Chander Dhingra's Blog
Wednesday, February 24, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 60
टू स्टेट्स - एक नई कहानी
( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( ६० ) पिंकी ने इन कुछ माह में ही अपने कार्य स्थल पर अच्छी खासी जगह बना ली थी। हर शाम हम परिवार वाले मिलते तो पिंकी की ही बातें होती थी। उसके घर लौटने का समय अब अनिश्चित सा हो गया था। अक्सर देर से पहुँच पाती थी। आज ये हो गया था, आज वो हो गया था.. आज मीटिंग थी.. आज वहां जाना पड़ गया था ..' वह घर आती तो ऐसी बातों से ही शुरुवात होती थी। एक दिन मैंने उसे कहा था कि अपने काम में उतना ही उलझना चाहिए, जितना आवश्यक हो, उससे अधिक नहीं। परन्तु उसने कहा था कि अपने काम को उस स्तर तक ले जाना चाहिए जो श्रेष्ठम हो, भले ही इसके लिए कितना ही श्रम और समय क्यों न देना पड़े। बाबा मेरी बात में सहमति जताते और उसे कहते कि वह थक जाती होगी। इस पर वह कहती कि क्या उन्हें वह थकी-हारी दिखती थी ? उसका तर्क होता कि जब वह किसी दायित्व को सम्पूर्णता में निपटाती है तो उसे जो संतोष मिलता है वह उसके लिए सबसे विश्राम वाला पल होता है। वह सदैव स्फूर्ति से भरी दिखती थी। मुझे सुस्ताता देखती तो हँसते हुए कहती, ' क्यों, क्या आज फिर अधिक खा लिया है ? बिशाखा से कहूँगी, आपको माछ-भात कम दिया करे .. ' मैं मुस्कुरा देता था और कहता, ' चलो, तुमने माछ-भात कहना तो सीख लिया है.. आराम भी आवश्यक है, ज़िन्दगी में.. तुम भी सुस्ता लिया करो.. माछ-भात खा कर.. ' उसका जवाब होता, ' संडे है न रिलैक्स करने के लिए ..' मैं उसकी बात पर मन ही मन सोचता कि इस लड़की ने अपनी कैसी दिनचर्या बना रखी है। सप्ताह में सुबह चार दिन जॉगिंग और दो दिन म्यूजिक क्लास जाती है, फिर भागते-दौड़ते प्रातः के कर्म निपटाती है और बाय मम्मी जी - बाय पापा जी कहते हुए, अपने होटल की तरफ दौड़ती है। घर लौटने का कोई निश्चित समय नहीं। संडे की बात कर रही है पर उस दिन तो यह बिशाखा को छुट्टी दे देती है। उसे कहती है, ' दीदी, आज आप बैठो...आज मैं खिलाती हूँ...' इसके अलावा माँ भी उसको अपने साथ यहाँ-वहाँ ले जाने को आतुर रहती है। पिंकी को अपने साथ ले चलने में क्या माँ को एक तरह का आत्मबल मिलता था ?
मैंने निश्चय किया कि एक रविवार को पिंकी को साथ लेकर कहीं घूमने जाया जायेगा। मैंने उसे दो दिन पहले ही कहा था, 'संडे को फ्री रहना.. हम लोग कहीं दूर जायेंगे.. ' फिर मैंने उसे बताया कि सुबह बेलूर मठ जायेंगे, लंच एक खास बंगाली होटल में खाएंगे और फिर एक पिक्चर देखेंगे..' वह बहुत खुश थी। उसने कहा, ' बंगाली पिक्चर दिखानी होगी..लवली पूछती रहती है कि कोई बंगाली पिक्चर देखी या नहीं ? मुझे उसका प्रस्ताव अच्छा लगा था। मैंने कहा कि बंगाली पिक्चर ही देखेंगे। मैं दो दिन तक रविवार का इंतज़ार करता रहा था। आज रविवार था। हम दोनों ही उत्साहित थे। रात को ही यह तय किया था कि सुबह ही निकल जाएँगे। सब ठीक था कि पिंकी के लिए उसके कार्यालय से फ़ोन आ गया था। कुछ विशेष कार्य आन पड़ा था और उसे बुलाया जा रहा था। पिंकी ने स्पष्ट शब्दों में इनकार कर दिया था। उसने कहा कि उसके कुछ कार्यक्रम पहले से ही तय थे और किसी भी हाल में उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता था। हम घर से निकल ही रहे थे कि उसका मोबाइल बज उठा था। ये उसके विभाग के वरिष्ठ प्रबंधक का कॉल था। पिंकी, एक ओर होकर मोबाइल पर ग़ौर से बात सुनती रही और यस सर कहकर मेरे पास आयी। उसने कहा, ‘ मैं होकर आती हूँ .. इस काम को टाला नहीं जा सकता .. मैं एक-दो घंटे में ही आ जाऊँगी..’ मैंने कहा, ‘ तुम्हें एकदम पक्का होकर ना कहना चाहिए था.. सप्ताह में एक दिन तो अपने लिए होना ही चाहिए..’ उसने कहा, सर ने ख़ुद कॉल किया था, उन्हें ना नहीं किया जा सकता..’ मैंने कहा,’क्यों नहीं.. आज संडे है..’ उसने कहा, ‘ जब दायित्व होता है और किसी को आप पर विश्वास होता है तो ना नहीं कर सकते..’ मैंने कहा,’ तुम्हारी जगह मैं होता तो कभी न जाता..’ पिंकी को मेरी बात असत्य सी लगी थी। उसने कहा, ‘ क्या आप अपने रवि साहब को उस दिन ना कर पाए थे ? थोड़ा संयम रखो ..मैं होकर आती हूँ .. बेलूर मठ किसी अन्य दिन चले जायेंगे ..आज लंच एक साथ लेंगे और पिक्चर भी देखेंगे ..और दोनों बंगाली ..’ उसने मुस्कुराते हुए मेरा हाथ दबा दिया था। मैं परेशान तो हो रहा था परंतु मैं भी मुस्कुरा दिया था। मैंने कहा, ‘ चलो ..जल्दी आना .. लेकिन तुम्हारे ऑफिस के काम और रोबी दा के काम में फ़र्क़ है ..वह सामाजिक दायित्व है.. दोनों का अंतर तुम्हें समझना चाहिए ..’ उसने कुछ भी उत्तर न दिया और मुस्कुराते हुए निकल गयी थी, यह कहकर कि जल्दी आने की कोशिश करेगी।
मैं उसकी प्रतीक्षा में उबासियाँ ले रहा था। एक बंगाली उपन्यास हाथ में था जो मेरा साथ दे रहा था। मैं पन्ने उलटता रहा और उस कहानी को किसी-किसी मोड़ पर खुद से जोड़ता रहा था। अचानक घड़ी में देखा तो सुइयाँ एक बजे की स्थिति को पाने की होड़ में दौड़ रही थीं। अरे! यह पंजाबी लड़की अभी तक नहीं आयी ? यह बेचैनी उस उपन्यास के लेखक पर पड़ी थी। मैंने प्रथम पृष्ठ पर छपे उसके नाम को अपने पैन से इस तरह से उलझाया था कि उसके अर्थ को अनर्थ कर दिया था और पुस्तक को अलग पटक दिया था। लगभग दो घंटे बाद पिंकी ने घर में प्रवेश किया। वह सॉरी -सॉरी कह रही थी और मैं खामोश था। उसने कहा,' क्या बताऊँ.. निकल ही रही थी तो निखिल ने खबर दी और मैं रुक गयी ..निखिल ने कहा कि अजय देवगन होटल में आ रहा था .. मैंने सोचा उसे पास से देखने का मौका है .. थोड़ी देर रुक जाती हूँ..मेरा पसंदीदा एक्टर है ..बस यह थोड़ी देर, अधिक होती चली गयी और मैं वहीं अटक गयी.परन्तु, इस रुकने का फायदा भी हुआ..मेरी एक फोटो उसके साथ खिंच गयी है..मिलेगी तो लवली को भेजूंगी..' वह किसी बच्चे की तरह एक साँस में कह गयी थी। मैं बहुत ही अधिक कुढ़ा हुआ था और भूख से भी ग्रस्त था। मैंने मन ही मन उसके सहायक निखिल को मनपसंद गाली दी और उसे कहा, ' एक तो सुबह का प्लान खत्म हो चुका था और अब तुमने लंच भी बेकार कर दिया.. अजय देवगन है क्या जो उसके लिए इतनी देर तक छुट्टी बेकार कर दी ? उसने मुझे देखा और कहा, ' सॉरी पर अजय देवगन को पास से देखने का मौका था.. कैसे छोड़ देती ? मैंने कहा, ' वो पंजाबी है इसीलिए न ? पिंकी ने मुझे घूरते हुए कहा, ' ये बात नहीं है.. वो अच्छा अभिनेता है और मेरा पसंदीदा है.. क्या तुम ने उसकी कोई फिल्म देखी है ? और पंजाबी-वंजाबी वाली बात होती तो आज मैं यहाँ ने होती.. मेरी तरह उसने भी एक बंगाली से शादी की है..' वह हँस रही थी। मैंने पैर पटकते हुए बिशाखा को आवाज़ दी और पूछा, ' कुछ खाने को मिलेगा, तुम्हारी बहू माँ ने लंच के बारह बजा दिए हैं..' पिंकी ने हँसते हुए कहा, ' बारह लंच के नहीं हम सरदारों के बजते हैं ..आपके लंच के तो तीन बज रहे हैं.. देर हो रही थी तो मैं रास्ते से तुम्हारा मनपसंद चाइनीस पैक करवा कर लायी हूँ .. आओ मुझे भी बहुत भूख लग रही है..' उसने बैग से लंच के चार डिब्बे निकाले। मैंने देखा, वह एक महंगे रेस्टॉरेंट का खाना था। मैंने कहा, ' इतने महंगे रेस्टॉरेंट से लाने की क्या जरूरत थी..' उसने फिर से चुटकी लेते हुए कहा ..' कभी कभी चलता है..हर बार महँगा-सस्ता नहीं देखा जाता..' बिशाखा ने प्लेटें लगा दी। पिंकी ने मुझे बुलाते हुए कहा, ' जल्दी आओ, अभी गरम है, खा लो ..' भूख तो लगी हुई थी, मैं खाने बैठ गया था। पिंकी भी चाव से खा रही थी। उसने बिशाखा से पूछा, मम्मी जी-पापा जी खाये छे ? ' इन दिनों वह बांग्ला बोलने का प्रयास करती थी। मैंने कहा, ' और नहीं तो क्या तुम्हारे इंतज़ार में बैठे रहते ? उसे मेरे कहने का अंदाज़ अच्छा न लगा था, ' वे दोनों तो घर पर ही खाने वाले थे..