Chander Dhingra's Blog

Wednesday, January 27, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -56

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra   http://chander1949.blogspot.com/?m=1                    (  हफ्ते वार इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ..  )   ( ५६ ) उस समय पिंकी ने मुझे इशारे से कहा था कि वह मम्मी जी को बाद में समझा देगी। जब वह मुझे एकांत में मिली तो परेशान सी दिखी थी। उसने कहा कि ये क्या बात हुई कि हम जवान लोग ड्राइविंग का आनंद न लें और ड्राइवर रखें ? मैंने उसे माँ की मंशा समझाने की कोशिश की थी कि कलकत्ता का ट्रैफिक बहुत भयंकर था और यहाँ खुद से गाड़ी चलाना सरल न था। परन्तु मेरी बात से वह संतुष्ट न हुई थी। उसका कहना था कि यदि कोई अन्य व्यक्ति ड्राइवर के नाम पर, गाड़ी चला सकता है तो हम क्यों नहीं ? मैं उसे समझाने की कोशिश करता रहा और अंत में विषय पर विराम लगाने के मकसद से यही कहा कि यह कलकत्ता था और यहाँ की बातें उसे धीरे-धीरे समझ में आयेंगी। वह हंसने लगी और उसने कहा, ' आप अंत में इसी बात पर आ जाते हो कि यह कलकत्ता है..पर इस विषय को मैं, धीरे-धीरे नहीं, तुरंत समझना चाहूँगी.. कार आने दो, जिस दिन आएगी, उसी दिन मम्मी जी को घूमाकर लाऊँगी.. तुम भी साथ में बैठना.. उन्हें महसूस होना चाहिए कि ड्राइविंग का आनंद क्या होता है   ..'  ऐसा ही हुआ था। कुछ ही दिनों में मामाजी ने अपने ड्राइवर के साथ कार भिजवा दी थी। ड्राइवर कार हमें दे, अगली संध्या की कालका मेल ट्रैन से लौट गया था। एक दिन बाद ही पिंकी ने कार में कहीं घूम आने की बात  उठाई थी। उसका आग्रह किसी शिशु-जिद्द की तरह था। मैं, बाबा और माँ भी उत्साहित हो, उसके साथ कार में बैठ लिए थे। उसने मुझसे गाइड बनने की बात कही थी । कुछ ठीक न था कि कहाँ जाएं, किधर से होते हुए जाएं ? हम लोग पार्क स्ट्रीट से होते हुए धर्मतला, डलहौजी से ईडन गार्डन, फोर्ट विलियम और विक्टोरिया मेमोरियल का चक्कर लगा कर लौटे। पथ में हम लोगों ने एक लोकप्रिय चाय के स्टाल पर रुक, मसाले वाली चाय भी पी थी।  हम सब के लिए यह एक अनूठा अनुभव था। बाबा तो बहुत ही आनन्दित थे। हमारे  घर के एक और छोटा सा मंदिर है। इसके आसपास एक बस्ती है। यहाँ रहने वाले लोग इस मंदिर में आये दिन पूजा-पाठ करते रहते हैं और इन आयोजनों के लिए चंदा वसूलते रहते हैं। उन्होंने जब पिंकी को ड्राइवर की सीट से निकलते हुए देखा तो पास आकर, माँ से कुछ बख्शीश मांगने लगे थे। उनकी बात में प्रार्थना या आग्रह नहीं, बल्कि एक तरह के दबाव का भाव था। मानों कह रहे हों, ' अमीर बहू घर आयी है, हमारा भी कुछ बनता है  ..'    मैं लिखता तो जा रहा हूँ पर कभी रुक कर सोचता हूँ कि ऐसा क्यों है कि मुझे सब वृतांत स्पष्ट रूप से कैसे याद हैं ? खुद से बात करता हूँ तो पूछता हूँ, ' अभिजीत, तुम्हारी ज़िंदगी तो ठीक ही चल रही थी फिर ऐसा हो गया कि तुम खुद को दोषी मान बैठे ? इस पृथ्वी पर जो भी आया है वह अपने हिस्से के दोष का भागीदार बनने को विवश है। सभी भीड़ का अंग बनकर आगे बढ़ते जा रहे हैं, एक गहरी अंधी खाई में खुद को समाप्त करने के लिए। खाई में खुद को जब तक झोंक न दें तब तक, न जाने कितने मुखोटे पहनते, उतारते और फेंकते चले जाते हैं। कभी नियति, कभी दायित्व, कभी तहजीब, कभी यह, कभी वो, न जाने कौन कौन सी मज़बूरियां हैं जो हमें असत्य के साथ बांधें रखती हैं। सब के साथ तुम भी तो इसी चक्र का हिस्सा हो। तुम ही क्यों रुक बैठे, सत्य का प्रण ले ?  जब भी मेरे स्मृति-प्रवाह में इस तरह की लहर उठ आती हैं तो मैं ठहर जाता हूँ और खुद को प्रोत्साहित करने का प्रयास करता हूँ कि मुझे मन की इन अपरिचित लहरों ने ही तो आज तक पराजित किया था। ये दुबकी सी छिपी रहती हैं मेरे भीतर और न जाने क्यों कभी कभी उठ आती हैं, मुझे फिर एक बार भ्रमित और शंकित करने के लिए। परन्तु मैं तो निश्चय कर चुका हूँ खुद से ही युद्ध करने का। मैं पराजय में ही अपनी जय देखता हूँ।    हम दोनों के दिन बीत रहे थे। मैं कभी उत्साहित हो जाता था और कभी निष्पक्ष हो, एक ओर हाशिये पर आ जाता था। पिंकी सदैव उत्साहित थी। वह हर ओर अपना प्रभामंडल फैलाती जा रही थी। पिंकी ने माँ और बाबा के साथ साथ बिशाखा को भी प्रभावित कर लिया था। मार्निंग वाक वाले दल में वह प्रिय बन चुकी थी। अब तो खिलखिलाते हुए उसने बांग्ला शब्दों का प्रयोग शुरू कर दिया था। एक दिन ऑफिस से लौटने पर मैंने उसे माँ के साथ रबिन्द्र संगीत दोहराते हुए देखा था तो हैरान रह गया था। मैंने उसे कहा था कि वह तो बहुत अच्छा गा रही थी। वह खुश थी और चाहती थी कि वह किसी से यह संगीत भली भांति सीखे। माँ को उसका प्रस्ताव अच्छा लगा था और उन्होंने उससे तभी आश्वस्त कर दिया था कि वह इसकी व्यवस्था करवा देंगी। इस बीच पिंकी के मामाजी कलकत्ता दो तीन दिन के लिए आये थे। मुझे लगा था कि उनके प्रति मेरा एक दायित्व है। मैं उनका परिचय अपने कलकत्ता और बंगाल से करवाना चाहता था। मैं वह सब कुछ उन्हें दिखाना चाहता था जिसमें इतिहास था, कला थी और संस्कृति थी। परन्तु उनका प्रभाव कुछ ऐसा था कि वह ही मुझे और अपनी बेटी जैसी भांजी को हमारे नगर  का वह रूप दिखाते रहे जिससे अब तक, मैं ही अपरिचित था। कुछ अवसरों पर इन्द्राणी भी हमारे साथ थी। पिंकी ने ही उसे साथ ले लेने का सुझाव दिया था। कभी पांच सितारा होटल में खाना-पीना, कभी नामी क्लब में शाम, कभी खास रेस्टोर में लंच। पिंकी बहुत खुश थी और यह स्वाभाविक भी था। इन्द्राणी, मामाजी की शानोशौकत से प्रभावित थी। वह मुझे कई बार कह चुकी थी कि मैंने क्या तकदीर पाई थी। इन दिनों में मैंने पाया कि ज़िंदगी में बेफिक्री क्या होती है ?  