Chander Dhingra's Blog

Wednesday, July 21, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 84

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1 हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे .. ( ८४ ) जिस दिन शहीद भगतसिंह की मूर्ति के आवरण का कार्यक्रम था, मेरे बाबा ने मुझे समय से मुझे तैयार हो जाने को कहा। मेरा मन तो न था किन्तु मैं पक्की तरह से उन्हें ना भी नहीं कह पा रहा था। वह रविवार का दिन था। मैं अधमना सा तैयार हो रहा था। न जाने क्यों अचानक मैंने वो अलमारी खोली जिसमें पुस्तकें और जरुरी फाइलें रहती थी। पिंकी की यादें तो इस कमरे में सब ओर बिखरी थीं किन्तु यह अलमारी उसकी खास थी क्योंकि जो पुस्तकें और अन्य आवश्यक कागजात वह अपने साथ लायी थी, वे इसी अलमारी में थे। मैं यूँ ही पुस्तकें उलटने-पलटने लगा कि एक पुस्तक पर मेरी नज़र अटक गयी थी। यह वही पुस्तक थी जो उसने गोवा के गुरूद्वारे से खरीदी थी और मुझे देते हुए कहा था कि पढ़ना अवश्य और शेल्फ में सजा कर रख मत देना। किन्तु मैं इसे पढ़ न पाया था। उस समय मुझे लगा था कि सरदारों की इस पुस्तक से मुझे क्या लेना ? परंतु मेरी पत्नी दे रही है तो मुझे मुस्कुराते हुए स्वीकार तो करना होगा वैसे तो ये सिख धर्म के प्रचार की पुस्तक ही होगी। सरसरी तौर देखा तो पाया कि अंग्रेजी भाषा की यह पुस्तक सिख धर्म के इतिहास और दर्शन पर थी। अलमारी में अचानक दिखी उस पुस्तक को देखते हुए गोवा में बिताये दिनों को याद करने लगा। अचानक पुस्तक में रखे एक कागज पर मेरी नज़र गयी। यह एक लेख या पत्र था जो पिंकी ने लिखा था। पढ़ने की उत्सुकता तो हुई थी किन्तु मैंने पत्र को वैसे ही पुस्तक में रहने दिया और पुस्तक को अपने तकिये के नीचे रख दिया था। मैं सोच रहा था कि पिंकी का लिखा प्रेम पत्र होगा जो वो मुझे दे न पायी होगी या संकोच में होगी की दूँ या न दूँ ? मैंने सोचा कि इस पत्र को रात को सोने से पहले पढूंगा। उस समारोह में हमारा काफी सम्मान किया गया था। समारोह में सिख समुदाय के बहुत लोग अपने परिवार के साथ आये हुए थे। मैंने देखा कि मेरे प्रति उन लोगों की बहुत हमदर्दी सी थी। मुझमें उन्हें अपना ही भाई, बेटा या पुत्र दिख रहा था। कुछ ने तो मुझे अपने घर आने का निमंत्रण भी दिया था। अधिकतर लोग बैरकपुर क्षेत्र के निवासी थे और कुछ कलकत्ता के विभिन्न गुरुद्वारों से आये लोग थे। हम उस समारोह से लौट कर आये तो मैं सीधे अपने कमरे मेरे आ गया था। पिंकी का पत्र पढ़ने की उत्सुकता थी। माँ ने देखा तो कुछ खा लेने को कहा था। मैंने कहा कि कुछ भी खाने का मन न था। माँ यह सुन चिंतित हो गयी थी। मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि मैं ठीक था। परन्तु माँ तो माँ होती है। उन्होंने अपनी पुत्रवधू को खोया था। अब उनको चिंता थी कि कहीं उनका पुत्र भी मानसिक आघात से ग्रसित न हो जाये ? मैंने फिर से उन्हें आश्वस्त किया था और कहा था कि मैं सो जाना चाहता था और वैसे सब ठीक था। मैं अपने बिस्तर पर आ गिरा था और उस पुस्तक को तकिये के नीचे से निकाला। रोमांच सा महसूस हुआ था। पत्र को हाथ में लेते ही पिंकी के साथ बिताये पल एक एक कर सामने आते गए थे। हम दोनों की एक फोटो थी जो बिस्तर के साथ जुड़ी साइड टेबल पर थी। मैंने टेबल लैंप जलाया और उस फोटो फ्रेम को अपनी ओर किया। प्रेम पत्र पढ़ने का माहौल बन रहा था। सुन्दर फ्रेम में जड़ी इस फोटो में हम दोनों मुस्कुरा रहे थे। मैंने पत्र पढ़ा तो दिल धक से बैठ गया था। मेरे भीतर न जाने क्या होने लग गया था। लगा कि मैं मृत्यु के समीप हूँ। ये न जाने कैसा अनुभव था ? मुझे समझ न आ रहा था कि क्या करूँ ? मैंने उस पत्र को फिर से पढ़ा था। वह रात मेरे लिए बोझ बन गयी थी। अचानक से मैं ऐसा दोषी बन गया था जिसके लिए कोई सफाई न थी और जिसका अपराध सिद्ध हो गया था। न जाने क्या क्या विचार थे जो एक-एक कर ज़हर से भीगे तीर बन मुझे पर आघात कर रहे थे। अचानक से मैं ऊँची दीवारों में घिरा एक बंदी बन गया था। शब्द इतना भयंकर आघात कर सकते हैं, कभी सोचा न था। वह रात उस अपराधी की रात की तरह थी जिसे विदित होता है कि सुबह उसे मृत्यु का आलिंगन करना है। भोर होने को थी, मैंने एक बार फिर से पत्र को छुआ, खोला और बिना पढ़े बंद कर दियाथा। मैं पूरी तरह से टूट चुका था। मेरा मस्तिष्क जो मेरा सहयोगी था, अब मेरे साथ न था। मुझे अकेला घने अंधकार में छोड़, वह किसी लुटेरे सा, लुप्त हो गया था। इन दिनों माँ, मेरे पास आ-आकर अपनी चिंता जताती थी। मेरी स्थिति अब भिन्न थी। मैं समझ पा रहा था कि अब मेरे बस में यातना और पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ न था। दिन थे जो कैसे गुजर रहे थे, बताया नहीं जा सकता। लवली का फोन आता तो मैं अपनी और से कुछ न कह पाता था। अब तो मेरे पास कहने को कुछ रह ही न गया था। यही स्थिति रोबी दा के फ़ोन के आने पर भी होती थी। वे मुझे प्रोत्साहित करने की चेष्टा करते थे किन्तु मुझे लगता इन्हें क्या पता, वे तो स्वयं दिमागी खिलाड़ी थे और अपनी स्थिति और रुतबा बनाये रखने हेतु जोड़-तोड़ में जुटे रहते थे। माँ-बाबा दोनों बहुत परेशान रहने लगे थे। बाबा ने कहा कि वे वी.आर.एस. ले लेंगे। माँ भी अब कहती कि महिला आयोग वाला काम निरर्थक था। मैं पिंकी के साथ बिताये अंतिम दिनों में उलझा रहता था। उसके बिन बोले शब्दों का, मैं न जाने, अपने मन से क्या समझ लेता था और अपने हिसाब से उत्तर भी दे देता था। वह तो कुछ और ही कह रही थी जो मैं समझ ही न पाया था। पिंकी तो मेरी भूल को अज्ञातवश हो गयी, क्षणिक भूल के रूप में स्वीकार कर रही थी। उसका पत्र मुझ पर, मेरे दिलोदिमाग पर कैसी उलझन बिछाये जा रहा था ? पिंकी के सुलझे विचारों के सामने मेरा पुस्तकी ज्ञान कितना संकीर्ण और तुच्छ हो चुका था? इन दिनों मैं कुछ भी करता, कहीं भी जाता, कुछ भी पढता क्षण भर में उकता जाता था। सिर को कहीं किसी ठोस सतह पर टकराने का मन करता था। मुझे लगता कहीं से कोई देवशक्ति आये और मुझे पिंकी से एक बार मिलवा दे। अचानक पथ में किसी सरदार जी को देखता तो चुपके से रास्ता बदल लेता था। मुझे लगता कि कहीं वे मुझे पहचान न ले ? एक बार जद्दू बाबू बाजार जाना हुआ था। यह इलाका पंजाबियों के बाहुल्य का इलाका है। उस दिन माँ साथ थी। कोई पंजाबी महिला दिखती तो मैं विचलित हो जाता था। ऐसा लगता कि वह चंडीगढ़ की रहने वाली है और मुझे और मेरी असलियत को जानती है। क्या मैं विक्षिप्त या किसी मानसिक रोग से ग्रसित होता जा रहा था ? उस दिन माँ ने मेरे बदले और भयभीत हुए रूप को देखा तो पूछा, ' ठीक हो न ? मैं तो सरलता से उत्तर देने में भी असमर्थ हो चुका था। कुछ न बोल पाया था। बस यही कहा, ' अच्छा नहीं लग रहा...' माँ ने कहा, ' चलो, घर वापस चलते हैं... ये पंजाबियों का इलाका है, मुझे भी यहाँ के लोगों को देख कर अपनी बहू माँ और उसके घर वाले याद आ रहे हैं...