Chander Dhingra's Blog
Wednesday, May 19, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 74
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ...
( ७४ ) नर्सिंग होम में बहुत सुबह ही पहुँच गया था। वहां साफ-सफाई का काम समाप्त ही हुआ था। पिंकी अपने बिस्तर पर पीछे की ओर सिर टिकाये बैठी हुई थी। मुझे देख वह हैरान हो गयी थी, ' अरे ! इतनी सुबह आ गए ? मैंने कुछ न कहा और उसके बिस्तर पर ही एक ओर को हल्का सा टिक कर बैठ गया था। उसने अब मुझे गौर से देखा और कहा,' ये क्या वही कल वाले कपड़े पहन कर आ गए हो ? मैं कुछ कहता इससे पहले उस ने खुद ही उत्तर दे दिया, ' जानती हूँ... रात को देर तक सोफे पर बैठे हुए टीवी देखते रहे होगे और वहीं सो गए होगे...अब वैसे ही उठकर यहाँ आ गए हो...चाय पी या नहीं ? मैं अभी भी चुप था। उसने कहा कि रात थर्मस भी भूल गया था और उस में चाय होगी। मैंने थर्मस ली और सामने रखे गिलास में चाय ढाली। गिलास भरी चाय मेरे हाथ में थी। मैं स्वयं और मेरे हाथ में थमी ठंडी-बेस्वाद चाय दोनों एक सामान थे। मैं अपराधी सा, बिना कुछ बोले धीरे-धीरे चाय पीने लगा। पिंकी समझ गयी कि चाय अब पीने योग्य न रही थी। उसने कहा, ' इसे फैंक दो, मेरे कप से ले लो...' मैंने हाथ के इशारे से उसे मना किया। पिंकी कुछ बेहतर तो लग रही थी। उसने कहा, ' देखो, आज काफी अच्छा महसूस कर रही हूँ... डॉक्टर से पूछना तो कि कब डिस्चार्ज करेंगे...मुझे अब इस तरह से अस्पताल में लेटे रहना अच्छा नहीं लग रहा...' मेरे पास बोलने को कुछ न था। मेरे शब्द तो शायद धुआं बन कहीं उड़ गए थे। मैं ख़ामोश था। एक शिथिलता थी जिसने मुझे रोगी सा बना दिया था। बिना कुछ बोले इशारे से मैंने उसे आराम से रहने को कहा। परंतु वह तो बात करने को उत्सुक थी। उसने कहा, ' कल मामाजी की बात अच्छी नहीं लगी न ? अरे वो तो ऐसा ही करते हैं...उन्हें सब कुछ टॉप क्लास चाहिए...अब देखो, यहाँ का इलाज क्या कुछ कम है, दो दिन में ही मैं ठीक भी हो गयी हूँ...नर्से -डॉक्टर सभी तो अच्छे हैं...आज मामाजी को सब कुछ बता दूँगी और उनकी चिंता दूर कर दूँगी...आप उनकी बातों को मन पर न लिया करो...'
पिंकी मेरा मुख ताक रही थी। वह न जाने क्या सोच रही थी पर अचानक मुझे लगा कि उसे ख़बर थी कि मेरी पिछली रात कैसी कटी थी। हम दोनों ही खामोश थे। पिंकी ने बात आरम्भ की, ' क्या हुआ, बहुत चिंता कर रहे हो ? देखो, आज तो मैं ठीक हो गयी हूँ...आप जैसे लोग छोटी सी बात पर खासा डर जाते हैं... आपकी तो आवाज़ ही बंद हो गयी है...' मैं क्या कहता ? मेरे पास तो केवल ख़ामोशी और घुटन थी। ऐसा लग रहा था मानो एक विशाल सी सागर-लहर मेरे दिमाग में आती थी और भयंकर चोट करती थी। ये क्या हो गया...ये कैसे हो गया... क्षण भर को मानों श्वांस रुक जाती, भय सा लगता और फिर महसूस होता कि वो चिल्लाती हुई लहर जो चोट कर चली गयी थी फिर से लौट कर आ रही थी।