बाहर जाकर तो हम दोनों को ही खाना था..आप बिना वज़ह नाराज़ हो रहे हैं ..कभी कभी ऐसा हो ही जाता है.. इसमें इतना कुछ खोजने की क्या जरुरत है..' कभी हल्की सी बात भी अनचाहे ही गहरी हो जाती है। शायद उस दिन ऐसा ही हुआ था। आज सालों बाद याद कर रहा हूँ तो खुद पर क्रोधित और शर्मशार हो रहा हूँ। पिंकी अपने दायित्व को ही तो निभा रही थी। उसे शायद मुझसे सहानुभूति और कुछ स्नेह भरे शब्दों की आशा थी। एक मैं था, जो अधिक तो न बोल रहा था परन्तु मेरी बातों में एक तंज़ का स्वर था। किसी अभिनेता के प्रति झुकाव किसी भी लड़की के लिए स्वाभाविक है। एक उम्र के लड़के लड़कियों में यह होता ही है। मैं स्वयं भी तो उन दिनों एक बंगाली अभिनेता के प्रति आकर्षित हुआ करता था। उस दिन वह स्वादिष्ट लंच एक फ़ांस सा हो गया था। हम दोनों खा तो रहे थे परन्तु खामोश थे। ऐसा खाना केवल पेट के लिए होता है। वह भूख को समाप्त तो कर सकता है परन्तु आनंद और संतुष्टि नहीं दे सकता।
शाम को सरलता लाने के मकसद से मैं पिंकी के करीब आया था। वह माँ के बिस्तर पर ही विश्राम कर रही थी। मैंने उसे कहा, ' पिक्चर चलना है न ? उसने तुरंत तो उत्तर न दिया परन्तु मेरे दोबारा पूछने पर कहा, 'अब मन नहीं हो रहा .. थोड़ा सिरदर्द भी है ..आज नहीं, फिर कभी ..' मैंने उसे मनाने की कोशिश न की थी और न ही कुछ अधिक बोला था। मैंने केवल कहा, ' मैं समझ सकता हूँ.. काम का प्रेशर हो रहा है, तुम पर..आराम करो ..' वह बोली नहीं ऐसी कोई बात नहीं है .. चलो चलते हैं..बेलूर मठ जाने और बंगाली लंच का कार्यक्रम तो खत्म हो गया है.. अब बंगाली फिल्म का कार्यक्रम तो हो ही जाये.. चलो, मैं पांच मिनिट में तैयार हो जाती हूँ.. ' वह एक बार फिर से अपने स्वभाविक खुशमिज़ाज़ स्वरुप में थी। ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर )
Wednesday, February 17, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )- 59
टू स्टेट्स - एक नई कहानी
( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( ५९ ) दूसरे दिन जब हम सभी नाश्ते पर मिले तो माँ ने उस सेमिनार की बात फिर से छेड़ दी थी। उन्होंने मुझे कहा कि एक दिन का समय हाथ में था सो मुझे मनप्रीत को गाइड करना चाहिए। मैनें कहा कि उसे किसी मार्गदर्शन की आवश्यकता न थी। किंतु माँ ने कहा कि हमें मिलकर विषय का पुनर्पठन करना चाहिए। साथ ही कलकत्ता कार्पोरेशन और पश्चिम बंगाल के नियमों आदि के बारे में मुझे मनप्रीत को बताना चाहिए। मैंने पिंकी की ओर देखा तो ऐसा लगा कि वह माँ की बात से सहमत थी। मैंने कहा, ' ऊपर चलो, कुछ देख लेते हैं जो शायद कल तुम्हारे का आ जाये..' हम अपने कमरे में आ गए और मैं जहाँ तक संभव हो सका, उसे संभावित बातों और विषयों की जानकारी देता रहा था। पिंकी खुद में बहुत सुलझी हुई लड़की थी। वह किसी भी बात की पूरी जानकारी लेने में संकोच न कर रही थी। पूरा दिन उसी के साथ बीत गया था। दोपहर का खाना और शाम की चाय भी बिशाखा ऊपर ही दे गयी थी। देर से हम लोग, माँ के बुलाने पर पर नीचे आने लगे तो पिंकी ने कहा, ' एकाउंट्स पर आपकी जो पकड़ है, वह अद्भुत है..इतना सब ज्ञान कहाँ से प्राप्त किया ? उसकी प्रशंसा मुझे अच्छी लगी थी। मैंने कहा, ' तुम भी कुछ कम नहीं हो..कल तो तुम जीतकर ही आओगी.. मैं लिख कर दे सकता हूँ ..' माँ ने हम दोनों को हँसते हुए देखा तो कहा कि अब आराम करना चाहिए क्यों कि पूरा दिन हम विषय पर ही चर्चा करते रहे थे और मुझे इंटरव्यू में फ्रेश दिमाग के साथ जाना चाहिए। पिंकी ने कहा, ' हाँ, मम्मी जी, अब बस..जितना कुछ कर सकते थे कर लिया, अब बाबा का आशीर्वाद चाहिए .. ' बाबा का आशीर्वाद, यह सुन माँ ने पिंकी का माथा चूम लिया था। पिंकी ने तो अपने नानक बाबा का आशीर्वाद माँगा था किंतु माँ ने शायद इसे अपने लोक नाथ बाबा से जोड़ लिया था।
