Chander Dhingra's Blog

Wednesday, June 30, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 80 & 81

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra                                                       http://chander1949.blogspot.com/?m=1    हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ...   ( ८०- ८१  ) लवली का अपनी दीदी के प्रति प्यार उमड़ रहा था। वह लगातार उसके पास बैठी हुई थी। अचानक उसने कहा, ' जीजू, उस प्रोडक्शन हाउस की जो हेड हैं, उनका नंबर मिलाइए...' मैंने कहा, 'क्या हुआ...वह तो खुद ही आज पिंकी को देखने आ रही है...उसका फोन आया था...' लवली ने कहा, ' ठीक है, मैं उससे बात करती हूँ...' मैंने कहा, ' उससे कुछ न होगा...पिंकी तो इस काम में बहुत खुश है...कुछ दिनों में अपने कामकाज में लग जाएगी तो सब ठीक हो जायेगा...'  लवली को न जाने क्यों लग रहा था कि पिंकी के मानसिक आघात वाली बात इस टीवी सीरियल के काम से जुड़ी हुई थी। शायद उसने ऐसी कहानियां सुनी हुई थी कि किस तरह से फिल्मों और टीवी सीरियल्स में नए कलाकारों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है।    देवयानी आयी तो  लवली ने उसे दोषी के रूप में गुस्से से देखा था। मुझे उसका व्यवहार उचित न लग रहा था। देवयानी अपनी ओर से पिंकी को प्रेरित कर रही थी। उसने कहा, ' मनप्रीत, तुम तो छा गयी हो कलकत्ता में ...चलो, काम पर आओ, तुम्हारे साथी और तुम्हारे प्रशंसक प्रतीक्षा कर रहे हैं...' लवली ने उसकी बात सुनी तो कड़क के बोली, ' मैडम, आप इसकी हालत देख रही हैं...आप ने इसका ख्याल नहीं रखा है...ये अब काम नहीं करेगी...इसे पूरा विश्राम चाहिए...' देवयानी सुलझी हुई महिला थी। उसने हँसते हुए कहा, ' हां, रेस्ट तो चाहिए, तुम्हारी सिस्टर को...' फिर उसने पिंकी की और देखते हुए कहा, ' क्यों मनप्रीत, हमने तुम्हारा ख्याल नहीं रखा...बोलो और क्या चाहिए ? पिंकी तो गुमसुम सी बैठी थी उसके बदले लवली ने कहा, ' किसी ने तो हर्ट किया है इसे...जब तक यह स्पष्ट नहीं हो जाता...मनप्रीत कहीं नहीं जाएगी...' इस बात पर देवयानी भी कुछ गंभीर हो चली थी। उसने कहा, ' मनप्रीत की हेल्थ की मुझे भी फ़िक्र है... इसे हर्ट कौन करेगा...मनप्रीत तो सबकी चहेती है...परन्तु, यह टीवी सीरीयल का काम है, इसे यूँ ही अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता...हाँ, हम कुछ दिन प्रतीक्षा कर सकते हैं...'  लवली अपने आक्रामक पंजाबी स्वरूप में थी। उसने कहा, ' फिर तो मैडम आपको प्रतीक्षा ही करते रहना होगा...' पिंकी निष्पक्ष सी सब कुछ सुन रही थी। उसकी ओर से कोई प्रतिक्रिया न थी। देवयानी ने अब कुछ न कहा और पिंकी को शुभकामना देते हुए कमरे से बाहर आ गई थी। मैं उसके साथ नीचे कार तक आया था। अब उसने मुझसे बंगाली में कहा, ' मनप्रीत की बहन विषय की गंभीरता को नहीं समझ पा रही है...जवाँ लड़की है, समझ नहीं रही ...इस काम को बीच में अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता...कान के द्रव्य का असंतुलित हो जाना बहुत गंभीर बीमारी नहीं है...अक्सर हो जाता है...