Chander Dhingra's Blog

Wednesday, July 29, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) 27 - 28

टू स्टेट्स - एक नई कहानी 
( Two States - A New Story ) 
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      चन्दर धींगरा / Chander Dhingra 
 
 ( २७-२८ )                चंडीगढ़ से दिल्ली और वहाँ से हावड़ा यानि मेरे शहर कलकत्ता की यह ट्रैन यात्रा बहुत लंबी प्रतीत हो रही थी। यात्रा के हर क्षण पिंकी मेरे साथ थी। मैं और वह न जाने क्या क्या बातें कर रहे थे। लगता था सामने की सीट पर वह बैठी थी और मुझे मेरे प्रत्येक कार्य के लिए आदेशपूर्ण सलाह दे रही थी। मैं सीट पर विश्राम के लिए लेटा तो उसने कहा, ' क्यों थक गए हो क्या ? जब चाय दी गयी तो उसने कहा, ' चाय तो एक बार पी चुके हो, अब ये फिर से..' मैंने कहा, ' तुम पंजाबी लोग चाय पीते हो, हम बंगाली तो चाय खाते हैं, पहली तुम्हारी ओर से मैंने पी थी, अब ये दूसरी वाली मेरी ओर से तुम खा लो..'  उसने हँसते हुए उत्तर दिया, ' हम पंजाबी जब चाय पीते हैं तो उसके साथ कुछ खाते भी हैं, अब तुम बंगाली चाय खिला रहे हो तो साथ में कम से कम एक बिस्कुट भी तो पिलाओ.. '  यात्रा में ऐसी न जाने कितनी बातें होती चली गयी। बीच-बीच में पिंकी के साथ में होने का भ्रम टूट जाता और मैं वास्तविक जगत में लौट आता था। राजधानी एक्सप्रेस के उस  कम्पार्टमेंट में बैठे अन्य यात्री ऐसे लगते मानों मुझे घूर रहे हों और कह रहे हों, ' हम तुम्हारी सब बातें जानते हैं ..'  मैं खुद को सहज करने का प्रयास करता। एक बात जो मेरे अंतर्मन के साथ जुड़ गयी थी वह थी मेरे ट्रैन में चढ़ते समय पिंकी द्वारा कहे गए शब्द,  ' घर में जल्दी बात करना.. देर मत करना..'  शायद वह जान गयी थी कि मैं अपने माता-पिता से अपने अनजाने और स्वतः से बन गए प्रेम सम्बन्ध को सरलता से न बता पाऊँगा। हम दोनों के बीच जो कुछ भी बातें हुई थी उसमें किसी भी ओर से कोई प्रस्ताव या प्रस्ताव का इशारा नहीं था। हम तो सामान्य परिचितों के बीच होने वाली बातें ही किया करते थे। परन्तु शायद हम दोनों के अंतर्मन कुछ और ही वार्तालाप में लिप्त रहते थे। जिसे केवल हम दोनों ही सुन और समझ पाते थे। बातों बातों में उसने एक बार कहा था कि जब से उसने शिक्षा समाप्त कर नौकरी आरम्भ की थी, उसके माता-पिता उसके विवाह को लेकर सोचने लगे थे। मैंने उस समय इस बात को सामान्य दोस्ती की बात के रूप में लिया था परन्तु आज  इस  बात का कुछ अन्य ही अर्थ निकालने लगा था। कहीं किसी खास वजह से तो पिंकी ने ये बात नहीं उठाई थी ? अगर कहीं उसके विवाह की बात कुछ आगे बढ़ चुकी होगी तो ये सिख लोग हैं, पीछे न हटेंगे। ट्रैन की गति तेज थी और मेरे विचारों की भी। मैंने निश्चय किया कि घर पहुँच कर ही माँ से बात करूँगा और उन्हें अपना मन दिखा दूँगा। सोचता, माँ कैसी प्रतिक्रिया देगी ? और बाबा ? वे तो तुरंत हां कर देंगे और शायद न करें। वे तो माँ की ओर देखने लगेंगे। माँ, उनकी ओर देखती मानों कह रही हो, 'अब सम्भालो अपने लाड़ले को..आप ने ही इसे खूब छूट दी है...अब पंजाबियों को अपना रिश्तेदार बनाओ..'  घर में काफी उथल-पथल चलेगी और कई दिनों तक चलेगी परन्तु मैं अपने माता-पिता को अच्छे से जानता था। अंततः मेरी बात माननी ही होगी। बंगाली परिवार में पंजाबी - सिख बहू ? ये विचार ही बहुत रोमांटिक लग रहा था। मन ने कहा, जो होगा उसे देखा जायेगा। पहले कलकत्ता पहुँचने तो दो। 

सुबह हो गयी थी।  चाय दी जा चुकी थी। राजधानी एक्सप्रेस की गति कुछ धीमी होती दिखी। मैंने अक्सर देखा है कि गंतव्य पर पहुँचने से पहले भारतीय रेल गाड़ियाँ धीमी हो जाती हैं। हावड़ा पहुँचने से पहले तो होता ही है। ये ऐसा समय होता है जब आप अपनों से मिलने को उत्सुक हो रहे होते हैं और आपकी ट्रैन आपका साथ नहीं दे रही होती। रेल व्यवस्था का यह एक प्रकार का षड्यंत्र प्रतीत होता है जो आपके मिलन को थोड़ा और गहरा बना देना चाहता है। खिड़की के सामने से मैंने पर्दे को एक ओर कर बाहर देखने की कोशिश की। सूर्य पृथ्वी को अपने दर्शन दे चुका था। उसकी नव किरणें चारों ओर फ़ैल चुकी थीं। दूर दूर तक हरियाली फैली हुई थी। कहीं कहीं गीली मिट्टी और वर्षा-जल से बन आये छोटे-छोटे गड्डे दिख जाते थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि माँ की बिछाई हरे पीले फूलों वाली चादर पर घर के बच्चों ने अपने छोटे छोटे खिलौने बिखरा दिए हों। ऐसा मनोरम दृश्य, मन में ताजगी भर गया। ट्रैन अब मेरे बंगाल में थी।  

बाबा कह रहे थे कि वे स्टेशन पर आएंगे। परन्तु मैंने जोर देकर मना कर दिया था। हावड़ा स्टेशन अपने आप में एक अद्भुत सी दुनिया है। लोग भाग रहे  होते हैं, एक दूसरे को रौंदते से। हर कोई जल्दी में होता है। ऐसा लगता है मानों हर किसी का कुछ न कुछ लुट चुका है या फिर विलम्ब हुआ तो लुट जायेगा। पिंकी यहाँ का नज़ारा देखेगी तो क्या सोचेगी ? नहीं वह तो फ्लाइट से आएगी। यही सब सोचते हुए मैं टैक्सी की लाइन में जा लगा। लम्बी लाइन और एक-दूसरे पर झुंझलाते लोग, अपने बच्चों, परिवारजनों और सामान को संभालते और इंचों में आगे की ओर खिसकते। बाहर कहीं से भी घर लौटने पर हमेशा खुश होता रहा हूँ परन्तु आज न जाने क्यों मैं निराश सा था। एक खिन्नता सी थी जो मुझे घेर रही थी। बस अब जितना जल्दी हो सके मुझे घर पहुँचना था। टैक्सी की लंबी लाइन में अपनी-अपनी सीट पर बैठे ड्राइवर, आने वाले ग्राहक की प्रतीक्षा में मेरी ही तरह खिन्न दिख रहे थे। हम लोग सोच रहे थे कि जल्दी से टैक्सी और अच्छा ड्राइवर मिले और वो सोच रहे थे कि दूर की अच्छी सवारी मिले। एक पुरानी टैक्सी में सरदार जी ड्राइवर दिखे। उनके चेहरे ने फिर से चंडीगढ़ की याद दिला दी। मन ने कहा यही टैक्सी मेरे भाग्य में हो। आज पहली बार मैंने सरदार जी टैक्सी वाला सोचा। अब तक मैं पंजाबी टैक्सी वाला ही कहा करता था। कलकत्ता में बहुत हैं। आज उनमें मुझे कोई अपना दिखा। भाग्य ने मेरा सुना और उन्हीं सरदार जी की टैक्सी मुझे मिली। एक बे मतलब सा संतोष हुआ। ड्राइवर सरदार जी बुजुर्ग थे। उन्होंने मेरा पता लिया और भीड़ में इधर-उधर टैक्सी को करते हुए, कलकत्ता की पहचान बन चुके, हावड़ा ब्रिज के ऊपर से, मुझे मेरे घर की ओर ले चले। टैक्सी की खिड़की से मैं अपने कलकत्ता की सड़कों, इमारतों और दोनों ओर फुटपाथ पर फैले संसार को ऐसे देख रहा था मानों इन सब से मेरा परिचय आज ही हो रहा हो। कुछ ही समय में मैं अपने घर के सामने था। टैक्सी से उतर और अपना सामान ले, मैंने सरदार जी से, सत श्री अकाल कहा। वे बुजुर्ग मेरी और देखते रह गए और मेरा अभिवादन स्वीकार किया। घर में मेरी प्रतीक्षा की जा रही थी। मैंने माँ और बाबा के पाँव छुए और आशीर्वाद लिया। हर माँ की तरह, अपनी माँ को मैं दुबला नज़र आया। उसने कहा, ' हाथ मुँह धो लो, मैं खाना लगाती हूँ ..'   

