Chander Dhingra's Blog
Sunday, June 20, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -77
टू स्टेट्स - एक नई कहानी
( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ..
( ७७ ) अगले दिन पिंकी को नर्सिंग होम से मुक्ति दे दी गयी थी। वह बहुत प्रसन्न थी कि फिर से अपने काम में जुट सकेगी। मुझे डॉक्टर ने कहा था कि यद्यपि बहुत अधिक चिंता की बात तो न लगती थी परन्तु रिपोर्ट्स में न्यूरो समस्या की ओर इशारा था। डॉक्टर ने कहा था कि उसे स्ट्रेस और किसी भी तरह के तनाव से दूर रहना होगा साथ ही तीन माह बाद चेकअप भी करवाना होगा। ये चेकअप नियमित रूप से आगे भी चलेगा। कुछ दवाइयाँ भी दी गयी थी। मैंने माँ और बाबा को यह सब बताया तो वे भी चिंता में आ गए थे। लेकिन पिंकी सामान्य थी। उसने कहा, ' हमारे देश के डॉक्टर्स किसी को भी भयभीत कर देने में खासी महारत रखते हैं...मैं अपने काम में व्यस्त हो जाऊँगी तो सब ठीक जायेगा... अगली रिपोर्ट एकदम नार्मल होगी...' माँ ने उसकी बात में हां मिलायी और कहा, ' सब कुछ ठीक है हमारी बहू माँ में...बेवजह चिन्ता करना ठीक नहीं होता...इस तरह की समस्या तो हम सभी के साथ होती रहती हैं...'
माँ और मैं जब पिंकी को नर्सिंग होम से लेकर आ रहे थे तो उसकी देखभाल करने वाली दो सिस्टर भावुक हो गयी थी। वे और कुछ अन्य स्टाफ पिंकी के पास आ गए थे। लगता है पिंकी ने अपनी जिंदादिली से उन सबका मन जीत लिया था। ये दोनों सिस्टर देश के नार्थ-ईस्ट क्षेत्र की प्रतीत हो रही थी। मैंने अक्सर महसूस किया है कि पर्वतीय क्षेत्रों से आयी ये लड़कियाँ, सेवा भाव से भरपूर होती हैं। इनके योगदान को हम बड़े शहरों वाले पहचान ही नहीं पाते। एक सिस्टर ने सामने आकर स्नेह से पिंकी के हाथ पकड़ लिए। उसने कहा, ' हम लोग तो ऐसा काम करते हैं कि किसी को ‘ फिर आना ‘ नहीं कह सकते परन्तु आपने हमारा दिल जीता है ... पूरी तरह से ठीक हो जाने पर हम बहनों से कभी मिलने आ जाना...' पिंकी भी इस बात पर भावुक हो गयी थी। उसने प्यार से दोनों को गले से लगा लिया और कहा, ' तुम दोनों को तो मैं कभी भी न भूल सकूँगी... मेरी छोटी सिस्टर चंडीगढ़ में है परन्तु यहाँ मुझे उसके बदले तुम दो मिल गयी हो... जरूर मिलने आऊँगी, वैसे भी एक सप्ताह बाद मुझे चेकअप के लिए आना ही है...सब अपना ख्याल रखना...' पिंकी ने एक दिन पहले मुझ से चॉकलेट के कुछ डिब्बे मंगवाये थे, उसने वे सब में बांटे थे । माँ उसके इस अंदाज़ से बहुत प्रभावित थी। मेरी मनस्थिति तो विचलित थी। मैं एक ओर खड़ा था और झुँझला रहा था कि क्यों पिंकी बेकार में स्नेह लुटा, आदर बटोर रही थी। इन नर्सिंग होम वालों ने अपना काम किया था और हमने उसका पैसा दिया था, बस। मैंने कहा, 'अब चलो, देर हो रही है...' मेरी इस बात पर पिंकी हंसने लगी। उसने उन लड़कियों की ओर देखते हुए अंग्रेजी में कहा, ' मेरे से ज्यादा तो मेरे हस्बैंड की तबीयत ख़राब लगती है...ऐसा लगता है मैं नहीं बल्कि ये इलाज करवा कर घर जा रहे हैं...' इस बात पर वे दोनों मुस्कुरा दी थीं।
