Chander Dhingra's Blog

Wednesday, May 5, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 72

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra                                           http://chander1949.blogspot.com/?m=1  हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ..  ( ७२ ) उसका हर बात को अपने ईश, अपने बाबा तक ले आना मुझे अज्ञानता सा लगता था। मुझे ऐसा प्रतीत होता कि सब कुछ होते भी यह लड़की एक तरह कि धार्मिक संकीर्णता से जकड़ी हुई थी। एक दिन मैंने इस सम्बन्ध में कहा तो उसी ने मुझे किताबी कीड़ा कह दिया जिसे प्रकृति और ईश्वर का कोई ज्ञान न था। हम दोनों अपनी-अपनी स्थिति और स्वधर्म में थे। उसने कहा था कि वह एक साधारण लड़की थी जो अपने नगर अपने परिवार और अपने कार्य में संतुष्ट थी, उसने कभी सोचा भी न था कि वह देश के एक शीर्ष स्वतंत्रता सेनानी के परिवार का सदस्य बन जाएगी और कलकत्ता जैसे महानगर लोग उसे पहचानने लगेंगे। उसका मानना था कि यह सब नानक बाबा की कृपा के ही द्वारा हुआ था। उसकी बात पर मैं व्यंग्य  भाव में मुस्कुरा दिया था। मुझे देख उसने कहा था, ' आप जो भी समझो...मुझे दकियानूसी मानो परन्तु सत्य यही है कि मेरे नानक बाबा का आशीर्वाद है मुझ पर जो मुझे ये सब मिला है...' पिंकी की इस बात पर मुझे कुछ गर्व की अनुभूति हुई थी।    समय बीतता जा रहा था। पिंकी सबकी चहेती बन चुकी थी। मैं खुद में सिमटा हुआ रोबी दा के साथ बेवजह सा जुड़ता जा रहा था। मैं परेशान रहता था या नाराज़ समझ पाना मुश्किल था। इन्द्राणी के साथ अपना मन साझा कर देना मुझे कुछ राहत सा देता था। मैंने उसे एक दिन बातों-बातों में बता दिया था कि न जाने क्यों मेरा मन अब आरम्भ के प्रेम-उत्साह से दूर होता चला जा रहा था। मैंने उसे यह भी कहा था कि पिंकी मेरे मन की बेचैनी से अनभिज्ञ थी और सामान्य थी। इन्द्राणी मेरी स्थिति को समझ पा रही थी और बार बार यही कहती थी कि सब ठीक हो जायेगा। उसने यह भी कहा कि हम दोनों बचपन के मित्र थे और वह मेरी हितैषी थी और मुझे कभी भी निराश नहीं देखना चाहेगी। उसने एक बार फिर से यह बात दोहराई कि हमारे विवाह में दो संस्कृतियों का जोड़ था जिस में एकरूपता होना असंभव तो नहीं परन्तु अत्यंत कठिन था।   पिंकी ने एक शाम सिरदर्द और माथा घूमने की बात उठायी थी। मुझे यही लगा कि बहुत अधिक काम और व्यस्त दिनचर्या के कारण यह हो रहा होगा। मैंने उसकी बात पर ध्यान न दिया था। मैंने उसे यही कहा था कि उसे तो मालूम था कि ऐसे में कौन सी टेबलेट लेनी होती है और उसके बाद विश्राम करना होता है। उसने मेरी बात का उत्तर न दिया और एक ओर को बिस्तर पर लेट गयी थी। कुछ समय बाद जब बिशाखा उससे चाय को पूछने को आयी तो उसने माँ को बुला लाने को कहा। माँ चिंतित हो गयी थी। उसने तुरंत पिंकी को एक टेबलेट खिलाई और उसे आश्वस्त किया कि कुछ समय में ही दर्द ठीक हो जायेगा। पिंकी ने बिस्तर से उठने की कोशिश की तो वह चक्कर खा गई थी और बैठ गयी थी। माँ ने उसे सहारा दिया था। रात में फिर ऐसा ही हुआ और वह गिर गयी। अब माँ को बहुत चिंता हुई। बाबा ने अपने परिचित डॉक्टर को फोन घुमाया तो उसने तुरंत एक नर्सिंग होम में ले आने की सलाह दी। मैंने कहा, ' ये डॉक्टर लोग यूँ ही सभी को घबरा देते हैं...हमें आज की रात देखनी चाहिए...' माँ ने किन्तु मेरी बात न मानी और उस नर्सिंग होम को फोन कर एम्बुलेंस भेजने को कहा। कुछ ही देर में पिंकी को वहां एडमिट करा दिया गया। मैं अभी तक इसे थकावट और ठीक से नींद न होने के कारण की परेशानी मान रहा था। डॉक्टर से मेरी बात हुई तब भी मैंने यही कहा था। उसका उत्तर था, ' देखते हैं पर इसे सहजता से नहीं छोड़ा जा सकता  ...'  