मैं अपने कमरे में आ गया। इधर-उधर देखा। सब कुछ वैसा ही था जैसा छोड़ गया था। मेरी बुक सेल्फ व्यवस्थित सी दिखी। जरूर माँ ने इधर हाथ दिया होगा। मेरे अपने हिसाब से रखी पुस्तकों को यहाँ-वहाँ, ऊपर-नीचे कर दिया होगा। अब जरुरत के समय मुझे अपनी पुस्तक न मिलेगी। मैं चिल्लाऊंगा और माँ कहेगी, ' जैसा था वैसा ही तो है, मैंने कुछ नहीं किया..'  फिर मैं समस्त पुस्तकों को बिस्तर पर गिराऊंगा और वह पुस्तक जिसे मैं ऊपर के रैक में रखा करता हूँ मुझे नीचे के रेक में दबी हुई मिलेगी। माँ से झड़प होगी और वो कहेगी, ' मैंने तेरी चीजों को छुआ तक नहीं..'  सालों से यही होता आ रहा था।  

मैं ट्रैन यात्रा के बाद की सुस्ती में लेटा हुआ था कि अचानक उठ अपनी पुस्तकों में एक खास पुस्तक खोजने लगा। पुस्तक तो यहीं रहती थी पर आज नहीं थी। मैंने माँ को आवाज़ दी। वह दौड़ती हुई आई। उन्हें पता था कि कुछ है जो मुझे मिल नहीं रहा। एक बार फिर से माँ-बेटे में झड़प होने वाली थी। उन्होंने कहा, ' क्या हुआ, क्यों चिल्ला रहे हो ?  ' होना क्या है, फिर से मेरे कमरे से छेड़छाड़ की गयी है.. ' मैंने कहा। माँ ने रटी रटाई बात फिर से दोहरा दी कि उसे मेरे कमरे, मेरे सामान से क्या लेना। फिर उसने पूछा कि अब क्या नहीं मिल रहा। मैंने कहा, ' वो किताब कहाँ है जो नाना को उनके पंजाब के दोस्त देकर गए थे और नाना ने मुझे दे दी थी..' माँ ने तुरंत प्रतिक्रिया दी, ' अरे वो.. वो तो साइड वाले रैक में पीछे की ओर रखी है..'  मैंने माथा पकड़ लिया, अगर माँ ने मेरे कमरे में हाथ नहीं दिया तो कैसे बता दिया कि वो किताब कहाँ रखी है ? मैंने किताब निकाली। यह किताब नाना से मिलने आये एक सरदारजी अंकल ने उन्हें दी थी। वे पंजाब यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे। अंग्रेजी भाषा की यह किताब सिख धर्म के बारे में थी। मैंने अपनी अन्य किताबों के साथ रख दिया था। इसके कवर पर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर का चित्र था जो मुझे याद था। मैंने इस किताब के पन्ने पलटना शुरू किया। मेरी स्मृतियों की किताब के हर पन्ने पर भी एक-एक चित्र उभर कर आ रहा था। माँ ने उस किताब के साथ मुझे देखा तो हैरान हो गयी। 
माँ ने मेरे पसंद की दो अन्य चीजें भी बनायीं हुई थी। एक थी आम-खजूर की मीठी चटनी और दूसरी चावल वाली गुड़ वाली पायस यानि खीर। मैंने भर पेट खा लिया था परन्तु इन दो चीजों का लोभ न छोड़ सका और दोनों को काफी मात्रा में खा गया। माँ मुझे भरपूर खाता देख संतुष्ट होती रही कि उन्होंने अच्छे से सब कुछ बनाया था। खाना खा मैं और बाबा दोनों विश्राम की मुद्रा में आ गए। माँ और उनकी सहायिका बिशाखा सामान समेटने में लगे हुए थे। हम दोनों सो गए। इतना भरपूर लंच लेने के बाद सोने के अतिरिक्त कोई विकल्प न था। मुझे इतना हैवी लंच नहीं लेना चाहिए था। ' हैवी लंच ' का सोच मैं अपने भीतर ही मुस्कुराने लगा। पिंकी जब ये शब्द सुनेगी तो खूब हँसेगी। कोई भी बेहतरीन चीज बंगाल में हैवी हो जाती है।  हैवी पिक्चर,  हैवी एक्टिंग, हैवी ड्रेस ..और न जाने क्या क्या ? मैंने सोचा, जब पिंकी यहाँ आकर तांत की साड़ी पहनेगी तो मैं उसे जरूर कहूंगा, 'आज तो हैवी लग रही हो..' मैं जानता था वह क्या कहेगी। वह जोर से हँसेगी और कहेगी, ' मैं तो बंगाली साड़ी में हैवी लग रही हूँ परन्तु, आप क्यों इस नीली सी शर्ट में लाइट बने बैठे हो ? यूँ ही न जाने क्या क्या सोचते नींद में सो गया। उठा, तो संध्या ढल आयी थी। बाबा तो उठ चुके थे परन्तु माँ अपने ऊँचे पलंग पर अब भी सो रही थी। पलंग के एक ओर फर्श पर अपनी पुरानी चटाई बिछा, बिशाखा भी सो रही थी।  
( आज यही तक, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर )

Wednesday, July 22, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी (Two States - A New Story) 25 & 26

टू स्टेट्स - एक नई कहानी 
 (Two States - A New Story) 
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चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra 
( २५ - २६ )                  
अगले तीन दिन ऐसे ही बीत गए। यह प्रशिक्षण मेरे लिए अर्थहीन हो चुका था। मैं किसी तरह समय बिता रहा था। अपने आप से द्वन्द करते  हुए मैंने सोचा कि अंतिम बार अंकल के घर हो ही आता हूँ। शाम को एक प्लास्टिक बैग में उनकी बेड शीट्स और टॉवल रखे और उनके घर पहुँच गया। मन में भीतर कहीं यह भी लग रहा था कि क्या मेरा उनके घर जाना ठीक था ?  मैं तो खुद ही प्रश्न करता हूँ और खुद ही निर्णयात्मक उत्तर भी  दे देता हूँ, ' हाँ ठीक ही तो है..उनका सामान तो मुझे लौटना ही है..'  हालाँकि मैं जानता था कि ये सामान लौटना महज एक बहाना था। भीतर ही भीतर मन वहाँ जाना चाहता था। घर पर आंटी अकेली थी। मुझे देख वे हैरान सी हो गयी। उन्होंने पूछा, ' सब ठीक है न, बेटा..'   मैंने कहा, ' हाँ आंटी सब ठीक है.. अब अगले सप्ताह वापिस चले जाना है.. आपका सामान था.. लौटने आ गया..'  उन्होंने कहा कि ऐसी क्या जल्दी थी। किसी दिन पिंकी ऑफिस से लौटते वक्त ले आती। उन्होंने मुझे अंदर बिठाया और अपने काम में लग गयीं। उन्होंने कहा कि पिंकी और लवली अपने पापा के साथ मार्किट गयी हुई थीं और थोड़ी देर में आ जाएँगी। उनके आने पर एक साथ बैठकर चाय पियेंगे। वे आते-जाते और काम करते-करते बात कर रही थीं। मैं चुपचाप एक ओर बैठा हुआ था। मुझे लगा कि मुझे इस समय यहाँ नहीं आना चाहिए था। इस बार जब आंटी कमरे में आयी तो मैंने कहा, 'अच्छा आंटी मैं चलता हूँ ..' उन्होंने कहा, ' अरे रुको.. सब लोग आते ही होंगे..' वे पास की कुर्सी पर बैठ गयी। बातचीत के मकसद से उन्होंने मेरा हालचाल फिर से पूछा। उन्होंने मेरी वापसी के बारे में पूछा। मैंने उन्हें बताया कि सोमवार को चले जाना था । 

