Chander Dhingra's Blog

Wednesday, May 27, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' -17

                                                  टू स्टेट्स - एक कहानी 
                                 TWO STATES -A STORY
                                                 
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा किया जाता है। आज गुरुवार है, अब आगे...   

( १७ )       ट्रेनिंग को आरम्भ हुए आधा समय बीत चुका था। मुझे ऐसा लगने लगा था कि यह एक सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है। बैंक और अन्य विभागों के अधिकारियों को इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में समय समय पर भाग लेना ही होता है। मुझे पिंकी की बातें याद हो आयी कि सबसे पहले काम के प्रति दायित्व और उत्साह जाग्रत किया जाना चाहिए और उसके बाद ही सेवाओं को बेहतर बनाने के प्रयास होने चाहिए। ट्रेनिंग में आये साथियों से बात होती तो यही निष्कर्ष निकल कर आता कि रूटीन ट्रेनिंग है सो करनी पड़ती है। अधिकतर साथी इसे एक माह की 'पेड लीव'  के रूप में देखते थे। 
उस शाम हम सब दोस्त मिलकर उस प्रसिद्द स्थान पर गए। यह चंडीगढ़ नगर से बाहर की ओर जा रहे मार्ग पर है। गेस्ट हाउस के मैनेजर ने एक छोटी वातानुकूलित बस की व्यवस्था करवा दी थी। यह जगह नगर से लगभग पंद्रह-बीस किलोमीटर बाहर थी। यह एक रिसोर्ट है जहाँ लोग एक दो दिन के विश्राम या मौज़ मस्ती के लिए आते हैं। यहाँ का रेस्टोरेंट बहुत विख्यात है। कहना गलत न होगा कि यहाँ का वातावरण बहुत ही सुन्दर था और हर दृष्टि से विकसित था। उस दिन हमारी क्लास समय से पहले समाप्त कर दी गयी थी। शाम तक हम लोग वहाँ घूमते- घामते रहे। फिर उस प्रसिद्द रेस्टोरेंट में डिनर हेतु गए। हम सभी बहुत प्रभावित थे। जगह महंगी थी परन्तु सभी का यह मानना था कि अच्छी चीज़ चाहिए तो दाम देना ही पड़ेगा। वापिस लौटते समय मैं सोच रहा था कि कल पिंकी को इस जगह के बारे में बताऊंगा और उससे कहूंगा कि उसे भी यहाँ घूमने आना चाहिए। फिर दिमाग ने मेरी हंसी उड़ाई, ' तुम क्या समझते हो, अंकल- आंटी अपनी बेटियों को लेकर यहाँ न आये होंगे ? तुम तो एक शाम के लिए आये हो, वे लोग तो वीक-एन्ड बिताकर गए होंगे.. ' एक बार को मुझे लगा कि ऐसी सुन्दर जगह पर ट्रेनिंग वाले दोस्तों के साथ नहीं बल्कि पिंकी जैसी दोस्त के साथ आना चाहिए। शायद कभी संजोग बन जाये और हम दोनों यहाँ आयें। 

अगले दिन पहले की तरह ही प्रतीक्षागत रहा। मैं सोचता रहा, ऑफिस से लौटते हुए, पिंकी यहाँ मेरे गेस्ट हाउस में आएगी और हम दोनों स्कूटर से उसके घर जायेंगे। मैं क्लास के समाप्त होते ही तैयार हो गया। बार बार घड़ी पर नज़र जाती। समय आगे बढ़ रहा था और साथ ही मेरी बेचैनी भी। देरी होती जा रही थी। पिंकी को अधिक से अधिक छह बजे तक आ जाना चाहिए था। अचानक नीचे गेट से सूचना आयी कि कोई गेस्ट आया है। मैं समझ गया कि पिंकी पहुँच गयी है। एक बार आईने में खुद को देखा, बाल सँवारे और तेजी से गेट की ओर बढ़ आया। बाहर पिंकी तो नहीं थी, अंकल अपनी कार के साथ टिके प्रतीक्षा कर रहे थे। ' मैं इस ओर आया हुआ था, तुम्हें लेते हुआ जाना था..परन्तु काम में थोड़ा विलम्ब हो गया..' उन्होंने कहा और मुझे कार में सामने बैठने का इशारा किया। घर पहुँचने पर देखा कि सभी इंतज़ार कर रहे थे। पिंकी भीतर कमरे में थी। हम लोगों के पहुँचने की आवाज़ पर वो तेजी से बाहर आयी। उसने कहा, ' इतनी देर कर दी.. पापा ही देर से आये होंगे.. मैं ही आपको स्कूटर से लेती आती तो ठीक होता.. ये पापा ऐसे ही काम में फँस जाते हैं और लेट हो जाते हैं..'  पिंकी एक साँस में बोल गयी। जब हम किसी के प्रति उत्सुकता और बेचैनी में होते हैं तो हमें दूसरे में भी इसी तरह के भाव दिखते हैं। मेरी मनस्थिति भी ऐसी ही थी। शायद पिंकी भी मेरी ही तरह उत्सुक थी। मेरी मनस्थिति का एक दूसरा पहलू भी था जो मुझे कह रहा था कि एक बंगाली लड़के के प्रति एक पंजाबी लड़की क्यों उत्सुक और आकर्षित होगी ? मेरे मन का यह पक्ष मुझे भावुक होने से रोक रहा था और व्यवहारकुशल बना रहा था। वह मुझे समझा रहा था कि मुझे पारिवारिक संबंधों की मर्यादा में रहना चाहिए और इससे अधिक कुछ न सोचना चाहिए। 

