Chander Dhingra's Blog

Wednesday, November 25, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी : Two States - A New Story - 47

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1                                      ( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ) ( ४७ )     दिल्ली एयरपोर्ट पर पिंकी की मम्मी का रोना रुक ही न रहा था। उसके पापा और मामा की भी आंखे नम थी। भावुक तो मैं भी हो रहा था। मैं खुद को दोषी मान रहा था। मैंने आंटी से कहा, ' मम्मी, चिन्ता न करें, हम सब उसका ख्याल रखेंगे.. सब कुछ ठीक रहेगा..' उन्होंने मुझे गले लगा लिया, ' हाँ बेटा, मुझे मालूम है, तुम सब हो, मेरी बेटी को कभी अकेलापन न लगेगा..फिर भी बेटा, लड़की की विदाई है..माँ-बाप के दिल का एक टुकड़ा अलग हो रहा है..'  मेरी तो कोई बहन न थी परन्तु मैं इस विदाई का अहसास समझ पा रहा था। मैं कल्पना कर रहा था कि यदि मेरी बहन की विदाई हो रही होती तो मैं भी ऐसे ही रो रहा होता और मेरे माता-पिता भी चिंतित और दुखी हो रहे होते। मैंने कई बार बेटी की विदाई का यह दृश्य देखा था और प्रत्येक बार मैं भावुक होता रहा था। यहाँ तो कुछ ही लोग थे, मेरी ओर से अकेला मैं ही था। मेरे साथ अपने घर को छोड़ जो लड़की जा रही थी, वह मेरी मित्र थी और हम दोनों एक-दूसरे को समझते थे। वह भी जानती थी कि वह किसी अपरिचित के साथ न थी परन्तु माता-पिता और पिता तुल्य मामाजी से बिछुड़ना उसे भी कष्ट दे रहा था। मैं चाहता था कि जल्द से जल्द हम आगे बढ़ जाएं और इस भावुक होती जा रही स्थिति से दूर हो जायें। हम सुरक्षा क्षेत्र में आये तो संतोष सा लगा। पिंकी अभी भी दूर तक अपने लोगों को ताके जा रही थी। उसकी आँखें अभी भी भीगी हुई थीं। फ्लाइट के ऊपर उठते ही उसने अपनी आँखें बंद की और ध्यान की मुद्रा में आ गयी। वह निश्चय ही अपने नानक बाबा से संवाद कर रही थी, ' बाबा, मैं एक नए संसार को उड़ चली हूँ.. मेरा साथ देना .. आप साथ हो तो मैं क्यों फ़िक्र करूँ..' मैं उसका मुख देखता रह गया था। एक दिव्य प्रकाश था जो मुझे अभिभूत कर रहा था। कुछ समय बाद उसने आँखें खोली तो मैंने पूछा, ' क्या माँगा ? उसने कहा, 'मैं कभी कुछ माँगती नहीं..केवल चाहती हूँ वे मेरा हाथ पकड़े रहें..'  हम इस दो-अढ़ाई घंटे के सफर में एक-दूसरे को आश्वस्त ही करते रहे थे। अचानक घोषणा हो गयी कि हम कलकत्ता पहुँच चुके थे। एयरपोर्ट से बाहर आये तो माँ-बाबा को इंतज़ार करते पाया था। पिंकी ने दोनों के पांव छुए थे। मैंने भी उसका साथ दिया था। माँ ने पिंकी को गले लगा लिया था। हमारा सामान देख माँ मुझ से बोली, ' अब तुम भी इतना कुछ ले आये ..' मैंने कुछ न कहा, बस पिंकी की ओर देख मुस्कुरा दिया था। मैंने वो लड्डू का डिब्बा माँ को थमाया और कहा, ' ये केवल मेरे लिए है..मम्मी जी ने खास मेरे लिए दिया है..' मेरे मुख से निकला मम्मी शब्द माँ को चौंका गया था। उन्हें कुछ क्षण लगे यह समझने में कि अब माँ के साथ-साथ एक मम्मी जी भी आ चुकी थी, मेरे जीवन में। वह कुछ कहना चाहती थी परन्तु रुक गयी थी, न जाने क्या सोचकर। मैं जानता था मेरे मुख से मम्मी शब्द उन्हें भीतर कहीं बींध गया था। मैं विवश था। मैं तो केवल पिंकी को जताना चाहता था कि उसकी मम्मी अब मेरी भी थी।  घर पर माँ ने नयी बहू के लिए खास व्यवस्थाएं की हुई थी। घर अच्छे से सजाया हुआ था। मुख्य कमरे के चारों कोनों पर बड़े-बड़े फूल दान रखे थे। कमरा फूलों से महक रहा था। साफ सफाई भी हुई थी। लगता था, बिशाखा पूरा दिन जुटी रही होगी। मैंने अलग से बिशाखा से अपने कमरे के बारे में पूछा तो वह हंसने लगी, ' सब ठीक कर दिया है..ऊपर जाकर अपनी आँख से देख लो..'  