Chander Dhingra's Blog

Wednesday, May 19, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 74

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra                                                                               http://chander1949.blogspot.com/?m=1    हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ...  ( ७४ ) नर्सिंग होम में बहुत सुबह ही पहुँच गया था। वहां साफ-सफाई का काम समाप्त ही हुआ था। पिंकी अपने बिस्तर पर पीछे की ओर सिर टिकाये बैठी हुई थी। मुझे देख वह हैरान हो गयी थी, ' अरे ! इतनी सुबह आ गए ? मैंने कुछ न कहा और उसके बिस्तर पर ही एक ओर को हल्का सा टिक कर बैठ गया था। उसने अब मुझे गौर से देखा और कहा,' ये क्या वही कल वाले कपड़े पहन कर आ गए हो ? मैं कुछ कहता इससे पहले उस ने खुद ही उत्तर दे दिया, ' जानती हूँ... रात को देर तक सोफे पर बैठे हुए टीवी देखते रहे होगे और वहीं सो गए होगे...अब वैसे ही उठकर यहाँ आ गए हो...चाय पी या नहीं ? मैं अभी भी चुप था। उसने कहा कि रात थर्मस भी भूल गया था और उस में चाय होगी। मैंने थर्मस ली और सामने रखे गिलास में चाय ढाली। गिलास भरी चाय मेरे हाथ में थी। मैं स्वयं और मेरे हाथ में थमी ठंडी-बेस्वाद चाय दोनों एक सामान थे। मैं अपराधी सा, बिना कुछ बोले धीरे-धीरे चाय पीने लगा। पिंकी समझ गयी कि चाय अब पीने योग्य न रही थी। उसने कहा, ' इसे फैंक दो, मेरे कप से ले लो...' मैंने हाथ के इशारे से उसे मना किया। पिंकी कुछ बेहतर तो लग रही थी। उसने कहा, ' देखो, आज काफी अच्छा महसूस  कर रही हूँ... डॉक्टर से पूछना तो कि कब डिस्चार्ज करेंगे...मुझे अब इस तरह से अस्पताल में लेटे रहना अच्छा नहीं लग रहा...' मेरे पास बोलने को कुछ न था। मेरे शब्द तो शायद धुआं बन कहीं उड़ गए थे। मैं ख़ामोश था। एक शिथिलता थी जिसने मुझे रोगी सा बना दिया था। बिना कुछ बोले इशारे से मैंने उसे आराम से रहने को कहा। परंतु वह तो बात करने को उत्सुक थी। उसने कहा, ' कल मामाजी की बात अच्छी नहीं लगी न ? अरे वो तो ऐसा ही करते हैं...उन्हें सब कुछ टॉप क्लास चाहिए...अब देखो, यहाँ का इलाज क्या कुछ कम है, दो दिन में ही मैं ठीक भी हो गयी हूँ...नर्से -डॉक्टर सभी तो अच्छे हैं...आज मामाजी को सब कुछ बता दूँगी और उनकी चिंता दूर कर दूँगी...आप उनकी बातों को मन पर न लिया करो...'   पिंकी मेरा मुख ताक रही थी। वह न जाने क्या सोच रही थी पर अचानक मुझे लगा कि उसे ख़बर थी कि मेरी पिछली रात कैसी कटी थी। हम दोनों ही खामोश थे। पिंकी ने बात आरम्भ की, ' क्या हुआ, बहुत चिंता कर रहे हो ? देखो, आज तो मैं ठीक हो गयी हूँ...आप जैसे लोग छोटी सी बात पर खासा डर जाते हैं... आपकी तो आवाज़ ही बंद हो गयी है...' मैं क्या कहता ? मेरे पास तो केवल ख़ामोशी और घुटन थी। ऐसा लग रहा था मानो एक विशाल सी सागर-लहर मेरे दिमाग में आती थी और भयंकर चोट करती थी। ये क्या हो गया...ये कैसे हो गया... क्षण भर को मानों श्वांस रुक जाती, भय सा लगता और फिर महसूस होता कि वो चिल्लाती हुई लहर जो चोट कर चली गयी थी फिर से लौट कर आ रही थी।  