Chander Dhingra's Blog

Wednesday, May 12, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) - 73

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra                                                                               http://chander1949.blogspot.com/?m=1    हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ..     ( ७३ ) इन्द्राणी ने मुझे उदास सा देखा तो कहा, ' यह क्या हुआ हमारे नायक बाबू को... पत्नी की जरा सी तबीयत ख़राब होने से परेशान हो गए ? अरे, ये तो जीवन है, यहाँ कुछ न कुछ तो होता ही रहेगा...' मैं मुस्कुरा दिया था और कहा, ' चिंता तो होनी ही है...क्या तुम चलोगी नर्सिंग होम ? उसने तपाक से कहा, ' हाँ, इसलिए तो आई हूँ... तुम्हारे साथ ही जाऊँगी, कब जा रहे हो ? मैंने कहा कि कुछ ही समय में चलते हैं, खाना खाकर। मैंने माँ से कहा तो उन्होंने कहा कि नर्सिंग होम में थोड़ी-बहुत तकलीफ तो होगी किन्तु मुझे वहीं बहू माँ के पास रहना होगा और उसका हौसला बढ़ाना होगा। उन्होंने मुझे एक बड़ी शॉल भी रात में ओढ़ने के लिए दी और बिशाखा से कहा कि मुझे एक थर्मस में चाय भी दे।  मैं और इन्द्राणी पैदल ही बढ़ चले थे। इन्द्राणी ने अपनी चिंता एक बार फिर से जताते हुए पूछा, ' डॉक्टर ने कोई गंभीर समस्या या भय की बात तो नहीं बताई है न ? मैंने कहा कि ऐसा कुछ तो नहीं लगता परन्तु वे लोग कुछ न्यूरो टेस्ट्स भी करवा रहे हैं...' इन्द्राणी ने मुझे ढाढ़स बंधवाते हुए कहा कि मुझे नर्सिंग होम में रात को तकलीफ हुई होगी। मैंने हाँ में सिर हिलाया और कहा कि इन नर्सिंग होम्स में अच्छी व्यवस्था तो होती नहीं है, कमरा छोटा है और अटेंडेंट के लिए एक बेंच है, उसी पर सोना होता है। नर्सिंग होम के उस कमरे में पहुंचे तो पिंकी को सोते हुए पाया। इन्द्राणी ने उसके पास जाकर हल्के स्वर में कहा, ' मनप्रीत... ' उसने एक बार की आवाज़ में आंखें खोल दी थी। इन्द्राणी ने पूछा, ' अब कैसी हो ? पिंकी पर शायद दवाइयों का असर था। उंसने मुस्कुराकर कहा, ' ठीक हूँ दीदी...आपको भी बेकार में परेशान किया...' उसकी आवाज़ में जोर कम था परन्तु उसका चेहरा आत्मविश्वास से चमक रहा था। उसने बैठने की कोशिश की परन्तु मैंने उसे लेटे रहने को कहा था। मैं उसके पास जाकर बैठ गया था। मैंने कहा, ' घबराने की बात नहीं है परन्तु डॉक्टर हर ओर से सुनिश्चित हो जाना चाहते हैं...तुम्हें कुछ दिन ऑब्जरवेशन में रहना होगा...वर्टिगो का असल कारण स्पष्ट हो जाना चाहिए...' पिंकी ने मेरी इस बात पर लम्बी हामी भरते हुए श्वांस ली थी। मुझे लगा मानो कह रही हो, ' मेरा सब काम उल्टा-पुल्टा हो गया है...