आंटी ने  बाहर बरामदे  में सबको बुलाया। उन्होंने वहाँ एक ओर कुर्सियां लगा दी थी। बीच में एक छोटी गोल मेज थी जिस पर सुन्दर कड़ाई किया हुआ टेबल क्लॉथ बिछा था। हम सब आराम से बैठ गए। आंटी ने सबको कोल्ड ड्रिंक्स दिया। अंकल ने अपने लिए गिलास में कुछऔर ही लिया, शायद विस्की थी। उन्होंने हल्के से मेरी ओर भी इशारा किया। मैंने मुस्कुराते हुए न कहा। मुझे बच्चों के बीच उनका इस तरह विस्की पीना उचित न लगा परन्तु पिंकी-लवली सामान्य दिख रही थी। लगता है अंकल का इस तरह का गिलास लेना, हर शाम की बात थी। अंकल ने कुर्सी पर टिकते हुए जोर देते हुए कहा, ' तो कौन शुरू कर रहा है ? आंटी ने कहा, ' शुरू तो लवली ही करती है.. लवली को कुछ संकोच नहीं था। उसने हिंदी फिल्म का गाना गाया। पर पिंकी ने मुझे धीरे से बताया कि वह गुरुद्वारों में गया जाने वाले भजन पर आधारित गीत था। लवली की आवाज़ मधुर थी और वह कुछ सुनाने को उत्सुक भी हो रही थी। उसने एक और फिल्म का गाना भी सुनाया। इस गाने को आंटी भी हलके हलके साथ में गुनगुना रही थीं। अंकल ने कहा, ' चलो जी अब बंगाली गाना सुनते हैं..'  उनका इशारा मेरी ओर था। मैं अभी सहज न था। मैंने पिंकी से कहा कि वह कुछ सुना दे, उसके बाद मैं। पिंकी ने क्या सुनाऊँ करते हुए एक फ़िल्मी  गाना सुनाया। लवली की तरह उसका गला भी मधुर था। जो  गाना उसने सुनाया वह एक पुरानी हिंदी फिल्म का प्रचलित गाना था और कई बार सुना हुआ था। वह सहज रूप से गा रही थी। हिंदी गानों मेरी रूचि कम ही है पर न जाने क्यों मुझे पिंकी का गाया यह गाना प्रभावित कर गया था। अब मेरी बारी थी। मैं रबिन्द्र संगीत के एक गीत के साथ तैयार था। गाते गाते मैंने देखा लवली तो चंचल हो रही थी परन्तु पिंकी संजीदा थी और आँखे मूँदकर सुन रही थी। मेरी इस गीत पर अच्छी पकड़ थी। मैं सहजता से गा रहा था। गीत की समाप्ति पर लवली हंसने लगी। ' ये तो दुखभरा गाना था, कुछ मस्ती भरा सुनाइए.. ' आंटी ने उसे चुप रहने को कहा। पिंकी ने इस गीत का अर्थ जानना चाहा, उसने कहा, ' मुझे तो कुछ गंभीर बात सुनाई दे रही थी, इस गाने में... ' मैंने उसे बताया कि इस गीत में अपने मन की अशांति और असंतोष के लिए ईश्वर से क्षमा की प्रार्थना की गयी है। पिंकी क्षण भर को रुकी और फिर सोचने लगी। उसने कहा, ' दादा, एक गाना और..' उसकी इस मांग पर लवली मुंह बनाने लगी, ' एक और इस तरह का गाना  .. मुझे तो नींद ही आ जाएगी..' पिंकी ने कहा कि मुझे इस नादान लड़की की बातों की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए। मैंने एक और रबिन्द्र गीत सुनाया। अंकल-आंटी मौन से बैठे थे मानों घर आये अतिथि के सम्मान में मज़बूर हों। खाना खा, हम सब उठे तो अंकल ने कलकत्ता में सब का हालचाल जानना चाहा।  मैं कहा,' दो दिन पहले माँ से बात हुई थी वैसे तो सब ठीक हैं परन्तु नाना बीमार हैं.. उन्हें इमरजेंसी में हॉस्पिटल में ले जाना पड़ा था.. देखो, अब कल फिर बात करूँगा..'
( आज यहीं तक, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर ) 

Wednesday, May 20, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' -16

                                                     ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हर सप्ताह इस लम्बी कहानी को साझा किया जाता है। आज गुरुवार है, अब आगे...   


