Chander Dhingra's Blog

Wednesday, October 28, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -43

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II-     चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1    ( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )  ( ४३ )         दिन यूँ ही बीतते जा रहे थे। पिंकी से बात होती तो समाप्त होने को न आती थी। इधर रोबी दा मुझे संगठन के कामों में व्यस्त कराते जा रहे थे। मेरी माँ थी जो हर दिन यहाँ-वहाँ ख़रीददारी में लगी हुई थी। बाबा भी अपने ही तरीके से व्यस्त थे। वह अपनी डायरी में न जाने क्या-क्या हिसाब -किताब लिखते रहते थे। वह आते-जाते माँ को कह जाते कि बजट बढ़ता चला जा रहा था। माँ उनकी बात की अनदेखी कर देती और कहती, ' एक ही तो बेटा है, उसकी शादी में ख़र्चा न करोगे तो कब करोगे ? बाबा झुंझला जाते थे। वह खुश तो थे परन्तु न जाने क्यों शंकित और चिंतित रहते थे। बेटे के विवाह-आयोजन में माता-पिता दोनों व्यस्त थे। परंतु दोनों की चिंता में एक तरह का मूलभूत अंतर था जो स्त्री और पुरुष के आध्यात्मिक असहमति को दर्शा रहा था और मुझे पिता के सांसारिक दायित्व भाव के प्रति शिक्षित किये जा रहा था। मैं इन दोनों के मध्य में था। माँ की तरह मुझे भी लगता कि हमें पिंकी के घर वालों को प्रभावित करना चाहिए और विवाह आयोजन में किसी तरह की कमी नहीं दिखानी चाहिए। साथ ही मैं पिता की तरह सोचता कि हमें शानो-शौकत और दिखावे से बचना चाहिए और ख़र्चों को बांध कर रखना चाहिए। एक बार इन्द्राणी से इस विषय पर बात हुई थी। उसने भी माना कि मेरा विवाह धूमधाम से किया जाना चाहिए, विशेष कर इसलिए कि यह सम्बन्ध एक धनाढ्य पंजाबी परिवार से होने जा रहा था। उसने हँसते हुए यह भी कहा कि हम बंगालियों की प्रतिष्ठा दाव पर थी।  एक दिन पिंकी ने बताया कि उसके मामा ने हम दोनों के गोवा यात्रा का प्रबंध कर दिया था। कलकत्ता में होने वाले रिसेप्शन के अगले दिन हमारी फ्लाइट बुक कर दी गयी थी। वहां पांच दिन रहने का कार्यक्रम था। उसने यह भी बताया कि मामा के एक मित्र जिनका गोवा में बड़ा व्यापारिक सम्बन्ध था, सारी व्यवस्था कर रहे थे। मैंने उसे फिर से बताया, ' रिसेप्शन नहीं बहुभात कहो..'  उसने दिन गिनकर बताया कि मात्र दस दिन ही रह गए थे। मैंने कहा कि इतने दिन न जाने कैसे फुर्र से निकल गए थे परन्तु अब एक-एक दिन भारी होता जा रहा था। पिंकी अपने घर और सम्बन्धियों में चल रही हलचल का बताती थी। उसने कहा कि उसके मम्मी-पापा बहुत खुश थे कि एक पढ़ा-लिखा, सुशील लड़का उनका दामाद बनने जा रहा था। उसने लवली के बारे में भी बताया कि वह अपने जीजा से वसूल की जाने वाली चीजों की लिस्ट लंबी करती जा रही थी। मैंने दो-तीन बार लवली से भी बात की थी और मैं जान चुका था कि एक अत्यंत चंचल चरित्र मेरे जीवन में आने वाला था। एक दिन तो उसने अपना नटखटपना दिखाते हुए कहा था कि दीदी तो शादी के बाद ही कलकत्ता आ पायेगी, तब तक मेरा दिल बहलाने के लिए वह आ सकती थी। मैं सामान्यतः ऐसी बातों को सहजता से नहीं ले पाता और संकोच कर जाता हूँ परन्तु उस दिन मैंने उसे कहा चिढ़ाते हुए कहा था कि उसे इतनी दूर आने का कष्ट करने की आवश्यकता न थी क्योंकि दिल बहलाने के लिए कलकत्ता में बहुत लोग थे। वह हूँ.. हूँ.. कहकर मुझे चिढ़ाने लगी, ' दीदी को बताती हूँ.. ये दिल बहलाने वाले लोगों की बात..'  मैं भी हँस दिया था। पिंकी के पापा ने उनकी और से सम्बन्धी-मित्रों में बाटें गए निमंत्रण पत्र हमें भी भेजे गए थे। ये उनकी ओर से हमारे सम्बन्धियों को निमंत्रण था। मैं निमंत्रण पत्र देखता ही रह गया। इतना महँगा, इतना आकर्षक .. माँ ने ये कार्ड्स कुछ खास सम्बन्धियों को भिजवा दिए थे। इन्द्राणी के घर तो मैं स्वयं ही देने गया था। उसने देखा तो मेरी ही तरह आश्चर्यचकित रह गयी थी। वह तो सीधे ही इसके दाम पर आ गयी थी, ' बहुत महँगा होगा न, यह कार्ड.. ' साथ ही उसने इस तरह के महंगे कार्ड को बेकार का खर्चा भी बताया।  अंततः वह दिन भी आ गया जब हमें दिल्ली के लिए राजधानी एक्सप्रेस पकड़नी थी। सुबह से ही घर में चहल-कदमी थी। जो लोग साथ जा रहे थे उनके फोन आ रहे थे। बाबा हमेशा की तरह झुंझलाये हुए थे। वह सबको सीट नंबर और बोगी नंबर बताये जा रहे थे। उनका निर्देश था कि पांच बजे की ट्रैन थी तो दो बजे तक हावड़ा स्टेशन के लिए निकल जाना चाहिए था। उन्होंने कौन किस सीट पर बैठेगा, इसका एक चार्ट भी बना रखा था। माँ यह सब देख चिढ़ जाती और कहती, ' क्या स्कूल के बच्चों का ट्रिप लेकर जा रहे हों ?  