Chander Dhingra's Blog

Wednesday, September 30, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -38

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II-     चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1    ( ३८ )     उन लोगों के वहां से निकल जाने के साथ ही मैं दौड़ता हुआ ऊपर के कमरे में आया। मैं हाँफ रहा था। मैंने चंडीगढ़ का नंबर मिलाया। कुछ गड़बड़ हो गया था। शायद चंडीगढ़ का कोड ही भूल हो गया था। दोबारा मिलाया। अब उधर से हेलो की आवाज़ आई तो मैंने कोई उत्तर न दिया। मैं जानता था कि उस तरफ  पिंकी ही थी। वह हेलो..  हेलो.. कह रही थी और मैं खुद में ही मुस्कुराता जा रहा था। अंत में मैंने कहा, ' हेलो.. क्या मैं मनप्रीत जी से बात कर सकता हूँ..' उधर से किसी ने कहा, ' जी वो तो घर पर नहीं हैं..आप कौन बोल रहे हैं..' मैंने सोचा ये तो गड़बड़ हो गया। फोन शायद उसकी बहन ने उठाया था। मैंने कहा, ' कब तक आएँगी .. मैं बाद में फोन कर लूंगा ..' अब उधर से हंसी की आवाज़ आयी, ' अरे, मैं मनप्रीत ही बोल रही हूँ, अभिजीत साहब.. मैं झुंझला गया, मैंने कहा, ' मुझे तो अभी दस मिनट पहले ही तुम्हारा नाम पता चला है, मनप्रीत.. परन्तु तुम्हें मेरा नाम कैसे पता चल गया...' वह हंसती ही जा रही थी, ' अरे, तुम्हारी कलकत्ता की फ्लाइट तो मैंने ही बुक की थी मिस्टर अभिजीत रॉय..'  अब मैं भी हंसने लगा। मैंने उसे दिन भर जो-जो हुआ था सब विस्तार से बताया। मैंने बताया कि सब कुछ ठीक से हो गया था। उसके मम्मी-पापा और मामा जी  कुछ समय पहले ही हमारे घर से निकले थे। मैंने कहा, ' दो महीने बाद नवंबर में उसे मिसेज मनप्रीत रॉय बनकर कलकत्ता आना था। वह बहुत खुश लग रही थी। उसने कहा, ' मनप्रीत रॉय नहीं मनप्रीत कौर रॉय..'  मैंने कहा, ' हाँ..बिलकुल सही कहा.. तुम्हारा कौर तुम्हारे साथ ही रहेगा..' हम लोग काफी देर तक बातें करते रहे। दोनों ही रोमांचित थे। अचानक माँ की आवाज़ आयी। वह मुझे बुला रही थीं। मैंने  फोन रखते हुए कहा कि रात में एक बार फिर से बात होगी। नीचे आया तो देखा भेंट में आयी सभी चीजों को खोलकर देखा जा रहा था। इनमें ड्राई फ्रूट्स के पैकेट्स थे। बादाम,अखरोट, काजू, किशमिश,पिस्ता आदि। जो टोकरे थे वे बहुत खूबसूरत ढंग से सजाये हुए थे और इनमें तरह-तरह के फल थे। कुछ फल तो वे थे जो सामान्य फल की दुकानों पर नहीं मिलते। अचानक मुझे टोकरों के ऊपर लगे स्टीकर दिखे। ये सभी कलकत्ता की एक प्रसिद्द मार्किट से आये थे। मैं समझ गया कि इन सभी की व्यवस्था पहले कर ली गयी थी और आज सुबह इन्हें हमारे घर के पते पर डिलीवरी करा दिया गया था। माँ बहुत खुश थी कि इतना सब कुछ मिला था। इन्द्राणी दीदी भी हैरान थी। माँ ने कहा कि वे लोग रोका के नाम पर सगाई ही करके गए थे। अब जो सगाई होगी वह मात्र औपचारिकता होगी। इन्द्राणी दीदी को एक बात परेशान कर रही थी कि शादी दिन में होगी। माँ ने उसे बताया कि रात में पार्टी भी होगी। बाबा ने कहा अब उनकी बात तो माननी ही होगी। हम लोग बारात लेकर दिल्ली जा रहे थे, वहां जैसा प्रबंध वे लोग करेंगे, हमें स्वीकार कर लेना होगा। बाबा तो दिल्ली जाने की व्यवस्था में लग चुके थे। उनका कहना था कि तुरंत ही सब कुछ कर लेना होगा। उन्होंने अपनी डायरी में कुछ नाम भी लिख लिए थे, जिन्हें बाराती के रूप में दिल्ली लेकर जाना था। ये करीब बारह लोगों की लिस्ट थी। उनका मानना था कि बहुत अधिक लोगों को ले जाना उचित न होगा। उन्होंने बताया कि ये सभी जानकारी दिल्ली में जोगेन्दर के साले को देनी थी जिससे कि वह रहने आदि की व्यवस्था कर सकें। बाबा हर समय रेल रिजर्वेशन फॉर्म्स अपने पास रखते थे। उन्होंने अपनी टेबल की कुर्सी पर बैठते हुए कहा, ' एक फॉर्म में छह लोगों के नाम आ सकते हैं, मैं राजधानी ट्रैन के दो फॉर्म भर रहा हूँ.. नवंबर की तारीख बताओ.. देर कर दी तो बुकिंग नहीं मिलेगी..'  माँ उनकी इस बात पर परेशान हो गयी थी। उन्होंने कहा कि अभी तुरंत तारीख नहीं बताई जा सकती थी। उन्होंने आदेश के स्वर में कहा, ' कल तक रुको.. इस तरह की जल्दबाज़ी मत करो.. सब कुछ सोचना-समझना पड़ेगा..'  बाबा निराश हो गए थे। उन्होंने खिन्न होते हुए माँ से कहा, ' जो करना है करो, विलम्ब किया तो ट्रैन के टिकट नहीं मिलेंगे और दिल्ली में लड़की वालों को भी अच्छी जगह ठहराने की मुश्किल होगी ..'  माँ ने कुछ नहीं कहा परन्तु ऐसा संकेत अवश्य दिया कि एक-दो दिन में कुछ फर्क नहीं पड़ता था। माँ ने बिशाखा को कहा कि सब सामान ठीक से ऊपर के उनके कमरे में रख दे। इधर इन्द्राणी दी और उनकी माँ घर जाने की मुद्रा में आ गए थे। माँ ने उन्हें रोक लिया कि दोपहर का बहुत खाना बचा हुआ था सो उन्हें रात को खाकर ही अपने घर जाना होगा। मैंने भी इन्द्राणी दी को रुकने को कहा। हम दोनों ऊपर छत पर चले गए। इन्द्राणी दी के पास वो फोटो वाला लिफाफा था। उन्होंने एक कोने में बैठते हुए कहा, ' चलो, अब आराम से सब फोटो देखते हैं..' उन्होंने एक फोटो निकाली और घूमा-घूमा कर देखने लगी। उन्होंने वो फोटो मुझे दी और दूसरी निकाली। पहली फोटो अब मेरे हाथ में थी। मैं देखता ही रह गया। इन्द्राणी दी एक-एक कर फोटो मुझे दे रही थी। आज मैं पहली बार पिंकी को इतने करीब से देख रहा था। इन्द्राणी दी ने कहा, ' भई, बहुत सुन्दर है..एकदम किसी फ़िल्मी नायिका सी दिखती है..' मैंने कहा, ' ऐसी कोई बात नहीं है, बस ठीक है..' उन्होंने मुझे चिढ़ाते हुए कहा कि मुझे इतना भी सरल नहीं बनना चाहिए। फिर उन्होंने कहा कि लड़की एक तो सुन्दर थी फिर पढ़ी-लिखी और अमीर परिवार की भी। उनका कहना था कि मैंने कोई बड़ी लाटरी जीत थी। वह फोटो को बहुत गौर से देख रही थीं। एक फोटो पर वह बार-बार चली जाती थीं। ये फोटो अमृतसर की थी। इसमें मैं एक ओर था और दोनों बहनें मेरे दायीं ओर। पृष्ठभूमि में पवित्र स्वर्ण मंदिर था। ऑन्टी ने यह फोटो खींची थी। हम तीनों इसमें बहुत श्रद्धावान दिख रहे थे। पिंकी बहुत आकर्षित दिख रही थी। मैंने उनसे पूछा, ' इसमें सबसे अच्छा कौन लग रहा है ?  इन्द्राणी दी ने तुरंत कहा, जिस पर तुम फ़िदा हो गए वही..' उन्होंने कहा इस फोटो से ऐसा लगता है कि अमृतसर जाकर ही मेरा मन इस लड़की पर आ गया होगा। मैं मुस्कुरा दिया, ' हाँ..आप ठीक कह रही हैं.. ' अब इन्द्राणी दी हंसने लगी, ' देखा हमारे तज़ुर्बे .. तुम्हारे चेहरे पर साफ दिख रहा है कि तुम क्या सोच रहे हो..और ये दीदी-दीदी क्या है ? मैं तुमसे बहुत बड़ी नहीं हूँ..हम तो दोस्त की तरह हैं..वो वाली बात याद नहीं है ?  अब से मुझे नाम से ही बुलाओगे और मेरे संग एक दोस्त की तरह पेश आओगे.. ' मैंने कहा, ' ठीक है.. दोस्त इन्द्राणी या इसे भी और भी छोटा कर दूँ.. इंदु..'  वह जोर से हंसने लगी। माँ की आवाज़ आई।  शायद मेरे लिए किसी का फोन आया था। हम दोनों नीचे आ गए। मैंने फोन उठाया। रोबी दा का फोन था। वह जानना चाहते थे कि मेरे क्या हालचाल थे। मैंने कहा कि सब ठीक था। उन्होंने ऑफिस की एक दो बात कही कि कैसे ऊपर के अधिकारी हमारे कार्यालय को बर्बाद करने पर तुले हुए थे और कैसे वे लोग कर्मचारियों के हित को नकार रहे थे। मैं चुपचाप सुनता जा रहा था। उन्होंने बताया कि इन्हीं सभी उलझनों के कारण वह उन दिनों बहुत व्यस्त चल रहे थे। उनकी पत्नी बीमार थी फिर भी वह रविवार के दिन वह ऑफिस गए हुए थे। उन्हें इस सप्ताह नगर के अन्य संघों के साथ बैठक आयोजित करनी थी। उन्होंने कहा कि अब उनका स्वास्थ्य बहुत ज्यादा भागदौड़ करने में आड़े आ रहा था। अब किसी युवा को उनका हाथ बाँटना चाहिए था। अचानक उन्होंने फिर से मेरा हालचाल पूछा, ' घर में सब ठीक है न ? मुझे लग रहा है, कुछ ठीक नहीं है और तुम कुछ संकोच कर रहे हो ..'  मैंने कहा, ' नहीं दादा, सब ठीक है..'  न जाने क्यों उन्हें मुझ पर विश्वास नहीं हो रहा था। मैं तो इस समय उनसे अधिक बात करने के मिज़ाज में न था। मैंने उन्हें आश्वस्त करने का प्रयास किया कि सब ठीक था और उनसे जब मिलूंगा तो सब बताऊंगा। इस पर तो वह और पक्का हो गए कि कुछ तो था जिसे मैं छिपा रहा था। उन्होंने अपनी ओर से कहा कि चिन्ता की कोई बात नहीं थी। उन्होंने कहा कि वे मेरे घर आकर मेरी माँ से मिलेंगे और सब ठीक करा देंगे। मैं अपने में ही मुस्कुराए जा रहा था। सब कुछ तो माँ के बाबा लोकनाथ की कृपा से सरलता से पहले से ही ठीक हो चुका था। अब ये क्या ठीक करेंगे। ( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को, यही पर  .. )