तुम्हारे लिए तो यह जगह अत्यंत कष्ट देय होगी ही...' माँ के मुख पर चिंता और आशंका के भाव स्पष्ट थे। वे दिन बहुत कष्ट देने वाले थे। मैं दिशा विहीन होता जा रहा था। माँ-बाबा ने एक दिन मुझे अपने पास बिठाकर कहा, ' बेटा, तुम्हीं अब हमें बताओ कि क्या किया जाये, तुम्हारा ये हाल हमसे देखा नहीं जाता ? मैं शांत था। बाबा ने कहा, ' तुम्हें कहीं घूम फिर कर आ जाना चाहिए...माहौल बदलोगे तो मन भी बदलेगा...' इस बात पर मैंने उनकी ओर देखा था। माँ एकदम शून्य सी बैठी थी। उन्हें लगा कि इस सुझाव ने मुझे आकर्षित किया था। उन्होंने कहा, ' हाँ, बेटा, जहाँ तुम्हारा मन करे घूमफिर आओ...' मैंने कहा, ' आप मुझ पर कितना भरोसा करते हैं ? माँ, मेरे मुख से यह सुन उठ गयी थी और कहा, ' बेटा, ये तुम क्या कह रहे हो ? तुम शिक्षित हो...परिवार में सभी के आदर्श रहे हो... प्रत्येक कक्षा में प्रथम रहे हो...अपने विषय के अतिरिक्त क्या-क्या नहीं पढ़ा है तुमने... रविंद्र संगीत और बांग्ला साहित्य पर तुम्हारी अच्छी पकड़ है...तुम्हारी तो कॉलेज के दिनों से वामपंथी पुस्तकों में भी रूचि रही है...तुम्हारा कोई भी निर्णय हमें पूरी तरह से स्वीकार होगा...' वे दोनों शायद यह सोच रहे थे कि मैं अपने पुनःविवाह के बारे में सोच रहा था। बाबा ने कहा, ' तुम्हें तो पंजाब पसंद है...हमें भी पसंद है...जैसा तुम चाहो, जिसे भी चाहो, हमें स्वीकार्य है...' मैंने कहा, ' ऐसा कुछ नहीं है...बस चाहता हूँ कि यदि मैं आपको बिना बताये कुछ करूँ तो चिंता न करना... और कुछ मत सोचना क्यों कि आपने मुझे वचन दिया है कि मेरा निर्णय आपको स्वीकार होगा...' दोनों के मुंह से निकला, ' हाँ, बेटा तुम हमारी ओर से चिंता न करना... हम तो बस चाहते हैं कि तुम प्रसन्न रहो...हमें पता है कि तुम जो कुछ भी करोगे वह सही ही होगा ' मैंने कहा, ' चलो, आप दोनों आराम करो, सब ठीक हो जायेगा...' मैं निराश-हताश और भटका हुआ सा इंसान था। मेरा मस्तिष्क जो सदैव तर्क शक्ति से मेरा मार्ग-दर्शन किया करता था, अब मुझ से दूर था। एक आग सी थी जिस में मैं लगातार झुलस रहा था। मुझे अपने भीतर छिपे बैठे झूठे इंसान से मुकाबला करना पड़ रहा था। मैं समझ न पा रहा था कि क्या करूँ ? कैसे इस अपराध से छुटकारा पाऊँ ? क्षमा तो किसी दूसरे से मांगी जाती है। मुझे तो खुद से क्षमा चाहिए थी। मैं महीनों यहाँ-वहाँ भटकता रहा था। मैं उन दोनों को चिंता और निराशा दे रहा था जिन्होंने मुझे जन्म दिया था। अपने माता-पिता को हम ईश्वर तुल्य मानते हैं। यहाँ मैं था जो उन्हें ही प्रत्येक क्षण प्रताड़ना दे रहा था। उन्हें लगता था कि मैं पत्नी वियोग से जूझ रहा था। परन्तु मैं तो स्वयं में विवश था। मेरे वश में अब कुछ न था। मैं बंजारा होता जा रहा था। कभी इस जगह, कभी उस जगह। कभी इस नगर, कभी उस शहर। कभी लगता कि सागर मुझे बुला रहा है तो मैं दीघा और पुरी चला गया था। कभी पहाड़ आकर्षित करते लगते तो दार्जीलिंग और शिलांग की ओर बढ़ जाता था। माँ-बाबा सोचते कि शायद यह भ्रमण किसी दिन मुझे स्थिर कर दे। किन्तु सागर के समक्ष होता तो उसकी भव्यता मुझे आतंकित करती और मैं किसी दीवार की ओट में छिप जाता था, जहाँ से सागर न दिखे। इसी तरह पहाड़ों की विशालता मुझ पर व्यंग्य करती दिखती थी। मैं अशांत और भयभीत हो घर लौट आता था। कुछ दिन रुकने के बाद फिर से कहीं दूर निकल जाने को आतुर हो जाता था। एक अनजान नगर में मुझे कमरे की खिड़की से बाहर के प्राकृतिक दृश्य दिखते थे। सामने एक नदी थी। खिड़की से नदी को देखता तो लगता मानों अपने मन के भीतर बहते प्रवाह को ही देख रहा था। मैं सोच रहा था, नदी का पानी तो किसी बड़ी नदी या समुन्द्र में मिल अपना सर्वस्व लुटा देता है परन्तु मेरे विचार तो सिमटे हैं सिर्फ मेरे अंतर्मन तक। ये अशांत हैं परन्तु बहते नहीं हैं। ये तो एक तूफ़ान सा भर जाते हैं, मेरे भीतर। ये तूफान मेरे अंदर ही अंदर उथल-पुथल मचाता है। बाहर ऐसी शांति है जैसे बरसों से रुका हुआ कोई विशाल पत्थर जो लगता तो है लुढ़कता हुआ परन्तु न जाने किस अज्ञात शक्ति के होते, छोटे से बालू के ढेर पर टिका हुआ है। जूझ रहा हूँ इस तीव्र प्रवाह, इस तूफ़ान से। मालूम नहीं ये खुद से ही जूझना मुझे कहाँ ले जायेगा ? मैं लड़ना चाहता हूँ और पूरी क्षमता से रोकना चाहता हूँ इस तूफ़ान को परन्तु अब जानने लगा हूँ कि मैं अत्यंत दुर्बल हूँ। पिंकी के सत्य ने कितना लाचार और शून्य कर दिया था मुझे। द्वन्द युद्ध को हरा पाना, मेरे बस में नहीं। पिंकी का लिखा पत्र तो मेरी स्मृति में छप चुका था। मैंने एक बार फिर से उसे निकाला और अपने सामने बिछा लिया। अंग्रेजी भाषा में लिखा यह पत्र, पिंकी की बौद्धिक क्षमता के सामने मेरे पुस्तकी ज्ञान को हीन कर देने में समर्थ था। पत्र मेरे सामने था। ऐसा लग रहा था कि पिंकी उस कागज़ से मुस्कुराते हुए झाँक रही थी : अभिजीत, मैंने कहीं पढ़ा था कि पति-पत्नी के जीवन में एक दौर ऐसा भी आता है जब वे एक दूसरे से प्रेम-भरी दूरी बना लेते हैं। उन्हें आपसी संवाद के लिए पत्रों और संकेतों पर आश्रित होना पड़ जाता है। मैं समझ न पाती थी कि यह दौर कब और कौन सी परिस्थितियों में होता होगा ? पर मैं सोचती , कितना मदिर होता होगा नाराजगी और प्रेम भरा यह दौर ? प्रत्येक लड़की अपने जीवन साथी में कुछ खोजती है। न जाने क्यों मुझे कुछ विशेष की चाह कभी न रही और मैंने कभी इस तरह से किसी में कुछ न खोजा। अपनी सहेलियों में देखती थी कि कैसे वे अपने होने वाले साथी में धन, प्रतिष्ठा, परिवार और कद काठी की आशा किया करती थीं। मुझे ख़ुद पर आश्चर्य होता था कि मैं क्यों उन सब लड़कियों से भिन्न थी ? मेरी कल्पना तो उन पक्षियों के समान थी जो जोड़े बन इधर-उधर उड़ा करते हैं। झुंड में होते हुए भी वे अपने -अपने साथी के साथ ही होते हैं। मुझे तो दाना चुगते हुए परिंदों में झुण्ड नहीं बल्कि एक साथ घूमते कई जोड़े दिख जाते रहे हैं जो अनजाने ही दूर से झुण्ड जैसा दिखने का भ्रम पैदा करते हैं। आप मेरे जीवन में आए तो मुझे अपने भीतर की खामोश चिड़िया दिखाई देने लगी जो अब चहकना चाहती थी। अचानक लगा कि अब पूरा आकाश मेरा है। मैं पंजाब के धन दौलत और आडंबरों भरे समाज में एक तरह की घुटन महसूस किया