माँ और बाबा रात में ही नर्सिंग होम से घर लौट आये थे। मुझे रात वहीं रहना था। यहाँ भी वैसा ही एक बार फिर से हुआ था। उठने पर ही उसे चक्कर आ जाता था। वह खड़ी न हो पा रही थी। मैंने उसे सो जाने का कहा। वह ठीक से सो भी न पा रही थी। किसी तरह से उसने कहा कि ये उसके साथ क्या हो रहा था ? मैंने धीरे से उसके कान में कहा कि सब ठीक हो जायेगा, दवा दे दी गयी है, नींद आ जाने और आराम करने से सुबह तक वह उठ खड़ी होगी। इस दर्द और बेचैनी में भी वह मुस्कुरा दी थी और उसने पूछा कि कौन सा अस्पताल था ? मैंने कहा, ' अभी तुम ये सब छोड़ो...सुबह बात करेंगे...'  यह हमारे घर के समीप का एक नर्सिंग होम था। हमारे परिवार में जब भी कभी आवश्यकता होने पर यहीं आया जाता था। नाना को तो कई बार यहां इलाज के लिए लाया गया था। उन्हें तो यह अपना घर जैसा लगता था। यहां के अधिकांश कर्मी लोग हमारे परिवार से परिचित थे। पिंकी को नींद के लिए उचित दवा दे दी गयी थी। मैं कुछ देर इधर- उधर नर्सिंग होम में टहलता रहा और वहां की गतिविधियों की जानकारी लेता रहा था। मैंने इन्द्राणी को फोन कर यह खबर दे दी थी। वह चिंता करने लगी और उसने कहा कि वह अगले दिन मिलने आएगी। साथ ही उसने मुझे साहस देते हुए बताया कि कुछ वर्ष पूर्व उसे भी इस तरह की समस्या हुई थी। उसने मेरी व्यवस्था के बारे में भी पूछा। मैंने बताया कि पिंकी के छोटे  कमरे में ही एक बेंच थी जिस पर मुझे रात काटनी थी। वह हंसने लगी, ' पत्नी के लिए ऐसी क़ुरबानी तो देनी ही होती है...' मैंने भी हँसते हुए कहा, ' हाँ, वो तो है लेकिंन तुम्हें कैसे पता चला ? वह जोर से हंसी और कहा, ' हमारी रसोई नहीं है तो क्या हुआ, हमें ये तो पता है कि रसोई कैसी होनी चाहिए...'   वह रात करवट बदलते कटी थी। पिंकी दवा के प्रभाव में थी। मैं उसकी ओर देखता तो चिंतित हो उठता कि कहीं कोई गंभीर समस्या न हो। इस स्थिति में भी उसका चेहरा चमक रहा था। चिंता के साथ साथ मुझे एक तरह का गुस्सा भी आ रहा था कि क्यों उसने खुद को इस तरह से व्यस्त कर लिया था ? मुझे लगता था कि यह सब उसके यथोचित विश्राम न लेने के कारण हुआ था। मैं डॉक्टर के आने की प्रतीक्षा में था कि पता चल सके कि क्या समस्या थी ? रात में ही कुछ टेस्ट्स हो गए थे। सुबह देर तक वह सोती रही थी। बाद में जागते ही उसने पूछा कि उसे क्या हुआ था। मैंने धैर्य दिलाते हुए कहा, ' आज पता चल जायेगा...परन्तु सामान्य थकावट के कारण ही यह सब हुआ है...अब से तुम्हें अपना रूटीन ठीक करना होगा और आराम के लिए भी समय निकालना होगा...' उसके चेहरे पर मुस्कराहट आयी किन्तु वह सामान्य न थी, यह साफ दिख रहा था। उसने धीरे से पूछा कि कहीं मैंने चंडीगढ़ और दिल्ली में तो न बता दिया था ? उसका कहना था कि उसके मम्मी-पापा  छोटी सी बात पर ही चिंतित हो जाते हैं सो उन्हें बताना उचित न था। मैंने उसे आश्वस्त किया कि यह कोई ऐसी बात न थी जिसे बताया जाये परन्तु कुछ समय बाद जब माँ पहुंची तो उन्होंने आते ही बताया कि दोनों जगह सूचना दी जा चुकी थी। यह सुन पिंकी मुस्कुरा दी और ऐसा भाव दिया मानो कहना चाह रही हो, ' अरे ! मम्मी जी आप भी न...' वह अभी भी दर्द और परेशानी में थी किन्तु पिछली रात से कुछ बेहतर दिख रही थी। डॉक्टर ने आकर हमारे सामने हालचाल लिए थे। वह माँ को मैडम कह कर बुला रहा था। उसने बताया कि प्रारंभिक तौर पर यह कान की एक समस्या दिख रही थी परन्तु ऐसे लक्षणों में पूरी तरह से आश्वस्त होना आवश्यक हो जाता है कि कहीं कोई न्युरॉ सम्बंधित समस्या न हो। माँ ने उसे एक तरह का निर्देश देते हुए कहा कि सब कुछ ठीक से चेक किया जाना चाहिए। उनके बीच हुई बातचीत से ऐसा लगा कि पिंकी को कुछ दिन वहां रहना होगा। मैंने अधिक कुछ न कहा बस यही कहा कि क्या किसी विशेषज्ञ का परामर्श आवश्यक था ? डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा, ' देखते हैं...'  