( १६ )               पिंकी ने मंगलवार को अपने क्लब के समारोह में मुझे ले चलने को कहा था। सच कहूँ, सोमवार का पूरा दिन मंगलवार की प्रतीक्षा में ही कटा। अगले दिन यानि मंगलवार को सुबह से ही मुझे न जाने क्यों ऐसा लगने लगा कि आज का दिन बहुत व्यस्त वाला है। नाश्ते के समय एक मित्र ने सुझाव रखा कि आज का डिनर कैंटीन में नहीं करते। उसने बताया कि नगर के बाहरी छोर पर एक बहुत प्रसिद्द ढाबा है। बाहर से आये लोग एक बार तो यहाँ के खाने का स्वाद लेने आते ही हैं। सुझाव का सब ने स्वागत किया परन्तु मैंने आवश्यक व्यस्तता दिखाते हुए न कर दिया। मेरे कहने पर उन्होंने ये  कार्यक्रम अगले दिन पर टाल दिया। दिन जैसे धीमी गति से गुजर रहा था। ऐसा होता ही है। जब आप किसी की प्रतीक्षा में हों तो ऐसा लगता है मानों घड़ी की सुइयाँ धीरे-धीरे खिसकते और मुस्कुराते हुए आपको चिड़ा रही हों। घड़ी का इस तरह का बर्ताव मैं पहले भी कई बार देख चुका हूँ परन्तु आज कुछ ज्यादा महसूस हो रहा था। 

 शाम हो आयी। क्लब का फंक्शन है यह सोचकर मैंने अपने बॉक्स से काली टी शर्ट और आकाशी रंग की जीन्स निकाली। मैं पिंकी की प्रतीक्षा में तैयार होकर बैठ गया। समय की पक्की पिंकी आज कुछ विलम्ब कर रही थी या मेरी अपनी आतुरता सामान्य को विलम्ब दिखा रही थी। गेट से उसके आने की सूचना आयी तो मैं तुरंत वहां पहुँच गया। पिंकी ने अपनी घड़ी में देखते हुए कहा, ' सॉरी, थोड़ा लेट हो गयी.. चलो, समय से पहुँचना है.. ' मैं स्कूटर पर पीछे बैठ गया और पिंकी ने स्कूटर को गति दे दी। कुछ ही समय में हम क्लब पहुँच गए। मुझे लगा कि यह जगह अंकल के घर के आसपास ही कहीं है। मैंने पिंकी से पूछा तो उसने बताया कि यहाँ से दस-पंद्रह मिनिट की ड्राइव है। उसने ये भी बताया कि पापा, मम्मी और लवली भी आएंगे। बातों बातों में पता चला कि आज का यह कार्यक्रम क्लब का इनहॉउस कार्यक्रम है जो माह के एक खास दिन को होता है और क्लब के सदस्य या उनके मेहमान ही इसमें भाग लेते हैं। इस कार्यक्रम में कोई कुछ भी सुना सकता है, कुछ भी दिखा सकता है। गाना, नाच कुछ भी। क्लब अच्छा लग रहा था। मेरे बाबा भी कलकत्ता के एक नामी क्लब के सदस्य हैं। बाबा कभी कभार ही वहाँ जाते हैं। मैं और माँ, महीने दो महीने में एक बार तो वहां हो ही आते हैं। मैंने देखा है कि ऐसे क्लब में ज्यादातर लोगों की रूचि बार रूम और कार्ड रूम तक सीमित होती है। यहाँ का क्लब, कलकत्ता के क्लब जैसा बड़ा न लग रहा था परन्तु अच्छा था। साज़-सजावट सुरूचिपूर्ण थी। हमारे पहुँचने के कुछ समय बाद ही अंकल, आंटी और लवली भी पहुँच गए। क्लब में अधिक भीड़ न थी। पिंकी ने बताया कि वीक डे था और शाम का समय होने के कारण इस कार्यक्रम में कम ही लोग आते हैं। जितने भी लोग थे, वे हँसी-ख़ुशी और उत्साह के मूड में दिख रहे थे। हम लोग हॉल की ओर बढ़ रहे थे कि एक सरदारजी ने जोगेन्दर अंकल के सामने आकर हाथ मिलाया और बड़े जोश से मिले। एक दो बातें हुई तो अंकल ने उनसे कहा, ' सेक्रेटरी साहब, आइये आप को इनसे मिलाते हैं..' कहकर अंकल ने मुझे उनसे मिलवाया। वे क्लब के सेक्रेटरी थे। अंकल ने नाना का नाम भी लिया और बताया कि कैसे वे और उनके चाचा आज़ादी के दिनों के साथी रहे थे और देश के नामी फ्रीडम फाइटर्स में जाने जाते हैं। सेक्रेटरी महोदय ने सम्मान के साथ मेरा स्वागत किया, कहा कि ये उनका और क्लब का सौभाग्य है कि ऐसे  सम्मानीय परिवार का एक सदस्य उनके बीच है। मुझ से इंजॉय करने का कहकर वे आगे बढ़े फिर अचानक रूक कर मुझसे बोले, 'आप चाहें तो आज हमें कोई बंगाली गाना सुना सकते हैं..' मुस्कुराते हुए वे अपने काम में व्यस्त हो गए। कार्यक्रम शुरू हो चुका था। हम सामने की दूसरी पंक्ति में बैठे थे। 

