Chander Dhingra's Blog

Wednesday, December 9, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -49

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II-    चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra   http://chander1949.blogspot.com/?m=1                                        ( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )  ( ४९ )   बहूभात वाली पार्टी में माँ ही छायी हुई थी। सभी देख रहे थे कि वह दुलाल चक्रवर्ती के साथ-साथ रहने की फ़िराक में थीं। मेरे बाबा ने संकेत भी दिए थे कि उन्हें सभी अतिथियों की ओर देखना चाहिये और नई बहू का परिचय सबसे करवाना चाहिए। परन्तु, माँ ने  हाँ-हूँ कहकर उन्हें एक ओर कर दिया था। उनसे जो भी मिलने आता, वह उससे एक ही बात सुनना चाहती थी कि वह नए पद पर सफल हों। कोई उन्हें बेटे के विवाह की बधाई देता तो वह अपनी ओर से बे वजह कहती कि उन्होंने सदैव ही भाषा और प्रान्त के बारे में कभी नहीं सोचा था। उन्होंने अपने घर में एक तरह के स्वनिर्णय का माहौल बनाया हुआ था इसीलिए उन्होंने बेटे की पंजाबी पसंद को स्वीकार किया था। वह अपने पिता यानि मेरे नाना का नाम भी बात-बात में ले लेती थीं कि कैसे उन्होंने देश के लिए कितने साल जेल में गुजारे थे और अपना जीवन आज़ादी के कार्यों हेतु झोंक दिया था। दुलाल बाबू ने एक बार उनकी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा कि वह अपने स्वतंत्रता सेनानी पिता की सच्ची विरासत थीं और उन्होंने अपने लिए एक पंजाबी बहू का चुनाव कर यह सिद्ध कर दिया था कि वाम फ्रंट की सहयोगी उनकी पार्टी ने उन्हें महिला आयोग का अध्यक्ष बनाने का सही निर्णय लिया था। वह सच में  इस पद के लिए उचित और सक्षम प्रत्याशी थी। वह समाज का हित करने में सफल होने वाली थी। इसी तरह की बातें इधर-उधर हो रहीं थीं। कभी-कभी मुझे और पिंकी को और साथ ही मेरे बाबा को अकेलापन सा महसूस होने लगता था हालाँकि पार्टी में काफी लोग थे। अपने लोगों के बीच में लगने वाली नीरवता एक तरह का अस्पष्टीकृत कष्ट ही होता है।  संध्या से आरम्भ हुई पार्टी कुछ घंटों में ही क्षीण होने लगी थी। पिंकी ने पूछा, ' क्या बात है, लोग घर लौट रहे हैं ? मैंने कहा, ' यह चंडीगढ़ या दिल्ली नहीं है.. जो देर रात तक खाना-पीना चलता रहे .. ये बंगाल के संस्कार हैं कि समय से घर पर लौट आया जाये ..' पिंकी ने कुछ आश्चर्य के साथ मेरी बात सुनी थी। उसे देख मैं मुस्कुरा दिया था और कहा, ' ये घरेलू कार्यक्रम है, इसलिए.. वैसे देर रात तक चलने वाली पार्टियाँ तो कलकत्ता में भी जम कर होती हैं..'  ग्यारह बजे तक सब लोग जा चुके थे। परिवार के लोग और कुछ सम्बन्धी ही रह गए थे। इन्द्राणी भी हमारे पास आकर बैठ गयी थी। मैंने उनसे पूछा कि सब कैसा रहा था ? वह मुस्कुरायी और कहा कि ठीक ही था किंतु उसे दिल्ली वाली पार्टी में अधिक मज़ा आया था। पिंकी ने उसकी बात सुनी तो कहा, ' हमारे अभिजीत साहब को तो दिल्ली की पार्टी बहुत लंबी लगी थी.. इन्हें तो समय से घर पहुँच जाना पसंद है..'  मैंने सफाई देते हुए कहा, ' ये बात नहीं है..बस यूँ ही कहा था कि कलकत्ता में लोग समय से पार्टी में खा कर घर लौट जाते हैं..'  इन्द्राणी ने हँसते हुए पिंकी को देखा और कहा, ' अरे, पार्टी का अर्थ केवल खाना थोड़ा ही होता है ..कौन समझाए, अब तुम ही इस लड़के को तैयार करना.. हम तो फेल हो चुके हैं..'  बाबा और माँ भी हमारे पास आ बैठे थे। बाबा ने और विलम्ब न कर घर जाने की बात उठाई तो मैंने पिंकी की ओर देखा और मुस्काया। वह भी मुस्कुरा दी। हम दोनों समझ गए थे कि सच में बंगाली लोग समय से घर आ जाने में विश्वास रखते हैं।  