Chander Dhingra's Blog

Wednesday, November 11, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -45

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II-     चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1    ( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )( ४५ )   अब हमारी कलकत्ता की वापसी थी। सामान बहुत बढ़ गया था। माँ सूटकेसों को देख परेशान थी या प्रसन्न, समझ न पा रहा था। मैं और पिंकी तो अगले दिन शाम को फ्लाइट से पहुँचने वाले थे। माँ को यही चिंता थी कि मैं उनके साथ न लौट रहा था। जोगेन्दर अंकल ने माँ को आश्वस्त किया था कि वह सब व्यवस्था करवा देंगे और कोई दिक्कत न होने देंगे। इन्द्राणी का मन भी एक दिन रुक, हमारे साथ ही फ्लाइट से लौटने का था परन्तु उसे अपना मन मारना पड़ा क्योंकि यह संभव न था। पिंकी और मैं एक दिन के लिए उसके मामा के घर रुकने वाले थे। मैं अपनी ख़ामोशी के साथ खुश था। पिंकी, मामाजी.. मामाजी कहती रहती थी। मुझे धीरे से गर्दन हिलाकर उसकी हाँ में हाँ करना होता था। मामाजी ने हमें एक कार दे दी थी। उन्होंने कहा था, ' खूब घूमो-फिरो..ये एक दिन दिल्ली के लिए है..'  रात उस पांच सितारा होटल में कटी थी। देर रात तक हम परिवार के खास लोग एक ही कमरे में जमे रहे थे। मेरे माँ-बाबा बहुत खुश थे। लगता था उनका पंजाबी लड़की को लेकर जो भ्रम था, वह धीरे-धीरे धुंधलाता जा रहा था। हम दोनों जब अपने कमरे में गए, तब तक भोर के चार बज चुके थे। दोनों थक कर चूर थे। होटल की तरफ से हमारे कमरे को भली भांति सजाया गया था। चारों ओर फूल सजे थे। टेबल पर फ्रेम में सजी हम दोनों की फोटो रखी थी। ये फोटो हमारे विवाह की ही थी। इसके साथ ही हमें वैवाहिक जीवन की शुभ कामनाएं देता एक बहुत ही सुन्दर कार्ड भी रखा हुआ था जो होटल के मुख्य प्रबंधक की ओर से था। मैं हैरान था, होटल वालों ने इस अल्प समय में ही कैसे इस फोटो का प्रबंध कर लिया था। यह हमारे नव जीवन की प्रथम रात थी। हम दोनों मौन, संकुचित और एक-दूसरे के प्रति आभार से भरे हुए थे। शब्द थे किन्तु कहीं खो से गए थे। इस मौन को तोड़ते हुए पिंकी ने अपने बैग में से एक फोटो फ्रेम निकाला। यह गुरुनानक देव जी का चित्र था। उसने हम दोनों की फोटो के पास इसे रखते हुए, प्रणाम किया और मुझे भी ऐसा करने को कहा। मैंने हँसते हुए कहा, ' अरे यहाँ भी ईश्वर की स्तुति ? उसने कहा, ' हम एक नया संसार बसाने जा रहे हैं, परमात्मा का आशीष तो लेना ही होगा ..' मैंने कहा, हाँ और आगे बढ़ प्रणाम किया। हम दोनों एक-दूसरे के हाथ थामे, मुस्कुराते जा रहे थे। यह पहली रात नहीं एक नई सुबह थी। एक दूसरे के प्रति निशब्द से कुछ आश्वासन, कुछ वादे और कुछ उड़ते से सपने थे। वही राजधानी एक्प्रेस ट्रैन थी जो दो दिन पहले हमें लेकर आयी थी। तब रोमांच था, आज एक संतुष्टि थी। भीड़ भाड़ वाले नयी दिल्ली स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर, हमारा बंगाली दल अलग सी पहचान दिखा रहा था। पिंकी थी जो सब में घुलमिल गयी थी। वह नवनवेली, शरमा तो रही थी परन्तु प्रयत्नशील थी कि सब उसे अपना ही जाने । वह माँ-बाबा की सुविधा-असुविधा को देख रही थी। उसके प्रयासों को देख, मेरे माँ-बाबा दोनों बहुत खुश थे। ट्रैन चलने को हुई तो उसके प्रति माँ का स्नेह उमड़-उमड़ पड़ा था। एक बार फिर से दुर्गा दुर्गा स्वर उठा था। इन्द्राणी हँसते हुए मेरे कानों में कह गयी, ' बहूरानी को ज्यादा परेशान मत करना..' अब माँ की आंखें नम हो रही थी। मैं कुछ कहता इससे पहले पिंकी, माँ को सहज करते हुए बोल उठी, ' मम्मी जी, चिन्ता न करें.. आप कल सुबह पहुँच रही हैं और हम शाम को..