Chander Dhingra's Blog

Wednesday, April 28, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) : 70 - 71

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra                                                                               http://chander1949.blogspot.com/?m=1    हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ..  ( ७०- ७१ )  यह बात किसी सामान्य घटना सी गुजर जाती किन्तु मेरी अंतिम बात शायद उसे आहत कर गयी थी। वह अपनी दिनचर्या में जुटी हुई थी किन्तु किसी से बात न कर रही थी। मैंने सामान्य होते हुए उससे कहा कि आज थोड़ा विलम्ब से ऑफिस जाऊँगा। उसने जवाब न दिया और माँ से मिल, अपने ऑफिस को निकल गयी  थी। मुझे आशा थी कि वह मेरे विलम्ब से जाने का कारण पूछेगी परन्तु, ऐसा न हुआ। उसके जाने के बाद मैं भी  निकलने को तैयार था। माँ ने देखा तो कहा, ' अभी तो मनप्रीत से कह रहे थे कि देर से जाऊंगा ? मैंने कहा, ' हाँ, मुझे कहीं ओर से होते हुए जाना है, थोड़ा विलम्ब तो हो ही जायेगा...' माँ ने कुछ न कहा था, बस चेहरे पर एक प्रश्न चिन्ह सा भाव दिखाया था। मैं घर से निकल तो आया था परन्तु अब ऑफिस तो विलम्ब से जाना था। मैं इन्द्राणी के घर कि ओर बढ़ गया था। मेरी पिशी ने दरवाजा खोला तो  इस अनजाने समय में मुझे देख हैरान हो गयी, ' अरे इस समय... आज क्या ऑफिस नहीं है ? मैंने कहा कि इधर कुछ काम था। मेरी आवाज़ सुन इन्द्राणी भी सामने आ गयी थी। वह भी आश्चर्य में थी।  पिशी तो रसोई घर में चली गयी और इन्द्राणी भी अपने स्कूल जाने के अनुसार तैयार हो रही थी। दोनों अपने काम में व्यस्त थे। मुझे लगा कि मुझे इस समय पर नहीं आना चाहिए था। इन्द्राणी कुछ क्षण के लिए मेरे पास आ बैठी थी। उसने कहा, ' यह समय तो तुम्हारे पास बैठ, कुछ बात करने का नहीं है  ... सॉरी अभिजीत...' मैंने कहा, ' ऐसी कोई बात नहीं है... बस यूँ ही चला आया...मैं भी चलूँगा...' इन्द्राणी ने कहा, ' नहीं रुको, चाय लाती हूँ... ' मैंने ना कहा और उठ खड़ा हुआ। इन्द्राणी ने कहा, ' चलो एक साथ निकलते हैं... कुछ दूर तक तो हमारा एक ही पथ है... चलते चलते कुछ बातचीत हो जाएगी...'  इन्द्राणी ने कहा, ' तुम्हारे चेहरे पर देख पा रही हूँ कि कुछ बात है... बताओ क्या हुआ ? मैंने आरम्भ में कुछ नहीं कहा परन्तु इन्द्राणी के जोर देने पर उसे बताया कि कैसे पिंकी इन दिनों व्यस्त होती जा रही थी और घर के लिए उसके पास समय कम होता जा रहा था। वह मुस्कुराने लगी। उसने एक चाय के स्टॉल की ओर संकेत करते हुए कहा, ' चलो, वहां बैठकर बात करते हैं... एक-एक कप चाय भी हो जाएगी...' यह फुटपाथ का टी-स्टाल था। दो ओर बेंच लगी थी। कलकत्ता के ऐसे स्टॉल की चाय अक्सर मूड ताज़ा कर देने वाली होती है।  इन्द्राणी ने कहा, ' मनप्रीत की व्यस्तता में उसका कोई दोष नहीं है... स्थितियाँ ही ऐसी बन गयी हैं कि वह व्यस्त हो गयी है...और तुम्हें चंडीगढ़ जाने की उसकी बात को ऐसे न नहीं लेना चाहिए था... उसे घर की याद आना तो स्वाभाविक है...तुम वहां नहीं जाना चाहते तो बाद में उसे समझा देते...' मैंने कहा, ' मैं उसे आहत तो नहीं करना चाहता था परन्तु बात कुछ ऐसे चली कि मुझे एकदम से न कहना पड़ा...' इन्द्राणी ने कहा कि हम दोनों ही अपनी अपनी जगह सही थे, ' उसे भी समझना चाहिए था कि किसी नयी जगह कुछ दिन के लिए जाना चाहिए...