कुछ ही देर में अंकल और पिंकी -लवली आ गए। उनके आते ही घर का माहौल बदल गया। अंकल ने अपने पंजाबी अंदाज़ में वाह..वाह.. आओ जी..  कहा। पिंकी और लवली से हेलो हुई। पिंकी ने किनारे पर रखे हुए बैग को देखा तो हैरान हो पूछा, ' अरे, तुम इसे ले आये .. मैं आकर ले जाती.. मैं सोच ही रही थी, तुम्हारे पास आने का..'  मैंने कहा, मंडे यहाँ से चले जाना है.. सोचा अंकल-आंटी से मिलना भी हो जायेगा..'  कुछ ही समय में आंटी चाय लेकर आ गयी। बातें होती रही, कुछ मेरी ट्रेनिंग की, कुछ कलकत्ता की और कुछ तब के राजनैतिक माहौल की। पिंकी ने कहा कि उसके कमरे में चलते हैं। हम तीनों अपने अपने चाय के कप लेकर उसके कमरे में आ गए। पिंकी ने कमरा बहुत अच्छे से सजाया हुआ था। सब सामान क़ायदे से रखा हुआ था। एक और बुक शेल्फ था जिसमें कई अंग्रेजी की पुस्तकें रखी हुई थी। ये देख मुझे अच्छा लगा। मैंने पिंकी से कहा कि सोमवार  की मेरी ट्रैन थी और मुझे अब चले जाना था। उसने तुरंत प्रतिक्रिया दी, ' ठीक है तो यह यहाँ तुम्हारा अंतिम संडे है, तुम्हें चंडीगढ़ घुमाते हैं..' मैंने कहा, ' एक बार फिर से यहाँ के गुरुद्वारे जाने की इच्छा है, मेरी..'  उसने कहा, ' ओके, गुरूद्वारे भी चलते हैं..'  मैं सच में गुरूद्वारे जाने का इच्छुक न था। मैं तो पिंकी को प्रभावित करना चाहता था। उसने कहा कि संडे वह मुझे गेस्ट हाउस में मिलेगी और हम दिन भर साथ रहेंगे, लंच भी बाहर ही करेंगे। हम तीनों इधर -उधर और फिल्मों की बातें करते रहे। कुछ समय बिता, मैं वहां से लौट आया। 

मैं बेचैन हो रहा था,आने वाले संडे के लिए और साथ ही उत्साहित भी था अपने घर कलकत्ता लौटने के बारे में सोचते हुए। बचपन से ही मैं घर से बाहर जाने के लिए जितना उत्साहित होता हूँ, वापिस घर लौटने के लिए भी उतना ही बेचैन भी होता हूँ। मेरी माँ कहती है कि मैं छुट्टियों में कहीं बाहर जाने की बहुत ज़िद किया करता था और नयी जगह पहुँच कर दो-चार दिन में ही वापिस घर चलो की रट लगाने लगता था। शायद मेरा बचपन अभी तक मेरे साथ था। हम लोग शाम को कहीं निकल जाते थे और रात का खाना बाहर से खाकर आते थे। इन दिनों मैं अपनी मर्जी का नॉन-वेजीटेरियन खा रहा था और संतुष्ट था। मैंने कुछ सामान भी खरीदा था । बाबा के लिए एक टी-शर्ट लेते हुए, अपने लिए भी शोख रंग की टी-शर्ट ले ली। मैंने यहाँ के युवकों को ऐसी टी-शर्ट पहने देखा था। मन में कहीं था कि रविवार को इस नई टी-शर्ट को पहना जायेगा। 

पहली बार की तरह, रविवार को पिंकी की प्रतीक्षा में ब्रेकफास्ट करने के बाद ही तैयार हो गया था। वह देर से आयी ग्यारह बजे के बाद। आज पहली बार वह मेरे कमरे  में आयी और कमरे की दशा देख हँसने लगी। उसने जल्दी जल्दी में इधर उधर पड़ी चीजों को व्यवस्थित किया। उसने पूछा कि क्या मेरा कलकत्ता वाला कमरा भी ऐसा ही रहता था ?  मैं थोड़ा संकोच में आ गया। मैंने कहा, ' कलकत्ता में तो मम्मी हैं, वह ठीक कर देती हैं..' आज शायद पहली बार मैंने अपनी माँ के लिए मम्मी शब्द का  प्रयोग किया था। मन ही मन मैं  चाहता था कि वह कहे कि जब मैं आ जाऊंगी तो सब ठीक कर दूंगी। पर उसने ऐसा नहीं कहा। मेरा दिमाग कुछ ज्यादा चतुर है। मैंने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ' मेरी माँ कहती है, मेरी पत्नी आ जाएगी तो वह मुझे अनुशासित कर देगी..'  पिंकी मुस्कुराने लगी। उसने कहा, ' और, कब आ रही है आपकी वाइफ मेरा मतलब आपकी पत्नी ? मेरे मुख से अनायास ही निकल गया, ' तो कब आ रही हो तुम ?  पिंकी ने सिर घुमा लिया और कुछ नहीं कहा। बाद में उसने जल्दी चलने के लिए कहा क्यों कि मुझे चंडीगढ़ की बहुत सी जगह दिखानी थी और लंच भी करना था। वह कई जगह मुझे अपनी स्कूटी में बिठा घुमाती रही। एक अच्छे रेस्टॉरेंट में हमने लंच किया। शाम हो आयी थी। हम दोनों गुरूद्वारे गए। पिंकी ने आज फिर मुझे सिर ढकना सिखाया। वह आज भी घर से मेरे लिए एक स्कार्फ़ लेकर आयी थी। मत्था टेक हम दोनों ध्यान की मुद्रा में बैठे रहे। काफी समय निकल गया। मेरे लिए यह पहला अनुभव था जब में मौन की स्थिति में  इतनी देर तक बैठा रहा। बाहर आ स्कूटी पर बैठने से पहले मैंने उससे पूछा, ' मंदिर में ध्यान में बैठी, क्या सोच रही थी ?  उसने कहा, ' कुछ नहीं, अपने बाबा नानक से प्रार्थना कर रही थी कि उनकी कृपा हमेशा बनी रहे..'  मैंने कहा, 'और कुछ ?  उसने कहा, ' बाबा की कृपा रहे, और क्या चाहिए .. ' मैंने कहा, ' पिंकी, चिंता मत करो, अगर तुम कलकत्ता आने का निश्चय करती हो तो मैं तुम्हें भरोसा दिलाता हूँ कि सब ठीक रहेगा.. विश्वास रखो.. '  उसने अब मेरी तरफ देखा।  उसकी आखों में एक जिज्ञासा भरी चमक थी। उसने कहा, ' चलो तुम्हें तुम्हारे गेस्ट हाउस में छोड़ दूँ.. अब रेलवे स्टेशन पर ही मुलाकात होगी.. छोड़ने आऊंगी..'
     क्या हम दोनों बिना अधिक बात किये, कुछ निश्चित कर चुके थे ? इन कुछ दिनों में ही हम दोनों के मध्य एक संवाद सा बन चुका था। जो दिखता न था पर चल रहा था। मैं तो कहीं बहुत पहले ही निश्चित कर चुका था कि मेरी इच्छा क्या थी और मुझे करना क्या था?  पिंकी की ओर से मैं समझ न पा रहा था। कोई संकेत न था। क्या पिंकी जैसी सिख धर्म की लड़की मुझ जैसे बंगाली लड़के के प्रति आकर्षित होगी ? मुझे तो अपनी पराजय ही दिखती थी। मैं अपने आप में कहीं आत्मविहीन सा था। मुझे यहाँ चंडीगढ़ के जीवन-व्यवहार ने सोचने को विवश कर दिया था कि मैं क्यों ऐसा न हो सका था। मुझे तो मोटर साइकिल तक चलाना नहीं आता था। आजकल की आधुनिक लड़की मुझ में क्या देख पायेगी ? परन्तु आज के पिंकी के व्यवहार ने स्पष्ट कर दिया कि कुछ तो ऐसा है जिसे उसने मुझ में देखा था। एक गुदगुदी सी थी मेरे भीतर। मैं एक जगह स्थिर न हो पा रहा था। बिस्तर पर लेट जाता, फिर दूसरे क्षण ही उठ बैठता। बाहर निकल आता। प्यास महसूस करता, पानी के दो-चार घूंठ पीता। बे मन से किसी पुस्तक के पन्ने पलटता। फिर बिस्तर पर आ गिरता। ये कैसा बर्ताव था मेरा,अपने ही साथ ? मैं खुश था,उदास था या व्याकुल ?  यूँ ही इधर-उधर उड़ते मन को बांधने की कोशिश में मैं उस दिन को याद करने लगा जब मैं चंडीगढ़ पहुंचा था। कैसे कलकत्ता से निकलते वक्त अनिश्चितता में था ? कैसे गेस्ट हाउस के खाने से विचलित था ? कैसे इन दिनों जब घर से दूर था, मैंने अपने नाना को खो दिया था ? और कैसे अब अंतिम दिन में मुझे लग रहा था कि कुछ दिन और यहाँ रहने को मिल जाता तो अच्छा होता ? मैं अपने घर तो पहुंच,अपने माता-पिता से मिलना तो चाहता था परन्तु मैं यह भी चाहता था, ऐसा कुछ हो जाये कि दो-तीन यहाँ और मिल जायें । कल की ट्रैन यदि कैंसिल हो जाय तो क्या ही अच्छा हो। ये क्या हो गया था मुझे ? ये कैसी स्कूल के बच्चों जैसी सोच कि आज वर्षा हो जाये तो छुट्टी मिल जाये और फिर मज़ा ही मज़ा ? 

