Chander Dhingra's Blog
Wednesday, July 21, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 84
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ..
( ८४ ) जिस दिन शहीद भगतसिंह की मूर्ति के आवरण का कार्यक्रम था, मेरे बाबा ने मुझे समय से मुझे तैयार हो जाने को कहा। मेरा मन तो न था किन्तु मैं पक्की तरह से उन्हें ना भी नहीं कह पा रहा था। वह रविवार का दिन था। मैं अधमना सा तैयार हो रहा था। न जाने क्यों अचानक मैंने वो अलमारी खोली जिसमें पुस्तकें और जरुरी फाइलें रहती थी। पिंकी की यादें तो इस कमरे में सब ओर बिखरी थीं किन्तु यह अलमारी उसकी खास थी क्योंकि जो पुस्तकें और अन्य आवश्यक कागजात वह अपने साथ लायी थी, वे इसी अलमारी में थे। मैं यूँ ही पुस्तकें उलटने-पलटने लगा कि एक पुस्तक पर मेरी नज़र अटक गयी थी। यह वही पुस्तक थी जो उसने गोवा के गुरूद्वारे से खरीदी थी और मुझे देते हुए कहा था कि पढ़ना अवश्य और शेल्फ में सजा कर रख मत देना। किन्तु मैं इसे पढ़ न पाया था। उस समय मुझे लगा था कि सरदारों की इस पुस्तक से मुझे क्या लेना ? परंतु मेरी पत्नी दे रही है तो मुझे मुस्कुराते हुए स्वीकार तो करना होगा वैसे तो ये सिख धर्म के प्रचार की पुस्तक ही होगी। सरसरी तौर देखा तो पाया कि अंग्रेजी भाषा की यह पुस्तक सिख धर्म के इतिहास और दर्शन पर थी। अलमारी में अचानक दिखी उस पुस्तक को देखते हुए गोवा में बिताये दिनों को याद करने लगा। अचानक पुस्तक में रखे एक कागज पर मेरी नज़र गयी। यह एक लेख या पत्र था जो पिंकी ने लिखा था। पढ़ने की उत्सुकता तो हुई थी किन्तु मैंने पत्र को वैसे ही पुस्तक में रहने दिया और पुस्तक को अपने तकिये के नीचे रख दिया था। मैं सोच रहा था कि पिंकी का लिखा प्रेम पत्र होगा जो वो मुझे दे न पायी होगी या संकोच में होगी की दूँ या न दूँ ? मैंने सोचा कि इस पत्र को रात को सोने से पहले पढूंगा।
उस समारोह में हमारा काफी सम्मान किया गया था। समारोह में सिख समुदाय के बहुत लोग अपने परिवार के साथ आये हुए थे। मैंने देखा कि मेरे प्रति उन लोगों की बहुत हमदर्दी सी थी। मुझमें उन्हें अपना ही भाई, बेटा या पुत्र दिख रहा था। कुछ ने तो मुझे अपने घर आने का निमंत्रण भी दिया था। अधिकतर लोग बैरकपुर क्षेत्र के निवासी थे और कुछ कलकत्ता के विभिन्न गुरुद्वारों से आये लोग थे। हम उस समारोह से लौट कर आये तो मैं सीधे अपने कमरे मेरे आ गया था। पिंकी का पत्र पढ़ने की उत्सुकता थी। माँ ने देखा तो कुछ खा लेने को कहा था। मैंने कहा कि कुछ भी खाने का मन न था। माँ यह सुन चिंतित हो गयी थी। मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि मैं ठीक था। परन्तु माँ तो माँ होती है। उन्होंने अपनी पुत्रवधू को खोया था। अब उनको चिंता थी कि कहीं उनका पुत्र भी मानसिक आघात से ग्रसित न हो जाये ? मैंने फिर से उन्हें आश्वस्त किया था और कहा था कि मैं सो जाना चाहता था और वैसे सब ठीक था।