पिंकी थोड़ा बहुत शरमा रही थी। यह स्वाभाविक था। उसने मुझे अपने कमरे में ले जाने की इच्छा जाहिर की। माँ, चाय की तैयारी कर रही थी। मैंने कहा कि चाय पीकर ऊपर अपने कमरे में चलते हैं। बिशाखा चाय लेकर आ गयी। साथ में मिठाई थी और कुछ कटलेट आदि थे। मैं जानता था की ये सब कौन सी दुकान से लाये गए थे। मैं क्रॉकरी आदि देख कर थोड़ा विचलित हुआ। मुझे पिंकी के घर की व्यवस्था याद आ रही थी। मुझे लगा कि हम वैसा क्यों नहीं कर पाते। मैंने मन ही मन में सोचा कि कल ही कुछ नयी क्रॉकरी लेकर आऊँगा। मैंने पिंकी से पूछा कि क्या खाओगी ? वह धीमे से मुस्कुरायी। उसने कहा, ' फ्लाइट में तो इतना कुछ खा लिया था .. अब मन नहीं है ..' मैंने कहा, ' ये चॉप यहाँ का मशहूर है..खाकर देखो..'  उसने कोने से छोटा सा टुकड़ा तोड़ लिया और कहा, ' अच्छा है..' मैंने भी मुँह में रखा और बिशाखा को आवाज़ लगायी, ' ये कब का लाकर रखा हुआ है ? एक दम ठंडा हो चुका है..' बिशाखा ने बताया कि वह शाम को ही लेकर आयी थी क्यों कि विलम्ब से जाने पर यह समाप्त हो चुका होता था। मुझे बिशाखा पर गुस्सा आ रहा था। माँ ने सुना तो मेरे हाथ से वह कटलेट लिया और कहा,' ठीक ही तो है..' मैं झुंझला गया, ' माँ ये चीज तो गरम ही खायी जाती हैं ..' माँ, हूँ  .. कह आगे बढ़ गयी थी । पिंकी ने बात संभाली, ' अरे लाओ, मैं माइक्रो में गर्म कर देती हूँ  ..'  ये माइक्रो तो उन दिनों हमारे घर में न था। पिंकी मुस्कुराने लगी। उसने बिशाखा का हाथ पकड़ा और उसे ले रसोई की ओर बढ़ गयी। उसने कहा, 'तवे पर गर्म कर लाती हूँ..' माँ दौड़ी आयी, ' अरे नहीं.. मुझे दो.. तुम बैठो.. अभी ही तो आयी हो ..' उन्होंने यह भी कहा कि मैं ऐसा ही खाता था, आज न जाने क्यों मुझे गर्म खाने का भूत चढ़ गया था।  मैं पिंकी को लेकर ऊपर अपने कमरे में आ गया था। पिंकी ने यहाँ-वहाँ देखा और कहा कि उसे कमरा ठीक करने में बहुत परिश्रम करना पड़ेगा। उसने कहा कि कमरे को एक ओर से बढ़ाना होगा। मैंने कहा, ' जो कुछ करना हो, कर लेना.. अभी तो आराम करो ..'  पिंकी ने अपना सामान खोलना आरम्भ किया। उसने कहा कि सामान सेट करने से पहले दिल्ली में फोन कर लेना चाहिए। मैंने हाँ कहा और उसे बताया कि फोन माँ के कमरे में था। वह मुस्कुरा दी और उसने अपने बैग से मोबाइल निकाला। उसने कहा कि अब तो इसे काम में लाना चाहिए। उसने दूसरे बड़े बैग से एक और मोबाइल का डिब्बा निकाल कर मुझे दिया और कहा, ' आपका भी तो है.. अब तो कहीं से भी मुझ से बात कर सकते हो..' मैंने कहा, ' हाँ, बात तो ठीक है परन्तु मोबाइल का बिल बहुत अधिक आता है..' उसने कहा, ' ये बिल-विल की बातें बाद में सोचेंगे..' उसने अपने मामाजी के घर का नंबर लगाया।  मामाजी, अपने मम्मी पापा और लवली से लम्बी बातचीत की। मैं अपना नया मोबाइल फोन देखने में लगा रहा परन्तु मेरा मन उसकी ओर भी था। मैं जानता था कि इतनी लम्बी बात का बिल भी वैसा ही आएगा। जोगेन्दर अंकल ने मुझ से भी बात करनी चाही तो मैंने पिंकी को इशारे से कहा कि कह दो कि मैं बाद में करूँगा। असल में मैं नए मोबाइल पर खुद को सहज न समझ रहा था और माँ के कमरे में जाकर अपने पुराने फोन से ही बात करना चाहता था। पिंकी सामान और कपड़े आदि सजाने-गुजाने में लग गयी थी। मैं माँ के कमरे में गया और दिल्ली फोन लगाया। वो सब लोग एक-एक कर मुझसे बात करने लगे थे। सब की एक सी बात थी, ' हमारी पिंकी का ध्यान रखना..कोई भूल हो जाये तो अनदेखी कर देना  .. ' मैं क्या कहता, यही दोहराता रहा कि चिंता न करें, सब ठीक रहेगा। जोगेन्दर अंकल ने अगले दिन हमारी ओर से होने वाली रिसेप्शन पार्टी के बारे में पूछा। मैंने उन्हें भी वही कहा जो पिंकी को कहा था, ' अंकल, हम लीग इसे बहू भात कहते हैं, यह आयोजन नयी बहू को सबसे परिचित करवाने के लिए किया जाता है  ..'  उन्होंने कहा कि वह भी इसमें भाग लेने के लिए आते परन्तु अपने काम-धंधे के कारण अधिक दिन तक दूर नहीं रह सकते थे। उन्होंने हमारे चंडीगढ़ आने की बात भी उठाई थी और कहा, ' बेटा, जल्दी यहाँ आने का कार्यक्रम बनाना   ..'  पिंकी अपने काम में व्यस्त थी। उसने कहा कि इस कमरे से जुड़ा हुआ एक और कमरा होता तो अच्छा होता। उसने इसकी गुंजाईश देख ली थी और बताया कि छत की एक ओर सरलता से एक कमरा निकाला जा सकता था। मैंने कहा, ' बाद में कभी देखा जायेगा ..इस बारे में माँ से बात करनी होगी.. बिना उनकी स्वीकृति के इस घर में कुछ भी नहीं होता..' ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर   .. )                                      