सुबह पिंकी उत्साह से भरी दिखी थी। उंसने कहा कि वह मुझे मेरे ऑफिस पर ड्राप कर इंटरव्यू के लिए निकल जाएगी। हम दोनों समय से तैयार थे। पिंकी अपनी पंजाबी पोशाक में, किसी को भी अभिभूत कर लेने की क्षमता में थी। एक चमक थी उसके चेहरे पर जो आत्मविश्वास को साफ दिखा रही थी। उसने माँ-बाबा के पाँव छुए तो कुछ बिना कुछ बोले ही उनके आशीर्वाद के स्वर झरते दिखे थे। बाबा ने अवश्य कहा, ' तुम को असफल करे, इतना साहस किसी में न होगा.. निश्चिंत होकर जाओ..' मैं भी जानता था कि वह निश्चय ही सफल होगी। मुझे मेरे ऑफिस के समीप उतार, वह मुस्कुरा कर कार से बाहर आयी और हमने एक-दूसरे को आलिंगन में लिया। मैंने कहा, ' आल द बेस्ट..' वह एक चुस्त-दुरुस्त एग्जीक्यूटिव की तरह, अपनी मारुती कार में आगे निकल गयी थी।
मैं ऑफिस में काफी समय तक उसके ही बारे में सोचता रहा था। फिर अपने काम में ऐसा व्यस्त हुआ कि दिन कब कट गया पता ही न चला। घर फोन किया तो बिशाखा ने बताया कि माँ-बाबा दोनों घर पर न थे और पिंकी अपने कमरे में थी। मैंने कहा, ' ठीक है.. कहना मैंने फोन किया था और मैं समय से घर पहुँच जाऊँगा..' जब मैं घर पहुंचा तो माँ-बाबा भी आ चुके थे। पिंकी उनके साथ हँसते-मुस्कुराते हुए बैठी थी। मैंने घर में घुसते ही उससे पूछा, 'कैसा रहा इंटरव्यू ? उसने मुंह बनाते हुए कहा, ' ठीक था..' उसका मुँह देख माँ-बाबा दोनों जोर से खिलखिला पड़े थे। बाबा ने कहा,' अरे ! हमारी बहू ने तो कमाल ही कर दिया है.. पूछो इससे .. ' मैंने पिंकी की ओर जिज्ञासा के साथ देखा। उसने कहा ,' ऐसा कुछ नहीं है..वे लोग मुझे कुछ एक्स्ट्रा कार्य देना चाहते हैं..मैंने अभी कुछ कहा नहीं है.. ' जब मैंने उससे विस्तार से बताने को कहा तो उसने बताया कि वे उसे फाइनेंस में केवल परियोजना का कार्य देना चाहते हैं लेकिन उसे साथ में कॉर्पोरेट वर्ग के विशेष अतिथियों के सत्कार विभाग की ज़िम्मेदारी दे रहे हैं। मैंने कहा कि यह तो बहुत अधिक कार्य हो जायेगा और उसे ना कर देना चाहिए। माँ ने कहा,' तुरंत निर्णय नहीं लेना चाहिए ..' मैंने कहा, ' सैलेरी एक और काम दो ? यह उचित नहीं होगा। पिंकी ने कहा कि ऐसी बात नहीं है.. फिर उसने प्रस्तावित सैलेरी के बारे में बताया तो मैं सकते में आ गया था। मेरा राष्ट्रीय कृत बैंक मुझे जो दे रहा था, यह राशि उससे चौगुनी से भी कुछ अधिक थी। अब मैं भी सोचने को विवश था। मैंने कहा, ' पिंकी, तुम पर है, जैसा तुम ठीक समझो..' काफी देर तक चर्चा चलती रही थी। पिंकी ने अपने मामाजी और पापा जी को भी बता दिया था और दोनों का मत था कि उसे यह जॉब जरूर स्वीकार करना चाहिए था। अंत में यही निश्चय हुआ कि अगले दिन पिंकी अपना स्वीकृति पत्र भिजवा देगी और नया कार्य आरम्भ कर देगी। जो प्रस्ताव पत्र उसे मिला था उसमें 'तत्काल प्रभाव से' लिखा था। इसका अर्थ था कि वह चाहे तो कभी भी दायित्व संभाल सकती थी। बाबा ने कहा कि उसे अपना पत्र तो कल भिजवा देना चाहिए और आगामी एक तारीख से ज्वाइन कर लेना चाहिए। पिंकी को भी यही ठीक लगा था। एक तारीख आने में कुछ ही दिन थे। माँ को भी यह बात ठीक लगी थी। उन्होंने कहा कि कल ही वह उसे लेकर एक आश्रम में जाएँगी और वहाँ पूजा-अर्चना करेंगी। पिंकी मुस्कुरा रही थी, उसने कहा, ' पर, मम्मी जी, कल सुबह पहले मैं आपको गुरुद्वारे लेकर जाऊँगी उसके बाद आपके आश्रम जायेंगे..' उसने मेरी ओर देखते हुए कहा, ' कल आप गुरुद्वारे में मत्था टेकते हुए, ऑफिस जाना..' मैंने हां में सिर हिलाया और कहा,' ठीक है..' माँ ने कहा कि मुझे भी साथ में आश्रम जाना चाहिए और एक दिन का अवकाश ले लेना चाहिए। मैंने कहा कि यह संभव नहीं था क्योंकि मुझे रोबी दा ने कुछ कार्य सौंपा हुआ था। अब यह निश्चय किया गया कि गुरुद्वारे से मैं ऑफिस चला जाऊँगा और वो दोनों घर आ जायेंगे और संध्या में उस आश्रम जायेंगे।
