Chander Dhingra's Blog

Wednesday, March 25, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' - 8


                                                            ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                              इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला शुरू है। 
                             आज गुरुवार है, अब आगे...    

( ८ )      मैं अपने आप के साथ कुछ समय बिताना चाहता था। मैंने क्लास से निकल जाने का सोचा। बच्चों का सा सिरदर्द का बहाना बनाया और ऊपर कमरे में आ गया। कुछ नहीं, बस यूँ ही बिस्तर पर पड़ा रहा। ये मन का कैसा बेचैनपना था ?  एक ओर मन अकेला खुद में बंधा रहना चाहता था और दूसरी ओर वह चाह रहा था कोई मिल आ बैठे और मेरे साथ कुछ अपनापन बांटे ?  मेरे साथ ऐसा होता ही रहता है। मन की ऐसी स्थिति में, मैं खुद को किसी पुस्तक के पन्नों में उलझा लेता हूँ। मैंने अपने सूटकेस से एक पुस्तक निकाली। ये चुनी हुई कविताओं का संकलन था। मैंने बीच से बिना देखे कोई एक पृष्ठ खोल लिया। कविता को पढ़ता चला गया। मुझे लगा ये कविता मेरे विचलित हो रहे मन के लिए ही थी। इस कविता में कवि ने ईश्वर का धन्यवाद किया है जिसने उसका परिचय अपरिचितों से करवाया है और इन अपरिचित चेहरों के बीच स्वयं ईश्वर उसे दर्शन दे रहे हैं। आज ऐसा ही तो मेरे साथ हो रहा था। अनजाना नगर, अपरिचित लोग फिर भी इनके बीच कहीं मुझे मैत्री और संतोष के ईश्वरीय दर्शन हो रहे थे। किसी सच्ची कविता के शब्दों में कितनी शक्ति होती है। मैंने कविता पढ़ पुस्तक को बंद कर दिया। मेरी ऊँगली पुस्तक के उसी पृष्ठ पर फंसी हुई थी। ऐसा लग रहा था कि मेरा उस कविता से संपर्क बना हुआ है। मेरी बुआ की बड़ी लड़की इन्द्राणी ने एक बार मुझसे कहा था कि कोई पुस्तक पढ़ते वक्त यदि कुछ पंक्तियाँ या प्रसंग प्रभावित कर रहें हों तो वहां कुछ समय के लिए रुक जाना चाहिए और उन दो पृष्ठों के बीच ऊँगली रख आंखे बंद कर लेनी चाहिए या फिर पुस्तक के उन दो पृष्ठों कोअपने चेहरे पर रख, चुपचाप लेट जाना चाहिए। इन्द्राणी दीदी के अनुसार इस प्रकार पढ़ी जा रही पुस्तक, विशेषकर पुस्तक के उस भाग से पाठक का, एक प्रकार का आध्यात्मिक सम्बन्ध बन जाता है जो लम्बे समय तक साथ रहता है। मैंने उस समय इन्द्राणी दीदी की बात को हँसकर उड़ा दिया था। पुस्तक के किसी पृष्ठ विशेष के ऊपर ऊँगली रख लेने, आँखें बंद कर पुस्तक को चेहरे पर रख लेने से आपका उस पुस्तक, उस प्रसंग या उस पृष्ठ से हमेशा का सम्बन्ध ?  मैंने तब दीदी से हँसते हुए कहा था, ' ये आध्यात्मिक बात है या साहित्यिक या फिर कोई विज्ञान ? आज की कविता ने कुछ इसी तरह का प्रभाव मुझ पर छोड़ा था। इन्द्राणी दीदी की बात मुझे सत्य प्रतीत हो रही थी। मुझे लग रहा था कि वह कविता कहीं गहरे तक मेरे भीतर समा रही है। मेरा एक रिश्ता है इस कविता से। परन्तु मेरा तार्किक मन कहाँ रुकने वाला था ? उसने उलझना प्रारम्भ कर दिया। ये गुरुदेव की कविता है। उनकी कविताओं के भाव तो हमेशा ही गहरा प्रभाव छोड़ जाते हैं। इसमें अनहोनी क्या है अगर मैं भी इस तरह का प्रभाव महसूस कर रहा हूँ ? स्कूल के दिनों में मैंने इंग्लिश की एक डिबेट प्रतियोगिता में भाग लिया था। डिबेट का विषय टैगोर की कविताओं  से जुड़ा था। इस प्रतियोगिता में मैंने प्रथम स्थान प्राप्त किया था। विषय की रूरेखा मेरे बाबा ने तैयार करवा दी थी। मैंने उस पर बहुत परिश्रम भी किया था। कुछ बातें माँ ने समझायी थी, कुछ नाना ने और परिणाम था कि मैं प्रथम आया था। नाना और बाबा बहुत खुश थे। बाबा ने मुझे 'गीतांजलि' का इंग्लिश अनुवाद और नाना ने सौ रुपये इनाम में दिए थे। माँ ने थपथपाया तो अवश्य था परन्तु कहा था इन स्कूल की खेलकूद और सामान्य ज्ञान की प्रतियोगिताओं में प्रथम आने से कुछ नहीं होगा। असली बात तो फाइनल परीक्षा में प्रथम आने की है। मेरी माँ हमेशा से ही चाहती थी कि मैं कक्षा में सदैव पहला स्थान लाऊँ, दूसरा नहीं। वह चाहती थी कि भविष्य में मैं एक सफल अर्थ शास्त्री बनूँ। अर्थ शास्त्री तो नहीं परन्तु आज में एक चार्टिड अकाउंटेंट अवश्य हूँ। सी. ए. की परीक्षा मैंने प्रथम प्रयास में ही और ऊँचे स्तर पर पास की थी। माँ को बहुत गर्व था। बाबा अवश्य कुछ निराश थे क्यों कि वह चाहते थे कि में अर्थ शास्त्र में आगे बढूं और फिर अमेरिका जाऊँ और इस विषय पर अनुसन्धान करूँ। स्कूल की प्रतियोगिता में पुरस्कार पाने पर मैं बहुत खुश था। उस समय मैंने सोचा था क्या केवल मेरी माँ ही ऐसा ही ऐसा सोचती है या सभी मायें कि स्कूल परीक्षा में प्रथम आना ही सही होता है ? बाद के वर्षों में मुझे लगने लगा कि बच्चों के प्रति माता-पिता की इस तरह की सोच उचित नहीं है। मैं आज इस डिबेट प्रतियोगिता में प्रथम आया, मेरे लिए बस यही काफी था। आगे स्कूल परीक्षा में क्या होगा, बाद में देखा जायेगा। उस दिन मैं बहुत उत्साहित था। बांग्ला साहित्य,संगीत और वाम विचारधारा की ओर मेरे रुझान का प्रारम्भ संभवत इस प्रथम से ही हुआ था। 
( आगे अगले सप्ताह, आज ही के दिन, यहीं पर .. ) 