पिंकी ने एक बार फिर से मेरी ख़ामोशी तोड़ी, 'डॉक्टर के आने का समय हो चला है... आप उससे बात कर लो और सब कुछ समझ लो...' कुछ समय में ही डॉक्टर अपनी टीम के साथ आ गए थे। उन्होंने मुझे देखा तो कहा, ' आज तो आपकी पत्नी ठीक लग रही है...परन्तु दो दिन-तीन और रहना होगा...एक तरह की मेडिकल निगरानी की आवश्यकता है...' फिर उन्होंने पिंकी की और देखते हुए कहा, ' क्या बात है, काम में बहुत स्ट्रेस रहता है क्या ? पिंकी मुस्कुरा दी और उसने अंग्रेजी में कहा, ' नो, नथिंग लाइक देट, डॉक्टर...' डॉक्टर ने कमरे से निकलते हुए मेरी और इशारा किया। मैं भी उनके पीछे कमरे से बाहर आ गया था। उन्होंने कहा कि ये जो वर्टिगो की समस्या हुई थी, वो तो कान के द्रव्य के असंतुलन के कारण हुई थी किन्तु कुछ न्यूरो समस्या भी रिपोर्ट में दिखाई दे रही थी जो शायद किसी तरह के प्रेशर और स्ट्रेस के कारण हो सकती थी। डॉक्टर ने मुझे समझाते हुए कहा, ' हम कुछ और देखना चाहते हैं... आशा है तीसरे दिन आप इन्हें घर ले जा सकेंगे...' मैंने केवल इतना कहा, ' जैसा आप उचित समझें...' डॉक्टर आगे बढ़ गए और मैं पिंकी के पास कमरे में लौट आया था। उसने मुझे देखा तो क्या कहा... क्या कहा... कहने लगी। मैंने कहा, 'सब ठीक है... स्ट्रेस के कारण ये सब हुआ है...' मैं यह कह तो गया था परन्तु उसके चेहरे को देखा तो नज़रें मिला न सका था। मैंने कहा, 'रुको मैं थोड़ा बाहर से होकर आता हूँ...' उसने मुस्कुराते हुए कहा, ' सिर्फ चाय पीना, सिगरेट मत फूँकना...' मैंने कुछ न कहा और कमरे से निकल आया। सिगरेट सुलगाने का मन हो रहा था परन्तु पिंकी की बात रोक रही थी। मैं खिन्नता की चरम सीमा पर था। तीन कप चाय पी गया था और हर कप के बाद सिगरेट सुलगाते-सुलगाते रुक जाता था। पिंकी के पास जाने का साहस न जुटा पा रहा था। जानता था कि जाना तो होगा ही। क्या मुझे सब कुछ अपनी पत्नी को बता देना चाहिए ? वह मानसिक समस्या से जूझ रही है, नर्सिंग होम में डॉक्टर की देखरेख में है, ऐसे में क्या करना चाहिए ? अंततः निश्चय किया कि फ़िलहाल मुझे सामान्य रहना चाहिए। वह घर आ जाये फिर देखा जायेगा। यही सब सोचते हुए मैं नर्सिंग होम लौटने लगा। आज उस दिन को सोचते हुए याद कर पा रहा हूँ कि मेरा दिमाग कुछ आश्वस्त सा हो चला था कि समय के साथ सब सामान्य होता चला जायेगा और मैं पिंकी को, जो मेरे और इन्द्राणी के बीच हुआ था उसे एक आकस्मिक घटना के रूप में दिखा पाऊँगा और उसे समझा पाऊँगा कि यह कैसे हो गया था।
मैं उसके बिस्तर के सामने आ बैठा था। वह भी पीठ पीछे तकिया लगा, टिक कर बैठी हुई थी। आज वह कुछ प्रसन्न लग रही थी। मुझे देख उसने पूछा, ' सिगेरट को तो हाथ नहीं लगाया न ? मैंने कहा, ' नहीं, सिर्फ चाय पी है, थर्मस वाली चाय तो बेकार हो गयी थी...' मेरे भीतर कुछ विश्वास सा जाग रहा था। अब वहां से उठने का समय हो चला था। मैंने कहा, ' थोड़ी देर में आता हूँ... ये तुम्हारी समस्या स्ट्रेस के लिए हुई है...दो दिन-तीन दिन और रहना पड़ेगा... फिर घर आ जाओगी ...लेकिन आराम करना होगा...' उसने परेशान सा होते हुए कहा, ' यहाँ रहना होगा, मैं तो घुटकर मर ही जाऊँगी...’