सब कार्य ठीक से होते चले गए थे। एक तारीख से पिंकी ने अपना कार्य संभाल लिया था। हम दोनों एक साथ घर से निकलते थे। वह मुझे ड्राप करते हुए आगे बढ़ जाती थी। एक दिन जब में ऑफिस के सामने कार से उतर रहा था तो सामने रोबी दा दिख गए थे। मैंने पिंकी को इशारे से कार से बाहर आ जाने का संकेत दिया। पिंकी ने उन्हें नमस्कार किया तो रोबी दा ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा, ' बहुत अच्छा लग रहा है, तुम दोनों को देखकर..अभिजीत ने मुझे सब कुछ बताया है.. एक साथ अपने अपने काम को निकलते हो..यह बहुत अच्छा है..पर हॉस्पिटलिटी इंडस्ट्री में शाम का लौटना ठीक नहीं होता.. बहुत ज़िम्मेदारी वाला काम होता है .. वर्ना इसे यहाँ से लेते हुए, एक साथ ही घर भी लौटते..' वह एक साँस में सब कह गए थे। पिंकी ने कहा, ' सर, अभी चलती हूँ..एक दिन आइये न हमारे घर..' वह कार स्टार्ट कर, तेजी से आगे निकल गयी थी। मैं और रोबी दा, अपने संगठन और देश की बिगड़ती स्थिति की बातें करते हुए, अपने कार्यालय की ओर बढ़ गए थे। शाम को पिंकी से बात हुई तो उसने कहा, ' ये तुम्हारे रवि साहब मुझे पसंद नहीं.. ऐसा लगता है... बहुत पेंचदार आदमी हैं...' मैंने कहा, ' नहीं, अच्छे आदमी हैं... मेरे नाना की बहुत इज्जत करते थे और अब माँ को भी बहुत मानते हैं... काफी रुआबदार हैं... राइटर्स बिल्डिंग में बहुत पहुँच है, उनकी...' ' हाँ, ऐसे ही लोगों की ऊपर तक पहुँच होती है... पर मुझे पसंद नहीं आ रहे, तुम्हारे ये रवि साहब...' पिंकी ने रूखे स्वर में मेरी बात का उत्तर दिया था।
( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर ... )
Friday, February 12, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 58
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( ५८ ) इन्द्राणी की बातों से मेरे उदास से मन को राहत सी मिली थी। उसने मुझे खाने का निमंत्रण दिया और कहा कि उसकी माँ ने आज घर में हम सब की प्रिय मछली बनायी थी। मैंने कहा कि आज नहीं, आज का डिनर तो मेरी ओर से। मैंने उसे बाहर चलने को कहा। मेरे दिमाग में आज के अख़बार में दिखा एक विज्ञापन घूम रहा था। वह पूछती जा रही थी कि कहाँ जा रहे थे परन्तु मैं खामोश था। जब हम लेक के पास उस रेस्टोरेंट के सामने पहुंचे तो वह हंसने लगी। उसने कहा, ' अरे ! इसके बारे में तो मैंने आज ही एक विज्ञापन देखा था और मैं सोच रही थी कि इसे आज़माया जायेगा.. अच्छा हुआ तुम यहाँ ले आये..' हम दोनों एक ओर कोने की सीट पर जा बैठे थे। यह नया रेस्टोरेंट था और इसका ही विज्ञापन देख ही मैं रुक गया था। अक्सर ऐसा होता है कि किसी छोटी सी बात पर हमारा मन रुक जाता है और कहीं न कहीं मन की किसी सतह पर वह हमें आकर्षित करता रहता है और अपनी ओर खींच ले आता है । मेरे साथ आज कुछ ऐसा ही हुआ था। जब से मैंने इस रेस्टोरेंट के बारे में देखा था, तब से यही लग रहा था कि इसे परखा जाये। कलकत्ता का प्रसिद्द चाइनीस रेस्टॉरेंट था जिसकी एक शाखा अब दक्षिणी कलकत्ता में खुली थी। हमने अपने पसंद के व्यंजनों का आर्डर दिया। इन्द्राणी ने कहा कि मनप्रीत भी साथ होती तो बहुत अच्छा होता। मैंने कहा, ' हाँ, ये बात तो ठीक है .. फिर कभी उसे लेकर आऊंगा.. परन्तु पता नहीं, पंजाबी लड़की को चाइनीस खाना पसंद आएगा या नहीं..हालाँकि कलकत्ता के चाइनीज़ खाने ने देश भर में अपनी पहचान बना ली है ..'