पर ये सब स्वाभाविक है... आज शाम को तुम्हें उसे कहीं घुमाने ले जाना चाहिए...' इन्द्राणी मुस्कुरा रही थी। हम दोनों उठ खड़े हुए और सामने के बस स्टॉप की ओर बढ़ चले थे। मुझे लगा कि इन्द्राणी सही कह रही थी। उसे आगे से दूसरी ओर मुड़ जाना था। कुछ क्षण को हम रुके।  इन्द्राणी ने अचानक कहा, ' वैसे बाकि तो सब ठीक है न तुम दोनों के बीच ? मैंने कहा, ' वैसा क्या ? इन्द्राणी हँसने लगी, ' अरे वही रात की पति-पत्नी की बातें...' मैंने कहा, ' ठीक ही है...' वह चलते चलते रुक गयी, ' शायद ठीक नहीं है, बाद में बात होगी...' मैंने कहा, ' वह व्यस्त है और देर से थक कर लौटती है... इसी से समझ जाओ...' इन्द्राणी मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गयी थी।  ऑफिस पहुंचा तो रोबी दा का संदेश टेबल पर रखा हुआ मिला। वह मेरे पास आये थे किसी आवश्यक काम के लिए। मैंने उनसे पहले मिल लेना उचित समझा। उनके पास गया तो उन्हें दो लोगों के साथ व्यस्त पाया। उन्होंने मुझे इशारे से एक ओर बैठने को कहा। कुछ समय में उन्होंने काम निपटा दिया और मेरी ओर देखते हुए कहा, ' आज क्या हुआ देर से आये ? मैंने बताया, ' पिशी के घर से होते हुए आया...' उन्होंने कहा, ' क्या हुआ ? मैंने कहा, ' कुछ नहीं यूँ ही कुछ काम था...आप बताइए मुझ से कुछ काम था ? उन्होंने कहा, ' हाँ, ये जो लोग आये हुए थे उन्हीं का काम था... मैं चाहता था तुम देखो... लेकिन अब तो हो गया है...उनके आवेदन हैं, वे तुम्हारे पास आएंगे...थोड़ा देख लेना...' उन्होंने आराम की मुद्रा में आते हुए कहा, ' और घर पर सब कैसे हैं...तुम्हारा सब कैसा चल रहा है ? फिर उन्होंने खुद से ही मानों उत्तर देते हुए कहा, ' तुम्हारी पत्नी तो व्यस्त होगी...उसका काम ही ऐसा है...' मैंने कहा, ' हाँ वह तो दिन दिन व्यस्त होती जा रही है...टीवी का धारावाहिक है और साथ ही ऑफिस का भी दायित्वपूर्ण काम है...' उन्होंने लम्बी साँस ली और कहा, ' जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ, तुम्हारी पत्नी बहुत सफलता पायेगी लेकिन सफलता के लिए कुछ तो खोना पड़ता है...' मैंने कहा, ' नहीं रोबी दा, ऐसा नहीं है... वह सब भली भांति समझती है...' उन्होंने ने मुस्कुरा दिया और कहा, ' ये तुम्हारे बंगाली संस्कार हैं जो तुम ऐसा कह रहे हो...वह जिस समाज से आयी है, वहां सफलता का अर्थ धन और प्रतिष्ठा है...मैं पंजाब की लड़की को अच्छे से समझ सकता हूँ... अत्यंत कर्मनिष्ट और दायित्वपूर्ण परन्तु ये दोनों गुण परिवार के सुख से ऊपर नहीं होते... मैं ईश्वर से प्रार्थना  करता हूँ कि तुम्हारा जीवन सुखी रहे... '  इन्द्राणी और रोबी दा की बातें देर तक मेरे जहन में छायी रहीं थी। मैं अपना ध्यान इधर-उधर करने की कोशिश करता परन्तु एक भय सा था जो मुझे घेर ले रहा था। घर पहुँच में पिंकी का इंतज़ार करने लगा था। मैं माँ के कमरे में सजे उस लोकनाथ बाबा के छोटे से मंदिर से हमेशा दूर ही रहा हूँ परन्तु आज न  जाने क्या हुआ कि मैं चुपके से वहां माँ के अंदाज़ में सामने जा बैठ गया था। न जाने मेरे भीतर क्या चल रहा था ? बचपन से माँ इस तरह से बैठकर पूजा करना सिखाती रही थी और मैं सीखने में आनाकानी करता रहा था परन्तु, आज खुद से ही वैसे बैठा हुआ था, जैसा माँ सिखाती थी।  