मैं अपने बिस्तर पर आ गिरा था और उस पुस्तक को तकिये के नीचे से निकाला। रोमांच सा महसूस हुआ था। पत्र को हाथ में लेते ही पिंकी के साथ बिताये पल एक एक कर सामने आते गए थे। हम दोनों की एक फोटो थी जो बिस्तर के साथ जुड़ी साइड टेबल पर थी। मैंने टेबल लैंप जलाया और उस फोटो फ्रेम को अपनी ओर किया। प्रेम पत्र पढ़ने का माहौल बन रहा था। सुन्दर फ्रेम में जड़ी इस फोटो में हम दोनों मुस्कुरा रहे थे। मैंने पत्र पढ़ा तो दिल धक से बैठ गया था। मेरे भीतर न जाने क्या होने लग गया था। लगा कि मैं मृत्यु के समीप हूँ। ये न जाने कैसा अनुभव था ? मुझे समझ न आ रहा था कि क्या करूँ ? मैंने उस पत्र को फिर से पढ़ा था। वह रात मेरे लिए बोझ बन गयी थी। अचानक से मैं ऐसा दोषी बन गया था जिसके लिए कोई सफाई न थी और जिसका अपराध सिद्ध हो गया था। न जाने क्या क्या विचार थे जो एक-एक कर ज़हर से भीगे तीर बन मुझे पर आघात कर रहे थे। अचानक से मैं ऊँची दीवारों में घिरा एक बंदी बन गया था। शब्द इतना भयंकर आघात कर सकते हैं, कभी सोचा न था। वह रात उस अपराधी की रात की तरह थी जिसे विदित होता है कि सुबह उसे मृत्यु का आलिंगन करना है। भोर होने को थी, मैंने एक बार फिर से पत्र को छुआ, खोला और बिना पढ़े बंद कर दियाथा। मैं पूरी तरह से टूट चुका था। मेरा मस्तिष्क जो मेरा सहयोगी था, अब मेरे साथ न था। मुझे अकेला घने अंधकार में छोड़, वह किसी लुटेरे सा, लुप्त हो गया था।
इन दिनों माँ, मेरे पास आ-आकर अपनी चिंता जताती थी। मेरी स्थिति अब भिन्न थी। मैं समझ पा रहा था कि अब मेरे बस में यातना और पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ न था। दिन थे जो कैसे गुजर रहे थे, बताया नहीं जा सकता। लवली का फोन आता तो मैं अपनी और से कुछ न कह पाता था। अब तो मेरे पास कहने को कुछ रह ही न गया था। यही स्थिति रोबी दा के फ़ोन के आने पर भी होती थी। वे मुझे प्रोत्साहित करने की चेष्टा करते थे किन्तु मुझे लगता इन्हें क्या पता, वे तो स्वयं दिमागी खिलाड़ी थे और अपनी स्थिति और रुतबा बनाये रखने हेतु जोड़-तोड़ में जुटे रहते थे। माँ-बाबा दोनों बहुत परेशान रहने लगे थे। बाबा ने कहा कि वे वी.आर.एस. ले लेंगे। माँ भी अब कहती कि महिला आयोग वाला काम निरर्थक था। मैं पिंकी के साथ बिताये अंतिम दिनों में उलझा रहता था। उसके बिन बोले शब्दों का, मैं न जाने, अपने मन से क्या समझ लेता था और अपने हिसाब से उत्तर भी दे देता था। वह तो कुछ और ही कह रही थी जो मैं समझ ही न पाया था। पिंकी तो मेरी भूल को अज्ञातवश हो गयी, क्षणिक भूल के रूप में स्वीकार कर रही थी। उसका पत्र मुझ पर, मेरे दिलोदिमाग पर कैसी उलझन बिछाये जा रहा था ? पिंकी के सुलझे विचारों के सामने मेरा पुस्तकी ज्ञान कितना संकीर्ण और तुच्छ हो चुका था?