बिना मोलतोल के कुछ भी खरीद लेना, कैसा सुख देता है। ये पसंद है, ले लो, ये माँ के लिए ले लो,ये इसके लिए, वो उसके लिए। घर पर जो है, पुराना और अप्रचलित है उसे फेंक, ये नया ले लो। यही सब चलता रहा था। मैं सबके साथ मुस्कुराते हुए घूम-फिर तो रहा था किंतु भीतर ही भीतर उदास और नाराज़ था। मैंने मामाजी से कलकत्ता की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक मार्किट देखने को कहा तो वह अपनी घड़ी देख, समय का हिसाब लगाने लगे थे। फिर एक अवसर पर मैंने उन्हें टैगोर का पुस्तैनी घर दिखाने की बात की तो वह अगली बार कह कर टाल गए थे।  पिंकी चंडीगढ़ वाली नौकरी पर त्यागपत्र दे आयी थी। उसने मुझे जब यह बताया था तो मैंने ओके-गुड तो अवश्य कहा था परन्तु मुझे इसमें एक भूल दिख रही थी। उसे यह निर्णय लेने से पहले मुझसे बात कर लेनी चाहिए थी। पिंकी ने कहा था कि वह कलकत्ता में ही कोई नौकरी ढूंढ लेगी। वह यह भी चाहती थी कि मैं भी किसी नई और भविष्य चमकाने वाली कंपनी में प्रयास करूँ। उसके अनुसार मैंने सी ए में उच्च पच्चीस में स्थान में पाया था तो मुझे इस बैंक की नौकरी से संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए था। मैंने जब उससे कहा कि इसके लिए मुझे कलकत्ता से बाहर जाना होगा तो उसने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, ' सो व्हाट .. ' मैं उससे मन की बात न कह पाया था बस अपना घर और माता-पिता का हवाला देकर विषय को टाल गया था। वास्तविकता यह थी कि मैं समझता था कि मुंबई, बंगलौर या किसी अन्य शहर में, खुश न रह पाऊँगा और अपनी बंगाली मानसिकता के साथ, अकेला जीवन बिताने को विवश हो जाऊँगा। ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर.. )   

Wednesday, January 20, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -55

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1                                (  हफ्ते वार इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ..  )  ( ५५ )  चाय पी कर मीटिंग वाले सभागार में वापिस लौटा तो कुछ हलचल दिखाई दी थी। एक बजुर्ग नेता पहुँच चुके थे और सामने रखी कुर्सी पर बैठे हुए थे। किसी ने उनके सामने माइक  रखा तो उन्होंने कहा कि कुछ ही लोग हैं और माइक के बिना भी काम चल जायेगा और उन्हें इसकी आवश्यकता न थी। उन्होंने सम्बोधित करते हुए जानकारी दी कि अचानक मौसम के ख़राब हो जाने के कारण मीटिंग में सभी लोगों के न पहुँच पाने की संभावना थी। फिर उन्होंने दो नाम लिए और दोनों के लिए दा शब्द का प्रयोग किया था। स्पष्ट था कि वे दोनों वरिष्ठजन थे। उन्होंने सूचित किया कि उन दोनों की ओर से, मीटिंग में न आ पाने की सूचना आ चुकी थी। इसके बाद उन्होंने न जाने क्या-क्या बातें की थी। मुझे जो समझ  आया वह सार यह था कि बहुत कठिन समय आने वाला था और संगठन को मजबूत करने की आवश्यकता थी। रोबी दा भी ऑफिस में अपने सहयोगियों के साथ बैठ, जब भी बातें किया करते थे तो इसी तरह का स्वर सुनाई देता था। अचानक उन्होंने मुझे सामने आने का संकेत दिया। रोबी दा की ओर से मेरा परिचय देते हुए उन्होंने कहा था कि उन्हें गर्व था कि एक नामी परिवार का सदस्य वहां बैठक में आया था। उन्होंने यह भी कहा कि सी ए की डिग्री होने के बावजूद भी मैंने संगठन  को मजबूत बनाने के लिए हाथ बटाया था। उनका मानना था कि मुझ जैसे नवयुवकों को आगे आना चाहिए था। मुझे उनकी बातें अच्छी लग रही थी। कोई भी व्यवस्था युवाजन के बिना आगे नहीं बढ़ सकती, वह ठीक ही तो कह रहे थे। उन्होंने अंत में मेरे नाना के देश के स्वतंत्रता आंदोलन में विशिष्ट योगदान का भी जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि उन जैसे देशभक्तों के कारण ही देश ने अग्रेजों के शासन से आज़ादी पायी थी।  इस मीटिंग में भी प्लास्टिक के कप में चाय दी गयी थी। यह एक छोटी सी बात थी परन्तु अब मुझे ऐसा लगता था कि ये छोटी-छोटी बातें ही हमारे व्यवहार और कर्म के प्रति हमारी मानसिकता को तय करते हैं। क्या मुझ पर यह चंडीगढ़ प्रवास का असर था ?  