आप देखिये और मनप्रीत को और उसकी बहन को समझाइये...' मैंने कहा, ' हां, ये बात तो सही है परन्तु कुछ न्यूरो प्रॉब्लम भी दिखाई दी है   ...' मैं ऊपर आकर लवली को यह बात समझाने की कोशिश करने लगा। मैंने उसे कहा, ' अगर पिंकी ने काम न किया तो देवयानी के प्रोडक्शन हाउस की बहुत क्षति होगी...' लवली ने दो शब्दों में उत्तर दिया, ' होने दो...'  पिंकी सब सुन रही थी परन्तु शांत थी। रात में उसने शायद अपनी बहन से कुछ बात की थी। सुबह लवली ने एक हाथ लिखा पत्र मुझे दिखाया। इस पर पिंकी के हस्ताक्षर थे। मैंने पढ़ा तो हैरान रह गया था। यह धारावाहिक के प्रोडक्शन हाउस के लिए था। इसमें लिखा था कि स्वास्थ्य कारण से वह धारावाहिक में काम न कर पायेगी। लवली ने कहा, ' ठीक है न जीजू...' मैंने कहा, ' अरे, तुम्हारी दीदी कुछ दिनों में ठीक हो जाएगी...हम कुछ दिनों का अवकाश लिख देते हैं... एक दम छोड़ने देने की बात क्यों लिखें ?  हम दोनों पिंकी के पास आये थे। वह गुमसुम सी बैठी थी। एक डर सा था उसके चेहरे पर। वह मुझसे आँखें छिपा रही थी। मैंने कहा, 'ये क्या, तुम यह सीरियल छोड़ देना चाहती हो ? वह लवली की ओर देखती जा रही थी। उसने उत्तर न दिया था। मैंने फिर कहा, ' यह तुम्हारे लिए एक सुअवसर था...आवेश में मत आओ...' वह इन दिनों बोलती न थी किन्तु उसकी ख़ामोशी में ही मैं उसकी बात सुन लेता था। उसने कहा, ' ये आवेश वाली बात तुम कह रहे हो ? मैंने कहा, ' हाँ...अच्छे से सोच-समझ कर निर्णय लो... निर्णय तो तुम्हें ही लेना...यह काम आरम्भ करने से पहले भी मैंने कहा था, सरल न होगा परन्तु तुम उत्साहित थी...मैं तुम पर काम का प्रेशर आ जाने से चिंतित था परन्तु तुम्हें अपने आप पर, अपनी क्षमता पर पूर्ण विश्वास था...देखो, इस प्रेशर के कारण कैसी समस्या हो गयी है...'  पिंकी की ख़ामोशी में ही शब्द थे। उसने कहा, ' आप जानते हो मेरी समस्या किस लिए हुई है और मैं क्यों इस स्थिति में हूँ...' मैंने कहा, ' ठीक है, मैं तुम्हारा ये लेटर भिजवा देता हूँ...तुम्हारी जैसी तबीयत है, उसमें ये काम नहीं हो सकता...हम सब को चिंता है...'  मैं बोलता चला जा रहा था। लवली सुन रही थी किन्तु वह समझ ही न पायी कि पिंकी ने कुछ न बोला था और यह एक तरफ़ा संवाद था। उसने कहा, 'देख पिंकी, तूने निर्णय ले लिया है तो ठीक ही है...अब जो होगा देखा जायेगा...जीजू और यहाँ-वहाँ सभी चिंतित हैं...मैं तुझे ठीक करके चली जाऊँगी... मुझे तो इस आदमी की भी फ़िक्र है...' उसने मेरी ओर देखकर, चंचलता से मुस्कुराते हुए कहा था। मुझे लगा अपनी बहन की इस बात पर पिंकी भी मुस्कुरा देगी और धीरे-धीरे सामान्य हो जाएगी किन्तु मैं भूल सोच रहा था। उसके मन में क्या था ?  मुझे तो सब पता था। मेरा मस्तिष्क था जो खेल रहा था। एक छिपी हुई चतुराई थी जो चालें चल रही थी। सत्य की सौगंध लेकर अपना जीवन याद कर रहा हूँ तो लगता है एक-एक घटना, एक-एक बात मेरे सामने आ मुझे घूर रही है और चेतावनी सी दे रही थी कि अपराध बोध की जंजीरों से मुक्त होना है तो सब कुछ अपने मन-मस्तिष्क से बाहर निकाल देना होगा।   