Chander Dhingra's Blog

Wednesday, April 29, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' -13


                                                                ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे...    

 ( १३ )     मैं रविवार की प्रतीक्षा करने लगा। परन्तु मेरे भीतर कोई था जो मुझे सावधान कर रहा था। ये इतनी उत्सुकता कैसी ? ये मेरे लिए नई अनुभूति थी। मैं क्यों सब कुछ सरलता से न ले पा रहा था ? मैं विवश क्यों था ?  मैं तो यहां चंडीगढ़ में एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में आया था। इस अनजान शहर में मेरे परिवार के पहचान के लोग, अभिभावक की तरह मेरी सहायता कर रहे हैं। ये अच्छे लोग हैं जो बड़ों का सम्मान करते हैं। मेरे नाना के कारण ही तो ये मेरे प्रति स्नेह दर्शा रहे हैं । ये सब समान्य बातें हैं पर मैं  सामान्य रूप में क्यों नहीं ले पा रहा हूँ ?  मैंने खुद को फिर से संतुलित किया परन्तु जानता था कुछ समय बाद ही विचारों के प्रवाह में फिर से बहने लगूंगा। 

रविवार को मैं जल्दी ही उठ बैठा। पिंकी ने सुबह आने का कहा था। सोचा, नौ बजे से पहले क्या आएगी ? अभी तो सात भी न बजे थे। दो घंटे और थे और वो भी अगर वह ठीक समय से आयी तो ? वैसे  यहाँ के लोग सामान्यतः समय के पाबंद हैं। अधिकतर समय पर ही काम करते हैं। यह मैं पिछले कुछ दिनों में महसूस कर चुका था। हमारी ट्रेनिंग की क्लास ठीक समय से ही शुरू हो जाती थी। शुरू होने के बाद बेशक इधर उधर हो जाये और समय बर्बाद होता रहे। मैं तैयार हो गया और प्रतीक्षा करने लगा। ये दो घंटे काटने बहुत मुश्किल हो रहे थे। नाश्ता तो किया ही, दो बार चाय भी पी। नौ बजने को आये तो मैं अपने कमरे में आकर बैठ गया। मैं नहीं चाहता था  कि पिंकी को लगे कि मैं उससे मिलने को उत्सुक था और तैयार होकर पहले से ही बैठा हुआ  था। नौ बजे ही थे कि नीचे से खबर आयी कि कोई मुझे मिलने आया है। मैं समझ गया कि पिंकी आ गयी है। वह समय की पाबंद जो थी, ठीक नौ बजे पहुँच गयी।  मैंने संदेशवाहक को कहा, ' कह दो आता हूँ.. '  मैं तो तैयार हो प्रतीक्षा में ही बैठा हुआ ही था, परन्तु साथ साथ नीचे न उतरा। कुछ देर पिंकी को इंतज़ार करांना ठीक लगा। तुरंत ही आ जाता तो यह लड़की समझती की मैं उससे मिलने की उत्सुकता में हूँ। नीचे आया तो देखा तो पिंकी अपने स्कूटर से टिकी खड़ी थी। मैंने कहा, ' सॉरी.. वेट करना पड़ा.. ' अरे, ये क्या बात हुई, कहकर तो गयी थी कि रेडी रहना.. खैर, छोड़ो.. कम ऑन, फ़ास्ट..'  पिंकी ने मुड़कर कहा और स्कूटर को स्ट्रार्ट कर, मुझे पीछे की सीट पर बैठने का इशारा करने लगी। तेज स्पीड में वो मुझे स्कूटर पर लेकर गेट से निकल गयी। कुछ दूर जाने पर मैंने एक बार फिर से सॉरी कहा पर पिंकी सामान्य थी। उसने कहा कि सॉरी की कोई बात नहीं है, ' हम लोग सिर्फ बीस मिनिट ही लेट है.. चिंता नहीं अभी कवर करती हूँ ' पिंकी ने हँसते हुए कहा और स्कूटर को गति देने लगी। कुछ ही समय में उसने स्कूटर को किनारे लगाया। मुझे सामने एक भव्य भवन दिखा। शायद हम लोग गुरूद्वारे आ गए थे। हाँ ये गुरुद्वारा ही था। भीड़भाड़ थी, रौनक थी और लोगों के चेहरों पर ख़ुशी, ताजगी और श्रद्धा के भाव थे। स्कूटर को स्टैंड पर लगा, पिंकी तेजी से आगे बढ़ रही थी। उसने अपने दुप्पटे से सिर को अच्छे से ढक लिया था। मैं पीछे चल रहा था। पिंकी ने पीछे मुड़ मुझे देखा और मेरा हाथ पकड़ मुझे खींच लिया।  ' कम ऑन.. फ़ास्ट.. ' उसने कहा और मुझसे पूछा, 'पॉकेट में रुमाल है न ? सिर  ढक लो '  मैंने पॉकेट से रुमाल निकाला जिसे देख उसने कहा, ' नहीं यह नहीं चलेगा '  फिर वैसे ही मेरा हाथ पकड़े हुए, मुझे गुरूद्वारे के मैन गेट के पास लगे एक स्टाल पर ले गयी। यहाँ उसने एक नीले रंग बड़ा सा स्कार्फ ख़रीदा। असल में यह सिर ढकने के लिए ही था। सिर पर पहन कर इसे पीछे से बांध सकते थे। सामने माथे पर सिखों का धर्मचिन्ह आ जाता था। पिंकी ने उत्साह के साथ मुझे यह पहनाया और फिर यह भी देखा कि वह धर्मचिन्ह माथे पर सही जगह यानि केंद्र में है या नहीं। थोड़ा सा इधर-उधर किया और ठीक होने पर उसने हँसते हुए कहा, ' ये हुई न बात.. अब बाबू मोशाय से सिंह साहब बन गए हो..' पिंकी के उत्साह ने मुझे भी थोड़ा सहज कर दिया था। जिस तरह से उसने मेरे सिर पर स्कार्फ ढकवाया था, मुझे उसमें अपनापन सा दिखा था। हम दोनों ने अपने जूते उतारे और आगे बने स्टाल में रख दिए। हमें एक टोकन दिया गया। यह व्यवस्था बहुत अच्छी थी। बाद में पिंकी से मालूम चला कि यहां काम कर रहे लोग, गुरुद्वारे के कर्मचारी नहीं अपितु यहाँ के नागरिक हैं जो सेवा भाव से ये कार्य करते हैं। वे न केवल जूते संभाल कर सही स्थान पर रखते हैं बल्कि उन्हें झाड़पोंछ कर साफ भी करते हैं। पिंकी ने बताया कि उसके पापा भी सेवा के लिए यहाँ आते हैं।