Wednesday, March 18, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' - 7

                                                           ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 

   इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला शुरू है। आज गुरुवार है, अब आगे...  
  
 ( ७ )   गेस्ट हाउस में आ जाने के बाद एक दिन माँ को फोन किया। वह चिंता करने लगी। उन्होंने कहा कि जोगेन्दर के घर पर था तो ठीक था। कुछ भी समस्या आ जाती तो वो लोग देख लेते। आखिर घर से बाहर दूसरी और नई जगह पर हूँ, तबीयत भी तो ख़राब हो सकती है। गेस्ट हाउस में न जाने खाना कैसा होगा ?  मुझे याद है उस चार मिनिट की टेलीफोन बातचीत में मैं ही सुन रहा था। माँ न जाने क्या क्या बोल रही थी। मुख्यतः वह मेरे प्रति चिंतित थी। एक बात और कही थी माँ ने कि मैं जोगेन्दर अंकल से और उसके परिवार से संपर्क बनाये रखूँ और ये भी कुछ भी परेशानी आ जाये तो उन्हें तुरंत बता दूं। मैंने  माँ को अपनी और से आश्वस्त किया कि उसे चिंता की कोई आवश्यकता नहीं है। कुछ दिनों की ही तो बात है, सब ठीक ठाक गुजर जायेगा। मैंने उस दिन एक कॉल सेंटर से फ़ोन किया था। मोबाइल फ़ोन उन दिनों नए नए आये थे। महंगे थे और गिनेचुने लोगों के पास ही हुआ करते थे। उन दिनों तो इनकमिंग कॉल पर भी पैसे लगते थे। मुझे याद है उस टेलीफोन बूथ में एक तरफ सिखों के गुरु नानकदेव जी की फोटो लगी हुई थी और दूसरी तरफ भगत सिंह और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की। मैं खुश था कि हमारे नेताजी बंगाल के बाहर भी सम्मान के साथ देखे जाते हैं। मैंने उस बूथ के युवा सरदार जी से पैमेंट करते समय, नेताजी की तस्वीर की ओर इशारा करते हुए पूछा था कि ये कौन हैं ? मुझे तो पता था परंतु मैं जानना चाहता था कि कहीं उसने ऐसे ही अनजाने में तो ये तस्वीर नहीं लगा रखी। परन्तु मैं जानना ही क्यों चाहता था ? मुझे विश्वास क्यों नहीं था कि इस युवा सरदार को अपने गुरुओं की तरह ही हमारे देश के महान लोगों पर भी श्रद्धा थी ?  खैर, उसने मुझे जो जवाब दिया वह मुझे विस्मित कर गया। उसने पंजाबी में कहा था परंतु मुझे समझ आ गया था। उसने जो कहा था वह कुछ यूँ था, ' अरे ! इन्हें कौन नहीं जानता ? इनके लिए ही तो हिंदुस्तान आज़ाद हुआ है ? इनकी फौज में तो हमारे दादा जी भी थे..'  मेरे नाना अक्सर आज़ाद हिन्द फौज और नेताजी की बातें बताया करते थे और ये भी कि कैसे देश के हर हिस्से से नौजवान नेताजी की फौज में जुड़ गए थे। पंजाब से सबसे ज्यादा लोग उनकी आज़ाद हिन्द फौज में आये थे। अचानक मुझे उस लड़के के चेहरे में उसके दादाजी दिखे। शायद ऐसे ही तो रहे होंगे इसके दादाजी जब  सेना की नौकरी छोड़ आज़ाद हिन्द फौज से आ जुड़े होंगे और देश पर शहीद हो गए होंगे। नेताजी को पूरे देश का सम्मान और प्यार मिला है। बंगाल में तो स्वाभाविक है परंतु पंजाब में उनके प्रति यह सम्मान नेताजी के एक ऐसे व्यक्तित्व के कारण है जो स्वाभिमानी है, अपने अधिकार के लिए मर-मिटना जानता है, जिसका चरित्र आध्यामिक है और जो दूर दृष्टि का स्वामी है। मेरे नाना अक्सर नेताजी, उनके अनेक कार्यों और कार्य पद्धति के बारे में बताया करते थे।  