Wednesday, November 18, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 46

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II-     चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1    ( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ) ( ४६ )        उस रात मामाजी के घर रहना भारी लग रहा था। जोगेन्दर अंकल, सुखबीर अंकल और उनके साथ आये परिवार जन के साथ-साथ कनाडा से आये बंटी का परिवार वहां था और धमा चौकड़ी मचाये हुए था। मैं पूरी तरह से इस माहौल में खुद को मिस फिट महसूस कर रहा था। पिंकी का गैर पंजाबी और बंगाली  पति होने के कारण, सभी मेरे ओर घेरा सा बनाये हुए थे। ' इनके लिए रसगुल्ला लाओ जी .. ' चितरंजन पार्क से फिश लाकर खिलाओ जी..'  मैं चुपचाप खिसिया रहा था कि रसगुल्ला और मछली से आगे भी बंगाल है। संकोच और अकेलापन था जो मुझ पर दबाव डाल रहा था कि पिंकी मेरे साथ ही बैठी रहे। इस भीड़भाड़ में केवल वह और उसकी बहन ही थे जिनके साथ मैं सहज हो सकता था। लवली तो अपने अंग्रेजी बंटी भैय्या के साथ चहकती फिर रही थी। मैंने एक-दो बार उसे अपने पास बुलाने का प्रयास किया किंतु वह 'जीजाजी, आपको तो दीदी मिल गयी है, अब हम क्या करें  ..'  कहकर भाग गयी थी। उधर बंटी अपनी और से न जाने क्या-क्या कार्यक्रम बनाता जा रहा था। मामाजी का भव्य आवास शादी घर के लिए बहुत सुंदरता के साथ सजाया हुआ था। वह इस तरह से कामकाज में जुटे हुए थे मानों उनकी ही लड़की की शादी थी। वैसे पिंकी के प्रति उनके प्यार को देखें तो सच में उनकी बेटी की ही तो शादी थी। जोगेन्दर आंटी स्वयं कह चुकी थी कि सब दायित्व उनके भाई ने अपने कंधे पर लिया हुआ था। दिल्ली में शादी हुई थी तो चंडीगढ़ वाले तो कुछ अधिक कर पाने की स्थिति में न थे। देर रात बंटी ने कहीं घूम कर आने का विचार सुझाया। पिंकी -लवली तो चहक उठी थी। मैं केवल ना नुकुर ही करता रह गया था। बस तुरंत एक बड़ी गाड़ी निकाली गयी और हम चार न जाने किस ओर निकल गए थे। यहाँ वहाँ भटकते किसी होटल के कॉफ़ी बार पहुंचे थे। मैं आश्चर्य में था कि आधी रात के समय भी वहां भीड़भाड़ और रौनक थी। ये समाज के किस वर्ग के लोग थे जो दुनिया से बेफिक्र और बेखौफ अपने में ही मस्त थे। मेरा वामपंथी विचारधारा की ओर झुका दिमाग बे चैन और क्षुब्ध था। मुझे लगा यह क्या हो रहा है हमें ? हम भारत जैसे देश में किस दिशा की ओर बढ़ रहे हैं ? पिंकी ने मुझे खामोश देखा तो कहा, ' ठीक तो हो न, क्या बात है चुपचाप हो ?  मैंने कहा कि सब ठीक था, बस रात अधिक हो चुकी थी सो थोड़ी थकावट सी थी। उसने पूछा कि क्या घर चलें ? मैंने कहा कि नहीं सब ठीक था। उधर बंटी था जो मस्ती के  मूड में था और यहाँ कुछ समय बिताना चाहता था। पिंकी मेरी मन स्थिति भाँप चुकी थी। उसने बंटी को कहा कि अब चलना चाहिये। बंटी ने बदले में मुझ से पूछा, ' क्यों जीजाजी, यहाँ सबके साथ मन नहीं लग रहा, वाइफ के साथ एकांत चाहिए ? लवली भी हँसने लगी। पिंकी ने कहा, ' जीजा जी को नहीं, तेरी दीदी को तेरे जीजाजी अकेले में चाहिये.. समझे, अब यहाँ से निकलो..'  घर पहुंचे तो देखा,स्थानीय मेहमान जा चुके थे। मामाजी और दोनों अंकल एक ओर बैठे थे। उनके हाथों में गिलास थे और सामने एक बोतल और कुछ ड्राई फ्रूट रखे थे। मैं हैरान था कि रात के इस पहर भी ये सब चल रहा था। मामाजी ने इशारे से मुझे भी उनके साथ जुड़ने की दावत दी। मैंने मुस्कुराते हुए न का इशारा करते हुए थैंक्स कहा था।    