Chander Dhingra's Blog

Wednesday, July 14, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 83

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1    हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  .. ( ८३ ) उस रात देर में पिंकी के मामा का फोन आया था। हम सभी थके हारे और दुखी मन बैठे हुए थे। माँ ने फोन उठाया था। उन्होंने कहा कि हम सभी को सुबह गुरुद्वारा पहुंचना था। उन्होंने विशेष अरदास का आयोजन करवाया था। इसके बाद उस दिन का लंगर भी उनकी ओर से था। माँ ने मुझे यह बताया तो मैं परेशान सा हो गया था। मैंने कहा कि इस सब की क्या आवश्यकता थी और मैं किसी आयोजन में जाने की मन स्थिति में न था। परन्तु लवली ने मुझे समझाते हुए कहा कि यह आवश्यक कार्यक्रम था और मुझे जाना ही होगा। उसने कहा कि मम्मी-पापा ऐसा ही अनुष्ठान चंडीगढ़ में भी करेंगे और शायद मामाजी दिल्ली में भी। मुझे वहां भी जाना होगा।  सुबह हम गुरुद्वारे पहुंचे तो वहां सब तैयारी हो चुकी थी। मैं हैरान था कि नौ बजे ही सब पहुँच चुके थे। पिंकी के पापा ने मुझे स्नेह और आदर के साथ सामने बिठाया था। यहाँ भी मुझे पगड़ी पहनायी गयी थी। मेरे बाबा को भी पगड़ी और सम्मान दिया गया था। सभी मेरे आसपास बैठे थे। माँ रो रही थी। लवली खुद में सिमटी हुई अपनी दीदी को याद कर रही थी। मैंने उसे अपने पास बुलाया और उससे हल्के स्वर में पूछा, ' यहां क्या क्या होगा ?  लवली ने बताया कि उस रस्म को 'अंतम अरदास ' कहते हैं...साथ ही सहज पाठ भी होगा...उसके बाद लंगर...'  यहाँ जो कुछ हो रहा था वह सामान्य ही लग रहा था। जो मुख्य ग्रंथि थे, उन्होंने पंजाबी भाषा में वक्तव्य दिया था। उन्होंने जो कहा और मुझे जैसा समझ आया कि शरीर आना-जाना है,आत्मा अमर है। ऐसा ही तो हम भी कहते हैं। मुझे लगा हिंदू और सिख धर्म एक समान हैं। एक अन्य वरिष्ठ सिख सामने आये और उन्होंने कुछ घोषणा की थी। मैं समझ न पाया था। लवली ने मुझे बताया कि यह एक घोषणा थी कि मामाजी ने अपनी ओर से पच्चास हज़ार का दान दिया था और उस दिन का लंगर भी उनकी ओर से था।  उसी रात की फ्लाइट से वे लोग दिल्ली लौट गए थे। जाते हुए सभी एक- दूसरे से मिलकर रो रहे थे। लवली तो मेरा साथ न छोड़ रही थी। वह बार-बार मेरे प्रति अपनी चिंता दिखा रही थी। मुझे अब लग रहा था कि मैं एक बार फिर से अकेला हो गया था। मेरे प्रति जिस तरह का स्नेह और सहानुभूति का छिड़काव हो रहा था वास्तव में क्या मैं उसका हक़दार था ? एक नयी सी मानसिकता उभर रही थी जिस में अपने ही प्रति दोष का भाव था। परंतु मेरा  मस्तिष्क अभी भी तर्क दे रहा था कि जो हुआ था वह एक घटना थी और पिंकी का जाना एक स्वाभाविक जीवन की प्रक्रिया थी। उसे एक न्यूरो समस्या थी। डॉक्टर ने कहा ही था कि ऐसे मामलों में वर्षों तक सब सामान्य चलता रह सकता था और कुछ मामलों में कुछ दिनों में ही स्थिति नाजुक हो सकती । पिंकी के मामले में यह दुर्भाग्य था। मृत्यु पर किसी का अधिकार नहीं होता। मेरे मन और मस्तिष्क का द्वन्द हमेशा की तरह चल रहा था। मेरा मस्तिष्क तो किताबी ज्ञान से भरा हुआ था, वह मन पर हावी हो जाता था। एक मौन था जो केवल बाहरी था। मेरे इस बाहरी मौन से ही सभी मेरे प्रति सहानुभूति की वर्षा कर रहे थे।  