मीटिंग समाप्त होने पर बाहर निकला तो ये लगता रहा था कि रोबी दा जिसे अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण मीटिंग कह रहे थे, उसमें ऐसा क्या था ? मेरे दिमाग ने प्रश्न तो उठाया था परन्तु मेरे मन ने तुरंत एक बहाना जैसा उत्तर भी दे दिया था, 'शायद, मौसम के ख़राब हो जाने के कारण मीटिंग अधूरी सी रह गयी थी..' अब मुझे घर वापिस पहुँचने की फ़िक्र थी। तेज वर्षा के कारण यातायात व्यवस्था लगभग टूट चुकी थी। मैं किसी तरह कलकत्ता के केंद्र बिंदु डलहौजी स्क्वायर पहुंचा था। वहां से मेरे घर की ओर जाने वाली बहुत सी बस उपलब्ध रहती हैं। घर पहुंचा तो मेरी दुर्दशा दर्शनीय हो चुकी थी। पिंकी ने देखा तो परेशान  हो गयी थी। उसने जल्दी से कपड़े बदलने को कहा। माँ मेरे प्रति उसकी बेचैनी को देख संतुष्ट हो रही थी। पिंकी ने कहा कि ऐसे मौसम में इतनी दूर जाने की क्या आवश्यकता थी ? वह दो बातों से हैरान थी। एक तो यह कि मैं अपना नया वाला मोबाइल साथ क्यों नहीं ले गया था और दूसरे, इस ख़राब मौसम में, मैंने टैक्सी क्यों न ली थी ? मैं उसे क्या समझाता ? बस इतना कहा कि मोबाइल ले जाना याद न रहा था और उस इलाके में वापसी के लिए टैक्सी मिली ही नहीं थी। मैं जानता था ये दोनों बातें असत्य थी। मोबाइल के लिए मैं चिंतित था कि बारिश के कारण वह ख़राब हो सकता था, इसलिए न ले गया था और टैक्सी के लिए मैंने प्रयास ही नहीं किया था क्यों कि ऐसे मौसम में कलकत्ता के टैक्सीवाले अपनी मनमानी करते हैं और दुगना-तिगुना किराया वसूलते हैं। पर  इस चंडीगढ़ की लड़की को क्या-क्या बताता ? कभी कभी थोड़ा-बहुत झूठ बोलना आवश्यक हो जाता है। किसी बात को अपने हिसाब से, झूठ के सहारे, कैसे नया रंग दिया जा सकता है, यह कला, न जाने मैंने किससे सीखी थी ? कहा जाता है कि हम अपने माता-पिता का कुछ अंश स्वाभाविक रूप से पा जाते हैं। यह अंश जीवन के उतार-चढ़ाव के बीच छिपा और दबा सा रहता है परन्तु परिस्थिति विशेष में उभर कर सामने आ जाता है। उस क्षण जो हमारे माता-पिता के समकालीन होते हैं वे बरबस कह उठते हैं, 'अरे ! ऐसा तो तेरी माँ किया करती थी.. या, यह तो एकदम अपने पिता की तरह कर रहा है..' हमारे माँ-बाप हमारे भीतर ही समाये होते हैं, हमेशा के लिए। उस दिन जब मैंने छोटी सी घटना को नया रूप दिया था तो कभी कहीं पढ़ा या सुना, यह तथ्य याद गया था। मैं सोचने लगा था कि यह गुण मुझे माँ से मिला था या पिता से ?   पिंकी मेरी दशा देख परेशान तो थी परन्तु उसने मुझे सहज करने के लिए, हँसते हुए कहा, ' यह मौसम तो गरमागर्म पकोड़े और चाय-काफी का है.. अभी बनाती हूँ.. ' उसने इशारे से बिशाखा को बुलाया। मैं फ्रेश हो चुका था और माँ के पास आकर बैठ गया था। कुछ ही समय में पिंकी एक बड़ी प्लेट में पकोड़े लेकर आ गयी थी। उसने हँसते हुए कहा, ' ये हैं हमारे पंजाबी पकोड़े .. आज केवल प्याज और आलू के ही हैं ..फिर किसी दिन गोभी, पनीर, बैगन और अण्डों के पकोड़े भी खिलाऊँगी .. '  फिर उसने मेरी ओर देखते हुए कहा, ' लगता है यहाँ काफी के शौकीन नहीं हैं..आज चाय ही सही परन्तु अब से इस घर में चाय के साथ साथ कॉफी का ऑप्शन भी रहा करेगा..' मैंने अपने बाबा की ओर देखा। वह बहुत आनंदित दिख रहे थे। चाय-पकोड़ों का आनंद लेते हुए न जाने क्यों मैंने पिंकी के मामाजी से कार लेने वाली बात उठा दी, ' तुमने मामाजी से बात की क्या ? पिंकी ने बताया कि उसने नहीं की थी क्यों कि मैं स्वयं ही तो इसके पक्ष में न था। पिंकी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ' आज देखा, कितनी असुविधा हुई.. टैक्सी नहीं मिली.. और मामाजी की वो मारूति तो ऐसे ही बेकार खड़ी है..मेरे ख्याल में तो ले लेनी चाहिए..' इस बार मैंने कुछ न कहा परन्तु मेरी ख़ामोशी वह समझ गयी और उसने कहा, ' मैं आज ही मामाजी बात करती हूँ..'  उसने रात में अपने मामाजी से बात की और जैसा अनुमान था, मामाजी तुरंत राजी हो गये। उन्होंने हँसते हुए कहा, ' चलो, अच्छा है, इस मारुती रानी को कलकत्ता की सड़कों पर घूमने-घामने का मौका मिलेगा..यहाँ तो बेचारी घर में बंद रहती है..' मामाजी ने मुझसे भी बात की थी और मुझे मारुती कार के कई गुण समझाए थे। उन्होंने यह भी कहा कि वह कार भिजवाने की व्यवस्था करवा देंगे और कुछ ही दिनों में यह कार पहुँच जाएगी। मैं रोमांचित हो रहा था। मैंने मन ही मन सोचा कि मुझे अब ड्राइविंग क्लास लेनी होंगीं। एक ऐसा स्कूल तो हमारे घर से बाहर निकलकर ही मुख्य सड़क पर लगभग सौ मीटर की दूरी पर ही है। उसके बहुत से पोस्टर और गाड़ियां मैं अक्सर देखा करता था। उस समय मुझे उसी ड्राइविंग स्कूल का ख्याल आया था। मैंने पिंकी को बताया तो वह हंसने लगी थी। उसने कहा, ' गाड़ी आयी नहीं और ड्राइविंग स्कूल पहले ही आ गया..अच्छा है, जब तक गाड़ी कलकत्ता आये, ड्राइविंग सीख लोगे..कल से ही ज्वाइन कर लो..सुबह बहुत समय होता है.. मैं जॉगिंग पर जाऊँगी और आप ड्राइविंग पर ..' मैं उसे क्या कहता, उसका उत्साह देखता रह गया था। पिंकी ने कहा कि कल सुबह मैं उसके साथ चलूँ और इस ड्राइविंग वाले मामले को तय कर आएं। मैंने जब कहा कि यह सब इतनी जल्दी नहीं होता और माँ-बाबा से बात करनी होगी तो वह मेरा मुँह ताकती रह गयी थी। उसने मुस्कुराते हुए कहा, ' बड़ों की सलाह लेना अच्छी बात है परन्तु कार और ड्राइविंग जैसे मामलों में आत्मनिर्भर होना चाहिए.. वर्ना ड्राइविंग करोगे कैसे  ..' मैंने कहा, ' ठीक है  ..