Wednesday, September 23, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 37

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra    ( हफ्ते वार साझा किये जाने वाली इस लम्बी कहानी का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ) ( ३७ )         मुझे सब के बीच में बिठाया गया। जोगेन्दर आंटी ने स्नेह से मेरे सिर पर अपना हाथ फेरा और मुझे एक लिफाफा थमा दिया। मेरी माँ ने देखा तो कहा कि ये तो आप कल दे चुकी थीं। आंटी ने तुरंत उत्तर देते हुए कहा, ' शगुन तो देना ही होता है, जी..' इसके बाद उन्होंने सब के हाथ में एक-एक लिफाफा पकड़ाया। माँ को, बाबा को, इन्द्राणी दीदी को और सभी को जो भी वहां मौजूद थे। उन्होंने एक कोने में खड़ी बिशाखा को अपने पास बुलाया और उसे भी एक लिफाफा दिया। मैंने देखा कि ये लिफाफे तीन रंगों के थे। सबको दे देने के बाद भी, आंटी के हाथ में अतिरिक्त लिफाफे थे। शायद वे अधिक बनाकर लायीं थीं। अंकल ने मेरे बाबा से जो टोकरियाँ और बक्से थे, उन्हें भीतर रखवाने का आग्रह किया। माँ ने आंटी का हाथ पकड़ा और उन्हें अपने कमरे में बने छोटे से मंदिर में ले गयी। माँ ने मंदिर को सुबह फूलों से अच्छे से सजा दिया था। लोक नाथ बाबा की मूर्ति के ऊपर नीला बल्ब जल रहा था और उसका प्रकाश संगमरमर की प्रतिमा को एक तरह की दिव्यता दे रहा था। माँ ने उन्हें बाबा के बारे में बताया कि कैसे वे दयानिधान हैं और कैसे उनका आशीर्वाद परिवार पर है। दोनों महिलाएं मंदिर के सामने हाथ जोड़, ध्यान की मुद्रा में बैठ गयी। कुछ समय बाद वे उठी। माँ अपने नित्य वाले मंत्रोचारण कर रही थी। आंटी ने कहा कि उनका मंदिर बहुत सुन्दर था। यह बात सुनते ही माँ अभियोग वाली मुद्रा में आ गयी, ' घर में मैं ही हूँ जो पूजा और मंदिर को बनाये रख रही हूँ..किसी के पास इस ओर देखने का समय नहीं है.. सबके पास अन्य बहुत कुछ करने का समय है, बस मंदिर के लिए समय नहीं है..' आंटी मुस्कुराने लगी जैसे वे समझ रही हों कि ये तो घर-घर की बात थी। उन्होंने कहा, ' मेरी दोनों बेटियां इस दिशा में बहुत अच्छी हैं..नित्य नियम से पूजा-पाठ करती हैं  ..' फिर अचानक उन्हें क्या याद आया, ' सुना है यहाँ का गुरुद्वारा बहुत सुन्दर है.. आज का दिन बहुत शुभ है..चलो जी मत्था टेक कर आते हैं..' माँ को उनकी बात साथ-साथ समझ न आयी परन्तु कुछ क्षण बाद उन्होंने हाँ कहा, ' हाँ खाने में तो अभी समय है.. गुरुद्वारा पास ही है..चलो आप को दिखा लाते हैं .. ' माँ ने मेरे बाबा से कहा। गाड़ी तो नीचे खड़ी ही थी। माँ, आंटी, इन्द्राणी दी और मैं वहां जाने के लिए निकल आये। बाबा और अंकल घर पर ही रुक गए। बाबा ने माँ से विलम्ब न करने का निर्देश दिया क्योंकि होटल से लंच पहुँचने ही वाला था। हमारे घर की दो दिशाओं में दो गुरूद्वारे हैं। दोनों ही लगभग समान दूरी पर हैं। इन्द्राणी दी, जो रास बिहारी चौराहे के पास था, वहां जाना चाहती थी किन्तु मेरा मन हरीश मुख़र्जी रोड वाले गुरूद्वारे का था। मैं ऑफिस आते-जाते इसके सामने से ही गुजरता था। मैंने ड्राइवर को वहीँ चलने को कहा। लगभग दस मिनिट में हम वहां पहुँच गए। गुरूद्वारे में लोग आ-जा रहे थे। मुझे मालूम था कि रविवार को यहाँ रौनक रहती थी। गुरूद्वारे के पास ही दो चाय की दुकाने हैं जो बहुत प्रचलित हैं। दिन भर यहाँ चाय पीने वालों का आना-जाना लगा रहता है। इन्द्राणी दी ने गाड़ी से उतरते ही पहले चाय पी लेने की इच्छा जाहिर की। माँ ने उसे हल्का सा डाँट दिया, ' पहले अंदर जाकर पूजा तो करो..' मुझे भी उनका इस तरह से चाय-चाय करना अच्छा न लगा था वह भी पंजाब से आयी आंटी के सामने। इन्द्राणी दी कुछ ज्यादा ही चुलबुली हो रही थी। मैंने अब ध्यान दिया था, वह उस दिन अपने मेकअप आदि में भी कुछ ज्यादा ही शोख़ दिख रही थीं। उनका ब्लाउज भी कुछ अधिक ही प्रदर्शनकारी और नटखट हो रहा था। वैसे हमारे परिवार में इन्द्राणी दी की आकर्षण करने की क्षमता और जिंदादिली को सभी पसंद करते थे। परन्तु मुझे न जाने क्यों ऐसा लगा था कि आज उन्हें बंगाली पारम्परिक लड़की के रूप में दिखना चाहिए था। अक्सर बंगाली लड़कियां जब सौम्यता प्रदर्शित करना चाहती हैं तो साड़ी की सहायता लेती हैं और इसी तरह जब किसी को लुभाना या बहकाना चाहती  हैं तब भी वे साड़ी पर ही भरोसा करती हैं। साड़ी एक ऐसा परिधान है जो पहनावे के स्वरूप से अपना रंग बदल लेता है।   