पिंकी, लवली और मैं एक साथ बैठे थे। पिंकी मेरी बगल वाली सीट पर थी। उसने धीरे से कहा कि मुझे सेक्रेटरी के सुझाव पर गौर करना चाहिए और एक बंगाली गाना सुना देना चाहिए। मैंने कहा कि ये यहाँ संभव नहीं है। स्टेज पर एक महिला हिंदी फिल्म का एक ग़ज़लनुमा गाना सुना रही थी। उनसे पहले भी एक सज्जन फ़िल्मी गाना सुना गए थे। पिंकी ने जोर देते हुए कहा, ' शर्माने की बात नहीं है.. अगर आप को आता है तो सुना सकते हैं.. घर जैसा ही माहौल है '  मैंने कहा, ' यहाँ नहीं, अलग से बाद में तुम लोगों को सुना दूंगा.. मुझे रबिन्द्र संगीत पसंद है.. पर पता नहीं, तुम लोगों को पसंद आये या न आये..'  पिंकी ने हँसते हुए ओके कहा और तुरंत अपने पापा को ये बात बता दी। अंकल-आंटी खुश हो गए और अंकल ने कहा, ' तो कल ही हो जाये, घर पर महफ़िल..'  मुझे उनका यह झटपट और हाथोंहाथ कुछ तय कर देने का बर्ताव बहुत प्रभावित कर गया। आंटी ने बात आगे बढ़ाई, ' तो फिर अपने बंगाली बाबू को मैं भी अमृतसरी फिश बनाकर खिलाऊंगी..'  मैं समझ न पा रहा था कि क्या रिएक्शन दूँ ? मैंने कहा, 'आंटी, कल नहीं किसी और दिन.. कल तो हम सभी दोस्त कहीं डिनर पर जा रहे हैं ' अंकल ने सुना और एक बार फिर से तुरंत तय कर दिया , 'ओय, ठीक है जी, कल नहीं तो परसों..'  लवली ने ताली बजाकर ख़ुशी जाहिर की परन्तु पिंकी सहज ही रही। लगता है लवली को उसकी मम्मी का अमृतसरी फिश वाला सुझाव बहुत पसंद आ गया था। स्टेज पर कार्यक्रम चल रहा था। मैं अपने आप में एक बार फिर से व्यस्त हो रहा था। मुझे इन लोगों को बंगाली गाना सुनाना होगा, क्या गाऊंगा ? मेरी  तो रबिन्द्र संगीत में रूचि है और मेरी पकड़ भी है। स्कूल, कॉलेज और ऑफिस के कार्यक्रमों में सुनाता रहा हूँ परन्तु यहाँ पंजाबियों के बीच ? इन्हें तो रबिन्द्र संगीत की गहराई ही समझ न आएगी। मेरे पास तो रबिन्द्र संगीत के सिवा कोई चारा भी नहीं है। बीच बीच में पिंकी मुझ से कुछ बात कहती तो मैं जरुरत भर उत्तर दे देता। मुझे लगा कि मेरा यह व्यवहार उसे रूखापन न लग जाये। मैंने अपनी ओर से बात की, ' अंकल -आंटी को कैसे गाने पसंद हैं ? पिंकी ने बताया कि मम्मी-पापा दोनों को पुरानी फिल्मों के गाने पसंद हैं। मुझे लगा अपनी झिझक दूर करने और इन लोगों को प्रभावित करने का यह अवसर है। वहीं बैठे-बैठे मैंने मन ही मन एक रबिन्द्र संगीत का गीत सोच लिया जो मुझे सुनाना चाहिये। यह गीत मैं तीन-चार बार यहाँ-वहाँ सुना चुका हूँ और प्रशंसा भी पा चुका हूँ। मुझे कुछ हिंदी गाने भी आधे-अधूरे याद आये परन्तु उनके बारे में मैं आश्वस्त न था। उसी क्षण मन ने कहा, ' तुम गुलाम अली की वो ग़ज़ल भी सुना सकते हो.. अभी तुम्हारे पास कल का दिन है, तैयार कर लेना..' 

 कार्यक्रम समाप्त होने को था। घोषणा कर दी गयी थी कि अब कुछ अंतिम प्रस्तुतियां ही रह गयी हैं। आंटी को मज़ा नहीं आ रहा था। उन्होंने चलने को कहा। अंकल का मन भी कार्यक्रम में नहीं रम रहा था। वे तुरंत उठ खड़े हुए और उनके साथ ही हम तीनों भी। हॉल से बाहर आ हम लोग लाउन्ज में बैठ गए। आंटी का चाय का मूड था सो चाय मंगवाई गयी। चाय पी हम लोग बाहर निकल आये। तय हुआ कि पिंकी और लवली स्कूटर से घर चली जाएं।अंकल-आंटी कार में मुझे मेरे गेस्ट हाउस छोड़कर आएंगे। अंकल तो चाहते थे कि मैं उनके साथ घर चलूँ और वहां से डिनर कर लौटूं परन्तु मुझे वहीं से सीधा लौटना उचित लगा। उन्होंने मुझे गेस्ट हाउस के गेट पर उतार दिया। गाड़ी को यू टर्न कराते हुए अंकल ने मुझे याद दिलाया कि हम लोग एक दिन बाद फिर से उनके घर पर मिल रहे हैं। 
( आज बस, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर )



Wednesday, May 13, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' -15

                                                     ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे...    
 