स्वयं के भीतर चल रहे द्वन्द पर विजय पाने के लिए विश्वास की एक हलकी सी लहर ही यथेष्ट होती है। मैं नर्सिंग होम से चला आया था। घर पहुँचने पर माँ ने सबसे पहले अपनी बहू माँ के बारे में पूछा। मैंने कहा कि दो दिन बाद घर आ जाएगी। माँ ने अब मेरे बारे में पूछा,' कैसी रही नर्सिंग होम की बेंच पर तुम्हारी रात ? मैंने हूँ कहा और अपने कमरे में घुस आया और अपने बिस्तर पर पड़ा सोचने लगा, ' ये क्या हो गया है मेरे साथ ? ये क्यों हुआ है मेरे साथ ? अब आगे क्या होगा मेरे साथ ? प्रश्न थे जो घूम-घूम कर आ रहे थे। मैं एक विचित्र सी स्थिति में था। मैं सो जाना चाहता था किन्तु एक बोझ था मेरे मन-मस्तिष्क पर जो क्षण भर के बाद ही न जाने कहाँ से आकर, मुझे किसी पर्वत शिखा से नीचे गहरी खाई में धकेल देता था। ये क्रम चलता ही चला जा रहा था। लगा कि मैं गंभीर मानसिक अवसाद में लिपटता चला जा रहा था। माँ आकर मुझ से बात न करती तो न जाने यूँ ही कब तक चलता रहता। माँ ने कहा, ' मैं किसी काम से निकल रही हूँ, वहाँ मुझे अधिक समय लग सकता है...मैं नर्सिंग होम न जा पाऊँगी...पर तुम यहाँ क्या कर रहे हो, जाओ, बहू माँ के पास जाकर बैठो... वह अकेलापन महसूस कर रही होगी...’ माँ यह कहकर घर से निकल गयी थी और मैं कुछ समय बाद नर्सिंग होम में पिंकी के सामने आकर बैठ गया था। पिंकी मुझे खामोश और व्यथित देख दुखी हो रही थी। उसने कहा, ' ये न जाने मुझे क्या हो गया था उस दिन ? पर अब तो मैं ठीक महसूस कर रही हूँ...मुझे डिस्चार्ज करवाकर निकालो यहाँ से...' मैं उसका मुख देखता रह गया। मैं एक अपराधी बन चुका था। मैंने कहा, ' दो दिन की ही बात है, पूरा चेक अप हो जाने दो...डॉक्टरों को संतुष्ट हो जाने दो...' उसने मेरी बात में सहमति जताते हुए उफ़ का भाव दिखाया था। मैं जितनी देर भी वहां रहा सिर्फ पिंकी की बातों का उत्तर ही देता रहा था। अपनी ओर से कहने को मेरे पास कुछ था ही नहीं। अपराधी के पास भ्रमित होने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। मैं स्वयं को किसी कटघरे में महसूस कर रहा था और सामान्य बने रहने का स्वाँग रच रहा था और शायद सफल भी था क्यों कि पिंकी मेरे मौन को उसके प्रति मेरी चिंता समझ रही थी। आज उस दिन को याद कर समझ पा रहा हूँ कि जो व्यक्ति किताबी ज्ञान से भरा हो और केवल शिक्षा-परीक्षा के श्रेष्ठ परिणामों के आधार पर स्वयं को उच्च मानता हो, वह अनजाने ही किस कदर चतुर होता चला जाता है। शायद यही दिमागी चतुराई अनजाने में उसकी सरलता छीनती चली जाती है और धूर्तता की सीमा को छूने लगती है। अपने स्वधर्म में हो रहे इस परिवर्तन को वह देख ही नहीं पाता, कई कई वर्षों तक और कभी तो जीवन के अंतिम क्षणों तक। ( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे, यहीं पर ...)
Wednesday, May 12, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 73
टू स्टेट्स - एक नई कहानी
( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ..
( ७३ ) इन्द्राणी ने मुझे उदास सा देखा तो कहा, ' यह क्या हुआ हमारे नायक बाबू को... पत्नी की जरा सी तबीयत ख़राब होने से परेशान हो गए ? अरे, ये तो जीवन है, यहाँ कुछ न कुछ तो होता ही रहेगा...' मैं मुस्कुरा दिया था और कहा, ' चिंता तो होनी ही है...क्या तुम चलोगी नर्सिंग होम ? उसने तपाक से कहा, ' हाँ, इसलिए तो आई हूँ... तुम्हारे साथ ही जाऊँगी, कब जा रहे हो ? मैंने कहा कि कुछ ही समय में चलते हैं, खाना खाकर। मैंने माँ से कहा तो उन्होंने कहा कि नर्सिंग होम में थोड़ी-बहुत तकलीफ तो होगी किन्तु मुझे वहीं बहू माँ के पास रहना होगा और उसका हौसला बढ़ाना होगा। उन्होंने मुझे एक बड़ी शॉल भी रात में ओढ़ने के लिए दी और बिशाखा से कहा कि मुझे एक थर्मस में चाय भी दे।