रात देर तक जागता रहा। पिंकी के बारे में सोचता रहा। उसके साथ कलकत्ता की सड़कों, बाज़ारों में घूमता रहा। कल बहुत जल्दी उठना भी था क्यों कि सामान पैक करना था, साथ ही सब से अंतिम बार मिलना भी था। मुझे कभी इस बात का अंदेशा न था कि इस चंडीगढ़ नगर से, यहाँ के गेस्ट हाउस से कुछ ऐसा गहरा सा रिश्ता बन जायेगा। मैं तो यही सोचकर कलकत्ता से चला था कि एक सामान्य ट्रेनिंग कोर्स था, जो आपको पसंद हो या न हो करना ही था। मैंने तो यही सोचा था कि चंडीगढ़ घूमना ही हो जायेगा और अपने सर्विस रिकॉर्ड में भी आ जायेगा। आज की रात न जाने कैसे कटेगी? अब तो रेलवे स्टेशन पहुंचना था और पिंकी से अंतिम बार मिलना था। बहुत सी बातें थी जो मेरे मन की खिड़की से इधर-उधर झांक रही थी। न जाने कल क्या होगा ? क्या वह अकेली ही आएगी ? शायद सभी आयें ? शायद पिंकी और उसके पापा ही आयें ? 
 
सुबह सब से पहले कैंटीन के स्टाफ से मिला। कृष्णा थोड़ा उदास दिखा। उसने कहा ' दादा फिर आना, आप बहुत अच्छे हो..' मैंने भी उसे कलकत्ता आने का निमंत्रण दिया। कुछ साथी भी मिले। हम सब गले मिल रहे थे। मैं इलाहाबाद वाले तपन को खोज रहा था। वह न जाने कहाँ था ? मैं गेट के इंचार्ज से मिलने गया। इन सरदारजी से मिलने तपन भी वहां आया हुआ था। वह गले मिला और स्नेहपूर्वक बात करने लगा। उसने कहा कि कलकत्ता आया तो मुझे अवश्य मिलेगा। उसने मेरा पता लिया और अपना इलाहाबाद का पता दिया। आज वह एक नया सा व्यक्ति लग रहा था। उसने एक बात और बताई कि उसकी बुआ जो कलकत्ता में रहती थी, राज्य सरकार के मुख्यालय में अच्छे पद पर कार्य करती थी और रबिन्द्र संगीत की गायिकाओं में उसका नाम था। वह आकाशवाणी और दूरदर्शन पर अपने गायन का प्रदर्शन भी करती रहती थीं। तपन ने कहा कि कभी मैं उनसे मिलने जा सकता था, उन्हें अच्छा लगेगा। मैं हैरान था कि वह आज अंतिम मुलाकात में इतना सब कुछ क्यों बता रहा था ? वह खुलकर, अपनापन दिखाते हुए बात कर रहा था। आज वह बातचीत भी बांग्ला में ही कर रहा था। पहली बार जब मिला था तब वह मुझ से अनदेखी कर रहा था। आज स्थिति विपरीत थी। आज मेरा मन उससे घनिष्टता करने का न था। मैंने औपचारिक सी बात की और आगे बढ़ गया। गेस्ट हाउस का मैनेजर हाथ में एक लिस्ट लेकर घूम रहा था। मुझे देख वह दूर से चिल्लाया, ' दादा,आप तो आज ही निकल रहे हो न ? उसने लिस्ट में मेरा नाम देखा और कहा, ' आपकी दिल्ली शताब्दी है और वहां से कलकत्ता की राजधानी.. आपको ग्यारह बजे हमारी गाड़ी स्टेशन छोड़ आएगी ..' गेट पर समय से आ जाइएगा..वरना अपना इंतज़ाम खुद करना पड़ेगा..'  समय से पहले ही मैं अपना सामान ले गेट पर आ गया। थोड़ी देर में दो और लड़के भी आ गए। इन्हें भी शताब्दी से ही जाना था। कुछ ही समय में हमें स्टेशन पर उतार दिया गया। मैं इधर-उधर पिंकी को ढूंढने लगा। मेरी ट्रैन का समय हो चला था। मैंने एक दोस्त से पूछा कि हमारी ट्रैन का समय तो हो गया था। उसने कहा कि अभी भी चालीस मिनट थे। सरदारों का शहर है तो  हमारी ट्रैन भी बारह बजे ही चलेगी। वो हँस रहा था परन्तु मुझे परेशानी हो रही थी। पिंकी विलम्ब क्यों कर रही थी ? समय से आ जाती तो कुछ बातें जो मेरे मन में उठ रही थी, शायद वो हो जाती। मैं प्लेटफॉर्म पर इधर -उधर टहल रहा था। एक-एक मिनट भारी लग रहा था।  

काफी समय बाद पिंकी और जोगेन्दर अंकल आते हुए दिखे। स्टेशन पर बहुत रौनक थी। गाड़ी चलने में कुछ ही समय बचा था। भीड़भाड़ के बीच पिंकी सबसे अलग और आकर्षित दिख रही थी। उसने हेलो कहा और जोगेन्दर अंकल ने मेरे साथ हाथ मिलाते हुए कहा, ' सो, चंडीगढ़ स्टोरी ओवर ...'  मैंने मन ही मन में सोचा, स्टोरी तो अब शुरू हो रही थी। पिंकी ने सॉरी कहते हुए कहा कि पापा की वजह से देर हो गयी थी। पिंकी ने दो पैकेट मुझे पकड़ाए। उसने कहा, ' ये खाने के लिए है.. और ये दूसरा मम्मी ने तुम्हें गिफ्ट दिया है..'  मैंने कहा, ' खाने के लिए ? यहाँ से शताब्दी है और दिल्ली से राजधानी.. दोनों में खाने की समस्या नहीं है.. तुम बेकार लायी हो..'  पिंकी ने कहा कि रख लो। मैंने दूसरे पैकेट की ओर देखते हुए कहा, ' और इसमें क्या है, गिफ्ट तो तुम्हारे दिल्ली वाले मामाजी ने दे ही  दिया ही था ?  पिंकी ने हँसते हुए कहा, ' वो दिल्ली का गिफ्ट था, ये चंडीगढ़ का.. देखकर बताना कहाँ का ज्यादा अच्छा है..'  अंकल जो एक ओर खड़े थे, सामने आ गए। उन्होंने कहा, ' बेटा, कलकत्ता पहुँच कर खबर देना..  बहन जी और भाई साहब को सत श्री अकाल कहना.. बहन जी से कहना, हर बार लुधियाना में सुखबीर के पास जाती हैं, कभी चंडीगढ़ में जोगेन्दर के पास भी आयें..' ट्रैन छूटने ही वाली थी। उन्होंने मुझे ट्रैन पर चढ़ जाने को कहा और भीड़ के पीछे हो गए। पिंकी का चेहरा उदास सा दिख रहा था। वो मेरे पास आयी, मैं ट्रैन में चढ़ने के लिए आगे बढ़ रहा था। उसने धीरे से कहा, ' घर में जल्दी बात करना.. देर मत करना.. फोन करना .. बाय-बाय  ..'  