हम गुरूद्वारे के भीतर गए। भजन कीर्तन चल रहा था। बहुत ही श्रद्धामय और पावन माहौल था। सामने एक मंच था जहाँ लोग आगे बढ़ते हुए, झुक जाते थे। मैंने भी हाथ जोड़ प्रणाम किया। पिंकी ने देखा तो कहा, 'मत्था टेको..'  मैं इन सब बातों में विश्वास नहीं रखता, मैंने कहा, ' हाथ जोड़ दिए हैं..' पिंकी ने कुछ आदेश वाले भाव में  मेरे पास आ धीरे से कहा, 'माथा टेको.. अच्छा होता है..' इस बार उसने मत्था नहीं माथा कहा था। मैंने क्षण भर को अपना बचपन याद किया जब प्रसाद के लालच में मंदिर मैं  झुक कर प्रणाम किया करता था। मैंने मुस्कुराकर पिंकी को ओके जैसा भाव दिया और अच्छे से घुटनों के बल झुक कर शीश को भूमि पर लगाते हुए प्रणाम किया और दोनों हथेलियों को जोड़ कर प्रसाद ग्रहण किया। वहां हॉल में हम दोनों कुछ देर तक बैठे। पिंकी महिलाओं वाले खंड में बैठी थी और मैं इस ओर पुरुषों वाले खंड में। पिंकी दूर थी परन्तु मैं उसे देख पा रहा था। वह आँखे मूँद, ध्यान मुद्रा में बैठी थी। मैं एकाग्रचित न हो पा रहा था। बार-बार पिंकी की ओर देख लेता था। वह केवल ध्यान में थी और दुनिया से बेखबर। मेरे आसपास जो लोग बैठे थे, वे भी प्रार्थना में मग्न थे। मेरे दिमाग ने प्रश्न उठाया, यहाँ बैठे लोगों में अधिकतर बड़े-बूढ़े थे, उनका इस तरह का व्यवहार तो बनता था परन्तु पिंकी ? वह तो पढ़ी-लिखी युवा लड़की है,  वह क्यों इतनी भक्ति दिखा रही है ?ये भी एक तरह का नया चलन तो नहीं है ? मैंने चारों ओर नज़र घूमाकर देखा। दीवारों पर बड़ी बड़ी तस्वीरें लगी हुई थी। ये सैनिकों या योद्धाओं के चित्र लग रहे थे। कुछ समय बाद मैंने देखा कि पिंकी मुझे बाहर आने का इशारा कर रही थी। मैं उठ गया। न जाने मुझसे ये अनायास कैसे हो गया, मैंने हाथ जोड़ प्रणाम किया और उठकर बाहर आ गया। शायद मैं पिंकी को दिखाना चाहता कि मुझे यहाँ आकर अच्छा लगा था और मुझ में श्रद्धा का भाव जग गया था। शायद कहीं न कहीं मैं पिंकी को प्रभावित करना चाहता था। कुछ समय को हम दोनों शांत थे। अचानक पिंकी को कुछ परिचित लोग दिखे तो उसने अभिवादन में परम्परा के अनुसार हाथ जोड़ 'सत श्री अकाल ' कहा। मुझे इस अभिवादन की जानकारी थी। मैंने कई सिख लोगों को नाना के पास आते देखा था। वे सत श्री अकाल और  नमस्ते दोनों कहते थे। यहाँ भी मैंने लोगों को यही अभिवादन करते हुए देखा था। जब पिंकी ने अपने परिचितजनों  को आदरपूर्वक प्रणाम किया तो उन्होंने प्रत्युत्तर में पिंकी और साथ में मुझे भी सत श्री अकाल  कहा। थोड़ा आगे बढ़े तो मैंने पिंकी को रोका और कहा, ' पिंकी, थोड़ा अपने गुरूद्वारे और यहाँ के बारे में तो बताओ..'  मैंने पहली बार उसे नाम से पुकारा था। पिंकी को मेरी ये जिज्ञासा अच्छी लगी। उसने कहा कि वे लोग अपने पवित्र ग्रन्थ की पूजा करते हैं। हमने जो आते ही माथा टेका था वह गुरु ग्रन्थ साहब के सामने था। ये जो हम यहाँ आने पर सिर ढक लेते हैं, वह भी गुरु के प्रति हमारे सम्मान का प्रतीक है। पिंकी थोड़ा गंभीर हो रही थी। मैं भी सिख धर्म के बारे में जानने को उत्सुक था। मैं कहा, ' चलो कहीं  बैठकर बात करते हैं.. पिंकी ने हाँ में सिर हिलाया। हम लोगों ने अपने जूते पहने और सामने रखी बैंच पर बैठ गए। पिंकी ने बताया, ' गुरु नानक देव जी हमारे पहले गुरु हैं। उनके बाद नौ और गुरु हैं इस तरह हमारे दस गुरु हुए हैं..'  मैंने चुटकी लेते हुए पूछा, ' सब गुरुओं के नाम याद हैं ?  पिंकी ने तपाक से उत्तर दिया, ' ऑफ़ कोर्स..' फिर उसने ऊँगली से गिनाना शुरू किया, गुरु नानक देव जी, गुरु अंगद देव जी, गुरु अमर दास जी, गुरु राम दास जी, गुरु अर्जन देव जी..' मैंने हँसते हुए उसे रोका, 'अरे मैं तो यूँ ही कह रहा था..' लेकिन पिंकी नहीं रुकी और उसने सब नाम गिनवा दिए। सिख, जिन्हें हम बंगाली लोग पंजाबी कहते हैं, के बारे में मेरे मन में कई प्रश्न थे। आज कुछ जानने को मौका है। मैंने कहा, ' तुम्हें नॉलिज है, कुछ बातें पूछता हूँ, सिख लोग ये छोटी सी तलवार क्यों अपने पास रखते हैं ? मुझे पता था ये जरूर पूछोगे.. हम लोगों को पांच चीजें रखना आवश्यक है.. उन में से एक ये है जिसे किरपान कहते हैं..और अन्य चार हैं केश, कच्छ, कड़ा और कंगा...ये हैं हमारे पांच ' के ' हैं।  हँसते हुए उसने बात आगे बढ़ाई, ' तुम्हारा अगला सवाल क्या है, बताऊँ ? अब तुम पूछोगे, सिखों में सारे पुरुष सिंह और महिलाएं कौर क्यों हैं ? मैं मुस्कुराने लगा। सच में, ये प्रश्न भी मेरी जिज्ञासा सूचि में था। मैंने कहा, ' हाँ, बताओ..' पिंकी ने कहा, सिंह का मतलब है शेर अर्थात  निडर और कौर है प्रिंसस यानि राजकुमारी.. ये टाइटल्स हमें जाति वगैहरा के बंधन से ऊपर उठाते हैं और समझाते हैं कि हम सब एक सामान हैं.. किरपान रखने के पीछे भी एक बात है कि हमें दुर्बल का साथ देते हुए अन्याय का विरोध करना है। मैं बहुत प्रभावित था।  आज मुझे पिंकी में एक सुन्दर लड़की के साथ साथ  एक समझदार लड़की भी दिख रही थी। मैंने कहा, ' मुझे तुमसे बहुत कुछ पूछना है, बहुत कुछ सीखना है..' पिंकी मुस्कुराई और उसने टेढ़ी नज़रों से मुझे देखा और कहा, ' मुझे भी आपसे बहुत बहुत कुछ पूछना है, बंगाल के कल्चर के बारे में.. बंगाल के क्रांतिकारियों के बारे में.. बंगाली लिटरेचर के बारे में.. और बहुत कुछ.. पर चलो, अब चलते हैं..  आपको चंडीगढ़ के मशहूर गर्मागरम छोले-भठूरे खिलाते है.. ' पिंकी ने स्कूटर स्टार्ट किया और हम लोग वहां से निकल आये। 
( आज बस, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर )

Wednesday, April 22, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story '-12


                                            ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला जारी है।
                             आज गुरुवार है, अब आगे...    