बाबा तो हर छोटी-बड़ी बात का ख्याल रख रहे थे। उन्होंने आपात काल के लिए एक फ़र्स्ट-एड टाइप का डिब्बा भी बना लिया था। जब मैंने कहा कि इसकी आवश्यकता नहीं थी तो उनका उत्तर था कि जब हम लेकर जा रहे थे तो ज़िम्मेदारी भी हमारी थी, सफर में किसी की तबियत बिगड़ गयी तो प्रबंध होना ही चाहिए। मैं अपने बाबा को जानता था। मुझे मालूम था कि हमारी कोई कोशिश काम न आएगी। वह अपने हिसाब से यात्रा की व्यवस्था को पुख्ता करते रहेंगे। धीरे धीरे सभी सम्बन्धी स्टेशन पर पहुँच गए और गाड़ी में अपना स्थान लेने लगे। सभी बहुत खुश थे और मुझ पर अपना स्नेह दिखा रहे थे। मेरे चाचा ने कहा कि बंगाली तो हमेशा से वीर रहे हैं और अभी तक हैं। उन्होंने हँसते हुए कहा, ' देखो, हमारे इस वीर पुरुष को, कैसे इसने पंजाबी सिख लड़की को फँसाया है और अपनी ज़िंदगी को एक तरह के खतरे में डाल दिया है..' उनकी इस बात पर सभी की ओर से एक जोर का ठहाका लगा था। माँ ने बात को हल्के में उड़ाने का प्रयास किया, ' हाँ, वीर तो है.. इसके नाना भी तो वीर थे, उन्होंने तो देश को एक समझा था..'  हंसी -मज़ाक और पिकनिक जैसा माहौल था। ट्रैन समय से छूटी तो एक और बैठी मेरी छोटी दादी ने जोर थे प्रार्थना करते हुए दुर्गा..दुर्गा.. कहा और सभी ने उनका साथ दिया। इन्द्राणी बहुत आनंदित थी। उसने तो मुख में ऊँगली घुमाते हुए अशुद्धता को दूर करने वाली परंपरागत ध्वनि निकाली थी।   पूरा सफर आनंद से बीतता चला गया था। यहाँ-वहाँ की बातें होती रही थी। माँ सभी से कुशलता पूछती। ट्रैन में दिए गए भोजन को कुछ ने संतोषजनक कहा तो कुछ ने एकदम बेकार। सालों से बेचारी राजधानी ट्रैन के भोजन के साथ उसके अतिथियों का यही व्यवहार होता चला आ रहा है। कुछ के लिए  अच्छा, कुछ के लिए एकदम बेकार। रात देर तक सभी बातचीत में लगे रहे थे और न जाने कब जाने सो गए थे। सुबह आराम से उठे।  बाबा ने सबसे पहले जानने की कोशिश की कि क्या ट्रैन समय से तो चल रही थी ? उन्हें संतोष हुआ कि ट्रैन विलम्ब से तो थी परन्तु भारतीय समय के हिसाब से ठीक ही थी। हमारे देश में यदि ट्रैन मिनटों में देरी से चल रही हो तो उसे समय से माना जाता है। विलम्ब की श्रेणी में आने के लिए उसे घंटो की देरी करनी होती है। नाश्ता आदि से निवृत हो सभी तैयार होकर बैठे थे। दिल्ली अब कुछ मिनटों की दूरी पर थी। मैं सबसे घुलने-मिलने का प्रयास तो कर रहा था परन्तु सत्य यह था कि मैं बेचैन था। मैं बार बार इन्द्राणी के पास जाकर बैठ जाता था। मेरी बेचैनी उसे दिख रही थी और वह मुझे देख मुस्कुरा देती थी। वह हमेशा की तरह आकर्षित दिख रही थी। माँ उसे प्रोत्साहित कर रही थी कि दिल्ली में उसे ही सबसे आगे रहना था और सब कुछ संभालना था। स्टेशन पर उतरने पर हमने देखा की पिंकी के मम्मी-पापा, मामा-मामी के साथ साथ कुछ और लोग भी आये हुए थे। एक स्वागत का बोर्ड था जिस पर बड़े आकर में अंग्रेजी में वेलकम लिखा था और उसके नीचे मेरा और मनप्रीत का नाम था। जो लोग साथ में आये थे, वे सहायक थे। उन्होंने हम सबका सामान संभाल लिया था। मैंने जोगेन्दर अंकल-आंटी के साथ साथ मामा-मामी के पाँव छुए। उन्होंने मुझे गले से लगाया और आशीर्वाद दिया। स्टेशन के बाहर गाड़ियाँ लाइन से लगी हुई थी। हर गाड़ी पर मनप्रीत-अभिजीत के विवाह की सूचना थी और जिस होटल में हमारे रहने की व्यवस्था थी, उसका नाम था। गाड़ियों का काफिला तेजी से कनॉट प्लेस से होता हुआ, एक नामी होटल में पहुँच गया था। होटल में बारातियों का तिलक और पुष्प गुच्छ से स्वागत किया गया था। भीतर लॉबी में बैठते ही शरबत सर्व किया गया और सब को अपने अपने कमरे की चाबी दे दी गयी थी। सभी कमरे एक ही फ्लोर पर साथ साथ थे। हम सभी व्यवस्था से अभिभूत थे। मामा जी ने मेरे बाबा को एक कागज़ देते हुए बताया कि ये पाँच गाड़ियों के नंबर थे जो तीन दिनों तक हमारे पास ही रहने वाली थीं।  जोगेन्दर अंकल ने माँ से कहा, ' बहन जी, अभी आराम करो जी, सारा प्रबंध यही होटल में है.. लंच, डिनर सब.. कहीं घूमने-फिरने का मन हो तो गाड़ियाँ बाहर लगी हुई हैं..' वे हाथ जोड़कर खड़े थे। उन्होंने कहा कि वे तो लड़की वाले थे जो भी आवश्यकता हो, हुक्म करें। मुझे ये हम तो लड़की वाले हैं, बात सुन अच्छा न लगा था। ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर )

Wednesday, October 21, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -42