मैं और इन्द्राणी पैदल ही बढ़ चले थे। इन्द्राणी ने अपनी चिंता एक बार फिर से जताते हुए पूछा, ' डॉक्टर ने कोई गंभीर समस्या या भय की बात तो नहीं बताई है न ? मैंने कहा कि ऐसा कुछ तो नहीं लगता परन्तु वे लोग कुछ न्यूरो टेस्ट्स भी करवा रहे हैं...' इन्द्राणी ने मुझे ढाढ़स बंधवाते हुए कहा कि मुझे नर्सिंग होम में रात को तकलीफ हुई होगी। मैंने हाँ में सिर हिलाया और कहा कि इन नर्सिंग होम्स में अच्छी व्यवस्था तो होती नहीं है, कमरा छोटा है और अटेंडेंट के लिए एक बेंच है, उसी पर सोना होता है। नर्सिंग होम के उस कमरे में पहुंचे तो पिंकी को सोते हुए पाया। इन्द्राणी ने उसके पास जाकर हल्के स्वर में कहा, ' मनप्रीत... ' उसने एक बार की आवाज़ में आंखें खोल दी थी। इन्द्राणी ने पूछा, ' अब कैसी हो ? पिंकी पर शायद दवाइयों का असर था। उंसने मुस्कुराकर कहा, ' ठीक हूँ दीदी...आपको भी बेकार में परेशान किया...' उसकी आवाज़ में जोर कम था परन्तु उसका चेहरा आत्मविश्वास से चमक रहा था। उसने बैठने की कोशिश की परन्तु मैंने उसे लेटे रहने को कहा था। मैं उसके पास जाकर बैठ गया था। मैंने कहा, ' घबराने की बात नहीं है परन्तु डॉक्टर हर ओर से सुनिश्चित हो जाना चाहते हैं...तुम्हें कुछ दिन ऑब्जरवेशन में रहना होगा...वर्टिगो का असल कारण स्पष्ट हो जाना चाहिए...' पिंकी ने मेरी इस बात पर लम्बी हामी भरते हुए श्वांस ली थी। मुझे लगा मानो कह रही हो, ' मेरा सब काम उल्टा-पुल्टा हो गया है...ऑफिस का भी और देवयानी वाला भी...' मैं उसकी मन की बात समझ गया था और अपनी ओर से कहा, ' अपने काम और शिडूल की फ़िक्र मत करो...' इन्द्राणी ने सामने रखी बेंच की ओर देखते हुए कहा, ' तुम्हें रात को इस बेंच पर सोना पड़ता है ? इस बात को सुन पिंकी ने मेरी ओर देखते हुए कहा, ' आप रात को घर चले जाना... मैं तो सो ही जाती हूँ और कुछ बात हो तो नर्स ड्यूटी पर रहती ही है...' मैंने कहा कि ये सब तो ठीक है ... मुझे तो साथ ही रहना चाहिए। पिंकी ने जोर देते हुए इन्द्राणी से कहा,' घर तो पास ही है...रात को चले जाएं और सुबह आ जाएं...क्यों दीदी ठीक है न ? इन्द्राणी चुप रही मानो कह रही हो, ' मनप्रीत के सुझाव में कुछ गलत तो नहीं है...' मैं खामोश था और कुछ क्षण बाद बोला, ' देखा जायेगा...माँ से बात करेंगे...' हम तीनों इधर-उधर की बातें करते रहे थे। इस बीच पिंकी के पापा और मामाजी का फोन आया था। पापा जी तो ठीक थे परन्तु मामाजी किसी अच्छे हॉस्पिटल में शिफ्ट कराने का जोर दे रहे थे। जब उन्होंने कहा कि वह खुद कलकत्ता आकर व्यवस्था कर देते हैं तो मैं झुँझला गया था। मैंने कहा, ' आपको क्या विश्वास नहीं है कि मैं आपकी भांजी का ख्याल नहीं रख पा रहा ? मैंने मोबाइल पिंकी को देते हुए कहा, ' लो, तुम्हीं अपने मामाजी को समझाओ, उन्हें मुझ पर विश्वास नहीं है...' पिंकी ने मामाजी को जोर से समझाते हुए कहा कि सब ठीक से चल रहा था और चिंता की बात न थी। फिर वह हाँ-हाँ, ठीक है, ओक-ओके कहने लगी। मुझे समझ में आया कि पिंकी के मामाजी उस पर भी दबाव डाल रहे थे कि किसी बड़े अस्पताल में अच्छे डॉक्टर के अंतर्गत इलाज होना चाहिए। अब मैंने पिंकी से फोन लिया और कुछ कड़े स्वर में कहा, ' पिंकी को जो प्रॉब्लम हुई है उसमें किसी तरह का मानसिक दबाव नहीं होना चाहिए... ये बात आपको समझनी चाहिए...अगर आवश्यक हुआ तो बड़े अस्पताल में शिफ्ट कर देंगे...आप न टेंशन लें और न टेंशन दें...' कुछ समय बाद नर्स ने आकर आगंतुकों को चले जाने का निर्देश दिया और कहा कि विजिटिंग टाइम समाप्त हो चुका था। इन्द्राणी उठ खड़ी हुई। मैं बैठा रहा। मुझे देख पिंकी ने कहा, 'आप भी जाइये, यहाँ कोई प्रॉब्लम नहीं है...मैं अब ठीक हूँ...' मामाजी से हुई बातचीत से मैं उलझा हुआ था, मैं उठ खड़ा हुआ, ' अच्छा तो मैं सुबह आता हूँ ' कहकर, इन्द्राणी के साथ बाहर निकल आया था।