( आज यहीं तक, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर..)

Wednesday, July 15, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ' Two States - A New Story ' -24

टू स्टेट्स - एक नई कहानी 
' Two States - A New Story ' 
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चन्दर धींगरा 
Chander Dhingra 
      (२४ )    चंडीगढ़ वापसी की यात्रा में सभी शांत थे। सभी थके और नींद से भरे हुए थे। मैं पिंकी के संग स्वर्णमंदिर में हमारे बीच चल रही बातचीत को आगे बढ़ाना चाहता था परन्तु यहाँ कार में ऐसा माहौल न था। पिंकी खुद भी आँखें मूंद सो रही थी या किसी चिंतन में थी। न जाने मुझे ऐसा क्यों लगा कि मेरी ही तरह वह भी अपने आप से जूझ रही थी। मैं पिंकी को लेकर न जाने क्या-क्या सोचने लग गया था। मैं अपने भीतर एक परिवर्तन सा महसूस कर रहा था। जोगेन्दर अंकल ने कार के भीतर चल रही शांति को तोड़ते हुए कहा, ' ओये .. सभी थक गए हो क्या ?  भई हमें तो ऐसी खामोशी पसंद नहीं है.. '  लवली जो अब तक शांत थी, सबसे पहले बोल उठी, ' पापा, सभी तो आप के जैसे स्ट्रांग नहीं हो सकते हैं.. दिन भर आप हमें इधर-उधर घूमाते रहे हो.. अब जरा आराम कर लेने दो और चुपचाप गाड़ी चलाओ ..'  आंटी ने सलाह दी कि आगे रास्ते में किसी अच्छी जगह रुक कर चाय पियेंगे। चाय के नाम पर पिंकी भी उठ बैठी। ' हाँ, चाय तो पीनी है और हमारे बाबू मोशाय तो चाय-कॉफी के खास शौकीन हैं..' उसने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा। मैंने एक बार बातों-बातों में उसे अपनी चाय-कॉफ़ी की रूचि के बारे में बताया था। मुझे अच्छा लगा कि उसे ये बात याद रही थी। मैंने कहा ' हाँ, चाय तो ऐसे लम्बे ड्राइव में मिलनी ही चाहिए..' अपनी बात को पक्का करते हुए मैंने उन्हें बताया कि जब कभी भी हम कलकत्ता से दीघा के समुद्र तट पर जाते हैं तो बीच रास्ते में एक-दो जगह टी-ब्रेक लेते ही हैं। अंकल ने मुझ से दीघा के बारे में पूछा तो मैंने उन्हें इस सुन्दर सागर तट के बारे में बताया कि कैसे कलकत्ता के लोग यहाँ दो-तीन दिन का विश्राम लेने आते हैं। अंकल-आंटी पुरी-भुवनेश्वर घूम कर आये हुए थे। आंटी ने वहां के अपने ट्रिप के बारे में बताया। उन्हें पुरी का समुद्र तट बहुत सुहाना लगा था। उन्होंने कहा कि जब वे पुरी गए थे तब पिंकी का जन्म नहीं हुआ था। पिंकी तो चुप रही परन्तु लवली ने कुछ जिद सा भाव दिखते हुए कहा कि वो इस दीवाली के समय पुरी जाएगी। अब पिंकी ने भी हाँ मिलायी कि दीघा और पुरी दोनों जगह जाना चाहिए। उसने मेरी तरफ देखकर कहा, ' क्यों ठीक है न ? हमारे गाइड तो आप ही रहोगे..'  एक शरारत भरी मुस्कान उसके चेहरे पर थी। मैंने कहा, ' क्यों नहीं.. तुम लोग जब भी कलकत्ता आओगे  तो..मैं ऑफिस से छुट्टी ले लूंगा, जितने दिन आप लोग वहां रहोगे.. लेकिन वहां पंजाबी खाना नहीं मिलेगा.. बंगाली  मछली-चावल खाना पड़ेगा..' मैं शायद पहली बार इतनी लम्बी बात कह गया था। इस पंजाबी सिख परिवार के साथ जो प्रारंभिक असुविधा हो रही थी, वह धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। दोनों बहनों ने एक साथ प्रतिक्रिया देते हुए जोर से कहा, ' श्योर..' लवली तो एक कदम आगे बढ़ गयी, उसने हँसते हुए कहा, ' फिश-राइस एंड रसगुल्ला... ' मैं भी हँसने लगा। मुझे लगा बंगाल से बाहर लोगों को हमारे बारे में केवल इतना ही पता है। मछली और रसगुल्ला। मैंने सोचा ये वक्त है इनका सामान्य ज्ञान बढ़ाने का। मैंने उन्हें बताया कि बंगालियों के लिए मछली एक ही आइटम नहीं है। तरह-तरह की मछलियाँ और उनसे बने तरह तरह के व्यंजन होते हैं और बंगाली मिठाइयां तो विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। मैंने लवली की ओर देखते हुए कहा, ' कभी बंगाल की दही खाई है ? मैंने कहा तो था लवली को देखते हुए परन्तु मेरे मन में पिंकी थी और उसने मेरी बात को सुना भी। इससे पहले की लवली कोई उत्तर देती वह बोल उठी, ' हाँ मैंने खाई है.. यह सादी सामान्य दही नहीं, मीठी दही होती है.. यह एक तरह का डस्सेर्ट है.. मेरी एक फ्रेंड ने एक बार खिलाई थी...सो यम्मी..'  अपनी मिष्ठी दही की तारीफ मुझे अच्छी लगी परन्तु इसके लिए यम्मी शब्द कुछ अटपटा लगा। हमारी मिष्ठी दही इससे कुछ ऊपर है। मैं सोचने लगा कि ये आजकल का यम्मी शब्द किस बंगाली व्यंजन के साथ जायेगा ? अचानक दिमाग ने साथ दिया कि हमारी आम-खजूर वाली चटनी को यम्मी कहा जा सकता है। मैंने कहा, 'पिंकी, हमारे बंगाल में आम-खजूर की चटनी होती है.. उसे यम्मी कहना सटीक होगा..' वह हँसने लगी। सटीक शब्द उसे अच्छा लगा। बंगाली मिठाइयों को लेकर बचपन में सुनी एक छोटी सी कविता मुझे याद आ रही थी। लगा वो कविता सुना दूँ परन्तु दूसरे ही क्षण लगा कि इन पंजाबी लड़कियों का कविता से क्या सम्बन्ध ? कविता सुनाऊँ और कहीं खुद मैं ही हँसी का पात्र न बन जाऊँ ?