हम गुरूद्वारे के अंदर गए। माँ तो यहाँ पहले भी आ चुकी थी। इन्द्राणी दी के लिए शायद पहला अवसर था । मुझे उन्हें सिर पर पल्लू लेने के नियम का बताना पड़ा था। मैंने देखा, पल्लू से सिर ढकने पर वह स्वयं से गंभीर हो गयी थी। जोगेन्दर आंटी को भी उनका ये रूप अच्छा लगा था और उन्होंने मुस्कुराकर इसका इशारा दिया था। हम लोग वहां कुछ समय के लिए शांत हो, ध्यान मुद्रा में बैठे रहे। बाहर आने पर एक बार फिर से वहां की प्रसिद्ध चाय की बात उठी परन्तु माँ ने समय नहीं है कहकर सबको गाड़ी में बैठ जाने का आदेश दिया। इन्द्राणी दीदी कुछ नाराज़ हुई थी। उन्होंने कहा कि मेरी शादी हो जाने दो फिर देखना वह कैसे मेरी पत्नी को यहाँ की चाय की लत लगवायेंगी। ऑन्टी कलकत्ता के गुरूद्वारे से बहुत प्रभावित थी। उन्होंने वहां एक अच्छी खासी धनराशि का दान भी दिया था। घर पर खाने की तैयारी हो रही थी। बाबा के साथ पंजाब से आये दोनों अंकल लोग न जाने कौन कौन से विषयों पर चर्चा में लगे हुए थे। माँ ने वहां पहुँच कर अपना रौब दिखाना शुरू कर दिया था। वह हमेशा ऐसा ही करती थीं। खाने की टेबल पर सब आ गए थे। बिशाखा ने इस तरफ का मोर्चा संभाला हुआ था। पंजाबी खाना देख, जोगेन्दर अंकल निराश हो गए। उन्होंने कहा कि वह तो बंगाली खाने का मूड बनाये बैठे थे। बाबा ने कहा, ' पंजाबी खाना है परन्तु इसमें बंगाली टच है.. इसके बाद बंगाल की विश्व प्रसिद्ध मिठाई और दोई भी है.. आपको वाह करने पर मजबूर कर देंगी.. '   जो भी हो सब बहुत स्वाद लेकर खा रहे थे। पिंकी के मामा ने कहा, ' ऐसा स्वादिष्ट पंजाबी खाना तो दिल्ली में भी नहीं मिलता..'  वह जिसे कहते हैं, उँगलियाँ चाट-चाट कर खाना, वैसे खा रहे थे। मामाजी से मैं दिल्ली में थोड़े ही समय के लिए मिला था, आज उनका व्यवहार देखा तो बहुत अच्छा लगा। वह बहुत हंसमुख स्वभाव के व्यक्ति लगे। हमारा घर आज मस्ती के मूड में था। खाना निपट जाने के बाद सब एक तरफ आकर बैठ गए। बाबा ने कहा, ' अब आगे का क्या कार्यक्रम है ?  मामा जी ने अपने अंदाज़ में कहा, ' अब पंजाब क्लब जायेंगे, अपना सामान लेंगे और एयरपोर्ट रवाना हो जायेंगे.. रात को नौ बजे दिल्ली में उतरेंगे और अपने घर जायेंगे.. ' बाबा भी हंसने लगे। उन्होंने कहा, ' मेरा मतलब शादी के कार्यक्रम से था.. सगाई और शादी..' पिंकी के पापा कुछ कहने ही वाले थे कि मामाजी ने कहा, ' ओये जी..जब आप कहो जी.. आप तो हुकुम करो.. अगले हफ्ते ही कर देते हैं.. ' अब माँ सामने आयी, ' मुझे तो अपनी बेटी लानी है.. कहो तो मैं लेने आ जाऊँ या फिर आप ही उसे छोड़ने आ जाओ.. ' माँ चालाकी से कह रही थी कि शादी चंडीगढ़ में होगी या कलकत्ता में ? मैं अपनी माँ की राजनैतिक तरीके से बात करने की प्रतिभा को जानता था। अब जोगेन्दर अंकल ने कहा कि जैसा हम लोग चाहें वैसा ही होगा। हंसी मज़ाक में गंभीर बातें होती चली गयीं। इस बीच मामा ने कहा, ' न चंडीगढ़ न कलकत्ता.. बीच में आता है दिल्ली, तो शादी दिल्ली में करते हैं.. पिंकी तो मेरी भी लड़की है..'  मैं एक ओर बैठा सबकी सुन रहा था। मुझे लगा, पिंकी के मामा और पापा पहले से ही दिल्ली का तय कर चुके थे। माँ को भी दिल्ली वाला सुझाव सही लगा। यही तय हुआ कि शादी में विलम्ब नहीं किया जाना चाहिए। शादी वाले दिन ही सगाई की रस्म भी की जाएगी। मैं हैरान था कि कैसी आसानी से सब काम होता जा रहा था। मुझे एक बार को लगा कि माँ जो सुबह-शाम बाबा लोकनाथजी का पूजन करती थीं, सच में यह उन्हीं की कृपा थी। वैसे तो मैं इसे माँ का आडम्बर ही मानता रहा था। इन्द्राणी दीदी दूसरे कोने में बैठी मुस्कुरा रही थी। मेरी माँ और जोगेन्दर ऑन्टी बहुत खुश दिख रही थी। वे न जाने क्या क्या बातें कर रही थीं। अचानक माँ ने मुझे अपने पास बुलाया। उन्होंने मुझे नवंबर माह के बारे में पूछा, ' ऑफिस में कोई समस्या तो न होगी.. छुट्टी तो मिल जाएगी न ? मैंने कहा कोई समस्या नहीं थी परन्तु वह किसलिए पूछ रही थीं ? माँ हँसने लगी, ' अरे तुम्हारी शादी की तारीख तय कर दी है .. ' मैंने कहा, ' इतनी जल्दी ? मुझे आश्चर्य हुआ था क्यों कि नवम्बर एक महीने बाद ही था। अब मेरी बात का आंटी ने उत्तर दिया, ' अरे, देरी क्यों ? पिंकी को भी नवंबर सूट करता है..' उन्होंने विषय को विराम देते हुए कहा, ' चलो सब पक्का, नवंबर दिल्ली में ..डेट्स जो तीन आयी हैं उनमें से कौन सी है, ये आप एक-दो दिन में बता देना..'     कुछ समय बाद पिंकी के मामा चलने की आतुरता दिखाने लगे। उन्होंने कहा कि क्लब से चेक आउट करना था और कलकत्ता से कुछ खरीदना भी था। वह बार बार कह रहे थे कि उन्हें हमारा घर और लंच बहुत अच्छा लगा था। पिंकी के पापा भी अब उठ खड़े हुए थे। माँ ने अपनी ओर से तीनों को गिफ्ट के पैकेट दिए। कलकत्ता के मशहूर रसगुल्ले के टिन भी आये हुए थे, वे भी दिए। सब घर से निकलने वाले ही थे कि माँ ने ऊँची आवाज़ में कहा,' सिर्फ पिंकी-पिंकी सुन रहे हैं, ये तो डाक नाम यानि घर का नाम है.. अरे, हमारी बहू का असली नाम क्या है, वह तो बताओ..'  सभी हंसने लगे। आंटी ने कहा, ' हमारी बेटी तो मन से प्यार करती है, वह तो मनप्रीत है जी.. मनप्रीत कौर.. ' अब अंकल ने ठहाका लगाते हुए कहा, ' जोड़ी बहुत अच्छी रहेगी जी .. मनप्रीत और अभिजीत .. वाह क्या बात है..रब दी बनाई जोड़ी है जी .. वाहे गुरु..'( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर   .. )