हम अपने कमरे में गए तो लगा किसी बड़े नामी होटल का विशेष कमरा हो। सब कुछ पांच सितारा स्तर का था। मैंने पिंकी से पूछा, ' ये कमरा तो बहुत शानदार है ? उंसने बताया कि उसके मामाजी को अपने घर को शानदार रखने का बहुत शौक था। उसने यह भी बताया कि हमारी शादी के लिए उन्होंने इस कमरे को नया रंग रूप दिया था। मैंने कहा कि वह बहुत सफल कारोबारी थे और अपने पैसे को इस तरह खर्च कर सकते थे, 'अमीर लोग धन खर्च नहीं  करते, लुटाते हैं..' मेरी इस बात पर उसने कोई प्रतिक्रिया न दी थी। हम आने वाले दिनों की बातें करते रहे थे। मैं मुग्ध था उसके सौंदर्य, उसकी लावण्यता और उसकी सबको अपना बना लेने की दक्षता पर। उसे छुआ तो प्रतीत हुआ कि कुछ था जो मुझे सबसे अलग कर कहीं दूर उड़ा ले जाना चाहता था। वह रात थी जो तितली के पंखों सी कोमलता लिए, इस पुष्प से उस पुष्प को छूती हुई, वाटिका में शुभगन्ध उड़ाती चली जा रही थी।  सुबह हंसी-ख़ुशी के माहौल में सबसे मुलाकात हुई। बंटी और लवली ने मेरी खिंचाई शुरू कर दी। ये जीजाजी शब्द न जाने क्यों असहज सा लग रहा था। मेरा मन कहीं बाहर निकल जाने का हो रहा था। इधर घर के बड़े लोग थे जो हर क्षण मुझे कुछ न खुश खिलाये जाने की फ़िराक में थे। मैं अब जल्दी से जल्दी अपने कलकत्ता पहुँच जाना चाहता था। मेरी निगाहें पिंकी को खोज रही थी पर वह थी कि अपने स्वजनों में घिरी हुई थी। वह आते-जाते मेरा हालचाल पूछ जाती और कह जाती, ' कुछ खाने को लाऊँ ?  दोपहर का खाना लगाया गया था तो मैं देखकर दंग रह गया था। इतना कुछ ? नौकर-चाकर लगे हुए थे, सबकी फरमाइश को पूर्ण करने में। मामाजी के दिल्ली में रह रहे सम्बन्धियों के साथ साथ मित्रगण भी आये हुए थे। उन सब का एक ही कथन था, ' आज तो मनप्रीत ससुराल चली जाएगी.. इसलिए मिलना तो था ही..'  मेरे पास कोई आकर बैठता तो कलकत्ता के बारे में ही पूछता था, जैसे मेरी रूचि सिर्फ कलकत्ता और बंगाल  हो।  जो लोग कभी कलकत्ता गए हुए थे, वे वहां की भीड़ और वहां की मिठाई की ही बातें करते। मैं ससुराल की इन बातों खिन्न हो रहा था और इन बेकार सी बातों से मुक्ति चाहता था। मैं खिन्न होते हुए भी मुस्कुराने और सरदारों की बातों में रूचि दिखाने को विवश था। अचानक किसी ने हमारी फ्लाइट का समय जानना चाहा और सुनते ही कहा कि आज एयरपोर्ट की ओर के ट्रैफिक में समस्या थी और हमें समय से निकल जाना चाहिए था। ट्रैफिक समस्या का सुन, मैं खुश हो गया था कि कहीं तो हमारे कलकत्ता जैसी बात हुई थी। मैंने पिंकी को इशारे से बुलाया और उसे कहा कि अंकल कह रहे कि हमें एयरपोर्ट के लिए निकल जाना चाहिए वर्ना फ्लाइट मिस हो सकती थी। उसने अपने मम्मी-पापा से बात की और मैंने देखा कि हमें विदा करने की तैयारियाँ होने लगी थी। चार बड़े बड़े सूट केस थे। साथ ही कुछ बैग छोटे बैग भी। पिंकी की मम्मी मेरे हाथों में एक बड़ा सा मिठाई का डिब्बा दे गयी थी। मैंने पूछा कि यह क्या था तो उन्होंने मुस्काते हुए कहा,' आप कह रहे थे न दिल्ली के लड्डुओं के बारे में, खास आपके लिए है मंगवाए हैं..' मुझे याद आया कि किसी क्षण बातों-बातों में मैंने कहा था कि दिल्ली के लड्डू तो बहुत मशहूर होते हैं।  कुछ समय बाद हम लोग एयरपोर्ट के लिए निकल आये थे। एक गाड़ी में मैं, पिंकी, लवली और बंटी थे। गाड़ी बंटी चला रहा था। दूसरी गाड़ी में पिंकी के मम्मी-पापा और मामाजी-मामीजी थे। उस गाड़ी का स्टेयरिंग मामाजी के हाथ में था। मैं अभी से ही अपने नगर कलकत्ता और बंगाल में था। मैं खास अवसरों पर की जाने वाली ईश्वर स्तुति को नापसंद करता हूँ और इन्हें एक कमज़ोरी मानता रहा हूँ परन्तु उस दिन न जाने क्यों, गाड़ी में बैठते हुए, बंगाली परंपरा को निर्वाह करते हुए, मैंने धीमे स्वर में, दुर्गा-दुर्गा कहा था। साथ ही पास बैठी पिंकी को ऐसे देखा था कि कहीं उससे कुछ चुराया हो । ( आज यही तक, आगे यहीं पर, अगले गुरुवार को..)