करती थी। अपने को बंगाली समाज का एक हिस्सा बनते देख में रोमांचित होती रही थी। मैं एक ऐसे परिवार में आ रही थी जिसने देश के लिए बलिदान दिया था। मेरा यह भी मानना था कि पारिवारिक संस्कार, पीढ़ी दर पीढ़ी चलते चले जाते हैं। मुझे लगता था कि मेरे रब नानक मुझ पर अपार कृपा बरसा रहे हैं और मेरे सपने सच हो रहे हैं। पर अचानक यह क्या हो गया ? मैं फिर से वही चिड़िया बन गयी जो झुंड में तो थी पर अकेली थी। आपके साथ एक रात जो हो गया था, उससे आहत होते हुए भी उसे क्षणिक आवेग में हुई घटना के रूप में स्वीकार करने की क्षमता मुझ में है। मुझे लगता कि आपके चेहरे पर पछताते हुए शिशु का भाव देखूं जो मेरे चेहरे पर अपनी सखा का ' चलो जो हुआ सो हुआ, फिर कभी नहीं करना ऐसी भूल ...' वाला भाव और मुस्कान देखे और हम दोनों हाथ पकड़ आगे बढ़ जाये, मानों कुछ हुआ ही न था । मैं देख पा रही हूँ कि आप वह नहीं हो जो अपने साथी को आकाश में ऊँचे उठते देख हर्षित होता हो। मैं अपने साथी में एक हताश व्यक्ति को नहीं देख सकती और वह भी बेवजह की हताशा। मैं किसी की हताशा का कारण भी नहीं बनना चाहती। मेरे लिए यह असमंजस की स्थिति है। मैं तो चाहती हूँ आप अपनी सम्भावनों को पहचानो और ख़ूब ऊपर जाओ, इतना ऊपर की मैं हँसते -मुस्कुराते हुए देखती रहूँ और सोचती रहूँ कि काश, मेरे पंखों में भी इतना बड़ा आकाश छूने का सामर्थ्य होता ? हम दोनों में से किसी की भी सफलता एक की थोड़े ही होती ? मेरे मस्तिष्क में जो अवरोध और रोग हुआ है, वह सामान्य भी है और असामान्य भी। इस रोग के सम्बन्ध में लोग कुछ भी कहें परंतु मैं जानती हूँ इसमें तीन स्थितियों की संभावना है। शायद कुछ भी गंभीर कभी भी न हो और सब कुछ वर्षों तक या जीवन पर्यन्त सामान्य सा चलता रहे या शायद मैं धीरे धीरे अपनी स्मृति-शक्ति से दूर होती चली जाऊँ और सब कुछ भूल जाऊँ या फिर तीसरी सम्भावना है कि अपने आप में सिमट, आँगन की मुरझाई तुलसी बन जाऊँ और किसी दिन ऐसी गहरी नींद सो जाऊँ कि फिर उठूँ ही नहीं। सब कुछ चलता रहे और हम दोनों अपरिचित से, मुखौटा पहन बढ़ते रहें, ऐसा जीवन कभी न चाहूँगी। मैंने ख़ुद को स्मृति विहीन रोगी के रूप में देखने की कल्पना भी की है। स्मृतियाँ तो जीवन का आधार होती हैं, स्मृतियाँ ही न रहें तो कैसा जीना ? ये स्थिति भी मेरे लिए नहीं है। मैंने अपने नानक बाबा से इन दोनों स्थितियों के लिए क्षमा माँग ली है। मैं एक विद्रोहिणी या प्रताड़िता का जीवन भी नहीं जी सकती। मैं बहुत सोचती रही हूँ। मैं विरोध करूं ? झगड़े और तर्क-तकरार हों और किसी सामान्य लड़की सा व्यवहार करूँ ? नहीं, मेरे नानक को मेरे लिए यह स्वीकार नहीं है। उन्होंने मुझे एक पथ दिखाया है। मुझे शांत हो जाना है। यह मस्तिष्क का रोग मेरे लिए वरदान बनकर आया है। मेरी ख़ामोशी ही एक शक्ति बन उभरेगी और आपको पुस्तकी ज्ञान से निकाल सत्य ज्ञान की और ले जायेगी। मेरा वार्तालाप चलता रहा है, अपने रब नानक के साथ। मैंने और मेरे बाबा नानक दोनों ने ही मेरे लिए इस पथ का निश्चय किया है। अब आपको सत्य-प्रकाश दिखे, यही प्रार्थना है। मैं ख़ामोशी में समाती जा रही हूँ। ये ख़ामोशी अंधकारमय नहीं, दिव्य प्रकाश स्वरूप है। एक प्रकाश पुंज है जो मुझे आकर्षित करता जाता है। न क्रोध, न द्वेष, न हताशा-निराशा, न प्रतिस्पर्धा। एक स्वपन है जो मात्र कहने को स्वपन है, वास्तव में वही तो जीवन है। मैं इसके साथ बँधती चली जा रही हूँ। नहीं चाहती यह स्वपन कभी टूटे। बस चाहती हूँ, यह मुझे अपने में समा ले। मैं आपसे नाराज भी नहीं हो सकती। यह अधिकार मैंने उस क्षण खो दिया था जिस क्षण मैंने आपको अपना जीवन साथी स्वीकार करने का निश्चय किया था। मेरी ख़ामोशी का अंत कभी भी हो सकता है। आज, कल, कुछ माह, वर्ष या कई वर्षों बाद, कभी भी। जब भी होगा, वही मेरे जीवन का अंतिम क्षण भी होगा । इससे पहले कि मैं दुर्बल और असमर्थ हो जाऊँ, ये पत्र लिख लेना चाहती हूँ। इसे आपको दूँगी नहीं, ये पत्र ख़ुद ही आप तक पहुँच जाएगा। किस दिन पहुंचेगा नहीं जानती, तब तक आपको अंधकार, असमंजस और मिथ्या भरी दुर्बलता में रहना होगा। जिस दिन आप इस पत्र को मन की सत्यता के साथ पढ़ेंगे, वह दिन हम दोनों के पुनर्मिलन का दिन होगा। वाहे गुरु । - मनप्रीत उस दिन न जाने क्यों ऐसा लगा कि मुझे नदी के समान खुद को समर्पित कर देना होगा। मुझे स्वीकार कर लेनी होगी हार। मैं मन के प्रवाह रोक नहीं सकता, मैं लड़ भी नहीं सकता। मेरी मुक्ति इसी में है कि मैं खुद बहने लगूँ , प्रवाह के साथ और सिमट जाऊं सत्य के सागर में। मन स्थिर होता दिख रहा है। एक राह सी दिख रही है। मुझे घर-समाज, प्रतिष्ठा और परम्परा जैसे बन्धनों से बेपरवाह हो सत्य को अपने साथ लेना है। केवल सत्य को ही स्वीकार करना है। मुझे सब कुछ बता देना है। असत्य के बोझ तले दबी अपनी कहानी को सत्य के प्रकाश में लाना है। इसी सत्य-पथ में मेरी यंत्रणा का मुक्ति पथ है। मैं किसी को बता नहीं सकता, किसी से बाँट नहीं सकता। मेरे पास केवल एक माध्यम है। मैं स्वयं से बात करूँ और इस वार्तालाप को लिखता चलूँ। आज अंत है। मैंने सब कुछ बता दिया है। अब मुझे नया जीवन जीना है। परन्तु मैं चाहता हूँ कि मेरी लिखी यह डायरी सब तक पहुंचे। मेरे मित्र, सम्बन्धी, सहकर्मी सब मेरी सत्यता को जाने। चाहे मुझे दुत्कारें और पिंकी का हत्यारा मानें या जो चाहें, सोचें। किसी तरह की सहानुभूति का पात्र तो मैं रहा ही नहीं। मैंने सब लिख छोड़ा है और अपने लिए कुछ ऐसा निश्चित कर लिया है जो वास्तव में अनिश्चय का गहरा सागर है। मैं जानता हूँ कल रात मैं उस ट्रैन में बैठा होऊँगा जो मुझे उस अंतिम स्टेशन पर छोड़ेगी जहाँ से आगे विशाल हिमालय का पथ आरम्भ हो जाता है। मैं नहीं जानता उस पथ पर कहाँ तक जाऊंगा ? शायद चलता चला ही जाऊँ या शायद कहीं रुक जाऊँ और डेरा बना लूँ ? विवश हो घर लौट आऊं और आत्म प्रताड़ना में जलते हुए, अपने माँ-बाबा को पुत्र वियोग में जीवन समाप्त कर देने के लिए विवश कर दूँ ? सच, कुछ भी नहीं जानता ? पिंकी ने एक बार हिमालय में बसी फूलों की घाटी की बात की थी। वह बचपन में वहां गयी थी और अब फिर से मेरे साथ वहाँ जाना चाहती थी। उसने कहा था कि वहाँ एक सुन्दर गुरुद्वारा है। उसने यह भी बताया था कि यह उनके दशम गुरुजी को समर्पित है। शायद मैं वहाँ रुक जाऊँ और खुद को कारसेवा में अर्पित कर दूँ ? शायद किसी दिन, किसी अपरिचित रूप में मुझे पिंकी के गुरु नानक मिल जायें ? शायद वे मुझे क्षमा कर दें ? शायद मुझे मुक्ति का मार्ग दिख जाये ? शायद .... ( आज कहानी का अंत ...)