( १२ )      मैं ऊपर कमरे में आकर अपने परिचित से अंदाज़ में बिस्तर पर गिरा। ये क्या हुआ ? लवली तो बस सूचना देकर चली गयी। पिंकी को स्वयं आना चाहिए था, उसकी बहन तो एक हवा के झोंके सी निकल गयी। आज यदि जाना नहीं हुआ तो क्या कल जायेंगे या किसी और दिन ? कुछ भी पता नहीं। मैं फिर से  एक बार खुद से उलझने लगा। ये क्या बात हुई ? सामान्य शिष्टाचार कहता है कि पिंकी को अपनी बहन को ठीक से समझाकर भेजना चाहिए था। लवली तो वैसे भी शैतान और नादान लड़की है। वह क्या जाने, किसी के मन की बात ? बस, स्कूटर पर आई और 'आज का प्रोग्राम कैंसिल ' कह कर निकल गयी। परन्तु, मैं परेशान क्यों हो रहा था ? इन सिख लोगों के पूजा स्थल से मुझे क्या लेना-देना ?  एक बात हुई थी गुरूद्वारे घूम आने की, बस...  कोलकाता में ऑफिस आते-जाते एक गुरूद्वारे को देखता रहा हूँ। देखता रहा हूँ कि कैसे सिख पुरुष और स्त्रियां वहां दिखते हैं, परन्तु कभी भीतर जाने की इच्छा न हुई। हमेशा यही लगता रहा कि ये लोग पूजा-पाठ के विधि विधान क्या समझते होंगे ? पूजा तो एक जटिल प्रक्रिया होती है। मैंने अपनी माँ और बचपन में नानी को कुछ विशेष अवसरों पर पूजापाठ का आयोजन करते देखा है। कैसे तिथि और मुहूर्त निकाला  जाता और कैसे कुछ दिनों पहले से ही साधन-सामग्री आदि इकठ्ठा किये जाते। फिर पूजा के दिन पंडित-पुरोहित की प्रतीक्षा की जाती थी। नानी चिल्लाती थी कि मुहूर्त निकला जा रहा है और पंडित का कुछ अता-पता नहीं.. फिर माँ, बाबा सभी परेशान हो उठते थे। मुझे पंडित जी को खोजने के लिए भेजा जाता था। इधर-उधर घूमने के बाद पता चलता कि वे तो किसी और घर में पूजा करवा रहे हैं।  ' बस, यहाँ की पूजा समाप्त कर पहुँचता हूँ ', पंडित जी कह देते परन्तु वहां से उन्हें कोई अन्य अपने घर पकड़ कर ले जाता और कुछ समय बाद मुझे एक बार फिर से उनकी खोज के लिए दौड़ाया जाता। ये बहुत खीज पैदा करने वाली बात होती थी और मुझे लगता कि ऐसे पूजा-पाठ का क्या तात्पर्य ? स्कूल में मेरे मित्र अपने अपने घरों में होने वाली पूजा के बारे में बताते कि उन्होंने कैसे आनंद लिया और खाया-पीया। पंडित वाली दुविधा प्रायः सभी घरों में होती। बाद के वर्षों में मुझे समझ आ गया था कि ये पंडित के पीछे दौड़ना, पूजा का ही एक अंग जैसा है। यदि पंडित स्वयं से सही समय पर आ जाएं तो पूजा का क्या मज़ा ?  ये वैसा ही है जैसे बारात का समय से न पहुंचना। समय से पहुँच गए और कन्या पक्ष वालों को प्रतीक्षा न करवाई तो  बारात कैसी ? मैं माँ से कहता कि ऐसी पूजा में क्या लाभ ? हमें खुद पूजा कर लेनी चाहिए। मेरी बात सुन नानी अंदर से मुझे डांटते हुए चिल्लाती, ' बिना पुजारी कहीं पूजा होती है ? मन्त्र-विधि क्या हम जानते हैं ? हम सब परेशान से पंडित जी की प्रतीक्षा में बैठ जाते। पंडित जी अपने समय से हांफते-हांफते आते और हड़बड़ी दिखाते कि जल्दी करो क्योंकि उन्हें तीन अन्य घरों में जाना है। मैं कहता कि मुहूर्त तो निकल चुका है तो वह बताते कि एक विशेष पंचाग के अनुसार संध्या तक का मुहूर्त है, चिंता की बात नहीं है परन्तु शीघ्रता करनी होगी। मैं खीजता हुआ पूजा स्थल पर बैठ जाता। परिवार के अन्य सभी सदस्य कुछ मिनिट तक पंडित जी से विलम्ब हेतु शिकायत करते और फिर सामान्य हो अपने अपने-अपने  स्थान पर बैठ जाते मानों कुछ हुआ ही न हो। नाना इस सब तूफान से अलग हो अपने कमरे में, अपने में सिमटे, किसी पुस्तक या समाचार पत्र में समाये रहते। उन्हें खाने की प्रतीक्षा अवश्य परेशान करती जो उस दिन विशेष बनता था। बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा और अन्य कई ऐसे आयोजनों की यही कहानी है। मैं चिढ़ जाता था। ये सब ढोंग-आडंबर और तमाशा है। मेरे खास मित्र सुब्रत का भी यही मत था। लोग गरीब हैं, भूखे हैं और हम इन सब फिजूल की बातों में उलझे हुए हैं। रोबी दा का भी कुछ ऐसा ही कहना था। उन के साथ एक बार बैंक कर्मचारियों की मीटिंग में गया था। वे ही ले गए थे। उन्होंने कहा था कि हम कच्चे नौजवानों को कुछ सीखना चाहिए। कैसे समाज को बदला जाये ? कैसे नया समाज लाया जाये ? कैसे पूजा-पाठ जैसे आडम्बरों से मुक्ति पाईजाये ? उस मीटिंग में काफी भीड़ थी और लाल झंडे लहरा रहे थे। क्षण भर को मेरी विचार श्रृंखला रुकी। मैं क्यों सोचते - सोचते कहाँ से कहाँ निकल जाता हूँ ? मैं स्वतः से नहीं रुक पाता। मुझे प्रयास करना पड़ता है अपने विचारों को विराम देने के लिए।  

पिंकी के न आने और गुरूद्वारे न जा पाने के कारण मैं यादों की गलियों में कहाँ से कहाँ तक पहुँच गया था ? एक बार फिर मैंने स्वयं को व्यवस्थित किया। कभी कभी ऐसा तो हो ही जाता है। मुझे समझना चाहिए कि कुछ ऐसी विशेष बात हो गयी होगी कि उसे गुरूद्वारे जाने का प्रोग्राम कैंसिल करना पड़ा होगा। उसने खबर तो पहुंचा ही दी न?  परन्तु अब किस दिन जाना है, उसे ये तो बताना चाहिये था? मुझे याद नहीं कि कितनी देर तक मैं खुद से उलझा रहा। झपकी भी लग गयी थी। आंख खुली तो पता चला कि संध्या के आठ बज चुके थे। मैं हाथ-मुंह धोकर नीचे आ गया। खाने का समय हो चुका था। कैंटीन के लड़के ने मुझे देखा तो दूर से ही बोला , ' क्या दादा, आज जल्दी भूख लग गयी ? ' मैंने जवाब नहीं दिया तो वह बोला, ' बस पांच-दस  मिनिट रुकिए  दादा, अभी थाली लगाता हूँ .. ' अब मैंने उसे उत्तर दिया कि कोई जल्दी नहीं है। मैं कोने में रखी कुर्सी को खींच, दरवाजे के सामने बैठ गया ताकि बाहर का नज़ारा दिख सके। मुख्य द्वार सामने ही था। सिक्यूरिटी इंचार्ज दोनों हाथ पीठ पीछे कर टहल रहा था। गेट के बाहर सड़क पर चहल पहल थी। अचानक मैंने गेट में एक स्कूटर को घुसते देखा। कोई लेडी  चला रही थी। क्या पिंकी थी ? नहीं, ये तो कोई मोटी महिला थी। पीछे भी कोई बैठा था। उन्होंने स्कूटर साइड में खड़ा किया और सिक्योरिटी इंचार्ज से बात करने लगी। सिक्योरिटी इंचार्ज ने मुझे कैंटीन के गेट पर कुर्सी पर बैठा देख लिया था। मैंने देखा कि वह उन्हें लेकर इधर ही आ रहा है। क्षण भर बाद मुझे उन दो महिलाओं में एक पिंकी दिखी। सिक्योरिटी इंचार्ज ने कहा, ' दादा, ये आपसे मिलने आई हैं। पिंकी ने भी मुझे देख लिया था और हाथ उठाकर 'हाय' कहा। उसने मुझे अपनी सहेली से मिलवाया और बताया कि कैसे उसे उसके साथ कहीं आवश्यक कार्य से जाना पड़ गया था और गुरूद्वारे जाना न हो पाया। लेकिन उसने कहा कि संडे को वह जरूर मुझे ले जाएगी। वह सुबह आयेगी और पहले गुरूद्वारे और बाद में चंडीगढ़ की अन्य जगहों पर घुमाने ले जाएगी। उसने दूसरी बार सॉरी कहा। स्कूटर स्टार्ट कर उस पर बैठेते हुए भी उसने सॉरी कहा। ' संडे रेडी रहना ', कह वो दोनों गेट से बाहर निकल गयी। एक बार फिर से मैं देखता रह गया। पहले छोटी वाली आयी थी और एक सूचना देकर चली गयी थी। अब उसी तरह से बड़ी वाली आयी और सॉरी कहकर निकल गयी। ये लोग धैर्य से बात क्यों नहीं करते ? बस स्कूटर पर आये और खबर दे, निकल गए। पिंकी को तो थोड़ा समय रुकना चाहिए था। ठीक से और विस्तार से बताना चाहिए था कि क्या आवश्यक कार्य उसकी सहेली पर आन पड़ा था ? परन्तु, मुझे ऐसी जिज्ञासा क्यों हो रही थी ? कुछ भी कार्य हो सकता है। मुझे क्यों सब कुछ बताया जाये ? मैं क्या सच में  कारण जानना चाहता था या कुछ और था जो मुझे परेशान कर रहा था ? ये सालों पुरानी छोटी सी घटना है परन्तु मुझे स्पष्ट रूप में आज भी याद है। असल में, मैं उस दिन पिंकी  की ही प्रतीक्षा कर रहा था। मैं उसके साथ संभावित समय बिताने को उत्सुक था। मुझे उसका स्वयं यहाँ अपनी फ्रेंड के साथ आकर बता जाना अच्छा लगा था। वह आने वाले संडे का कार्यक्रम भी बता गयी थी। ये सब तो उसने ठीक किया था। ये उसके दायित्व बोध को दर्शाता था। लेकिन जब मित्र  के साथ आयी थी तो उसके साथ मेरा परिचय तो करवाना चाहिए था। 