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II-    चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1 ( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ) ( ४२ )  हर दिन पिंकी से बात होती थी, हर दिन बाकि बचे दिन गिने जाते थे। इस बीच रोबी दा थे, जो हर दिन कुछ नया बता जाते थे और मुझे कुछ कागज़ात पढ़ने को दे जाते थे। वह मुझे तीन-चार बैठकों में भी ले गए थे। एक बैठक तो संगठन के नाम पर राजनैतिक दल की बैठक थी। मेरे नाना के दो-तीन परिचित वहां मिले थे। उन्होंने मेरे प्रति स्नेह दिखाया था। उन्होंने भी कहीं न कहीं वही बातें कही थी जो रोबी दा कहते रहते थे कि मेरे जैसे युवकों को आगे आना चाहिए और संगठन को सुदृढ़ करना चाहिए। मुझे अच्छा लगता कि नाना का सम्मान किया जाता था हालाँकि कहीं न कहीं मुझे ऐसा भी लगता था कि यह आदर का भाव मात्र औपचारिकता थी क्योंकि नाना को गए अभी अधिक समय न हुआ था और वक्त के साथ सब धूमिल होता चला जायेगा। मैंने जब पिंकी से इन बैठकों में अपने उपस्थित होने का जिक्र किया तो वह तुरंत तो कुछ न बोली पर बाद में उसने एक बात कही थी कि सब काम सोच-समझ के साथ करना ही उचित होता है।  इन दिनों इन्द्राणी भी फोन करती रहती थी और घर भी आती रहती थी। उसने बताया कि कैसे वह मेरी शादी की तैयारी में जुटी हुई थी। उसने शादी वाले दिन के लिए विशेष साड़ी खरीद ली थी परन्तु उस शाम को होने वाली पार्टी के लिए पसंद की साड़ी नहीं मिल रही थी। एक दिन उसने  मेरे साथ हिंदी पिक्चर देखने की योजना बनायी। उसने बताया कि इस फिल्म का रिव्यू टेलीग्राफ में पढ़ा था। वह प्रभावित थी। मैंने हां कर दी और कहा कि मैं ऑफिस से पहुँच जाऊंगा। उसने कहा कि उस शाम का खर्चा उसी के नाम था। मैं उसकी इस बात पर मुस्कुरा दिया था। मैं जानता था कि इस तरह के ख़र्चों में वह मितव्ययी न थी और पहले भी कई बार मेरे लिए खर्च कर चुकी थी। वास्तव में मुझे अपराध बोध सा होता था कि मुझे अपनी पॉकेट हल्की करनी चाहिए थी परन्तु वह हर बार मुझे रोक देती थी और न जाने क्यों मैं रुक भी जाता था। इधर माँ और बाबा भी शादी की तैयारियों में जुटे हुए थे। बाबा ने राजधानी ट्रैन से जाने-आने की सीट्स बुक कर दी थीं। वह सुबह-शाम माँ को याद दिला जाते थे कि जो-जो साथ जा रहे थे उन्हें टिकट का पैसा दे देना चाहिए था और जो नहीं जा पा रहे थे उन्हें समय से बता देना चाहिए ताकि टिकट रद्द करवा सकें और कोई नुकसान न हो। उनकी इन बातों से माँ चिढ़ जाती थी और   कहती, ' सबसे पैसे नहीं लिए जा सकते.. हम लोग साथ ले जा रहे हैं तो हमें ही खर्चा वहन करना होगा..'  बाबा बुड़बुड़ाते हुए, दूसरी ओर निकल जाते थे। मुझे भी लगता कि इस तरह से पैसे लेना उचित नहीं था परन्तु मैंने माँ को कहा कि कोई रिश्तेदार यदि खुद से दे तो ले लेना चाहिए। मैंने यह भी कहा कि यदि इन्द्राणी दें, तो भी मत लेना। माँ ने मेरी बात में सहमति दिखाई और कहा कि वह तो अपने ही घर की सदस्य जैसी थी।   एक दिन बाद इन्द्राणी दी का फोन आया कि फिल्म की टिकट ले ली गयी थी और उसी शाम का शो था। मैंने कहा कि ठीक था मैं पहुँच जाऊँगा, सीधे ऑफिस से। मैंने घर में फोन कर माँ को बताया और फिर पिंकी को भी। अभी फोन रखा ही था कि रोबी दा की तरफ से सूचना आयी कि आज ऑफीस के बाद एक बैठक रखी गयी थी। मैंने उन्हें अपना कार्यक्रम बताया तो उन्होंने कहा कि अच्छा ठीक है, साथ ही यह भी कहा कि अब मुझे संगठन के प्रीति अपनी ज़िम्मेदारी को गंभीरता से लेना चाहिए और सिनेमा आदि से ऊपर उठना चाहिए। वह हल्के से ना खुश दिखे थे। मैंने उन्हें संतुष्ट करने के लिए कह दिया कि यदि पहले से बैठक की  खबर मिल गयी होती तो मैं इन्द्राणी को मना कर देता। इस पर उन्होंने प्रतिक्रिया दी कि संगठन के कार्य ऐसे ही होते हैं। वे किसी पिक्चर रिलीज़ की तरह नहीं होते कि पहले से मालूम हो कि अमुक शुक्रवार को रिलीज़ होना है। मैं उनकी बात पर क्षुब्ध तो अवश्य हुआ परन्तु मुझे लगा कि वे भी तो अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा संगठन के कार्यों पर खपा रहे थे।    शाम को सिनेमा हॉल पैदल ही चलकर पहुँच गया था। मेरे ऑफिस से अधिक दूर न था। मैं इन्द्राणी की प्रतीक्षा करने लगा था। उसको न आता देख, सामने पान की दुकान से एक सिगरेट खरीदी और सुलगाई। मैं सामने की ओर देख रहा था कि पीछे से इन्द्राणी ने आकर, चौंका दिया था। मैंने सिगरेट छुपाने की कोशिश की तो वह हंसने लगी, ' अरे, शरमाओ मत.. जवान हो.. अच्छा खासा जॉब करते हो..सिगरेट तो बनती है..वैसे भी सिगरेट के साथ लड़कों की पर्सनल्टी बढ़ जाती है ..' मैंने कहा, ' ऐसी बात नहीं है दीदी.. आप बड़ी हैं, इसीलिए ..'  