Wednesday, November 11, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -45

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II-     चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1    ( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )( ४५ )   अब हमारी कलकत्ता की वापसी थी। सामान बहुत बढ़ गया था। माँ सूटकेसों को देख परेशान थी या प्रसन्न, समझ न पा रहा था। मैं और पिंकी तो अगले दिन शाम को फ्लाइट से पहुँचने वाले थे। माँ को यही चिंता थी कि मैं उनके साथ न लौट रहा था। जोगेन्दर अंकल ने माँ को आश्वस्त किया था कि वह सब व्यवस्था करवा देंगे और कोई दिक्कत न होने देंगे। इन्द्राणी का मन भी एक दिन रुक, हमारे साथ ही फ्लाइट से लौटने का था परन्तु उसे अपना मन मारना पड़ा क्योंकि यह संभव न था। पिंकी और मैं एक दिन के लिए उसके मामा के घर रुकने वाले थे। मैं अपनी ख़ामोशी के साथ खुश था। पिंकी, मामाजी.. मामाजी कहती रहती थी। मुझे धीरे से गर्दन हिलाकर उसकी हाँ में हाँ करना होता था। मामाजी ने हमें एक कार दे दी थी। उन्होंने कहा था, ' खूब घूमो-फिरो..ये एक दिन दिल्ली के लिए है..'  रात उस पांच सितारा होटल में कटी थी। देर रात तक हम परिवार के खास लोग एक ही कमरे में जमे रहे थे। मेरे माँ-बाबा बहुत खुश थे। लगता था उनका पंजाबी लड़की को लेकर जो भ्रम था, वह धीरे-धीरे धुंधलाता जा रहा था। हम दोनों जब अपने कमरे में गए, तब तक भोर के चार बज चुके थे। दोनों थक कर चूर थे। होटल की तरफ से हमारे कमरे को भली भांति सजाया गया था। चारों ओर फूल सजे थे। टेबल पर फ्रेम में सजी हम दोनों की फोटो रखी थी। ये फोटो हमारे विवाह की ही थी। इसके साथ ही हमें वैवाहिक जीवन की शुभ कामनाएं देता एक बहुत ही सुन्दर कार्ड भी रखा हुआ था जो होटल के मुख्य प्रबंधक की ओर से था। मैं हैरान था, होटल वालों ने इस अल्प समय में ही कैसे इस फोटो का प्रबंध कर लिया था। यह हमारे नव जीवन की प्रथम रात थी। हम दोनों मौन, संकुचित और एक-दूसरे के प्रति आभार से भरे हुए थे। शब्द थे किन्तु कहीं खो से गए थे। इस मौन को तोड़ते हुए पिंकी ने अपने बैग में से एक फोटो फ्रेम निकाला। यह गुरुनानक देव जी का चित्र था। उसने हम दोनों की फोटो के पास इसे रखते हुए, प्रणाम किया और मुझे भी ऐसा करने को कहा। मैंने हँसते हुए कहा, ' अरे यहाँ भी ईश्वर की स्तुति ? उसने कहा, ' हम एक नया संसार बसाने जा रहे हैं, परमात्मा का आशीष तो लेना ही होगा ..' मैंने कहा, हाँ और आगे बढ़ प्रणाम किया। हम दोनों एक-दूसरे के हाथ थामे, मुस्कुराते जा रहे थे। यह पहली रात नहीं एक नई सुबह थी। एक दूसरे के प्रति निशब्द से कुछ आश्वासन, कुछ वादे और कुछ उड़ते से सपने थे। वही राजधानी एक्प्रेस ट्रैन थी जो दो दिन पहले हमें लेकर आयी थी। तब रोमांच था, आज एक संतुष्टि थी। भीड़ भाड़ वाले नयी दिल्ली स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर, हमारा बंगाली दल अलग सी पहचान दिखा रहा था। पिंकी थी जो सब में घुलमिल गयी थी। वह नवनवेली, शरमा तो रही थी परन्तु प्रयत्नशील थी कि सब उसे अपना ही जाने । वह माँ-बाबा की सुविधा-असुविधा को देख रही थी। उसके प्रयासों को देख, मेरे माँ-बाबा दोनों बहुत खुश थे। ट्रैन चलने को हुई तो उसके प्रति माँ का स्नेह उमड़-उमड़ पड़ा था। एक बार फिर से दुर्गा दुर्गा स्वर उठा था। इन्द्राणी हँसते हुए मेरे कानों में कह गयी, ' बहूरानी को ज्यादा परेशान मत करना..' अब माँ की आंखें नम हो रही थी। मैं कुछ कहता इससे पहले पिंकी, माँ को सहज करते हुए बोल उठी, ' मम्मी जी, चिन्ता न करें.. आप कल सुबह पहुँच रही हैं और हम शाम को..