ऑफिस का भी और देवयानी वाला भी...' मैं उसकी मन की बात समझ गया था और अपनी ओर से कहा, ' अपने काम और शिडूल की फ़िक्र मत करो...' इन्द्राणी ने सामने रखी बेंच की ओर देखते हुए कहा, ' तुम्हें रात को इस बेंच पर सोना पड़ता है ? इस बात को सुन पिंकी ने मेरी ओर देखते हुए कहा, ' आप रात को घर चले जाना... मैं तो सो ही जाती हूँ और कुछ बात हो तो नर्स ड्यूटी पर रहती ही है...' मैंने कहा कि ये सब तो ठीक है ... मुझे तो साथ ही रहना चाहिए। पिंकी ने जोर देते हुए इन्द्राणी से कहा,' घर तो पास ही है...रात को चले जाएं और सुबह आ जाएं...क्यों दीदी ठीक है न ?  इन्द्राणी चुप रही मानो कह रही हो, ' मनप्रीत के सुझाव में कुछ गलत तो नहीं है...' मैं खामोश था और कुछ क्षण बाद बोला, ' देखा जायेगा...माँ से बात करेंगे...' हम तीनों इधर-उधर की बातें करते रहे थे।  इस बीच पिंकी के पापा और मामाजी का फोन आया था। पापा जी तो ठीक थे परन्तु मामाजी किसी अच्छे हॉस्पिटल में शिफ्ट कराने का जोर दे रहे थे। जब उन्होंने कहा कि वह खुद कलकत्ता आकर व्यवस्था कर देते हैं तो मैं झुँझला गया था। मैंने कहा, ' आपको क्या विश्वास नहीं है कि मैं आपकी भांजी का ख्याल नहीं रख पा रहा ? मैंने मोबाइल पिंकी को देते हुए कहा, ' लो, तुम्हीं अपने मामाजी को समझाओ, उन्हें मुझ पर विश्वास नहीं है...' पिंकी ने मामाजी को जोर से समझाते हुए कहा कि सब ठीक से चल रहा था और चिंता की बात न थी। फिर वह हाँ-हाँ, ठीक है, ओक-ओके कहने लगी। मुझे समझ में आया कि पिंकी के मामाजी उस पर भी दबाव डाल रहे थे कि किसी बड़े अस्पताल में अच्छे डॉक्टर के अंतर्गत इलाज होना चाहिए। अब मैंने पिंकी से फोन लिया और कुछ कड़े स्वर में कहा, ' पिंकी को जो प्रॉब्लम हुई है उसमें किसी तरह का मानसिक दबाव नहीं होना चाहिए... ये बात आपको समझनी चाहिए...अगर आवश्यक हुआ तो बड़े अस्पताल में शिफ्ट कर देंगे...आप न टेंशन लें और न टेंशन दें...' कुछ समय बाद नर्स ने आकर आगंतुकों को चले जाने का निर्देश दिया और कहा कि विजिटिंग टाइम समाप्त हो चुका था। इन्द्राणी उठ खड़ी हुई। मैं बैठा रहा। मुझे देख पिंकी ने कहा, 'आप भी जाइये, यहाँ कोई प्रॉब्लम नहीं है...मैं अब ठीक हूँ...'  मामाजी से हुई बातचीत से मैं उलझा हुआ था, मैं उठ खड़ा हुआ, ' अच्छा तो मैं सुबह आता हूँ ' कहकर, इन्द्राणी के साथ बाहर निकल आया था।   बाहर आ मैंने इन्द्राणी को उसके घर तक छोड़ आने का सुझाव दिया। उसके घर के दरवाजे पर पहुंचे तो इन्द्राणी ने कहा कि मामी मेरे घर लौटकर आने पर नाराज़ हो जाएगी। मैं भी सोच में आ गया था। इन्द्राणी ने सुझाव दिया कि मैं उसके घर पर ही रुक जाऊँ। मुझे यह प्रस्ताव ठीक लगा। कहीं भी सोना ही तो था। घर में प्रवेश करते ही पीशी ने मनप्रीत के बारे में पूछा। मैं कुछ कहता इससे पहले ही इन्द्राणी ने कहा, ' माँ, अभिजीत आज रात यहीं रहेगा...