मैं स्वयं में उलझता और सुलझता रहा हूँ। अपने जीवन की पोटली को खोलकर, हर छोटी बड़ी सामग्री को निकाल-निकाल कर, न केवल स्वयं से पुनः एक बार परख रहा हूँ अपितु आप को भी दिखा रहा हूँ। इन्हें छिपाये-लुकाये अकेला ही अपरिचित पथ पर चलता रहा हूँ। कभी कभी तो इस यादों की पोटली को दूर अनजान जगह पर फेंक आने या किसी गहरी नदी में डुबो आने का भी मन बनाया। परन्तु जैसे ही ऐसा कुछ करने की सोचता, कहीं भीतर से आहाट सी होती कि ' बच्चे, इसे तुम अपने से जुदा नहीं कर सकते। इसका बोझ तुम्हें जीवनपर्यन्त ढोना है। यही नहीं, ये बोझ समय के साथ साथ बढ़ता भी  जायेगा..'  सच में इस बोझ को बढ़ते हुए मैं महसूस कर चुका हूँ। मेरे मन की भीतरी सतह पर ये बढ़ता बोझ, एक तरह का भय भी पैदा करता रहा था। मैं  जितना भी सरल शब्द में कहूँ या निश्चिंत भाव दिखाने  का प्रयास करूँ, वास्तविकता यह थी कि मैं खुद में परेशान था। मैं उखड़ा उखड़ा सा रहता था। कभी कभी मुझे लगता जीवन बेमतलब है। मैं अपनी दुर्बलता को समझ पा रहा था। क्या ये डिप्रेशन के लक्षण थे ? मैंने कहीं पढ़ा था कि डिप्रेशन के नौ मुख्यः लक्षण होते हैं और यदि किसी व्यक्ति में इन में से पांच हों तो वह डिप्रेशन का शिकार माना जाता है। ऐसी मानसिक स्थति में मैंने एक रात खुद को टटोलना चाहा था। ये पिछले वर्ष की बात है। तब मुझे लगा था कि खिन्नता के कई लक्षण मुझ पर सही बैठते हैं। पर क्या था कि मैं सम्भला हुआ था ? वह क्या था मेरे अंदर जो मुझे मेरी मानसिक स्थिति से मुझे परिचित करवा रहा था ? मैं कहाँ से कहाँ चला आया ? अब इन बातों को सोचता हूँ तो मुझे खुद पर हँसी आ जाती है। मुझे तो अपनी पूरी कहानी पूर्ण सत्यता के साथ सुनानी है। ये जो मैं इधर-उधर भटक जाता हूँ या स्मृतियों की गलियों में दूर कहीं निकल जाता हूँ, ये भी तो मेरी कहानी का ही हिस्सा हैं। मेरी इस मानसिकता के प्रभाव को दर्शाये बिना तो सब कुछ अपूर्ण सा ही दिखेगा। 
( आज यहीं तक, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर )

Wednesday, April 15, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story '-11



                                                   ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे...    

( ११ )    जोगेन्दर अंकल के घर से देर रात को वापिस लौटा। खाना वहीं खाया। उन लोगों ने बिना खिलाये लौटने ही न दिया। उस शाम को जब से गुरूद्वारे जाने की बात चली थी, तब से ही मैं प्रतीक्षा की मनस्थिति में आ चुका था। मैं अपने कमरे में आ तो गया था परन्तु मेरा मन कहीं बाहर भटक रहा था। कलकत्ता में मैंने सिख समुदाय की गतिविधियों को देखा था। ऑफिस आते-जाते एक गुरूद्वारे के सामने से गुजरना होता था। बाहर से ही देखता था कि लोग आ-जा रहे होते थे।  कोलकाता के प्रसिद्ध मैदान में भी साल में दो बार बहुत विशाल समारोह, सिखों के गुरु नानक के जन्मोत्सव और बैशाख माह के आरम्भ के अवसर पर किया जाता है। यहाँ लाखों लोग एकत्रित होते हैं। ये समारोह दो-तीन दिन तक चलता है। इतनी बड़ी संख्या में सिख लोगों को एक साथ देख आश्चर्य होता। ऑफिस में इस सम्बन्ध में साथियों से बात होती तो वे व्यंगात्मक भाषा में कहते, ' कोलकाता तो अब पंजाबी पगड़ीवालों का शहर हो गया है..' कुछ ऐसी ही बात तब भी सुनाई देती जब बिहारी लोग छठ की पूजा करते हैं। तब ऐसा लगता है मानों कोलकाता बंगाल का नहीं बिहार का कोई शहर हो। छठ पूजन मुझे बहुत विस्मित करता। लोग जिस तरह से बैंड बाजे और हो-हल्ला के साथ गंगा घाटों पर जमा होते, मुझ में कुछ ऐसी भावना जाग्रत करते कि ये कोई पिछड़ा और अंध विश्वासी समुदाय हो। आज जब ये सब लिख रहा हूँ तो अपनी सोच-समझ  बहुत कुछ बदल चुका हूँ। किन्तु उन दिनों  मेरी सोच काफी संकीर्ण हुआ करती थी। आज सत्य की प्रतिज्ञा के साथ पेन और कागज़ लेकर बैठा हूँ तो कुछ छिपाऊँगा नहीं । उन दिनों मुझे बंगाल के बाहर से आये लोगों के जनसमूह और उनके द्वारा किये जाने वाले समारोह परेशान किया करते थे। मुझे लगता था इन बाहर से आये हुए लोगों के कारण धीरे धीरे हमारे बंगाल की संस्कृति प्रभावित हो रही है। उन दिनों बंगाल के राजनैतिक और सांस्कृतिक समुदायों में कुसंस्कृति  की बात भी उठी थी। ऑफिस, दोस्त-यारों में इसे लेकर वाद विवाद हुआ करता था। 'अपोसंस्कृति ' हम बंगालियों के लिए एक मज़ेदार शब्द बनकर उभरा था। हम दोस्त लोग इसका खूब प्रयोग करते थे। मुझे याद है एक दिन मेरे टिफिन में माँ ने फोर्क रख दिया था। उन्हें लगा होगा कि जिस तरह का खाना उस दिन दिया गया था उसे इस फोर्क से खाने में सुविधा होगी। लंच के समय मुझे इस तरह फोर्क के साथ खाते देख एक साथी ने हँसते हुए कहा था, ' क्या हाथ से सीधे-सीधे खाने में शर्म आती है..अपोसंस्कृति.. अपोसंस्कृति.. ' इसी तरह एक दोस्त के घर पर उसके रिकॉर्ड प्लेयर पर ऊँची ध्वनि पर एक इंग्लिश गाना बजता देख मैंने भी इसी तरह अपोसंस्कृति.. अपोसंस्कृति.. कहकर उसे चिढ़ाया था। वह दोस्त दार्जिलिंग के बोर्डिंग स्कूल में पढ़ा था और उसे इस तरह का संगीत पसंद था। मेरे व्यवहार पर वह झुंझलाया था और उसने मुझे कहा था, ' बस, कुँए के मेंढक बने रहो..'   मैं सामने खुलकर कहूँ या न कहूँ परन्तु भीतर कहीं कसक सी होती थी कि ये लोग बंगाल में आ बसे  हैं किन्तु अपनी आदतों और संस्कारों को छोड़ नहीं पा रहे हैं। चाहे बिहारी हों या सिख-पंजाबी या मारवाड़ी या फिर चीनी लोग।  