Wednesday, July 14, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 83

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1    हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  .. ( ८३ ) उस रात देर में पिंकी के मामा का फोन आया था। हम सभी थके हारे और दुखी मन बैठे हुए थे। माँ ने फोन उठाया था। उन्होंने कहा कि हम सभी को सुबह गुरुद्वारा पहुंचना था। उन्होंने विशेष अरदास का आयोजन करवाया था। इसके बाद उस दिन का लंगर भी उनकी ओर से था। माँ ने मुझे यह बताया तो मैं परेशान सा हो गया था। मैंने कहा कि इस सब की क्या आवश्यकता थी और मैं किसी आयोजन में जाने की मन स्थिति में न था। परन्तु लवली ने मुझे समझाते हुए कहा कि यह आवश्यक कार्यक्रम था और मुझे जाना ही होगा। उसने कहा कि मम्मी-पापा ऐसा ही अनुष्ठान चंडीगढ़ में भी करेंगे और शायद मामाजी दिल्ली में भी। मुझे वहां भी जाना होगा।  सुबह हम गुरुद्वारे पहुंचे तो वहां सब तैयारी हो चुकी थी। मैं हैरान था कि नौ बजे ही सब पहुँच चुके थे। पिंकी के पापा ने मुझे स्नेह और आदर के साथ सामने बिठाया था। यहाँ भी मुझे पगड़ी पहनायी गयी थी। मेरे बाबा को भी पगड़ी और सम्मान दिया गया था। सभी मेरे आसपास बैठे थे। माँ रो रही थी। लवली खुद में सिमटी हुई अपनी दीदी को याद कर रही थी। मैंने उसे अपने पास बुलाया और उससे हल्के स्वर में पूछा, ' यहां क्या क्या होगा ?  लवली ने बताया कि उस रस्म को 'अंतम अरदास ' कहते हैं...साथ ही सहज पाठ भी होगा...उसके बाद लंगर...'  यहाँ जो कुछ हो रहा था वह सामान्य ही लग रहा था। जो मुख्य ग्रंथि थे, उन्होंने पंजाबी भाषा में वक्तव्य दिया था। उन्होंने जो कहा और मुझे जैसा समझ आया कि शरीर आना-जाना है,आत्मा अमर है। ऐसा ही तो हम भी कहते हैं। मुझे लगा हिंदू और सिख धर्म एक समान हैं। एक अन्य वरिष्ठ सिख सामने आये और उन्होंने कुछ घोषणा की थी। मैं समझ न पाया था। लवली ने मुझे बताया कि यह एक घोषणा थी कि मामाजी ने अपनी ओर से पच्चास हज़ार का दान दिया था और उस दिन का लंगर भी उनकी ओर से था।  उसी रात की फ्लाइट से वे लोग दिल्ली लौट गए थे। जाते हुए सभी एक- दूसरे से मिलकर रो रहे थे। लवली तो मेरा साथ न छोड़ रही थी। वह बार-बार मेरे प्रति अपनी चिंता दिखा रही थी। मुझे अब लग रहा था कि मैं एक बार फिर से अकेला हो गया था। मेरे प्रति जिस तरह का स्नेह और सहानुभूति का छिड़काव हो रहा था वास्तव में क्या मैं उसका हक़दार था ? एक नयी सी मानसिकता उभर रही थी जिस में अपने ही प्रति दोष का भाव था। परंतु मेरा  मस्तिष्क अभी भी तर्क दे रहा था कि जो हुआ था वह एक घटना थी और पिंकी का जाना एक स्वाभाविक जीवन की प्रक्रिया थी। उसे एक न्यूरो समस्या थी। डॉक्टर ने कहा ही था कि ऐसे मामलों में वर्षों तक सब सामान्य चलता रह सकता था और कुछ मामलों में कुछ दिनों में ही स्थिति नाजुक हो सकती । पिंकी के मामले में यह दुर्भाग्य था। मृत्यु पर किसी का अधिकार नहीं होता। मेरे मन और मस्तिष्क का द्वन्द हमेशा की तरह चल रहा था। मेरा मस्तिष्क तो किताबी ज्ञान से भरा हुआ था, वह मन पर हावी हो जाता था। एक मौन था जो केवल बाहरी था। मेरे इस बाहरी मौन से ही सभी मेरे प्रति सहानुभूति की वर्षा कर रहे थे।  तीसरे दिन चंडीगढ़ से सूचना आयी थी कि हम तीनों को वहां पहुंचना था। जिस दिन वहां अनुष्ठान रखा गया था उस दिन माँ की एक विशेष बैठक थी। वह नहीं जा सकती थी। मैं और बाबा गए थे। जिस गुरूद्वारे में यह अनुष्ठान किया गया था, वहां मुझे पिंकी भी लेकर गयी थी। यादें थी जो आ आ कर आघात दे रही थी। मन विचलित हो रहा था। मैंने लवली को यह बात बताई तो वह रोने लगी थी। मेरी आँखे भी नम थी। पिंकी की मम्मी ने हम दोनों को देखा तो उनकी आँखे भी छलक आयी थी। पिंकी के पापा उठकर बाहर निकल आये थे और एक कोने में जाकर फूट-फूट कर रोने लगे थे। पिंकी के मामा भी दिल्ली से चंडीगढ़ आये हुए थे। वह अपने में ही थे मानों उनका सब कुछ लुट चुका था। शाम को वे हमें अपने साथ अपनी गाड़ी में दिल्ली ले आये थे। ये चंडीगढ़ से दिल्ली का रास्ता मेरा परिचित बन चुका था। एक-एक मोड़, एक-एक पेड़ मानों मुझसे कह रहा था कि हमारी प्यारी लड़की को लेकर गए थे, उसे कहाँ छोड़ आये ? अकेले क्यों आये हो ?  हमें अगले दिन शाम की फ्लाइट से लौट आना था। सुबह दिल्ली कैंट क्षेत्र के गुरुद्वारा गए थे। यहाँ भी तो मुझे पिंकी लेकर आयी थी। मुझे उस दिन की याद बन आयी थी। मैंने मामाजी को यहाँ मत्था टेकना और कैंट के बाजार के एक छोटे से होटल में खाना खाने की बात बताई तो वे मुरझा से गए और मुझे अपनी बाँहों में लपेट लिया था। उन्होंने कहा, ' हमारी बेटी तो नानक बाबा का भेजा फरिश्ता थी...नानक का मन उसके बिना न लग रहा होगा सो उन्होंने उसे अपने पास बुला लिया, लेकिन हमारा नहीं सोचा कि हम कैसे जियेंगे उसके बिना...' मामाजी ने मेरे हाथ में एक बड़ा सा लिफाफा पकड़ाया और ग्रंथि जी को दे आने को कहा। दान था। ग्रंथि जी ने मुझे इशारे से ऑफिस में जाकर देने को कहा था। मैं वहां गया तो सामने बैठे सरदारजी को देख स्वयं से सत श्री अकाल मुख से निकल आया था। मैं अपने व्यवहार पर हैरान था। उन्होंने लिफाफा खोलकर धन राशि को गिना और मुझ से पूछा, ' किस के नाम से दान है ? मैंने कहा, ' मनप्रीत कौर रॉय... ' उन्होंने रसीद काटकर मुझे पकड़ाई। बाहर आकर मैंने देखा, मामाजी ने यहाँ भी पच्चास हज़ार दिए थे। मेरे मस्तिष्क ने कहा , ' अमीर आदमी हैं... दिए हैं तो क्या हुआ ?  हम जब एयरपोर्ट के लिए निकलने लगे तो मुझे भी एक लिफाफा दिया था। मैंने समझ गया था कि इसमें क्या था। मैं ना-नुकर करता रहा किंतु मामीजी ने जबरदस्ती मेरे बैग में डाल दिया था।  कलकत्ता में अपना घर अब सुनसान सा लग रहा था। माँ बार बार मेरे पास आती थी और मुझे सांत्वना देने लगती थी। मेरे बाबा भी चिंतित दिखने लगे थे। ऑफिस जाने का मन ही न हो रहा था। माँ ने कहा, ' ऑफिस जाना शुरू करोगे तो धीरे धीरे सब सामान्य होता जायेगा...