Chander Dhingra's Blog
Sunday, June 20, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -76
टू स्टेट्स - एक नई कहानी
( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ..
( ७६ ) घर का दरवाजा इन्द्राणी ने ही खोला था। मुझे देख वह ऐसे मुस्कुराई, मानो वह कुछ ऐसा कहने का प्रयास कर रही हो कि उसे पूर्ण विश्वास था कि मैं आऊँगा ही । उसने माँ को आवाज़ दी और कहा, ' माँ, अभिजीत आया है...' पिशी रसोई घर से सामने निकल आयी और हाथ पोंछते हुए कहा, ' अब कैसी है हमारी बहू माँ...' मैं कुछ उत्तर देता इससे पहले ही उन्होंने स्वयं ही उत्तर दिया, ' सुना है अभी डॉक्टरी निगरानी में रहना होगा...' अब मैंने हां कहा और न जाने क्यों अपनी ओर से बात बढ़ाते हुए कहा, ' वह नहीं चाहती कि मैं नर्सिंग होम में रात काटूँ...दिन भर उसके पास रहता हूँ...वह अब ठीक है...दो रात की बात है फिर घर आ जाएगी...' पिशी ने हां में सिर हिलाया और कहा, 'अच्छा, बहू माँ अब कुछ बांग्ला भी बोल पाती है... मुझे पिशी कहती है या अपनी भाषा में बुआ ? मैंने कहा, ' बोलने का प्रयास तो करती है और कुछ शब्द सीख भी गयी है परन्तु आपको तो बुआ ही कहती है...' पिशी मुझे आराम करने का कह कर, रसोई घर में चली गयी। इन्द्राणी ने एक ख़ास अन्दाज़ में मुझसे पूछा, ' खाना खाओगे ? मैंने कहा, ' खाना खा लिया है...पर इस थर्मस में चाय है, वह पी लूँगा...' इन्द्राणी ने कहा, ' मेरे कमरे में चलो, मैं कप और साथ में कुछ खाने का लेकर आती हूँ...' इन्द्राणी कुछ समय बाद कमरे में आयी थी। उसके हाथ में एक बड़ी ट्रे थी। मैं संकोच कर रहा था और अपने में ही सिमटे जा रहा था किन्तु इन्द्राणी सामान्य दिख रही थी। उसने कहा, ' आज होटल से खाना मंगवाया गया था...माँ ने खा लिया है किन्तु मैंने नहीं खाया...चलो तुम भी मेरे साथ कुछ शेयर लो...' मैं तो कुछ भी बोल पाने की स्थिति में न था। इन्द्राणी ने एक प्लेट में कुछ परोसा और मुझे पकड़ाते हुए कहा, ' इस तरह घबराए हुए क्यों हो ? हम दोनों बचपन के साथी और दोस्त हैं, तुम एक शिक्षित युवक हो, जो हुआ है उसके बारे में तुम्हारे मन में स्पष्ट दृष्टिकोण होना चाहिए...ऐसा हो जाना स्वाभाविक होता है ... किसी साधारण युवक सा मत दिखो...मुझे अच्छा नहीं लगता...’ अब मैंने उसकी ओर देखा और कहा, ' जो हुआ, वह होना तो नहीं चाहिए था...' इन्द्राणी ने अपनी प्लेट में से फिश फ्राई का एक टुकड़ा उठाया और मेरी प्लेट में रखते हुए कहा, ' तुम ये खा लो... मैंने शाम को ही खाया है...' उसने मेरी बात के उत्तर में कहा, ' ये चाहिए या नहीं चाहिए की बात नहीं है...हम बहुत कुछ चाहते हैं जो नहीं होता और अनजाने ही वो जाता है जो नहीं चाहते... ये सब अपने आप में स्वाभाविक प्रक्रिया है...' मैंने कहा, ' जिसे सामाजिक स्वीकृति नहीं वह स्वाभाविक कैसे हो सकता है ? इन्द्राणी को मैं हमेशा से बौद्धिक स्तर पर खुद से श्रेष्ठ मानता रहा था। उसने कहा, ' सामाजिक स्वीकृति या अस्वीकृति एक कृत्य है जिसे हम स्वयं ही बनाते हैं और अपनी सुविधानुसार उसमें परिवर्तन भी करते रहते हैं...जो कल तक अस्वीकृत था, आज स्वीकृत हो सकता है...' इन्द्राणी ने मेरी ओर ऐसे देखा मानो मेरी प्रतिक्रिया जानने की कोशिश कर रही हो। मैं उसके साथ दृष्टि न मिला पा रहा था। मैंने कहा, ' तुम सदैव से ही हमारे परिवार में गुणी और बुद्धिवान जानी जाती हो...