Friday, September 18, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 36

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra              हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ..  ( ३६ )    हम सभी रविवार सुबह समय से पहले बिस्तर छोड़ चुके थे। बिशाखा न जाने कब की जगी हुई थी ? बाबा ने बताया कि आज वह तो पांच बजे ही जाग गए थे और उन्होंने देखा था कि बिशाखा का स्नान और पूजा-पाठ हो चुका था। हम सब में एक तरह का उतावलापन सा साफ दिखाई दे रहा था। माँ ने हमारे घर की एक अन्य सहायिका को सुबह-सुबह आ जाने की हिदायत दे रखी थी। वह आयी तो घर की साफ-सफाई में जुट गयी। घर के बैठक खाने को व्यवस्थित कर दिया गया था। माँ ने सभी को समय से तैयार हो जाने के लिए कहा और मुझे घर से बाहर कहीं भी न जाने का आदेश दिया। न जाने हमारी मायें विशेष कर बंगाली मायें, परिवार में कुछ भी विशेष होने के अवसर पर घर में ही रहने का आदेश क्यों देती हैं ? उन्हें अंतिम क्षणों में कुछ अनहित घट जाने की आशंका न जाने क्यों बनी रहती है ? माँ ने इन्द्राणी दीदी और उनकी माँ के साथ-साथ कुछ अन्य सम्बन्धियों को भी आज आमंत्रित किया हुआ था। दस बजे से उन सबका आना आरम्भ हो गया था। इन्द्राणी दी बहुत सज धज कर आयीं थी। वह आते ही सीधे ऊपर मेरे कमरे में आयीं और हँसते हुए कहने लगी, ' कैसी दिख रही हूँ मैं, पंजाबी सम्बन्धियों को प्रभावित कर सकूँगी तो ?  मैं मुस्कुरा दिया, ' सावधान रहना कहीं वो लोग तुम्हें अपने साथ ही न लेते जायें ? हम दोनों हँसते हुए नीचे आ गए। सब मुझे बधाई देने लगे परन्तु उनकी बधाई में मुझे एक छिपी सी बात सुनाई दे रही थी और वह थी, ' क्या बंगाली लड़कियों का अकाल पड़ गया था जो पंजाब से लड़की लेकर आ रहे हो ?  तैयारियाँ पूरी हो चुकी थीं। बाबा होटल में फोन कर पक्का कर रहे थे कि खाना समय पर पहुँच जाना चाहिए। उन्होंने अपने ऑफिस के एक सहकर्मी को मिठाई की दुकान पर से आर्डर के हिसाब से सामान ले आने को कहा और एक कार उसे ले जाने के लिए कहा। दूसरी कार जोगेन्दर अंकल लोगों  के लिए जाने वाली थी कि उनकी ओर से फोन आ गया। उन्होंने बताया कि ठीक ग्यारह बजे वे लोग पहुँच जायेंगे। बाबा ने उन्हें ले आने के लिए कार भेजे जाने की बात कही तो उन्होंने कहा कि इसकी आवश्यकता नहीं थी।  उनकी ओर से सभी प्रबंध किया जा चुके थे। उन्होंने यह भी पूछा कि इस अवसर पर कितने लोग होंगे ? माँ ने जब यह सब सुना तो थोड़ा तेश में आ गयी क्यों कि वह कल से कह रही थीं कि जोगेन्दर से पूछ कर ही गाड़ी की व्यवस्था करो। अब बे वजह एक गाड़ी का भाड़ा देना होगा। बाबा उन्हें समझाने की कोशिश करने लगे। वह खीज़ गए थे उन्होंने कहा, ' ऐसा हो जाता है, आज के दिन तो इन छोटी-छोटी बातों में मत उलझो  .. सब का मिज़ाज मत बिगाड़ो ..'  मुझे हमेशा की तरह उनकी बात में सत्य दिखा। माँ को अपने पर नियंत्रण रखना चाहिए था। इन्द्राणी दी इधर-उधर झांकती फिर रही थी। माँ ने उसे बताया कि वो पूछ रहे थे कि आज के आयोजन में कौन कौन रहेगा ? उन्होंने उसका नाम भी बताया था और यह भी कि वह हमारे घर की सदस्य की तरह थी। वैसे भी इन्द्राणी दी से वे लोग एयरपोर्ट पर मिल चुके थे। घर में चल-पहल बढ़ गयी थी। बाबा को इस तरह का पारिवारिक माहौल बहुत पसंद था। वे उत्साहित थे और साथ ही साथ बहुत प्रसन्न भी थे। ठीक ग्यारह बजे, बिसाखा दौड़ कर आयी और खबर दी कि वे लोग आ गए थे। मैंने तुरंत बालकनी से नीचे झाँका। तीन गाड़ियाँ खड़ी थी। मैं हैरान था। तीन लोग और तीन गाड़ियाँ ? फिर देखा, तीन नहीं छह लोग थे। वे लोग आगे की दो गाड़ियों से निकले। पीछे की गाड़ी से भी दो लोग उतरे और तीन गाड़ियों से सामान उतरवाने लगे। सामान में सजे हुए टोकरे और बॉक्स थे। उन दोनों ने सामान को घर के अंदर रखवाया और एक गाड़ी लेकर वापिस चले गए। इस सिख पंजाबी लोगों का एक साथ हमारे घर आना आस पड़ोस में उत्सुकता जगा रहा था। मैंने देखा कि सब इधर-उधर से झाँकने की कोशिश कर रहे थे। मुझे देख, सामने  घर के काका ने चिल्लाते हुए पूछा ' क्या मामला है ?  मैंने खीजते हुए कहा कि खुश खास नहीं था, पंजाब से कुछ मेहमान आ रहे थे। परन्तु वे संतुष्ट न हुए। उन्होंने कहा, ' तुम कुछ छिपा रहे हो..इतना सारा सामान लेकर आये हैं, मत बताओ, बाद में तो पता चल ही जायेगा ? मैं उनसे उलझना नहीं चाहता था। मैंने उन्हें शांत करने के लिए कहा कि मेरी माँ से बाद में बात करना वह सब बता देंगी और अभी उन्हें घर के अंदर जाकर विश्राम करना चाहिए। पर वह कहाँ मानने वाले थे, वहीं खिड़की में चिपके रहे। मैं ही भीतर आ गया और सोचने लगा कि इन लोगों को किसी की व्यक्तिगत आज़ादी का कुछ ख्याल नहीं था। किसी के घर कोई आये या कुछ भी हो, इन्हें पूरा विवरण चाहिए था। अतिथि भीतर आ गए थे। एक और सरदार जी दम्पति भी थे।  शायद मामाजी के कलकत्ता में रहने वाले परिचित थे। मैंने सब के पाँव छुए। जोगेन्दर आंटी ने मुझे गले से लगा लिया। उन्होंने मेरा हालचाल पूछा। माँ ने हँसते हुए कहा, ' जब से चंडीगढ़ से लौटा है, बस वहीं की बातें करता रहता है.. आपने न जाने इसे क्या-क्या खिला दिया है, मेरे हाथ का खाना तो अब इसे अच्छा ही नहीं लगता..' आंटी हँसने लगी। उन्होंने कहा, ' ये खाता कहाँ है, थोड़ा सा प्लेट में ले लेता है और बस..' अंकल और पिंकी के मामा मेरे बाबा के साथ व्यस्त थे। बाबा उन्हें मेरे नाना की विभिन्न अवसरों पर ली गयी तस्वीरें दिखा रहे थे। वे लोग इन तस्वीरों में बहुत रूचि ले रहे थे। मैं उनके साथ खड़ा हो गया। मुझे नाना की उस तस्वीर की याद आ गयी जिसमें वे पंजाब के मुख्यमंत्री के साथ खड़े थे। पंजाब सरकार ने उन्हें तब सम्मानित किया था। मैंने एल्बम से वह तस्वीर निकाली और उत्साहपूर्वक जोगेन्दर अंकल को दिखाने लगा। उन्होंने सम्मान के साथ कहा, ' सर जी तो पूरे देश के लिए आदरणीय थे..'  माँ ने आकर जोगेन्दर अंकल का हाथ पकड़ कर, लगभग चिल्लाते हुए कहा, ' ये सब पुरानी फोटो देख रहे हो..हमारी बहू रानी की फोटो कहाँ है..मैंने कहा था न, लेकर आना ?  अंकल ने कहा, ' हां जी एक फोटो नहीं, बहुत सारी फोटो लाये हैं  ..'  फिर उन्होंने अपनी पत्नी से पूछा कि फोटो कहाँ थीं। आंटी ने एक लिफाफा अपने बैग से निकाला और मेरी माँ के हाथ में दे दिया। माँ बहुत उत्साह के साथ और सब कुछ छोड़, कोने में रखी कुर्सी पर बैठ गयी और फोटो देखने लगी। इन्द्राणी दीदी भी उनके पास जा खड़ी हुई। बिशाखा भी पीछे जाकर झुकी ही थी कि माँ ने उसे भगा दिया और कहा कि अभी काम का वक्त था बाद में देखना। फोटो देखने के लिए अधीर तो मैं भी हो रहा था परन्तु खुद पर नियंत्रण कर गया था। दस फोटो रही होंगी। माँ से इन्द्राणी दी एक एक फोटो लेती, देखती और वाह वाह करती। माँ बहुत खुश दिख रही थी। मैं भीतर-भीतर मुस्कुराए जा रहा था। मुझे विश्वास था कि पिंकी का चेहरा माँ को प्रभावित कर गया होगा। अब माँ फिर से काम में जुट गयी थी और वो लिफाफा इन्द्राणी दी के हाथ में था। मैंने इशारे से उन्हें एक ओर आने के लिए कहा। वह मुझे चिढ़ाने लगी परन्तु बाद में कुछ समय के लिए लिफाफा मुझे दे दिया। माँ मुझे बुला रही थी। मैंने जल्दी जल्दी में फ़ोटोस पर नज़र डाली। पिंकी का मुस्कुराता चेहरा मुझे मुग्ध कर गया। कुछ चेहरे सुन्दर होते हैं परन्तु यदि सही तरीके से फोटो लिए जायें तो वे अद्वितीय हो जाते हैं। किसी भी फोटोग्राफर के लिए ऐसे चेहरे उनकी प्रतिभा को उभारने का काम करते हैं। पिंकी का चेहरा भी इसी श्रेणी का था। इन फोटो को देख कोई भी सास अपनी होने वाली बहू के लिए ख़ुशी से गर्वित हो जाएगी। लिफाफे में चार फोटो हमारे अमृतसर के ट्रिप की भी थीं। ( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को यहीं पर )     

