Chander Dhingra's Blog
Wednesday, November 18, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 46
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II- चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )
( ४६ ) उस रात मामाजी के घर रहना भारी लग रहा था। जोगेन्दर अंकल, सुखबीर अंकल और उनके साथ आये परिवार जन के साथ-साथ कनाडा से आये बंटी का परिवार वहां था और धमा चौकड़ी मचाये हुए था। मैं पूरी तरह से इस माहौल में खुद को मिस फिट महसूस कर रहा था। पिंकी का गैर पंजाबी और बंगाली पति होने के कारण, सभी मेरे ओर घेरा सा बनाये हुए थे। ' इनके लिए रसगुल्ला लाओ जी .. ' चितरंजन पार्क से फिश लाकर खिलाओ जी..' मैं चुपचाप खिसिया रहा था कि रसगुल्ला और मछली से आगे भी बंगाल है। संकोच और अकेलापन था जो मुझ पर दबाव डाल रहा था कि पिंकी मेरे साथ ही बैठी रहे। इस भीड़भाड़ में केवल वह और उसकी बहन ही थे जिनके साथ मैं सहज हो सकता था। लवली तो अपने अंग्रेजी बंटी भैय्या के साथ चहकती फिर रही थी। मैंने एक-दो बार उसे अपने पास बुलाने का प्रयास किया किंतु वह 'जीजाजी, आपको तो दीदी मिल गयी है, अब हम क्या करें ..' कहकर भाग गयी थी। उधर बंटी अपनी और से न जाने क्या-क्या कार्यक्रम बनाता जा रहा था। मामाजी का भव्य आवास शादी घर के लिए बहुत सुंदरता के साथ सजाया हुआ था। वह इस तरह से कामकाज में जुटे हुए थे मानों उनकी ही लड़की की शादी थी। वैसे पिंकी के प्रति उनके प्यार को देखें तो सच में उनकी बेटी की ही तो शादी थी। जोगेन्दर आंटी स्वयं कह चुकी थी कि सब दायित्व उनके भाई ने अपने कंधे पर लिया हुआ था। दिल्ली में शादी हुई थी तो चंडीगढ़ वाले तो कुछ अधिक कर पाने की स्थिति में न थे। देर रात बंटी ने कहीं घूम कर आने का विचार सुझाया। पिंकी -लवली तो चहक उठी थी। मैं केवल ना नुकुर ही करता रह गया था। बस तुरंत एक बड़ी गाड़ी निकाली गयी और हम चार न जाने किस ओर निकल गए थे। यहाँ वहाँ भटकते किसी होटल के कॉफ़ी बार पहुंचे थे। मैं आश्चर्य में था कि आधी रात के समय भी वहां भीड़भाड़ और रौनक थी। ये समाज के किस वर्ग के लोग थे जो दुनिया से बेफिक्र और बेखौफ अपने में ही मस्त थे। मेरा वामपंथी विचारधारा की ओर झुका दिमाग बे चैन और क्षुब्ध था। मुझे लगा यह क्या हो रहा है हमें ? हम भारत जैसे देश में किस दिशा की ओर बढ़ रहे हैं ? पिंकी ने मुझे खामोश देखा तो कहा, ' ठीक तो हो न, क्या बात है चुपचाप हो ? मैंने कहा कि सब ठीक था, बस रात अधिक हो चुकी थी सो थोड़ी थकावट सी थी। उसने पूछा कि क्या घर चलें ? मैंने कहा कि नहीं सब ठीक था। उधर बंटी था जो मस्ती के मूड में था और यहाँ कुछ समय बिताना चाहता था। पिंकी मेरी मन स्थिति भाँप चुकी थी। उसने बंटी को कहा कि अब चलना चाहिये। बंटी ने बदले में मुझ से पूछा, ' क्यों जीजाजी, यहाँ सबके साथ मन नहीं लग रहा, वाइफ के साथ एकांत चाहिए ? लवली भी हँसने लगी। पिंकी ने कहा, ' जीजा जी को नहीं, तेरी दीदी को तेरे जीजाजी अकेले में चाहिये.. समझे, अब यहाँ से निकलो..' घर पहुंचे तो देखा,स्थानीय मेहमान जा चुके थे। मामाजी और दोनों अंकल एक ओर बैठे थे। उनके हाथों में गिलास थे और सामने एक बोतल और कुछ ड्राई फ्रूट रखे थे। मैं हैरान था कि रात के इस पहर भी ये सब चल रहा था। मामाजी ने इशारे से मुझे भी उनके साथ जुड़ने की दावत दी। मैंने मुस्कुराते हुए न का इशारा करते हुए थैंक्स कहा था।