उन्होंने इतराते हुए अंदाज़ में कहा, ' ये बड़ा-छोटा छोड़ो.. हम उम्र हैं.. और हाँ, मैंने पहले भी कहा था ये मुझे दीदी-दीदी कहना बंद करो और अब अंदर चलो.. फिल्म शुरू हो चुकी होगी..' वह आगे बढ़ गयी थी। अब अचानक मैंने ख्याल किया कि वह बहुत आकर्षित लग रही थीं। भीड़ में लोगों की निगाहें उन पर थी। वह साँवली सी, अच्छी कदकाठी और सुन्दर नाक-नक्शे वाली लड़की थी। पिक्चर हॉल में मैंने उन्हें यह बात बताई तो वह खुश हो गयी थी, ' अच्छा है यदि मैं लोगों को आकर्षित करती हूँ..यह तो एक तरह का कॉम्पलिमेंट है, किसी भी लड़की के लिए..' पूरी फिल्म में वह बहुत आनंद लेती हुई लगी। फिल्म की कहानी नायक के इर्दगिर्द घूमती है जिसे दो बहनें प्यार करती हैं परन्तु वह अपने पारिवारिक पृष्ठभूमि और उसके पिता की हत्या के मानसिक तनाव के कारण बदले की भावना से ग्रस्त होते हुए, उन लड़कयों में से एक की हत्या कर देता है। वह अपने इस कार्य को उचित मानता है क्योंकि लड़की के पिता ने वर्षो पूर्व उसके परिवार के साथ अन्याय किया था और उसके पिता की हत्या कर, उनका सब कुछ हड़प लिया था। इन्द्राणी को फिल्म अच्छी लगी थी। उसे फिल्म के नायक की भूमिका प्रभावशाली लगी थी। साथ ही वह दोनों नायिकाओं की भी प्रशंसा कर रही थी जो इस फिल्म से पहली बार हिंदी फिल्म जगत में प्रवेश कर रही थीं। वो कह रही थी कि उन्हें बहुत आनंद आया था । फिल्म समाप्त होने पर बाहर आये तो इन्द्राणी ने खुद को स्थिर करने का प्रयास किया। एक अद्भुत सी चमक उसके मुख पर बिखरी जा रही  थी जो उनके मन में उठ रही चंचलता को साफ प्रदर्शित कर जाती थी। रात का खाना पार्क स्ट्रीट के एक मशहूर चाइनीस रेस्टोरेंट में किया था। वह बहुत खुश थी। उसने चुटकी लेते हुए कहा,' आज तो सच में मज़ा आ गया..पिक्चर भी अच्छी थी, डिनर भी अच्छा रहा और सबसे बड़ी बात, साथी भी अच्छा था.. कॉलेज के दिन याद आ गए '  टैक्सी ने पहले उसे घर उतारा था और बाद में मैं अपने घर पहुंचा था। उस ने उतरने से पहले कहा कि अब तो मेरी शादी हो जाएगी और मैं अपनी पत्नी के साथ व्यस्त हो जाऊँगा इसलिए हमें ये जो कुछ दिन हैं, साथ साथ बिताने चाहियें। जैसे ही मैंने मुस्कुराते हुए हाँ कहा तो उसने अगले रविवार के लिए एक नया कार्यक्रम बना दिया, ' अगले सप्ताह इसी नायक की एक नयी फिल्म आ रही है..ये एक बड़े बैनर की फिल्म है और लगता है कि इसमें नए अंदाज़ की कहानी है.. मैं टिकट बुक करा देती हूँ.. ' इन्द्राणी एक साँस में कह गयी और ओके कह, हाथ हिलाते हुए घर में घुस गयी। ( आज यहीं तक, अगले गुरुवार आगे, यहीं पर )

Wednesday, October 14, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-41

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II-     चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1    ( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )( ४१ )         मैंने सोचा अब ये किस झमेले में मुझे फंसा रहे हैं, रोबी दा ? मैं तो एक ही जगह फंसना चाहता था और वह था विवाह। मैं सब कुछ भूल अपने ऑफिस के कार्य से जूझना चाहता था परन्तु मेरा मन स्थिर न हो पा रहा था। टेलीफ़ोन की ओर दृष्टि जाती, हाथ बढ़ता और रुक जाता था। ऐसा कुछ समय तक होता रहा था। अंततः मैंने चंडीगढ़ का नंबर घूमा ही दिया था। पिंकी भी अपने ऑफिस में मेरी ही तरह बे चैन सी थी। हालाँकि उसने कहा कि वह सामान्य थी। मैंने उससे पूछा कि शादी के बाद कहाँ जायेंगे ? वह हंसने लगी, ' अरे ! तुम्हें तो हनीमून कहने में भी शर्म आ रही है ? मैंने कहा कि हाँ वही। वह हँसे जा रही थी। उसने कहा,' कहीं न कहीं चले जायेंगे, क्या फर्क पड़ता है, वैसे मामा जी कहीं विदेश जाने की बात कर रहे थे, कुआलालंपुर या बैंकॉक..' मैं चौंका, ' अरे नहीं,यहीं कहीं भारत में ही जायेंगे, बहुत अच्छी-अच्छी जगह हैं.. दार्जिलिंग ? वह जोर से हंसी, 'अपने बंगाल से बाहर नहीं निकलोगे क्या ? दार्जिलिंग तो कभी भी जा सकते हैं.. गोवा कैसा रहेगा ?  मैंने कहा कि गोवा ठीक था। हम दोनों इसी तरह की बातें करते जा रहे थे। पिंकी ने कहा कि ऑफिस का फोन था इसलिए हमें गपशप के लिए इस पर चिपके नहीं रहना चाहिए था।  मैंने कहा, ' छोड़ो इस बात को, फोन मिला है तो लाभ उठाना चाहिए.. वैसे भी हमें सैलरी हमारे काम के हिसाब से कहाँ मिलती है.. '  फोन कॉल समाप्त करने से पहले मैंने उससे वायदा लिया कि प्रतिदिन एक बार मुझे फोन अवश्य किया करेगी। मैं काम में जुट गया। मैं खुश था और अनायास एक प्रसिद्द फ़िल्मी गाने को गुनगुनाए जा रहा था। कहा जाता है कि यदि गृहिणी रसोई में और अधिकारी अपने कार्यालय में गाना गाते हुए काम करते दिखें तो समझ लेना चाहिए कि वे संतुष्ट हैं। मैं काम में लगा रहा। संध्या होते और ऑफिस के बंद होने से पहले रोबी दा का सन्देश आया कि आज मुझे उनके साथ कहीं जाना होगा। उन्होंने कहा कि मुझे अपनी माँ को