बाहर आ मैंने इन्द्राणी को उसके घर तक छोड़ आने का सुझाव दिया। उसके घर के दरवाजे पर पहुंचे तो इन्द्राणी ने कहा कि मामी मेरे घर लौटकर आने पर नाराज़ हो जाएगी। मैं भी सोच में आ गया था। इन्द्राणी ने सुझाव दिया कि मैं उसके घर पर ही रुक जाऊँ। मुझे यह प्रस्ताव ठीक लगा। कहीं भी सोना ही तो था। घर में प्रवेश करते ही पीशी ने मनप्रीत के बारे में पूछा। मैं कुछ कहता इससे पहले ही इन्द्राणी ने कहा, ' माँ, अभिजीत आज रात यहीं रहेगा...पिशी थोड़ा चौंकी और कहा, ' नर्सिंग होम में बहूमाँ के पास कौन है ? इन्द्राणी ने उसे संमझाते हुए कहा, ' तुम अधिक चिंता मत करो, सब ठीक है...' पिशी खामोश हो गयी थी। हमेशा से ही वह अपनी बेटी के आगे कुछ न बोला करती थी। पिशी मेरे बिस्तर की व्यवस्था करने लगी। इन्द्राणी ने कहा, ' कुछ अलग से करने की आवश्यकता नहीं है, अभिजीत मेरे कमरे में ही सो जायेगा...' हम दोनों ऊपर इन्द्राणी के कमरे में आ गए। इन्द्राणी ने चाय की पेशकश की तो मैंने न नहीं कहा था। चाय पीते हुए इन्द्राणी ने पिंकी के मामा की बात छेड़ दी, ' इन पैसे वाले लोगों की यही समस्या है, इन्हें सब कुछ टॉप क्लास चाहिए...अब सामान्य सी वर्टिगो की तकलीफ है तो भी वुडलैंड में ले जाओ, बेल-व्यू में ले जाओ,नामी हॉस्पिटल होना चाहिए...' मैंने सहमति में सिर हिलाया तो उसने बात आगे बढ़ा दी कि मामा को समझ नहीं थी तो मनप्रीत को ही समझाना चाहिए था। उसने कहा, ' उसे कहना चाहिए था कि वे उसके मामले में न पड़ें...उसका पति जो उचित है वही कर रहा है...' अब मैंने कहा, ' यही तो मुश्किल बात है...ये लोग आगे बढ़ विरोध करना नहीं जानते...मामा ने कहा है तो हाँ-हाँ करते जाओ... और ये मामा बिज़नेस करते हैं और सिर्फ धन कमाते हैं... आधारभूत रूप में अनपढ़ हैं...' मैं क्रोध में था। आज मामाजी की जगह मैं मामा कह रहा था। इन्द्राणी न जाने किस मानसिकता में थी। उसने कहा, ' अगर उन्हें लगता है कि यहाँ ठीक से नहीं हो रहा तो अपनी भांजी को दिल्ली ले जायें और वहां बड़े अस्पताल में किसी बड़े डॉक्टर से इलाज करवायें...' उसके स्वर में तंज़ था। मैंने मौन रहकर उसकी बात को स्वीकृति दी थी और मन ही मन सोचा कि मामा ने अब इस सम्बन्ध कुछ बात की तो मैं यही बात कहूंगा।
इन्द्राणी का बिस्तर मुलायम और सुखमय था। मुझे नर्सिंग होम की बेंच और माँ की दी शॉल याद आ गयी थी। इन्द्राणी ने लाइट ऑफ कर दी थी और गुड नाईट कह दिया था किन्तु हम अभी भी बातचीत कर रहे थे। न जाने किस बात पर हम दोनों एक दूसरे के करीब आ गए थे। इन्द्राणी ने पूछा, ' अलग से दूसरा तकिया लाकर दूँ ? मैंने कहा, ' अपने लिए चाहिए हो तो ले लो...मुझे तो हम दोनों के लिए ये एक तकिया ही यथेष्ट लग रहा है...' इन्द्राणी हँस दी और उसने मेरी बाँह को अपनी गर्दन के नीचे रखते हुए खुद को मुझसे जोड़ लिया। एक मूक संवाद चल रहा था दोनों के बीच, शब्द तो न थे परन्तु शारीरिक गतिविधियां थी जो हमें एक-दूसरे में समेटती जा रही थी। हम अज्ञान से कहीं गहरे में डूबते जा रहे थे। उभर कर ऊपर आते और फिर किसी आवेश में डूबने लगते। रात कब कटी, कैसे कटी कुछ समझ ही न पाए थे।
सुबह असमंजस में लिपटी हुई थी। ये क्या हो गया था ? एक अपराध, एक पाप का सा बोध था। इन्द्राणी सामान्य थी पर जैसे कुछ छिपा रही थी। मैं नर्सिंग होम के लिए निकलने लगा तो वह मेरे पास आयी तो धीरे से कहा, ' अभिजीत, अधिक मत सोचना और मन पर बोझ न लेना...मैंने कहीं पढ़ा है कि युवा कज़िन्स के बीच एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हो जाना सामान्य और स्वाभाविक होता है...'( आज यहीं तक, अगले गुरुवार को आगे, यहीं पर ... )
Wednesday, May 5, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 72
टू स्टेट्स - एक नई कहानी
( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ..