कल जब ड्राइविंग स्कूल ज्वाइन कर लूंगा तो आकर माँ को बता दूंगा..'  सुबह पिंकी ने मुझे समय से जगा दिया था। वह पूरी तैयारी में थी। मैं आज नहीं कल करता रह गया था परन्तु वह मुझे तैयार करा नीचे लेकर आ गयी थी। वह आजकल अपनी मारवाड़ी भाभी के साथ लेक तक जाती थी। कुछ ही समय में वह लोग अपनी कार लेकर आ गए। उन्होंने गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया। मुझे देख वे हंसने लगे और भाभी ने मुझसे कहा, ' अच्छा है, भाई साहब आप भी सुबह की सैर पर आने लगे   ..' पिंकी ने उन्हें पूरी बात बताई। यह लेक कलकत्ता की बहुत सुन्दर लेक है। कहा जाता है कि इसकी परिकल्पना नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने की थी। यहाँ सुबह का नज़ारा देखने योग्य था। इतने लोग, दूर-दूर तक लगी गाड़ियां और इतनी चहल-पहल। मैं सबके साथ खामोश सा लेक के इस छोर से उस छोर तक चलता रहा था। मुझे अच्छा लग रहा था। एक घंटे के बाद जब हम लोग लौटने को हुए तो उन भाई साहब ने एक ड्राइविंग स्कूल की गाड़ी को देख कहा, ' आइये, आपका काम यहीं करवा देते हैं..' हम उस गाड़ी के पास पहुंचे। उन्होंने ही ड्राइवर और प्रशिक्षक से बात की। वह स्वयं ही स्कूल का कर्ता-धर्ता भी था। यह तय हुआ कि अगले दिन से इसी समय वह मुझे ट्रेनिंग देगा। हम सब एक साथ आएंगे। एक घंटा पिंकी और वे लोग सैर करेंगे और मैं अपनी ड्राइविंग क्लास।  उसने एक फॉर्म पर वहीं  मेरे हस्ताक्षर लिए और कहा कि मैं कल एक फोटो और फीस जमा कर दे दूँ। सब कुछ बहुत सरलता से हो गया था। मुझे उसी क्षण से लगने लगा था कि मैं अब अपनी कार चला सकता था और पिंकी को बगल में बिठा दूर तक जा सकता था।  घर पहुंचे तो माँ ने हँसते हुए स्वागत किया। उन्होंने पिंकी का हाथ पकड़ कहा, ' मनप्रीत, यह बहुत अच्छा काम किया जो अभिजीत को सुबह उठा, सैर पर ले गयी..वह कुछ कहती इससे पहले ही मैंने ड्राइविंग सीखने वाली बात बताई। उनकी प्रतिक्रिया वैसी ही थी जैसी मैंने आशा की थी। उन्होंने इसे खारिज़ करते हुए, बाबा को बुलाया और कहा, ' ये लोग कलकत्ता जैसे सड़कों पर खुद कार चलाएंगे ? ये खतरनाक काम नहीं होगा.. ड्राइवर रखो..देखते नहीं कितने एक्सीडेंट होते हैं, यहाँ.. ' हम दोनो शांत थे। 

Wednesday, January 13, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) - 54

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1                                (  हफ्ते वार इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ..  )  ( ५४ )     उस राजस्थानी परिवार के उत्सव में खाना तो शाकाहारी होना ही था। मैं तो हमेशा से नॉन वेजेटेरियन खाने का शौकीन रहा हूँ परन्तु यहाँ जो खाना खिलाया गया था, वह भी मुझे अच्छा लग रहा था। पिंकी बहुत आनंद के खा रही थी। उसकी नयी बनी मित्र और भाभी, उसके प्रति विशेष स्नेह दिखा रही थी। खाने के बाद भी उन्होंने हमें रोके रखा था और अपने सगे-सम्बन्धियों से पिंकी का परिचय करवाया था। वो लोग एक-दूसरे से संपर्क नंबर ले-दे रहे थे। पिंकी आकर्षण का केंद्र बनी हुई थी। मुझे अच्छा तो लग रहा था परन्तु मैं नहीं चाहता था कि मेरी पत्नी इन व्यवसायी परिवारों में घिरती चली जाये। अब जब सत्य को अपने साथ लेकर बैठा हूँ तो छुपाने का प्रयास नहीं करूँगा। उस दिन मैं एक हीन भावना से ग्रसित हो रहा था। उस धनाढ्य मारवाड़ी परिवार में, मैं खुद को जमा नहीं पा रहा था। मैं उनकी व्यावसायिक सफलता से अपने बंगाली समाज की असफलता को जोड़ कर देख रहा था। मैं भीतर ही भीतर  तैश में था। एक द्वन्द सा था जो मुझे विचलित किये जा रहा था। मैं खुद को सहज-सरल दिखाने को विवश था। मेरी अत्यंत विकट स्थिति बनी हुई थी। दूसरी ओर पिंकी थी जो सभी से सरलता और मुक्त ह्रदय से मिलजुल रही थी। वह अपने नाम के अनुरूप मनप्रीत बनी हुई थी। वह मेरी ओर देखती तो मैं मुस्कुरा देता था। मेरी मुस्कान में एक तरह का सन्देश छिपा होता था कि अब हमें चलना चाहिए। वह यह छिपा सन्देश पढ़ भी लेती थी और इशारे से कहती कि बस थोड़ी देर में चलते हैं।  कुछ समय बाद हम विदा लेने को तैयार हुए तो पिंकी की केडिया भाभी ने उसे प्रसाद के नाम पर एक बड़ा सा पैकेट पकड़ाया। पिंकी ने कहा कि हम तो प्रसाद ग्रहण कर चुके थे। उन्होंने कहा कि ये घर वालों के लिए था। फिर उन्होंने अपनी कार से हमें पहुंचा देने की पेशकश भी की। मुझे अच्छा तो नहीं लग रहा था परन्तु पिंकी ने थैंक यू और सो नाइस आदि कह दिया था, मुझे मान लेना पड़ा था। कार में बैठते ही मैंने  कहा, ' ऐसी जगहों पर मैं असुविधा महसूस करता हूँ..प्लीज, भविष्य में मुझे साथ चलने के लिए मत कहना..'  पिंकी ने आश्चर्य सा भाव दिखाया मानों कह रही हो, ' अरे यह क्या बात हुई..' कुछ क्षण बाद उसने कहा, ' पहली बार मिले थे न  इस लिए कम्फर्टेबल नहीं थे..दोस्ती हो जाएगी तो ठीक हो जायेगा..