नए रेस्टोरेंट का इंटेरियर बहुत अच्छा था। हल्की ध्वनि में वाद्य संगीत चल रहा था। प्रकाश भी मद्धम था। इन्द्राणी ने आगे की ओर हथेलियों पर चेहरा टिकाते हुए कहा, ' अच्छा, अब बताओ, कैसा चल रहा है, वैवाहिक जीवन .. इतनी सुन्दर और गुणवान पत्नी पायी है, तुमने ..’ मैंने कहा, ' सब ठीक है..उसने नए घर में अच्छे से एडजस्ट कर लिया है..माँ की प्रिय बन गयी है, बाबा भी उससे प्रभावित हैं.. सब ठीक ही चल रहा है ..' इन्द्राणी ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि उसे भी ऐसा ही लग रहा था कि यह एक्टिव लड़की सबका मन मोह लेगी। मैंने कहा कि वह अपने को बहुत जगह व्यस्त करती जा रही थी और अब उसके एक अच्छे जॉब में लग जाने की भी उम्मीद थी और मेरे लिए यह चिंता की बात थी कि उस पर अधिक प्रेशर न बन जाये। इन्द्राणी ने हूँ ..कहा तो मैंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ' नए माहौल में इच्छा होती है, सबको प्रभावित करने की और हम जोश में सब को हां करते जाते हैं और बाद में संभालना कठिन हो जाता है..' इन्द्राणी ने कहा, ' अरे ! तुम तो शादी के बाद समझदार हो गए हो.. अगर तुम्हें लगता है कि वह इतना सब न संभाल पायेगी तो उसे सचेत करो.. परंतु, यह भी याद रखना कि कुछ लोगों की क्षमता, हमारी उम्मीद से अधिक होती है ..' हम बात करते जा रहे थे और चाइनीस व्यंजनों का आनंद भी ले रहे थे। मैंने कहा, ' यहाँ चाइना टाउन वाला स्वाद नहीं है ..पहला ही ओरिजिनल होता है ..बाद में खुलने वाली शाखाओं में सिर्फ नाम ही होता है ..' इन्द्राणी ने कहा, ' नहीं, ऐसी बात तो नहीं..मुझे तो अच्छा लग रहा है, यहाँ का खाना ..' फिर हँसते हुए कहा, ' तुम अपनी वाइफ के साथ नहीं आये हो न इसलिए तुम्हें स्वाद नहीं मिल रहा ..' मैं इस बात पर मुस्कुरा दिया और मैंने कहा, ' शायद यही बात है ..वैसे किसी भी बात को आप जैसे स्पष्ट कर देती हैं,उसका जवाब नहीं..इसीलिए तो आप इन्द्राणी दीदी हैं ..' इन्द्राणी ने मुँह बनाया, ' ख़बरदार जो फिर से दीदी कहना शुरू किया..हम एक उम्र हैं और दोस्त हैं .. '
खाना खा बाहर आये तो मैं खुद को काफी सहज महसूस कर रहा था। इन्द्राणी को उसके घर छोड़, मैं अपने घर पहुंचा तो पाया कि माँ और पिंकी भी आ चुकी थीं। मुझे देखते ही पिंकी दौड़ते हुए आयी और सरलता से कहने लगी, ' आज तो मज़ा ही आ गया ..सेमिनार बहुत अच्छा था.. बहुत कुछ नया जानने को मिला और मज़े की बात, ये सेमिनार उसी होटल में था जहाँ मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाया गया है.. मैं तो सब देख आयी हूँ..बहुत अच्छा है..ये सर्विस तो मैं नहीं छोडूँगी..मम्मी जी ने तो किसी से कहकर सैलेरी का भी अनुमान लगवा लिया है.. ' मैंने कहा ,' ये तो बहुत अच्छी बात है, पर मुझे बैठने तो दो..' फिर उसने व्यंग्य सा करते हुए कहा, ' हाँ - हाँ बहुत मेहनत-मजदूरी कर के आये हो, पहले चाय-पानी पियो, आराम कर लो, फिर बात करना ..' मैंने कहा, ' ऐसा नहीं है पर घर में घुसा हूँ बैठने तो दो..' माँ और वह दोनों हँसने लगी। माँ ने कहा, ' ये ऐसा ही है..इससे थोड़ी देर बाद बात करना..' बाद में माँ ने सारी बात विस्तार में बतायी। पिंकी इतनी उतावली हो रही थी कि वह मुझसे एकाउंट्स की कुछ किताबों के बारे में पूछने लगी थी। उसका कहना था कि वह आज रात से ही तैयारी शुरू कर देगी और मुख्य विषयों का पुनर्पठन कर लेगी। मैं समझ रहा था कि यह नौकरी वह पाकर ही छोड़ेगी। मैंने उसे धैर्य रखने को कहा पर उसका छात्र जैसा मन उसे उकसा रहा था। उसकी उत्सुकता देख, मैंने कुछ पुस्तकें उसे निकालकर दी। वह वहीं एक ओर बैठ, पन्ने पलटने लगी थी। मेरे बाबा जो इधर-उधर मंडरा रहे थे, उसकी जिज्ञासा को देख खुश हो रहे थे। उन्होंने पिंकी के सिर पर हाथ रखते हुए कहा था कि उसे यह जॉब मिलेगा ही और यदि न मिला तो यह उस होटल कंपनी का ही नुकसान होगा क्योंकि वे एक प्रतिभाशाली कर्मचारी को खो देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के इस बड़े होटल उद्योग के लिए प्रतिभा का ही महत्व है। पिंकी ने अपनी प्रशंसा सुनी तो कहा, ' डैडी जी, आपका और मेरे नानक बाबा का आशीर्वाद रहे तो सफलता मिलेगी ही..' मैंने कहा कुछ नहीं, किन्तु मन में सोचा कि इतनी सुन्दर और आकर्षक प्रतिभा को तो सब जगह ही सफलता मिलेगी। यदि मैं इस पद के लिए जाऊँ तो अस्वीकार कर दिया जाऊँगा। अपने मन की बात को मैंने कुछ इस तरह से निकाला, ' अरे, तुम स्मार्ट हो, अट्रैक्टिव हो, तुम्हारा चयन होकर ही रहेगा.. होटल,आतिथ्य-सत्कार का उद्योग है, यहाँ यह सब पहले देखा जाता है.. डिग्रियाँ बाद में देखी जाती हैं ..' पिंकी ने मेरी बात सुनी तो कहा, ' पर मेरे पास तो अच्छी ख़ासी डिग्री भी है..' बाबा ने उसका साथ देते हुए कहा, ' और अनुभव भी.. चाहे एक-दो साल का ही हो.. ' माँ ने अचानक मुझसे खाने के बारे में पूछा, ' खाना खाओगे? हम दोनों तो वहीं से खाकर आये हैं.. सेमिनार के बाद डिनर भी था..' मैंने कहा कि मैं भी खा चुका हूँ ..' पिंकी ने सुना तो कहा, ' अरे कहाँ ? मैंने कहा, ' तुम फाइव स्टार में खाकर आयी हो तो हम भी कहीं अच्छा ही खाकर आये होंगे..' उसने जिद्द सी करते हुए कहा, ' बताओ न कहाँ से खाकर आये हो ? तो मैंने कहा कि इन्द्राणी ने खिला दिया था। उसने मुस्कुराते हुए कहा, ' अच्छा जी ..अकेले अकेले हो आये उनके घर ..' मैं और इन्द्राणी चाइनीस रेस्टोरेंट में खाने गए थे, ये बात मैं न जाने क्यों दबा गया था। क्या कोई चोर था, मेरे भीतर?