तीसरे दिन चंडीगढ़ से सूचना आयी थी कि हम तीनों को वहां पहुंचना था। जिस दिन वहां अनुष्ठान रखा गया था उस दिन माँ की एक विशेष बैठक थी। वह नहीं जा सकती थी। मैं और बाबा गए थे। जिस गुरूद्वारे में यह अनुष्ठान किया गया था, वहां मुझे पिंकी भी लेकर गयी थी। यादें थी जो आ आ कर आघात दे रही थी। मन विचलित हो रहा था। मैंने लवली को यह बात बताई तो वह रोने लगी थी। मेरी आँखे भी नम थी। पिंकी की मम्मी ने हम दोनों को देखा तो उनकी आँखे भी छलक आयी थी। पिंकी के पापा उठकर बाहर निकल आये थे और एक कोने में जाकर फूट-फूट कर रोने लगे थे। पिंकी के मामा भी दिल्ली से चंडीगढ़ आये हुए थे। वह अपने में ही थे मानों उनका सब कुछ लुट चुका था। शाम को वे हमें अपने साथ अपनी गाड़ी में दिल्ली ले आये थे। ये चंडीगढ़ से दिल्ली का रास्ता मेरा परिचित बन चुका था। एक-एक मोड़, एक-एक पेड़ मानों मुझसे कह रहा था कि हमारी प्यारी लड़की को लेकर गए थे, उसे कहाँ छोड़ आये ? अकेले क्यों आये हो ?  हमें अगले दिन शाम की फ्लाइट से लौट आना था। सुबह दिल्ली कैंट क्षेत्र के गुरुद्वारा गए थे। यहाँ भी तो मुझे पिंकी लेकर आयी थी। मुझे उस दिन की याद बन आयी थी। मैंने मामाजी को यहाँ मत्था टेकना और कैंट के बाजार के एक छोटे से होटल में खाना खाने की बात बताई तो वे मुरझा से गए और मुझे अपनी बाँहों में लपेट लिया था। उन्होंने कहा, ' हमारी बेटी तो नानक बाबा का भेजा फरिश्ता थी...नानक का मन उसके बिना न लग रहा होगा सो उन्होंने उसे अपने पास बुला लिया, लेकिन हमारा नहीं सोचा कि हम कैसे जियेंगे उसके बिना...' मामाजी ने मेरे हाथ में एक बड़ा सा लिफाफा पकड़ाया और ग्रंथि जी को दे आने को कहा। दान था। ग्रंथि जी ने मुझे इशारे से ऑफिस में जाकर देने को कहा था। मैं वहां गया तो सामने बैठे सरदारजी को देख स्वयं से सत श्री अकाल मुख से निकल आया था। मैं अपने व्यवहार पर हैरान था। उन्होंने लिफाफा खोलकर धन राशि को गिना और मुझ से पूछा, ' किस के नाम से दान है ? मैंने कहा, ' मनप्रीत कौर रॉय... ' उन्होंने रसीद काटकर मुझे पकड़ाई। बाहर आकर मैंने देखा, मामाजी ने यहाँ भी पच्चास हज़ार दिए थे। मेरे मस्तिष्क ने कहा , ' अमीर आदमी हैं... दिए हैं तो क्या हुआ ?  हम जब एयरपोर्ट के लिए निकलने लगे तो मुझे भी एक लिफाफा दिया था। मैंने समझ गया था कि इसमें क्या था। मैं ना-नुकर करता रहा किंतु मामीजी ने जबरदस्ती मेरे बैग में डाल दिया था।  कलकत्ता में अपना घर अब सुनसान सा लग रहा था। माँ बार बार मेरे पास आती थी और मुझे सांत्वना देने लगती थी। मेरे बाबा भी चिंतित दिखने लगे थे। ऑफिस जाने का मन ही न हो रहा था। माँ ने कहा, ' ऑफिस जाना शुरू करोगे तो धीरे धीरे सब सामान्य होता जायेगा...वैसे जब तुम्हारा मन करे तभी जाना...