कुछ समय बाद अंकल ने एक ढाबा नुमा जगह पर गाड़ी रोक दी। वो तेजी से उतर टॉयलेट की तरफ दौड़े। मैं भी और बाद में तीनों महिलाएं भी। हल्के हो, हम टेबल पर आकर बैठे और वहां रखे मेनू कार्ड  देखने लगे। आंटी को पहले से ही अंदाज़ा था कि वहाँ क्या-क्या मिल सकता था। उन्होंने चाय और साथ में कुछ स्नेक्स मंगवाया। यहाँ भी मैं यही सोचता रहा कि यदि कभी ये लोग कलकत्ता आएँगे और हम लोग दीघा या कहीं और जा रहे होंगे और ऐसी ही परिस्थिति होगी तो चाय के साथ इन सब के लिए क्या क्या मँगवाऊंगा ? मैं पिछले वर्ष दोस्तों के साथ दीघा गया था। आज मुझे लगा कि यहाँ जैसे हाई वे रिसोर्ट या ढाबे वहां के रास्तों पर क्यों नहीं हैं ?  इन लोगों, विशेष कर पिंकी को वहां कैसा लगेगा ? मैं इन्हें हमारे कलकत्ता के चाइना टाउन के चाईनीज़ रेस्टोरेंट्स में ले जाऊँगा। बालीगंज के मशहूर बंगाली रेस्टॉरेंट में भी ले जाऊंगा। चौरंगी के एक ऊँचे होटल के बंगाली रेस्टॉरेंट में भी जा सकते हैं। मैं सोचता ही जा रहा था कि अंकल ने सबसे गाड़ी में जाकर बैठने को कहा।  'अब चलना चाहिए वरना बहुत देर हो जाएगी..'  उन्होंने आदेश के स्वर में कहा। मैंने देखा कि दोनों लड़कियाँ एकदम से चुपचाप कार में जाकर बैठ गयी। लगभग दो घंटे बाद हम चंडीगढ़ पहुँच गए। मेरा गेस्ट हाउस पहले आता था। मुझे अंकल ने गेट पर उतारा। सभी लोग कुछ समय के लिए कार से उतर आये। अंकल ने मुझे अपना ख्याल रखने को कहा। आंटी ने कहा कि किसी चीज़ की जरुरत हो तो निसंकोच बताना। पिंकी और लवली ने कहा, सत श्री अकाल, गुड नाइट, बाय। मैं दूर जाती उनकी कार को देखता रहा। आगे मोड़ पर जब वह ओझल हो गयी तब मैं गेस्ट हाउस के गेट के भीतर आया। कैंटीन का हॉल खाली पड़ा था और सामान समेटा जा रहा था। कैंटीन के मैनेजर ने पूछा कि आज बहुत देर हो गयी थी। मैंने उसे बताया कि अमृतसर गया था। उसने कहा, ' अच्छा, मत्था टेकने गए थे.. बैठो खाना लगता हूँ ..'  मैंने कहा, ' थोड़ा सा ही देना, ज्यादा भूख नहीं है..'  उसने एक प्लेट में दो गर्म रोटी, दाल, सब्जी और सलाद लगा दिया। मुझे याद आया कि पिंकी ने भी मंदिर में मत्था टेकने की बात कही थी न कि दर्शन करने की। भाव एक जैसा है परन्तु गुरु के सामने माथा टिकाना अधिक आस्था पूर्ण लगता है। 

 खाना खा मैं अपने कमरे में आ बिस्तर पर धम से लेट गया। दिन भर की थकावट थी लेकिन मेरे भीतर चल रहे विचारों का अंत नहीं हो रहा था।  वे तेज प्रवाह से किसी पहाड़ी नदी की तरह  इधर-उधर बिखरे पत्थरों से टकराते हुए, बहे चले आ रहे थे। गुरुद्वारे में लंगर के समय एक बात और हुई थी। लंगर की पंक्ति में बैठने पर, सेवा करने वाले को मैंने एक रोटी देने को कहा था तो उसने मुझे रोटी नहीं ' प्रसादा ' बोलने को कहा था। उसने अतिविनम्रता के साथ कहा था परन्तु मुझे अच्छा न लगा था। बाद में पिंकी ने मुझे सिखाया था कि यह दो हाथों में स्वीकार किया जाता है और इसे प्रसादा कहते हैं। मैंने उस समय उसे बंगाल में साल भर होते रहने वाले तरह-तरह के पूजा आयोजनों और उन अवसरों पर वितरित होने वाले 'भोग' के बारे में बताया था। लेकिन अब मुझे लगने लगा था कि गुरुद्वारे के लंगर में जो श्रद्धा और आस्था का भाव मैंने देखा था वह बंगाल के भोग में नहीं दिखता। साथ ही मैंने स्वयं को एक स्पष्टीकरण भी दे दिया कि यहाँ के लोग अधिक सम्पन्न हैं और वे अधिक धनराशि ऐसे आयोजनों पर दान स्वरुप दे सकते हैं। इसीलिए यहाँ अधिक सुदृढ़  व्यवस्था होती है। याद आया कि नाना ने एक बार मुझसे कहा था कि जो भी काम किया जाये उसे पूर्ण निष्ठा के साथ करना चाहिए। आज अमृतसर के गोल्डन टेम्पल में मैंने कार्य के प्रति जिस तरह की निष्ठा देखी थी, वैसी ही निष्ठा हमारे आयोजनों में भी होनी चाहिए। मैं यही सब सोचते-सोचते न जाने कब सो गया। 
 ( आज यहीं तक, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर  .. )

Wednesday, July 8, 2020

' टू स्टेट्स - नई कहानी ' ' Two States - A New Story ' -23


                                            ' टू स्टेट्स - नई कहानी '
' Two States - A New Story ' 
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चन्दर धींगरा 
Chander Dhingra 

 इस लम्बी कहानी ( उपन्यास ) को साझा करने का सिलसिला शुरू है। आज गुरुवार है, आगे बढ़ते हैं  ...  
( २३ )             हम दोनों मंदिर के पवित्र सरोवर की सीढ़ियों पर खामोश बैठे थे। बाहर मौन था परन्तु दोनों के भीतर संवाद चल रहा था। मन के इसी वार्तालाप में मैंने खुद से कहा, ' मैं अपने से ही बातें कर रहा हूँ, पर क्या पिंकी मेरा मन सुन पा रही है ?  स्वर्ण मंदिर का दिव्य दर्शन सामने था। न जाने कितने सत्य छिपे हुए थे इस दिव्यता की छांव में ? इस तरह की दिव्यता संभवतः कलकत्ता के समीप बेलूर मठ में ही महसूस होती है। वहां के किसी अन्य मंदिर में नहीं। हम दोनों के बीच छाए मौन को तोड़ते हुए, मैंने बात आरम्भ की। कहीं से तो करनी थी, लगा क्यों न किसी फिल्म की बात से शुरू करूँ ? हमारे समाज में फिल्म और राजनीति ऐसे विषय हैं जिन पर पर कभी भी बात की जा सकती है। मैंने कहा, ' पिंकी क्या तुमने देवदॉस फिल्म देखी है ?  उसका न सुन मैं हैरान रह गया। उसने कहा कि फिल्म तो नहीं देखी थी परन्तु यह उपन्यास उसने दो बार पढ़ा था और उसने इसके सम्बन्ध में एक लेख लिखा था जो कॉलेज की अंग्रेजी की पत्रिका में प्रकाशित भी हुआ था। उसने कहा कि वह इस कहानी के पात्रों से बहुत प्रभावित हुई थी।  ' कौन सा पात्र सबसे अधिक प्रभावशाली लगा है? मैंने पूछा। न जाने क्यों मैं इस विषय को आगे बढ़ाना चाहता था।  'ऑफ़ कोर्स, पारो..' उसने अपने पंजाबी अंदाज़ में कहा। इसके बाद उसने कहा कि देवदॉस की कहानी को दुनिया की श्रेष्ठम प्रेम कहानियों में रखा जाना चाहिए। मुझे उसकी यह बात अच्छी लगी। मैंने कहा कि क्या उसे कहानी का दुखद अंत पसंद आया था और क्या इसका सुखद अंत नहीं किया जा सकता था ? वो हंसने लगी, ' तुम्हारा मतलब है देवदॉस और पारो अंत पति-पत्नी की तरह मिल जाते.. अरे, तुम तो इस कहानी को बॉम्बे की फिल्म बना देते..'  मुझे उसकी बात प्रभावशाली लगी।  मैंने कहा, ' तुम्हें नहीं लगता, दुनिया में हर किसी के पास अपनी एक कहानी छिपी होती है..'  ' हाँ, जरूर, सबकी अपनी-अपनी कहानी है.. मेरे पापा-मम्मी की भी एक प्रेम कहानी है... इन दोनों ने अपने पेरेंट्स की इच्छा के विरुद्ध शादी की थी..'  वह मुस्कुराने लगी। मैंने कहा, ' अच्छा.. तो सुनो, मेरे माँ-बाबा की भी लव स्टोरी है..' मैं झूठ बोल रहा था और उसे प्रभावित करना चाहता था। मेरे माँ-बाबा की तो सामान्य दो परिवारों के बीच तय की हुई शादी थी। वह बाबा शब्द पर अटकी। उसने पूछा, ' बाबा..माने ?  मैंने उसे स्पष्ट किया कि बंगाली भाषा में बाबा का अर्थ है पिता.. जैसे वह मम्मी-पापा कहती है वैसे ही हम माँ-बाबा कहते हैं..' मैं अपने माँ-बाबा की लव स्टोरी पर बे वजह का झूठ बोल गया था। अब पिंकी ने उनकी लव स्टोरी जाननी चाही। लड़कियों को इस तरह के विषयों में खासी रूचि रहती है। मैंने कहा कि कुछ विशेष नही था। अब मैं इस विषय को यहीं समाप्त करना चाहता था। परन्तु वह ज़िद करने लगी। मुझे एक कहानी गढ़नी पड़ी। मैं कहानी गढ़ने की अपनी क़ाबलियत पर मुग्ध हो रहा था। मैंने माँ के ब्राह्मण तथा बाबा के कायस्थ होने के साथ साथ कई इधर-उधर की बातें जोड़ी और एक अनोखी प्रेम कथा उसे सुना दी। पिंकी ने सुना और सरलता से कहा कि वह तो बंगाली लोगों को बहुत पढ़ा-लिखा और खुले दिमाग वाला समझती थी। परन्तु वहां भी इस तरह की जात-पात की बातें थीं। 