सूचित कर देना चाहिए कि आज घर लौटने में कुछ विलम्ब हो सकता था। मैंने  माथा पकड़ लिया किंतु बाद में सोचा कि रोबी दा भी तो संगठन के लिए अपना इतना समय देते थे तो हमें भी उनका साथ देना चाहिए। मैंने माँ को फोन कर बता दिया था। माँ कुछ नाराज़ हुई परन्तु मान गयी कि रोबी कुछ कहे तो मानना ही होगा, वह भी तो मेरे नाना की हर बात मानते रहे थे। शाम को रोबी दा के साथ संगठन की एक बैठक में जाना पड़ा। यह नगर के संगठनों की समन्वय समिति की बैठक थी। करीब बीस लोग होंगे। मैं चुपचाप एक ओर बैठा था। अधिकांश बुजुर्ग लोग थे और बातचीत कुछ ही लोगों के मध्य ही हो रही थी। मुझे जो समझ आया वो ये था कि केंद्र की सरकार कुछ ऐसी नीतियों पर कार्य कर रही थी जहाँ समस्त व्यवस्था नष्ट हो जाने वाली थी और इसका विरोध किया जाना आवश्यक हो चुका था। मैंने देखा कि रोबी दा की बात को महत्व दिया जा रहा था। रोबी दा ने युवा शक्ति को प्रोत्साहित किये जाने की बात की और फिर मेरी ओर इशारा कर मेरा परिचय दिया था। मुझे अचानक खड़ा हो जाना पड़ा और मुस्कुराते हुए, सभी को नमस्कार करना पड़ा था। यह बैठक लगभग दो घंटे तक चली थी। इस बीच प्लास्टिक के कप में चाय और बिस्कुट बांटे गए थे। थकावट के  कारण ये  चाय-बिस्कुट एक तरह का आराम दे गए थे। बाहर आने पर रोबी दा ने बताया कि वरिष्ठ लोगों पर मेरा प्रथम परिचय प्रभावशाली रहा था। मैं क्या समझता ? बस उनकी बात पर मुस्कुरा दिया था। ये वो दिन थे जब वामपंथी विचार धारा की लहर अपने उफान पर थी। पश्चिम बंगाल में तो विशेष रूप से इसका प्रभाव था। इस विचार धारा के राजनैतिक दल संयुक्त हो एक मोर्चा बना, राज्य की बागडोर संभाले हुए थे। शिक्षण संस्थानों, कर्मचारी और व्यापारिक संगठनों में इन्हीं का वर्चस्व था। बसों, ट्रकों और अन्य वाहनों, यहाँ तक कि रिक्शाओं पर भी लाल झंडे लहराते दिखते थे। मौसम की मार झेलते-झेलते अधिकांश झंडे चीथड़ों में बदल जाते थे। उन्हें केवल किसी बड़े आयोजन के अवसर पर ही बदला जाता था। इस राजनैतिक परिवर्तन से मैं भी, बहुत से बंगाली युवाओं की तरह प्रभावित था और मुझे लगता था कि राज्य में एक नया युग आने को था और सब कुछ बदल जाने वाला था। कॉलेज में, मैं वामपंथी विद्यार्थी संघ का सदस्य रह चुका था। आज की इस बैठक में मैंने महसूस किया था कि रोबी दा सही कह रहे थे कि परिवर्तन की इस लहर को सशक्त करने हेतु युवा लोगों को आगे आना चाहिए। घर पहुँचते पहुँचते काफी विलम्ब हो गया था। माँ-बाबा दोनों प्रतीक्षा में थे। मुझे देखते ही वे दोनों बोल उठे, ' चलो हाथ धो लो और खाना खा लो.. हम लोग भी इंतज़ार में भूखे बैठे हैं..'  मैं उनके साथ बैठ गया था। भूख तो मुझे भी लगी ही थी। बैठते ही मैंने पूछा, ' किसी का फोन तो नहीं आया था ?  माँ मुस्कुरा दी और कहा कि किसी का फोन नहीं आया था। खाना खाते हुए कुछ अधिक बात नहीं हुई थी। बाबा ने हलके से सलाह देते हुए कहा, ' संगठन आदि के साथ जुड़ना ठीक है परन्तु अपना लक्ष्य सामने रख, आगे बढ़ना चाहिए..कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जिन पर चलने से, वापिस लौटना असंभव सा हो जाता है..' मैं चुपचाप खाता  रहा। मुझे पता था कि माँ-बाबा खाना खा, लगभग दो घंटे तक नीचे ही रहते थे। यही समय था जब मैं ऊपर उनके कमरे में जा पिंकी को फोन कर सकता था। मैं ऊपर चला आया और चंडीगढ़ का नंबर घुमाया। आंटी ने फ़ोन उठाया और बेटा-बेटा कह बात करने लगी। वह मेरी माँ के बारे में बार-बार पूछ रही थी। कुछ समय बाद पिंकी ने फोन संभाला। उसने कहा कि वह शाम से ही प्रतीक्षा में थी। मैंने उसे दिन भर का वृतांत बताया। वह चुपचाप सुनती रही और अंत में कहा कि मुझे इन सब राजनैतिक और यूनियनबाजी की बातों से अलग रहना चाहिए था। फिर इधर-उधर की बातें हुई। हम दोनों ही आने वाले दिनों के प्रति उत्सुक थे और न जाने क्या-क्या सपने बुन रहे थे।  अगले दिन फिर बात होगी कह, फोन रखा ही था कि वह फिर बज उठा। यह इन्द्राणी का फोन था। उन्होंने बात कुछ इस तरह से आरम्भ की, ' ये क्या अभी तो सिर्फ मिनी सगाई ही हुई है और हमें भूल भी गए ? मैंने कहा, यह मिनी सगाई क्या होती है ?  ' अरे वही तुम्हारा पंजाबी रोका न ठाका ..' वह हंसने लगी। उन्होंने फिर से पिंकी की फोटो, उसकी सुंदरता और आकर्षित कर देने वाली भाव-भंगिमा की बात की थी और कहा कि वह जल्दी-से जल्दी पिंकी से मिलना चाहती थी। उन्होंने कुछ दिन गिने और कहा कि अब भी बत्तीस दिन बचे थे। अचानक मुझे भी लगा कि इतने दिन कैसे कटेंगे ?( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर .. )

Wednesday, October 7, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 39 & 40