लवली अपनी बहन के साथ उसके कमरे में ही रहती थी। वह उसे आनंदित और उत्साहित करने का प्रयास करती रहती थी। मैं दो बहनों में खुद को नहीं लाना चाहता था इसलिए मैं अलग ही रहता था किन्तु लवली से पूछता रहता था और अपनी चिंता जाहिर करने में भी न चूकता था। मैं ऑफिस न जा रहा था। रोबी दा का एक-दो बार फोन आया था परन्तु वह मुझे अपने कार्य में आ जाने का दबाव न दे पा रहे थे। मैंने मनोवैज्ञानिक और न्यूरो विशषेज्ञों से संपर्क भी किया था। लवली मेरे हर प्रयास में साथ थी और संतुष्ट थी कि मैं उसकी बहन के लिए सब कुछ कर रहा था। चेन्नई के एक विशेषज्ञ से भी संपर्क किया था। पिंकी की दशा में सुधार न दिख रहा था। एक चिंता की काली छाया मुझ पर भी आ रही थी। लवली हर दिन अपने घर पर और अपने मामाजी को समाचार देती थी। उसकी बातों से पता चलता कि उसने निश्चय किया हुआ था कि वह अपनी दीदी को स्वस्थ करके ही चंडीगढ़ लौटेगी। एक दिन मुझे लवली ने कहा कि उसे लगता था कि पिंकी का स्वास्थ्य दिन दिन बिगड़ता जा रहा था। वह बहुत शांत हो गयी थी और खाने में भी उसकी रूचि समाप्त होती जा रही थी। उसने कहा कि हमें चेन्नई के उस डॉक्टर को दिखाना चाहिए, जिसके साथ हमने सम्पर्क किया था। उस दिन लवली बहुत चिंतित थी। उसकी चिंता देख मैं भी डर गया था। उसने मुझे देखा तो कहा, 'आप तो पिंकी से अधिक कमजोर और रोगी जैसे दिख रहे हैं...आप दुर्बल पड़ जायेंगे तो मेरी दीदी को कौन संभालेगा ? मैंने कहा, ' मैं अभी चेन्नई हॉस्पिटल में बात करता हूँ...आज ही निकल चलते हैं...' मेरी बात समाप्त होते ही उसने अपने पापा को फोन कर दिया कि हम लोग पिंकी को लेकर चेन्नई जा रहे थे। कुछ ही समय में दिल्ली से मामाजी का फोन आ गया था। हमारे चेन्नई जाने की खबर चंडीगढ़ से उन तक पहुँच गयी थी। वह बहुत परेशान हो गए थे। उन्होंने कहा कि क्या वह भी चेन्नई पहुंच जाएं ? बहुत मुश्किल से उन्हें रोका गया था। उस दिन मुझे लगा कि सच में वह पिंकी को अपनी बेटी समझते थे और उन्हें मामाजी की जगह छोटे पापाजी कहना चाहिए। मैंने लवली को यह बात बताई तो वह गर्व से मुस्कुरा दी। उसने कहा, ' आपको भी तो मुझे जीजू न कहकर वीर जी कहने का मन करता है...'    उसी शाम की फ्लाइट से हम तीनों चेन्नई चले गए थे। अगली सुबह डॉक्टर का अपॉइंटमेंट था। मामाजी के कई फोन आ चुके थे। हमें चेन्नई में तीन दिन रुकना पड़ा था। अंत नतीजा यही निकला कि जो इलाज और दवाइयां कलकत्ता के विशेषज्ञ ने दी थी वही चलती रहेंगी। पिंकी को हर तरह से सामान्य वातावरण चाहिए होगा, किसी तरह का तनाव नहीं होना चाहिए। हमें बताया गया कि रोगी की इस तरह की अवस्था के बारे में यह नहीं बताया जा सकता कि यह कब तक चलेगा ? परिवार के सभी सदस्यों को सहयोग करना होगा और पिंकी को प्रेरित करते रहना होगा। हम वापिस लौट आये थे, मानों खाली हाथ थे। पिंकी के मम्मी-पापा दोनों बहुत चिंतित थे और कलकत्ता आना चाहते थे। इसी तरह की अवस्था पिंकी के मामाजी और मामीजी की भी थी। इधर लवली भी परेशान थी कि अब क्या करे ? उसने मुझसे बात की तो मुझे भी समझ न आया कि उसे क्या करना चाहिए ? फिर उसने खुद ही सुझाया कि वह अभी के लिए वापस चली जाएगी और कुछ दिनों बाद, आवश्यक हुआ तो फिर से आ जाएगी। मैंने माँ को बताया तो उन्हें भी यह सही लगा। उसकी वापसी की टिकट तीन दिन बाद की हो गयी थी। उसने पिंकी को यह बताया तो उसने कोई प्रतिक्रिया न दी थी। मैंने कहा, 'तुम्हारी बहन जा रही है...तुम भी साथ में जाओगी ? पिंकी बस मेरा मुँह ताकती रह गयी थी। अब मैंने लवली को कहा, ' चलो, कल गुरुद्वारे में पूजा करके आते हैं...