Chander Dhingra's Blog
Sunday, June 20, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -75
टू स्टेट्स - एक नई कहानी
( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ..
( ७५ ) मैं शाम को तैयार हो रहा था कि बिशाखा ने मुझे चाय से भरी हुई थर्मस पकड़ा दी थी। वह जानती थी कि मैं रात को नर्सिंग होम में रहूँगा। उसने मुझे शान्त और चिंतित देखा तो कहा, ' अरे ! तुम तो दो दिन में ही इतने दुर्बल हो गए हो...पत्नी के प्रति ऐसा प्रेम तो इन दिनों यदाकदा ही देखने को मिलता है... सौभाग्यशाली है हमारी बहू माँ...’ वह हाथ जोड़कर ईश्वर से प्रार्थना करने लगी कि वह मुझे सामर्थ्य दे और मेरी पत्नी को स्वस्थ कर दे। नर्सिंग होम पहुँचने से पहले ही इन्द्राणी का फोन आ गया था। वह सब हालचाल पूछ रही थी। उसकी बातों से ऐसा लग रहा था कि वह सामान्य थी मानो हम दोनों के बीच जो हो गया था वह स्वाभाविक था और उसमें कुछ भी ऐसा न था जो विचलित कर दे। इस ओर से मैं तो केवल सुन रहा था। उत्तर के लिए मेरे पास केवल हूँ और हाँ दो शब्द ही रह गए थे। उसने कहा, ' नर्सिंग होम की वो बेंच तो आज भी वैसी ही होगी, तुम संकोच मत करना और यहाँ अपनी पिशी के घर ही आ जाना...' मैंने अब भी कुछ न कहा था।
पिंकी अब कुछ हद तक अपने स्वाभाविक स्वभाव में आ चुकी थी। मुझे देख उसके मुख पर मुस्कान आ गयी थी। परन्तु जो मेरे मुख पर आयी थी उसे मैं देख तो न पा रहा था परन्तु महसूस कर पा रहा था। मुस्कान के नाम पर जो मेरे मुख पर थी, वह एक झेंप थी। पिंकी ने बताया कि उसने अपने पापाजी और मामाजी के साथ बात कर ली थी। दोनों बहुत संतुष्ट थे और मामाजी तो मेरे प्रति कृतज्ञ थे और ऐसा दामाद मिलने पर रब का शुक्रिया कर रहे थे। उसने कहा कि वे दोनों तो कलकत्ता आना भी चाहते थे परन्तु उसने ही मना कर दिया था। पिंकी ने यह भी बताया कि देवयानी भी उसकी स्वस्थता देख प्रसन्न थी। उसने तो आगामी सप्ताह के बाद से एक शूटिंग का नया शिडूल भी बना लिया था। उसके होटेल वाले भी संतुष्ट थे और चाहते थे कि वह जल्द ही अपना काम ज्वाइन करे। उसकी हर बात पर मैं केवल धीमा सा मुस्कुराता रहा था। मुझे लगा कि अभी वह माँ के साथ उनके महिला आयोग वाले काम, सुबह की संगीत क्लास और जॉगिंग और केडिया भाभी की बात भी करेगी। शायद वह करना भी चाहती थी। उसकी केडिया भाभी और भैय्या उस से मिलने भी आये थे और शायद बहुत सी बातें छोड़ गए थे जो वह मेरे साथ साझा करना चाहती थी। अपने आसपास बन चुके इस स्नेह-चक्र से वह खुश थी। उसने बात को आगे बढ़ाया, ' यहाँ से निकलने के बाद पहला काम जो करना है, वह है बेलूर मठ जाना, बंगाली होटल में मछली वाला लंच और एक अच्छी बंगाली मूवी...इस सब के बाद कुछ और देखा जायेगा...क्यों ठीक है न ' वह उस दिन की मेरी नाराज़गी को दूर करना चाह रही थी। मैं अपनी यथास्थिति में था। केवल इतना कहा, ' हाँ सब हो जायेगा...' वह इन दिनों की अपनी चुप्पी और व्यथा को पूरी तरह से समाप्त कर देना चाहती थी। उसने कहा, ' लवली कुछ दिनों के लिए मेरे पास आना चाहती थी तब आपने कहा था कि अभी नहीं बाद में, सोच रही हूँ उसे अब आ जाने को कह दूँ... मैं भी उससे मिलने को तरस रही हूँ...ऐसा करते हैं ये बेलूर मठ वाला कार्यक्रम अभी स्थगित कर देते हैं, लवली को तो वहां ले जाना ही होगा... उसके साथ ही जायेंगे...' वह हंसने लगी और बात बढ़ाते हुए उसने कहा, ' परन्तु ये बंगाली लंच और मूवी वाला कार्यक्रम तो जरूर होगा...ऑफिस ज्वाइन करने से पहले ही...काम में फँस गयी तो ये फिर से अटक जायेगा...' मैं तो बोल ही न रहा था।