पिंकी ने कहा कि हम दोनों के माता-पिता प्रेम विवाह से बंधे थे तो कहीं न कहीं हमारे परिवारों में कुछ समानता थी। मैं भीतर तक शंकित सा हो गया था। अब लगा कि मुझे ये झूठी कहानी नहीं बनानी चाहिए थी। कहीं यह बात उठ गयी तो ? दिमाग ने हमेशा की तरह फिर से मेरा साथ दिया, 'अब जो होगा देखा जायेगा..'  पिंकी ने जब परिवारों की समानता की बात की तो मैंने उसकी भाव भंगिमा पढ़नी चाही। शायद वह सामान्य थी परन्तु मुझे लगा कि कोई सन्देश देना चाहती थी। मैंने कहा कि वह अपने लिए कैसा विवाह चाहेगी, प्रेम विवाह या पारिवारिक विवाह। पिंकी ने तुरंत कहा कि वह कुछ कह नहीं सकती परन्तु अपने होने वाले जीवन-साथी को बिना जाने-समझे वह कैसे किसी से विवाह कर सकती थी। मैंने पूछा, ' क्या तुम इंटरकास्ट मैरिज करोगी ? उसने हँसते हुए कहा कि पारिवारिक व्यवस्थित विवाह हो या कुछ और, वह अपने होने वाले पति को अच्छे से जानना और समझना तो अवश्य ही चाहेगी। मैंने भी उसकी बात में हामी भरी, ' हाँ, होने वाले जीवन साथी को जानना तो आवश्यक है..परन्तु एक दो बार मिलने-मिलाने से कितना जान सकते हैं..  हमारी परम्परा में पारिवारिक जानकारी का आधार होना एक अधिक अच्छी प्रणाली है.. परिवार की पृष्ठभूमि सभी कुछ स्पष्ट कर देती है..'  अब उसके हाँ कहने की बारी थी, ' दोनों बातें अपनी-अपनी जगह हैं..'  मैं विषय से अलग नहीं होना चाहता था। मैंने हलके अंदाज़ में पूछा, ' अच्छा, हम दोनों कुछ दिनों से एक-दूसरे से मिल रहे हैं, तुम मुझे कितना जान सकी हो ? पिंकी इस तरह मुस्कुराई मानों मेरी चतुराई को भांप रही हो। उसने कहा, ' सच कहूँगी तो तुम बुरा मान जाओगे..'  मैंने कहा कि नहीं ऐसा नहीं होगा। उसने उसी अंदाज़ में कहा, ' तो सुनो..तुम पढ़े-लिखे सिंपल टाइप हो..पर अच्छे हो..अपनी वाइफ को खुश रखोगे.. परन्तु अभी मैं पूरे विश्वास के साथ नहीं कह सकती..' यह कह कर वह हँसने लगी। उसकी सरल स्पष्टता प्रभावशाली थी। मैं न जाने क्यों झेंप रहा था। सामने की ओर देखा, अंकल,आंटी और लवली मंदिर का चक्कर लगाकर वापिस चले आ रहे थे। हम दोनों खड़े हो गए। पिंकी ने मंदिर की ओर शीश झुका कर प्रणाम किया। उसने मुझे भी ऐसा करने का इशारा किया। मैंने भी झुक कर नमन किया। मैं स्वयं को बहुत बुद्धिमान समझता रहा हूँ कि मैं ईश्वर और प्रार्थना आदि को नहीं मानता कि मैं बंगाल की प्रगतिशील विचारधारा में बड़ा हुआ था। मुझे मंदिर और पूजा-पाठ सदैव से एक तरह का आडम्बर लगते रहे थे। मेरे हिसाब से ये बातें मनुष्य की दुर्बलता दर्शाती थी। परन्तु आज न जाने मेरे मन ने भीतर ही भीतर क्यों कहा ' हे ! पवित्र मंदिर, तुम्हारे दर्शन को पुनः आऊँगा, अपने माँ, बाबा और पत्नी के साथ..' अचानक मुझे लगा कि क्या मैं भी दुर्बल हो रहा था ? मेरे दिमाग ने हमेशा की तरह मेरा साथ दिया कि नहीं यह कोई प्रार्थना नहीं थी। यह तो मैं केवल अपनी इच्छा को अपने से ही व्यक्त कर रहा था। 
( आज यहीं तक, इससे आगे गुरुवार को, यहीं पर )

Wednesday, July 1, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' - 22


                                                 ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हर गुरुवार को इस लम्बी कहानी ( उपन्यास ) को साझा किया जाता है। आज फिर एक गुरुवार है, अब आगे..  

( २२ )                     चंडीगढ़ का वो गेस्ट हाउस मेरे लिए अब पहले जैसा अनजाना न था। इन कुछ ही दिनों में यह अपना सा लगने लगा था। अक्सर ऐसा ही होता है, नया व्यक्ति हो या नया स्थान, आरम्भ में अपरिचित होता है परन्तु कुछ समय बाद वह परिचित और अपना सा हो जाता है। कभी कभी यह अपना हो जाने वाला समय कुछ मिनटों या घंटों का ही होता है। मुझे तो लगता है कोई-कोई अपरिचित तो मुलाकात के प्रथम कुछ क्षणों में ही परिचित हो जाता है और कभी अपना बनाने के प्रयास में हम सालों साल लगे रहते हैं परन्तु अपरिचय की यह दूरी तय ही नहीं होती।

 आने वाले रविवार का इंतज़ार था। उस दिन अमृतसर जाना था। इस बीच एक दिन में जोगेन्दर अंकल के घर पर हो आया था। वो सभी मुझे सहज करने की कोशिश करते दिखे। पिंकी ने घर पर हमारे अमृतसर जाने की बात की हुई थी। बातों बातों में पता चला कि वे सभी जायेंगे। मैंने अंकल से कहा कि जो खर्च आ आएगा, उसमें मुझसे मेरा भाग लेना होगा। अंकल हँसने लगे। उन्होंने कहा, ' ये क्या बात हुई.. तुम अपने घर के ही हो.. दो बच्चे साथ हैं तो अब समझो तीन हैं.. ' उनकी बात में एक तरह की ग्रामीण सादगी थी। उन्होंने मेरी बात को अपनी बातों में इधर-उधर कर दिया। उन्होंने मुझे अमृतसर शहर के बारे में बताया। अमृतसर को पंजाब का सबसे महत्वपूर्ण और विश्व का एक पवित्र नगर माना जाता है। दुनिया के बहुत ज्यादा लोग यहाँ के पवित्र स्वर्ण मंदिर को देखने आते हैं। उन्होंने बताया कि अमृतसर ने सबसे ज्यादा युद्ध और अत्याचार सहे हैं। देश के बंटवारे के समय भी सबसे बड़ी आग अमृतसर को ही सहनी पड़ी थी। उन्होंने कहा कि जलियांवाला बाग के बारे में तो सभी जानते ही हैं। मैंने कहा, ' अंकल उस नरसंहार को तो पूरी दुनिया जानती है.. हमारे रबीन्द्रनाथ टैगोर ने तो अंग्रेज़ों  द्वारा दिया गया ' नाईटहुड ' सम्मान ही वापिस कर दिया था..'  मैंने बताया कि जब अमृतसर में जलिआंवाला बाग को लेकर एक समारोह हुआ था तो नाना को भी स्वतंत्रता सेनानी के रूप में वहां आमंत्रित किया गया था। उस समय बंगाल से कई लोग आये थे। अंकल ने कहा, ' संडे को तुम अंग्रेजों के अत्याचार की तस्वीर देखना..'  रविवार को सुबह जल्दी निकल जाने का निर्णय हुआ क्योंकि संध्या तक वापिस लौट आना था। पिंकी ने सलाह दी कि मुझे पांच बजे तक तैयार रहना चाहिये और वो लोग मुझे गेस्ट हाउस से ले लेंगे क्योंकि वह रास्ते में ही पड़ता था। रविवार सुबह पांच बजे ? मुझे असुविधा लग रही थी। इतनी जल्दी शायद मैं जाग ही न पाऊँ ? मैंने पिंकी को बताया तो उसने सलाह दी कि मुझे गेस्ट हाउस के रात की ड्यूटी के चौकीदार को बता कर रखना होगा। वो मुझे उठा देगा।  