पिंकी कुछ समय बाद पहुँच गयी थी। अक्सर उसे देर हो जाती थी किन्तु आज वह उतनी विलम्ब से न आयी थी। उसने मुझे सुस्ताते हुए देखा तो कुछ न बोली बस खुद ही पास आ बैठ गयी थी। मैंने कहा, ' आज तो समय से आ गयी हो ? उसने उत्तर न दिया।  मैंने कहा, ' चलो आज मौके से दोनों समय से घर आ गए हैं, आज बिशाखा को छुट्टी दे देते हैं और कहीं बाहर खा कर आते हैं। अब भी उसने उत्तर न दिया। मैंने फिर से कहा, ' क्या हुआ, तबीयत तो ठीक है ना ? अब उसने उत्तर दिया, ' सब ठीक है पर कहीं बाहर जाने का मूड नहीं है...' मैंने थोड़ा सा बचपना दिखाते हुए कहा, ' चलो न, पास ही में कहीं खाकर आते हैं...' उसने कहा, ' ठीक है, कुछ देर रुको...पर चाइनीस खिलाना पड़ेगा...' मैंने हामी भरी। हम उसी नए रेस्टॉरेंट में गए जहाँ मैं इन्द्राणी के साथ गया था। बातों बातों में उसने कहा, ' अच्छा रेस्टॉरेंट है, पहले कभी आये हो यहाँ ? मैं क्षण भर को सकपकाया पर मैंने न जाने क्यों कहा, ' नहीं...' पिंकी को पंजाबी खाने से चाइनीस खाना ज्यादा पसंद था और मुझे भी अपने बंगाली खाने से चाइनीस ज्यादा अच्छा लगता था परन्तु मैं उसकी तरह यह बात खुले मन से स्वीकार न करता था और बंगाली खाने की प्रशंसा किया करता था। पिंकी ने बताया कि एक विज्ञापन संस्था ने उसे फोन किया था। वे पंजाब के एक प्रोडक्ट के बंगाल में प्रमोशन के लिए उससे बात करना चाहते थे परन्तु उसने न कर दिया था। साथ ही उसने बताया कि अगले सप्ताह उसे अपने होटल के सिलसिले में एक दिन के लिए मुंबई जाना होगा। उसने कहा, ' आप भी चलिए... थोड़ा चेंज हो जाएगा...' मैंने कहा, ' एक दिन के लिए काफी खर्चा हो जायेगा...' वह हँसने लगी, ' यह मेरी तरफ से है... होटल तो फ्री है... एयरफेयर मैं दे दूंगी...' मैंने कहा कि कोई भी दे, खर्च तो होगा ही और वह भी केवल एक दिन के लिए। उसने कहा कि ऐसा सोचना उचित नहीं था। उसने कहा,' हमें मुंबई में दो शामें मिल रही हैं...'  मैंने कुछ न कहा।  तीन दिन बाद वह मुंबई के लिए रवाना हो गयी थी। बहुत कहने पर भी मैं उसके साथ न गया और यह तर्क देता रहा कि वह तो अपने काम में व्यस्त रहेगी और मैं वहां बोर होता रहूँगा। जाने से पहले उसने हँसते हुए कहा, ' वहां तो दो शाम साथ होते, अब यहाँ बोर होते रहना...' मैं मुस्कुरा दिया था। मैंने कहा, ' मैं पूरा समय रोबी दा के साथ बिता दूँगा...वह अक्सर कहते हैं कि मैं उन्हें समय नहीं देता...' उसने कहा, 'उफ़ !  किस आदमी का नाम लिया है...उनके साथ ज्यादा रहोगे तो वैसा ही बन जाओगे...' उसने मुंबई पहुँच कर, तीन बार फोन किया था। हर बार यह बात की कि मुंबई का काम का वातावरण कलकत्ता से अच्छा था। मुझे भी इस बात का अहसास था। मेरे दो मित्र जो मुंबई में थे, वे भी अक्सर ऐसा ही कहा करते थे।   