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 35

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II-चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra इस लम्बी कहानी को हर हफ्ते साझा करने का सिलसिला जारी है, अब आगे  .. ( ३५ )   माँ ने अपनी एक पंजाबी परिचित से ' रोका ' के सम्बन्ध में पूछा। उन्हें इस शब्द पर बहुत हँसी आयी। वह मुझे चिढ़ाने के लिए कहती रही कि मुझे अब रोक लिया गया था और मैं अब कहीं नहीं जा सकता था। कभी कहा कि मैं रिज़र्व हो चुका था, कभी कहा कि मेरी बुकिंग हो चुकी थी। एक बात अवश्य थी कि अब माँ और बाबा दोनों बहुत खुश थे। उन्हें इस बात की ख़ुशी थी कि घर में एक लड़की आ रही थी। हम अक्सर सास-बहू की नोंकझोंक के किस्से सुनते रहते हैं परन्तु बेटे की शादी की बात चलते ही घर में बहू के आने की सबसे अधिक ख़ुशी सास को ही होती है। माँ जोर-शोर से रविवार को होने वाले अनुष्ठान के काम में जुट गयी थी। वह अपने गैर-बंगाली परिचितों को फोन कर रही थी कि इस अवसर पर उनकी ओर से क्या-क्या किया जाना चाहिए। अगली शाम हम तीनों मिल बैठे तो माँ ने मेरे हाथ में कागज़-पेन थमाते हुए कहा, ' लिखते जाओ क्या क्या करना है..'  मैंने कहा, ' शुरू से शुरू करते हैं.. एयरपोर्ट पर लेने कौन कौन जायेगा.. और दो गाड़ियाँ तो चाहिए ही होंगी..  ये दोनों गाड़ियां अगले दिन के लिए भी चाहिए होंगी..'  माँ ने हाँ में स्वीकृति दी। बाबा ने कागज-पेन मेरे से ले लिया और वे खुद लिखने लगे। जोगेन्दर अंकल ने कहा था कि वे लोग रविवार को सुबह ग्यारह बजे तक हमारे घर पर आ जायेंगे, तो उनके लंच की भी व्यवस्था करनी होगी। बाबा ने बिशाखा को आवाज़ देकर बुलाया और उससे अच्छा से अच्छा भोजन बनाने को कहा। उन्होंने उसे एक खास मछली और नारियल वाली झींगा बनाने की हिदायत भी दी। माँ ने उन्हें लगभग फटकार लगाते हुए कहा, ' ये घर का खाना उस दिन नहीं चलेगा ..पंजाबी लोग हैं तो पंजाबी खाना किसी अच्छे होटल से मंगवाना होगा..'  इस पर बाबा बिगड़ गए। उनका कहना था वे लोग बंगाली परिवार में आ रहे थे तो उन्हें बंगाली खाना ही परोसा जाना चाहिए, भले ही घर में न बना कर होटल से मंगवाया जाये। दोनों ने मेरा मत जानना चाहा। मैं भी असमंजस में आ गया था। अतिथियों को  उनकी रूचि का खाना खिलाया जाना चाहिए या अपनी रूचि का ? यह तय हुआ कि पंजाबी खाना ही मंगवाया जायेगा और कई तरह की बंगाली मिठाइयाँ और मिष्टी दोई मंगवाई जाएगी। माँ ने पंजाबी होटल भी तय कर दिया था। यह प्रसिद्द और पुराना ढाबानुमा होटल  है जिसे एक नामी चित्रकार की सरपरस्ती के कारण जाना जाता है। मिठाइयों और दही के लिए भी एक खास विरासती मिठाई की दुकान का नाम तय कर दिया गया जो कलकत्ता के उत्तरी इलाके में है। माँ अब लड़की को दी जाने वाली सामग्री के विषय पर जुट गयी परन्तु उन्होंने कहा कि ये सब उन पर छोड़ दिया जाना चाहिए और किसी को भी इस विषय पर अपनी टाँग नहीं डालनी चाहिए। माँ सच कह रही थी। इन सब मामलों में उनका मुकाबला न था।  बाबा इन दिनों बहुत चुस्त से हो गए थे। प्रकृति का एक अद्भुत नियम है कि भीतरी प्रसन्नता स्वाभाविक रूप से बाहर भी झलकने लगती है। उनकी यही भीतरी प्रसन्नता थी जिसने उन्हें चुस्त बना दिया था। उन्होंने खुद से काफी सारे काम निपटा दिए थे। खाने और मिठाई आदि के आर्डर भी दे आये थे। दो गाड़ियों की व्यवस्था हो गयी थी। उनके उत्साह पर माँ भी हैरान थी। अपने और मेरे लिए वे गरियाहाट इलाके की एक मशहूर दुकान से दो शानदार बंगाली पोशाकें भी ले आये थे। वे ऐसे काम खुद से कभी भी न किया करते थे। उन्हें भय रहता था कि घर पर उनकी पसंद को नकार दिया जाएगा। परन्तु इस बार वे जो लाये थे उसे देख, माँ भी वाह-वाह करने लगी थी। माँ ने रंग, डिज़ाइन, मूल्य किसी भी बात पर कुछ न कहा। वह पूरी तरह संतुष्ट थी। माँ की संतुष्टि ने बाबा को एक तरह के आत्मविश्वास से भर दिया था। वह हर काम में अधिक रूचि लेने लग गए थे और इधर उधर आते-जाते माँ से पूछते, ' सब ठीक है न, कुछ आवश्यकता हो तो बताओ ? फिर वह शनिवार भी आ गया। उनकी फ्लाइट ग्यारह बजे पहुँचनी थी। मैं तो सुबह से ही बेचैन था। माँ-बाबा भी उत्साहित थे। दो गाड़ियाँ जो बुक की गयी थी, आठ बजे से ही दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गयी थीं। मुझे हैरानी हुई कि इतना पहले क्यों आ गयी थी परन्तु मैं जानता था कि बाबा ने अधिक सावधानी दिखाते हुए समय से काफी पहले ही बुला लिया होगा। इन्द्राणी दीदी को भी साथ लेकर जाना था। गाड़ियों को देख, बाबा ने सबको तैयार हो जाने का आदेश दे दिया। माँ और मैं दोनों उनकी हड़बड़ी पर झुंझला रहे थे। अंततः नौ बजे हम लोग इन्द्राणी दी के घर के लिए निकल गए। इन्द्राणी दी पहले से ही तैयार थी। वह बहुत सुन्दर और लुभावनी दिख रही थी। उन्हें वहाँ से लिया और दस बजे के आसपास एयरपोर्ट पहुँच गए। हम सभी बाबा की जल्दबाज़ी पर परेशान हो रहे थे और वह थे जो संतोष जाता रहे थे कि समय पर पहुँच गए थे। उन्हें कलकत्ता के यातायात व्यवस्था पर कभी भी भरोसा नहीं रहा था। वह अक्सर कहा करते थे कि ट्रैन और प्लेन के लिए घर से तीन-चार घंटे पहले ही निकल जाना चाहिए।   समय से फ्लाइट आ गयी और हमारे अतिथि बाहर निकल आये। मैं कुछ अधिक ही संकोच में था या उत्तेजना में, कह नहीं सकता परन्तु भीतर ही भीतर एक तूफान सा महसूस कर रहा था। मैंने तीनों के पाँव छुए। हम चारों पारंपरिक बंगाली हिसाब से तैयार होकर आये थे। माँ और इन्द्राणी दी बंगाली तांत की साड़ी में थीं। मैंने पेंट-शर्ट पहना हुआ था और बाबा पूरी तरह से बंगाली धोती-कुर्ते की पोशाक में थे। मुझे यूँ झुककर सरदार लोगों का चरणस्पर्श करना, आसपास के लोगों के लिए कुछ अनूठा सा था। जोगेन्दर अंकल ने बाबा के हाथों में एक पैकेट पेश किया और इसी तरह का एक पैकेट आंटी ने मेरी माँ को हाथ जोड़ते हुए दिया। सफर की कुशलता को लेकर थोड़ी बहुत बात हुई और हम लोग अपनी गाड़ियों की ओर बढ़ गए। उन लोगों की रहने की व्यवस्था पंजाब क्लब में थी। माँ ने रविवार को ग्यारह बजे के भीतर अपने घर आने का निमंत्रण दिया और लंच के बारे में भी बताया। अत्यंत विनम्रता से हाथ जोड़ प्रणाम करते हुए वे लोग निकल गए और उनके पीछे पीछे हमारी कार भी।  घर पहुँच कर अपने पंजाबी अतिथियों के बारे में ही चर्चा होने लगी। इन्द्राणी दी को जोगेन्दर दंपति अच्छे लगे परन्तु उनके साथ आये पिंकी के मामा, अपने को कुछ अधिक ही समझने वाले लगे। मैंने  बताया कि वे बहुत पैसे वाले थे। उनका दिल्ली में बहुत व्यापक कारोबार था। धन-दौलत के कारण उनका इस तरह का होना स्वाभाविक था। मैंने यह भी बताया कि उनकी अपनी संतान नहीं थी। वह अपनी बहन की लड़कियों को ही अपनी संतान मानते थे, पिंकी तो उनकी खास थी, उसे बहुत प्यार करते थे और कहते थे  कि उनका जो कुछ भी था, पिंकी के लिए ही था। मेरी बात सुन वह चुप हो गयी। कुछ क्षण बाद उन्होंने व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा, ' अरे, मेरे प्यारे बाबू, क्या ऐसी खाती-पीती पंजाबी वाइफ को संभाल पाओगे ?  मैंने उनकी बात को अनसुनी करना ही उचित समझा और सिर्फ कहा, ' जिसके साथ आप हों, उसके लिए क्या ये मुश्किल होगा..?  हम दोनों माँ के बिस्तर पर ऐसे सुस्ता रहे थे मानों बहुत बड़ा और मेहनत का काम करके आये हों। माँ कमरे में आयी तो उन्होंने वो दो बॉक्स रख दिए और कहा कि खोल कर देखो तो क्या था।  इन्द्राणी दी और मैं एक-एक बॉक्स खोलने लगे। जो मैंने खोला उसमें खूब सारे ड्राई फ्रूट्स थे और जो इन्द्राणी दी ने खोला उसमें बहुत सारी शानदार मिठाई थी। दोनों बॉक्स के ऊपर एक-एक छोटा सुन्दर लिफाफा जिस पर एक सिक्का चिपका होता है, लगा हुआ था। खोलने पर देखा तो उनमें पांच हज़ार-पांच हज़ार रुपये के ताज़े नोट रखे थे। उन दिनों के हिसाब से ये काफी बड़ी राशी थी। हम जैसे बंगाली परिवार के लिए तो यह चौंकाने वाली राशी थी। इन्द्राणी दी हँसने लगी, ' एयरपोर्ट पर होने वाली पहली मुलाकात पर ही इतना कुछ ? अब कल देखना, क्या-क्या होता है ? ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर )   

Wednesday, September 2, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) 33-34

                                               टू स्टेट्स - एक नई कहानी 

( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra 

( ३३-३४ )        मैं संतुष्ट था कि सब कुछ जैसा मैं चाहता था वैसा ही हो गया था। अगली सुबह माँ-बाबा दोनों ही खुश नज़र आये। मेरे प्रति उनका स्नेह साफ दिखाई दे रहा था। माँ ने आज अपने हाथ से मेरा ऑफिस का टिफ़िन बनाया। बिशाखा भी चुपके-चुपके मुस्कुरा रही थी। वो सब कुछ समझ गयी थी। मुझे एक ओर अलग देख, उसने चुटकी लेते हुए कहा, ' तो हमारे घर में बहू आ रही है.. ' मैंने  कहा, ' हाँ, वो तो आनी ही थी..'  बिशाखा बहुत उत्साहित हो रही थी, ' मेरे साथ बंगाली में बात कर पायेगी न ? मेरा बना खाना खायेगी न ? वह और भी बहुत कुछ कहना चाहती थी परन्तु माँ को आता देख, एक ओर निकल गयी। कुछ समय बाद मैं भी अपने ऑफिस के लिए निकल आया। आज माँ-बाबा दोनों न जाने क्यों दरवाजे तक आये थे और मुझे गली से जाता हुए देखते रहे थे ।

ऑफिस में कुछ समय बाद ही रोबी दा मिल गए। एक बार फिर उन्होंने मेरा और मेरे घर का हालचाल पूछा। मैंने हूँ-हाँ में जवाब दिया। वे न जाने मेरे अनमने से जवाब से क्या समझे, बस बोले, 'आता हूँ तुम्हारी माँ से मिलने..तुम चिन्ता मत करो..मैं उन्हें समझा दूँगा, तुम्हारे मन की बात, उन्हें मानना ही होगा.. मैं हूँ न.. ' मैं कुछ और कहता इससे पहले ही वे आगे बढ़ गए। मैं सोचने लगा अब ये क्या समझायेंगे मेरी माँ को ? वहां तो सब कुछ पहले ही से ठीक हो चुका था। इन्द्राणी दी ने तो पहले से ही समस्या को सुलझा और माँ को समझा दिया था। अब पिंकी को फोन करना था। कहाँ से शुरू करूँगा ? मैं उत्साहित था, रोमांचित भी और शायद चिंतित भी। मुझे लग रहा था कि यहाँ कलकत्ता में पहुंचे हुए मुझे तीन दिन हो गए थे, मेरे फोन न आने का पिंकी न जाने क्या सोचती होगी ? मन ने दिलासा दिया, उसके पापा को तो फोन कर ही दिया था और बता दिया था कि मैं बाद में फ़ुरसत से पिंकी-लवली को फोन करूँगा। फोन तो पिंकी को ही करना था परन्तु नाम दोनों का लिया था। मैं पिंकी से बात करने को बे चैन था परन्तु चाहता था कि मेरा फोन वह ही उठाये। यदि जोगेन्दर अंकल या आंटी ने उठाया तो खुलकर मन की बात न कर पाऊँगा, बस औपचारिक हैलो - हाय ही होकर रह जाएगी। अब जो भी हो, फोन तो करना ही था। सोचा, घर जाकर रात में फोन करूँगा। 