मैं पिंकी और लवली के साथ गुरूद्वारे जाने के कार्यक्रम को लेकर उत्साहित था। मुझे पिंकी के साथ कुछ समय बिताने का अवसर मिल रहा था। नहीं कह सकता कि क्या कहीं न कहीं उसने मुझे प्रभावित किया था ?  किन्तु कुछ तो ऐसा था जो मेरे भीतर हलचल कर रहा था। मुझे स्मरण है कि इन्द्राणी दीदी  ने एक बार मुझे अपना अनुभव बताया था कि कैसे वे अपने दन्त चिकित्सक से प्रभावित थी और जिस दिन उन्हें उसके पास जाना होता था तो वे काफी पहले से एक तरह के ' वेटिंग मॉड ' में आ जाती थी और सुबह से सोचने लगती थी कि आज कौन सी साड़ी पहन कर जाऊंगी ? आज मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही तो हो रहा था। कहीं न कहीं मैं चाहता था कि बीच का यह समय जल्द से जल्द गुजर जाये। मैं इधर-उधर करवट बदल रहा था। नींद का दूर दूर तक कुछ अतापता न था। कभी माँ की बातें याद आ जाती, कभी बाबा की। बाबा की याद आते ही उनका चेहरा सामने आ जा जाता है। आज भी और पहले भी जब कभी मैं बाबा के बारे में सोचता तो मुझे लगता कि वे एक तरह के अकेलेपन में जी रहे हैं। माँ उनका ख्याल तो बहुत रखती थी। उनके खान-पान, दवा और ड्रेस इत्यादि का परन्तु कहीं न कहीं बाबा दबाव में रहते थे। पुरुष का चरित्र कुछ ऐसा होता है कि वह एक तरह की आज़ादी चाहता है। वह पूर्णाधिकार तो नहीं चाहता परन्तु अपनी बात की स्वीकार्यता और समर्थन अवश्य चाहता है। घर में अपने विचार की स्वीकार्यता बाबा को न मिलती थी। मैं बचपन से ही इस तथ्य को समझने लगा था परन्तु इसे व्याख्या दे पाना मेरे बस में न था। इन्द्राणी दी को मैंने एक बार हलके से कहा था कि मेरी माँ, मेरबाबा पर एक तरह का प्रेशर बनाये रखती हैं। इन्द्राणी दी ने तब मुझे समझाना चाहा था कि माँ ने अपने बाबा यानि मेरे नाना के साथ, शासकीय प्रभाव एवं अधिकार का सुख भोगा है। उनका बचपन प्रभावशाली व्यक्तियों की गोद में बीता है। उनका स्कूल-कॉलेज जीवन उन साथियों के साथ रहा है जिनके अभिभावक सत्ता और प्रशासन के गलियारों में रसूख रखते थे। ये स्वाभाविक है कि अनजाने ही उनमें दूसरे को दबाने का स्वभाव आ गया है। ऐसे लोगों में अनजाने ही ऐसी प्रवर्ति बन जाती है जो अपने भीतर बन चुकी धारणाओं को ही जीवन का अंतिम सत्य मानने लगती हैं। समय के साथ वे इसी मानसिकता में जीते जाते हैं और उससे विपरीत कुछ भी देखने और समझने की शक्ति से अलग होते जाते  हैं। इन्द्राणी दीदी ने ये भी कहा था कि मेरी माँ एक समझदार और संतुलित महिला हैं और मेरे बाबा भी इस सत्य को बहुत अच्छे से समझते हैं। मैं आज जब बरसों पुरानी इस बात को याद कर रहा था तो  इन्द्राणी दीदी का चेहरा मेरे जेहन में स्पष्ट छा रहा था। मैं उनकी किसी भी विषय की व्याख्या करने की प्रतिभा का फिर से एक बार कायल हो रहा था। 

कब सो गया था पता न चला। सुबह उठा तो एक बेचैनी सी थी। न जाने क्यों लगा, माँ स्वस्थ नहीं हैं। मैं यहाँ उनसे मीलों दूर हूँ। कौन उनकी देखभाल करता होगा ? बाबा है न ? मेरे भीतर से ही उत्तर मिला। परन्तु बाबा तो सरलता से कह देंगे, ' एक केलपोल की गोली क्यों नहीं ले लेती ? बाबा के लिए केलपोल की गोली संजीवनी के सामान थी। माँ तो बाबा के इस सुझाव पर सिर पकड़कर बैठ जाएँगी और कुछ जवाब न देंगी। फिर बाबा भी माँ की इस बेरुखी को देख, ' अच्छा, जो तुम्हें ठीक लगे.. ' का भाव लेकर, कोने में रखी कुर्सी पर अख़बार लेकर बैठ जायेंगे। एक क्षण को मैंने आंखें बंद की, गर्दन को पीछे की ओर झुकाया और सोचने लगा, माँ की अस्वस्थता का हल्का सा विचार ही मेरे भीतर कैसा उथल-पुथल मचा रहा है। ये सपना भी न था। ये तो किसी नन्हें पंख सा ख्याल था जो उड़ते उड़ते कहीं से आया और न जाने मुझे कहाँ से कहाँ ले चला था। मैंने खुद को संतुलित किया। माँ के सुस्वास्थ्य की कामना करते हुए बाबा लोकनाथ को स्मरण और प्रणाम किया। ये माँ ने ही सिखाया था कि चिंता और आशंका की मनस्थिति में बाबा लोकनाथ का स्मरण कर लेना चाहिए। उनकी बाबा लोकनाथ में खूब आस्था थी और वे प्रतिमाह इस आस्था हेतु अच्छा खासा दान भी किया करती थी। अब प्रातःकाल की दिनचर्या का समय था। मैं उठा और बाथरूम की और बढ़ा किन्तु फिर लौट कर अपने सूटकेस को खोल अपने कपड़ों को देखने लगा। मैंने नीले रंग की एक शर्ट को निकाला और देखने लगा कि उसे आयरन करने की जरुरत है या नहीं ?   

सामान्य दिनों की तरह अपने ट्रेनिंग सेंटर गया और सामान्य दिनों की तरह ही दोस्तों के साथ दिन बिताता रहा परन्तु आज एक गुदगुदी सी थी मेरे भीतर।  मैं उत्सुकता में था कि समय जल्दी बीते। नज़र कलाई पर बंधी घड़ी पर चली जाती थी। पर मैं उत्साहित क्यों था ? मैं खुद को बार बार सँभालने की कोशिश कर रहा था। मुझे लगता ये जो मेरे भीतर एक उत्सुकता सी बन रही है, मुझे दुर्बल कर रही है। मैं यहाँ चंडीगढ़ में कुछ दिनों के लिए आया हुआ हूँ। यहाँ परिवार के परिचित मेरे स्थानीय अभिभावक की तरह हैं और उनकी बेटियाँ  मुझे स्थानीय पूजा स्थल यानि उनके गुरूद्वारे ले जा रही हैं। यह सब मेरे लिए सामान्य होना चाहिए। मैं अपने विचारों को दबा रहा था परन्तु यह भी महसूस कर रहा था कि मेरे विचार सामान्य स्थिति में न थे। हमारी आज की क्लास समाप्त हो चुकी थी। सभी साथी दिन भर के लिए विदा ले, अगले दिन फिर से  मिलने का वादा करते हुए, जा रहे थे। मैं भी उनके साथ हँसते-हंसाते मुख्य द्वार तक आ गया और फिर गेस्ट हाउस की ओर बढ़ गया। गेस्ट हाउस अधिक दूर न था। केवल दो-तीन मिनिट ही पैदल चलना होता था। गेस्ट हाउस के सामने पहुंच, मैं सड़क की दाहिनी ओर देखने लगा। इधर से ही तो पिंकी आयेगी। ऊपर अपने कमरे में चला जाऊं ?  उसके आने का समय तो हो ही चला है। फिर से नीचे आना होगा। यहीं प्रतीक्षा करता हूँ। कुछ मिनिट ही बीते होंगे कि मैंने दूर मोड़ से एक स्कूटर को अपनी ओर आते हुए देखा। अहा, पिंकी आ गयी है। स्कूटर पास आकर रुका तो एक झटका सा लगा। हेलमेट जिसने उतारा वो पिंकी नहीं उसकी बहन लवली थी। वहीं स्कूटर पर खड़े खड़े उसने कहा, ' अच्छा हुआ आप यहीं मिल गए..  दादा, आज का प्रोग्राम कैंसिल..'  वह हंस रही थी।  ' पिंकी को अपनी किसी सहेली के साथ कहीं ओर जाना पड़ गया है.. सो नॉट टुडे.. मुझे इतनी दूर आपको आकर बताना पड़ा.. ओके बाय.. '  कहकर उसने स्कूटर घुमाया और फुर्र से निकल गयी। मैं कुछ भी समझ न पाया। ऐसा लगा कोई कोई माइक था जिस पर ऊँची ध्वनि में उद्घोषणा हुई थी जिसमें मुझे अपने कमरे में चले जाने, और चुपचाप बिस्तर पर धम से गिर जाने का आदेश था।  
( आज यहीं तक... आगे अगले गुरुवार, यहीं पर )

Wednesday, April 8, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story '-10


                                                            ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                              इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला शुरू है। आज गुरुवार है, अब आगे...    