वैसे जब तुम्हारा मन करे तभी जाना...तुम्हारे साथ जो हुआ है वह हम सब के लिए पीड़ादायक है...' मैं कुछ न बोला था और घर से बाहर निकल आया था। कलकत्ता की भीड़ भरी सड़कें और भागते-बौखलाए से लोग, मानों सब किसी समस्या से जूझ रहे हों। महानगरों की यही तो त्रासदी है। सब कुछ है परन्तु एक बेचैनी है लोगों के मन में कि सब कुछ समेट लो, कहीं लुट न जाएं ? अब मेरे दिन थे जो यूँ ही कट रहे थे। इस बीच गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के कुछ लोग घर आये थे। वे माँ से बात कर रहे थे। मुझे लगा कि महिला आयोग सम्बन्धी कुछ समस्या होगी। किन्तु माँ ने मुझे बताया तो पता चला कि एक वार्षिक अनुष्ठान होने जा रहा था जिस में वे हर वर्ष कुछ लोगों को सम्मानित करते थे। इस बार की सूची में मेरा नाम भी था। मैंने कहा कि मैंने तो कुछ विशिष्ट कार्य नहीं किया था तो माँ ने आश्चर्य दिखाते हुए कहा, ' तुमने जिस तरह से बंगाल और पंजाब की सिख संस्कृतियों को जोड़ने का कार्य दिखाया है, वह विशिष्ट ही तो है...अपनी सिख पत्नी के लिए तुमने तो अपनी परम्परा को छोड़ दिया, यह साहस का काम है... ये कार्यक्रम अगले सप्ताह, गुरुनानक देव जी के जन्म दिन के अवसर पर है, हम तीनों वहां जायेंगे... तुम ये बात अपने ससुरजी को बता दो, उन्हें अच्छा लगेगा...' मैंने असहमति जैसा मुंख बनाया किन्तु कुछ देर बाद लवली को फोन कर बता दिया था। वह ख़ुश हो गयी थी। बाद में पिंकी के पापा और दिल्ली में उसके मामा दोनों का फोन आया था। वे लोग मुझे आशीर्वाद दे रहे थे और वाहे गुरु... वाहे गुरु... कह रहे थे।  यह एक भव्य आयोजन था। तीन लोगों  को सम्मानित किया जा रहा था। इनमें दो पूर्व सैनिक थे और एक मैं था। दोनों सैनिकों ने अपने अपने क्षेत्र में अद्वितीय साहस का कार्य किया था। मेरे परिचय में कहा गया कि मैंने अपनी स्वर्गीय पत्नी के लिए गुरु नानक की परम्परा और शिक्षा का सम्मान किया था। मुझे वहां उन लोगों के साथ बैठने में असुविधा लग रही थी परन्तु मन में कहीं एक लहर सी उठ आती थी जो मुझे गर्वित महसूस करवा रही थी। माँ ने वहां के एक फोटोग्राफर को बुलाकर सम्मान ग्रहण कर रहे क्षण की अच्छी फोटो ले लेने की बात की थी। मैंने जब उन्हें ऐसा न करने को कहा तो उन्होंने कहा कि ऐसे अवसर तो याद रखे जाते हैं। उन्होंने कहा कि वे ये फोटो चंडीगढ़ और दिल्ली भी भेजेंगी। मैं जानता हूँ कि मौका मिलते ही मेरी माँ अपने राजनैतिक और प्रशासनिक रूप में स्वतः आ जाया करती है।  मेरे ऑफिस से कभी कभी किसी मित्र या अधिकारी का फोन आ जाता था। सभी मुझ से सहानुभूति जताते थे। उनका मानना था कि मेरे ऊपर जैसा संकट आया था उसके लिए मुझे विश्राम, एकांत और विश्वास की आवश्यकता थी। रोबी दा कई बार सांत्वना दे चुके थे। उनका कहना था कि मुझे ऑफिस और अपने कार्य की चिंता न कर, खुद को मजबूत बनाना चाहिए। ऐसी ही बात वे मेरी माँ के साथ भी कर चुके थे कि मुझे फ़िलहाल ऑफिस आने की आवश्यकता न थी। उन्होंने कहा था की जब मैं स्वयं को सामान्य का लूँ तभी ऑफिस आऊं। एक दिन उन्होंने फिर से ऐसी बात कही किन्तु कुछ संकोच के साथ संगठन की एक बैठक के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा कि मैं उस बैठक में आ जाऊँ तो उन्हें अच्छा लगेगा साथ ही मेरे लिए भी वातावरण का बदलाव हो जायेगा। मैंने माँ से यह बात कही तो उन्होंने भी कहा कि मुझे जाना चाहिए और धीरे धीरे सामान्यता की ओर अपने जीवन को लाना चाहिए।  इस बैठक का वैसा ही माहौल था जैसा सा मैं अक्सर देखता रहा था। परन्तु इस बार अधिक लोग थे। बुजुर्गों के साथ साथ यहाँ युवा लोग भी थे। मैं रोबी दा के साथ बैठा हुआ था। उन्हें जब मंच पर बुलाया गया तो वे मेरे कंधे पर हाथ रख, मुझे प्रोत्साहित करते हुए आगे बढ़ गए थे। उन्हें अपने विचार रखने के लिए कहा गया तो उन्होंने हमेशा वाली बातें की कि समाज और देश बहुत संकट से गुजर रहा था। उन्होंने युवा जन को आगे आने का आव्हान किया था। अब उन्होंने मेरे बारे में कहा कि कैसे मैंने चार्टर्ड एकाउंटेंसी की परीक्षा में उच्चता प्राप्त करने के बावजूद खुद को संगठन के कार्य में झोंक दिया था और मैं चाहता तो मुंबई या विदेश की किसी कंपनी में उच्च पद पा सकता था। फिर उन्होंने मेरे वैवाहिक जीवन के बारे में बताते हुए कहा कि मैंने अपने नाना की परम्परा को रखते हुए प्रान्तीयता से ऊपर उठ एक सिख परिवार की कन्या से विवाह किया और जब दुर्भाग्य से मेरी पत्नी गंभीर रोग के कारण से संसार से असमय गुजर गयी तो मैंने अपनी पत्नी के सम्मान और प्यार में खुद को सिख परंपरा को समर्पित कर दिया था। ये एक ऐसी बात थी जिसे मेरा मन स्वीकार न कर पा रहा था। यह एक कहानी थी जो खुदबखुद बनती चली जा रही थी। मेरा मस्तिष्क मुझे प्रेरित कर रहा था कि इसमें कुछ भूल न थी। यह विचार मुझे गर्वित और खुश कर रहा था। मेरे मस्तिष्क की चतुराई मेरे मन के शुद्ध भावों पर भारी थी। बैठक के बाद कुछ लोग आगे आ मेरे साथ हाथ मिलाने लग गए थे। कुछ ने तो मुझसे भविष्य में मिलने की ख्वाइश भी जाहिर की थी। दिन यूँ ही बीते जा रहे थे। मैं समझ न पा रहा था कि मेरा जीवन किस ओर जायेगा ? ऑफिस में सभी मुझे किसी अन्य दृष्टि से देखते थे। वे आगे बढ़ मेरी सहायता करने लग गए थे। रोबी दा हर दिन मेरी कुशलता का पूछते थे। एक दिन उन्होंने कहा कि वे मेरी माँ से मिलेंगे और मेरे भविष्य के बारे में बात करेंगे। उन्होंने जब कहा कि अभी मेरी उम्र ही क्या थी तो मैं समझ गया कि वे मेरे विवाह की सोच रहे थे। मैंने उन्हें ऐसा कुछ भी करने से मना किया तो वे कहने लगे, ' तुम्हारे प्रेम का मैं सम्मान करता हूँ किन्तु जीवन एक कठिन पथ है...तुम युवा हो अभी न समझोगे...