इन दिनों मैं कुछ भी करता, कहीं भी जाता, कुछ भी पढता क्षण भर में उकता जाता था। सिर को कहीं किसी ठोस सतह पर टकराने का मन करता था। मुझे लगता कहीं से कोई देवशक्ति आये और मुझे पिंकी से एक बार मिलवा दे। अचानक पथ में किसी सरदार जी को देखता तो चुपके से रास्ता बदल लेता था। मुझे लगता कि कहीं वे मुझे पहचान न ले ? एक बार जद्दू बाबू बाजार जाना हुआ था। यह इलाका पंजाबियों के बाहुल्य का इलाका है। उस दिन माँ साथ थी। कोई पंजाबी महिला दिखती तो मैं विचलित हो जाता था। ऐसा लगता कि वह चंडीगढ़ की रहने वाली है और मुझे और मेरी असलियत को जानती है। क्या मैं विक्षिप्त या किसी मानसिक रोग से ग्रसित होता जा रहा था ? उस दिन माँ ने मेरे बदले और भयभीत हुए रूप को देखा तो पूछा, ' ठीक हो न ? मैं तो सरलता से उत्तर देने में भी असमर्थ हो चुका था। कुछ न बोल पाया था। बस यही कहा, ' अच्छा नहीं लग रहा...' माँ ने कहा, ' चलो, घर वापस चलते हैं... ये पंजाबियों का इलाका है, मुझे भी यहाँ के लोगों को देख कर अपनी बहू माँ और उसके घर वाले याद आ रहे हैं...तुम्हारे लिए तो यह जगह अत्यंत कष्ट देय होगी ही...' माँ के मुख पर चिंता और आशंका के भाव स्पष्ट थे।
वे दिन बहुत कष्ट देने वाले थे। मैं दिशा विहीन होता जा रहा था। माँ-बाबा ने एक दिन मुझे अपने पास बिठाकर कहा, ' बेटा, तुम्हीं अब हमें बताओ कि क्या किया जाये, तुम्हारा ये हाल हमसे देखा नहीं जाता ? मैं शांत था। बाबा ने कहा, ' तुम्हें कहीं घूम फिर कर आ जाना चाहिए...माहौल बदलोगे तो मन भी बदलेगा...' इस बात पर मैंने उनकी ओर देखा था। माँ एकदम शून्य सी बैठी थी। उन्हें लगा कि इस सुझाव ने मुझे आकर्षित किया था। उन्होंने कहा, ' हाँ, बेटा, जहाँ तुम्हारा मन करे घूमफिर आओ...' मैंने कहा, ' आप मुझ पर कितना भरोसा करते हैं ? माँ, मेरे मुख से यह सुन उठ गयी थी और कहा, ' बेटा, ये तुम क्या कह रहे हो ? तुम शिक्षित हो...परिवार में सभी के आदर्श रहे हो... प्रत्येक कक्षा में प्रथम रहे हो...अपने विषय के अतिरिक्त क्या-क्या नहीं पढ़ा है तुमने... रविंद्र संगीत और बांग्ला साहित्य पर तुम्हारी अच्छी पकड़ है...तुम्हारी तो कॉलेज के दिनों से वामपंथी पुस्तकों में भी रूचि रही है...तुम्हारा कोई भी निर्णय हमें पूरी तरह से स्वीकार होगा...' वे दोनों शायद यह सोच रहे थे कि मैं अपने पुनःविवाह के बारे में सोच रहा था। बाबा ने कहा, ' तुम्हें तो पंजाब पसंद है...हमें भी पसंद है...जैसा तुम चाहो, जिसे भी चाहो, हमें स्वीकार्य है...' मैंने कहा, ' ऐसा कुछ नहीं है...बस चाहता हूँ कि यदि मैं आपको बिना बताये कुछ करूँ तो चिंता न करना... और कुछ मत सोचना क्यों कि आपने मुझे वचन दिया है कि मेरा निर्णय आपको स्वीकार होगा...' दोनों के मुंह से निकला, ' हाँ, बेटा तुम हमारी ओर से चिंता न करना... हम तो बस चाहते हैं कि तुम प्रसन्न रहो...हमें पता है कि तुम जो कुछ भी करोगे वह सही ही होगा ' मैंने कहा, ' चलो, आप दोनों आराम करो, सब ठीक हो जायेगा...'