( ७२ ) उसका हर बात को अपने ईश, अपने बाबा तक ले आना मुझे अज्ञानता सा लगता था। मुझे ऐसा प्रतीत होता कि सब कुछ होते भी यह लड़की एक तरह कि धार्मिक संकीर्णता से जकड़ी हुई थी। एक दिन मैंने इस सम्बन्ध में कहा तो उसी ने मुझे किताबी कीड़ा कह दिया जिसे प्रकृति और ईश्वर का कोई ज्ञान न था। हम दोनों अपनी-अपनी स्थिति और स्वधर्म में थे। उसने कहा था कि वह एक साधारण लड़की थी जो अपने नगर अपने परिवार और अपने कार्य में संतुष्ट थी, उसने कभी सोचा भी न था कि वह देश के एक शीर्ष स्वतंत्रता सेनानी के परिवार का सदस्य बन जाएगी और कलकत्ता जैसे महानगर लोग उसे पहचानने लगेंगे। उसका मानना था कि यह सब नानक बाबा की कृपा के ही द्वारा हुआ था। उसकी बात पर मैं व्यंग्य भाव में मुस्कुरा दिया था। मुझे देख उसने कहा था, ' आप जो भी समझो...मुझे दकियानूसी मानो परन्तु सत्य यही है कि मेरे नानक बाबा का आशीर्वाद है मुझ पर जो मुझे ये सब मिला है...' पिंकी की इस बात पर मुझे कुछ गर्व की अनुभूति हुई थी।
समय बीतता जा रहा था। पिंकी सबकी चहेती बन चुकी थी। मैं खुद में सिमटा हुआ रोबी दा के साथ बेवजह सा जुड़ता जा रहा था। मैं परेशान रहता था या नाराज़ समझ पाना मुश्किल था। इन्द्राणी के साथ अपना मन साझा कर देना मुझे कुछ राहत सा देता था। मैंने उसे एक दिन बातों-बातों में बता दिया था कि न जाने क्यों मेरा मन अब आरम्भ के प्रेम-उत्साह से दूर होता चला जा रहा था। मैंने उसे यह भी कहा था कि पिंकी मेरे मन की बेचैनी से अनभिज्ञ थी और सामान्य थी। इन्द्राणी मेरी स्थिति को समझ पा रही थी और बार बार यही कहती थी कि सब ठीक हो जायेगा। उसने यह भी कहा कि हम दोनों बचपन के मित्र थे और वह मेरी हितैषी थी और मुझे कभी भी निराश नहीं देखना चाहेगी। उसने एक बार फिर से यह बात दोहराई कि हमारे विवाह में दो संस्कृतियों का जोड़ था जिस में एकरूपता होना असंभव तो नहीं परन्तु अत्यंत कठिन था।
पिंकी ने एक शाम सिरदर्द और माथा घूमने की बात उठायी थी। मुझे यही लगा कि बहुत अधिक काम और व्यस्त दिनचर्या के कारण यह हो रहा होगा। मैंने उसकी बात पर ध्यान न दिया था। मैंने उसे यही कहा था कि उसे तो मालूम था कि ऐसे में कौन सी टेबलेट लेनी होती है और उसके बाद विश्राम करना होता है। उसने मेरी बात का उत्तर न दिया और एक ओर को बिस्तर पर लेट गयी थी। कुछ समय बाद जब बिशाखा उससे चाय को पूछने को आयी तो उसने माँ को बुला लाने को कहा। माँ चिंतित हो गयी थी। उसने तुरंत पिंकी को एक टेबलेट खिलाई और उसे आश्वस्त किया कि कुछ समय में ही दर्द ठीक हो जायेगा। पिंकी ने बिस्तर से उठने की कोशिश की तो वह चक्कर खा गई थी और बैठ गयी थी। माँ ने उसे सहारा दिया था। रात में फिर ऐसा ही हुआ और वह गिर गयी। अब माँ को बहुत चिंता हुई। बाबा ने अपने परिचित डॉक्टर को फोन घुमाया तो उसने तुरंत एक नर्सिंग होम में ले आने की सलाह दी। मैंने कहा, ' ये डॉक्टर लोग यूँ ही सभी को घबरा देते हैं...हमें आज की रात देखनी चाहिए...' माँ ने किन्तु मेरी बात न मानी और उस नर्सिंग होम को फोन कर एम्बुलेंस भेजने को कहा। कुछ ही देर में पिंकी को वहां एडमिट करा दिया गया। मैं अभी तक इसे थकावट और ठीक से नींद न होने के कारण की परेशानी मान रहा था। डॉक्टर से मेरी बात हुई तब भी मैंने यही कहा था। उसका उत्तर था, ' देखते हैं पर इसे सहजता से नहीं छोड़ा जा सकता ...'