पिंकी ने एक बार फिर से मेरी ख़ामोशी तोड़ी, 'डॉक्टर के आने का समय हो चला है... आप उससे बात कर लो और सब कुछ समझ लो...' कुछ समय में ही डॉक्टर अपनी टीम के साथ आ गए थे। उन्होंने मुझे देखा तो कहा, ' आज तो आपकी पत्नी ठीक लग रही है...परन्तु दो दिन-तीन और रहना होगा...एक तरह की मेडिकल निगरानी की आवश्यकता है...' फिर उन्होंने पिंकी की और देखते हुए कहा, ' क्या बात है, काम में बहुत स्ट्रेस रहता है क्या ? पिंकी मुस्कुरा दी और उसने अंग्रेजी में कहा, ' नो, नथिंग लाइक देट, डॉक्टर...' डॉक्टर ने कमरे से निकलते हुए मेरी और इशारा किया। मैं भी उनके पीछे कमरे से बाहर आ गया था। उन्होंने कहा कि ये जो वर्टिगो की समस्या हुई थी, वो तो कान के द्रव्य के असंतुलन के कारण हुई थी किन्तु कुछ न्यूरो समस्या भी रिपोर्ट में दिखाई दे रही थी जो शायद किसी तरह के प्रेशर और स्ट्रेस के कारण हो सकती थी। डॉक्टर ने मुझे समझाते हुए कहा, ' हम कुछ और देखना चाहते हैं... आशा है तीसरे दिन आप इन्हें घर ले जा सकेंगे...' मैंने केवल इतना कहा, ' जैसा आप उचित समझें...' डॉक्टर आगे बढ़ गए और मैं पिंकी के पास कमरे में लौट आया था। उसने मुझे देखा तो क्या कहा... क्या कहा... कहने लगी। मैंने कहा, 'सब ठीक है... स्ट्रेस के कारण ये सब हुआ है...' मैं यह कह तो गया था परन्तु उसके चेहरे को देखा तो नज़रें मिला न सका था। मैंने कहा, 'रुको मैं थोड़ा बाहर से होकर आता हूँ...' उसने मुस्कुराते हुए कहा, ' सिर्फ चाय पीना, सिगरेट मत फूँकना...' मैंने कुछ न कहा और कमरे से निकल आया। सिगरेट सुलगाने का मन हो रहा था परन्तु पिंकी की बात रोक रही थी। मैं खिन्नता की चरम सीमा पर था। तीन कप चाय पी गया था और हर कप के बाद सिगरेट सुलगाते-सुलगाते रुक जाता था। पिंकी के पास जाने का साहस न जुटा पा रहा था। जानता था कि जाना तो होगा ही। क्या मुझे सब कुछ अपनी पत्नी को बता देना चाहिए ? वह मानसिक समस्या से जूझ रही है, नर्सिंग होम में डॉक्टर की देखरेख में है, ऐसे में क्या करना चाहिए ? अंततः निश्चय किया कि फ़िलहाल मुझे सामान्य रहना चाहिए। वह घर आ जाये फिर देखा जायेगा। यही सब सोचते हुए मैं नर्सिंग होम लौटने लगा। आज उस दिन को सोचते हुए याद कर पा रहा हूँ कि मेरा दिमाग कुछ आश्वस्त सा हो चला था कि समय के साथ सब सामान्य होता चला जायेगा और मैं पिंकी को, जो मेरे और इन्द्राणी के बीच हुआ था उसे एक आकस्मिक घटना के रूप में दिखा पाऊँगा और उसे समझा पाऊँगा कि यह कैसे हो गया था।   मैं उसके बिस्तर के सामने आ बैठा था। वह भी पीठ पीछे तकिया लगा, टिक कर बैठी हुई थी। आज वह कुछ प्रसन्न लग रही थी। मुझे देख उसने पूछा, ' सिगेरट को तो हाथ नहीं लगाया न ? मैंने कहा, ' नहीं, सिर्फ चाय पी है, थर्मस वाली चाय तो बेकार हो गयी थी...' मेरे भीतर कुछ विश्वास सा जाग रहा था। अब वहां से उठने का समय हो चला था। मैंने कहा, ' थोड़ी देर में आता हूँ... ये तुम्हारी समस्या स्ट्रेस के लिए हुई है...