तुम्हारे साथ जो हुआ है वह हम सब के लिए पीड़ादायक है...' मैं कुछ न बोला था और घर से बाहर निकल आया था। कलकत्ता की भीड़ भरी सड़कें और भागते-बौखलाए से लोग, मानों सब किसी समस्या से जूझ रहे हों। महानगरों की यही तो त्रासदी है। सब कुछ है परन्तु एक बेचैनी है लोगों के मन में कि सब कुछ समेट लो, कहीं लुट न जाएं ? अब मेरे दिन थे जो यूँ ही कट रहे थे। इस बीच गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के कुछ लोग घर आये थे। वे माँ से बात कर रहे थे। मुझे लगा कि महिला आयोग सम्बन्धी कुछ समस्या होगी। किन्तु माँ ने मुझे बताया तो पता चला कि एक वार्षिक अनुष्ठान होने जा रहा था जिस में वे हर वर्ष कुछ लोगों को सम्मानित करते थे। इस बार की सूची में मेरा नाम भी था। मैंने कहा कि मैंने तो कुछ विशिष्ट कार्य नहीं किया था तो माँ ने आश्चर्य दिखाते हुए कहा, ' तुमने जिस तरह से बंगाल और पंजाब की सिख संस्कृतियों को जोड़ने का कार्य दिखाया है, वह विशिष्ट ही तो है...अपनी सिख पत्नी के लिए तुमने तो अपनी परम्परा को छोड़ दिया, यह साहस का काम है... ये कार्यक्रम अगले सप्ताह, गुरुनानक देव जी के जन्म दिन के अवसर पर है, हम तीनों वहां जायेंगे... तुम ये बात अपने ससुरजी को बता दो, उन्हें अच्छा लगेगा...' मैंने असहमति जैसा मुंख बनाया किन्तु कुछ देर बाद लवली को फोन कर बता दिया था। वह ख़ुश हो गयी थी। बाद में पिंकी के पापा और दिल्ली में उसके मामा दोनों का फोन आया था। वे लोग मुझे आशीर्वाद दे रहे थे और वाहे गुरु... वाहे गुरु... कह रहे थे।  यह एक भव्य आयोजन था। तीन लोगों  को सम्मानित किया जा रहा था। इनमें दो पूर्व सैनिक थे और एक मैं था। दोनों सैनिकों ने अपने अपने क्षेत्र में अद्वितीय साहस का कार्य किया था। मेरे परिचय में कहा गया कि मैंने अपनी स्वर्गीय पत्नी के लिए गुरु नानक की परम्परा और शिक्षा का सम्मान किया था। मुझे वहां उन लोगों के साथ बैठने में असुविधा लग रही थी परन्तु मन में कहीं एक लहर सी उठ आती थी जो मुझे गर्वित महसूस करवा रही थी। माँ ने वहां के एक फोटोग्राफर को बुलाकर सम्मान ग्रहण कर रहे क्षण की अच्छी फोटो ले लेने की बात की थी। मैंने जब उन्हें ऐसा न करने को कहा तो उन्होंने कहा कि ऐसे अवसर तो याद रखे जाते हैं। उन्होंने कहा कि वे ये फोटो चंडीगढ़ और दिल्ली भी भेजेंगी। मैं जानता हूँ कि मौका मिलते ही मेरी माँ अपने राजनैतिक और प्रशासनिक रूप में स्वतः आ जाया करती है।  मेरे ऑफिस से कभी कभी किसी मित्र या अधिकारी का फोन आ जाता था। सभी मुझ से सहानुभूति जताते थे। उनका मानना था कि मेरे ऊपर जैसा संकट आया था उसके लिए मुझे विश्राम, एकांत और विश्वास की आवश्यकता थी। रोबी दा कई बार सांत्वना दे चुके थे। उनका कहना था कि मुझे ऑफिस और अपने कार्य की चिंता न कर, खुद को मजबूत बनाना चाहिए। ऐसी ही बात वे मेरी माँ के साथ भी कर चुके थे कि मुझे फ़िलहाल ऑफिस आने की आवश्यकता न थी। उन्होंने कहा था की जब मैं स्वयं को सामान्य का लूँ तभी ऑफिस आऊं। एक दिन उन्होंने फिर से ऐसी बात कही किन्तु कुछ संकोच के साथ संगठन की एक बैठक के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा कि मैं उस बैठक में आ जाऊँ तो उन्हें अच्छा लगेगा साथ ही मेरे लिए भी वातावरण का बदलाव हो जायेगा। मैंने माँ से यह बात कही तो उन्होंने भी कहा कि मुझे जाना चाहिए और धीरे धीरे सामान्यता की ओर अपने जीवन को लाना चाहिए।  