Chander Dhingra's Blog

Sunday, June 20, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -78

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1 हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे... ( ७८ ) मैं इन्द्राणी के आने की टोह लेने लगा था। हालांकि जानता था कि वह स्कूल की ड्यूटी समाप्त कर शाम को ही आ पायेगी। मैं पिंकी के पास बैठा हुआ था। मैंने उसकी ओर ऐसे देखा कि मानों पूछना चाहता था कि अब वह कैसा महसूस कर रही थी ? उसने मुझे देख कहा, ' आप बहुत चिंतित दिख रहे हो...मैं बिलकुल ठीक हूँ...मुझे अपने काम पर जुट जाने दो तो समझ ही न पाओगे कि मैं कल तक हॉस्पिटल में थी...' वह हंस रही थी। मैंने कहा, ' अपने काम को तुम भूल नहीं पा रही हो... इतना सब कर के क्या पाओगी...हाई सैलेरी ? उसने कहा, ' सैलेरी मुझे कभी भी आकर्षित नहीं कर पायी है...धन जो दे सकता है, उसके लिए मेरे पापा और मेरे मामाजी हैं न...उन्होंने कभी भी मेरी इच्छाओं को दबने नहीं दिया है...और नानक बाबा की ऐसी कृपा है कि मेरी इच्छायें कभी भी ऊँची उड़ानों की मोहताज़ नहीं रही हैं...हाँ, एक सुख है जो अपने काम में सफल होने पर मुझे मिलता है...बस यही सुख है जो मुझे अपने काम, अपने दायित्व की ओर खींचता है...' मैंने कहा, ' यह जिसे सुख कह रही हो न, एक लालसा है कि नाम कमाना है, सबको पीछे छोड़ आगे बढ़ जाना है... प्रतिष्ठा और लोकप्रियता ... ऐसा सोचना भी सही नहीं है...देखो, डॉक्टर ने तुम्हें तनाव मुक्त रहने को कहा है...काम में जुट जाओगी तो यहाँ-वहाँ तनाव आएगा ही...तुम आराम करो...बाकि सब मुझ पर छोड़ दो...' वह मुस्कुराने लगी मानों कह रही हो कि तुम मेरा कितना ख्याल रखते हो। अब मैं भी मुस्कुराया और माहौल को सहज करते हुए मैंने कहा, ' आज बुआजी आ रही हैं, तुमसे मिलने...' पिंकी ने इठलाते हुए कहा, ' अच्छा, फिर तो इन्द्राणी दीदी भी आएगी...चलो, उनके लिए बाहर से कुछ खास मंगवाते हैं...बुआजी को क्या पसंद है ? मैंने कहा, ' तुम चिंता न करो...मैं सब कर लूंगा, तुम केवल स्ट्रेस फ्री रहने की कोशिश करो...' वह हूँ...कह कर बैठ गयी फिर बच्चों की तरह जिद्द करने लगी कि बताओ, बुआजी को क्या क्या पसंद है ? मैंने कहा, ' वह तो सब कुछ पसंद करती हैं, हाँ, उन्हें एक खास दुकान की गुड़ की मिठाई बहुत पसंद है, वह मैं ले आऊंगा और इन्द्राणी तो फिश फ्राई की शौकीन है...बस हो जायेगा...' उसने कहा, ' ठीक है परन्तु कुछ पेस्ट्रीज और किसी अच्छी दुकान से गुजराती ढोकला भी ले आना...थोड़ी वेरायटी होनी चाहिए...' मैंने कुछ न कहा पर मन में सोचा ये ढोकला भी कोई खाने की चीज है ? मैं घर से बाहर निकल आया था। एक बार फिर से सोचने लगा था कि न जाने जब इन्द्राणी आएगी तो क्या होगा ? मेरा मस्तिष्क मुझे भरोसा दे रहा था कि सब ठीक रहेगा और वे लोग पिंकी का हालचाल पूछ चले जायेंगे। सब सामान्य हो जायेगा और ये जो मेरे मन की भटकन है, वह भी समय के साथ स्थिर होती चली जाएगी। शाम को पिशी और इन्द्राणी समय से आ गए थे। यहाँ-वहाँ की बातें चल रही थी इन्द्राणी अपने सामान्य स्वरुप में थी। वह एक कमरे से दूसरे कमरे में चहलकदमी कर रही थी। मैं उसके सामने आने से कतरा रहा था। वह पिंकी से औपचारिक बात कर दूसरी ओर निकल गयी थी। पिशी काफी समय तक पिंकी के पास बैठी रही थी। जब बिशाखा चाय लेकर आयी तो उसने सभी को वहां बुला लिया था। पिंकी माँ के बड़े पलंग पर ही आराम कर रही थी। माँ ने कहा कि सभी यहीं बैठकर चाय पीते हैं। माँ और पिशी पिंकी के दायें-बायें बैठी थी। इन्द्राणी पलंग के दूसरे छोर पर बैठ गयी थी। मैं और मेरे बाबा कोने में रखी दो कुर्सियों पर बैठे थे। मेरे भीतर बैठे भय और शंका को ऐसा लगा मानों कोई खेल होने जा रहा था और बिसात बिछी गयी थी। खिलाड़ी तो दो ही थे। मैंने इन्द्राणी की ओर देखा। वह खिलखिला रही थी। वह अपने सामान्य स्वरुप में थी। पिंकी भी प्रसन्न थी। उसके हाथ में मोबाइल था। शायद उसे किसी के कॉल की प्रतीक्षा थी या मैं ही ऐसा सोच रहा था और चाहता था कि माहौल किसी अन्य विषय की ओर चला जाये। मुझे लगा कि यदि पिंकी के मामाजी का फोन आ जाये तो वह अपने जोक्स और हल्की बातों में सभी को बहा ले जायेंगे। पिशी ने कहा, ' हमारा अभिजीत तो अपनी पत्नी के लिए सब कुछ भूल गया है... लगता है यही बीमार था...' माँ ने हाँ मिलाते हुए कहा, ' यह बात तो सही है...