वापिस लौटने पर भी वह मुंबई की बात किया करती थी। एक दिन उसने कहा कि मुझे भी मुंबई की किसी बड़ी संस्था में कोशिश करनी चाहिए क्यों कि मेरा शैक्षणिक रिकॉर्ड बहुत बेहतरीन था और मुंबई की कोई भी बड़ी कम्पनी मुझे सहर्ष अपने एकाउंट्स विभाग में ले लेगी और वहां मुझे और आगे बढ़ने के भी अवसर मिलेंगे। उसने यह भी कहा कि यदि मुझे वहां अच्छा अवसर मिल जाता है तो वह भी सरलता से मुंबई के होटल में ट्रांसफर ले सकती थी। उसकी इस बात पर मैं चौंक गया था किन्तु मुझे अच्छा लगा था कि वह मेरी प्रशंसा भी कर रही थी। दूसरी ओर मैंने सोचा कि शायद रोबी दा की बात सत्य थी और पिंकी की ऊपर उठने और धन-प्रतिष्ठा पाने की इच्छाएं प्रबल हो रही थी। मैंने उसे कहा, ' मैं यहीं अपने सीमित में ही खुश हूँ... अपने घर में अपने माता-पिता के साथ हूँ, यही काफी है... ' मैंने कहा तो नहीं किन्तु कहीं मेरे मन में था कि वह आगे बढ़ना चाहती थी तो उसे अधिकार था। पिंकी ने कहा, ' छोड़ो इन बातों को... मेरे टीवी सीरियल की सारणी बढ़ती जा रही है और मुझे उधर अधिक समय देना होगा...' मैंने कहा, ' हां वह तो है... यह सीरियल तो हिट हो चला है... देवयानी  तो बहुत खुश होगी... तुम्हारे साथ तो अब मेरा पब्लिक में जाना मुश्किल होता जा रहा है...देखा था न उस दिन चाइनीस रेस्टोरेंट में लोग तुम्हें देख रहे थे...' उसने कहा, ' ये तो होना ही था...हिंदी सीरियल या फिल्म होती तो जीना दूभर हो जाता...' उसने तो ये बात सामान्य रूप में कही थी किन्तु न जाने मुझे लगा कि वह चाहती थी कि उसे हिंदी सीरियल या फिल्म में काम मिले और उसके लाखों चाहने वाले हों। आज बरसों बाद एक-एक दृश्य सामने आ रहा है और मुझे मेरी हीन मानसिकता से परिचित कराता जा रहा है।  पिंकी की सफलता आगे बढ़ रही थी और उसका समय सिमटता जा रहा था। न रविवार था और न कोई अवकाश। यहाँ से आओ तो वहां जाओ, फिर वहां से लौटो तो आगे के कार्यक्रम हेतु निकल जाओ। इस बीच उस के ऑफिस की ओर से उसे एक नयी कार मिल गयी थी। शांतु की पत्नी तो उसकी चहेती बन चुकी थी। उसने एक दिन बताया कि शांतु का कोई निश्चित काम न था और उसकी पत्नी बहुत चिंता में रहती थी। पिंकी ने मुझसे पूछा कि अब हमारे पास नई कार आ गयी है तो क्यों न हम शांतु को अपना ड्राइवर रख लें ? मैं हैरान था क्यों कि वह तो शांतु को एक गुंडा मानती थी और आज उसी को अपना ड्राइवर रखना चाहती थी। मेरी शंका का खुद पिंकी ने ही समाधान कर दिया था। उसने कहा, ' उसके पास ठीक से कोई रोजगार न था सो वह इधर-उधर की किया करता था, उसके पास ड्राइविंग लाइसेंस है, यदि काम मिल जाये तो वह ठीक हो जायेगा...उसकी पत्नी कितनी अच्छी है, उसकी भी मदद हो जाएगी...' मैंने हूँ कहा तो वह मुस्कुराने लगी और उसने बिशाखा को कह कर शांतु की पत्नी को बुला भेजा था। शांतु की पत्नी बहुत खुश थी कि पिंकी ने उनकी एक बड़ी समस्या को सुलझा दिया था। कुछ ही समय में शांतु भी मिलने आया था और आभार प्रदर्शित करने लगा था। पिंकी ने उसे गाड़ी की चाबी दे दी। शांतु ने कहा, ' कल सुबह कितने बजे गाड़ी लगा दूँ ? पिंकी ने उसे सब समझाया। वह खुश हो और हाँ...हाँ... करता चला गया था। मैंने पिंकी से कहा कि अब इस ड्राइवर की तनख्वाह का बोझ भी आएगा। वह अपनी आदत के अनुसार मेरी बात पर हंसने लगी थी। उसने कहा, ' अरे, हम कमाते किस लिए हैं...ऐसी चिंता हमें कुछ बढ़ा करने से रोकती है...जरा सोचो, नानक बाबा के आशीर्वाद से हम इतने सक्षम हैं कि किसी को रोजगार दे रहे हैं...'   ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर... )

No comments:

Post a Comment