इस बैठक का वैसा ही माहौल था जैसा सा मैं अक्सर देखता रहा था। परन्तु इस बार अधिक लोग थे। बुजुर्गों के साथ साथ यहाँ युवा लोग भी थे। मैं रोबी दा के साथ बैठा हुआ था। उन्हें जब मंच पर बुलाया गया तो वे मेरे कंधे पर हाथ रख, मुझे प्रोत्साहित करते हुए आगे बढ़ गए थे। उन्हें अपने विचार रखने के लिए कहा गया तो उन्होंने हमेशा वाली बातें की कि समाज और देश बहुत संकट से गुजर रहा था। उन्होंने युवा जन को आगे आने का आव्हान किया था। अब उन्होंने मेरे बारे में कहा कि कैसे मैंने चार्टर्ड एकाउंटेंसी की परीक्षा में उच्चता प्राप्त करने के बावजूद खुद को संगठन के कार्य में झोंक दिया था और मैं चाहता तो मुंबई या विदेश की किसी कंपनी में उच्च पद पा सकता था। फिर उन्होंने मेरे वैवाहिक जीवन के बारे में बताते हुए कहा कि मैंने अपने नाना की परम्परा को रखते हुए प्रान्तीयता से ऊपर उठ एक सिख परिवार की कन्या से विवाह किया और जब दुर्भाग्य से मेरी पत्नी गंभीर रोग के कारण से संसार से असमय गुजर गयी तो मैंने अपनी पत्नी के सम्मान और प्यार में खुद को सिख परंपरा को समर्पित कर दिया था। ये एक ऐसी बात थी जिसे मेरा मन स्वीकार न कर पा रहा था। यह एक कहानी थी जो खुदबखुद बनती चली जा रही थी। मेरा मस्तिष्क मुझे प्रेरित कर रहा था कि इसमें कुछ भूल न थी। यह विचार मुझे गर्वित और खुश कर रहा था। मेरे मस्तिष्क की चतुराई मेरे मन के शुद्ध भावों पर भारी थी। बैठक के बाद कुछ लोग आगे आ मेरे साथ हाथ मिलाने लग गए थे। कुछ ने तो मुझसे भविष्य में मिलने की ख्वाइश भी जाहिर की थी। दिन यूँ ही बीते जा रहे थे। मैं समझ न पा रहा था कि मेरा जीवन किस ओर जायेगा ? ऑफिस में सभी मुझे किसी अन्य दृष्टि से देखते थे। वे आगे बढ़ मेरी सहायता करने लग गए थे। रोबी दा हर दिन मेरी कुशलता का पूछते थे। एक दिन उन्होंने कहा कि वे मेरी माँ से मिलेंगे और मेरे भविष्य के बारे में बात करेंगे। उन्होंने जब कहा कि अभी मेरी उम्र ही क्या थी तो मैं समझ गया कि वे मेरे विवाह की सोच रहे थे। मैंने उन्हें ऐसा कुछ भी करने से मना किया तो वे कहने लगे, ' तुम्हारे प्रेम का मैं सम्मान करता हूँ किन्तु जीवन एक कठिन पथ है...तुम युवा हो अभी न समझोगे...यदि तुम्हारी पत्नी का असमय देहांत न हो जाता तो सब कुछ बहुत अच्छा था...तुम्हारी ससुराल में तो सब कुछ तुम्हारा ही था और तुम्हारे मामा ससुर तो मनप्रीत को अपनी लड़की ही मानते थे, उनका सब कुछ भी तो तुम्हारा ही तो था...' मैंने उन्हें कहा, ' दादा, ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं...' किन्तु घर आकर मैं एकांत में बैठा तो रोबी दा की बातें मुझे  कुरेदने लगी थी। मेरे मस्तिष्क ने फिर से वार्तालाप शुरू कर दिया था कि जो कुछ उन्होंने कहा वह गलत तो न था। मैंने भी सोचा कि अब पिंकी न थी तो ससुराल के साथ मेरा रिश्ता क्या रहेगा ? मेरे मस्तिष्क ने कहा, ' जो हो रहा है वह अपनी जगह है और सही है...इसमें तुम कुछ नहीं कर सकते...' फिर मुझे सलाह देते हुए कहा कि मुझे अपनी ओर से पिंकी के पापा और मामा के साथ सम्पर्क बनाये रखना चाहिए। मैंने उसी दिन पहले दिल्ली में मामाजी को और फिर चंडीगढ़ में पापाजी को फोन लगाया था। मेरा स्वर धीमा था और मेरा मस्तिष्क ही मेरा मार्गदर्शक बना हुआ था कि मुझे पीड़ित, दुखी और अकेलेपन से जूझ रहे पति का भाव दिखाना था। अब मैं हर दिन प्रतीक्षा करता था कि उधर से किसी का फोन आएगा। लवली का फोन दो-तीन बार आया था। वह बस हालचाल पूछ लेती थी। मैं उससे अपने अकेलेपन की बातें करता और कहता कि केवल घर से ऑफिस और फिर घर में सिमट कर रह गया था। वह मुझे प्रेरित करने का प्रयास करती थी और कहती समय ही सब सामान्य कर देगा। मैं पूछता कि मम्मी-पापा कैसे हैं तो वह छोटा सा उत्तर देती कि आप समझ सकते हो कि वे कैसे होंगे ?  