ये बात अच्छी भी है...पत्नी की फ़िक्र तो हर पति को करनी ही चाहिए...मैं तो इसे प्रोत्साहित करती रहती हूँ...नर्सिंग होम में रात के लिए हम लोगों ने एक अलग नर्स की व्यवस्था कर दी थी परन्तु इसे मैं रात में वहीं रहने के लिए भेज देती थी...तीन रात इसने वहाँ की बेंच पर काटी हैं...' पिशी ने चौंकते हुए कहा, ' पर हमारी बहू माँ भी तो अपने पति का ख्याल रखती है...वह कहाँ उसे बेंच पर सोने देती...वह इसे घर जाकर आराम से सोने को भेज देती थी...' अब माँ के चौंकने की बारी थी। उन्होंने मुझे देखते हुए कहा, ' अरे, तुम तो घर आते न थे तो कहाँ चले जाते थे ? मैंने कुछ न कहा परन्तु पिशी ने कहा, ' जायेगा कहाँ ? सोने के लिए मेरे घर आ जाता था...' माँ हैरान थी, ' ये क्या बात हुई ? मुझे तो पता ही नहीं...' पिंकी ने भी मेरी और देखा। वह भी हैरान थी। माँ ने फिर से हैरानी जताते हुए कहा, ' रात के लिए तो यह थर्मस में चाय भी ले जाता था...सुबह जब आता था तो मैं समझती थी कि नर्सिंग होम से आया है और शायद ठीक से नींद नहीं हुई है...अगर नर्सिंग होम में नहीं सोना था तो अपने घर में आ जाना चाहिए था...पिशी का घर तो दूर भी पड़ता है...वहां क्या करते थे...' इन्द्राणी ख़ुद में मंद मंद मुस्कुरा रही थी। अब उसने कहा, ' यहाँ अकेले क्या करता, मनप्रीत तो थी नहीं ? वहां तो मैं थी...' उसकी बात में एक तरह का कटाक्ष था। उसने पिंकी की ओर इस अंदाज़ से देखा मानों कह रही हो, ' तुम गौरी हो, अच्छी कद काठी की हो, सुन्दर और पढ़ी-लिखी हो, कामकाज में स्मार्ट हो...परन्तु जादू तो मेरे पास है...बंगाली जादू का नाम सुना है न, काला जादू ? पिंकी से उसकी आँखे मिली तो दोनों में एक मूक संवाद सा हो गया था। पिंकी ने अब मेरी ओर देखा। उन दोनों के मूक संवाद में अब मैं भी शामिल था। किसी को कुछ कहने की आवश्यकता न रह गयी थी। सामान्य बातें चलती चली जा रही थी। माँ, पिशी न जाने क्या क्या बातें कर रहे थे। हम तीनों खामोश थे। इन्द्राणी का चेहरा किसी विजयी की तरह चुलबुला रहा था। पिंकी अचानक अस्वस्थ सी दिखने लगी थी जैसे डॉक्टर ने किसी गंभीर बीमारी की जानकारी दे दी हो। मैं अपने चेहरे को बिना देखे, पढ़ पा रहा था। एक अपराधी भाव था जो खुद को निर्दोष दिखाने की कोशिश में था या यह दिखाना चाह रहा था कि सब सामान्य था। मैं चाहता था कि पिशी और इन्द्राणी अब प्रस्थान कर जाएं। मैं कमरे से बाहर निकल आया था। मेरे पीछे इन्द्राणी भी आ गयी थी। मैं नहीं चाहता था कि वह मेरे साथ नज़दीकी दिखलाये। पिंकी ने भी उसे मेरे पीछे जाते हुए देखा और कुछ आशंकित सी दिखी। मैं बालकॉनी में जा खड़ा हुआ। इन्द्राणी ने पीछे से आ मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ' क्या हुआ, ऐसे घबराये हुए क्यों हो ? मैंने कहा, ' ऐसी तो कोई बात नहीं है...' उसने कहा, ' मुझे इन बातों का अनुभव है... मैं तुम्हारी मानसिकता समझ पा रही हूँ... कुछ नहीं हुआ है, खुद को सामान्य रखो...' मैंने उसे घूमकर, गुस्से से उसकी ओर देखा और कहा, 'तुम सामान्य व्यवहार क्यों नहीं कर रही, मेरे पीछे आ गयी हो ? इन्द्राणी ने जवाब नहीं दिया और कमरे में लौटकर पिंकी के पास जा बैठी थी। उसके चेहरे पर नाराज़गी थी। उसने बनावटी हँसी दिखाते हुए, पिंकी का हाथ पकड़ लिया और बोली, ' चिंता मत करो मनप्रीत, जीवन में बहुत कुछ होता रहता है पर वह चलता रहता है...तुम तो समझदार लड़की हो...अभिजीत भी समझदार लड़का है...' पिंकी चुपचाप उसकी बात सुनती रही। मैं बालकॉनी एक कोने से दोनों को देख पा रहा था और समझने की कोशिश कर रहा था कि इन्द्राणी की बात का पिंकी पर कैसा प्रभाव होता है। ( आज बस, गुरुवार को आगे, यहीं पर ... )

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