एक दिन बाद पिंकी के उस वर्टिगो समस्या में सुधार था। वह सामान्य बातचीत कर पा रही थी, यद्यपि दुर्बलता महसूस कर रही थी। उसे देवयानी के कार्य में बाधा होने की चिंता थी। मैं उसकी इस बात से परेशान था। मैंने कहा, ' जो होगा देखा जायेगा, तुम पूरी तरह से आराम करो...' उसने अपना मोबाइल लिया और सबसे पहले ऑफिस में फोन किया था। मैंने तुरंत उससे मोबाइल ले लिया था। वह देवयानी के साथ बात न कर सकी थी। उसने मुझसे  प्रोडक्शन हाउस में फोन कर सूचना देने को कहा था। मैं उसकी इस तरह की कर्तव्यनिष्ठा पर झुँझला रहा था। मैंने कहा, ' ये तुम्हें क्या हो रहा है ? ऐसी स्थिति में भी सबकी चिंता है...मैं वहां बता दूंगा...फ़िलहाल दिमाग़ पर ज़ोर नहीं देना है...' बाद में मैंने बाहर जाकर देवयानी के ऑफिस में फोन कर दिया था। कुछ समय बाद ही मेरे मोबाइल पर लगातार कॉल आने लग गए थे। देवयानी बहुत घबराई हुई थी। उसके मैनेजर और कुछ साथियों के फोन भी आये थे। दिल्ली से उसके मामाजी पिंकी को तुरंत किसी बड़े अस्पताल में शिफ्ट किये जाने का दबाव दे रहे थे। वह मेरी किसी बात को समझने को तैयार न थे। उसके पापाजी सामान्य थे। उन्होंने कहा कि मैं एक समझदार लड़का था और जो भी उचित था वही कर रहा था। वह आश्वस्त दिखे थे। उन्होंने किसी भी तरह की सहायता या उनके कलकत्ता आ जाने का सुझाव भी रखा था जो मैंने न कर दिया था। उस दिन शाम को डॉक्टर ने आकर कहा था कि कान के द्रव्य के असंतुलित हो जाने के कारण उसे यह समस्या हुई थी परन्तु उसे अभी कुछ दिन चिकित्सा-अवलोकन में  रहना होगा और कुछ अन्य न्यूरो सम्बंधित टेस्ट्स भी किये जाने होंगे। मुझे तुरंत यह लगा था कि यह नर्सिंग होम का बिल बढ़ाने का तरीका था।  अब पिंकी का हालचाल पूछने वाले आने लगे थे। देवयानी के साथ तीन अन्य लोग आये थे। उसके होटल के तो कई साथी थे। उसका बॉस भी आया था। मैं इन लोगों से निपटने में लगा रहा। बाद में घर आया और सोचने लगा कि न जाने पिंकी का स्वास्थ्य किस दिशा में जाये ? उसके मामाजी का फोन आया था। माँ ने उन्हें जानकारी दे दी थी। अब मेरे मोबाइल में आया तो वह पिंकी को किसी अच्छे और बड़े अस्पताल में शिफ्ट करने की बात फिर से करने लगे थे। उन्होंने कहा, ' पैसे की फ़िक्र मत करना...अच्छे से अच्छा इलाज करवाना... मुझे हर रोज की खबर देना वर्ना मैं कलकत्ता पहुंच जाऊंगा...' उनकी इस आखिरी बात पर मुझे गुस्सा आ गया था। मैं सोचने लगा कि सरदार मामा आखिर सरदार ही रहेगा। पिंकी की खोज-खबर लेने वालों का सोचकर मैं हैरान था कि कैसे इस लड़की ने कुछ ही महीनों में अपने मित्र और चाहने वाले बना लिए थे। मैं ये बात सोच ही रहा था कि इन्द्राणी आ पहुंची थी।  घर के बाहर  ही उसे शांतु की पत्नी मिल गयी थी। वह भी उसके साथ आयी थी। वह चिंता जता रही थी। शांतु की पत्नी ने पूछा कि क्या वह अपनी भाभी से नर्सिंग होम में जाकर मिल सकती थी ? मैंने हां में सिर हिलाया कि बिशाखा बीच में कूद पड़ी। उसने शांतु की पत्नी से कहा, ' जब तुम जाओगी तो मुझे भी साथ ले जाना...' मैंने उसे डाँटते हुए कहा, ' वहां क्या तमाशा लगाना है...नर्सिंग होम है, भीड़ नहीं जुटानी है...सभी वहां नहीं जा सकते...' आज याद कर रहा हूँ तो अपने मन को स्पष्ट देख पा रहा हूँ कि उस समय मैं पिंकी के प्रति सभी के उत्साह और स्नेह से नाराज था।  ( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे, यहीं पर  ... )

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