घर में सब कुछ सामान्य था। शाम की चाय फिर टीवी पर समाचार और कुछ अन्य कार्यक्रम और फिर रात का भोजन। माँ-बाबा दोनों ही अपने सामान्य  स्वरुप में थे। मुझे न जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि वे अभी से ही घर में एक लड़की की उपस्थिति महसूस करने लग गए थे। वे इस कल्पना से ही खुश हो रहे थे कि घर में एक लड़की आएगी। माँ ने कहा कि मुझे चंडीगढ़ फोन करना चाहिए। मैं तुरंत उठ, माँ के कमरे में रखे फोन पर नंबर मिलाने लगा। माँ भी आ गयी और साथ में बैठ गयी। हम दोनों ने एक दूसरे को देखा। माँ उत्सुक थी कि मैं क्या बात करता हूँ। भाग्य ने साथ दिया। फोन पिंकी ने ही उठाया। मैंने हेलो कहा ही था कि उधर से आवाज़ आयी, ' तो बाबू मोशाय, फ़ुरसत मिल गयी हमें याद करने की ? मैंने कहा, ' अरे, ऐसा नहीं है..अंकल को तो फोन कर ही दिया था.. ऑफिस में बहुत कुछ पेन्डिंग हो गया था..चलो अब तो कर ही लिया ही न.. और हाऊ आर यू ? हाऊ इज नाटी गर्ल लवली ? पिंकी ने कहा सब ठीक था। मुझे महसूस हो रहा था कि उसके मन में क्या चल रहा था। उसने पूछा, ' आंटी से बात हुई ? मैं कहा, ' हाँ, बात हुई है.. ' माँ ने अचानक मेरे हाथ से फोन ले लिया और पिंकी से बात करने लगी, ' बेटा कैसी हो ? तुम सब ने इसका बहुत ख्याल रखा..थैंक यू .. ये तो जब से आया है, तुम सब की बहुत तारीफ ही किये जा रहा है..'  माँ अपनी टूटी फूटी बंगाली-मिक्स हिंदी में बात कर रही थी। इस दो तीन मिनट में उसने पंजाब-बंगाल के पुराने संबंधों, उसके पापा और उसके सुखबीर अंकल की प्रशंसा और उसे कलकत्ता आने का निमंत्रण दे दिया था। मैं मुस्कुराता रहा। मुझे माँ की बातें अच्छी लग रही थीं। माँ मुझे फोन दे कमरे से बाहर निकल गयी। अब मैंने कहा, ' मैंने तो यहाँ बात कर ली है, अब तुम भी अपने घर में बात कर लो.. ' पिंकी ने कहा, ' पापा को कुछ आईडिया हो चुका है.. लवली ने हँसी-हँसी में माँ को कुछ हिन्ट दिया है..वो ऐसा ही करती है..तुम अपनी मम्मी से कहना, वो मेरे घर बात करें.. पर देर नहीं होनी चाहिए..'  मैंने कहा, ' ठीक है, मेरी माँ आज-कल में ही बात करेंगी.. लेकिन उस से पहले तुम भी कुछ बात कर लेना.. ऐसा न हो कि मेरी माँ की बात किसी शॉक जैसी लगे.. अपना ख्याल रखना..फिर कभी फोन करूँगा.. तुम दिन में मुझे ऑफिस नंबर पर सकती हो ..'  मैंने उसे ऑफिस नंबर दिया और बाय और गुड नाइट कहकर फोन रख दिया। मेरे दिल की धड़कन तेज चल रही थी। कुछ समय वही बैठा रहा फिर नीचे आया और माँ से जोगेन्दर अंकल से बात करने को कहा। मैंने कहा कि विलम्ब ठीक नहीं था क्योंकि पिंकी तनाव में थी। माँ ने कहा कि वे कल फोन करेंगी। पहले लुधियाना में सुखबीर से बात करना ठीक होगा। वे सुखबीर से कहेंगी कि वह चंडीगढ़ में अपने भाई से बात करे। माँ ने कहा कि मेरे पिता भी यही ठीक समझते थे कि हमें सुखबीर से ही पहले बात करनी चाहिए। माँ अपने में ही मंद-मंद मुस्कुरा रही थी, ' अरे, इन पंजाबी भाइयों को ऐसा सुशील और पढ़ा-लिखा लड़का कहाँ मिलेगा.. अब तुम चिन्ता न करो, सब ठीक हो जायेगा..' 

  अगले दिन ऑफिस में लंच ब्रेक के बाद एक घंटा ही बीता होगा कि पिंकी का फोन आ गया। उसने उत्साहित स्वर में कहा, ' क्या चल रहा है ? मैंने कहा, ' ऑफिस में हूँ.. पेंडिंग काम को देख रहा हूँ.. तुम भी तो ऑफिस में ही होगी..'  उसने कहा, ' नहीं, आज घर में हूँ.. मन नहीं किया ऑफिस जाने का, कभी कभी बे मतलब भी छुट्टी ले लेनी चाहिए.. ऑफिस इसीलिए तो कैसुअल लीव देता है..' उसकी आवाज़ में उत्तेजना साफ दिखाई दे रही थी। मैं उससे असली बात जानना चाहता था, 'आंटी-अंकल से बात हुई ?  वह कुछ क्षण के लिए रुकी। मैंने अपनी बात दोहराई। वो फिर भी चुप रही। मैं परेशान हो रहा था और वो खामोश थी। मैंने जोर देते हुए फिर से पूछा, ' क्या आंटी-अंकल से बात हुई है ? अब उसने हल्के से स्वर में हाँ कहा। इससे आगे उसने कुछ नहीं कहा। मुझे ही पूछना पड़ा कि उनका क्या रिस्पांस था। पिंकी ने कहा कि अब तक उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी और ये कि उनका मूड ठीक नहीं लग रहा। कुछ समय तक दोनों ओर से चुप्पी रही। फिर पिंकी ने पूछा कि क्या मैं घबरा रहा था ? मैंने कहा  ' थोड़ा-बहुत, परन्तु अब जो भी होगा देखा जायेगा..' अब मुझे उधर से खिलखिलाने का आभास मिला। पिंकी ने कहा, ' बाबू मोशाय, घबराने की आवश्यकता नहीं है.. मम्मी-पापा कुछ तो परेशान हुए परन्तु अंत में उन्होंने कहा कि मैं समझदार और पढ़ी-लिखी हूँ और अपने सम्बन्ध में निर्णय लेने में सक्षम हूँ..'  मैंने कहा ये क्या मज़ाक किया। फिर वो हंसने लगी, ' अरे, मैंने जरा सा मज़ाक किया, आप तो सीरियस हो गए.. '  सच, मैं घबरा तो गया ही था। पिंकी ने बताया कि उसके पापा लुधियाना में सुखबीर अंकल से बात करेंगे और उनसे कलकत्ता में मेरे माता-पिता से बात करने को कहेंगे। लगता है पिंकी के घर पर भी वैसा ही चल रहा था जैसा मेरे घर पर था। दोनों ओर से सुखबीर सिंह जी से मध्यस्था करने को कहा जा रहा था। हम दोनों के माता-पिता तो राज़ी हो चुके थे। मैं कुछ हद तक आश्वस्त हो चुका था। मैं चाहता था कि कुछ अंत रंग बात हो पर झिझक रहा था। पिंकी ने कहा, ' नींद ठीक से आ रही है तो ?  मैंने कहा, ' तुम अपना बताओ, तुम्हें आ रही है ? वह हँसने लगी, ' बिलकुल, हम तो मज़े से सो रहे हैं.. मैं तो आज भी सुबह दस बजे तक सोती रही.. ' पिंकी की बातों से मैं खुश तो हो रहा था  परन्तु अपनी ख़ुशी दिखा नहीं पा रहा था। मैं कभी भी  रोमांटिक मिज़ाज नहीं दिखा पाया हूँ। इन्द्राणी दी के साथ एक बार इंग्लिश फिल्म देखने गया था। उन्होंने ने ही फिल्म देखने का निमंत्रण दिया था। कलकत्ता के ग्लोब नाम के सिनेमा हाल में यह फिल्म चल रही थी जिसका काफी नाम हुआ था। इन्द्राणी दी घर से पहुंची थी और मैं ऑफिस से। ये एक प्रेम कथा थी और इसमें कई प्रेम प्रसंग थे। इन्द्राणी दी बहुत खुश दिख रही थी। उन्होंने कहा कि कॉलेज के दिनों में वे एक मित्र के साथ अक्सर पिक्चर देखने जाया करती थी और आज उन्हें उन दिनों जैसा ही आभास हो रहा था।  मैंने पूछा, ' क्या कोई बॉय फ्रेंड था ? उन्होंने हँसते हुए कहा था कि ऐसी कोई बात नहीं थी परन्तु वह कुछ अलग सा था और शायद उसके साथ उनकी सोच की समरसता थी। पूरी फिल्म में इन्द्राणी दी बहुत आनंदित थी। मैं उन्हें आनंदित देख मुस्कुराता रहा था। फिल्म समाप्त होने पर उन्होंने मुझसे जानना चाहा कि फिल्म कैसी लगी थी तो मैंने केवल गुड ही कहा था। ये छिपे से मेरे रोमांटिक मनोभाव आज फिर मुझसे खेल रहे थे। मैंने बात को समाप्त करने के इरादे से कहा, ' चलो, बाद में बात करते हैं .. बॉस मुझे बुला रहा है..'  मैंने बाय बाय कह फोन रख दिया। मैं अपनी दोनों कोनियों को टेबल पर टिका बैठ गया। मन उमंगित हो रहा था। अब मेरी भी प्रेमिका थी जिसके साथ मिलकर मुझे अपना संसार रचाना था। 