अचानक मुझे मेरे मस्तिष्क ने सचेत किया कि मेरी ख़ामोशी कहीं अस्वाभाविक न दिखे, मुझे कुछ न कुछ तो बोलना चाहिए। मैंने कहा, ' कल डॉक्टर मेरे जाने के बाद फिर से आये थे, कुछ कहा उन्होंने ? पिंकी ने कहा, ' आये थे परन्तु बात वही थी कि अभी मुझे यहाँ ऑब्ज़र्वेशन में रहना होगा... न जाने क्या देखना चाहते हैं...उनका आने का समय हो चला है... आप ही बात कर लेना...' मैंने कहा ठीक है। मैंने देखा कि उसके बिस्तर के दूसरी ओर रखी छोटी टेबल पर फूलों के गुच्छे रखे थे। मुझे उत्सुकता हुई और मैंने उस ओर जाकर देखा। तीन सुंदर बुके रखे थे। एक पिंकी के ऑफिस की ओर से था और दूसरा केडिया भाभी की ओर से और तीसरा बिना नाम से था। शायद धारावाहिक के प्रॉडशन हाउस की तरफ़ से था। कुछ कार्ड्स भी थे जिनमें उसके सुस्वास्थ्य की कामना की गयी थी। मुझे आश्चर्य हुआ कि पिंकी के इतने शुभ चिंतक बन चुके थे। एक कार्ड में सुस्वास्थ्य की कामना के साथ साथ मिलने का निमंत्रण भी था। ये शायद ऑफिस के किसी साथी का था।
मैंने बेंच को थोड़ा व्यवस्थित करने का प्रयास किया तो पिंकी बोल उठी, ' अरे, घर जाकर आराम से सोना...यहाँ बेवजह परेशान होगे...यहाँ रहे तो बिमार हो जाओगे... कल ही तो बात हुई थी कि रात को चले जाओगे और सुबह आ जाओगे...' मैंने कहा, ' नहीं, यहीं ठीक है...माँ भी चाहती है कि रात तुम्हारे साथ रहूं...' उसने कहा कि माँ की चिंता स्वाभाविक थी परन्तु ऐसी कोई बात नहीं थी और मुझे घर चले जाना चाहिए था। मैं खामोश था। पिंकी ने कहा कि थर्मस की चाय को दोनों मिलकर समाप्त कर लेते हैं । मैंने पिंकी के कप में चाय ढाली और साथ रखे गिलास में अपने लिए ले ली। थर्मस में अभी भी चाय बाकी थी। पिंकी ने अपने बचपन की एक कहानी सुनाई कि कैसे जब वह बीमार हो गयी थी और उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। जब उसे अस्पताल ले जा रहे थे तो वह ऐसे रोमांचित और खुश थी मानो कि जैसे किसी बड़े होटल में रहने जा रही हो। वह हँस रही थी कि डॉक्टर ने प्रवेश किया। डॉक्टर ने देखा तो मुस्कुराते हुए कहा, ' क्यों मिसेज रॉय, आज तो फिट दिख रही हैं... परन्तु घर जाना तो दो दिन बाद ही होगा...' डॉक्टर ने बताया कि न्यूरो रिपोर्ट में थोड़ा सा कुछ ऐसा दिखा है जिसका निवारण करना उचित होगा। उसने यह भी कहा कि कुछ मेडिसिन लेनी होंगीं और आराम करना करना होगा। किसी भी भी तरह की चिंता या तनाव नहीं होना चाहिए। उसने हमें आश्वस्त करते हुए कहा कि यह कोई बहुत गंभीर बात न थी। पिंकी सुन रही थी और मुझे देख ऐसा भाव दिखाया मानों कह रही हो, ' ये तो डॉक्टरों की बातें हैं...वे तो सब कुछ बढ़ा-चढ़ा कर कहते हैं...' डॉक्टर के चले जाने के बाद एकदम यही बात पिंकी ने कही थी। मैं भीतर ही भीतर प्रसन्न था कि मैंने उसकी हँसी में छिपे भाव सही पकड़े थे।
विजिटिंग टाइम समाप्त हो गया था। मैं किसी उलझन में था। मैंने एक बार फिर से उस कमरे में रखी बेंच को व्यवस्थित करने का प्रयास किया। पिंकी ने कहा, ' अरे ! इसे छोड़ो और घर जाकर सोओ...मेरी चिंता मत करो...यहाँ रात काटी तो बीमार ख़ुद ही बीमार हो जाओगे और इस बिस्तर पर सोना होगा...' वह हँस रही थी, ' जाओ, घर जाओ, सुबह आ जाना और न्यूज़ पेपर लेते आना...' मैं उठ खड़ा हुआ और पिंकी की ओर ऐसे देखा जैसे उसका आदेश था सो मान रहा था। मैं थर्मस वाला बैग कंधे पर झुलाये घर की ओर बढ़ चला था। एक गली थी जिसके दायीं ओर मुड़ जाने पर हमारा घर आ जाता था और सीधे बढ़ जाने पर मुख्य सड़क। मैं सीधा बढ़ा और मुख्य सड़क पर आगे आ गया था। अब मैं अनायास ही अपनी पिशी के घर की ओर चला जा रहा था।
( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को, यहीं पर )
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