नानक बाबा का आशीर्वाद चाहिए...' मेरे मुख से यह बात सुन लवली खुश हो गयी थी किन्तु पिंकी के मुख पर ऐसे भाव थे मानो कह रही हो, ' तुम्हें नानक बाबा का आशीर्वाद नहीं लेना बल्कि एक दिखावा करना है...' उसकी अनकही बात मुझे बरबस सुनाई दे गयी थी। ऐसा ही चल रहा था उन दिनों। पिंकी कुछ कहती न थी परन्तु मैं न जाने क्या क्या सुन लेता था और उत्तर भी दे देता था। अगली सुबह लवली को लेकर गुरूद्वारे गया था। वह चंचल सी लड़की न जाने कैसे गंभीर और पूजा-पाठ वाली लड़की बन गयी थी। वह अत्यंत सौम्य दिख रही थी। मैं स्वयं भी तो अपने भीतर एक परिवर्तन सा देख पा रहा था। चेन्नई से लौट आने के बाद से मुझे लगता कि ईश्वर पिंकी को फिर से सामान्य कर दें। मुझे यह तो लगता कि मुझसे एक अपराध हुआ था किन्तु मेरा मस्तिष्क तर्क देता कि यह कोई जघन्य अपराध न था। एक क्षणिक भूल थी। कभी कभी मैं इन्द्राणी के बारे में भी सोचता था। उसने तो सब कुछ सहजता से लिया था।   गुरूद्वारे में मैं सिर ढक कर प्रवेश कर रहा था तो लवली ने मुझे प्रवेश द्वार की दहलीज़ पर प्रणाम करने को कहा। अचानक मुझे अमृतसर की यात्रा और स्वर्ण मंदिर की याद हो आयी थी। तब मैंने इसे एक ढकोसला समझा था परन्तु आज मुझे यह एक ऐसी परम्परा प्रतीत हुई जिसमें स्वयं को शीर्ष के समक्ष समर्पित कर देने की परम्परा थी। मैं मत्था टेक कर एक और कोने में शांत मुद्रा में बैठ गया था। लवली दूसरी ओर के कोने में बैठी थी। कुछ समय बाद वह उठ खड़ी हुई और मेरे पास आयी थी। उसने मुझे चलने का इशारा किया तो मैंने कहा, ' कुछ देर और बैठो, अच्छा लग रहा है...'  बाहर आने पर गुरुद्वारे के सामने की चाय की दुकान पर दृष्टि गयी और उस दिन की याद बन आयी जब अपनी माँ और पिंकी की मम्मी के साथ आया था। उस दिन इन्द्राणी भी साथ थी। मैंने लवली को यह बात बताई तो वह मुस्कुरा दी। उसने कहा, ' हाँ, मम्मी को कलकत्ता का यह गुरुद्वारा बहुत अच्छा लगा था...चलो, एक-एक कप चाय पी लेते हैं...' हम भीड़भाड़ भरी सड़क पार कर उस चाय की दुकान की ओर बढे ही थे कि अचानक किसी ने आवाज़ दे मुझे पुकारा। सामने इन्द्राणी खड़ी थी। वह मुस्कुरा रही थी। मैंने सोचा क्या संजोग था। अभी कुछ क्षण पहले ही मैं उसे याद कर रहा था। मैंने आश्चर्य से उसे देखा और उसने लवली और मुझे। इन्द्राणी ने हँसते हुए कहा, ' अरे,अपनी साली को कलकत्ता की मशहूर चाय पिलाने लाये हो ? मैं क्या कहता ? लवली उसे पहचान गयी थी और अपनी चंचल शैली में बोली, ' आपने तो नहीं पिलाई तो मेरे जीजा ही पिलायेंगे...' इन्द्राणी हंसने लगी। उसके साथ एक सज्जन खड़े थे। टिप टॉप और महंगा काला चश्मा लगाए हुए। चेहरे पर रोब की छाया, उम्रदार लग रहे थे। इन्द्राणी ने उन्हें इशारा किया तो वह सामने आ गए। इन्द्राणी ने परिचय कराते हुए कहा, ' ये अभिजीत, मेरा कजिन...मेरे मामा का बेटा.. और ये हैं जावेद साहब...' फिर परिचय को आगे बढ़ाते हुए उसने कहा, ' अभिजीत, इनका छोटा बेटा मेरा स्टूडेंट है...' अब लवली का हाथ पकड़ कर उसने परिचय कराते हुए कहा, ' ये इनकी पंजाबी साली है, लवली...असली नाम क्या है मुझे नहीं पता, हाँ, इसकी दीदी का नाम पता है, मनप्रीत... और हाँ लवली, कलकत्ता में जब कभी बिरयानी खाओ और स्वाद में मज़ा आ जाये तो समझ लेना, जावेद साहब के होटल की है...