शाम को घर पहुँचा तो माँ को मंद मंद मुस्कुराते हुए पाया। मैंने उनसे पूछा कि दिन कैसा रहा तो उन्होंने बताया कि उन्होंने ने लुधियाना में सुखबीर से बात कर ली थी और वह चंडीगढ़ में जोगेन्दर सिंह से बात कर, आज रात को ही उन्हें सूचित करने वाले थे। मैं माँ की तत्परता पर मुग्ध हो रहा था। मैंने माँ को प्यार से बाँहों में लपेट लिया। मैं नहीं जानता था कि सब कुछ कैसे इतनी सरलता से होता जा रहा था ?  माँ ने स्नेह से मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ' चलो, पहले कुछ खा लो..' हमारी बंगाली माओं को न जाने क्यों अपने बच्चों को कुछ खिलाने की ही चिंता बनी रहती है। इस शाम के नाश्ते के साथ माँ अपनी बातें साथ लेकर बैठ गयी। माँ की न जाने क्या क्या योजनाएं बन चुकी थीं। खान पान, खरीदारी और मेरे कमरे की सुव्यवस्था..  वह बोलती जा रही थी किन्तु मैं अपने ही ख्यालों में खोया था। माँ ने जब चंडीगढ़ जाने की बात उठायी तो मैं चौंका गया। माँ ने कहा कि सुखबीर का फोन आने के बाद उन्हें चंडीगढ़ जाने का कार्यक्रम बनाना पड़ेगा। मैंने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जब भी जाना हो तो एयर से ही जाना, इतनी लम्बी ट्रैन यात्रा न करना। माँ ने अधिक कुछ नहीं कहा, बस इतना कहा कि देखा जायेगा और यह कि रिश्ता पक्का करने के लिए वे लोग भी तो कलकत्ता आ सकते थे । माँ को सुखबीर के फोन का इंतज़ार था। उन्होंने कहा, ' हम यहाँ बैठे सब कुछ अपने से ही तय करते जा रहे हैं, क्या पता जोगेन्दर को यह सम्बन्ध पसंद न हो..' मैंने कहा, ' हो सकता है..'  मैं आज पिंकी से हुई बातचीत को छिपा गया। 

बिशाखा रात के खाने की सूचना देकर गयी ही थी कि फोन की घंटी बज उठी। मैं दौड़ा परन्तु माँ ने मुझे रोक दिया। माँ ने कहा कि शायद लुधियाना से सुखबीर का फोन होगा। माँ का अंदाज़ा सही था। यह उन्हीं का फोन था। मैं एक ओर खड़ा था। पहली बात ही बधाई हो और मिठाई खिलाओ से शुरू हुई। सुखबीर अंकल ने बताया कि जोगेन्दर ने इस सम्बन्ध को स्वीकार किया था। फिर इधर -उधर की बातें हुई। उनकी बातों से मुझे यह आभास हो गया कि जोगेन्दर अंकल का फोन भी अब आएगा। माँ ने फोन रखने के बाद मेरे बाबा को सब बताया। रात के नौ बज चुके थे। जोगेन्दर अंकल का भी फोन आ गया। उन्होंने देर रात को फोन करने के लिए क्षमा चाही। माँ ने हँसते हुए कहा कि हम बंगालियों के लिए यह देर रात नहीं थी।  जोगेन्दर अंकल ने जो कहा वो कोई खुले दिमाग वाला ही कह सकता था। उन्होंने कहा कि बच्चे पढ़े-लिखे और समझदार थे, उनके निर्णय को हमें खुले दिल से स्वीकार करना चाहिए। माँ ने इस बार फोन मेरे बाबा को पकड़ाया। उन्होंने कहा, ' सिंह साहेब, रॉय साहेब भी आप से बात करेंगे..'  मैं आसपास ही घूम रहा था। इधर की बातें सुन, मैं उधर की बातों का अंदाज़ा लगा रहा था। मेरे बाबा धैर्य से सुलझे हुए अंदाज़ से बात कर रहे थे। उन्होंने कहा कि ये अच्छा था कि बच्चों ने एक-दूसरे को समझ-परख लिया था और दोनों अपना संसार सजाने में सक्षम थे। बाबा ने कहा कि दोनों परिवारों का सम्बन्ध सुखद ही होगा। उन्होंने ये भी कहा कि उन दोनों को भी मिलना चाहिए। शायद जोगेन्दर अंकल इस बात के लिए तैयार थे। उनकी बात से मुझे संकेत मिला कि वे शीघ्र ही कलकत्ता आने का कार्यक्रम बनाएंगे और एक-दो दिन में ही सूचित करेंगे। माँ संतुष्ट लग रही थी कि वो लोग कलकत्ता आ रहे थे। माँ कहीं न कहीं चाहती थी कि लड़की वालों को ही उनके पास औपचारिक प्रस्ताव लेकर आना चाहिए था। 

अगले दिन जोगेन्दर अंकल का फोन आया। माँ और बाबा दोनों से उन्होंने बात की।  माँ ने बाद में मुझे सब बताया कि उन्होंने बात विषय से ही शुरू की कि बच्चे जब बड़े हो जाते हैं तो अपनी मर्जी के मालिक होते हैं। माँ-बाप को उनके साथ ही चलना होता है। माँ ने कहा कि वह तो बातचीत के दौरान अधिकतर हाँ..हाँ.. कर रही थी। माँ ने बताया कि वे अगले शनिवार को अपनी वाइफ और लड़की के मामा कलकत्ता आ रहे थे। माँ को उनके कलकत्ता में  ठहराने की चिंता हो रही थी। माँ ने अपनी ओर से कहा कि हमारे घर पर तो उनको बंगाली भोजन ही मिलेगा।  इस पर जोगेन्दर अंकल ने बताया कि पिंकी के मामा कलकत्ता के किसी क्लब में रहने की व्यवस्था करेंगे और हमें किसी बात की फ़िक्र नहीं करनी चाहिए। वे लोग एक दिन के लिए ही आ रहे थे। उन्हें अगले दिन ही लौट जाना था। उन्होंने माँ से रोका और ठाका की रस्म करने की भी बात की थी। माँ ये शब्द समझ न पायी परन्तु उन्हें ये आभास हो गया कि यह लड़की वालों की ओर से की जाने वाला कोई अनुष्ठान था और इसके लिए रविवार की सुबह तय कर दी। जोगेन्दर अंकल को भी शायद रविवार उचित लगा। उन्होंने कहा कि रोका कर के वे लोग संध्या की फ्लाइट से लौट जायेंगे। माँ ने जोर देकर कहा कि लड़की की फोटो जरूर लेते आएं। अंकल ने कहा, ' एक फोटो नहीं, पूरी एल्बम ही ले आएंगे जी, लड़की तो अब हमारी नहीं आपकी है जी ..'
( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर  ... )