मैं निराश-हताश और भटका हुआ सा इंसान था। मेरा मस्तिष्क जो सदैव तर्क शक्ति से मेरा मार्ग-दर्शन किया करता था, अब मुझ से दूर था। एक आग सी थी जिस में मैं लगातार झुलस रहा था। मुझे अपने भीतर छिपे बैठे झूठे इंसान से मुकाबला करना पड़ रहा था। मैं समझ न पा रहा था कि क्या करूँ ? कैसे इस अपराध से छुटकारा पाऊँ ? क्षमा तो किसी दूसरे से मांगी जाती है। मुझे तो खुद से क्षमा चाहिए थी। मैं महीनों यहाँ-वहाँ भटकता रहा था। मैं उन दोनों को चिंता और निराशा दे रहा था जिन्होंने मुझे जन्म दिया था। अपने माता-पिता को हम ईश्वर तुल्य मानते हैं। यहाँ मैं था जो उन्हें ही प्रत्येक क्षण प्रताड़ना दे रहा था। उन्हें लगता था कि मैं पत्नी वियोग से जूझ रहा था। परन्तु मैं तो स्वयं में विवश था। मेरे वश में अब कुछ न था। मैं बंजारा होता जा रहा था। कभी इस जगह, कभी उस जगह। कभी इस नगर, कभी उस शहर। कभी लगता कि सागर मुझे बुला रहा है तो मैं दीघा और पुरी चला गया था। कभी पहाड़ आकर्षित करते लगते तो दार्जीलिंग और शिलांग की ओर बढ़ जाता था। माँ-बाबा सोचते कि शायद यह भ्रमण किसी दिन मुझे स्थिर कर दे। किन्तु सागर के समक्ष होता तो उसकी भव्यता मुझे आतंकित करती और मैं किसी दीवार की ओट में छिप जाता था, जहाँ से सागर न दिखे। इसी तरह पहाड़ों की विशालता मुझ पर व्यंग्य करती दिखती थी। मैं अशांत और भयभीत हो घर लौट आता था। कुछ दिन रुकने के बाद फिर से कहीं दूर निकल जाने को आतुर हो जाता था।
एक अनजान नगर में मुझे कमरे की खिड़की से बाहर के प्राकृतिक दृश्य दिखते थे। सामने एक नदी थी। खिड़की से नदी को देखता तो लगता मानों अपने मन के भीतर बहते प्रवाह को ही देख रहा था। मैं सोच रहा था, नदी का पानी तो किसी बड़ी नदी या समुन्द्र में मिल अपना सर्वस्व लुटा देता है परन्तु मेरे विचार तो सिमटे हैं सिर्फ मेरे अंतर्मन तक। ये अशांत हैं परन्तु बहते नहीं हैं। ये तो एक तूफ़ान सा भर जाते हैं, मेरे भीतर। ये तूफान मेरे अंदर ही अंदर उथल-पुथल मचाता है। बाहर ऐसी शांति है जैसे बरसों से रुका हुआ कोई विशाल पत्थर जो लगता तो है लुढ़कता हुआ परन्तु न जाने किस अज्ञात शक्ति के होते, छोटे से बालू के ढेर पर टिका हुआ है। जूझ रहा हूँ इस तीव्र प्रवाह, इस तूफ़ान से। मालूम नहीं ये खुद से ही जूझना मुझे कहाँ ले जायेगा ? मैं लड़ना चाहता हूँ और पूरी क्षमता से रोकना चाहता हूँ इस तूफ़ान को परन्तु अब जानने लगा हूँ कि मैं अत्यंत दुर्बल हूँ। पिंकी के सत्य ने कितना लाचार और शून्य कर दिया था मुझे। द्वन्द युद्ध को हरा पाना, मेरे बस में नहीं। पिंकी का लिखा पत्र तो मेरी स्मृति में छप चुका था। मैंने एक बार फिर से उसे निकाला और अपने सामने बिछा लिया। अंग्रेजी भाषा में लिखा यह पत्र, पिंकी की बौद्धिक क्षमता के सामने मेरे पुस्तकी ज्ञान को हीन कर देने में समर्थ था। पत्र मेरे सामने था। ऐसा लग रहा था कि पिंकी उस कागज़ से मुस्कुराते हुए झाँक रही थी :
अभिजीत,
मैंने कहीं पढ़ा था कि पति-पत्नी के जीवन में एक दौर ऐसा भी आता है जब वे एक दूसरे से प्रेम-भरी दूरी बना लेते हैं। उन्हें आपसी संवाद के लिए पत्रों और संकेतों पर आश्रित होना पड़ जाता है। मैं समझ न पाती थी कि यह दौर कब और कौन सी परिस्थितियों में होता होगा ? पर मैं सोचती , कितना मदिर होता होगा नाराजगी और प्रेम भरा यह दौर ?