मेरे बाबा भी इन दिनों ढीले हो गए थे। लगता था कि उन्हें खुद से ज्यादा मेरी चिंता सताने लगी थी। उनकी बातें कुछ इस तरह की होती कि ईश्वर न जाने क्या चाहता था जो इतनी घनी विपदा उसने उनके बेटे को दी थी। जब भी वह ऐसी बात करते मैं उनके सामने से दूसरी ओर निकल जाता था। एक दिन कुछ लोग घर पर आये। वे किसी संस्था से जुड़े थे जो स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों का सम्मान किया करती थी। उन्होंने बताया कि वे बैरकपुर क्षेत्र में शहीद भगतसिंह की प्रतिमा स्थापित करने जा रहे थे और हमें सपरिवार निमंत्रण देने आये थे। माँ तो इस तरह के आयोजनों में जाने को तत्पर रहती थी। उसने मेरे नाना की बातें आरम्भ कर दी थी। साथ ही यह भी मेरे बारे में भी बताया कि मैंने सिख परिवार की लड़की से विवाह किया था और उसके अंतिम संस्कार में खुद को सिख परंपरा का अनुयायी बना दिया था। इस आगंतुक दल में दो सिख सज्जन भी थे। वे बहुत प्रभावित हुए थे और उनके समारोह में मेरे उपस्थित होने पर जोर देने लगे थे। उन्होंने कहा कि वे हमारे आने-जाने के लिए गाड़ी भी भिजवा देंगे। यह कार्यक्रम दो सप्ताह बाद था। इस बीच मेरे बाबा की तबीयत कुछ ख़राब हो गयी थी। ज्वर था जो उतरने का नाम न ले रहा था। माँ भी बहुत चिंतित रहती थी। मैं तो खुद में ही सिमटा रहता था। माँ ने एक बार संकेत देते हुए कहा था कि मेरे बाबा का बिगड़ता स्वास्थ्य मेरे प्रति उनकी चिंता के कारण था। मैं क्या कर सकता था ? मैं तो स्वयं ही दिशा हार चुका हो चुका था। मेरा मन कहता कि मुझसे भूल हुई थी पर मेरे भीतर कोई था जो इस विचार का विरोध करता था। पिशी एक दिन मेरे बाबा से मिलने आयी थी। उन्हें कहीं से अपने भाई की अस्वस्थता का समाचार मिला था। वह मुझ पर नाराज हो रही थी कि उन्हें मैंने खबर क्यों न दी थी। फिर वह मुझसे सांत्वना दर्शाने लगी थी कि मेरे साथ जो हुआ था, वह किसी के साथ न हो। वह कहने लगी कि कैसे ईश्वर ने मेरे सुखी वैवाहिक जीवन को इतने थोड़े समय के लिए ही दिया था। वह बाबा के पास बैठी ऐसी ही बातें कर रही थी। माँ और मैं भी वहीं थे। अचानक उन्होंने कहा कि दुःख के साथ साथ ख़ुशी के क्षण भी आते हैं। हम तीनों उनका मुख देखने लगे थे। पिशी ने बताया कि इन्द्राणी विवाह करने जा रही थी। मैं चौंका। पिशी अब पूरा विवरण देने लगी कि जिसके साथ विवाह होने जा रहा था, वह तलाकशुदा था। वह साल्ट लेक क्षेत्र में बड़े भव्य भवन का मालिक था और उसके पास दो कारें थी। पिशी बार बार इस बात पर आ जाती थी कि वह बहुत अच्छा और धनवान व्यक्ति था। बाबा के पूछने पर पिशी ने कहा कि बहुत नेक व्यक्ति है, मुसलमान है तो क्या हुआ ? अब मैं समझ गया कि इन्द्राणी, जावेद खान नाम के उस व्यक्ति से विवाह करने जा रही थी जिससे उसने गुरूद्वारे वाली चाय की दुकान पर मिलवाया था।  ( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे  ... )

No comments:

Post a Comment