मेरे लिए मछली बनवा कर रख्नना.. मिलकर डिनर करेंगे..' फिर वह बिशाखा को देख बोली, ' दीदी, आप मेरे लिए मीठा दही लाकर रखना..' बिशाखा शरमाते हुए हंसने लगी थी। उसने बांग्ला में कुछ कहा था। सब लोग उसकी बात पर हँस पड़े थे। हम दोनों ट्रैन से नीचे उतर आये थे और धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म से बाहर की ओर खिसकती ट्रैन को देखते जा रहे थे। स्टेशन से बाहर आ, पिंकी ने कहा कि आज की शाम ही हम दोनों के पास थी। अगले दिन तो कलकत्ता के लिए निकल जाना था। उसका विचार था कि यह जो समय मिला है उसे अपने हिसाब से बिताया जाना चाहिए था। मुझे क्या एतराज़ हो सकता था। वैसे भी मामाजी के घर पर बाहर से आये हुए सभी सम्बन्धी रुके हुए थे। उनके सरदारों वाले ठहाकों के बीच में, मैं तो मुरझाई हुई कविता की एक पंक्ति सा बन के रह जाने वाला था। मैं अधिक से अधिक समय बाहर ही बिताना चाहता था। मैं चाहता था, देर रात घर पहुंचे और सीधे अपने बिस्तर में घुस जाएं। मैंने सुझाव रखा, ' ठीक है, पर खाना भी बाहर ही कहीं खाते हैं..' पिंकी ने हाँ कहा। गाड़ी में बैठते ही, उसने ड्राइवर को किसी जगह का नांम बताया। ड्राइवर सुन हैरान हो गया था। उसने पंजाबी में कुछ कहा तो पिंकी ने अंग्रेजी में जवाब दिया ' नो वरी '  मैंने पूछा तो उसने बताया कि ड्राइवर चिन्ता कर रहा था कि उस जगह आने-जाने में तीन घंटे लग जायेंगे क्यों कि ट्रैफिक का समय था। वो मुस्कुरा रही थी। उसने अपने बैग से मोबाइल निकाला। मैं हैरान हो देखने लगा। मोबाइल उन दिनों कुछ खास लोगों के पास ही हुआ करता था। उसने कहा, ' नया है, मम्मी से मिला है..आपके लिए भी है ..घर जाकर मिल जायेगा..' उसने अपनी मम्मी को फोन लगाया और कहा कि हम लोग देर से घर लौटेंगे और डिनर कर के ही आएँगे। मैंने उसका मोबाइल फोन देखना चाहा था । ये नोकिआ का फोन था। मैंने कहा, ' अरे, ऐसा ही तो मैं भी लेना चाहता था.. ' वह हँस पड़ी, ' लो, मन ही मन में आपने चाहा और आज मिल भी गया..'  मैंने उस दिन उसे आप से तुम पर आ जाने का निवेदन किया था। उसने कहा कि पंजाबियों में पति को आप ही कहा जाता है। ये उसके परिवार के संस्कार थे परन्तु वह कोशिश करेगी कि मेरे लिए आप से तुम पर आ जाये। हमारी कार दिल्ली की सड़कों पर दौड़ी चली जा रही थी। कनॉट प्लेस, विदेशी दूतावासों के क्षेत्र चाणक्यपुरी से होती हुई। पिंकी मुझे किसी गाइड की तरह, दाएं-बाएं दिखा रही थी। मैं हैरान था कि चंडीगढ़ की लड़की को दिल्ली के बारे में इतना सब कुछ कैसे पता था ? उसने स्वयं से मेरी शंका का निराकरण कर दिया था। उंसने कहा, ' बचपन से ही दिल्ली आ रही हूँ.. दो-चार दिन मिले नहीं कि दिल्ली में मामाजी के पास..मुझे तो चंडीगढ़ से अधिक  दिल्ली अपना लगता है.. बहुत पहले मामाजी दिल्ली कैंट एरिया में रहते थे..वहां का गुरुद्वारा मुझे बचपन से अच्छा लगता है.. मामाजी इस गुरूद्वारे में लाया करते थे.. ये मिलिट्री एरिया है..इस गुरूद्वारे में सेना के बहुत लोग आते हैं..' फिर उसके चेहरे पर एक मुस्कान बिखर आयी थी, वह बोली, ' यहाँ गोपीनाथ मार्किट है..वहां एक होटल है.. बहुत अच्छा खाना है.. छोटा सा होटल है परन्तु खाना..एक नंबर.. बचपन में तो खूब खाते थे वहां..'  मैं उसकी ख़ुशी देखता रह गया था। मैं कहा, ' चलो, आज तुम्हारी बचपन की यादें ताज़ा कर लेते हैं..वहीं डिनर करते हैं.. ' वह उत्साहित हो गयी, ' सच ..पर वह छोटा सा  होटल है और सभी तरह के लोग आते हैं..' मैंने कहा कि इसमें क्या बात है.. वहीं चलते हैं..गुरूद्वारे में मत्था टेक कर, वहीं खाना खाएंगे ..देखें तो हमारी मनप्रीत का बचपन का होटल..'  मेरा गुरूद्वारे जाकर, मत्था टेकने का सुझाव, उसे अच्छा लगा था।   ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर  ..)