माँ और बाबा रात में ही नर्सिंग होम से घर लौट आये थे। मुझे रात वहीं रहना था। यहाँ भी वैसा ही एक बार फिर से हुआ था। उठने पर ही उसे चक्कर आ जाता था। वह खड़ी न हो पा रही थी। मैंने उसे सो जाने का कहा। वह ठीक से सो भी न पा रही थी। किसी तरह से उसने कहा कि ये उसके साथ क्या हो रहा था ? मैंने धीरे से उसके कान में कहा कि सब ठीक हो जायेगा, दवा दे दी गयी है, नींद आ जाने और आराम करने से सुबह तक वह उठ खड़ी होगी। इस दर्द और बेचैनी में भी वह मुस्कुरा दी थी और उसने पूछा कि कौन सा अस्पताल था ? मैंने कहा, ' अभी तुम ये सब छोड़ो...सुबह बात करेंगे...'
यह हमारे घर के समीप का एक नर्सिंग होम था। हमारे परिवार में जब भी कभी आवश्यकता होने पर यहीं आया जाता था। नाना को तो कई बार यहां इलाज के लिए लाया गया था। उन्हें तो यह अपना घर जैसा लगता था। यहां के अधिकांश कर्मी लोग हमारे परिवार से परिचित थे। पिंकी को नींद के लिए उचित दवा दे दी गयी थी। मैं कुछ देर इधर- उधर नर्सिंग होम में टहलता रहा और वहां की गतिविधियों की जानकारी लेता रहा था। मैंने इन्द्राणी को फोन कर यह खबर दे दी थी। वह चिंता करने लगी और उसने कहा कि वह अगले दिन मिलने आएगी। साथ ही उसने मुझे साहस देते हुए बताया कि कुछ वर्ष पूर्व उसे भी इस तरह की समस्या हुई थी। उसने मेरी व्यवस्था के बारे में भी पूछा। मैंने बताया कि पिंकी के छोटे कमरे में ही एक बेंच थी जिस पर मुझे रात काटनी थी। वह हंसने लगी, ' पत्नी के लिए ऐसी क़ुरबानी तो देनी ही होती है...' मैंने भी हँसते हुए कहा, ' हाँ, वो तो है लेकिंन तुम्हें कैसे पता चला ? वह जोर से हंसी और कहा, ' हमारी रसोई नहीं है तो क्या हुआ, हमें ये तो पता है कि रसोई कैसी होनी चाहिए...'
वह रात करवट बदलते कटी थी। पिंकी दवा के प्रभाव में थी। मैं उसकी ओर देखता तो चिंतित हो उठता कि कहीं कोई गंभीर समस्या न हो। इस स्थिति में भी उसका चेहरा चमक रहा था। चिंता के साथ साथ मुझे एक तरह का गुस्सा भी आ रहा था कि क्यों उसने खुद को इस तरह से व्यस्त कर लिया था ? मुझे लगता था कि यह सब उसके यथोचित विश्राम न लेने के कारण हुआ था। मैं डॉक्टर के आने की प्रतीक्षा में था कि पता चल सके कि क्या समस्या थी ? रात में ही कुछ टेस्ट्स हो गए थे। सुबह देर तक वह सोती रही थी। बाद में जागते ही उसने पूछा कि उसे क्या हुआ था। मैंने धैर्य दिलाते हुए कहा, ' आज पता चल जायेगा...परन्तु सामान्य थकावट के कारण ही यह सब हुआ है...अब से तुम्हें अपना रूटीन ठीक करना होगा और आराम के लिए भी समय निकालना होगा...' उसके चेहरे पर मुस्कराहट आयी किन्तु वह सामान्य न थी, यह साफ दिख रहा था। उसने धीरे से पूछा कि कहीं मैंने चंडीगढ़ और दिल्ली में तो न बता दिया था ? उसका कहना था कि उसके मम्मी-पापा छोटी सी बात पर ही चिंतित हो जाते हैं सो उन्हें बताना उचित न था। मैंने उसे आश्वस्त किया कि यह कोई ऐसी बात न थी जिसे बताया जाये परन्तु कुछ समय बाद जब माँ पहुंची तो उन्होंने आते ही बताया कि दोनों जगह सूचना दी जा चुकी थी। यह सुन पिंकी मुस्कुरा दी और ऐसा भाव दिया मानो कहना चाह रही हो, ' अरे ! मम्मी जी आप भी न...' वह अभी भी दर्द और परेशानी में थी किन्तु पिछली रात से कुछ बेहतर दिख रही थी। डॉक्टर ने आकर हमारे सामने हालचाल लिए थे। वह माँ को मैडम कह कर बुला रहा था। उसने बताया कि प्रारंभिक तौर पर यह कान की एक समस्या दिख रही थी परन्तु ऐसे लक्षणों में पूरी तरह से आश्वस्त होना आवश्यक हो जाता है कि कहीं कोई न्युरॉ सम्बंधित समस्या न हो। माँ ने उसे एक तरह का निर्देश देते हुए कहा कि सब कुछ ठीक से चेक किया जाना चाहिए। उनके बीच हुई बातचीत से ऐसा लगा कि पिंकी को कुछ दिन वहां रहना होगा। मैंने अधिक कुछ न कहा बस यही कहा कि क्या किसी विशेषज्ञ का परामर्श आवश्यक था ? डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा, ' देखते हैं...'