( आज बस, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर ...)
Wednesday, February 3, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 57
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( ५७ ) समय आगे बढ़ते चला जा रहा था और साथ ही मेरे मन से वैवाहिक जीवन की गुलाबी रोमांटिकता को फीका भी कर रहा था। मैं यह परिवर्तन महसूस कर पा रहा था। परन्तु लगता कि यह समय से पहले हो रहा था। पिंकी हमेशा की तरह उत्साहित ही थी। वह तो दिन दिन व्यस्त होती जा रही थी। माँ के महिला आयोग वाले कामों में हाथ बटा रही थी। माँ को भी उसका साथ और सहयोग अच्छा लगता था। माँ ने उसे रबिन्द्र संगीत की शिक्षिका से मिलवा दिया था। यह शिक्षिका माँ की पुरानी परिचित थी और पिंकी जैसी सुन्दर और गैर-बंगाली लड़की को अपनी छात्रा के रूप में पा बहुत प्रसन्न थी। पहले दिन मैं ही पिंकी को लेकर उनके पास गया था। पिंकी की गायन क्षमता जानने के लिए जब उन्होंने उसे कुछ गाने के लिए कहा तो पिंकी ने एक पंजाबी भजन सुनाया था। मैं गुरुद्वारे में इस भजन को सुन चुका था। वह शिक्षिका जिन्हें मैं मानसी मासी के नाम से जानता था, बहुत प्रभावित हुई थी। उन्होंने कहा था कि मनप्रीत को रविंद्र संगीत सीखने में अधिक कष्ट न होगा। केवल शब्दों के उच्चारण पकड़ने होंगे। यह तय हुआ था कि सप्ताह में दो दिन वह उनके पास जाया करेगी। घर आकर जब माँ को यह बताया तो वह भी कहने लगी कि उन्हें पूरा विश्वास था कि मनप्रीत इस नए संगीत में दक्षता पा लेगी। उन्होंने मेरी ओर देखते हुए हंसकर कहा, ' तुम भी तो रविंद्र संगीत गाते हो और अच्छा गाते हो, अब दोनों में प्रतिस्पर्धा होगी ..' मैं तो चुप था बस हल्का सा मुस्कुरा दिया था परन्तु पिंकी ने तुरंत प्रतिक्रिया दी थी। उसने कहा, ' मैंने इनका गाना सुना है मम्मी जी, इनके जैसा अच्छा तो मैं कभी न गा पाऊँगी ..'
हम तीनों की बातचीत चल ही रही थी कि बिशाखा एक लिफाफा मेरे हाथ में दे गयी। उसने कहा कि लेटर बॉक्स में था। मैंने देखा तो पाया कि वह मनप्रीत कौर रॉय के नाम का था। मैंने उसे पकड़ाते हुए कहा, ' यह तुम्हारा है ..' वह हैरान रह गयी थी और उसने कहा, ' वाह, कलकत्ता के पते पर मेरा पहला लेटर ..' उसने जब खोलकर पढ़ा तो मेरी ओर देख बोली, ' अरे ! यहाँ तो काम बहुत फ़ास्ट होता है..वो जो अप्लाई किया था, उनका जवाब आ गया है ..' उसने पत्र मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने पढ़ा तो सब समझ आ गया। उसने कलकत्ता के बहुत बड़े और नामी होटल में एकाउंट्स हेड के पद के लिए आवेदन किया था, उसे मिलने के लिए बुलाया गया था। बाबा भी यह सब सुनकर वहां आ गए थे। मैंने कहा, ' पिंकी का इंटरव्यू कॉल आया है ..' बाबा ने पत्र लिया और पढ़ने लगे। उन्होंने कहा कि यह कोई औपचारिक इंटरव्यू लेटर नहीं लगता, सैलरी आदि की बात करना चाहते हैं.. शायद मनप्रीत का सिलेक्शन उन्होंने कर लिया है..' मुझे भी अब ऐसा ही लगा था। मैंने कहा, ' जरूर किसी सरदार जी के हाथ में चयन का अधिकार होगा, मनप्रीत कौर नाम देखकर बुला रहे होंगे वर्ना ऐसा थोड़े ही होता है..' पिंकी ने भी हँसते हुए बात को लिया, ' अच्छा, आपके यहाँ कैंडिडेट का सिलेक्शन नाम से कर लेते हैं.. सी वी वग़ैहरा नहीं देखते ? मैंने मुस्कुराते बात को टाल दिया और कहा, ' दो दिन बात बुलाया है..मैं तुम्हारे साथ चलूँगा.. ' पिंकी फिर एक बार हँसी, ' अच्छा, क्या मेरा स्कूल का एडमिशन है जो गार्डियन बनकर साथ जाओगे.. मैं खुद चली जाऊँगी.. अब तो मेरे पास अपनी कार भी है..' उसकी इस बात पर मुझे थोड़ी बौखलाहट हुई थी। मैंने कहा,' इधर फाइव स्टार होटल में नौकरी करोगी, उधर संगीत की क्लास और फिर माँ के साथ महिला आयोग का काम भी.. इतना सब कर पाओगी..' उसने चुटकी लेते हुए कहा, ' चिंता मत करो.. हम पंजाब के हैं..