शनिवार की रात को मैंने गेस्ट हाउस के गेट इंचार्ज को अपनी मुश्किल बता दी। सुबह चार बजे चौकीदार मुझे जगा गया। पांच बजे तक मैं तैयार था और गेट पर आकर बैठ गया। थोड़ी देर में जोगेन्दर अंकल अपनी गाड़ी में पहुँच गए। वे गाड़ी चला रहे थे। आंटी बगल वाली सीट पर थी। दोनों बहनें पीछे बैठी थी। पिंकी ने अपनी ओर वाला दरवाजा खोला और मुझे अंदर बुलाया। सभी लोग बहुत खुश नज़र आ रहे थे। लवली ने जरूर एक बार इतनी सुबह सुबह जाने पर पर मुँह बनाया। दोनों बहनें बहुत स्मार्ट दिख रही थी। पिंकी कुछ गंभीर सी दिखी। वह शायद हरमंदिर साहेब जाने के कारण अभी से गुरु स्मरण की मुद्रा में थी। गाड़ी जब शहर के बाहर आ गयी तो मैंने पिंकी की ओर नज़र घुमाई। वह आँखें मूंद गहन ध्यान मुद्रा में दिखी। आंटी भी हलके स्वर में  भजन गुनगुना रही थीं। अंकल होशियारी से गाड़ी चला रहे थे। लवली पावर नेप ले रही थी। अंकल ने बताया कि चार घंटे में वे अमृतसर पहुँच जायेंगे परन्तु कुछ समय के लिए बीच में एक स्थान पर रुकेंगे। मैंने अंकल से पूछा कि पूरा रास्ता वह ही कार चलाएंगे तो थक जायेंगे। उन्होंने कहा, ' अरे, ऐसी कोई बात नहीं है   .. जरुरत पड़ी तो तुम्हारी आंटी या पिंकी चला लेंगी..' लवली ने यह बात सुनी तो हंसने लगी, ' सभी थक गए तो मैं हूँ ना..' मुझे खुद में एक तरह की क्षीणता सी लगी कि यहाँ सभी कार चला सकते हैं सिवाय मेरे। 

अमृतसर आने पर हम लोग सीधे स्वर्ण मंदिर गए। पिंकी ने मुझे सिर ढकने के लिए कहा। वह मेरे लिए एक स्कार्फ़ घर से ही लेकर आयी थी। मंदिर में बहुत रौनक थी। श्रद्धा से भरे लोग, कतार में लगे हुए थे। मैं मन्त्र मुग्ध था। क्या अनुशासन, क्या साफ-सफाई .. सब कुछ देखने लायक था। बहुत आस्था के साथ हम सब ने दर्शन किये और लंगर खाया। लंगर के बारे में मुझे पिंकी ने बहुत कुछ बताया। लवली और अंकल -आंटी आगे आगे चल रहे थे। मैं और पिंकी पीछे थे। सिख समाज के बारे में मुझे इतना कुछ मालूम न था। पिंकी से आज बहुत कुछ पता चल रहा था। मैं सोचता रह गया कि हमारे देश और संस्कृति के लिए इन लोगों ने कितना कुछ बलिदान किया था। मैंने भी पिंकी को बंगाल की कुर्बानियों के बारे में बताया। कुछ समय विश्राम कर हम लोग जलिआंवाला बाग पहुँच गए। यहाँ आकर ऐसा लगने लगा कि मानों हम इतिहास के उस दिन में आ गए हों जब ब्रिटिश अधिकारी जनरल डायर ने निहत्थे और शांति से सभा कर रहे भारतीय लोगों पर गोलियां बरसा दी थीं। पिंकी को यहाँ का पूरा इतिहास मालूम था। उसने मुझे कई बातें बताई कि कैसे रौलेट एक्ट के प्रति विरोध जाहिर करने को जमा लोगों को मार दिया गया था। उसने यह भी बताया कि शहीद भगत सिंह की सोच को बनाने में जलिआंवाला बाग़ की घटना प्रमुख है। पिंकी को काफी कुछ पता था। वह कई बार यहाँ आ चुकी थी परन्तु उसे अधिक जानकारी अपने स्कूल के एक टूर में मिली थी। उसने बताया कि कैसे सरदार उधमसिंह ने जलिआंवाला बाग का बदला इंग्लॅण्ड में डायर को मार कर लिया था। मैं उसकी इतिहास में रूचि पर मुग्ध था। साथ ही मैं बंगाल के ऐतहासिक घटनाओं के बारे में भी सोच रहा था। शहीद खुदीराम, मास्टर दा सूर्यसेन, बागा जतिन आदि मेरे दिमाग में आ रहे थे। मुझे लगा कि क्या ये लड़की जो मुझे इतना कुछ बता रही थी, उसे बंगाल के क्रांतिकारियों के बारे में भी जानकारी थी ?  मैंने सोचा, मौका मिलेगा तो मैं भी पिंकी को अपने बंगाल के बारे में सब कुछ बताऊंगा। 

हम सभी काफी थक गए थे। किसी का भी वागा बॉर्डर जाने का मन नहीं था। शायद मेरे लिए ही वे वहां जाने वाले थे। मैं वागा बॉर्डर का कार्यक्रम टीवी पर देख चुका था। मैंने एक बंगाली पत्रिका में इसके बारे में पढ़ा भी था कि यहाँ संध्या में होने वाली फौजी रस्म देशभक्ति को नहीं बल्कि दोनों ओर वहां आये दर्शकों के मध्य भावना भड़काने वाली जैसी होती है। मेरी भी वहां जाने की इच्छा न थी। जैसे ही मैंने वागा बॉर्डर न जाने की बात की, सभी के चेहरे खिल उठे। ये निश्चित किया गया कि एक बार फिर हरमंदिर साहेब जायेंगे और वहां कुछ समय बिताकर चंडीगढ़ लौट जायेंगे। मुझे अमृतसर का माहौल बहुत पसंद आ गया था। मैंने सोचा, माँ को फोन कर सब बताऊंगा। हम लोग स्वर्ण मंदिर आ गए और वहां सरोवर की सीढ़ियों पर बैठ गए। सभी आँखें मूंद ध्यान की मुद्रा में थे। लवली जो सामान्यतः चुलबुल सी रहती थी, इस समय अपने पापा के पास बैठी, ईश्वर की भक्ति कर रही थी। उसे इस तरह गंभीर देखना अच्छा लगा। कुछ समय बाद आंटी ने कहा, ' एक चक्कर लगा लेते हैं, फिर वापिस चलते हैं..'  पिंकी ने कहा, ' मम्मी, आप लोग हो आओ मैं यहीं बैठी हूँ..'  वो लोग आगे बढ़ गए। मैं उठा तो परन्तु फिर मुझे भी कुछ देर बैठ जाना ही अच्छा विकल्प लगा। मैं कहा, ' अंकल, मैं भी यहीं रुकता हूँ.. पिंकी के साथ ..'   
( आज बस, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर )