Chander Dhingra's Blog
Wednesday, June 23, 2021
टू स्टेट्स -एक नई कहानी (Two States - A New Story) - 79
टू स्टेट्स -एक नई कहानी (Two States - A New Story)
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ..
( ७९ ) पिशी और इन्द्राणी अपने घर को लौटने को हुए तो मैं एक बार फिर से भयभीत हुआ था। मुझे लगा न जाने पिंकी की प्रतिक्रिया कैसी होगी ? इन्द्राणी जाते-जाते उसके पास आयी और स्नेह दर्शाते हुए बोली, ' तुम जल्द ही एकदम ठीक हो जाओगी...किसी बात की चिंता न करना...तुम बहुत प्यारी लड़की हो, हम सब तुम्हें चाहते हैं...जीवन में बहुत कुछ होता रहता है, मन मलीन नहीं करना चाहिए...मैं फिर आऊँगी मिलने...' मैं पास में ही खड़ा था। उसकी बातों को मैं अपने हिसाब से सुन रहा था। मुझे लगा कि उसे इतना सब कहने की क्या आवश्यकता थी ? सीढ़ी से नीचे उतरते हुए उसने एक चुटीले अंदाज़ में मेरी ओर देखते हुए कहा, ' तुम भी सुन लो...जीवन में बहुत कुछ होता रहता है...इसे सरलता से लेना चाहिए...अब तुम्हें अपनी पत्नी का पूरा ख्याल रखना चाहिए...' मैं उसे देखता रह गया। नीचे पहुँच उसने ऊपर की ओर देखा और ऊँची आवाज़ में कहा, ' मेरे घर आना...'
मेरे लिए यह सब अब सामान्य न था। मैंने मन ही मन सोचा, ' ये इन्द्राणी भी अजीब लड़की है... हम दोनों के बीच इतना कुछ हो गया है और इस पर कुछ असर नहीं है...यह अपने सामान्य स्वरूप में है...कोई रोष-दोष नहीं है...बस कुछ हुआ था और बीत गया...' मैं पिंकी के पास आया और कहा, ' चलो, अपने कमरे में चलते हैं... ' उसने कुछ न कहा बस संकेत दिया कि वह वहीं ठीक थी। मैंने कहा कि माँ का पलंग था और शायद उन्हें भी आराम करना होगा। अब पिंकी उठ खड़ी हुई और ऊपर जाने लगी। मैंने सहारा देने को हाथ बढ़ाया तो उसने न कर दिया, ' मैं ठीक हूँ...' पिंकी अपने कमरे में प्रवेश करते ही बिस्तर और अन्य चीजों को व्यवस्थित करने लगती थी किन्तु आज उसने ऐसा कुछ न किया था और बिस्तर पर लेट गयी थी। मैंने उसके सिर के नीचे तकिया रखना चाहा तो उसने कहा, ' नहीं चाहिए, ऐसे ही ठीक हूँ...' मैंने कहा, ' तुम्हें आराम चाहिए, इसे रख लो...' उसने कुछ न कहा परन्तु मैंने कुछ सुना कि वह कह रही थी कि यह सहानुभूति रहने दो। पिंकी ने आँखें बंद की हुई थी। शायद कुछ आंसू बाहर आना चाहते थे, जिन्हें वह रोक रही थी। मैंने दबे स्वर में कहा, ' क्या तबीयत ठीक नहीं लग रही...कुछ ऐसी दवाइयाँ दी गयी हैं जिनका प्रभाव कुछ दिन तक रहता है...धीरे-धीरे ठीक हो जाओगी...' उसने हल्के से आँखें खोली और मुझे ऐसे देखा मानों कह रही हो, ' कुछ बिमारियां भी ऐसी होती हैं जिनका प्रभाव दिन दिन बढ़ता है, वे दवाइयों से कम या ठीक नहीं होती...' मैंने पास रखे पानी के गिलास को उसकी ओर बढ़ाया, ' पानी पी लो...' उसने पानी के दो घूंठ पीये और गिलास मुझे वापिस कर दिया। वह कुछ क्षण खामोश रही फिर कहा, ' आप इन्द्राणी दीदी के घर जाकर सोते थे, यह मुझे तो नहीं बताया...' मैंने कहा, ऐसी कोई विशेष बात न थी...क्या बताता... पिशी चाहती थी कि उनके पास आ जाया करूँ... ' उसने मुझे ऐसे देखा मानो कह रही हो, ' क्यों झूठ बोल रहे हो ? वह अधिक बोल न पा रही थी पर उसने अब कहा, ' इन्द्राणी और आप तो बचपन के साथी हो, क्यों नहीं कहते कि उसने कहा था कि उसके पास आ जाओ...बुआ जी का नाम क्यों ले रहे हो...मम्मीजी को भी तो भी नहीं बताया...' अचानक न जाने मुझे क्या हुआ कि मैं उठ खड़ा हुआ और ऊँची आवाज़ में कहा, ' हाँ... नहीं बताया... माँ को नहीं बताया...तुम्हें नहीं बताया...बाबा को नहीं बताया... बिशाखा को नहीं बताया...किसी को नहीं बताया... इन्द्राणी बचपन की दोस्त है...चलो, उसके साथ दो रात बिता दी तो क्या हुआ, यह एक सामान्य बात है...युवा लोगों में हो जाती है...' वह धक से मुझे देखती रह गयी थी। आवेश में आकर मैंने उसके मन में उठ रहे संदेह के बुलबुलों को साफ कर दिया था। उसने कहा, ' जो बात किसी के लिए सामान्य हो वह दूसरे के लिए असामान्य और घातक भी हो सकती है...' उसने तकिये को थोड़ा नीचा किया और आँखें बंद कर ली थी। अचानक मुझे लगा मेरे सामने जो थी वह पिंकी नहीं कोई और थी, एक रोगी थी जो किसी गंभीर बीमारी से जूझ रही थी। शायद मैंने भूल की थी और मुझे अपने आवेश पर नियंत्रण रखना चाहिए था। लगभग दस मिनट के बाद पिंकी ने आंखें खोली और कहा, ' प्लीज़, मेरी बहन लवली को बुला लो...' मैंने कहा, ' ठीक है...' वह करवट बदल दूसरी ओर को लेट गयी थी। इतने लम्बे समय बाद भी मुझे सब याद है। वह पिंकी के साथ मेरा अंतिम वार्तालाप था। हम दोनों में बात तो होती थी परन्तु वह तो कुछ भी न बोलती थी, परन्तु मैं ही न जाने क्या क्या सुन लेता था। वह तो मुरझाती तुलसी सी होती जा रही थी जिसे अब न इच्छा थी कि कोई भोर में जल दे और संध्या समय उसके पास प्रदीप जलाये।
मैंने चंडीगढ़ में फोन किया था और बताया कि पिंकी चाहती थी कि लवली कुछ दिनों के लिए उसके पास आ जाये। पिंकी के पापाजी से बात हुई थी। उन्होंने चिंता जताते हुए अपनी बेटी का हाल जानना चाहा था। मैंने उन्हें आश्वस्त किया था कि ठीक है परन्तु शायद घर की याद में है। उन्होंने कहा कि वह लवली को कलकत्ता भेज देंगे लेकिन कुछ दिनों के बाद क्यों कि वह किसी परीक्षा की तैयारी में थी और कुछ सप्ताह के बाद ही जा पायेगी। मैंने पिंकी को यह बताया तो उसने आश्चर्य से देखा। स्वर तो न थे परन्तु मैं सुन पा रहा था, ' ऐसी कौन सी परीक्षा है जो मेरे से मिलने और मेरे साथ रहने से अधिक आवश्यक है ? मैंने कहा, ' मैं समझ पा रहा हूँ कि तुम्हें अपने घर की याद आ रही है और वहां से कोई इस समय आ जाये तो अच्छा रहेगा परन्तु सब की अपनी मज़बूरी होती है... अब लवली की परीक्षा है तो वह कैसे आ पायेगी ? पिंकी मेरा मुंह ही ताक रही थी मानो कह रही हो 'बहनों का प्यार समझ पाना सब के बस की बात नहीं होती...' मैंने कहा, ' अगर तुम कहो तो मैं सीधे लवली से बात करता हूँ...' पिंकी के चेहरे पर कोई भाव न था परन्तु मैंने अंदाज़ा लगाया कि वह कह रही थी, ' मुझे अकेले ही झूझना होगा वह बेचारी यहाँ आकर क्यों परेशान हो...'
माँ पिंकी के पास आयी और उसका हालचाल पूछने लगी परन्तु पिंकी शांत थी। मेरे बाबा हमारे कमरे में किसी काम से ही आया करते थे, ने वहां आकर पिंकी से बात की किन्तु वह केवल सुनती रही थी। बाबा समझ ही न पाए थे कि पिंकी ने उनसे कुछ भी न कहा था। उन्होंने मुझसे कहा. ' जो दवाइयां दी गयी हैं वे ठीक से खिला रहे हो तो ? तुम्हारी जिम्मेदारी है हमारी बहू माँ का पूरा ख्याल रखने की... कोई भी त्रुटि नहीं होनी चाहिए...' मैंने सिर हिलाया और उन्हें आश्वस्त किया कि सब ठीक से चल रहा था।
पिंकी ने अगले दो दिन मुझसे बात न की थी। बाद में मुझे लगा कि वह किसी से भी अधिक बात न कर रही थी। केवल आवश्यकता अनुसार हाँ या न कह रही थी। बिशाखा ने ऊपर आकर उससे पूछना चाहा कि यदि वह कुछ विशेष खाना चाहे तो वह बना देगी। पिंकी ने न हाँ कहा और न ही ना। विशाखा अपनी ओर से बात करती रही कि कैसे उसे भी एक बार तीव्र ज्वर आया था तो उसका पाचन तंत्र नष्ट हो गया था और उसकी भी कई दिनों तक कुछ भी खाने की इच्छा न होती थी। उसने बताया कि कैसे नींबू और आंवले के अचार से उसका भोजन के प्रति स्वाद जागा था। मैंने सुना तो कहा कि वह वही अचार पिंकी के लिए भी ले आये। बिशाखा के मुख पर निर्मल मुस्कान थी परन्तु पिंकी ऐसे थी जैसे कुछ हुआ ही न हो। मैंने उससे कहा कि लवली को फ़ोन किया था और उसे पिंकी के स्वास्थ्य के बारे में बताया था। मैंने कहा, ' तुम्हारी बहन जल्द ही यहाँ पहुँच जाएगी और वह परीक्षा अगले सत्र में देगी...' मुझे लगा कि वह यह सुन खुश हो जाएगी परन्तु वह खामोश थी। चार दिन बाद लवली आ गयी थी। उसे देख भी पिंकी के मुख पर एक बार को मुस्कराहट आयी थी परन्तु क्षण भर बाद ही एक स्थिरता थी। उसने अपने मम्मी-पापा अपने चंडीगढ़ के बारे में कुछ न पूछा था। मुझे लगा दोनों बहनों को एकांत दिया जाना चाहिए। शायद पिंकी इससे अपने स्वाभाविक स्वरूप में आ जाये ?
दोनों बहनें एक ऊपर के कमरे में साथ थी। कुछ समय बाद लवली नीचे आयी तो बोली, ' जीजाजी, पिंकी की तबीयत तो ठीक नहीं लगती...वह तो कुछ बोल ही नहीं रही...डॉक्टर ने क्या कहा है ? मैंने कहा, ' वैसे तो सब ठीक है...जो वर्टिगो की समस्या हुई थी वह तो कान के कारण थी लेकिन डॉक्टर ने किसी भी तरह के स्ट्रेस से दूर रहने की सलाह दी है...मैं कल फिर डॉक्टर से मिलूंगा...तुम भी मेरे साथ चलना...अब तुम आ गयी हो तो मुझे भी थोड़ा सपोर्ट मिल गया है...मैं तो अकेला था...' कोई था जो मेरे भीतर बैठा मुझसे चतुराई भरी बातें करवा रहा था और मैं अपने प्रति सहानुभूति जाग्रत करने की चेष्टा में था। लवली ने मुझे प्यार से देखा और कहा, ' जीजू आप इतना कुछ कर रहे हैं, आपका ऑफिस भी तो है ? मैंने कहा, ' ऑफिस बाद में है वो पिंकी से आगे नहीं है... आवश्यक हुआ तो कुछ महीनों की छुट्टी ले लूंगा...' लवली ने मेरे गले में अपनी बाहें डाल दी और कहा, ' माय डिअर जीजू, यू आर ग्रेट...' उसने कहा, 'मम्मी और मामाजी को फोन करना है...' उसने अपना मोबाइल निकाला और पहले चंडीगढ़ का नंबर मिलाया। मैंने उससे कहा कि लैंडलाइन से फोन करे क्योंकि मोबाइल में अधिक बिल आता है तो वह खिलखिला पड़ी और कहा कि अब लैंडलाइन में उसे मज़ा नहीं आता था। उधर से आवाज़ आयी तो उसने कहा, ' मम्मी, पिंकी बहुत कमजोर हो गयी है...बात ही नहीं कर रही...डॉक्टर ने एकदम स्ट्रेस लेने से मना किया है...' शायद उधर से मम्मी ने कहा कि उसे दो-दो काम नहीं करने चाहिए थे। लवली ने कहा, 'हाँ, मम्मी मैं इसका टीवी सीरियल वाला काम छुड़वा दूंगी...बहुत हीरोइन बनने चली है...अब मैं आ गयी हूँ, देखती हूँ इस पगली को किस बात का स्ट्रेस है...उसकी मम्मी ने शायद अब मेरे बारे में पूछा था। उसने कहा, ' अरे, जीजू ही तो सब संभाल रहे हैं... वो तो दो-तीन महीने की छुट्टी भी लेने की कह रहे हैं...कल मैं डॉक्टर से खुद जाकर मिलूंगी और आपको बताऊँगी...' लवली की बातें मुझे अच्छी लग रही थी। मैंने कहा, ' मामाजी को भी फोन कर लो...' उसने हूँ कहकर दिल्ली का नंबर घुमाया और उन्हें भी ऐसा ही सब कहा। मामाजी ने मुझसे बात करनी चाही तो लवली ने फोन मेरे हाथ में दे दिया। मैं मामाजी की बात सुनता रहा। वह किसी स्पेशलिस्ट से परामर्श लेने का जोर दे रहे थे। उन्होंने कहा कि मैं पिंकी को दिल्ली ले आऊं और यहाँ एम्स के किसी बड़े डॉक्टर को दिखाया जाये। वह बीच-बीच में यह कह देते थे कि पैसे की फ़िक्र न करना। मेरी ओर से चुप्पी देख उन्होंने कहा, ' पिंकी से बात करवाओ...' मैंने पिंकी को फोन पकड़ाया, ' मामाजी हैं, बात कर लो...' पिंकी ने मेरी ओर न देखा। वह स्थिर थी और चुपचाप मामाजी की बात सुनती चली गयी थी। मुझे लगा कि पिंकी की ख़ामोशी ने मामाजी को चिंतित कर दिया होगा और वह कहीं कलकत्ता ही न पहुँच जाएं ?
लवली मेरे साथ उसी नर्सिंग होम के डॉक्टर के पास गयी थी। डॉक्टर ने एक नया प्रिस्क्रिप्शन बनाया था। लवली संतुष्ट न थी। उसने मामाजी को सब खबर दी और उन्होंने तुरंत किसी न्यूरो विशेषज्ञ से मिलने को कहा था। मैंने इधर-उधर फोन किया और उसी शाम हम दोनों, सभी रिपोर्ट्स लेकर विशेषज्ञ से मिले थे। ये कलकत्ता के एक नामी डॉक्टर थे। उनकी अपॉइंटमेंट सरलता से न मिलती थी। नाना और माँ के नाम पर यह संभव हो सका था। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट्स के साथ साथ रोगी से भी मिलना होगा। लवली ने कहा कि इसे किसी और दिन पर नहीं टाला जा सकता। वह घर गयी और पिंकी को साथ लेकर आ गयी थी। मैं वहीं प्रतीक्षा कर रहा था। पिंकी को आते देख मैं अचरज में आ गया। वह सच में किसी गंभीर रोगी सी दिख रही थी। मैं मन में सोचा ईश्वर करे इस डॉक्टर के इलाज से वह स्वस्थ हो जाये। आज लवली भी बहुत गंभीर दिखी थी। डॉक्टर ने कहा कि पिंकी शायद किसी गहरे मानसिक आघात की शिकार हुई थी। पिंकी केवल हाँ - हूँ कर रही थी। नई औषधी दी गयी थी और कुछ नए टेस्ट्स की सलाह दी गयी थी। लवली ने घर आते ही चंडीगढ़ और दिल्ली में सूचना दे दी थी। पिंकी के पापा और मामा दोनों का मानना था कि टीवी धारावाहिक का काम वह न संभाल पा रही थी और वहीं कुछ हुआ था। उन्होंने मुझसे भी बात की थी। मैंने भी कहा था कि यही कारण हो सकता था।( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे, यहीं पर ...)
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