( १५ )       मुझे नीचे गेट पर छोड़, पिंकी अपने घर चली गयी। मैं हर बार की तरह अपने बिस्तर पर धम से आ गिरा। यहाँ मेरे पास हॉस्टल का छोटा सा  कमरा और बिस्तर ही तो था जहाँ मैं खुद में सिमट सकता था। मेरा मन अपनी आदत से मजबूर इधर-उधर भटक रहा था। मैं कभी अपनी माँ को याद करता, कभी अपने बाबा को। घड़ी में समय देखा तो अचानक नाना की याद हो आयी। वे अपने कमरे से चिल्ला रहे होंगे, ' रविवार है, एक कप एक्स्ट्रा चाय तो पिला दो ..' आज का अख़बार तो उन्होंने पूरा चबा लिया होगा, अब तक। कुछ कटिंग्स भी रख ली होंगी। संडे का वह स्टेट्समैन जिसका कुछ घंटों पहले तक उन्हें बेसब्री से इंतज़ार था, अब तक कोने में रखी टेबल के नीचे रद्दी में जा चुका होगा। अपने दूर दराज के मित्रों को एक-दो पत्र भी लिखे जा चुके होंगे। उनका रविवार ऐसे ही बीतता है। आज उन्हें लंच में अपनी पसंद की मछली के साथ-साथ गोश्त की भी तड़प रहती है। संध्या में उन्हें कुछ दोस्तों के आने का इंतज़ार रहता है। वे स्वयं इन दिनों घर से कम ही निकलते हैं। उनके गिरते स्वास्थ्य को देख माँ ने उन पर कई तरह की पाबंदियाँ लगायी हुई हैं। कलकत्ता के अपने घर से भटकता हुआ मेरा मन फिर इधर चंडीगढ़ की डाल पर आ बैठा। मैं पिंकी के बारे में सोचने लगा। उसे अपने धर्म और रीति-रिवाजों के बारे में सब कुछ पता है। वह आधुनिक समाज की होते हुए भी परम्परा के साथ बंधी है। माता-पिता से कोई गहरा विरोध नहीं। बड़ों का सम्मान जैसे पारिवारिक संस्कार हों। उसमें दूसरों से भी बहुत कुछ जानने की इच्छा है। मैं देख चुका था कि कैसे उसने बंगाल और कलकत्ता के बारे में अपनी जिज्ञासा दिखाई थी। मैं मन ही मन योजनाएं बनाने लग गया था। जब पिंकी कलकत्ता आएगी तो उसे कहाँ-हाँ ले जाऊंगा और क्या-क्या दिखलाऊंगा ? वो तो मुझे अपने स्कूटर में यहाँ वहां ले जा सकती है, पर कलकत्ता में क्या उसे बस में घुमाऊंगा ? ये ऊँचे लोग हैं, इन्हें बस में ? और वो भी कलकत्ता की बस में ?  सोच कर ही मुझे घबराहट होने लगी। दिमाग ने सहारा दिया, 'अरे चिंता की क्या बात है ? टैक्सी हैं न ? नहीं, टैक्सी बहुत महंगी पड़ेगी..'  खुद को ही मेरा सपाट उत्तर था। फिर सोचा, चाचा हैं उनकी कार और ड्राइवर ले लेंगे। एक दिन में कलकत्ता के सारे विजिटिंग स्पॉट्स हो जायेंगे और दूसरे दिन इधर-उधर। अचानक दिमाग ने मन को डांटा, ' अरे, उसे कलकत्ता आने तो दो.. तब देखा जायेगा.. ' 

