुकते ही उस में अपना सामान चढ़ाने लगी। मैंने कहा, ' पहले उससे पूछ तो लो..जायेगा या नहीं..' वह हैरान हो मुझे देखने लगी, ' अरे, टैक्सी है.. जायेगा क्यों नहीं..टैक्सी वाला नो नहीं कर सकता ..' मेरे मन में आया कि कहूं ' ये तुम्हारा चण्डीगढ़ नहीं है ..यह कलकत्ता है ..' पर चुप रह गया था और टैक्सी ड्राइवर से बात करने लगा था। वह राजी था और हमें ले गुरुद्वारे की ओर निकल गया। गुरूद्वारे के सामने पहुँच मैंने पिंकी को कहा कि मैं टैक्सी में रहूँगा और वह जल्दी से प्रणाम कर आ जाये। उसने कहा कि दोनों ही गुरूद्वारे के भीतर जायेंगे। मैंने उसे समझाया कि टैक्सी में सामान था और उसे छोड़ना उचित न था। उसने कहा कि टैक्सी का नंबर नोट कर लेते हैं। फिर एक बार मन में आया कि कहूँ, ' ये तुम्हारा चंडीगढ़ नहीं है.. कलकत्ता है..' परन्तु एक बार फिर से मैं चुप रह गया था और टैक्सी वाले से कहा. ' पांच मिनिट में आते हैं..' कनखियों से मैंने टैक्सी का नंबर देख लिया था। हम तुरंत ही लौट आये थे, वहां बैठे नहीं थे और समय से एयरपोर्ट पहुँच गए और रात को गोवा के होटल में। गोवा एयरपोर्ट पर होटल की ओर से स्वागत किया गया था। किसी भी असुविधा का प्रश्न ही न था।
गोवा में चार दिन कैसे बीत गए थे, पता ही न चला था। मैं बहुत ही खुश था। पिंकी का आकर्षणीय व्यक्तित्व मुझ पर और उसके संपर्क में आने वाले सभी पर छा रहा था। इन चार दिनों में ही वह होटल के स्टाफ के बीच प्रिय बन गयी थी। सभी हमारा मुस्कुरा कर स्वागत करते थे। हम दोनों यहाँ के गुरूद्वारे में भी गए थे। यह बहुत सुन्दर गुरुद्वारा बेटिम फेरी के पास ही था। होटल के कर्मचारियों में एक सिख लड़का भी दिखा था। पिंकी ने उससे बात की थी। वह लुधियाना का था। उस लड़के ने ही इस गुरूद्वारे के बारे में बताया था। इसका उद्घाटन राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह द्वारा किया गया था। पिंकी को गुरूद्वारे में सिख धर्म से सम्बंधित एक अंग्रेजी पुस्तक मिल गयी थी। उसने मुझे देते हुए कहा, ' इसे पढ़ना.. बुक शेल्फ में सजाकर न रख देना ..'( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को, यहीं पर .. )
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