मुझे भी शुरू में ऐसा ही लगा था पर बाद में मुझे ये लोग अच्छे लगने लगे..' उसकी इस बात पर मैंने कोई प्रतिक्रिया न दी थी। पिंकी को शायद लगा था कि मैं उसकी बात से सहमत हो गया था परन्तु मैं सोच रहा था कि बाद में यह खुद ही समझ जाएगी कि व्यावसायिक समाज के लोगों से घनिष्टता अच्छी नहीं होती। बौद्धिक स्तर पर हम उनके साथ नहीं मिल सकते। हमारा घर अधिक दूर न था। कुछ ही मिनटों में हम घर के सामने थे। पिंकी ने हैरानी दिखाते हुए कहा, ' अरे पहुँच भी गए ? मैंने कहा, ' हाँ, वाकिंग डिस्टेंस ही तो है.. हम आराम से पैदल चल कर आ सकते थे..तुमने बेकार में उनकी कार ली..' पिंकी ने हँसते हुए कहा, ' मैंने क्या ली..वो इतने  प्यार से कह रही थी तो ना कहना अच्छा थोड़े ही लगता ? पिंकी ने भैया कहकर ड्राइवर को धन्यवाद दिया था। उसने भी आदर के साथ गुड नाइट कहते हुए, फिर से कभी आने के लिए कहा था। उसके हावभाव से मैं समझ गया था कि वह बिहार का था। उस समय मैंने सोचा था कि इस तरह के ड्राइवर और काम वाले मिलना सौभाग्य की बात थी। साथ ही मैंने यह भी सोचा कि इन व्यापारी अमीर लोगों से इन्हें अच्छी तनख्वाह मिलती है तभी तो ये अच्छे से काम करते हैं।  ऊपर घर पर प्रवेश करने पर माँ को प्रतीक्षा करते पाया था। वह कुछ गंभीर भी दिखीं थी। मैंने इशारे से पूछा कि सब ठीक था न ? उन्होंने कहा, 'हाँ, सब ठीक है..' फिर उन्होंने पिंकी की ओर देखते हुए कहा, ' मनप्रीत, कैसी रही तुम्हारी पूजा-पार्टी ?  पिंकी मुस्कुरा दी, 'पार्टी नहीं मम्मी जी  ..पूजा और लंगर प्रसाद.. बहुत अच्छा लगा..पर आपका बेटा वहां बोर हो रहा था..' माँ ने मेरी ओर देखते हुए कहा, ' इसका पूजा-पाठ में दिल थोड़े ही लगेगा..ये बचपन से ही ऐसा है..अच्छा सुनो, कल का कोई कार्यक्रम न रखना.. कल मनप्रीत को मेरे साथ कहीं जाना है..'  मैंने मामला जानना चाहा तो माँ ने बताया कि जद्दूबाबू बाजार इलाके के किसी पंजाबी परिवार की एक घटना, वहां के पुलिस थाने में दर्ज हुई थी। पारिवारिक हिंसा का मामला था। क्षेत्र के सांसद ने उन्हें फोन किया था कि माँ को परिवार वालों से जाकर मिलना चाहिए। बाद में पुलिस थाने और स्थानीय विधायक के फोन भी आये थे। अब बात यह थी कि विधायक विपक्ष की पार्टी के थे। सांसद जो वामफ्रंट के थे, मेरे नाना के अनुयायी थे, वह चाहते थे कि माँ, मनप्रीत के साथ वहां जाये ताकि माँ की पंजाबी बहू होने का प्रभाव डाला जा सके। पिंकी ने जब यह सब सुना तो उत्साहित हो गयी थी। उसने कहा, ' मैं तो जरूर जाऊंगी..और बंगाली साड़ी पहनूंगी..'  माँ ने उसे टोक दिया, ' अरे, बंगाली साड़ी किसी और दिन पहनना..कल तो तुम्हें पक्की पंजाबन बनकर मेरे साथ जाना होगा..मामला एक पंजाबी परिवार का है..समझी ?  पिंकी हंसने लगी। बाद में उसने गहरे लाल रंग की पंजाबी ड्रैस निकालकर मुझे दिखाई थी और पूछा था कि वह ड्रेस अगले दिन  के लिए कैसी रहेगी ? मैंने बिना देखे कहा था, ' जो भी पहनो, ठीक है..' उसने कहा, 'ये क्या बात हुई, बिना देखे कह रहे हो कि ठीक है ? मैं थोड़ा सा झुंझला गया था। मैंने कहा, ' अब मैं क्या कहूं..बंगाल में हो तो तुम्हें यहाँ जैसी ही दिखना चाहिए.. यहाँ भी पंजाबी ही बन कर रहना चाहती हो तो मैं क्या कहूं ? वह मुझे देखती रह गयी थी। उसने कहा कि वह तो मम्मी जी के आदेश का ही पालन कर रही थी, उन्होंने ही उसे पंजाबी ड्रेस पहनने को कहा था। मैंने आँखे चुराते हुए, उसकी बात में सहमति जताई थी परन्तु मेरे दूसरी ओर मुंह फेर लेने से वह मेरा मन भांप गयी थी। उसने कहा, ' मम्मी जी की बात को न तो नहीं कह सकती.. और देखा जाये तो उनका कहना गलत नहीं है क्यों कि वह मुझे किसी पंजाबी सिख परिवार में ले जा रही हैं..' मैंने बात को समाप्त करते हुए कहा था, ' चलो छोड़ो इस बात को..तुम जानोऔर माँ जाने..'  अगले दिन माँ और पिंकी अपने मिशन पर निकलने को तैयार थे। मैं पिंकी को देखता रह गया था। उसने इशारे से पूछा कि वह कैसी लग रही थी ? मैं मुस्कुरा दिया था। मुझे मुस्कुराता देख, वह खिलखिलाई और माँ की ओर देख बोली, ' मम्मी जी मैं रेडी हूँ.. चलें.. ' माँ भी तैयार हो चुकी थी। दोनों राज्य महिला आयोग का बोर्ड लगी गाड़ी में निकल गए थे। मुझे अच्छा तो न लग रहा था कि माँ उसे अपने शासकीय कार्य में ले गयी थी परन्तु मैं समझ पा रहा था कि इस तरह के कार्यों में जोड़तोड़ तो लगाया ही जाता है। इसके साथ, इसी बहाने नवविवाहिता पंजाबी बहू को कलकत्ता की गतिविधियाँ देखने को मिल रहीं थी। मैं औंधें लेटे हुए कल्पना कर रहा था कि वो दोनों अब तक घटना स्थल वाले घर पहुँच गए होंगे और माँ अपने मिज़ाज़ के हिसाब से रुवाब दिखा रही होंगी और पिंकी चुपचाप एक ओर खड़ी, कलकत्ता के सिख-पंजाबी परिवार की स्थिति का अंदाज़ा लगा रही होगी। शायद कुछ ही समय में वह उस परिवार में घुलमिल भी जाएगी। साथ ही साथ सोच की एक अन्य लहर भी दौड़ी चली जा रही थी कि क्या मेरी पत्नी का इस तरह से सब से घुलमिल जाना और सब को अपना बना लेना, न जाने, हमारे पारिवारिक जीवन के लिए कैसा होगा ? उसने मेरे माँ-बाबा, बिशाखा, बाबा के मित्र और मेरे काका के साथ साथ, केडिया परिवार और उस बांग्ला टीवी की समाचार एंकर को तो प्रभावित