छोले-भठूरे स्वयं में पूरा खाना है। मुझे लगा आज लंच को भूल जाना ही बेहतर होगा। परन्तु मैं जानता था बाद में भूख लग जाएगी। मैंने सोचा कैंटीन से कुछ लाकर कमरे में रख लेता हूँ। बाद में भूख लगने पर खा लूंगा। मैं नीचे कैंटीन में गया और उनसे कहा कि मेरा लंच पैक कर के दे दें। कैंटीन का वह लड़का इन कुछ ही दिनों मेरा मित्र जैसा हो चुका था। उसने कहा, ' दादा आप चलिए, मैं लेकर आता हूँ..' वहां से पानी की एक बोतल लेकर मैं ऊपर आ गया। मैंने कपड़े बदल, आरामदायक पजामा और बनियान पहनी। अपने बक्से से एक पुस्तक निकाली। तकिये को सीधा कर टिकाया और पुस्तक के पन्ने उलटने लगा। ये सुनील गंगोपाध्याय की चर्चित बांग्ला पुस्तक थी। मैंने काफी समय पूर्व इसे पढ़ा था परन्तु न जाने क्यों इसे अपने साथ रख लिया था। ये पुस्तक बंगाल नवजागरण से सम्बंधित घटनाओं का कथाकरण है। सुनील गंगोपाध्याय के लेखन से मैं बहुत प्रभावित रहा हूँ। उन्हें बांग्ला के पांच-छह श्रेष्ठम लेखकों में समझता हूँ। मैंने पुस्तक के बीच के किसी एक पृष्ठ को खोल, वहीं से पढ़ना शुरू कर दिया और पढता चला गया। पढ़ी हुई पुस्तकों को मैं ऐसे ही पढता हूँ। कहीं से भी, किसी भी पृष्ठ से। लेखक की शैली में ऐसा वर्णन-सौंदर्य था कि मैं पढ़ी हुई पुस्तक के प्रवाह के साथ बहता चला गया। कैंटीन के लड़के द्वारा दरवाजा खटखटाने पर मेरा यह प्रवाह रुका। मैंने पुस्तक को उसी पृष्ठ पर उलटकर रख दिया। दरवाजे पर कैंटीन का लड़का खड़ा था। वह एक चुस्त और सच्चा गढ़वाली लड़का था। सब उसे किशन कहकर बुलाते थे परन्तु मैं उसे कृष्णा कहता था। उसे यह अच्छा लगता था। एक दिन उसने कहा था, ' मेरा असली नाम तो मेरी माँ जानती है या आप जानते हो.. कृष्णा ..'  खाने को टेबल पर रख मैं फिर से उस पुस्तक में उलझ गया। पढ़ते-पढ़ते कोई सन्दर्भ ऐसा आया कि मैं रुक गया। मुझे लगा कि पिंकी को यह पुस्तक पढ़नी  चाहिए। मुझे लग रहा था कि इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद तो निश्चय ही अब तक नहीं हुआ होगा। हिंदी में ऐसी पुस्तकों के पाठक कहाँ ? इंग्लिश अनुवाद की ' फर्स्ट लाइट ' के नाम से प्रकाशन की योजना थी, यह मैंने कहीं पढ़ा था। मैंने सोचा कि पिंकी को इस पुस्तक को पढ़ने का सुझाव दूंगा। क्यों न उसे एक पुस्तक भेंट स्वरुप दी जाये ? मन ने सुझाव दिया और अपने ही सुझाव पर मैं हर्षित हो उठा। आज शाम को ही किसी बुक स्टोर में जाकर पता करता हूँ। मैं खुद से ही खुश हो रहा था कि क्या उम्दा ख्याल आया है?  खाना तो अनमना सा खाया। एक तो आज भूख न के बराबर थी और दूसरे मुझे रविवार का अपने घर का, बंगाली खाना याद आ रहा था। रविवार के दिन मेरे बाबा घर से दूर गरियाहाट बाजार जाते थे। वे सब्जी आदि तो लाते ही थे परन्तु उनका विशेष फोकस मछली पर होता था। उनका मानना था कि कलकत्ता में सबसे अच्छी मछली तो गरियाहाट बाजार में ही मिलती है। बचपन में मैं भी अक्सर बाबा के साथ रविवार सुबह के बाजार में जाया करता था। मछलियों को देखना मुझे अच्छा लगता था। बाबा बाजार में घूम घूम कर मछली पसंद करते और कई तरह की मछलियाँ खरीदकर लाते थे। 

खाना खाकर मैं कुछ देर के लिए सो गया। शाम को नीचे उतरा तो ट्रेनिंग में आया एक साथी मिल गया। शायद वह भी मेरी तरह अकेलापन महसूस कर रहा था। मैंने पूछा, ' क्या हो रहा है ? उसने कहा, ' कुछ नहीं..सोच रहा हूँ कुछ किया जाये.. चलो कहीं घूमकर आएं .. ' मैंने कहा ठीक है। हम आगे बढ़ गए। दोनों ही चंडीगढ़ की व्यवस्था से प्रभावित थे। इस शहर में कई बातें थी जो कलकत्ता से भिन्न थी। मेरे साथी का भी यही हाल था। वह तो मध्यप्रदेश के भोपाल से आया था और चंडीगढ़ की नगर व्यवस्था की प्रशंसा कर रहा था। मैंने उससे किसी बुक स्टोर में जाने की बात कही। मेरे मन में किसी अच्छी पुस्तक का विचार बार बार आ रहा था। हम ऐसे ही यहाँ-वहाँ भटक रहे थे। एक बुक स्टोर दिखा तो हम अंदर घुस गए। मैंने काउंटर पर खड़ी लड़की से पुस्तक के बारे में पूछा। सुनील गंगोपाध्याय के नाम से ही वह चौंक गयी। उसे पता न था। मैंने अन्य इंग्लिश टाइटल पूछा तो उसने चेक किया और सॉरी कह कर, मुझे कुछ दूसरी पुस्तकों के बारे में बताने लगी। जिन पुस्तकों का वह सुझाव दे रही थी, वे अंग्रेजी की प्रचलित पुस्तकें थी जो सब जगह मिल जाती हैं। कलकत्ता में तो पार्क स्ट्रीट और चौरंगी इलाके में ये पुस्तकें फुटपाथ पर सजे स्टालों पर आसानी से मिल जाती हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि कैसे हमारे समाज का एक प्रभावशाली हिस्सा इन गिनीचुनी अंग्रेजी की पुस्तकों के आधार पर स्वयं को बुद्धिजीवी वर्ग मानने लगा है। मैंने भोपाल के अपने मित्र को कलकत्ता के कॉलेज स्ट्रीट और वहां के पुस्तक बाजार के बारे में बताया। वह आश्चर्यचकित हो गया। मैंने भी सोचा कि पिंकी के कलकत्ता आने पर उसे कॉलेज स्ट्रीट भी दिखाएंगे। चंडीगढ़ के उस बुक स्टोर में मुझे 'गीतांजलि ' का छोटा सा संस्करण दिख गया था। जो मैंने खरीद लिया था। ये एक सुन्दर सा प्रकाशन था जिसके प्रत्येक पृष्ट पर चित्र थे। सोचा, पिंकी के साथ जब अगली मुलाकात होगी तो मैं उसे ये पुस्तक दूँगा। बाजार में समय बिता और चाय पी कर हम दोनों गेस्ट हाउस लौट आये। 