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II-     चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1    ( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )( ३९ - ४० )      रात के खाने पर फिर से वही बातें शुरू हो गयी थीं। मुख्य बात यह थी कि कलकत्ता से कौन-कौन दिल्ली जायेगा ?  अब जो नाम आये वे सब मिलाकर पंद्रह हो रहे थे। इन्द्राणी अपनी एक सहेली को भी साथ ले जाना चाहती थी। बाबा ने तो साथ ही साथ हाँ कर दी थी परन्तु माँ ने बात को बनाते हुए, ' बाद में देखेंगे ' कहकर लगभग इसे निरस्त ही कर दिया था। एक बात यह भी आड़े आ रही थी कि अमीर लोगों से सम्बन्ध बन रहा था, इसी हिसाब से, वर पक्ष वाले लोगों को तय किया जाना चाहिए था। ये बात बाबा के एक पुराने मित्र को साथ ले जाने के साथ उठी थी। मैं उनको जानता था और काका कहकर बुलाता था। वह बाबा के स्कूल के दिनों के साथी थे। बाबा को वह और उनका परिवार बहुत प्रिय था। वह विद्वान किंतु अपने में ही सिमटे रहने वाली प्रकृति के व्यक्ति थे। उनका बाहरी व्यक्तित्व, आजकल के प्रचलन के हिसाब से प्रभावित करने वाला न था। माँ उन्हें अधिक पसंद नहीं करती थी। मैं भी प्रारम्भ में माँ की  ही तरह सोचा करता था परन्तु जब से मैंने उनसे बातचीत करना शुरू किया था, मैं उनसे धीरे-धीरे प्रभावित होता चला गया था। बांग्ला साहित्य पर उनकी बहुत अच्छी पकड़ थी। वह कविता भी लिखा करते थे। यदाकदा उनकी कविता प्रकाशित भी होती थी। उनका लेखन प्रभावशाली था परन्तु उनका नाम न हो पाया था। उनका नाम हो जाता तो शायद उनके प्रति माँ का नज़रिया भी बदल जाता। मैंने बाबा का साथ देते हुए कहा, ' बाबा चाहते हैं तो उन्हें ले ही जाना चाहिए..' माँ ने कुछ न कहा था, बस मेरी बात को अनसुनी कर कमरे से निकल गयी थी। किसी बात को अस्वीकार करने का यह माँ का अपना तरीका था। मेरे बाबा भी चुपचाप अपनी डेस्क पर रखी पुस्तक के पन्ने पलटने लग गए थे। अपनी नाराज़गी और निराशा दर्शाने का यह उनका भी यही तरीका था। इंद्राणी ने एक सुझाव रखा कि सभी संभावित नामों का रेल रिजर्वेशन करवा लेना चाहिए और बाद में आवश्यकता अनुसार रद्द करना सरल होगा। इस प्रकार बीस लोगों के नाम लिस्ट में रखे गए थे।  अगली सुबह ऑफिस जाने का मन न हुआ था। मैंने माँ को कहा कि मेरा लंच पैक न करें। माँ हैरान हो गयी थी। वह हमेशा मुझे घर का खाना ही खाने की सलाह दिया करती थी। वह कहने लगी कि घर से ही ले जाओ। मैंने जब बताया कि आज छुट्टी ले रहा था तो वह मुस्कुराने लगी। माँ जब नीचे उत्तरी तो मैंने तुरंत उनके कमरे में जाकर फोन घुमाया। अभी सुबह के साढ़े सात ही बजे थे परन्तु मैं उतावला हो रहा था क्यों कि रात को दोबारा फोन न कर पाया था। साथ ही मुझे पता था कि दोनों बहनें इस समय तक जॉगिंग करके घर आ चुकी होंगी। पिंकी ने ही फोन उठाया। वह नाराज़गी दिखाने लगी कि वह रात को फोन का इंतज़ार करती रही थी। मैंने उसे रात की सारी घटना बताई। उसने कहा,' मम्मी को तुम्हारे घर पर बहुत अच्छा लगा, तुम्हारी मम्मी भी बहुत स्वीट लगी.. और पापा तो लगता है वहां पर लंच खाकर मस्त हो गए.. ऐसा क्या खिलाया था ?  मैंने कहा, ' यहाँ का एक मशहूर होटल है जिसे पंजाबी ढाबा कहते हैं, वहीं से खाना आया था..' उसने तुरंत कहा कि उसे भी वहां का खाना खिलाना पड़ेगा। मैंने कहा, ' जरूर.. तुम आओ.. और क्या कहा मम्मी-पापा ने ?   उसने कहा, ' कुछ खास नहीं, यही कि सब ठीक था और तुम बहुत शरमा रहे थे..'  इस बात पर मैंने कुछ उत्तर नहीं दिया।   मैंने ऑफिस से छुट्टी ले ली थी तो घर पर मानों सभी छुट्टी पर थे। बिशाखा आराम से थी, माँ अपनी आरती-पूजा धीरे-धीरे कर रही थी। मैंने मन में सोचा, ' देखो, मेरे छुट्टी लेने से ईश्वर को भी आराम मिल गया है, उनका भोग आदि भी ठीक से लगाया जा रहा है..' अपने बिस्तर पर सुस्ताया सा मैं, कल्पना जगत में भ्रमण कर रहा था और अपने आसपास पिंकी की चहल कदमी महसूस कर रहा था। कल शाम से ही मुझे ऐसा लग रहा था कि वह हमारे घर आ चुकी थी। सोचा कुछ समय बाद उसके ऑफिस में फोन करूँगा और उसे अपने मन की स्थिति बताऊंगा। दो घंटे यूँ ही कट गए। बाहर कुछ समय के लिए आस-पड़ोस का चक्कर लगा आया था। एक सिगरेट भी फूंकी थी। घर आ सीधे पिंकी के ऑफिस का नंबर घुमाया। पता चला वह आज ऑफिस आई ही न थी। अब घर का नंबर घुमाया। पिंकी ही थी दूसरी ओर। इससे पहले कि मैं कुछ कहता, वह ही बोली,' आज ऑफिस क्यों नहीं गए ? मैंने कहा, ' तुम्हें कैसे पता चला ?   ' अरे, अभी-अभी तुम्हारे ऑफिस के नंबर पर कॉल किया था ..' उसने कहा। मैं हंसने लगा। उसने हंसने की वजह पूछी। मैंने बताया कि मैंने भी उसके ऑफिस के नंबर पर फोन किया था। अब वह भी हंसने लगी। दोनों ओर एक सा ही हाल था। दोनों काफी देर तक बतियाते रहे थे। माँ ने आकर लंच के लिए बुलाया। फोन पर मुझे देखा तो कहा, ' इतना भी ज्यादा फोन नहीं किया करते.. इतनी आतुरता दिखाओगे तो बाद में संभाल न पाओगे..' मैं माँ की बात में छिपे संकेत को समझने का प्रयास करने लगा।  लंच हो जाने के बाद, मैं घर के भीतर ही इधर से उधर होता रहा था। कभी सोफे पर, कभी बिस्तर पर, कभी बालकनी पर, कभी रसोई घर में। एक असंतुलित सी स्थिति हो रही थी। मैं अपने घर में तो अवश्य था परन्तु मेरा मन एक अस्थाई से बंजारापन से गुजर रहा था। मैं समझ न पा रहा था कि मैं  प्रसन्न था या अधीर हो रहा था ? मैंने देखा कि माँ नीचे के कमरे में ही विश्राम कर रही थी। उसकी आँखे नींद से बोझिल हुई जा रही थी। मुझे मालूम था, वह अब नींद से लगभग एक घंटे बाद ही उठेगी और बिशाखा को चाय हेतु आवाज़ लगाएगी। मैं ऊपर गया और फोन उठाया। फिर न जाने क्या सोच रख दिया। माँ के बिस्तर पर, यूँ ही लेटा रहा। एक बार पुनः फोन की ओर हाथ बढ़ा और रुक गया। शायद माँ की कही बात का दबाव बन रहा था। अचानक फोन की घंटी बजी। मैं फोन के लिए लपका, लगा जिसे मैं फोन करना चाहता था, उस ही का फोन होगा। मैंने हेलो कहा तो उधर से रोबी दा की आवाज़ सुनाई दी। मैंने खिन्न होते हुए कहा, ' हाँ, रोबी दा.. आज मन नहीं हुआ ऑफिस आने का..' उन्होंने चिंता का भाव दिखाया कि मेरे न आने से वह चिंतित हो गए थे। उन्होंने कहा, ' घर में सब ठीक है न ?  इससे पहले कि मैं उन्हें कुछ बताता उन्होंने मुझे आश्वस्त करना आरम्भ कर दिया कि वह मेरी माँ का समझायेंगे और मेरी समस्या को सुलझा देंगे। मैं कहता रह गया कि सब ठीक था। उन्होंने यह कह कर फोन रख दिया कि वह आज शाम को मेरे घर आएंगे। मैंने सोचा, ' लो अब ये घर आकर न जाने क्या-क्या बात करें..' शाम को वह समय से आ ही गए। माँ से बात करते हुए उन्होंने इस तथ्य पर जोर दिया कि बच्चों को अपने माता-पिता की सलाह को अवश्य मानना चाहिए। उनका कहना था कि माता-पिता बच्चों का भला ही चाहते हैं। माँ, उनकी हाँ में हाँ मिलाती रही परन्तु कहा कि आजकल के बच्चे खुद में बहुत समझदार हैं और उनकी बात को ना कारा नहीं जा सकता। फिर उन्होंने बताया कि उन्होंने मेरी पसंद की पंजाबी लड़की को अपनी बहु बनाने की स्वीकृति दे दी थी। इस पर रोबी दा मेरी ओर देखते हुए कहा, ' इनकी ख़ुशी ही हमारी ख़ुशी है..'  रोबी दा मामले के ऐसे सरल से अंत के लिए तैयार न थे। वह संभवत: एक प्रभावशाली मध्यस्थ की भूमिका  के लिए तैयार होकर आये थे। उन्हें आशा थी कि वह, मेरे और माँ के बीच होने वाले कुछ गरम तर्क-वितर्क में एक निर्णायक की भूमिका निभाएंगे। उनके चेहरे पर निराशा के भाव थे। उन्हें कर्मचारी यूनियन के नेता होने के कारण समस्या का सरलता से समाप्त होना या किया जाना, आघात सा दे गया। वह जाने को उठे और मेरी ओर कुछ ऐसे अंदाज़ में देखा मानों कह रहे हों, ' मुझे अनभिज्ञ रख, तुमने ठीक नहीं किया..' रोबी दा माँ को प्रणाम कर घर से निकल गए। एक तरह की हताशा उनके चेहरे पर दिखाई दे रही थी। मैं उन्हें नीचे तक छोड़ने आया था। उन्होंने कुछ अधिक बात नहीं की थी। हँसते हुए मुझसे पूछा, ' कल तो ऑफिस आ रहे हो न ? मैंने हाँ कहा तो उन्होंने कहा, 'ठीक है, कल मिलना..'  उनकी कार निकल गयी। मैं सोचने लगा कि अब इनकी बे वजह की नाराज़गी को दूर करना होगा। मैं कर ही क्या सकता था। सब कुछ ऐसी सरलता से होता चला जायेगा, यह तो मैंने कभी सोचा ही न था। घर में शायद विरोध हो, इसलिए रोबी दा और इन्द्राणी को बताकर रख दिया था। मुझे ऐसा लगा था कि आवश्यकता होने पर ये दोनों मेरी तरफदारी करेंगे और मेरी माँ को राजी करवा लेंगे।   रात को एक बार फिर से चंडीगढ़ में फोन किया। इस बार लवली ने उठाया और वह खिलखिलाते हुए मज़ाक  करने लगी। वह जीजाजी - जीजाजी कर रही थी। उसने मज़ाक में कहा कि वह तो सोचती ही रह गयी और बिग सिस्टर हाथ मार गयी। लवली एक साली की तरह पेश आ रही थी। उसने फोन छोड़ने से मना  कर दिया था। मैं बार-बार कहता रहा, ' पिंकी को फोन दो..' और वह हँसते हुए इधर-उधर की बातें किये जा रही थी। अंत में मैंने कहा, ' मैं फोन रख रहा हूँ..' अब  उसने पिंकी को बुलाया और उसे फोन दिया। मैंने उसे दिन भर की बातें बताई। रोबी दा के बारे में सुन वह हंसने लगी। उसने कहा कि ऐसे लोग सब जगह होते हैं। उसने यह भी कहा कि वह उन्हें रोबी दा नहीं कहेगी और मिस्टर रवि कहेगी। रोबी शब्द उसे धोबी जैसा लग रहा था। मैंने कहा कि यदि उसे हर रोबी शब्द में धोबी शब्द दिखेगा