कर ही लिया था। माँ, महिला आयोग के काम में उसका सहयोग अपने लिए अच्छा मानने लगी थी। केडिया भाभी ने तो मानों उसे अपनी सबसे प्रिय सहेली बना लिया था। वह टीवी एंकर जिससे मैं प्रभावित हुआ करता था, अपना विजिटिंग कार्ड पिंकी को दे चुकी थी और उससे आश्वासन ले चुकी थी कि कभी वह पंजाब सम्बंधित टीवी कार्यक्रम बनाएगी तो उसमें उसे जरूर भाग लेना होगा। पिंकी का मोबाइल नंबर भी उसने, मनप्रीत कौर के नाम से रख लिया था। मैं इन ख्यालों में भटका हुआ था कि रोबी दा का फोन आ गया था। उन्होंने क्षमा दर्शाते हुए बात आरम्भ की थी। उन्होंने कहा कि वह समझ सकते थे कि मैं अपनी पत्नी के साथ व्यस्त होऊँगा और अवकाश का आनंद ले रहा होऊंगा परन्तु उनकी आवश्यकता अपरिहार्य थी। उन्होंने मुझे संध्या चार बजे एक बैठक, जो काशीपुर क्षेत्र में होने जा रही थी, में उनके प्रतिनिधि के रूप में जाने का आग्रह किया था। उन्होंने बताया था कि अस्वस्थ होने के कारण वह न जा पा रहे थे। उन्होंने आयोजकों को इसकी सूचना भी भिजवा दी थी। रोबी दा ने आग्रह शब्द तो कहा था परन्तु उनके स्वर में निर्देश का भाव था। मैं क्या कहता ? ' ठीक है, रोबी दा ..' कहने के अतिरिक्त मेरे पास कोई विकल्प न था।  काशीपुर एक भीड़भाड़ वाला क्षेत्र है। वहां पहुँचने के लिए काफी समय लग जाता है। मुझे वैसे भी वह क्षेत्र अच्छा न लगता था। उस दिन कलकत्ता का मौसम भी प्रतिकूल था। वर्षा अपना विराट रूप दिखाने के मिज़ाज़ में थी। बेमना सा मैं, परेशान  था। मैंने बिशाखा को बुला, उसे मेरे लिए खाना बनाने को कहा था। मैंने उसे कहा कि मुझे किसी अत्यंत आवश्यक कार्य के लिए बाहर जाना था। वह मुझे देखती रह गयी मानों कह रही हो, ' बहूमाँ तो आ जाए .. एक साथ खाना..'  मैंने भी उसका मन पढ़ लिया था और कहा, ' माँ अपनी बहू को लेकर गयी हुई हैं.. वे दोनों कब कब लौटेंगी, कुछ ठीक नहीं.. मैं खाना खा कर निकल जाता हूँ.. बहुत आवश्यक कार्य है, मैं विलम्ब नहीं कर सकता..तुम उन्हें बता देना ..'    जैसा अनुमान था वैसा ही हुआ था। मेरे घर से निकलने के कुछ समय बाद ही मौसम ने करवट ले ली थी। तेज प्रवाह से हवाएं चलने लगी थी और जोर से वर्षा होने का आभास होने लगा था। कलकत्ता की सड़कों में पानी जमने में देर नहीं लगती। मैं गरियाहाट तक पैदल चल पहुंचा था और वहां से किसी तरह एक भीड़भाड़ वाली बस में चढ़ तो गया किन्तु मैं समझ पा रहा था कि एक-डेढ़ घंटे बाद जब गंतव्य पर उतरूँगा तो मेरी दशा कैसी होगी ? मेरे जूते भीग चुके थे और छाता अपने काम में नाकाम हो रहा था। मैं रोबी दा को मन ही मन कोस रहा था कि उन्होंने मुझे फँसा दिया था। काशीपुर पहुँचने पर मैं टूट चुका था। इधर-उधर पूछते हुए बैठक स्थल पर पहुंचा था। यह पार्टी का उस क्षेत्र का कार्यालय था। कुछ ही लोग आये हुए थे। मैंने अपना परिचय संयोजक महोदय को दिया तो उन्होंने एक कुर्सी की ओर बैठने का संकेत किया और आगे निकल गए थे। सब खामोश बैठे थे। लगता था वे सब मेरे ही तरह किसी वरिष्ठ का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और आपस में उनका एक-दूसरे से परिचय न था। मेरे पास बैठे सज्जन ने मौसम का हवाला देते हुए बात आरम्भ की थी। उसका आरोप था कि नगर की जलनिकासी की पुख्ता व्यवस्था नहीं की जा रही थी। वह मेरी ही उम्र का युवक था। वह अपनी ओर से कई बातें किये जा रहा था। वह जिस स्थान से आया था, वह काफी दूर था और तीन बसें बदलकर वहां पहुंचा था। मैं उसकी बातें चुपचाप सुने जा रहा था। मैंने उससे केवल इतना कहा, ' मीटिंग कब आरम्भ होगी, समय तो हो चुका था ? उसने तीन नाम लिए थे और बताया था कि जब तक वे नहीं पहुँच जाते, मीटिंग आरम्भ होने का प्रश्न ही नहीं था। अब मैं उठा और बाहर चला आया था। सामने एक चाय की दुकान थी। वहां एक कप चाय पी थी। हम कलकत्ता वासी चाय के लिए कप शब्द का प्रयोग करते हैं परन्तु यहाँ यह चाय का कप, एक मिटटी का भाड़ होता है जिसे गैर बंगाली लोग कुल्हड़ कहते हैं। मैंने एक सिगरेट भी सुलगायी थी हालाँकि  पिंकी को याद कर मैंने दो कश के बाद ही उसे एक ओर फेंक दिया था। मैं सोच रहा था कि अब तक वह घर आ चुकी होगी। मुझे यह भी आभास था कि उसने माँ का अच्छे से सहयोग किया होगा और उस पीड़िता को न्याय का पूरा भरोसा दिया होगा। पीड़िता ने पिंकी में एक सच्ची सहेली देखी होगी। माँ ने अपने मिशन की सफलता पर, घर पहुँचते ही कई जगह फोन किये होंगे और घटना को बढ़ा -चढ़ा कर बताया होगा। वह अपनी बहू पर स्नेह वर्षा कर रही होंगी और अपना स्नेह कुछ यूँ दर्शाया होगा, ' मनप्रीत, आज तुम्हारे हाथ के बने,आलू के पराठें खाने का मन है..'  ( आज यहीं तक, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर   .. )

Wednesday, January 6, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -53