प्रत्येक लड़की अपने जीवन साथी में कुछ खोजती है। न जाने क्यों मुझे कुछ विशेष की चाह कभी न रही और मैंने कभी इस तरह से किसी में कुछ न खोजा। अपनी सहेलियों में देखती थी कि कैसे वे अपने होने वाले साथी में धन, प्रतिष्ठा, परिवार और कद काठी की आशा किया करती थीं। मुझे ख़ुद पर आश्चर्य होता था कि मैं क्यों उन सब लड़कियों से भिन्न थी ? मेरी कल्पना तो उन पक्षियों के समान थी जो जोड़े बन इधर-उधर उड़ा करते हैं। झुंड में होते हुए भी वे अपने -अपने साथी के साथ ही होते हैं। मुझे तो दाना चुगते हुए परिंदों में झुण्ड नहीं बल्कि एक साथ घूमते कई जोड़े दिख जाते रहे हैं जो अनजाने ही दूर से झुण्ड जैसा दिखने का भ्रम पैदा करते हैं।
आप मेरे जीवन में आए तो मुझे अपने भीतर की खामोश चिड़िया दिखाई देने लगी जो अब चहकना चाहती थी। अचानक लगा कि अब पूरा आकाश मेरा है। मैं पंजाब के धन दौलत और आडंबरों भरे समाज में एक तरह की घुटन महसूस किया करती थी। अपने को बंगाली समाज का एक हिस्सा बनते देख में रोमांचित होती रही थी। मैं एक ऐसे परिवार में आ रही थी जिसने देश के लिए बलिदान दिया था। मेरा यह भी मानना था कि पारिवारिक संस्कार, पीढ़ी दर पीढ़ी चलते चले जाते हैं। मुझे लगता था कि मेरे रब नानक मुझ पर अपार कृपा बरसा रहे हैं और मेरे सपने सच हो रहे हैं।
पर अचानक यह क्या हो गया ? मैं फिर से वही चिड़िया बन गयी जो झुंड में तो थी पर अकेली थी। आपके साथ एक रात जो हो गया था, उससे आहत होते हुए भी उसे क्षणिक आवेग में हुई घटना के रूप में स्वीकार करने की क्षमता मुझ में है। मुझे लगता कि आपके चेहरे पर पछताते हुए शिशु का भाव देखूं जो मेरे चेहरे पर अपनी सखा का ' चलो जो हुआ सो हुआ, फिर कभी नहीं करना ऐसी भूल ...' वाला भाव और मुस्कान देखे और हम दोनों हाथ पकड़ आगे बढ़ जाये, मानों कुछ हुआ ही न था ।
मैं देख पा रही हूँ कि आप वह नहीं हो जो अपने साथी को आकाश में ऊँचे उठते देख हर्षित होता हो। मैं अपने साथी में एक हताश व्यक्ति को नहीं देख सकती और वह भी बेवजह की हताशा। मैं किसी की हताशा का कारण भी नहीं बनना चाहती। मेरे लिए यह असमंजस की स्थिति है। मैं तो चाहती हूँ आप अपनी सम्भावनों को पहचानो और ख़ूब ऊपर जाओ, इतना ऊपर की मैं हँसते -मुस्कुराते हुए देखती रहूँ और सोचती रहूँ कि काश, मेरे पंखों में भी इतना बड़ा आकाश छूने का सामर्थ्य होता ? हम दोनों में से किसी की भी सफलता एक की थोड़े ही होती ?