तो यह अच्छी बात न होगी। बातों बातों में मैंने उसे कहा कि मैं एक सीधा-सादा विवाह चाहता था, आडम्बर भरा नहीं। उसने कहा कि चाहती तो वह भी थी कि दिखावों से दूर रहा जाये परन्तु उसके मामा ने बहुत से सपने सजा रखे थे। उनके लिए यह उनकी अपनी ही बेटी का विवाह था। इसीलिए इसे चंडीगढ़ की जगह दिल्ली में आयोजित किया जा रहा था जहाँ सब कुछ उनकी इच्छानुसार ही होने वाला था। उसने ये भी बताया कि दिन में गुरूद्वारे में विवाह की रस्म के बाद, शाम को एक पांच सितारा होटल में पार्टी का कार्यक्रम निश्चित किया गया था। मैं ना-ना कहता रहा परन्तु मेरे भीतर कहीं उत्साह भी था। मैंने उसे बताया कि शादी के बाद कलकत्ता आने पर, हमारी ओर से भी एक प्रीतिभोज का कार्यक्रम रखा जायेगा। उसने पूछा, ' रिसेप्शन ?  मैंने कहा, ' हाँ वही समझो.. हम बंगाली उसे बहुभात कहते हैं..यह लड़के वालों का आयोजन होता है.. यह कार्यक्रम भी अच्छे स्तर पर किया जायेगा..'  मैंने उसे बताया कि इस आयोजन में उसे एक परंपरागत बंगाली दुल्हन के रूप में उपस्थित होना होगा और मेरी माँ ने अपनी पुत्रवधू के लिए, इस अवसर हेतु, एक खास साड़ी बहुत पहले से खरीद ली थी। पिंकी की ओर से भी ख़रीददारी शुरू हो चुकी थी। वह मेरे लिए एक सूट खरीदने वाली थी। मैंने फिर एक बार न-न कहा परन्तु उसके उत्साह से मैं  प्रसन्न तो हो ही रहा था। मैंने भी अपनी ओर से कहा कि मैं भी उसके लिए एक पंजाबी स्टाइल का सूट खरीदने वाला था। वैसे ये विचार मेरे मन में ताज़ा ताज़ा ही आया था परन्तु बात को रंग देने के लिए मैंने एक कहानी बना दी और कहा कि चंडीगढ़ में किसी को पहने देखा था। तुम्हें देखा तो लगा था कि तुम पर बहुत फबेगा। वो हंसने लगी। उसने कहा कि गहरे रंग का न खरीदना क्यों कि उसे गहरे रंग पसंद नहीं थे। यूँ ही बातें होती रही।  अगले दिन ऑफिस में पहुँचते ही मुझे रोबी दा का स्मरण हो आया था। मुझे मालूम था कि कुछ ही समय में वह मुझे बुला भेजेंगे या खुद ही चले आएंगे। वही हुआ, वह मुस्कुराते हुए चले आये थे। उन्होंने हँसते हुए कहा, ' और सुनाओ.. हमारे पंजाबी सरदार जी के जमाई बाबू..'  मैं खड़ा हो गया था। कुर्सी खींच वह बैठे और उन्होंने ख़ुशी दिखाई कि मेरे माता-पिता ने इस इंटर कास्ट विवाह में रूकावट नहीं की थी। उन्होंने कहा कि ऐसा ही होना ही चाहिए था। फिर उन्होंने आश्वस्त होते हुए कहा कि ये वैवाहिक रिश्ता पूरी तरह से सफल रहेगा क्यों कि हमारे परिवार के गैर-बंगालियों से अच्छे सम्बन्ध रहे थे। माँ ने घर में आयी मिठाई में से एक डिब्बा मुझे ऑफिस के मित्रों के लिए दिया था। उसे खोल रोबी दा के सामने किया। उन्होंने कहा कि ये सब क्या था ? मैंने उन्हें सारा वृतांत बताया। वह चौंक गए, ' अच्छा तो सगाई कर गए हैं वे पंजाबी लोग ? मैंने उन्हें बताया कि सगाई जैसी कोई बात न थी। ये उनका सम्बन्ध बनाने का तरीका था। वह बहुत विचित्र सी स्थिति में थे। हैरान थे परन्तु स्वाभाविक दिखना चाहते थे। उनके मुख पर स्पष्ट दिख रहा था कि कह रहे हों, ' इतना सब कुछ हो गया और मुझे पता ही न चला..'  अपने को स्थिर करते हुए उन्होंने कहा, ' तुमने एक खुश खबर दी है तो एक खुश खबर मेरी ओर से तुम्हें भी है.. हमारे संगठन की ओर से राज्य स्तर पर गठित परिषद में मैंने तुम्हारा नाम रखा है..ये बहुत दायित्व पूर्ण कार्य है और मैं चाहता हूँ कि कोई युवा इसमें मेरे साथ रहे.. और धीरे-धीरे पूरी ज़िम्मेदारी संभाल ले..तुम पढ़े-लिखे हो और बहुत अच्छी पारिवारिक पृष्ठभूमि से हो.. देखना तुम बहुत आगे जाओगे..'  मैं असमंजस में था। मैंने कहा कि मुझे क्षमा किया जाये। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता था। युवा शक्ति को संगठन हेतु आगे आना ही होगा। मैंने कहा कि मैं मानसिक रूप से भी इस तरह के कार्य के लिए तैयार नहीं था। परन्तु वह तो जैसे पक्के होकर आये थे। उन्होंने कहा, ' अरे, तुम चिंता मत करो, अपनी शादी-वादी की तैयारी करो.. अभी तो मैं हूँ.. सब कुछ मैं ही करूँगा.. तुम केवल साथ रहना और कार्य-पद्धति को देखना.. ' उन्होंने अपनी फाइल से टाइप किया हुआ एक कागज निकाल, मुझसे हस्ताक्षर कर देने को कहा। मैंने पूछा कि यह क्या था। वे मुस्कुराने लगे, ' ये तुम्हारी ओर से एक छोटा सा सर्टिफ़िकेट है कि तुम इस कार्य के लिए राजी हो.. एक औपचारिकता है..'  क्या लिखा था, मैं पढ़ भी न पाया था और उन्होंने मेरे हस्ताक्षर ले लिए थे। उन्होंने कुर्सी से उठते हुए व्यंग्यात्मक भाव में कहा, ' अच्छा चलता हूँ, मुझे बहुत काम हैं.. तुमने चुपचाप सगाई तो कर ली है, अब बिना बताये शादी मत कर लेना..'  ( आज यहीं तक,  आगे गुरुवार को, यहीं पर )