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1                                (  हफ्ते वार इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ..  ) ( ५३ ) मैंने चार सप्ताह की छुट्टी ली हुई थी तो ऑफिस की ओर से निश्चिंत था। न सुबह की दौड़ा-दौड़ी और न शाम को देर से घर लौटने की चिंता। मैं और पिंकी एक बेसुध से संसार में थे। पिंकी ने सुबह जॉगिंग जाना शुरू कर दिया था। पहली सुबह माँ ने उसके साथ बिशाखा को भेजा था परन्तु दूसरे दिन से उसने अकेले जाना शुरू कर दिया था। उसका कहना था कि उसने लेक का क्षेत्र और पथ समझ लिया था। पिंकी ने कहा कि साथ चलना हो तो मुझे ही चलना चाहिए वर्ना वह अकेले ही जाया करेगी। मैं एक दिन गया भी था। पिंकी पूरी तैयारी के साथ जाती थी। जॉगिंग सूट, जॉगिंग शू, सिर पर कैप और पीछे पैंट के पॉकेट में छोटी सी वाटर-बॉटल। दो-चार दिन में ही उसने कुछ मित्र भी बना लिए थे जो हमारे घर के आसपास ही रहते थे। ये मारवाड़ी परिवार से थे और अब पिंकी उन्हीं के साथ वापिस आती थी। एक दिन वह मुझे उनसे मिलाने ले गयी थी। मैं नानुकर करता रहा परन्तु अंततः एक दिन जाना ही पड़ा था। ये दो दंपति थे जो गुरुसदा रोड के एक महंगे आवासीय परिसर में रहते थे और हमारे घर के पास से गुजरते थे। वे अपनी अपनी कार लेकर उस खूबसूरत लेक तक जाते थे और लौटते में पिंकी को ड्राप कर देते थे। मैं उनसे मिला तो थोड़ा सा असहज महसूस कर रहा था। पिंकी तो उनसे घुलमिल गयी थी। अब तो सच ही लिखने बैठा हूँ और सच कहूं तो मैं हीन भावना से ग्रस्त हो रहा था। पिंकी ने बाद में मुझे मेरी असहजता का अहसास दिलाया था। उसने कहा, 'तुम्हारा व्यवहार ऐसा नहीं होना चाहिए..जिस से भी मिलो, खुलकर मिलो..'  मैंने कहा, ' मुझे न जाने क्यों इन व्यापारी लोगों से असुविधा सी होती है..और मैं हिंदी में बातचीत भी नहीं कर पाता..' पिंकी ने हैरान होते होते हुए कहा, ' पर वे लोग तो तुमसे बंगाली में बात कर रहे थे ..उन्हें तो बड़ा अच्छा लगा था जब मैंने उन्हें बताया था कि मैं एक सिख पंजाबी हूँ और मेरे हस्बैंड बंगाली.. इसीलिए तो वे तुमसे मिलना चाहते थे ..उन्होंने तो हमें सैटरडे शाम को घर पर बुलाया भी है.. कोई पूजा-पाठ है ..  मैंने ये सुना तो तपाक से कहा, ' मैं नहीं जाऊँगा..तुम चली जाना..' पिंकी ने भी उतने ही तपाक से जवाब देते हुए कहा, ' अरे ये क्या बात हुई, मैं अकेले ? दोनों को बुलाया है, दोनों जायेंगे..' मैंने फिर से ना - ना किया तो उसने कहा कि अकेले तो वह बिल्कुल नहीं जाएगी और उन्हें मना कर देगी। पिंकी का मिज़ाज देखते हुए मैंने कहा, ' ठीक है, तुम ज़िद कर रही हो तो चलेंगे परन्तु मेरा मन तो नहीं है..' दो दिन बाद ही शनिवार था। उस सुबह ही पिंकी ने मुझे याद दिला दिया था कि शाम को केडिया भाभी के घर जाना है। ये सुन स्वतः ही मेरा मुँह बन गया था और पिंकी ने देख भी लिया था। उसने कहा, ' ऐसा मुँह मत बनाओ, मैं कह रही हूँ न कि वे अच्छे लोग हैं, तुम्हें वहां अच्छा लगेगा.. तुम्हें ऐसे लोगों के साथ उठना-बैठना चाहिए..वहां और भी कई लोग मिलेंगे..' मैंने कुछ न कहा परन्तु मैं जानता था कि वहाँ मुझे कैसा लगेगा।  पिंकी ने दिन में ही मेरे और अपने लिए, शाम को पहनी जाने वाली ड्रेस निकाल कर रख दी थी। मेरे लिए उसने काली टी-शर्ट और हल्के नीले रंग की जीन्स चुनी थी। मैंने देखा तो थोड़ा उखड़ गया, ' ये क्या ? मैं अपनी बंगाली पोशाक में ही जाऊँगा..मेरा कुरता-पजामा ही ठीक है..' पिंकी ने विरोध सा दिखाते हुए कहा कि ये टी-शर्ट मुझ पर बहुत खिलेगी। उसने यह भी कहा कि उसी के साथ मैच करती ड्रेस उसने अपने लिए भी निकाली है। दोनों अच्छे दिखेंगे। मैं न-न करता रह गया था परन्तु शाम को उसकी चुनी ड्रेस पहन तैयार हो गया था। हम दोनों नीचे आये तो मेरी माँ हमें देखती ही रह गयी थी। उन्होंने बिशाखा को लाल मिर्च जलाकर लाने को कहा, ' क्या जोड़ी सजी है.. आओ नज़र उतार दूँ .. ' फिर उन्होंने पूछा, ' वहां कैसे जाओगे ? पिंकी ने मेरी ओर देखा था। मैंने कहा, ' पास में ही तो जाना है.. पैदल ही चले जायेंगे या फिर टैक्सी ले लेंगे हैं..'  अब पिंकी ने कहा, ' यहाँ की टैक्सी की हालत में देख चुकी हूँ..सो डर्टी एंड खटारा .. मैं टैक्सी में नहीं जाऊँगी.. वाक ही कर लेते हैं..'  माँ ने कहा कि उनकी ऑफिस की कार आयी हुई थी क्यों कि उन्हें कहीं जाना था, वह हमें छोड़ देंगी। अब पिंकी ने कहा कि अपनी एक कार होनी चाहिए। फिर आवेश में उसने कहा कि उसके मामाजी के पास तीन कारें थी और जब उसने ऑफिस ज्वाइन किया था तब वे एक छोटी कार उसे देना चाहते थे। वह उनसे कहेगी तो वह भिजवा देंगे। माँ ने कहा, ' तुम दोनों देख लो ..जैसा ठीक लगे, करो..' मैंने कहा कि मामाजी से कार लेना उचित न था। पिंकी ने कहा कि संकोच की कोई बात न थी क्यों कि उस कार को ऐसे ही रखा हुआ था। मामाजी के लिए उसका कुछ उपयोग नहीं था। वह जब भी दिल्ली जाती थी तो इस कार को निकालती थी। उसने कहा कि वह रात को ही अपने मामाजी को फोन करेगी। मैंने न तो कहा था परन्तु उसमें एक तरह का हाँ छिपा था। मैं भीतर ही भीतर कुछ और ही सोच रहा रहा था कि कार आएगी तो पिंकी ही चलाएगी मुझे तो ड्राइविंग नहीं आती थी। माँ भी तैयार हो चुकी थी। उन्होंने हमें साथ लिया और अपने ड्राइवर से कहा, ' शिबू, इन्हें गुरुसदा रोड पर छोड़ते हुए जाना है..'  