एक दिन बाद पिंकी के उस वर्टिगो समस्या में सुधार था। वह सामान्य बातचीत कर पा रही थी, यद्यपि दुर्बलता महसूस कर रही थी। उसे देवयानी के कार्य में बाधा होने की चिंता थी। मैं उसकी इस बात से परेशान था। मैंने कहा, ' जो होगा देखा जायेगा, तुम पूरी तरह से आराम करो...' उसने अपना मोबाइल लिया और सबसे पहले ऑफिस में फोन किया था। मैंने तुरंत उससे मोबाइल ले लिया था। वह देवयानी के साथ बात न कर सकी थी। उसने मुझसे प्रोडक्शन हाउस में फोन कर सूचना देने को कहा था। मैं उसकी इस तरह की कर्तव्यनिष्ठा पर झुँझला रहा था। मैंने कहा, ' ये तुम्हें क्या हो रहा है ? ऐसी स्थिति में भी सबकी चिंता है...मैं वहां बता दूंगा...फ़िलहाल दिमाग़ पर ज़ोर नहीं देना है...' बाद में मैंने बाहर जाकर देवयानी के ऑफिस में फोन कर दिया था। कुछ समय बाद ही मेरे मोबाइल पर लगातार कॉल आने लग गए थे। देवयानी बहुत घबराई हुई थी। उसके मैनेजर और कुछ साथियों के फोन भी आये थे। दिल्ली से उसके मामाजी पिंकी को तुरंत किसी बड़े अस्पताल में शिफ्ट किये जाने का दबाव दे रहे थे। वह मेरी किसी बात को समझने को तैयार न थे। उसके पापाजी सामान्य थे। उन्होंने कहा कि मैं एक समझदार लड़का था और जो भी उचित था वही कर रहा था। वह आश्वस्त दिखे थे। उन्होंने किसी भी तरह की सहायता या उनके कलकत्ता आ जाने का सुझाव भी रखा था जो मैंने न कर दिया था। उस दिन शाम को डॉक्टर ने आकर कहा था कि कान के द्रव्य के असंतुलित हो जाने के कारण उसे यह समस्या हुई थी परन्तु उसे अभी कुछ दिन चिकित्सा-अवलोकन में रहना होगा और कुछ अन्य न्यूरो सम्बंधित टेस्ट्स भी किये जाने होंगे। मुझे तुरंत यह लगा था कि यह नर्सिंग होम का बिल बढ़ाने का तरीका था।
अब पिंकी का हालचाल पूछने वाले आने लगे थे। देवयानी के साथ तीन अन्य लोग आये थे। उसके होटल के तो कई साथी थे। उसका बॉस भी आया था। मैं इन लोगों से निपटने में लगा रहा। बाद में घर आया और सोचने लगा कि न जाने पिंकी का स्वास्थ्य किस दिशा में जाये ? उसके मामाजी का फोन आया था। माँ ने उन्हें जानकारी दे दी थी। अब मेरे मोबाइल में आया तो वह पिंकी को किसी अच्छे और बड़े अस्पताल में शिफ्ट करने की बात फिर से करने लगे थे। उन्होंने कहा, ' पैसे की फ़िक्र मत करना...अच्छे से अच्छा इलाज करवाना... मुझे हर रोज की खबर देना वर्ना मैं कलकत्ता पहुंच जाऊंगा...' उनकी इस आखिरी बात पर मुझे गुस्सा आ गया था। मैं सोचने लगा कि सरदार मामा आखिर सरदार ही रहेगा। पिंकी की खोज-खबर लेने वालों का सोचकर मैं हैरान था कि कैसे इस लड़की ने कुछ ही महीनों में अपने मित्र और चाहने वाले बना लिए थे। मैं ये बात सोच ही रहा था कि इन्द्राणी आ पहुंची थी। घर के बाहर ही उसे शांतु की पत्नी मिल गयी थी। वह भी उसके साथ आयी थी। वह चिंता जता रही थी। शांतु की पत्नी ने पूछा कि क्या वह अपनी भाभी से नर्सिंग होम में जाकर मिल सकती थी ? मैंने हां में सिर हिलाया कि बिशाखा बीच में कूद पड़ी। उसने शांतु की पत्नी से कहा, ' जब तुम जाओगी तो मुझे भी साथ ले जाना...' मैंने उसे डाँटते हुए कहा, ' वहां क्या तमाशा लगाना है...नर्सिंग होम है, भीड़ नहीं जुटानी है...सभी वहां नहीं जा सकते...' आज याद कर रहा हूँ तो अपने मन को स्पष्ट देख पा रहा हूँ कि उस समय मैं पिंकी के प्रति सभी के उत्साह और स्नेह से नाराज था।
( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे, यहीं पर ... )
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