मेरे मस्तिष्क में जो अवरोध और रोग हुआ है, वह सामान्य भी है और असामान्य भी। इस रोग के सम्बन्ध में लोग कुछ भी कहें परंतु मैं जानती हूँ इसमें तीन स्थितियों की संभावना है। शायद कुछ भी गंभीर कभी भी न हो और सब कुछ वर्षों तक या जीवन पर्यन्त सामान्य सा चलता रहे या शायद मैं धीरे धीरे अपनी स्मृति-शक्ति से दूर होती चली जाऊँ और सब कुछ भूल जाऊँ या फिर तीसरी सम्भावना है कि अपने आप में सिमट, आँगन की मुरझाई तुलसी बन जाऊँ और किसी दिन ऐसी गहरी नींद सो जाऊँ कि फिर उठूँ ही नहीं।
सब कुछ चलता रहे और हम दोनों अपरिचित से, मुखौटा पहन बढ़ते रहें, ऐसा जीवन कभी न चाहूँगी। मैंने ख़ुद को स्मृति विहीन रोगी के रूप में देखने की कल्पना भी की है। स्मृतियाँ तो जीवन का आधार होती हैं, स्मृतियाँ ही न रहें तो कैसा जीना ? ये स्थिति भी मेरे लिए नहीं है। मैंने अपने नानक बाबा से इन दोनों स्थितियों के लिए क्षमा माँग ली है। मैं एक विद्रोहिणी या प्रताड़िता का जीवन भी नहीं जी सकती। मैं बहुत सोचती रही हूँ। मैं विरोध करूं ? झगड़े और तर्क-तकरार हों और किसी सामान्य लड़की सा व्यवहार करूँ ? नहीं, मेरे नानक को मेरे लिए यह स्वीकार नहीं है। उन्होंने मुझे एक पथ दिखाया है। मुझे शांत हो जाना है। यह मस्तिष्क का रोग मेरे लिए वरदान बनकर आया है। मेरी ख़ामोशी ही एक शक्ति बन उभरेगी और आपको पुस्तकी ज्ञान से निकाल सत्य ज्ञान की और ले जायेगी। मेरा वार्तालाप चलता रहा है, अपने रब नानक के साथ। मैंने और मेरे बाबा नानक दोनों ने ही मेरे लिए इस पथ का निश्चय किया है। अब आपको सत्य-प्रकाश दिखे, यही प्रार्थना है।
मैं ख़ामोशी में समाती जा रही हूँ। ये ख़ामोशी अंधकारमय नहीं, दिव्य प्रकाश स्वरूप है। एक प्रकाश पुंज है जो मुझे आकर्षित करता जाता है। न क्रोध, न द्वेष, न हताशा-निराशा, न प्रतिस्पर्धा। एक स्वपन है जो मात्र कहने को स्वपन है, वास्तव में वही तो जीवन है। मैं इसके साथ बँधती चली जा रही हूँ। नहीं चाहती यह स्वपन कभी टूटे। बस चाहती हूँ, यह मुझे अपने में समा ले। मैं आपसे नाराज भी नहीं हो सकती। यह अधिकार मैंने उस क्षण खो दिया था जिस क्षण मैंने आपको अपना जीवन साथी स्वीकार करने का निश्चय किया था।
मेरी ख़ामोशी का अंत कभी भी हो सकता है। आज, कल, कुछ माह, वर्ष या कई वर्षों बाद, कभी भी। जब भी होगा, वही मेरे जीवन का अंतिम क्षण भी होगा । इससे पहले कि मैं दुर्बल और असमर्थ हो जाऊँ, ये पत्र लिख लेना चाहती हूँ। इसे आपको दूँगी नहीं, ये पत्र ख़ुद ही आप तक पहुँच जाएगा। किस दिन पहुंचेगा नहीं जानती, तब तक आपको अंधकार, असमंजस और मिथ्या भरी दुर्बलता में रहना होगा। जिस दिन आप इस पत्र को मन की सत्यता के साथ पढ़ेंगे, वह दिन हम दोनों के पुनर्मिलन का दिन होगा। वाहे गुरु ।