हम अपने कमरे में गए तो लगा किसी बड़े नामी होटल का विशेष कमरा हो। सब कुछ पांच सितारा स्तर का था। मैंने पिंकी से पूछा, ' ये कमरा तो बहुत शानदार है ? उंसने बताया कि उसके मामाजी को अपने घर को शानदार रखने का बहुत शौक था। उसने यह भी बताया कि हमारी शादी के लिए उन्होंने इस कमरे को नया रंग रूप दिया था। मैंने कहा कि वह बहुत सफल कारोबारी थे और अपने पैसे को इस तरह खर्च कर सकते थे, 'अमीर लोग धन खर्च नहीं करते, लुटाते हैं..' मेरी इस बात पर उसने कोई प्रतिक्रिया न दी थी। हम आने वाले दिनों की बातें करते रहे थे। मैं मुग्ध था उसके सौंदर्य, उसकी लावण्यता और उसकी सबको अपना बना लेने की दक्षता पर। उसे छुआ तो प्रतीत हुआ कि कुछ था जो मुझे सबसे अलग कर कहीं दूर उड़ा ले जाना चाहता था। वह रात थी जो तितली के पंखों सी कोमलता लिए, इस पुष्प से उस पुष्प को छूती हुई, वाटिका में शुभगन्ध उड़ाती चली जा रही थी।
सुबह हंसी-ख़ुशी के माहौल में सबसे मुलाकात हुई। बंटी और लवली ने मेरी खिंचाई शुरू कर दी। ये जीजाजी शब्द न जाने क्यों असहज सा लग रहा था। मेरा मन कहीं बाहर निकल जाने का हो रहा था। इधर घर के बड़े लोग थे जो हर क्षण मुझे कुछ न खुश खिलाये जाने की फ़िराक में थे। मैं अब जल्दी से जल्दी अपने कलकत्ता पहुँच जाना चाहता था। मेरी निगाहें पिंकी को खोज रही थी पर वह थी कि अपने स्वजनों में घिरी हुई थी। वह आते-जाते मेरा हालचाल पूछ जाती और कह जाती, ' कुछ खाने को लाऊँ ? दोपहर का खाना लगाया गया था तो मैं देखकर दंग रह गया था। इतना कुछ ? नौकर-चाकर लगे हुए थे, सबकी फरमाइश को पूर्ण करने में। मामाजी के दिल्ली में रह रहे सम्बन्धियों के साथ साथ मित्रगण भी आये हुए थे। उन सब का एक ही कथन था, ' आज तो मनप्रीत ससुराल चली जाएगी.. इसलिए मिलना तो था ही..' मेरे पास कोई आकर बैठता तो कलकत्ता के बारे में ही पूछता था, जैसे मेरी रूचि सिर्फ कलकत्ता और बंगाल हो। जो लोग कभी कलकत्ता गए हुए थे, वे वहां की भीड़ और वहां की मिठाई की ही बातें करते। मैं ससुराल की इन बातों खिन्न हो रहा था और इन बेकार सी बातों से मुक्ति चाहता था। मैं खिन्न होते हुए भी मुस्कुराने और सरदारों की बातों में रूचि दिखाने को विवश था। अचानक किसी ने हमारी फ्लाइट का समय जानना चाहा और सुनते ही कहा कि आज एयरपोर्ट की ओर के ट्रैफिक में समस्या थी और हमें समय से निकल जाना चाहिए था। ट्रैफिक समस्या का सुन, मैं खुश हो गया था कि कहीं तो हमारे कलकत्ता जैसी बात हुई थी। मैंने पिंकी को इशारे से बुलाया और उसे कहा कि अंकल कह रहे कि हमें एयरपोर्ट के लिए निकल जाना चाहिए वर्ना फ्लाइट मिस हो सकती थी। उसने अपने मम्मी-पापा से बात की और मैंने देखा कि हमें विदा करने की तैयारियाँ होने लगी थी। चार बड़े बड़े सूट केस थे। साथ ही कुछ बैग छोटे बैग भी। पिंकी की मम्मी मेरे हाथों में एक बड़ा सा मिठाई का डिब्बा दे गयी थी। मैंने पूछा कि यह क्या था तो उन्होंने मुस्काते हुए कहा,' आप कह रहे थे न दिल्ली के लड्डुओं के बारे में, खास आपके लिए है मंगवाए हैं..' मुझे याद आया कि किसी क्षण बातों-बातों में मैंने कहा था कि दिल्ली के लड्डू तो बहुत मशहूर होते हैं।
कुछ समय बाद हम लोग एयरपोर्ट के लिए निकल आये थे। एक गाड़ी में मैं, पिंकी, लवली और बंटी थे। गाड़ी बंटी चला रहा था। दूसरी गाड़ी में पिंकी के मम्मी-पापा और मामाजी-मामीजी थे। उस गाड़ी का स्टेयरिंग मामाजी के हाथ में था। मैं अभी से ही अपने नगर कलकत्ता और बंगाल में था। मैं खास अवसरों पर की जाने वाली ईश्वर स्तुति को नापसंद करता हूँ और इन्हें एक कमज़ोरी मानता रहा हूँ परन्तु उस दिन न जाने क्यों, गाड़ी में बैठते हुए, बंगाली परंपरा को निर्वाह करते हुए, मैंने धीमे स्वर में, दुर्गा-दुर्गा कहा था। साथ ही पास बैठी पिंकी को ऐसे देखा था कि कहीं उससे कुछ चुराया हो । ( आज यही तक, आगे यहीं पर, अगले गुरुवार को..)
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