बिशाखा स्वागत के लिए द्वार पर ही खड़ी थी। शांतु की पत्नी भी वहीं थी। पिंकी ने दोनों को स्नेह से आलिंगन में ले लिया था। बिशाखा उसे सहारा दे कर अंदर ले जाने लगी तो पिंकी ने कहा, ' ऐसी गम्भीर बीमार नहीं हूँ... सब ठीक है...ऐसा करोगी तो सच में बीमार हो जाऊँगी...' वह माँ के बिस्तर पर बैठ गयी और उसने बिशाखा से कहा, ' दीदी, एक कप कड़क चाय पीला दो...वहाँ की चाय तो पूछो मत क्या थी, जो भी थी पर चाय तो न थी...' माँ भी उसके पास ही बैठी थी। वह खुश दिख रही थी कि उनकी बहू सकुशल घर आ गई थी। किन्तु वह दो-तीन बार यह चुकी थी कि मनप्रीत को आराम चाहिए और अभी उसे कम से कम एक सप्ताह छुट्टी लेनी होगी। उन्होंने डॉक्टर की सलाह की बात भी उठायी थी। पिंकी लेकिन बेफिक्र थी जैसे कुछ हुआ ही न हो। मैं चुपचाप था। एक अपराधी का दोष-भाव था जो मुझे सामान्य नहीं होने दे रहा था। पिंकी ने मुझे बुलाया और कहा कि चंडीगढ़ में फोन कर बता दूँ कि सब ठीक है और मैं घर आ चुकी हूँ। उसने मुझे शांत देखा तो कहा, ' अरे मैं बिल्कुल ठीक हूँ, चिंता मत करो...आज बिशाखा से कहकर मनपसंद मछली बनवाते हैं और लंच एन्जॉय करते हैं...' मैंने चंडीगढ़ में फोन किया और पिंकी की मम्मी को सब खबर दी। वह बहुत संतुष्ट थी कि उनकी बेटी कुशल और स्वस्थ थी। उन्होंने बार बार मेरा भी धन्यवाद दिया कि मैंने पिंकी का इतना अच्छे से ख्याल रखा था। वह कह रही थी कि नानक बाबा का आशीर्वाद था कि उनकी बेटी को इतना अच्छा ससुराल और पति मिला था। मैं ख़ामोशी से उनकी बातें सुन रहा था। मैंने अंत में कहा, ' मामाजी को भी सब बता देना...' कुछ ही समय में मामाजी का फोन आ गया था। वह भी संतुष्ट थे परन्तु नाराज़ थे कि मैंने उन्हें फोन क्यों न किया था ? मैंने उनसे अधिक बात न की थी और पिंकी को फोन पकड़ा दिया था। लवली का भी फोन आया था। वह तो चहक रही थी। उसने कहा, ' जीजू, यू आर ग्रेट... मन करता है अभी उड़कर आप से मिलने आ जाऊँ... ' उसके साथ भी मैं सामान्य न हो पा रहा था। मैंने कहा, ' जब तुम्हारा मन करे, आ जाना... तुम्हारी बहन भी खुश हो जाएगी...' मैं सामान्य होने का प्रयास करता रहा था किन्तु हो न पा रहा था। शायद लवली भी फोन पर ही मेरी असुविधा देख पा रही थी। उसने कहा, ' आप तो अभी तक चिंता में लग रहे हो...जीजू, आप पिंकी के लिए इतना सोचते हो...लव यू जीजू... मैं पिंकी से नहीं आप से मिलने आऊँगी...मैं कलकत्ता आने का प्रोग्राम बनाती हूँ...सब से मिलने को तरस रही हूँ...मुझे पूरा कलकत्ता घूमना होगा और ख़ूब खिलाना-पिलाना होगा ...’
वह दिन यूँ ही बीत रहा था। पिंकी बार बार झपकी ले लेती थी। मैं भी यहाँ-वहाँ हो रहा था। इन्द्राणी का फोन आया और उसने बताया कि वह अपनी माँ के साथ कल पिंकी से मिलने आएगी। उसके पिंकी से मिलने की बात पर बेचैनी हुई थी। मैं केवल यही कह पाया था,' ठीक है...' मुझे उसके आने की और पिंकी से मिलने की प्रतीक्षा होने लगी थी। मैं अपने भीतर ही सिमटा जा रहा था। क्या मुझे इन्द्राणी से, उसके यहाँ आने से पहले मिल लेना चाहिए ? क्या मुझे उसे समझाना चाहिए कि वह अभी पिंकी से न मिले ? क्या वह मेरी बात, मेरी मनस्थिति समझ पायेगी ? प्रश्न थे जो मेरे पीछे दौड़ते आ रहे थे। उत्तर तो कहीं न थे। मेरे दिमांग ने मुझे समझाना चाहा कि इन्द्राणी बहुत समझदार थी और परिस्थिति के अनुसार व्यवहार करने में कुशल थी। वह सब संभाल लेगी और कुछ भी अप्रिय न होने देगी।
( आज यहीं तक, गुरुवार को इससे आगे, यहीं पर )
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