कमरे में जाने से पहले हम दोनों बाहर लगी कुर्सियों पर बैठे। कुछ अन्य साथी भी आ गए थे। सब मिलकर हंसी मजाक करते रहे। मैं अपने ऑफिस की और अन्य मित्र मंडलियों में सरदारजी जोक्स सुनता रहा हूँ। यहां भी इस तरह के जोक्स बीच बीच में आ रहे थे। पहले मुझे कुछ मज़ा आया करता था परन्तु आज मुझे लगा कि जिन लोगों का समाज निर्माण में इतना बड़ा योगदान हो, उन्हें फूहड़ सी हँसी का पात्र बनाना कहाँ तक उचित है ? अचानक मैं सोचने लगा कि मेरी इस नयी और बदली हुई सोच में क्या मेरा पिंकी से मिलना और उसके व्यक्तित्व का मुझ पर पड़ा प्रभाव है ?
( आज बस, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर )


    

Wednesday, May 6, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story '-14


                                                    ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे...    

( १४ )                      गुरूद्वारे से निकलकर पिंकी एक होटल में ले आयी। यह स्थान मुख्य शहर से कुछ दूर लग रहा था क्योंकि स्कूटर पर २०-२५ मिनिट्स लग गए थे। यह होटल ढाबानुमा या हाईवे के रिसोर्ट जैसा था। काफ़ी भीड़भाड़ थी यहाँ। सुन्दर माहौल था। साफ-सफाई भी दिख रही थी। बाहर बहुत सी कुर्सियां, बेंचें और टेबल्स लगी हुई थी। सर्विस करने वाले लड़के चुस्त और स्मार्ट दिख रहे थे। कुछ लड़कियां भी थी सर्विस टीम में। इन सर्विस वालों ने एक जैसी टी-शर्ट पहनी थी। लोग परिवार और बच्चों-बड़ों के साथ आये हुए थे। लग रहा था मानों यह रविवार के लिये आउटिंग का स्थान था। पिंकी खाली टेबल देखने लगी। फिर दूर एक तरफ उसे खाली टेबल दिखी और वह तेजी से उस ओर बढ़ गयी। उसने मुझे भी तेजी दिखाने को कहा। हम दोनों ने उस टेबल के पास रखी कुर्सियों को खींचा और बैठ गए। सर्विस वाला लड़का आया और पानी के दो गिलास रख गया। मैंने आसपास नज़र घुमाई। माहौल बहुत सुन्दर था। फूलों की छोटी-छोटी क्यारियां बनी हुई थी। सलीके से फूलों के बड़े-बड़े पॉट रखे हुए थे। कुछ टेबल्स के ऊपर रंगीन छाते भी थे। पिंकी ने पूछा, क्या खाएंगे ? यहाँ सब कुछ है परन्तु संडे को छोले-भठूरे की डिमांड रहती है..'  मैंने कहा, ' मैंने ये पंजाबी खाना ज्यादा नहीं खाया है.. शायद एक दो बार ही खाया होगा.. '  ' क्या छोले-भठूरे आपके कलकत्ता में नहीं मिलते, चलो, आज खिलाते हैं, आपको..'  पिंकी ने दो प्लेट छोले-भठूरे का आर्डर दिया और मुझसे पूछा ' लस्सी भी चलेगी न ? लस्सी का नाम सुन मैंने तुरंत हाँ में सिर हिलाया। मुझे लस्सी अच्छी लगती है। मैंने कई बार कलकत्ता के लिनसे स्ट्रीट में लस्सी पी है। लस्सी कलकत्ता के कई स्थानों पर स्ट्रीट फ़ूड की तरह मिलती है। छोले-भठूरे आये। सच में बहुत लज़ीज़ थे। मैंने सोचा इससे मिलता जुलता खाना हमारा घुघनी-लुची भी है। उसे भी ऐसे ही घूमते-फिरते खाया जाता है। हमारे आलू-राधा बल्ल्भी भी इसी तरह के खाने में आएंगे। मैंने खाते खाते, पिंकी को कलकत्ता के स्ट्रीट फूड्स और एग-रोल्स आदि के बारे में बताया। ये भी कि कैसे स्ट्रीट फ़ूड कलकत्ता में बहुत प्रचलित हैं और बहुत से ऑफिस में काम करने वाले दोपहर के भोजन के लिए स्ट्रीट फ़ूड पर निर्भर करते हैं। बातों बातों में कलकत्ता की डेकर्स लेन का ज़िक्र भी हुआ। मैंने उसे बताया कि ये छोटी सी गली खाने-पीने के लिए ही प्रसिद्द है। पिंकी बहुत उत्साहित लगी। उसने मुस्कुराते हुए कहा कि जब कभी भी वह कलकत्ता आएगी तो डेकर्स लेन जरूर देखना चाहेगी। उसके इस उत्साह पर मुझे बहुत अच्छा लगा। मैंने कहा, 'कलकत्ता में बहुत कुछ देखने को है, तुम आओगी तो सब जगह घुमाएंगे.. पर क्या तुम सच में आओगी..  तुम तो ऐसे औपचारिकता में ही कह रही हो न ?  ' नहीं-नहीं, मैं तो पापा को कई बार कह चुकी हूँ.. मैंने कई बंगाली नॉवेल्स के इंग्लिश अनुवाद पढ़े हैं.. मैंने डोमिनिक लपिरे की 'सिटी ऑफ़ जॉय' को भी पढ़ा है.. और मदर टेरेसा की लाइफ को भी.. '  मैंने कहा, ' रबिन्द्रनाथ को पढ़ा है ? उसने कहा, ' यू मीन टैगोर ? कुछ शार्ट स्टोरीज पढ़ी हैं.. काबुलीवाला फिल्म देखी है.. उनकी नोबल प्राइज वाली गीतांजलि नहीं पढ़ी..मुझे डर लगता है, कहीं सिर के ऊपर से न निकल जाये..'  हँसते हुए उसने बात आगे बढ़ाई, ' हम सरदार लोग ज्यादा गहरी बातों को नहीं पचा पाते..' 

