Chander Dhingra's Blog

Wednesday, July 7, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 82

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II-चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1    हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  .. ( ८२ ) तीसरे दिन लवली चली गयी थी। उसे जाता देख भी पिंकी ने कुछ न कहा था। लवली की आँखों में आँसू थे। वह मुझसे लिपटकर फूट फूट कर रोने लगी थी। मेरी आंखें भी नम हो आयी थी। उसे एयरपोर्ट पर छोड़ने गया था। वह वहां भी रो रही थी। उसने कहा, ' मैं क्या करूं ? मुझे जाना तो होगा  ...आप दोनों की हालत मुझसे देखी नहीं जाती... पिंकी बीमार है और आप उसकी बीमारी में ऐसे चिंतित कि आपको भी इलाज की आवश्यकता हो...' मुझे उसकी बातें अच्छी लगी थी। मेरा मस्तिष्क न जाने क्या-क्या सोच रहा था। मुझे लगा कि लवली अपने मम्मी-पापा के साथ बातों में मेरी प्रशंसा ही करेगी। लवली कुछ ही घंटो में दिल्ली में अपने मामाजी के घर पर पहुँच गयी थी। उसका फोन आया तो वह वही बातें कर रही थी जो यहाँ से जाते वक्त की थी। उसने मामाजी से मेरी बात करवाई थी। मामाजी मेरी प्रशंसा किये जा रहे थे। उन्होंने एक बार पुनः दोहराया कि किसी भी चीज की आवश्यकता हो तो निसंकोच कहूं। मैंने कहा, ' हाँ, मामाजी...मुझे तो आपका आशीर्वाद चाहिए...' उन्होंने कहा कि ये अच्छा हुआ कि लवली अपनी बड़ी बहन के साथ कुछ समय बिता आयी थी और सेवा कर आयी थी। वह मुझे अब सेवा का महत्व समझाने लग गए थे। उन्होंने मुझे आशीर्वाद देते हुए कहा कि मैं भी अपनी पत्नी की सेवा ही कर रहा था जिसका सुफल मुझे अवश्य ही नानक बाबा देंगे। अब में उनकी बातों से झुंझला रहा था परन्तु मैंने कुछ न कहा केवल मन ही मन सोचा कि ये लोग अपने गुरु के नाम पर ही जीते हैं। मैंने कहा, 'अच्छा मामाजी आपसे फिर बात करूँगा...मुझे पिंकी को दवा देनी है और उस दिन की रिपोर्ट डॉक्टर को बतानी है...' उधर से उत्तर आया, ' बेटा जीते रहो, खूब-खूब कमाओ माँ-बाप की सेवा करो...बाबा नानक का आशीष तुम पर बना रहे...' मैं मन ही मुस्कुरा दिया था, ' लो, आशीर्वाद देते हुए भी खूब धन कमाने की बात आ ही गयी, सरदार जी के दिमाग में...' मैं पिंकी के पास आया तो देखा कि वह सो रही थी। एक दिव्यता सी थी, उसके चेहरे पर। शायद कोई स्वपन था जो उसकी नींद का साथी बना हुआ था। क्या वह मेरा स्वपन देख रही थी ? उस क्षण मुझे खुद पर ही खेद हुआ था। क्या मैंने उसके सपनों का हिस्सा होने का अधिकार खो न दिया था ? मेरा मन था जो कह रहा था कि हाँ ऐसा हुआ है परन्तु दूसरे ही क्षण मेरा मस्तिष्क मुझे भरोसा देने लगता कि ऐसा कुछ नहीं हुआ है। जो हुआ था उसे पिंकी देर-सबेर स्वीकार कर लेगी। मैंने पिंकी को जगाने की कोशिश न की थी। मुझे लगा उसे सोने ही देना चाहिए। डॉक्टर ने भी तो ऐसा ही कहा था कि अच्छी नींद उसके लिए आवश्यक थे। मैं नीचे आ गया था। माँ को बताया कि पिंकी गहरी नींद में थी। माँ ने कहा, ' अच्छी नींद के साथ साथ उसे ठीक से खाना भी चाहिए...कुछ समय बाद उसे जगा देना और खाना खिला देना...' मैं हूँ कह वहीं बैठ गया था। नींद की झपकी मुझे भी आ गयी थी। माँ भी सो रही थी। समय कहां गया, पता ही न चला था। बिशाखा ने आ कर हमें जगाया और कहा, ' आज क्या हुआ है सबको ? क्या किसी को खाना नहीं है ? मैंने परोस दिया है, सब सो रहे है तो मैं क्यों जागती रहूं ? मैंने आँख खोली और समय देखा। रात के ग्यारह बज रहे थे। मैंने कहा, ' लाओ, खाना दो...क्या बनाया है आज ? माँ भी जाग गयी थी। उसने बिशाखा से कहा, ' ऊपर जाकर देखो, बहू माँ उठी है या नहीं ? अगर जाग रही है तो उसे खाना दे आओ...अगर सो रही है तो मत उठाना, मैं कुछ समय बाद खुद उसे खिला कुछ आऊंगी या फिर अब वह सुबह ही खायेगी...' बिशाखा ने आकर बताया कि पिंकी सो रही थी। उसने यह भी कहा, 'लगता है खूब गहरी नींद है...जैसे बहुत समय से सोयी ही ना हो... परन्तु चेहरा क्या चमक रहा है किसी देवी जैसा...मैं तो देखती ही रह गयी...' माँ और मैं दोनों खाने बैठ गए थे। कुछ समय बाद माँ एक प्लेट में खाना लेकर ऊपर गयी, ' खिलाकर आती हूँ...ऐसे खाली पेट सोना ठीक नहीं...' माँ ऊपर गयी और कुछ समय बाद ही उसने चिल्लाकर मुझे पुकारा, ' अभिजीत, तुरंत तुरंत ऊपर आओ...डॉक्टर को फोन करो अभी...' मैं दौड़ता हुआ ऊपर गया था और सोच रहा था कि अब न जाने क्या हो गया था ? मैंने पिंकी के पास जाकर कहा, ' पिंकी, क्या हुआ ? ठीक तो हो न ? उसने कुछ न कहा था बस आंखें खोल कर फिर से बंद कर ली थी। मैंने फिर से उससे बात करने की कोशिश की। मुझे लगा ऐसी भी क्या बात हो गयी थी कि वह कुछ जवाब ही नहीं दे रही ?  माँ को तो जवाब दे ? माँ ने कहा, ' डॉक्टर को फोन करो...डॉक्टर ने कहा था न कि कुछ न हो तो वर्षों तक न हो और होना हो तो कभी भी हो जाये...'  मैंने फोन किया और डॉक्टर को तुरंत आने के लिए कहा। एक दवा इमर्जेन्सी के समय के लिए दी गयी थी, वह टेबलेट किसी तरह माँ और मैंने पिंकी के मुंह में डाली। वह गले से नीचे न उतार सकी थी। डॉक्टर को पहुँचने में विलम्ब हो रहा था। मैंने फिर से फोन घुमाया और पता चला कि वह निकल चुके थे। कुछ समय बाद वह पहुँच गए थे। पिंकी को छू कर उन्होंने कुछ प्रतिक्रिया दी थी जो मैं न समझ सका था। उन्होंने फिर बहुत कुछ चेक किया था। स्टेथोस्कोप से भी चेक किया और माँ की ओर देखा और निराशा भरे स्वर से अंग्रेजी में कहा, ' विलम्ब हो गया है...नहीं रही...' हम सभी स्तब्ध रह गए। कमरे से सन्नाटा था जो अचानक माँ की चीख से टूटा था। माँ फूट फूट कर रोने लगी थी। उसके साथ बिशाखा थी। बाबा को मैंने उस दिन जैसा देखा था, वैसा कभी न देखा था। वह रो रहे थे और माँ और बिशाखा को दिलासा दिला रहे थे। मैं, सभी से अपरिचित सा मौन खड़ा था। मेरे आँसू मानों सूख गए थे। मेरी विचित्र स्थिति थी। मैं कभी न समझ पाया कि मुझे क्या हो गया था। आज उस दिन को याद कर रहा हूँ तो समझ पा रहा हूँ कि कैसे और क्यों पिंकी मौन हो गई थी? बाबा ने कहा, ' बेटा, ससुराल में फोन कर दो...' मेरे मुख से निकला, ' आप करो, मुझसे न होगा...' माँ कुछ संभल चुकी थी। उसने कहा, ' बताना तो होगा  ...लवली तो अभी शायद दिल्ली में ही होगी...बेचारी आज ही तो गयी है...ईश्वर ने यह क्या कर दिया...हमसे क्या भूल हो गयी...' माँ के मुख से निकला भूल शब्द मुझे तीर सा भेद गया था। माँ ने फोन उठाया और चंडीगढ़ का नंबर मिलाया। उधर से कोई उठाता उसे पहले ही वह कहने लगी, ' क्या कहूं ? कैसे शुरू करूँ ? बाबा ने कहा कि उन्हें फोन दे कि वो बात करते हैं, इतने में ही माँ बोल उठी, ' हाँ, बहन जी...लवली पहुँच गयी है ? उधर पिंकी की मम्मी जी थी।  इतनी रात में फोन कॉल ने उन्हें चिंतित किया होगा।  उन्होंने शायद कहा कि दो दिन अपने मामा के घर दिल्ली में रहेगी। माँ ने कहा कि उसे तुरंत कलकत्ता वापस आना होगा। कुछ अनहोनी हो गयी है। माँ इतना ही कह पायी थी और फूट फूट कर रोने लगी थी। वह बोल ही न पा रही थी। अब बाबा ने उनके हाथ से फोन लिया और कहा, ' बहनजी, भगवान हमसे नाराज़ हो गए हैं, हम आपकी बेटी को अपने घर में रख न पाए...हमें क्षमा कर दें और यहाँ आ जाएं...' बाबा भी फूट फूट कर रो रहे थे...दूसरी और भी यही हाल था, शायद इससे भी बुरा। बाबा ने कहा, ' बहन जी, मुझसे बात नहीं हो पा रही है...अभिजीत तो एक सदमे में है, वह तो कुछ बोल ही नहीं पाएगा...आप ही आकर उसे सम्भालिए...प्लीज दिल्ली में भी खबर दे दें...मैं तो उनसे बात न कर पाऊँगा...' यह कह बाबा ने फोन रख दिया था। मैं खामोश तो था परन्तु विचलित न था। मैं सोच रहा था कि वे लोग इसे कैसे लेंगे ? एक डर सा था, मेरे भीतर।  कुछ मिनटों में ही सभी के फोन आने लगे थे। माँ-बाबा ही उत्तर दे रहे थे। लवली ने जिद की तो माँ ने कहा, 'इससे तो तुम बात करो...' मैंने फोन लिया और कहा, ' सॉरी लवली...तुम्हारी दीदी को मैं रोक न पाया, वह चली गई है... तुम उसके साथ होती तो वह न जाती...आई एम सॉरी...' लवली रोती ही जा रही थी...मेरी आंखों में भी आँसू थे। मैंने कहा, ' प्लीज जल्दी आ जाओ...मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा...प्लीज...'  समय बीतता जा रहा था और सब ओर से फोन आ रहे थे। स्पष्ट हो गया था कि संध्या तक दिल्ली और चंडीगढ़ से वे लोग पहुँच जायेंगे। माँ ही सब व्यवस्था कर रही थी। मैं सहानुभूति का पात्र बना, एक ओर को बैठा था।  संध्या की दिल्ली की फ्लाइट्स से पिंकी के मम्मी-पापा, लवली और मामा-मामी एक साथ पहुंचे थे। उनके आते ही माहौल बदल गया था। जहाँ हम सब खामोश बैठे थे वहीं अब जोर जोर से रोने की आवाजें थी। पास-पड़ोस वाले सभी इधर-उधर से झांक रहे थे। ऐसी तांक-झांक पड़ोसियों ने तब की थी जब पिंकी के घर वाले रिश्ता पक्का करने आये थे। पिंकी के मामा के कलकत्ता के बिज़नेस सम्बन्धी भी पहुँच चुके थे। सभी मेरे पास आकर मुझे दिलासा दे रहे थे। लवली मेरे पास आयी तो मुझे समझ न आया कि उससे कैसा व्यवहार करूँ ? वह मुझसे लिपटकर रोये जा रही थी। मैंने धीरे से कहा, ' तुम्हें जाना नहीं चाहिए था...मैं और पिंकी तुम्हारे जाने के बाद अकेले से हो गए थे...' मेरी बात पर, लवली और जोर से रोने लगी थी। माँ ने आकर उसे संभाला था। बिशाखा और शांतु की पत्नी भी एक कोने में खड़ी रो रही थी। इन्द्राणी और पिशी भी आ गयी थी। इन्द्राणी ने मुझे ढाढ़स दिया और कहा, ' कभी सोचा न था कि मनप्रीत हमें यूँ अचानक छोड़कर चली जाएगी...' वह मेरे पास बैठी रही थी। ऐसे समय में जैसा हुआ करता है, अंतिम संस्कार की तैयारियां होने लगी थी। माँ अपने प्रशासनिक अधिकारी वाले रूप में आ चुकी थी। यहाँ फोन, वहाँ फोन। यह निश्चय किया गया कि रात में ही कार्य सम्पन्न कर दिया जायेगा। पिंकी के पापा मेरे पास आये और बोले, ' बेटा, उठो, तुम्हें ही साहस दिखाना है...तुम्हें ही आगे आना है... ' मामाजी भी सामने आ गए और मुझसे लिपटकर फिर से रोने लगे थे। मेरी माँ ने कहा, ' अभिजीत ने तो हर संभव प्रयास किया परन्तु ईश्वर के आगे सभी हार जाते हैं...इसे भी संभालना होगा...यह भी दुर्बल हो जाता है...मनप्रीत में तो इसके प्राण थे...वह तो इसकी शक्ति थी ' हर बात पर पिंकी के पापा और मामा मुझे अपनी बाजूओं में लपेट लेते थे। हमारे परिवार का पुरोहित आ गया था और माँ से विधि-विधान और व्यवस्था की बातें करने लगा था। मैंने माँ को अपने पास बुलाया। पिंकी के मामा स्नेह से मेरा हाथ थामे खड़े थे। मैंने माँ को कहा, ' सब कार्य सिख परम्परा से होगा...इन पंडित जी को कह दो...और गुरूद्वारे में सूचित कर दो...जैसा वह कहेंगे वैसे ही होगा...' मामाजी ने मेरी बात सुनी तो ऊँची आवाज़ में कहा, ' वाहे गुरु...बोले सो निहाल...हे ! रब तू ही सब का मालिक ...' मैं कहानी को पूर्ण विस्तार के साथ याद करता जा रहा हूँ। एक एक क्षण, एक एक बात जैसे मेरे जहन में है और खुद ब खुद सामने आती जाती हैं। अभी-कभी लगता है, अब कुछ याद न करूँ। परन्तु आगे न बढ़ना मेरी सत्यता की सौगंध के साथ अन्याय होगा। मेरा यह कहना कि अंतिम कार्य सिख परंपरा के अनुसार होगा, पिंकी के परिवार पर एक विशिष्ठ प्रभाव छोड़ गया था। मामाजी ने अपने कलकत्ता के मित्रों के साथ विचार विमर्श किया और पूर्ण कार्य को एक भव्यता देने की योजना बनायीं। उन्होंने गुरुद्वारे में विशेष आयोजन और लंगर आयोजित करने का सोचा था। साथ ही उन्होंने मेरी माँ से इस सम्बन्ध में बात की कि वह क्या चाहती थी। माँ ने कहा, 'अंतिम कर्म आज हो जाये और फिर जैसा आप चाहें...' मैंने जब यह सुना तो जोर देते हुए कहा, ' पिंकी सबसे पहले गुरुद्वारे जाएगी...उसके बाद अंतिम कर्म...' सभी को मेरा प्रस्ताव उचित लगा। पिंकी के शव को लेकर सब लोग गुरूद्वारे के लिए निकले। घर के बाहर बहुत भीड़ थी। बंगाली हरि बोल...हरि बोल... के शब्द सुनाई दे रहे थे। मैं अपने बाबा के साथ था। माँ कार्य का नियंत्रण कर रही थी। इन्द्राणी माँ के साथ किसी सहयोगी की तरह जुड़ी हुई थी। गुरूद्वारे पहुँचने पर मुझे एक पगड़ी पहनाई गयी थी और सिख परम्परा के अनुसार अरदास की गई थी। हम बंगालियों के लिए यह सब अपरिचित सा था। वहां लोग जमा हो गए थे। वे बंगाली परिवार के साथ सिख परंपरा को देख हैरान हो रहे थे। कई तरह की बातें हो रही थी। पिंकी का नाम, मनप्रीत कौर राय कुछ लोगों के लिए परिचित सा था। ये वे लोग थे जो नया लोकप्रिय टीवी धारावाहिक देख रहे थे।   मैं स्थानीय सिख समुदाय में सम्मान का पात्र बनता जा रहा था। मेरी ओर सहानुभूति की लहर सी आ रही थी। भीतर मन के गहरे तल पर मुझे एक झूठे गर्व की अनुभूति हो रही थी। आज इस झूठे आभास में मुझे अपनी पराजय दिख रही है। काश ! तब मुझे जागृति हो जाती? रात देर से अंतिम संस्कार कर लौट आये थे। पिंकी के घर वाले किसी परिचित के घर रुके थे परन्तु लवली ने कहा कि वह कहीं न जाएगी और अपनी दीदी के घर पर ही रहेगी। माँ ने उसका हाथ पकड़ा हुआ था। माँ ने उसे अपने साथ जोड़ते हुए कहा, ' हां, लवली मेरी बेटी है...यह कहीं नहीं जाएगी...मेरे पास ही रहेगी...'( आज बस, आगे गुरुवार को यहीं पर  ... )

No comments:

Post a Comment