कलकत्ता की बिरयानी पर इनका कब्ज़ा है...' वह हँसती जा रही थी। मैं खामोश था। चाय पीकर हम बाय करते हुए अलग हुए। मैंने देखा, इन्द्राणी जावेद साहब के साथ एक महंगी कार में बैठ रही थी।   रास्ते में लवली ने कहा, ' आपकी इन्द्राणी दीदी बहुत स्मार्ट हैं ?  घर पहुँचते ही वह दौड़ते हुए पिंकी के पास गयी और उसे गुरूद्वारे का प्रसाद दिया। उसने कहा, ' लो, अब तुम ठीक हो जाओगी, मैं और जीजू अरदास करके आये हैं...' इधर-उधर की बात कर उसने कहा, ' पिंकी, वहां जो चाय का स्टाल है, उसकी चाय तो बहुत कड़क है...मज़ा आ गया और वहां इन्द्राणी दीदी भी मिली थी...' मुझे लगा था कि इन्द्राणी का नाम सुनकर पिंकी कुछ प्रतिक्रिया देगी परन्तु वह तो अपने में ही सिमटी हुई थी। लवली ने भी इन्द्राणी को लेकर बात बढ़ाते हुए और मचलते हुए कहा, ' जीजू की कजिन बहुत स्मार्ट है...वह स्वीट नहीं, साल्टी है...क्यों है न ? लवली हँस रही थी किन्तु इस बात पर भी पिंकी निष्पक्ष थी। शायद वह किसी पीड़ा का अनुभव कर रही थी। मैंने उसके पास जाकर कहा, ' क्या बात है, सिर में दर्द तो नहीं हो रहा ? पिंकी ने हल्का सा मेरी ओर देखा था। एक बार फिर से वही हुआ, उसने कुछ न कहा परन्तु मैंने सुना, ' आप जानते हो मुझे कहाँ दर्द हो रहा है ? मैंने तुरंत उत्तर देते हुए कहा, ' मैं डॉक्टर को बुलाता हूँ...लगता है तेज़ हेड-एक  हो रहा है...' मैं फोन के लिए लपका। लवली मेरे पास आ खड़ी हुई थी। उसने भी कुछ बोला नहीं किन्तु मेरे मस्तिष्क ने सुना, ' जीजू, आप से तो पिंकी का हल्का सा कष्ट भी नहीं देखा जाता...मुझे तो आपकी भी चिंता होने लगी है...' मैंने लवली की ओर देखा और कहा, ' याद नहीं चेन्नई के डॉक्टर ने कहा था कि इस रोग में कभी कभी बहुत तेज सिर दर्द होता है और ऐसे में डॉक्टर को खबर देनी चाहिए...और हाँ, वो फाइल निकालना ऐसी हालत के लिए एक इमर्जेन्सी टेबलेट लिखी थी...मैं लेकर आता हूँ...' मैंने डॉक्टर को फोन कर दिया था। उसने भी एक टेबलेट बताई थी। मैं दौड़ता हुआ नीचे गया था। एक केमिस्ट मुख्य सड़क पर कुछ आगे जाने पर ही था। पिंकी को वह टेबलेट दी। शायद उसने मन ही मन कहा, ' मुझे सिर दर्द कहाँ हो रहा है खैर, तुम कहते हो तो मैं यह टेबलेट ले लेती हूँ...' हम दोनों के बीच यह अजीब सा एक तरफ़ा संवाद हो जाता था। मैंने कहा, ' यह आवश्यक है...चेन्नई के डॉक्टर रामचंद्रन ने यही कहा था और हमारे डॉक्टर सेन भी कह रहे हैं... लवली बीच में आ गयी थी। उसने कहा, ' पिंकी, तू अगर जल्दी ठीक न हुई तो जीजू भी बीमार हो जायेंगे...मैं दो-दो मरीजों का न संभाल पाऊँगी...' उसकी बात में चंचलता थी परन्तु पिंकी तो निष्प्राण सी लेटी हुई थी। लवली ने कहा, ' मैं परसों जा रही हूँ...अब तुझे अपना और जीजू का ख्याल रखना होगा...मैं कुछ दिनों बाद आ जाऊँगी...तुझे एकदम फिट हो जाना है... मुझे कलकत्ता घूमना है...इस बार तो तूने बोर कर दिया है...' मैंने कहा, ' नहीं, तेरी दीदी ठीक हो जाएगी और तुझे खूब घुमाएगी...हम लोग पुरी भी घूमने जाएंगे...वहां का बीच तो बहुत सुन्दर है...'   ( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे ...) 

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