दो दिन-तीन दिन और रहना पड़ेगा... फिर घर आ जाओगी ...लेकिन आराम करना होगा...' उसने परेशान सा होते हुए कहा, ' यहाँ रहना होगा, मैं तो घुटकर मर ही जाऊँगी...’  स्वयं के भीतर चल रहे द्वन्द पर विजय पाने के लिए विश्वास की एक हलकी सी लहर ही यथेष्ट होती है। मैं नर्सिंग होम से चला आया था। घर पहुँचने पर माँ ने सबसे पहले अपनी बहू माँ के बारे में पूछा। मैंने कहा कि दो दिन बाद घर आ जाएगी। माँ ने अब मेरे बारे में पूछा,' कैसी रही नर्सिंग होम की बेंच पर तुम्हारी रात ? मैंने हूँ कहा और अपने कमरे में घुस आया और अपने बिस्तर पर पड़ा सोचने लगा, ' ये क्या हो गया है मेरे साथ ? ये क्यों हुआ है मेरे साथ ? अब आगे क्या होगा मेरे साथ ? प्रश्न थे जो घूम-घूम कर आ रहे थे। मैं एक विचित्र सी स्थिति में था। मैं सो जाना चाहता था किन्तु एक बोझ था मेरे मन-मस्तिष्क पर जो क्षण भर के बाद ही न जाने कहाँ से आकर, मुझे किसी पर्वत शिखा से नीचे गहरी खाई में धकेल देता था। ये क्रम चलता ही चला जा रहा था। लगा कि मैं गंभीर मानसिक अवसाद में लिपटता चला जा रहा था। माँ आकर मुझ से बात न करती तो न जाने यूँ ही कब तक चलता रहता। माँ ने कहा, ' मैं किसी काम से निकल रही हूँ, वहाँ मुझे अधिक समय लग सकता है...मैं नर्सिंग होम न जा पाऊँगी...पर तुम यहाँ क्या कर रहे हो, जाओ, बहू माँ के पास जाकर बैठो... वह अकेलापन महसूस कर रही होगी...’ माँ यह कहकर घर से निकल गयी थी और मैं कुछ समय बाद नर्सिंग होम में पिंकी के सामने आकर बैठ गया था। पिंकी मुझे खामोश और व्यथित देख दुखी हो रही थी। उसने कहा, ' ये न जाने मुझे क्या हो गया था उस दिन ? पर अब तो मैं ठीक महसूस कर रही हूँ...मुझे डिस्चार्ज करवाकर निकालो यहाँ से...' मैं उसका मुख देखता रह गया। मैं एक अपराधी बन चुका था। मैंने कहा, ' दो दिन की ही बात है, पूरा चेक अप हो जाने दो...डॉक्टरों को संतुष्ट हो जाने दो...' उसने मेरी बात में सहमति जताते हुए उफ़ का भाव दिखाया था। मैं जितनी देर भी वहां रहा सिर्फ पिंकी की बातों का उत्तर ही देता रहा था। अपनी ओर से कहने को मेरे पास कुछ था ही नहीं। अपराधी के पास भ्रमित होने  के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। मैं स्वयं को किसी कटघरे में महसूस कर रहा था और सामान्य बने रहने का स्वाँग रच रहा था और शायद सफल भी था क्यों कि पिंकी मेरे मौन को उसके प्रति मेरी चिंता समझ रही थी। आज उस दिन को याद कर समझ  पा रहा हूँ कि जो व्यक्ति किताबी ज्ञान से भरा हो और केवल शिक्षा-परीक्षा के श्रेष्ठ परिणामों के आधार पर स्वयं को उच्च मानता हो, वह अनजाने ही किस कदर चतुर होता चला जाता है। शायद यही दिमागी चतुराई अनजाने में उसकी सरलता छीनती चली जाती है और धूर्तता की सीमा को छूने लगती है। अपने स्वधर्म में हो रहे इस परिवर्तन को वह देख ही नहीं पाता, कई कई वर्षों तक और कभी तो जीवन के अंतिम क्षणों तक। ( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे, यहीं पर ...)

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