रास्ते में उन्होंने बताया कि अगले दिन किसी क्लब के महिला विभाग की ओर से उन्हें एक गोष्ठी में आमंत्रित किया गया था और मनप्रीत को भी उनके साथ जाना होगा।  हम केडिया भाभी के नौवें फ्लोर के फ्लैट में पहुंचे तो वहां काफी धूमधाम देखी थी। मैंने पिंकी से पूछा, ' केडिया भाभी कहती हो परन्तु उनका नाम क्या है   ..' पिंकी ने कहा, ' कोमल  .. कोमल केडिया   ..' उनका बहुत बड़ा फ्लैट था। लिफ्ट से उनके फ्लोर पर उतरते ही उनके घर पर हो रही पूजा का माहौल दिखने लग गया था। फूलों से पूरे फ्लोर को भव्य रूप से सजाया गया था। केडिया भाभी बहुत प्यार से मिली थी। उन्होंने पिंकी को गले लगाया, ' मनप्रीत, बहुत आभार, तुम आई हो, मेरे घर..चलो पहले मंदिर में दर्शन कर लो..' मुझे भी उन्होंने भैया कहकर नमस्ते कहा था। वह पिंकी को हाथ पकड़कर पूजा घर ले गयी। मैं पीछे पीछे था। उनका पूजा घर एक बड़े कमरे में था। एक ओर संगमरमर का अति सुन्दर मंदिर था। उसके सामने महिलाएं बैठी हुई थी। राधा-कृष्ण की मूर्तियां सजी हुई थी और भजन की ध्वनि महक रही थी। मैं अपरिचित और ठगा सा एक ओर खड़ा था। केडिया भाभी, पिंकी को अपनी माँ और अन्य महिलाओं से मिलवा रही थी। अचानक मैंने देखा कि बांग्ला टीवी की एक प्रसिद्द समाचार वाचिका भी वहां थी। भाभी ने पिंकी को उससे मिलवाया, ' ये मेरी नयी फ्रेंड हैं, मनप्रीत कौर.. ये चंडीगढ़ से आयी है..यहाँ कलकत्ता में इसकी बंगाली ससुराल है..'  उस समाचार वाचिका से मैं बहुत प्रभावित हुआ करता था। उसका बांग्ला भाषा में वाचन और बंगाली साड़ी और माथे की बिंदिया मुझे बहुत प्रभावित किया करती थी। मेरा मन हुआ कि उससे मिलूं। तभी पिंकी ने मुझे इशारे से बुलाया और उससे कहा, ' ये हैं मेरे हस्बैंड, अभिजीत रॉय..'  उसने मेरी ओर हाथ बढ़ा दिया और तपाक से हेलो कहा। उसके इस अंदाज़ से क्षण भर को मैं असहज हुआ क्यों कि समाचार पढ़ते उसे देखता था तो मुझे उसमें आदर्श बंगाली नारी दिखती थी। यहाँ वह एकदम आधुनिका नारी सी दिख रही थी। मैंने बांग्ला में कहा, 'आप यहाँ ? उसने केडिया भाभी की ओर इशारा करते हुए अंगेरजी में उत्तर दिया, ' कोमल मेरी पुरानी और बहुत अच्छी मित्र है ..' मैं कुछ और बात करता इससे पहले ही वह आगे बढ़ गयी थी और दूसरों से मिलने-जुलने लगी थी। मैं सोच में था कि दूरदर्शन पर ये कितनी सौम्य और बंगाली दिखती है और वास्तविकता में अत्यंत आधुनिक और फ़ास्ट लेडी। मैंने इधर-उधर नज़रें घुमाई। हर ओर मुझे वैभवता ही दिख रही थी। मैं सोचने लगा कि ये मारवाड़ी लोग कलकत्ता में आकर कितने धन वान हो जाते हैं। अपने क्षेत्र में तो ये लोग शायद किसी छोटी-मोटी दुकान के मालिक भी न हों। उस बंगाली समाचार वाचिका के व्यवहार और इस मारवाड़ी घर की भव्यता ने मुझे खिन्न सा कर दिया था। मैंने मौका लगते ही पिंकी से घर लौटने को कहा था। वह हैरान हो मुझे देखने लगी थी। उसने कहा कि अभी तो आरती होगी और उसके बाद खाना भी था, ऐसे में जल्दी से लौट जाना ठीक नहीं लगता। मैंने कहा कि किसी आवश्यक कार्य का बहाना बना दो। परन्तु उसने मेरी बात का नकार दिया था और मुझे भाभी के हस्बैंड के साथ बातचीत करने को कहा था। उसने दूर खड़े एक सज्जन की ओर इशारा करते हुए कहा, ' वह उधर खड़े हैं दिनेश भैया, आओ तुम्हें मिलवा दूँ ..' मुझे यह विचित्र सा लगा था। मैं जन्म से कलकत्ता का रहने वाला और यह पहली बार पंजाब से आयी लड़की, मुझे ही एक अन्य कलकत्तावासी से मिलवा रही थी। मैंने कहा, ' छोड़ो न, क्या करना है इनसे मिलकर..हमें तो अभी यहाँ से निकलना ही है ..'  एक क्षण को मुझे उसका दिनेश भैया वाला संबोधन भी खटका था। मेरा शिकायती मन गतिशील हो रहा था। मैंने सोचा कि उन्हें मुझसे मिलना चाहिए था क्योंकि हम उनके घर आये हुए थे। पिंकी शायद मेरा मन भांप गयी थी। उसने कहा कि इतने लोग आये हुए थे शायद वह व्यस्तता में खुद से आगे बढ़ मिलने न आ पाए होंगे। उसने धीमे से यह बात कही थी। धीमी या मन ही मन में कही बात भी कभी कभी अपने गंतव्य तक पहुंच जाती है। कुछ ही समय में केडिया साहब, हम दोनों के पास चले आये और मुझसे से नमस्ते करते हुए कहा, ' बहुत अच्छा हुआ जो आप आये.. मनप्रीत जी से आपके बारे में सुना था .. आज मिलना भी हो गया.. आराम से बैठिये.. अपना ही घर समझिये  ..' फिर उन्होंने आगे बढ़ते हुए कहा, ' आप भी सुबह मॉर्निंग वाक पर आया करिये..सुबह की सैर बहुत अच्छी होती है..हमारा ब्लड प्रेशर और शुगर तो इसी से कंट्रोल में रहता है..' मैं केवल मुस्कुरा दिया था और वह आगे बढ़ गए थे।  पिंकी ने हल्की सी नाराज़गी दिखाते हुए मेरे कान में कहा, ' आपको कुछ कहना चाहिए था.. उन्हें अपने घर इन्वाइट करना चाहिए था..इसी तरह से तो दोस्ती बढ़ती है..'  मैंने उसकी बात का उत्तर न दिया था परन्तु मेरा दिमाग़ संवाद कर रहा था। उसने कहा, ' ये व्यापारी और हर सम्बन्ध में लाभ-हानि सोचने वाले लोग, हमारे बंगाली स्वतंत्रता सेनानी के घर में क्या पाएंगे..'( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे, यहीं पर   ..)