Wednesday, November 4, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -44

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II-     चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1    ( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ) ( ४४ )    मैं पिंकी से मिलने को बे चैन हो रहा था परन्तु मिलने का कोई पथ नहीं सूझ रहा था। लंच हो जाने के बाद इन्द्राणी दी ने शायद मेरे मन की सुन ली थी और वो बात कह दी जो जिसकी चाह मैं शर्माते हुए छिपा रहा था। उन्होंने सुझाव दिया कि कोई जरूरी सामान खरीदने के बहाने से निकल जाते हैं और पिंकी से मिल आते हैं। मैंने कहा, ' ठीक है..'  मेरा उतावलापन देख वह हंसने लगी थी। उसने कहा, ' अरे कल तो सज धज कर मिलने जा ही रहे हो.. एक दिन की ही तो बात है, प्रतीक्षा करो..' मैंने कहा, ' चलो ना, शादी से पहले एक बार तुम भी लड़की से मिल लो.. ' मैंने पिंकी को फोन किया। उसने एक खास रेस्टोरेंट में पहुँचने की बात कही थी। मैं और इन्द्राणी दी एक गाड़ी ले निकल गए। ये दिल्ली के कैलाश क्षेत्र का एक रेस्टोरेंट था। हमारे पहुँचने से पहले ही वह वहाँ आ गयी थी। कोने की एक टेबल पर वह और लवली बैठे हुए थे। उनके साथ एक और सिख लड़का भी था। मुझे देखते ही लवली दौड़ते हुए आयी और जीजाजी कह लिपट गयी थी । वह एक निर्मल हृदया साली थी। उसका इस तरह मिलना, मुझे अच्छा लगा था। टेबल पर बैठते ही मैंने कहा, ' ये मेरी कजिन इन्द्राणी हैं..' पिंकी तो कुछ न बोली परन्तु लवली ने हँसते हुए पास बैठे सिख युवक की ओर इशारा कर कहा, ' और ये हमारे कजिन बँटी साहब हैं, ये कनाडा से आये हैं..'  बंटी ने अपना हाथ मेरी ओर बढ़ाया और गर्मजोशी से हेलो कहा। वह अच्छी कदकाठी वाला स्मार्ट युवक था। वह अंग्रेजी में ही बात कर रहा था। बाद में पता चला कि बचपन में ही उसके माता-पिता कनाडा चले गए थे। वहां उन्होंने अपना अच्छा खासा कारोबार बना लिया था। बंटी उनका इकलौता बेटा था। बातों-बातों में पता चला कि उसने पढाई-लिखाई अमेरिका में की थी और अब वह वहीं किसी कम्पनी में काम करता था और कनाडा में अपने माता-पिता के पास आता-जाता रहता था। उसकी भी तमन्ना थी कि अपना कारोबार बसाया जाये। कॉफी चल रही थी और इधर-उधर की बातें भी। बंटी पूरी तरह से महफ़िल पर छाया हुआ था। लवली और बंटी खूब खिलखिला रहे थे। मैं और पिंकी बे वजह हर बात पर मुस्कुरा रहे थे। इन्द्राणी समझ ही न पा रही थी कि क्या किया जाये ? कुछ समय बाद बंटी ने सुझाव रखा कि लड़के-लड़की यानि मुझे और पिंकी को एकांत दिया जाना चाहिए। हम दोनों को वहीँ छोड़ वे लोग बाहर निकल गए थे। बाहर जाने से पूर्व बंटी ने सेवा कर रहे वेटर को कुछ और ऑर्डर दिया और कहा कि हम दोनों का हर तरह से  ख्याल रखा जाये। उसकी आवाज़ में एक तरह का आदेश और प्रभाव था। उसका व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि धनाढ्यता साफ झलकती थी। वेटर उसकी हर बात पर मुस्कुरा रहा था और यस सर .. यस सर.. ही उसके मुख से निकल रहा था। इन्द्राणी बाहर जाते जाते मेरे कानों में कह गयी, ' मैं तो अकेले फंस गयी.. इस अमेरिकन सरदार जी के साथ..' अब हम दोनों ही थे और दोनों शांत। विवाह से पूर्व यह हमारी अंतिम मुलाकात थी। पिंकी ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ' कैसा लग रहा है, बाबू मोशाय ? ' मैं मुस्कुरा दिया।  मैंने कहा, ' मुझे तो अच्छा लग रहा है.. हमारी पंजाबी कुड़ी को कैसा लग रहा है ? वह हंसने लगी। उसने कहा कि चलो मैंने एक पंजाबी शब्द तो सीख लिया था। मैंने कहा, ' अरे नहीं, मैंने तो आओजी, सत श्रीकाल और बहुत कुछ सिख लिया है ..'  पिंकी ने पूछा कि मेरे घर में और परिवारजनों में इस अंतर्जातीय विवाह को कैसे लिया गया था ? मैंने उसे आश्वस्त किया कि सब ने सामान्य और समय के साथ होने वाली बात के रूप में लिया था। पिंकी, इन्द्राणी से प्रभावित लगी थी। उसने कहा कि वह बहुत सुन्दर और आकर्षित कर लेने वाली शख्सियत थी। फिर उसने पूछा कि उसने अब तक शादी क्यों नहीं की थी ? मैंने कहा कि उनकी मर्जी, जब चाहेगी कर लेगी। पिंकी ने भी हाँ करते हुए कहा कि उसे लड़कों की कमी थोड़े ही होगी। ऐसे ही न जाने क्या क्या बात होती रही थी। अचानक मुझे लगा कि अब वो तीन लोग किसी भी क्षण आ सकते थे। मैंने कहा, ' तुमने हिम्मत कर बंगाली परिवार में आने का निर्णय किया है, किसी तरह का संशय तो नहीं है ?  