( १० )   चंडीगढ़ के गेस्ट हाउस के कमरे में अकेला और सुस्ताया मैं, स्मृतियों की गलियों में भटक रहा था कि नीचे से सन्देश आया कि कोई  मिलने आया है। मैं समझ गया कि पिंकी आ गयी है। मैंने संदेशवाहक से कहा कि कह दो आ रहा हूँ। एक कमीज निकाली और पहन ली। क्षण भर बाद न जाने मन में क्या आया, उसे उतार, दूसरी कमीज पहन ली। बाल ठीक किये, शीशे में खुद को निहारा और नीचे उतर आया। पिंकी स्वागत कक्ष में सोफे पर बैठी थी। मुझे देख वह मुस्कुराई और बोली, ' रेडी.. चलें.. ?  मैंने सर हिला दिया। आज फिर मैं झेंप सा रहा था। पिंकी की ड्रेस उस दिन आकर्षक थी। सामान्य पंजाबी लड़कियों की तरह उसने सलवार-कमीज पहनी हुई थी। रंग हल्के के डिज़ाइन जो सफ़ेद रंग पर फैले हुए थे, उस पर खूब फब रहे थे।  यहां चंडीगढ़ में अधिकतर लड़कियों को गहरे रंग की पोशाकों में देखा था। पिंकी को इन हलके रंग के कपड़ों में देखना अच्छा लगा। कुछ तो था जो उसे सामान्य पंजाबी लड़कियों से अलग कर रहा था। मन में एक विचार किसी चमक सा लहराया। अगर पिंकी हल्के गुलाबी रंग की तांत की साड़ी पहने तो बहुत  सुन्दर दिखेगी। वो गोरी और अच्छे कद की लड़की थी, साड़ी उस पर अच्छी लगेगी। पिंकी को बंगाली लड़की की पोशाक में देखने की मेरी कल्पना स्वाभाविक थी। पिंकी और मैं वहां से निकले। वह अपना स्कूटर लेकर ही आयी थी जो उसने मुख्य द्वार के किनारे खड़ा कर दिया था। पिंकी ने मुझसे मुस्कुराते हुए दिन के बारे में पूछा, ' सो, हाऊ वास द डे, बाबू मोशाय ?   ये एक सामान्य सी बात है। लोग अक्सर ऐसे ही बातचीत शुरू करते हैं। राजेश खन्ना ने अपने इस बाबू मोशाय वाले डायलॉग से दुनिया भर के बंगालियों को पहचान सी दे दी है। ट्रैनिंग सेंटर में भी एक जगह अपना नाम लिखते वक्त डेस्क पर बैठे क्लर्क ने मेरा नाम देखकर कहा था, ' आईये, बाबू मोशाय, बैठिये.. पर आज मुझे लगा कि 'बाबू मोशाय' जो एक सम्मानजनक सम्बोधन है, गैर बंगालियों के लिए एक ऐसे चरित्र की पहचान बन गया है जो सफ़ेद धोती-कुरता पहने है, सिर पर घने बाल हैं, बीच से मांग निकाली हुई है। ये चरित्र पढ़ा-लिखा तो है परन्तु तर्क-वितर्क में उलझा हुआ है और आराम पसंद है। मैं सोचता रहा हूँ कि हमारे देश में बंगाली लोगों और बंगाल की संस्कृति को सही पहचान नहीं मिल पाई है। नाना के पास भी जो पंजाब से मित्रजन आते हैं, वे भी कुछ इसी तरह का नजरिया रखते हैं। वे बंगाल को क्रांतिकारियों की भूमि मानते हैं परन्तु ये भी कि बंगाल हर वक्त विरोध की राजनीति करता है। मैं एक दो बार घर आये पंजाबी मेहमानों से इस बात पर उलझ चुका हूँ। अक्सर ये बात यूँ शुरू होती है कि बंगालियों को मछली और चावल दे दो, बस वे खुश रहेंगे। हंसी-मजाक में उठायी गयी ये छोटी सी बात, एक मानसिकता को दर्शाती है। 