यदि तुम्हारी पत्नी का असमय देहांत न हो जाता तो सब कुछ बहुत अच्छा था...तुम्हारी ससुराल में तो सब कुछ तुम्हारा ही था और तुम्हारे मामा ससुर तो मनप्रीत को अपनी लड़की ही मानते थे, उनका सब कुछ भी तो तुम्हारा ही तो था...' मैंने उन्हें कहा, ' दादा, ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं...' किन्तु घर आकर मैं एकांत में बैठा तो रोबी दा की बातें मुझे  कुरेदने लगी थी। मेरे मस्तिष्क ने फिर से वार्तालाप शुरू कर दिया था कि जो कुछ उन्होंने कहा वह गलत तो न था। मैंने भी सोचा कि अब पिंकी न थी तो ससुराल के साथ मेरा रिश्ता क्या रहेगा ? मेरे मस्तिष्क ने कहा, ' जो हो रहा है वह अपनी जगह है और सही है...इसमें तुम कुछ नहीं कर सकते...' फिर मुझे सलाह देते हुए कहा कि मुझे अपनी ओर से पिंकी के पापा और मामा के साथ सम्पर्क बनाये रखना चाहिए। मैंने उसी दिन पहले दिल्ली में मामाजी को और फिर चंडीगढ़ में पापाजी को फोन लगाया था। मेरा स्वर धीमा था और मेरा मस्तिष्क ही मेरा मार्गदर्शक बना हुआ था कि मुझे पीड़ित, दुखी और अकेलेपन से जूझ रहे पति का भाव दिखाना था। अब मैं हर दिन प्रतीक्षा करता था कि उधर से किसी का फोन आएगा। लवली का फोन दो-तीन बार आया था। वह बस हालचाल पूछ लेती थी। मैं उससे अपने अकेलेपन की बातें करता और कहता कि केवल घर से ऑफिस और फिर घर में सिमट कर रह गया था। वह मुझे प्रेरित करने का प्रयास करती थी और कहती समय ही सब सामान्य कर देगा। मैं पूछता कि मम्मी-पापा कैसे हैं तो वह छोटा सा उत्तर देती कि आप समझ सकते हो कि वे कैसे होंगे ?  मेरे बाबा भी इन दिनों ढीले हो गए थे। लगता था कि उन्हें खुद से ज्यादा मेरी चिंता सताने लगी थी। उनकी बातें कुछ इस तरह की होती कि ईश्वर न जाने क्या चाहता था जो इतनी घनी विपदा उसने उनके बेटे को दी थी। जब भी वह ऐसी बात करते मैं उनके सामने से दूसरी ओर निकल जाता था। एक दिन कुछ लोग घर पर आये। वे किसी संस्था से जुड़े थे जो स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों का सम्मान किया करती थी। उन्होंने बताया कि वे बैरकपुर क्षेत्र में शहीद भगतसिंह की प्रतिमा स्थापित करने जा रहे थे और हमें सपरिवार निमंत्रण देने आये थे। माँ तो इस तरह के आयोजनों में जाने को तत्पर रहती थी। उसने मेरे नाना की बातें आरम्भ कर दी थी। साथ ही यह भी मेरे बारे में भी बताया कि मैंने सिख परिवार की लड़की से विवाह किया था और उसके अंतिम संस्कार में खुद को सिख परंपरा का अनुयायी बना दिया था। इस आगंतुक दल में दो सिख सज्जन भी थे। वे बहुत प्रभावित हुए थे और उनके समारोह में मेरे उपस्थित होने पर जोर देने लगे थे। उन्होंने कहा कि वे हमारे आने-जाने के लिए गाड़ी भी भिजवा देंगे। यह कार्यक्रम दो सप्ताह बाद था। इस बीच मेरे बाबा की तबीयत कुछ ख़राब हो गयी थी। ज्वर था जो उतरने का नाम न ले रहा था। माँ भी बहुत चिंतित रहती थी। मैं तो खुद में ही सिमटा रहता था। माँ ने एक बार संकेत देते हुए कहा था कि मेरे बाबा का बिगड़ता स्वास्थ्य मेरे प्रति उनकी चिंता के कारण था। मैं क्या कर सकता था ? मैं तो स्वयं ही दिशा हार चुका हो चुका था। मेरा मन कहता कि मुझसे भूल हुई थी पर मेरे भीतर कोई था जो इस विचार का विरोध करता था। पिशी एक दिन मेरे बाबा से मिलने आयी थी। उन्हें कहीं से अपने भाई की अस्वस्थता का समाचार मिला था। वह मुझ पर नाराज हो रही थी कि उन्हें मैंने खबर क्यों न दी थी। फिर वह मुझसे सांत्वना दर्शाने लगी थी कि मेरे साथ जो हुआ था, वह किसी के साथ न हो। वह कहने लगी कि कैसे ईश्वर ने मेरे सुखी वैवाहिक जीवन को इतने थोड़े समय के लिए ही दिया था। वह बाबा के पास बैठी ऐसी ही बातें कर रही थी। माँ और मैं भी वहीं थे। अचानक उन्होंने कहा कि दुःख के साथ साथ ख़ुशी के क्षण भी आते हैं। हम तीनों उनका मुख देखने लगे थे। पिशी ने बताया कि इन्द्राणी विवाह करने जा रही थी। मैं चौंका। पिशी अब पूरा विवरण देने लगी कि जिसके साथ विवाह होने जा रहा था, वह तलाकशुदा था। वह साल्ट लेक क्षेत्र में बड़े भव्य भवन का मालिक था और उसके पास दो कारें थी। पिशी बार बार इस बात पर आ जाती थी कि वह बहुत अच्छा और धनवान व्यक्ति था। बाबा के पूछने पर पिशी ने कहा कि बहुत नेक व्यक्ति है, मुसलमान है तो क्या हुआ ? अब मैं समझ गया कि इन्द्राणी, जावेद खान नाम के उस व्यक्ति से विवाह करने जा रही थी जिससे उसने गुरूद्वारे वाली चाय की दुकान पर मिलवाया था।  ( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे  ... )

Wednesday, July 7, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 82

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II-चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1    हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  .. ( ८२ ) तीसरे दिन लवली चली गयी थी। उसे जाता देख भी पिंकी ने कुछ न कहा था। लवली की आँखों में आँसू थे। वह मुझसे लिपटकर फूट फूट कर रोने लगी थी। मेरी आंखें भी नम हो आयी थी। उसे एयरपोर्ट पर छोड़ने गया था। वह वहां भी रो रही थी। उसने कहा, ' मैं क्या करूं ? मुझे जाना तो होगा  ...आप दोनों की हालत मुझसे देखी नहीं जाती... पिंकी बीमार है और आप उसकी बीमारी में ऐसे चिंतित कि आपको भी इलाज की आवश्यकता हो...' मुझे उसकी बातें अच्छी लगी थी। मेरा मस्तिष्क न जाने क्या-क्या सोच रहा था। मुझे लगा कि लवली अपने मम्मी-पापा के साथ बातों में मेरी प्रशंसा ही करेगी। लवली कुछ ही घंटो में दिल्ली में अपने मामाजी के घर पर पहुँच गयी थी। उसका फोन आया तो वह वही बातें कर रही थी जो यहाँ से जाते वक्त की थी। उसने मामाजी से मेरी बात करवाई थी। मामाजी मेरी प्रशंसा किये जा रहे थे। उन्होंने एक बार पुनः दोहराया कि किसी भी चीज की आवश्यकता हो तो निसंकोच कहूं। मैंने कहा, ' हाँ, मामाजी...मुझे तो आपका आशीर्वाद चाहिए...' उन्होंने कहा कि ये अच्छा हुआ कि लवली अपनी बड़ी बहन के साथ कुछ समय बिता आयी थी और सेवा कर आयी थी। वह मुझे अब सेवा का महत्व समझाने लग गए थे। उन्होंने मुझे आशीर्वाद देते हुए कहा कि मैं भी अपनी पत्नी की सेवा ही कर रहा था जिसका सुफल मुझे अवश्य ही नानक बाबा देंगे। अब में उनकी बातों से झुंझला रहा था परन्तु मैंने कुछ न कहा केवल मन ही मन सोचा कि ये लोग अपने गुरु के नाम पर ही जीते हैं। मैंने कहा, 'अच्छा मामाजी आपसे फिर बात करूँगा...मुझे पिंकी को दवा देनी है और उस दिन की रिपोर्ट डॉक्टर को बतानी है...' उधर से उत्तर आया, ' बेटा जीते रहो, खूब-खूब कमाओ माँ-बाप की सेवा करो...बाबा नानक का आशीष तुम पर बना रहे...' मैं मन ही मुस्कुरा दिया था, ' लो, आशीर्वाद देते हुए भी खूब धन कमाने की बात आ ही गयी, सरदार जी के दिमाग में...' मैं पिंकी के पास आया तो देखा कि वह सो रही थी। एक दिव्यता सी थी, उसके चेहरे पर। शायद कोई स्वपन था जो उसकी नींद का साथी बना हुआ था। क्या वह मेरा स्वपन देख रही थी ? उस क्षण मुझे खुद पर ही खेद हुआ था। क्या मैंने उसके सपनों का हिस्सा होने का अधिकार खो न दिया था ? मेरा मन था जो कह रहा था कि हाँ ऐसा हुआ है परन्तु दूसरे ही क्षण मेरा मस्तिष्क मुझे भरोसा देने लगता कि ऐसा कुछ नहीं हुआ है। जो हुआ था उसे पिंकी देर-सबेर स्वीकार कर लेगी। मैंने पिंकी को जगाने की कोशिश न की थी। मुझे लगा उसे सोने ही देना चाहिए। डॉक्टर ने भी तो ऐसा ही कहा था कि अच्छी नींद उसके लिए आवश्यक थे। मैं नीचे आ गया था। माँ को बताया कि पिंकी गहरी नींद में थी। माँ ने कहा, ' अच्छी नींद के साथ साथ उसे ठीक से खाना भी चाहिए...कुछ समय बाद उसे जगा देना और खाना खिला देना...' मैं हूँ कह वहीं बैठ गया था। नींद की झपकी मुझे भी आ गयी थी। माँ भी सो रही थी। समय कहां गया, पता ही न चला था। बिशाखा ने आ कर हमें जगाया और कहा, ' आज क्या हुआ है सबको ? क्या किसी को खाना नहीं है ? मैंने परोस दिया है, सब सो रहे है तो मैं क्यों जागती रहूं ? मैंने आँख खोली और समय देखा। रात के ग्यारह बज रहे थे। मैंने कहा, ' लाओ, खाना दो...क्या बनाया है आज ? माँ भी जाग गयी थी। उसने बिशाखा से कहा, ' ऊपर जाकर देखो, बहू माँ उठी है या नहीं ? अगर जाग रही है तो उसे खाना दे आओ...अगर सो रही है तो मत उठाना, मैं कुछ समय बाद खुद उसे खिला कुछ आऊंगी या फिर अब वह सुबह ही खायेगी...' बिशाखा ने आकर बताया कि पिंकी सो रही थी। उसने यह भी कहा, 'लगता है खूब गहरी नींद है...जैसे बहुत समय से सोयी ही ना हो... परन्तु चेहरा क्या चमक रहा है किसी देवी जैसा...मैं तो देखती ही रह गयी...' माँ और मैं दोनों खाने बैठ गए थे। कुछ समय बाद माँ एक प्लेट में खाना लेकर ऊपर गयी, ' खिलाकर आती हूँ...ऐसे खाली पेट सोना ठीक नहीं...' माँ ऊपर गयी और कुछ समय बाद ही उसने चिल्लाकर मुझे पुकारा, ' अभिजीत, तुरंत तुरंत ऊपर आओ...डॉक्टर को फोन करो अभी...' मैं दौड़ता हुआ ऊपर गया था और सोच रहा था कि अब न जाने क्या हो गया था ? मैंने पिंकी के पास जाकर कहा, ' पिंकी, क्या हुआ ? ठीक तो हो न ? उसने कुछ न कहा था बस आंखें खोल कर फिर से बंद कर ली थी। मैंने फिर से उससे बात करने की कोशिश की। मुझे लगा ऐसी भी क्या बात हो गयी थी कि वह कुछ जवाब ही नहीं दे रही ?  माँ को तो जवाब दे ? माँ ने कहा, ' डॉक्टर को फोन करो...डॉक्टर ने कहा था न कि कुछ न हो तो वर्षों तक न हो और होना हो तो कभी भी हो जाये...'  मैंने फोन किया और डॉक्टर को तुरंत आने के लिए कहा। एक दवा इमर्जेन्सी के समय के लिए दी गयी थी, वह टेबलेट किसी तरह माँ और मैंने पिंकी के मुंह में डाली। वह गले से नीचे न उतार सकी थी। डॉक्टर को पहुँचने में विलम्ब हो रहा था। मैंने फिर से फोन घुमाया और पता चला कि वह निकल चुके थे। कुछ समय बाद वह पहुँच गए थे। पिंकी को छू कर उन्होंने कुछ प्रतिक्रिया दी थी जो मैं न समझ सका था। उन्होंने फिर बहुत कुछ चेक किया था। स्टेथोस्कोप से भी चेक किया और माँ की ओर देखा और निराशा भरे स्वर से अंग्रेजी में कहा, ' विलम्ब हो गया है...नहीं रही...' हम सभी स्तब्ध रह गए। कमरे से सन्नाटा था जो अचानक माँ की चीख से टूटा था। माँ फूट फूट कर रोने लगी थी। उसके साथ बिशाखा थी। बाबा को मैंने उस दिन जैसा देखा था, वैसा कभी न देखा था। वह रो रहे थे और माँ और बिशाखा को दिलासा दिला रहे थे। मैं, सभी से अपरिचित सा मौन खड़ा था। मेरे आँसू मानों सूख गए थे। मेरी विचित्र स्थिति थी। मैं कभी न समझ पाया कि मुझे क्या हो गया था। आज उस दिन को याद कर रहा हूँ तो समझ पा रहा हूँ कि कैसे और क्यों पिंकी मौन हो गई थी? बाबा ने कहा, ' बेटा, ससुराल में फोन कर दो...' मेरे मुख से निकला, ' आप करो, मुझसे न होगा...' माँ कुछ संभल चुकी थी। उसने कहा, ' बताना तो होगा  ...लवली तो अभी शायद दिल्ली में ही होगी...बेचारी आज ही तो गयी है...ईश्वर ने यह क्या कर दिया...हमसे क्या भूल हो गयी...' माँ के मुख से निकला भूल शब्द मुझे तीर सा भेद गया था। माँ ने फोन उठाया और चंडीगढ़ का नंबर मिलाया। उधर से कोई उठाता उसे पहले ही वह कहने लगी, ' क्या कहूं ? कैसे शुरू करूँ ? बाबा ने कहा कि उन्हें फोन दे कि वो बात करते हैं, इतने में ही माँ बोल उठी, ' हाँ, बहन जी...लवली पहुँच गयी है ? उधर पिंकी की मम्मी जी थी।  इतनी रात में फोन कॉल ने उन्हें चिंतित किया होगा।  उन्होंने शायद कहा कि दो दिन अपने मामा के घर दिल्ली में रहेगी। माँ ने कहा कि उसे तुरंत कलकत्ता वापस आना होगा। कुछ अनहोनी हो गयी है। माँ इतना ही कह पायी थी और फूट फूट कर रोने लगी थी। वह बोल ही न पा रही थी। अब बाबा ने उनके हाथ से फोन लिया और कहा, ' बहनजी, भगवान हमसे नाराज़ हो गए हैं, हम आपकी बेटी को अपने घर में रख न पाए...हमें क्षमा कर दें और यहाँ आ जाएं...' बाबा भी फूट फूट कर रो रहे थे...