उसने कहा, ' तुमने भी तो सिख परिवार से नाता जोड़ने का साहस दिखाया है.. अगर हम जुड़े रहेंगे तो सब कुछ ठीक रहेगा..' मैंने आगे बढ़ उसका हाथ अपने हाथ में लिया ही था कि उधर इन्द्राणी, बंटी और लवली आते दिख गए थे। एक बार फिर से बंटी छा गया था। वह मेरे लिए कुछ लाया था। उसने कहा कि बाहर घूमते हुए कुछ चीजें पसंद आ गयी थी तो एक अपने जीजू के लिए और एक अपनी  बहन के लिए खरीद ली थी। ख़ुशी ख़ुशी हम सब रेस्टोरेंट से निकल आये थे। पिंकी ने मुझे हल्के से कहा, ' चलो अब कल मिलते हैं .. ऑल द बेस्ट..'   अगले दिन सुबह से हम सब के बीच शादी की तैयारियों की बातें होने लगी थी। हम सब कलकत्ता वालों के लिए यह शायद पहला अवसर था कि दिन की शादी में भाग ले रहे थे। सभी नाराज़ से थे कि सजने-संवरने का समय नहीं मिल रहा था। माँ सभी को समझाने की कोशिश करती फिर रही थी कि गुरुद्वारे की शादी में अधिक समय नहीं लगेगा। रात की पार्टी के लिए बहुत समय मिलेगा। वह हर किसी से कह रही थी कि गुरुद्वारा एक पवित्र स्थान है वहां नियम से हम सभी को समय पर पहुँच जाना चाहिए। कुछ विलम्ब से हम गुरुद्वारे पहुंचे थे। कुछ लोग हमें लेने आये थे।  द्वार पर हमें सिर ढकने के लिए स्कार्फ़ दिए गए थे। मुझे और मेरे बाबा को सिख परंपरा की पगड़ी पहनाई गई थी। मुझे पगड़ी में देख इन्द्राणी मुस्कुराने लगी थी। माँ ने उसे इशारे से शांत और संयम में रहने को कहा था। इन्द्राणी ने इस अवसर के लिए एक विशेष पंजाबी ढंग का सूट बनवाया था। सलीके से सिर ढक वह पूरी तरह से पंजाबी महिला दिख रही थी। हमारी ओर से वही सबसे प्रभावित कर रही थी। अत्यंत आदर के साथ हमारा स्वागत किया गया था। भीतर हॉल में बहुत लोग थे। सुखबीर अंकल और जोगेन्दर अंकल आगे बढ़ सारी व्यवस्था को देख रहे थे। भजन की आवाज़ से माहौल पवित्र बना हुआ था। हम बंगालियों के लिए यह सब नया था। हम पंक्तिबद्ध हो मत्था टेक रहे थे। जोगेन्दर अंकल ने बताया कि पहले कुड़माई की रस्म की जाएगी। मुझे एक कड़ा पहनाया गया था। मैंने अमृतसर में एक कड़ा खरीदा था। स्टील का वो कड़ा मेरी कलाई पर था। अब जो पहनाया गया वह सोने का था।  मुझे एक छोटी सी करपान भी दी गयी थी। हम शांत हो अरदास सुन रहे थे। सब कुछ अत्यंत पावनता के साथ हो रहा था। पिंकी ने मुझे धीरे से बताया था कि यह आनंद कारज था जो बहुत शुभ माना जाता है। हम बंगाली लोगों के लिए यह एक अपरिचित सा अनुभव था। हमें आशीर्वाद दिए गए थे। बधाइयाँ दी गयी थी। मुझे कहीं न कहीं यह सब अच्छा लगा था। बाद में हमें लंगर के लिए आमंत्रित किया गया था। पिंकी को उसके परिवार वाले नयी पोशाक पहनाने के लिए ले गए थे। कुछ समय बाद वह मेरी माँ की दी हुई साड़ी में वापस आयी थी। उस पर सुनहरी गहने सजे हुए थे। बंगाली साड़ी और पंजाबी लड़की, सभी उसे ताकते रह गए थे। मुझे अपनी किस्मत पर गर्व हुआ कि ऐसी सुन्दर लड़की मेरी पत्नी बन चुकी थी। मैं किसी दूसरे ही संसार में उड़ रहा था।  संध्या में पार्टी का नज़ारा अलग ही था। पांच सितारा होटल था। होटल वालों का ही सब प्रबंध था। हम तो कुछ  ही लोग थे परन्तु दूसरी ओर से बहुत थे। मेरे लिए यह अनूठा अनुभव था। पूरा हॉल जगमगा रहा था। पंजाबी लोग और उनकी महिलाएं महंगे-महंगे परिधान और आभूषणों में सजी, हँसते-खिलखिलाते बधाई दे रहे थे। मेरे प्रति उनका स्नेह उमड़ रहा था। पिंकी और मेरे साथ, जोगेन्दर अंकल-आंटी  खड़े थे। उपहारों और नगदी से भरे लिफाफों का ढेर जमता चला जा रहा था। फोटग्राफर्स और वीडियो वाले कुछ ऐसा अंदाज़ दिखा रहे थे मानों किसी राजकुमार की दावत हो। हम कलकत्ता वाले इस पांच सितारा चकाचोंध में दबे-दबे से तो जरूर थे परन्तु खाने-पीने का आनंद भी ले रहे थे। माँ बहुत गर्व से भरी दिख रही कि उसके सुपुत्र को ऐसी सुन्दर और धनवान परिवार की लड़की ने पसंद किया था। वह अपनों में कहती घूम रही थी कि कुछ ऐसा न कर देना जिससे हमें लज्जित हो जाना पड़े। सिख सम्बन्धियों में वह बहनजी बनी हुई, आदर और सम्मान पा रही थी। मैं दूर मंच से देख रहा था। इन्द्राणी थी जो यहाँ-वहाँ चहकती घूम रही थी। वह सरदारों की भीड़ में खुद को आकर्षण का केंद्र बनाये हुए थी। मैंने सोचा चलो हमारी ओर से एक तो है जो प्रभाव जमा रही थी। वह कभी कभी हमारे पास मंच पर भी आती और कुछ न कुछ कह जाती थी। एक बार उसने कहा कि पार्टी बड़ी शानदार थी और वह बहुत लुत्फ़ ले रही थी। उसने यह भी बताया कि उसने कुछ दोस्त भी बना लिए थे। पार्टी देर रात तक चल रही थी। हम नव दम्पति विश्राम और एकांत के लिए प्रतीक्षारत, हर मिलने वाले अतिथि को देख, लगातार चेहरे पर मुस्कराहट की लकीरें बनाये जा रहे थे। ( आज बस, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर.. )