पिंकी ने अपना स्कूटर स्टार्ट कर दिया था और वह इशारे से मुझे पीछे बैठने को कह रही थी परन्तु मैं खुद ही में खोया हुआ था। तब पिंकी ने आवाज़ देकर कहा, ' आइये.. साहब.. बैठिये..   मैं जरा लड़खड़ाया और फिर स्कूटर की पिछली सीट पर बैठ गया। मैंने पीछे लगे लोहे के रिंग को कस कर पकड़ लिया। पिंकी निसंकोच हो तेज रफ़्तार में स्कूटर दौड़ा रही थी। मैं कुछ सिमटा सा था और यह भी नहीं कह पा रहा था कि, ' जरा आराम से चलाओ, इतनी जल्दी क्या है ? वैसे मैंने मेरे मन में आयी यह बात शायद पिंकी ने सुन ली थी। उसने अब जो कहा वह मेरी बात का ही तो उत्तर था।  उसने कहा, ' शाम के समय तो यहाँ चालीस-पचास से ऊपर चला ही नहीं सकते.. कितना समय लग जाता है कहीं भी पहुँचने.. '
 घर पहुँचने पर जैसे ही पिंकी ने स्कूटर का हॉर्न बजाया, आंटी ने दरवाजा खोल दिया। लगता है उन्हें आभास था कि बेटी आ गयी है। कहते हैं न कि माँ को अपने बच्चों की गंध मिल जाती है। उन्होंने हँसते हुए मेरा स्वागत किया, ' बेटा कैसे हो ? सब ठीक है न ? '  मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा, ' हाँ आंटी, सब ठीक है..  पिंकी स्कूटर खड़ा कर अपने कमरे में चली गयी। मैं और आंटी भीतर ड्राइंग रूम में आ गए। आंटी ने मुझे सोफे पर बैठने का इशारा किया। मैं कुछ संकोच के साथ बैठा था। आंटी ने मुझे सहज करते हुए कहा, ' आराम से बैठो.. ऐसे क्यों बैठो हो ?  मैं थोड़ा पीछे की ओर सरक गया और पीठ टिका कर बैठ गया। आज मुझे प्रतीत हुआ जैसे अपने ही घर में बैठा हूँ। मैंने कहा, ' आंटी, लवली कहाँ है ?  ' होगी यहीं कहीं ', उन्होंने ऐसे कहा मानों  कहना चाहती हों कि उसका किसी को कुछ पता नहीं होता, वो तो अपनी मर्जी की मालिक है। आंटी किचन की ओर बढ़ गयी, ' चाय लाती हूँ..' कहकर। मैंने सेंटर टेबल के नीचे रखी एक पत्रिका को निकाला और पन्ने पलटने लगा। मैं कोने के दरवाजे को भी कनखियों से देख रहा था। क्या मैं पिंकी का देखना चाहता था ? हाँ, मुझे लग रहा था कि किसी भी क्षण पिंकी कमरे में आ जाएगी। मेरे विचार श्रृंखला को आंटी की आवाज़ से ठोकर लगी। वे चाय लेकर आ गयी थीं। वही ट्रे में सरीखे से सजा कर। उन्होंने एक कप मेरे सामने किया। मैंने पहली चुस्की ली ही थी कि लवली लगभग दौड़ते हुए अंदर आ गयी।  उसने मेरी तरफ झांकते हुए  'हाय' कहा और अपनी माँ के पास बैठ गयी। हमेशा की तरह वह चहचहा रही थी। उसने मुझसे पंजाबी में कुछ कहा और फिर हँसते हुए कहने लगी, ' अब तक हमारी पंजाबी लैंग्वेज इतनी तो आ ही गयी होगी ?  हाँ, सच में इतनी पंजाबी तो मुझे आ ही गयी थी। उसने मेरा हालचाल पूछा। मैंने जवाब में सिर हिलाकर दिया था। थोड़ी देर तक आंटी से इधर उधर की बात हुई तब पिंकी भी आ गयी और आगे बढ़ कर खुद ही चाय ली और कुछ ऐसा भाव दिया कि मानों कह रही हो  ' घर आकर चाय पियो तभी ऑफिस की थकान मिटती है..'  पिंकी के आने पर आंटी अंदर चली गयी यह कहकर की उन्हें बहुत काम हैं। हम तीनों बात करते रहे। मुख्यतः दोनों बहनें मुझसे कोलकाता के बारे में पूछ रही थी। कोलकाता की मिठाई, कोलकाता की भीड़, कोलकाता की ट्राम, पार्क स्ट्रीट, कॉलेज स्ट्रीट और चाइनीज़ फ़ूड। मैं संभल संभल कर बता रहा था। लवली तो हमेशा ही नटखटपने में रहती थी। यहाँ भी उसके मन में कुछ शरारत ही घूम रही थी। मुझे इंतज़ार था कि वह कुछ न कुछ ऐसी बात करेगी ही। जहाँ दो बहनें होती हैं वहां छोटी नटखट और बड़ी समझदार होती है, यह मैं जानता था और समझता भी था परन्तु लवली में मुझे एक शरारती लड़की से कुछ अधिक दिखाई दिया।  शायद इसकी पढाई - लिखाई में रूचि नहीं है, शायद यह समझती है कि उसके पापा पैसे वाले हैं और उनका अच्छा खासा बिज़नेस है। उसे किसी बात की चिंता नहीं है। पिंकी के सम्बन्ध में मेरा विचार  कुछ दूसरा ही बनता जा रहा था। वह पापा के समृद्ध होते हुए भी नौकरी कर रही है। वह सामान्य लड़कियों की तरह रहती है। एक और बात जो मुझे आकर्षित कर रही थी वह थी पिंकी का दूसरों के प्रति संवेदनशील होना। उसका पहले दिन मेरे गेस्ट हाउस में आना और वहां की सुविधाओं की ओर देखना था। मानव की संवेदनशीलता ही इस प्रकार का व्यवहार दिखा सकती है। लवली तो वहां भी उतावलापन दिखा रही थी। मेरा मन खुद में ही उलझता जा रहा था। मेरे साथ ऐसा होता ही रहता है। मैं अपने आप से ही बातें करता जाता हूँ और तर्क-वितर्क के बीच कहीं कुछ ऐसा हो जाता है जो मुझे यानि मेरी सोच की अनियंत्रित आंधी को सामान्य स्तर पर ले आता है। आज फिर ऐसा ही हुआ। लवली चहकते हुए मेरे पास आयी और बोली, ' दादा, आप कभी गुरद्वारे गए हो ? नहीं न ? चलो कल आपको गुरूद्वारे ले चलते हैं ..'  फिर अपने आप ही उसने सारा कार्यक्रम बना दिया। उसके प्लान के अनुसार, पिंकी  शाम को ऑफिस से थोड़ा जल्दी निकलेगी और मुझे गेस्ट हाउस से सीधे गुरूद्वारे ले आएगी। लवली अपने से वहां पहुँच जाएगी। यही नहीं, मिनटों में उसने गुरूद्वारे से आगे का भी कार्यक्रम बना दिया था। वहां से स्कूटर उसके पास रहेगा। वह एक ऐसी जगह की बात कर रही थी जहाँ गोलगप्पे और चाट बहुत बढ़िया मिलते हैं। शुक्र है मुझे पता था कि बंगाल के पुचकों को उत्तर भारत में गोलगप्पे कहते हैं। अगर मुझे पता न होता तो लवली मेरी अज्ञानता पर खिलखिलाने लगती। ये चाट वाली जगह गुरूद्वारे से वाकिंग दूरी पर ही थी। मुझे और पिंकी को वहां पैदल पहुंचना था। हम दोनों शांत थे और लवली के बनाये कार्यक्रम को सुन रहे थे। फिर पिंकी ने मेरी और देखा और हम दोनों ही मुस्कुरा दिए।  इस मुस्कराहट में एक छोटा सा संवाद था कि लवली नाम की इस लड़की के सामने किसी की नहीं चलती। लवली यहीं न रुकी। वह दौड़ते हुए अपनी मम्मी के पास गयी और उन्हें सारा कार्यक्रम बता दिया। आंटी को भी पता था कि लवली की बात को टाला नहीं जा सकता।  मुझे उनकी आवाज़ सुनाई दी।  उन्होंने हलके गुस्से और कुछ नाराजगी भरे स्वर में अपनी भाषा में कुछ कहा था किन्तु मुझे समझ आ गया था। उन्होंने कहा था, ' जो मर्जी आये करो, पढ़ना-लिखना नहीं.. तू किसी की सुनेगी तो नहीं..अपनी बहन से कुछ सीख..  '  
( आज बस, आगे अगले गुरुवार , यहीं पर  .. )

Wednesday, April 1, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' - 9


' टू स्टेट्स - एक कहानी '  ' Two States - A Story '
चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA

इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला शुरू है। आज गुरुवार है, अब आगे..
( ९ ) पिंकी कुछ मिनटों के लिए ही आयी परन्तु मुझे प्रभावित कर गयी थी। वह अपने ऑफिस जाते वक्त मुझे सामान दे गयी थी। ये सोचकर अच्छा लगा कि ये लोग कितने केयरिंग हैं। मेरा भी कितना ख्याल रख रहे हैं। मुझे लगा कि आंटी-अंकल से मिलने और उन्हें थैंक्स देने के लिए उनके पास एक बार हो आना चाहिए। यही सब सोचते हुए मैं गेस्ट हाउस से बाहर निकल आया। यूँ ही पास की मार्किट में टहलता रहा। अचानक एक टेलीफोन बूथ के पास से गुजरा तो मन में आया क्यों न जोगेन्दर अंकल के घर फ़ोन किया जाए ? मैंने उनका नंबर मिलाया। दूसरी ओर आंटी थी। वह खुश हुई और बार-बार पूछती रही, ' बेटा, सब ठीक है न ? न जाने उन्हें लग रहा था कि शायद मुझे कुछ असुविधा है इसलिए मैंने फ़ोन मिलाया था। मैं कहता रहा, 'आंटी, बस यूँ ही फ़ोन कर लिया, आपने सामान भेजा है, सो मन हुआ थैंक्स कहूं.. वैसे मुझे इन चीजों की जरुरत नहीं थी..' इस बात पर आंटी ने कहा, ' मुझे पता है आजकल के बच्चों को किसी भी चीज की जरुरत नहीं होती, पिंकी इन्सिस्ट कर रही थी कि गेस्ट हाउस के बेड शीट्स और टॉवल अच्छे नहीं थे तो वो ऑफिस जाते वक्त लेती गयी..' मैं चौंका, तो पिंकी ने ये अपनी तरफ से किया था ? मैंने बात को बढ़ाते हुए कहा, ' आंटी, किसी दिन आऊंगा मिलने..' उन्होंने जोर देते हुए कहा, ' क्यों ? किसी दिन क्यों ? आज ही क्यों नहीं ? मैं पिंकी को फोन कर देती हूँ, ऑफिस से लौटते वक्त तुम्हें साथ लेती आये, हमारे साथ डिनर करना..' मैं ना नुकर करता रहा परन्तु उन्होंने न मानी। मैं कमरे में आ लेट गया और ये सोचने लगा कि आज पिंकी आयेगी.. कौन सी शर्ट पहन कर उसके साथ जाऊंगा ?
ये प्रतीक्षा भी अजीब होती है। कुछ विशेष न भी हो परन्तु ऐसा लगता है मानों कुछ विशेष होने को है। प्रतीक्षा में आनंद है, प्रतीक्षा में आशा है किन्तु यह आवश्यक है कि हम प्रतीक्षा के क्षणों में खुद से किस तरह से व्यवहार करते हैं ? ये बात न जाने मैंने कहाँ पढ़ी थी ? शायद कहीं नहीं। ये तो मेरे मन की लहरें हैं जो मुझ से अक्सर खेला करती हैं। ये खेल मुझे अच्छा लगता है। मैं खुद से ही बातें किया करता हूँ। बाबा ने मुझे एक बार खामोश बैठा देखा था और शायद मैं काफी समय से अपने में ही था तो उन्होंने मेरे पास आकर जानना चाहा था कि मैं इस तरह से शांत क्यों था ? उन्हें मेरा व्यवहार ठीक न लगा था। उन्होंने मेरी माँ से भी कहा था। माँ ने इसे बेहद हल्के से लिया था। 'अरे ! बच्चा चुप बैठा है तो इसमें अनहोनी क्या है ? उन्होंने कहा और घर के कामकाज में व्यस्त हो गयी थी। लेकिन बाबा चिंतित होते रहे और उन्होंने मुझे घर से बाहर जा मित्रों से मिल आने को कहा। मैंने कहा, ' ठीक है बाबा..' परन्तु फिर मैंने सोचा, चलो, बुआ के घर हो आते हैं.. जब आप सत्य की सौगंध लिए हों तो स्मरण शक्ति भी आप के साथ हो लेती है। इसीलिए तो अपना सत्य लिखते वक्त आज छोटी छोटी बातें, न जाने कैसे मुझे याद आती चली आ रही हैं। ये यादें ऐसे उभर कर आ रही हैं मानों कल की ही बातें हों और अब तक दिल के किसी एक कोने में दुबकी बैठी थी।
अपनी बुआ के पास जाने के लिए घर से निकलने को तैयार होने लगा। बाबा के चेहरे पर संतोष का भाव था। उन्होंने ने सोचा शायद मैं अपने मित्र सुब्रत के घर जा रहा हूँ। उन्होंने अक्सर मुझे उसी के साथ देखा है और उन्हें लगता है कि वह ही मेरा सबसे नजदीकी मित्र है। उन्होंने पूछा, ' सुब्रत से मिलने जा रहे हो ? ' मैंने कहा, 'नहीं, पिशी के घर जा रहा हूँ..' मैं घर से निकल आया। पिशी यानि मेरी बुआ का घर बहुत दूर न था। एक बस सीधी वहां जाती थी परन्तु बसों की भीड़ मुझे पसंद नहीं थी। मैं पैदल ही चलने लगा। पैदल चलने वाले रास्ते में भी भीड़ थी परन्तु किया ही क्या जा सकता है? भीड़ तो भारत की पहचान है। मुझे तब भी ऐसा लगता था और आज भी। मैं भीड़ में बचता बचाता चला जा रहा था। मुख्य सड़क का रास्ता तो लम्बा था परन्तु एक छोटी सी गली से होकर जाने से बुआ का घर काफी करीब था। यह गली केवल पैदल या हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शे के लिए ही उपयुक्त है। सामने से एक रिक्शा चला आ रहा था। उस पर एक युव दम्पति बैठे हुए थे। सजे-धजे, हँसते-मुस्कुराते मानों घर के सोफा पर बैठे हों। रिक्शा वाला उम्रदार व्यक्ति था, शायद सालों से रिक्शा खींचना ही उसका जीवन था। सब शहरों से इस तरह के रिक्शे समाप्त हो रहे हैं परन्तु हमारे कलकत्ता से नहीं। मुझे गुस्सा आ रहा था। पर मैंने सोचा कलकत्ता के रिक्शे बिहार से आये गरीब लोगों को रोजगार दे रहे हैं। ये गरीब लोग और कुछ तो कर नहीं सकते, रिक्शा खींच कम से कम अपने परिवार का पेट तो भर रहे हैं। कभी कभी जब नगर में बरसात का पानी जमा हो जाता है और यातायात के अन्य साधन ठप्प हो जाते हैं तो बूढ़े, बच्चों और बीमार-लाचार लोगों को डाक्टर,स्कूल ले जाने और अन्य आवश्यक सुविधाओं के लिए, यही रिक्शे काम में आते हैं। नहीं, इन्हें कलकत्ता से हटाना उचित नहीं। विचार को आगे बढ़ाते हुए, अगले ही क्षण मैंने सोचा किसी दिन अगर बिहारी मजदूर लोगों ने इन रिक्शों को चलाना बंद कर दिया तो क्या होगा ? क्या बंगाली इस तरह का मुश्किल काम कर सकेंगे ?
मैं संकीर्ण रास्ते से अपने ही विचारों में खोया चला जा रहा था। बुआ के घर जाकर क्या करूँगा, कुछ पता न था। बस समय था और घर से कुछ समय के लिए निकलना था, सो उधर कदम बढ़ गए। आज एकांत में हूँ तो उस संकरी गली को ऐसे याद कर रहा हूँ जैसे कोई खास बात जुड़ी हो। हाँ, बताता हूँ। उस गली के मोड़ पर एक पान-सिगरेट की दुकान थी। न जाने क्या हुआ, मैंने एक सिगरेट खरीदी और दुकान के साथ झूलती और सुलगती रस्सी से उसे जलाया। वो मेरी ज़िन्दगी की पहली सिगरेट थी। मुझे पहले ही दिन सिगरेट पीना कैसे आ गया, समझ न पाया। मुझे न खांसी आयी थी, न ही गले में जलन हुई थी और न ही किसी परिचित द्वारा देखे जाने जैसी भय की अनुभूति हुई थी। मैं सिगरेट के कश ऐसे लेते हुए चला जा रहा था जैसे मैं सिगरेट का पुराना खिलाड़ी हूँ। वैसे मेरे भीतर कोई था जो मुझसे बेखौफ होने को प्रेरित कर रहा था। जो कह रहा था, अबे ! डरना क्या ? सिगरेट तो सभी पीते हैं.. एक न एक दिन तो सिगरेट शुरू करनी ही है.. मेरे मित्र सुब्रत ने मुझे अपनी पहली सिगरेट की कहानी बताई थी कि कैसे उसने छिपकर कश लगाए थे और कैसे उसे एक रोमांच की सुरसुरी सी अपने अंदर महसूस की थी। मुझे ऐसा कुछ भी न लगा था। लेकिन बुआ के घर पहुँचने से पहले मैंने नल से कुल्ला अवश्य किया था और एक मिंट वाली गोली भी अपने मुंह में रख ली थी। सिगरेट की गंध न आये, ये भय तो था मेरे अंदर। बुआ ने ही दरवाजा खोला। मुझे देख उन्होंने हलकी सी आश्चर्य वाली मुस्कान दी और पूछा कि सब कुछ ठीक तो है ? वे संभवत: मेरे बिना सूचना के आ जाने से हैरान थी। फिर उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि क्या मैं इस ओर किसी काम से आया हुआ था ? मैंने दोनों बातों का हाँ और न में उत्तर दिया और अंदर आकर बुआ के बड़े और ऊँचे पलंग पर एक ओर बैठ गया। बुआ ने चाय का पूछा का पूछा। मैंने हाँ कहा तो वो रसोई में चली गयी। मैं बिस्तर पर रखी पुस्तक को उलट पुलट कर देखने लगा। अचानक भीतर के कमरे से इन्द्राणी दी की आवाज़ सुनाई दी। मुझे यही आशा थी कि किसी भी क्षण इन्द्राणी दी दिख जाएँगी। वे बच्चों के स्कूल में पढ़ाती हैं और दोपहर दो बजे तक घर लौट आती हैं। उनका व्यक्तित्व आकर्षक है। वे बातें भी बहुत अच्छी करती हैं और रबिन्द्र संगीत पर भी उनकी पकड़ है। 'अरे ! तुम ? अचानक ? उन्होंने पूछा.. ' बस ऐसे ही, बोर हो रहा था, आपसे मिलने चला आया ' ' मुझे से या अपनी बुआ से ? उन्होंने हँसते हुए कहा। मैं क्या उत्तर देता, इतना कहा, 'आपसे भी और उनसे से भी..' बुआ, चाय-बिस्कुट लेकर आ गयी। वहीं पलंग पर बैठे हुए हमने चाय पी। फिर ऊपर के कमरे में मैं और इन्द्राणी दीदी इधर-उधर की बातें करते रहे। कुछ सिनेमा की, कुछ संगीत की और कुछ उन दिनों के हालात की बातें चली। करीब दो घंटे वहां बीता कर लौट आया। बाहर कुछ दूर तक इन्द्राणी दी मेरे साथ आयी। उन्हें पास की दुकान से कुछ खरीदना था। दुकान से आगे बढ़ने पर उन्होंने मुझे फिर से किसी एक दिन घर आने के लिए कहा और ये भी कहा कि अगले शनिवार की शाम को कुछ साथी घर आने वाले हैं। गीत-संगीत की महफ़िल बैठेगी, तुम भी आ जाना, मुझे अच्छा लगेगा।

( आज यहीं तक, आगे अगले सप्ताह, आज ही के दिन .. )