लस्सी आ गयी थी। मैंने आज तक जितनी भी लस्सी पी थी, ये सबसे ऊपर थी। मैंने मन में सोचा, पंजाब का दूध-दही तो बहुत अच्छा माना जाता है, लस्सी  तो अच्छी होगी ही। मुझे पिंकी की बातें अच्छी लग रही थीं। मैंने रबीन्द्रनाथ वाली बात को आगे बढ़ाया, ' तुम्हें पता है, टैगोर का संगीत भी है जिसे रबिन्द्र संगीत कहते हैं ? उसने अपनी अनभिज्ञता दर्शायी। मैंने कहा, ये बहुत मधुर संगीत है.. कलकत्ता आओगी तो ये भी सुनाएंगे..' उसने कहा, ' कलकत्ता क्यों, तुम्हें आता हो तो यहीं चंडीगढ़ में हो जाये.. मैं मुस्कुरा दिया। मैं जानता था कि रबिन्द्र संगीत पर मेरी थोड़ी-बहुत पकड़ है, कम से कम यहाँ पंजाब के लोगों को तो प्रभावित कर ही सकता हूँ। दूसरे ही क्षण  सोचा ये भंगड़ा और बल्ले-बल्ले का देश है। यहां रबिन्द्र संगीत ? भैंस के आगे बीन बजाने जैसा होगा। आज मुझे पिंकी के साथ समय बिताना अच्छा लग रहा था पर उसने कहा, ' चलें या कुछ और खाने का मन है ?  मैंने कहा नहीं, ' पेट भर गया है, लस्सी तो बहुत रिच और हैवी थी.. चलो, चलते हैं..'  अचानक उसकी कलाई पर पड़े लोहे के रिंग पर मेरी नज़र गयी, ' ये क्या है, सिंगल रिंग ? उसने कहा, ' ये हमारा पवित्र कड़ा है, सिखों के पांच ' के ' बताये थे न ?  उनमें से एक ये है..  मैंने सोचा हमारे यहाँ भी तो बंगाली महिलायें  शाखा पहनती हैं और उसे शुभ मानती हैं।
 पिंकी ने मेरे गेस्ट हाउस के गेट पर जाकर स्कूटर रोका।  ' चलो अब आराम करो, किसी चीज़ की जरुरत हो तो बताना '.. मैं चाहता था पिंकी कुछ देर और रुके। पंजाब और सिखों के बारे में बहुत कुछ बातें मेरे दिमाग में चल रहीं थीं। मैं उससे चर्चा करना चाहता था। लुधियाना में जो उसके चचेरे अंकल थे, उनके पिता और उनके साथियों ने आज़ादी की लड़ाई में बहुत कुछ न्यौछावर कर दिया था। हर तरह की प्रताड़नाएं सही। वे और मेरे नाना एक साथ जेल में भी रहे थे। मैं उनके बारे में भी जानना चाहता था। मैंने हल्का सा झिझकते हुए कहा, 'अब कब मिलेंगे ? उसने कहा, ' जब आपका मन हो मैं आ जाऊंगी, वैसे दो दिन बाद हमारे क्लब में एक कल्चरल फ़ंक्शन है, आप चाहो तो चल सकते हो.. फिर सोचते हुए तारीखों का हिसाब लगाया, ' हाँ, मंगलवार को ही है, पक्का करो तो ऑफिस के बाद आपको लेती चलूंगी..'  मैंने कहा, ' ठीक है, मंगलवार को तैयार रहूँगा.. ' 
( आज यहीं तक, आगे गुरुवार, यहीं पर )