- मनप्रीत
उस दिन न जाने क्यों ऐसा लगा कि मुझे नदी के समान खुद को समर्पित कर देना होगा। मुझे स्वीकार कर लेनी होगी हार। मैं मन के प्रवाह रोक नहीं सकता, मैं लड़ भी नहीं सकता। मेरी मुक्ति इसी में है कि मैं खुद बहने लगूँ , प्रवाह के साथ और सिमट जाऊं सत्य के सागर में। मन स्थिर होता दिख रहा है। एक राह सी दिख रही है। मुझे घर-समाज, प्रतिष्ठा और परम्परा जैसे बन्धनों से बेपरवाह हो सत्य को अपने साथ लेना है। केवल सत्य को ही स्वीकार करना है। मुझे सब कुछ बता देना है। असत्य के बोझ तले दबी अपनी कहानी को सत्य के प्रकाश में लाना है। इसी सत्य-पथ में मेरी यंत्रणा का मुक्ति पथ है। मैं किसी को बता नहीं सकता, किसी से बाँट नहीं सकता। मेरे पास केवल एक माध्यम है। मैं स्वयं से बात करूँ और इस वार्तालाप को लिखता चलूँ।
आज अंत है। मैंने सब कुछ बता दिया है। अब मुझे नया जीवन जीना है। परन्तु मैं चाहता हूँ कि मेरी लिखी यह डायरी सब तक पहुंचे। मेरे मित्र, सम्बन्धी, सहकर्मी सब मेरी सत्यता को जाने। चाहे मुझे दुत्कारें और पिंकी का हत्यारा मानें या जो चाहें, सोचें। किसी तरह की सहानुभूति का पात्र तो मैं रहा ही नहीं। मैंने सब लिख छोड़ा है और अपने लिए कुछ ऐसा निश्चित कर लिया है जो वास्तव में अनिश्चय का गहरा सागर है।
मैं जानता हूँ कल रात मैं उस ट्रैन में बैठा होऊँगा जो मुझे उस अंतिम स्टेशन पर छोड़ेगी जहाँ से आगे विशाल हिमालय का पथ आरम्भ हो जाता है। मैं नहीं जानता उस पथ पर कहाँ तक जाऊंगा ? शायद चलता चला ही जाऊँ या शायद कहीं रुक जाऊँ और डेरा बना लूँ ? विवश हो घर लौट आऊं और आत्म प्रताड़ना में जलते हुए, अपने माँ-बाबा को पुत्र वियोग में जीवन समाप्त कर देने के लिए विवश कर दूँ ? सच, कुछ भी नहीं जानता ? पिंकी ने एक बार हिमालय में बसी फूलों की घाटी की बात की थी। वह बचपन में वहां गयी थी और अब फिर से मेरे साथ वहाँ जाना चाहती थी। उसने कहा था कि वहाँ एक सुन्दर गुरुद्वारा है। उसने यह भी बताया था कि यह उनके दशम गुरुजी को समर्पित है। शायद मैं वहाँ रुक जाऊँ और खुद को कारसेवा में अर्पित कर दूँ ? शायद किसी दिन, किसी अपरिचित रूप में मुझे पिंकी के गुरु नानक मिल जायें ? शायद वे मुझे क्षमा कर दें ? शायद मुझे मुक्ति का मार्ग दिख जाये ? शायद ....
( आज कहानी का अंत ...)
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