माँ ने यहाँ अंतिम क्षणों में भी अपनी ही बात उठायी थी। उन्होंने कहा कि दुलाल बाबू काफी मददगार हो रहे थे। वह उनकी प्रशंसा किये जा रही थी। उन्होंने बताया कि दो-तीन दिन के भीतर ही उन्हें ने पद ग्रहण कर लेने की उम्मीद थी। मैंने कहा, ' परन्तु हम तो यहाँ होंगे नहीं.. हम तो कल संध्या की फ्लाइट से गोवा निकल जायेंगे और पांच दिन बाद लौटेंगे..' माँ ने कहा कि इससे कुछ अंतर नहीं पड़ेगा। हमें तो गोवा जाना ही होगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा, ' लेकिन इस अवसर पर यदि मनप्रीत यहाँ होती तो वह अपनी मम्मी जी का सम्मान होते देख लेती..उसके हमारे घर में प्रवेश के साथ ही तो यह शुभ समाचार आया था..भाग्यवान बहू है, मेरी ..' उन्होंने पिंकी को स्नेह से दुलारा था। पिंकी ने मुस्काते हुए कहा, ' मम्मी जी, ऐसा करते हैं, मैं अपनी टिकट कैंसल करवा देती हूँ.. ये अकेले घूमकर आ जाएं.. मेरा तो गोवा देखा हुआ भी है..' उसका शरारतीपन झलक रहा था। इन्द्राणी ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ' टिकट कैंसल करवाने की आवश्यकता नहीं है मनप्रीत, तुम्हारी टिकट पर मैं चली जाती हूँ..' इस बात पर सब हँस पड़े थे। पिंकी ने इन्द्राणी की ओर देखते हुए कहा, ' आईडिया बुरा नहीं है.. कैंसलेशन के पैसे भी नष्ट नहीं होंगे..' उन दोनों की इन बातों में मैं झेंप रहा था। बाबा ने पुनः घर की ओर निकल जाने की उत्सुकता दिखाई थी। उन्होंने कहा, ' इस जगह की बुकिंग साढ़े दस बजे तक की है, अब ग्यारह बज चुके हैं..वे लोग एक्स्ट्रा चार्ज लगा देंगे..'  माँ ने कहा, ' छोड़ो..एक्स्ट्रा चार्ज  ..लगाएंगे तो लगाने दो..बहुभात है, समय तो लगेगा ही..'  माँ की बात सुन पिंकी ने प्रतिक्रिया दी, ' अरे ! अब तो मम्मी जी तो वीमेन कमीशन की चेयरमैन हैं.. किसी की एक्स्ट्रा चार्ज करने की हिम्मत ही न होगी..'  इन्द्राणी ने कहा, ' चेयरमैन नहीं, चेयर वूमेन..' माँ को भी इस बात पर उत्सुकता जगी। उन्होंने अपने पति की ओर देखा। मेरे बाबा ने कहा, ' ऐसे में अंग्रेजी में चेयर पर्सन कहते हैं.. कुछ भी कहते हों, पद तो पद है, अब चलो.. बहू को भी नींद आ रही होगी..'  हम लोग घर आ गए थे। यहाँ फिर से बातें आरम्भ हो गयी थीं। माँ को अपने नए कार्यालय की चिंता हो रही थी। बाबा ने कहा कि जहाँ सरकार कार्यालय देगी वहीं से काम करना होगा। माँ ने हूँ कर दिया, ' ऐसे कैसे ? मुझे अपनी कार्य सुविधा देखनी होगी.. जब तक मुझे मेरे हिसाब से कार्यालय नहीं मिलेगा, मैं पदभार ग्रहण नहीं करुँगी..' बाबा ने चुटकी लेते हुए कहा, ' अधिक नखरे मत दिखाओ  ..वरना वो अभिनेत्री इंतज़ार में बैठी है, उसे पद दे दिया गया तो हाथ मलती रह जाओगी..' इस बात पर माँ चौंक गयी थी, ' ठीक है, तब तक मैं घर से ही काम करुँगी.. कल ही दुलाल दा से बात करुँगी ..' पिंकी चुपचाप एक ओर बैठी बातें थी। मैंने ही उसे कहा, ' चलो, सोने चलते हैं  ..' हम दोनों अपने कमरे में आ गए। मैंने देखा, कमरा कुछ अधिक ही सुव्यस्थित सा दिख रहा था। मैंने आश्चर्य जताया और पूछा, ' पिंकी, यह हमारा कमरा इतना अच्छा कैसे हो गया ..' उसने तड़ाक से उत्तर दिया, ' पहली बात मुझे पिंकी नहीं बुलाओगे, मेरा नाम मनप्रीत है.. दूसरे हमारे पास एक जादू है जिससे काम चुटकी बजाते ही हो जाते हैं..' मैंने कहा, ' मेरे लिए तो तुम पिंकी ही हो.. हाँ, दूसरों के सामने तुम्हें मनप्रीत कहूंगा..खुश.. अब बताओ, कमरा ठीक कैसे किया ? उसने कहा, 'खुद सोचो..' फिर उसने कहा, ' पार्टी कुछ ढीली सी रही..' मैंने भी उसी के अंदाज़ में कहा, ' पहली बात ये कोई पार्टी नहीं थी, यह एक पारम्परिक अनुष्ठान था जिसे बहुभात कहते हैं ..' वह मुस्कुरा दी, ' मेरे लिए तो यह रिसेप्शन पार्टी थी.. हाँ, सबके सामने मैं बहुभात ही कहूँगी.. अब खुश ? हम दोनों हँस पड़े थे। ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर  ..)

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