तुम्हारी बातों में किसी को भी सहमत करा लेने की क्षमता है...' हम दोनों अब चुपचाप खाना खा रहे थे। अचानक इन्द्राणी उठी और उसने टीवी ऑन कर दिया। समाचारों का प्रसारण हो रहा था। तत्कालीन मुख्यमंत्री किसी विषय पर विचार रख रहे थे। वह कह रहे थे कि राज्यों की स्वायत्ता पर किसी भी तरह का आघात उन्हें स्वीकार न होगा। यह वह समय था जब पश्चिम बंगाल राज्य में वाम फ्रंट की सरकार थी और केंद्र सरकार के साथ एक तनाव सा बना रहता था। उन दिनों मैं और मेरी उम्र के अनेकों युवा किसी नई सोच और नई व्यवस्था के स्वपन में जी रहे थे। हमें लगता था कि यह जो आर्थिक और पूंजीवादी शक्ति थी वह हमारे सपनों को साकार न होने दे रही थी। मैंने इन्द्राणी की ओर देखते हुए कहा, ' हम बंगालियों के सामाजिक समता के सपने न जाने कब पूर्ण होंगे ? इन्द्राणी मुस्कुरायी और उसने कहा, ' सामजिक और आर्थिक समानता एक स्वपन है जो हमेशा स्वपन ही रहेगा... यह पूर्ण तो कभी न होगा किन्तु समाज में एक तरह का विद्वेष बनाये रखेगा...' मैंने कहा, ' शायद हमारा प्रदेश कुछ कर दिखाए...नया नेतृत्व है...' इन्द्राणी मुस्कुराई और मुझे देखते हुए कहा, ' नया कुछ नहीं है, एक नया रंग है जो वक्त के साथ पुराने रंग में ही घुलमिल जायेगा... अच्छा, खा लिया हो तो प्लेट दो, मैं रखकर आती हूँ...' वह बाहर गयी और कुछ समय बाद आयी। उसके हाथ में पान था । उसने कहा, ‘ पान खाओगे ? मेरा उत्तर सुने बिना ही उसने दाँत से आधा काट लिया और आधा मेरे मुँह में डाल दिया। पिशी भी साथ थी। वह यह देख हँसने लगी। टीवी चल रहा था। उन्होंने कहा, ' ये दिल्ली वाली सरकार हमें कुछ करने न देगी...हमारे मुख्यमंत्री जो भी करें ये लोग उसी पुराने तरीके से रोड़े अटकाते रहेंगे...' पिशी की इस बात पर मैंने इन्द्राणी की ओर देखा तो वह हँसते हुए बोल उठी, ' अरे, मेरी माँ तो पक्की कम्युनिस्ट समर्थक है...ज्योति बसु तो उसके लिए उत्तम कुमार के सामान एक हीरो हैं...'
इन्द्राणी के कमरे में आज बिस्तर पर एक नयी चादर बिछी हुई थी। कमरा कुछ अधिक व्यवस्थित भी लग रहा था। बिस्तर के साथ लगी छोटी टेबल पर पानी से भरा जग और दो गिलास रखे हुए थे जो कल न थे । तकिये पर एक इंग्लिश पुस्तक रखी थी। मैंने उसे उठाया। यह उपन्यास था। मैंने इसके बारे में स्थानीय अंग्रेज़ी समाचार पत्र में पढ़ा था कि यह प्रेमकथा आधारित उपन्यास कैसे विश्व प्रसिद्द हो रहा था और बेस्ट सेलर की श्रेणी में आ गया था। मुझे पुस्तक को देखते हुए देख, इन्द्राणी ने कहा, ' मैंने पढ़ लिया है... अच्छा उपन्यास है, तुम ले जाना...' मैंने कहा, ' ये इंग्लिश के पेपरबैक हमारे बांग्ला उपन्यासों का क्या मुकाबला करेंगे...बांग्ला साहित्य सर्वश्रेष्ठ है...' मैंने पुस्तक को एक ओर रख दिया था। हम दोनों लेटे-लेटे यहाँ-वहाँ की बातें करते रहे परन्तु मन था जो बातों से दूर कुछ और ही सोच रहा था। कुछ समय बाद जब इन्द्राणी ने लाइट ऑफ की तो बरबस दोनों एक-दूसरे में सिमट गए। मुझे ऐसा लगा कि यह कल वाली ही रात थी जो अधूरी रह गयी थी। मैंने हल्के से यह बात इन्द्राणी के कानों में कही तो वह खिलखिलाई और उसने कहा, ' एक रात और है...इस रात को कल तक और ले चलना...उसके बाद तो तुम्हारा घर संसार मेरा अपना संसार ...’ मैंने कुछ न कहा किन्तु मेरी ख़ामोशी ने उसकी बात में हाँ मिलायी ही थी। सच अगले दिन भी मैं, चाय भरी थर्मस के साथ वहां फिर से पहुँच गया था। पिशी ने मुझे देखा तो कहा, ' बहू माँ तुम्हारी सुविधा-असुविधा का कितना सोचती है...वहां नर्सिंग होम में ठीक से सो न पाओगे, इसलिए तुम्हें यहाँ भेज देती है...ईश्वर उसे स्वस्थ रखे...कल तो घर आ ही जाएगी...उसे लेकर यहाँ मेरे घर आना...'
( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर )
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