Chander Dhingra's Blog

Friday, September 18, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 35

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II-चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra इस लम्बी कहानी को हर हफ्ते साझा करने का सिलसिला जारी है, अब आगे  .. ( ३५ )   माँ ने अपनी एक पंजाबी परिचित से ' रोका ' के सम्बन्ध में पूछा। उन्हें इस शब्द पर बहुत हँसी आयी। वह मुझे चिढ़ाने के लिए कहती रही कि मुझे अब रोक लिया गया था और मैं अब कहीं नहीं जा सकता था। कभी कहा कि मैं रिज़र्व हो चुका था, कभी कहा कि मेरी बुकिंग हो चुकी थी। एक बात अवश्य थी कि अब माँ और बाबा दोनों बहुत खुश थे। उन्हें इस बात की ख़ुशी थी कि घर में एक लड़की आ रही थी। हम अक्सर सास-बहू की नोंकझोंक के किस्से सुनते रहते हैं परन्तु बेटे की शादी की बात चलते ही घर में बहू के आने की सबसे अधिक ख़ुशी सास को ही होती है। माँ जोर-शोर से रविवार को होने वाले अनुष्ठान के काम में जुट गयी थी। वह अपने गैर-बंगाली परिचितों को फोन कर रही थी कि इस अवसर पर उनकी ओर से क्या-क्या किया जाना चाहिए। अगली शाम हम तीनों मिल बैठे तो माँ ने मेरे हाथ में कागज़-पेन थमाते हुए कहा, ' लिखते जाओ क्या क्या करना है..'  मैंने कहा, ' शुरू से शुरू करते हैं.. एयरपोर्ट पर लेने कौन कौन जायेगा.. और दो गाड़ियाँ तो चाहिए ही होंगी..  ये दोनों गाड़ियां अगले दिन के लिए भी चाहिए होंगी..'  माँ ने हाँ में स्वीकृति दी। बाबा ने कागज-पेन मेरे से ले लिया और वे खुद लिखने लगे। जोगेन्दर अंकल ने कहा था कि वे लोग रविवार को सुबह ग्यारह बजे तक हमारे घर पर आ जायेंगे, तो उनके लंच की भी व्यवस्था करनी होगी। बाबा ने बिशाखा को आवाज़ देकर बुलाया और उससे अच्छा से अच्छा भोजन बनाने को कहा। उन्होंने उसे एक खास मछली और नारियल वाली झींगा बनाने की हिदायत भी दी। माँ ने उन्हें लगभग फटकार लगाते हुए कहा, ' ये घर का खाना उस दिन नहीं चलेगा ..पंजाबी लोग हैं तो पंजाबी खाना किसी अच्छे होटल से मंगवाना होगा..'  इस पर बाबा बिगड़ गए। उनका कहना था वे लोग बंगाली परिवार में आ रहे थे तो उन्हें बंगाली खाना ही परोसा जाना चाहिए, भले ही घर में न बना कर होटल से मंगवाया जाये। दोनों ने मेरा मत जानना चाहा। मैं भी असमंजस में आ गया था। अतिथियों को  उनकी रूचि का खाना खिलाया जाना चाहिए या अपनी रूचि का ? यह तय हुआ कि पंजाबी खाना ही मंगवाया जायेगा और कई तरह की बंगाली मिठाइयाँ और मिष्टी दोई मंगवाई जाएगी। माँ ने पंजाबी होटल भी तय कर दिया था। यह प्रसिद्द और पुराना ढाबानुमा होटल  है जिसे एक नामी चित्रकार की सरपरस्ती के कारण जाना जाता है। मिठाइयों और दही के लिए भी एक खास विरासती मिठाई की दुकान का नाम तय कर दिया गया जो कलकत्ता के उत्तरी इलाके में है। माँ अब लड़की को दी जाने वाली सामग्री के विषय पर जुट गयी परन्तु उन्होंने कहा कि ये सब उन पर छोड़ दिया जाना चाहिए और किसी को भी इस विषय पर अपनी टाँग नहीं डालनी चाहिए। माँ सच कह रही थी। इन सब मामलों में उनका मुकाबला न था।  बाबा इन दिनों बहुत चुस्त से हो गए थे। प्रकृति का एक अद्भुत नियम है कि भीतरी प्रसन्नता स्वाभाविक रूप से बाहर भी झलकने लगती है। उनकी यही भीतरी प्रसन्नता थी जिसने उन्हें चुस्त बना दिया था। उन्होंने खुद से काफी सारे काम निपटा दिए थे। खाने और मिठाई आदि के आर्डर भी दे आये थे। दो गाड़ियों की व्यवस्था हो गयी थी। उनके उत्साह पर माँ भी हैरान थी। अपने और मेरे लिए वे गरियाहाट इलाके की एक मशहूर दुकान से दो शानदार बंगाली पोशाकें भी ले आये थे। वे ऐसे काम खुद से कभी भी न किया करते थे। उन्हें भय रहता था कि घर पर उनकी पसंद को नकार दिया जाएगा। परन्तु इस बार वे जो लाये थे उसे देख, माँ भी वाह-वाह करने लगी थी। माँ ने रंग, डिज़ाइन, मूल्य किसी भी बात पर कुछ न कहा। वह पूरी तरह संतुष्ट थी। माँ की संतुष्टि ने बाबा को एक तरह के आत्मविश्वास से भर दिया था। वह हर काम में अधिक रूचि लेने लग गए थे और इधर उधर आते-जाते माँ से पूछते, ' सब ठीक है न, कुछ आवश्यकता हो तो बताओ ? फिर वह शनिवार भी आ गया। उनकी फ्लाइट ग्यारह बजे पहुँचनी थी। मैं तो सुबह से ही बेचैन था। माँ-बाबा भी उत्साहित थे। दो गाड़ियाँ जो बुक की गयी थी, आठ बजे से ही दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गयी थीं। मुझे हैरानी हुई कि इतना पहले क्यों आ गयी थी परन्तु मैं जानता था कि बाबा ने अधिक सावधानी दिखाते हुए समय से काफी पहले ही बुला लिया होगा। इन्द्राणी दीदी को भी साथ लेकर जाना था। गाड़ियों को देख, बाबा ने सबको तैयार हो जाने का आदेश दे दिया। माँ और मैं दोनों उनकी हड़बड़ी पर झुंझला रहे थे। अंततः नौ बजे हम लोग इन्द्राणी दी के घर के लिए निकल गए। इन्द्राणी दी पहले से ही तैयार थी। वह बहुत सुन्दर और लुभावनी दिख रही थी। उन्हें वहाँ से लिया और दस बजे के आसपास एयरपोर्ट पहुँच गए। हम सभी बाबा की जल्दबाज़ी पर परेशान हो रहे थे और वह थे जो संतोष जाता रहे थे कि समय पर पहुँच गए थे। उन्हें कलकत्ता के यातायात व्यवस्था पर कभी भी भरोसा नहीं रहा था। वह अक्सर कहा करते थे कि ट्रैन और प्लेन के लिए घर से तीन-चार घंटे पहले ही निकल जाना चाहिए।   समय से फ्लाइट आ गयी और हमारे अतिथि बाहर निकल आये। मैं कुछ अधिक ही संकोच में था या उत्तेजना में, कह नहीं सकता परन्तु भीतर ही भीतर एक तूफान सा महसूस कर रहा था। मैंने तीनों के पाँव छुए। हम चारों पारंपरिक बंगाली हिसाब से तैयार होकर आये थे। माँ और इन्द्राणी दी बंगाली तांत की साड़ी में थीं। मैंने पेंट-शर्ट पहना हुआ था और बाबा पूरी तरह से बंगाली धोती-कुर्ते की पोशाक में थे। मुझे यूँ झुककर सरदार लोगों का चरणस्पर्श करना, आसपास के लोगों के लिए कुछ अनूठा सा था। जोगेन्दर अंकल ने बाबा के हाथों में एक पैकेट पेश किया और इसी तरह का एक पैकेट आंटी ने मेरी माँ को हाथ जोड़ते हुए दिया। सफर की कुशलता को लेकर थोड़ी बहुत बात हुई और हम लोग अपनी गाड़ियों की ओर बढ़ गए। उन लोगों की रहने की व्यवस्था पंजाब क्लब में थी। माँ ने रविवार को ग्यारह बजे के भीतर अपने घर आने का निमंत्रण दिया और लंच के बारे में भी बताया। अत्यंत विनम्रता से हाथ जोड़ प्रणाम करते हुए वे लोग निकल गए और उनके पीछे पीछे हमारी कार भी।  घर पहुँच कर अपने पंजाबी अतिथियों के बारे में ही चर्चा होने लगी। इन्द्राणी दी को जोगेन्दर दंपति अच्छे लगे परन्तु उनके साथ आये पिंकी के मामा, अपने को कुछ अधिक ही समझने वाले लगे। मैंने  बताया कि वे बहुत पैसे वाले थे। उनका दिल्ली में बहुत व्यापक कारोबार था। धन-दौलत के कारण उनका इस तरह का होना स्वाभाविक था। मैंने यह भी बताया कि उनकी अपनी संतान नहीं थी। वह अपनी बहन की लड़कियों को ही अपनी संतान मानते थे, पिंकी तो उनकी खास थी, उसे बहुत प्यार करते थे और कहते थे  कि उनका जो कुछ भी था, पिंकी के लिए ही था। मेरी बात सुन वह चुप हो गयी। कुछ क्षण बाद उन्होंने व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा, ' अरे, मेरे प्यारे बाबू, क्या ऐसी खाती-पीती पंजाबी वाइफ को संभाल पाओगे ?  मैंने उनकी बात को अनसुनी करना ही उचित समझा और सिर्फ कहा, ' जिसके साथ आप हों, उसके लिए क्या ये मुश्किल होगा..?  हम दोनों माँ के बिस्तर पर ऐसे सुस्ता रहे थे मानों बहुत बड़ा और मेहनत का काम करके आये हों। माँ कमरे में आयी तो उन्होंने वो दो बॉक्स रख दिए और कहा कि खोल कर देखो तो क्या था।  इन्द्राणी दी और मैं एक-एक बॉक्स खोलने लगे। जो मैंने खोला उसमें खूब सारे ड्राई फ्रूट्स थे और जो इन्द्राणी दी ने खोला उसमें बहुत सारी शानदार मिठाई थी। दोनों बॉक्स के ऊपर एक-एक छोटा सुन्दर लिफाफा जिस पर एक सिक्का चिपका होता है, लगा हुआ था। खोलने पर देखा तो उनमें पांच हज़ार-पांच हज़ार रुपये के ताज़े नोट रखे थे। उन दिनों के हिसाब से ये काफी बड़ी राशी थी। हम जैसे बंगाली परिवार के लिए तो यह चौंकाने वाली राशी थी। इन्द्राणी दी हँसने लगी, ' एयरपोर्ट पर होने वाली पहली मुलाकात पर ही इतना कुछ ? अब कल देखना, क्या-क्या होता है ? ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर )   

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