दूसरी और भी यही हाल था, शायद इससे भी बुरा। बाबा ने कहा, ' बहन जी, मुझसे बात नहीं हो पा रही है...अभिजीत तो एक सदमे में है, वह तो कुछ बोल ही नहीं पाएगा...आप ही आकर उसे सम्भालिए...प्लीज दिल्ली में भी खबर दे दें...मैं तो उनसे बात न कर पाऊँगा...' यह कह बाबा ने फोन रख दिया था। मैं खामोश तो था परन्तु विचलित न था। मैं सोच रहा था कि वे लोग इसे कैसे लेंगे ? एक डर सा था, मेरे भीतर।  कुछ मिनटों में ही सभी के फोन आने लगे थे। माँ-बाबा ही उत्तर दे रहे थे। लवली ने जिद की तो माँ ने कहा, 'इससे तो तुम बात करो...' मैंने फोन लिया और कहा, ' सॉरी लवली...तुम्हारी दीदी को मैं रोक न पाया, वह चली गई है... तुम उसके साथ होती तो वह न जाती...आई एम सॉरी...' लवली रोती ही जा रही थी...मेरी आंखों में भी आँसू थे। मैंने कहा, ' प्लीज जल्दी आ जाओ...मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा...प्लीज...'  समय बीतता जा रहा था और सब ओर से फोन आ रहे थे। स्पष्ट हो गया था कि संध्या तक दिल्ली और चंडीगढ़ से वे लोग पहुँच जायेंगे। माँ ही सब व्यवस्था कर रही थी। मैं सहानुभूति का पात्र बना, एक ओर को बैठा था।  संध्या की दिल्ली की फ्लाइट्स से पिंकी के मम्मी-पापा, लवली और मामा-मामी एक साथ पहुंचे थे। उनके आते ही माहौल बदल गया था। जहाँ हम सब खामोश बैठे थे वहीं अब जोर जोर से रोने की आवाजें थी। पास-पड़ोस वाले सभी इधर-उधर से झांक रहे थे। ऐसी तांक-झांक पड़ोसियों ने तब की थी जब पिंकी के घर वाले रिश्ता पक्का करने आये थे। पिंकी के मामा के कलकत्ता के बिज़नेस सम्बन्धी भी पहुँच चुके थे। सभी मेरे पास आकर मुझे दिलासा दे रहे थे। लवली मेरे पास आयी तो मुझे समझ न आया कि उससे कैसा व्यवहार करूँ ? वह मुझसे लिपटकर रोये जा रही थी। मैंने धीरे से कहा, ' तुम्हें जाना नहीं चाहिए था...मैं और पिंकी तुम्हारे जाने के बाद अकेले से हो गए थे...' मेरी बात पर, लवली और जोर से रोने लगी थी। माँ ने आकर उसे संभाला था। बिशाखा और शांतु की पत्नी भी एक कोने में खड़ी रो रही थी। इन्द्राणी और पिशी भी आ गयी थी। इन्द्राणी ने मुझे ढाढ़स दिया और कहा, ' कभी सोचा न था कि मनप्रीत हमें यूँ अचानक छोड़कर चली जाएगी...' वह मेरे पास बैठी रही थी। ऐसे समय में जैसा हुआ करता है, अंतिम संस्कार की तैयारियां होने लगी थी। माँ अपने प्रशासनिक अधिकारी वाले रूप में आ चुकी थी। यहाँ फोन, वहाँ फोन। यह निश्चय किया गया कि रात में ही कार्य सम्पन्न कर दिया जायेगा। पिंकी के पापा मेरे पास आये और बोले, ' बेटा, उठो, तुम्हें ही साहस दिखाना है...तुम्हें ही आगे आना है... ' मामाजी भी सामने आ गए और मुझसे लिपटकर फिर से रोने लगे थे। मेरी माँ ने कहा, ' अभिजीत ने तो हर संभव प्रयास किया परन्तु ईश्वर के आगे सभी हार जाते हैं...इसे भी संभालना होगा...यह भी दुर्बल हो जाता है...मनप्रीत में तो इसके प्राण थे...वह तो इसकी शक्ति थी ' हर बात पर पिंकी के पापा और मामा मुझे अपनी बाजूओं में लपेट लेते थे। हमारे परिवार का पुरोहित आ गया था और माँ से विधि-विधान और व्यवस्था की बातें करने लगा था। मैंने माँ को अपने पास बुलाया। पिंकी के मामा स्नेह से मेरा हाथ थामे खड़े थे। मैंने माँ को कहा, ' सब कार्य सिख परम्परा से होगा...इन पंडित जी को कह दो...और गुरूद्वारे में सूचित कर दो...जैसा वह कहेंगे वैसे ही होगा...' मामाजी ने मेरी बात सुनी तो ऊँची आवाज़ में कहा, ' वाहे गुरु...बोले सो निहाल...हे ! रब तू ही सब का मालिक ...' मैं कहानी को पूर्ण विस्तार के साथ याद करता जा रहा हूँ। एक एक क्षण, एक एक बात जैसे मेरे जहन में है और खुद ब खुद सामने आती जाती हैं। अभी-कभी लगता है, अब कुछ याद न करूँ। परन्तु आगे न बढ़ना मेरी सत्यता की सौगंध के साथ अन्याय होगा। मेरा यह कहना कि अंतिम कार्य सिख परंपरा के अनुसार होगा, पिंकी के परिवार पर एक विशिष्ठ प्रभाव छोड़ गया था। मामाजी ने अपने कलकत्ता के मित्रों के साथ विचार विमर्श किया और पूर्ण कार्य को एक भव्यता देने की योजना बनायीं। उन्होंने गुरुद्वारे में विशेष आयोजन और लंगर आयोजित करने का सोचा था। साथ ही उन्होंने मेरी माँ से इस सम्बन्ध में बात की कि वह क्या चाहती थी। माँ ने कहा, 'अंतिम कर्म आज हो जाये और फिर जैसा आप चाहें...' मैंने जब यह सुना तो जोर देते हुए कहा, ' पिंकी सबसे पहले गुरुद्वारे जाएगी...उसके बाद अंतिम कर्म...' सभी को मेरा प्रस्ताव उचित लगा। पिंकी के शव को लेकर सब लोग गुरूद्वारे के लिए निकले। घर के बाहर बहुत भीड़ थी। बंगाली हरि बोल...हरि बोल... के शब्द सुनाई दे रहे थे। मैं अपने बाबा के साथ था। माँ कार्य का नियंत्रण कर रही थी। इन्द्राणी माँ के साथ किसी सहयोगी की तरह जुड़ी हुई थी। गुरूद्वारे पहुँचने पर मुझे एक पगड़ी पहनाई गयी थी और सिख परम्परा के अनुसार अरदास की गई थी। हम बंगालियों के लिए यह सब अपरिचित सा था। वहां लोग जमा हो गए थे। वे बंगाली परिवार के साथ सिख परंपरा को देख हैरान हो रहे थे। कई तरह की बातें हो रही थी। पिंकी का नाम, मनप्रीत कौर राय कुछ लोगों के लिए परिचित सा था। ये वे लोग थे जो नया लोकप्रिय टीवी धारावाहिक देख रहे थे।   मैं स्थानीय सिख समुदाय में सम्मान का पात्र बनता जा रहा था। मेरी ओर सहानुभूति की लहर सी आ रही थी। भीतर मन के गहरे तल पर मुझे एक झूठे गर्व की अनुभूति हो रही थी। आज इस झूठे आभास में मुझे अपनी पराजय दिख रही है। काश ! तब मुझे जागृति हो जाती? रात देर से अंतिम संस्कार कर लौट आये थे। पिंकी के घर वाले किसी परिचित के घर रुके थे परन्तु लवली ने कहा कि वह कहीं न जाएगी और अपनी दीदी के घर पर ही रहेगी। माँ ने उसका हाथ पकड़ा हुआ था। माँ ने उसे अपने साथ जोड़ते हुए कहा, ' हां, लवली मेरी बेटी है...यह कहीं नहीं जाएगी...मेरे पास ही रहेगी...'( आज बस, आगे गुरुवार को यहीं पर  ... )