पिशी थोड़ा चौंकी और कहा, ' नर्सिंग होम में बहूमाँ के पास कौन है ? इन्द्राणी ने उसे संमझाते हुए कहा, ' तुम अधिक चिंता मत करो, सब ठीक है...' पिशी खामोश हो गयी थी। हमेशा से ही वह अपनी बेटी के आगे कुछ न बोला करती थी। पिशी मेरे बिस्तर की व्यवस्था करने लगी। इन्द्राणी ने कहा, ' कुछ अलग से करने की आवश्यकता नहीं है, अभिजीत मेरे कमरे में ही सो जायेगा...' हम दोनों ऊपर इन्द्राणी के कमरे में आ गए। इन्द्राणी ने चाय की पेशकश की तो मैंने न नहीं कहा था। चाय पीते हुए इन्द्राणी ने पिंकी के मामा की बात छेड़ दी, ' इन पैसे वाले लोगों की यही समस्या है, इन्हें सब कुछ टॉप क्लास चाहिए...अब सामान्य सी वर्टिगो की तकलीफ है तो भी वुडलैंड में ले जाओ, बेल-व्यू में ले जाओ,नामी हॉस्पिटल होना चाहिए...' मैंने सहमति में सिर हिलाया तो उसने बात आगे बढ़ा दी कि मामा को समझ नहीं थी तो मनप्रीत को ही समझाना चाहिए था। उसने कहा, ' उसे कहना चाहिए था कि वे उसके मामले में न पड़ें...उसका पति जो उचित है वही कर रहा है...' अब मैंने कहा, ' यही तो मुश्किल बात है...ये लोग आगे बढ़ विरोध करना नहीं जानते...मामा ने कहा है तो हाँ-हाँ करते जाओ... और ये मामा बिज़नेस करते हैं और सिर्फ धन कमाते हैं... आधारभूत रूप में अनपढ़ हैं...'  मैं क्रोध में था। आज मामाजी की जगह मैं मामा कह रहा था। इन्द्राणी न जाने किस मानसिकता में थी। उसने कहा, ' अगर उन्हें लगता है कि यहाँ ठीक से नहीं हो रहा तो अपनी भांजी को दिल्ली ले जायें और वहां बड़े अस्पताल में किसी बड़े डॉक्टर से इलाज करवायें...' उसके स्वर में तंज़ था। मैंने मौन रहकर उसकी बात को स्वीकृति दी थी और मन ही मन सोचा कि मामा ने अब इस सम्बन्ध कुछ बात की तो मैं यही बात कहूंगा।   इन्द्राणी का बिस्तर मुलायम और सुखमय था। मुझे नर्सिंग होम की बेंच और माँ की दी शॉल याद आ गयी थी। इन्द्राणी ने लाइट ऑफ कर दी थी और गुड नाईट कह दिया था किन्तु हम अभी भी बातचीत कर रहे थे। न जाने किस बात पर हम दोनों एक दूसरे के करीब आ गए थे। इन्द्राणी ने पूछा, ' अलग से दूसरा तकिया लाकर दूँ ? मैंने कहा, ' अपने लिए चाहिए हो तो ले लो...मुझे तो हम दोनों के लिए ये एक तकिया ही यथेष्ट लग रहा है...' इन्द्राणी हँस दी और उसने मेरी बाँह को अपनी गर्दन के नीचे रखते हुए खुद को मुझसे जोड़ लिया। एक मूक संवाद चल रहा था दोनों के बीच, शब्द तो न थे परन्तु शारीरिक गतिविधियां थी जो हमें एक-दूसरे में समेटती जा रही थी। हम अज्ञान से कहीं गहरे में डूबते जा रहे थे। उभर कर ऊपर आते और फिर किसी आवेश में    डूबने लगते। रात कब कटी, कैसे कटी कुछ समझ ही न पाए थे।   सुबह असमंजस में लिपटी हुई थी। ये क्या हो गया था ? एक अपराध, एक पाप का सा बोध था। इन्द्राणी सामान्य थी पर जैसे कुछ छिपा रही थी। मैं नर्सिंग होम के लिए निकलने लगा तो वह मेरे पास आयी तो धीरे से कहा, ' अभिजीत, अधिक मत सोचना और मन पर बोझ न लेना...मैंने कहीं पढ़ा है कि युवा कज़िन्स के बीच एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हो जाना सामान्य और स्वाभाविक होता है...'( आज यहीं तक, अगले गुरुवार को आगे, यहीं पर  ... )

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