मेरे लिए मछली बनवा कर रख्नना.. मिलकर डिनर करेंगे..' फिर वह बिशाखा को देख बोली, ' दीदी, आप मेरे लिए मीठा दही लाकर रखना..' बिशाखा शरमाते हुए हंसने लगी थी। उसने बांग्ला में कुछ कहा था। सब लोग उसकी बात पर हँस पड़े थे। हम दोनों ट्रैन से नीचे उतर आये थे और धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म से बाहर की ओर खिसकती ट्रैन को देखते जा रहे थे। स्टेशन से बाहर आ, पिंकी ने कहा कि आज की शाम ही हम दोनों के पास थी। अगले दिन तो कलकत्ता के लिए निकल जाना था। उसका विचार था कि यह जो समय मिला है उसे अपने हिसाब से बिताया जाना चाहिए था। मुझे क्या एतराज़ हो सकता था। वैसे भी मामाजी के घर पर बाहर से आये हुए सभी सम्बन्धी रुके हुए थे। उनके सरदारों वाले ठहाकों के बीच में, मैं तो मुरझाई हुई कविता की एक पंक्ति सा बन के रह जाने वाला था। मैं अधिक से अधिक समय बाहर ही बिताना चाहता था। मैं चाहता था, देर रात घर पहुंचे और सीधे अपने बिस्तर में घुस जाएं। मैंने सुझाव रखा, ' ठीक है, पर खाना भी बाहर ही कहीं खाते हैं..' पिंकी ने हाँ कहा। गाड़ी में बैठते ही, उसने ड्राइवर को किसी जगह का नांम बताया। ड्राइवर सुन हैरान हो गया था। उसने पंजाबी में कुछ कहा तो पिंकी ने अंग्रेजी में जवाब दिया ' नो वरी '  मैंने पूछा तो उसने बताया कि ड्राइवर चिन्ता कर रहा था कि उस जगह आने-जाने में तीन घंटे लग जायेंगे क्यों कि ट्रैफिक का समय था। वो मुस्कुरा रही थी। उसने अपने बैग से मोबाइल निकाला। मैं हैरान हो देखने लगा। मोबाइल उन दिनों कुछ खास लोगों के पास ही हुआ करता था। उसने कहा, ' नया है, मम्मी से मिला है..आपके लिए भी है ..घर जाकर मिल जायेगा..' उसने अपनी मम्मी को फोन लगाया और कहा कि हम लोग देर से घर लौटेंगे और डिनर कर के ही आएँगे। मैंने उसका मोबाइल फोन देखना चाहा था । ये नोकिआ का फोन था। मैंने कहा, ' अरे, ऐसा ही तो मैं भी लेना चाहता था.. ' वह हँस पड़ी, ' लो, मन ही मन में आपने चाहा और आज मिल भी गया..'  मैंने उस दिन उसे आप से तुम पर आ जाने का निवेदन किया था। उसने कहा कि पंजाबियों में पति को आप ही कहा जाता है। ये उसके परिवार के संस्कार थे परन्तु वह कोशिश करेगी कि मेरे लिए आप से तुम पर आ जाये। हमारी कार दिल्ली की सड़कों पर दौड़ी चली जा रही थी। कनॉट प्लेस, विदेशी दूतावासों के क्षेत्र चाणक्यपुरी से होती हुई। पिंकी मुझे किसी गाइड की तरह, दाएं-बाएं दिखा रही थी। मैं हैरान था कि चंडीगढ़ की लड़की को दिल्ली के बारे में इतना सब कुछ कैसे पता था ? उसने स्वयं से मेरी शंका का निराकरण कर दिया था। उंसने कहा, ' बचपन से ही दिल्ली आ रही हूँ.. दो-चार दिन मिले नहीं कि दिल्ली में मामाजी के पास..मुझे तो चंडीगढ़ से अधिक  दिल्ली अपना लगता है.. बहुत पहले मामाजी दिल्ली कैंट एरिया में रहते थे..वहां का गुरुद्वारा मुझे बचपन से अच्छा लगता है.. मामाजी इस गुरूद्वारे में लाया करते थे.. ये मिलिट्री एरिया है..इस गुरूद्वारे में सेना के बहुत लोग आते हैं..' फिर उसके चेहरे पर एक मुस्कान बिखर आयी थी, वह बोली, ' यहाँ गोपीनाथ मार्किट है..वहां एक होटल है.. बहुत अच्छा खाना है.. छोटा सा होटल है परन्तु खाना..एक नंबर.. बचपन में तो खूब खाते थे वहां..'  मैं उसकी ख़ुशी देखता रह गया था। मैं कहा, ' चलो, आज तुम्हारी बचपन की यादें ताज़ा कर लेते हैं..वहीं डिनर करते हैं.. ' वह उत्साहित हो गयी, ' सच ..पर वह छोटा सा  होटल है और सभी तरह के लोग आते हैं..' मैंने कहा कि इसमें क्या बात है.. वहीं चलते हैं..गुरूद्वारे में मत्था टेक कर, वहीं खाना खाएंगे ..देखें तो हमारी मनप्रीत का बचपन का होटल..'  मेरा गुरूद्वारे जाकर, मत्था टेकने का सुझाव, उसे अच्छा लगा था।   ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर  ..)

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