काम से घबराते नहीं हैं..' अब तो मैं चिढ़ ही गया था। मैंने कहा, ' ये पंजाब-बंगाल क्या है ? मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था..बड़े होटल के एकाउंट्स को संभालना, काफी मेहनत का काम होगा.. काफी समय देना पड़ेगा..तुम्हें लगता है कर लोगी, तो ठीक है.. मुझे क्या..' अब माँ ने कहा कि वहां मिलकर आओ और देखो क्या दे रहे हैं, सैलरी ठीक होनी चाहिए। बाबा को इन सब विषयों का अधिक अनुभव था। उन्होंने कहा कि ऐसी कंपनियों में सैलरी आड़े नहीं आती, यदि कैंडिडेट पसंद है तो वे लोग अच्छी सैलरी ही देते हैं। मैं चुप था। कुछ समय बाद मैंने पिंकी से गंभीर होते हुए कहा कि डाक्यूमेंट्स वगैरह ठीक से रख लेना।
माँ का इधर-उधर आना-जाना इन दिनों बढ़ गया था। उन्होंने कहा कि शाम को किसी सेमिनार में जाना था। उन्होंने सेमिनार का कार्ड पिंकी को देते हुए कहा, ' मनप्रीत, चलोगी ? पिंकी ने कार्ड को सरसरी रूप में देखा और कहा, ' हाँ, मम्मी जी, क्यों नहीं, ये सेमिनार तो स्टेट्समैन वालों का है, अच्छा ही होगा ..' शाम को समय से माँ और पिंकी निकल गए थे। मैं अपने ख्यालों में उलझा हुआ, सुबह का और अब तक बासी हो चुका अख़बार एक बार फिर से कुतरने लग गया था। मेरी दृष्टि समाचारों से अलग स्थानीय विज्ञापनों पर घूम रही थी। अख़बार में छपी जिन बातों को हम अक्सर नज़रअंदाज़ करते रहते हैं, वे सब ऐसे उदास क्षणों में सामने आ जाती हैं। अक्सर बहुत कुछ हमारे आसपास होता रहता है और हम अपरिचित रहते हैं। मैंने देखा, एक जाने माने चाइनीस रेस्टोरेंट की हमारे इलाके में ब्रांच खुल चुकी थी। मुझे तो पता ही न था। यूँ ही खुद से उलझते मैं नीचे उतर आया और अपने चिरपरिचित अंदाज़ में कोने वाली पान की दुकान पर एक ओर को टिक सामने दौड़ती-भागती सड़क को देखता रहा। वह दुकान वाला अच्छे से मुझे जानता था। उसने अपनी ओर से मेरी तरफ सिगरेट बढ़ा दी। फिर उसने कहा कि भाभी बहुत होशियार हैं और क्या आत्मविश्वास के साथ कार चलाती हैं और उसकी दुकान के सामने से तेजी से कार में निकल जाती हैं। मैंने उसकी बातों का जवाब न दिया था और आगे बढ़ गया था।
मैं सिगरेट के कश लगाते हुए, बिना गंतव्य सोचे, चला जा रहा था। फिर मैंने खुद को अपनी बुआ के घर के सामने पाया। शायद भीतर कहीं मेरा मन यहीं आना चाहता था। मैंने डोर बेल बजायी तो बुआ ने ही दरवाज़ा खोला था। वह मेरे दायें बायें देखने लगी। उन्होंने कहा, ' बहू कहाँ है ? मैंने कहा, ' पिशी, वो माँ के साथ किसी काम पर गयी है..मैं घर में अकेला था तो आपसे मिलने चला आया.. ' उन्होंने कहा कि मैंने ठीक किया था और अपनी पिशी से मिलने आया था। उन्होंने मुझे स्नेह से बिठाया और घर का हालचाल पूछने लगी। मैंने पूछा, ' इन्द्राणी घर पर नहीं है ? उन्होंने कहा कि इन्द्राणी ऊपर अपने कमरे में थी और स्कूल का काम कर रही थी। मैं ऊपर चला गया। इन्द्राणी भी मुझे अचानक देख हैरान हो गयी थी। उसे भी मुझे बताना पड़ा कि क्यों मैं अकेला आया था। कुछ इधर-उधर की बातें हुई और उसने चुटकी लेते हुए पूछा, ' और वैवाहिक जीवन कैसा चल रहा है ? मैंने कहा कि सब ठीक था और पिंकी सबकी चहेती बनती जा रही थी। जब बातें और आगे बढ़ी तो छिपता हुआ मेरा मन सामने निकल आया। मैंने कहा, ' अब तो यह मान ही लेना होगा कि हम, दो भिन्न स्टेट्स के संस्कारों और परम्पराओं से जुड़े हैं, समायोजित होने में समय तो लगेगा ही..' इन्द्राणी के लिए इतनी सी बात का इशारा काफी था। उसने कहा कि वह समझ सकती थी। यह सांस्कृतिक अंतर स्वाभाविक था। ( आज यहीं तक, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर ..)
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