माँ को फोन कर कमरे में आकर ऐसे ही लेट गया। जूता भी नहीं उतारा। हल्का सा सिरदर्द महसूस कर रहा था। लगा कहीं ज्वर न आ जाये। अक्सर मैंने देखा है कि मुझे जब कभी भी सिरदर्द और गले में खराश सी रहती है तो मुझे ज्वर आ जाता है। जोगेन्दर अंकल के घर की छवि सामने आ गयी। ऑन्टी-अंकल का स्नेह और लवली-पिंकी का दोस्ती भरा व्यवहार याद आ गया। मैं बड़ी बहन के बारे में सोचने लगा। पिंकी क्यों अपनी बहन सी नहीं है ? वह समझदार है। छोटी लवली तो नटखट है। दो बहनों में ऐसा ही होता है। मेरी चचेरी बुआ की दो लड़कियां भी ऐसी ही हैं। बड़ी को शास्त्रीय संगीत और गंभीर विषय की पुस्तकें पसंद हैं तो छोटी को आजकल का फ़िल्मी संगीत और पुस्तकों से तो उसका कोई नाता ही नहीं है।  कितनी समानता है मेरी बुआ की लड़कियों और जोगेन्दर अंकल की लड़कियो में। यही सब सोचते सोचते नींद आ गयी। कुछ समय बाद आँख खुली तो पाया कि अंधकार हो आया था। घड़ी  देखी तो रात के दस बजने को थे। शायद अब डिनर न मिले। देर हो चुकी थी। फिर भी मैं नीचे डाइनिंग हॉल में आया। कर्मचारी सब कुछ समेटने में जुटे थे। मैंने उन्हें बताया कि थोड़ी तबीयत ठीक न थी और आँख लग गयी थी। इंचार्ज ने कहा, 'आपको नौ बजे तक खा लेना चाहिए, चलो बैठो, खाना लगाता हूँ ..' मुझे उसका व्यवहार मित्रतापूर्ण लगा। खाना खा तो लिया पर अच्छा नहीं लगा। सब्जी, दाल, रोटी और सलाद। मुझे बचपन से ही नॉन वेजीटेरियन पसंद है। दिल को तसल्ली दी, ' गेस्ट हाउस में तो ऐसा ही होता है..'  नींद आने का नाम न ले रही थी। काफी समय तक इधर-उधर करवट पलटता रहा। देर रात कब आँख लग गयी पता ही न चला।

अगले दिन ट्रेनिंग सेंटर पहुंचा। सब सामान्य था। वही क्लास, वही नोट्स और वही मेरा मन जो कह रहा था, ' क्या होगा, ये सब सीखकर, बैंकों में तो जैसा चल रहा है वैसा ही चलेगा ..'  क्लास को शुरू हुए बीस-पच्चीस मिनिट ही हुए होंगे कि चपरासी आया यह बताने कि कोई मुझसे मिलने आया है। हैरान सा मैं बाहर आया तो देखा कि पिंकी वहां खड़ी थी। उसके हाथ में एक बड़ा बैग था।  ' हेल्लो ! ' उसने गरम जोशी से कहा। 'अरे तुम, अचानक ? ' मैंने पूछा 
 उसने हँसते हुए कहा, ' हाँ, हम तो ऐसे ही सरप्राइज देते हैं.. मम्मी ने कुछ भेजा है, फ्रेश बेड शीट्स हैं, टॉवल है..  उस दिन कहा था न.. '  पिंकी ने बैग मुझे थमा दिया। मैंने कहा कि ये सब तो है यहाँ, क्या जरुरत थी ?  पिंकी ने उसी जोश भरे अंदाज़ में कहा, ' जरुरत-वरुरत मैं नहीं जानती, मम्मी ने कहा तो मैं देने आ गयी और वैसे भी उस दिन मैंने देखा था, बेड शीट्स और टॉवल अच्छे नहीं थे यहाँ के..'  अच्छा, अब चलती हूँ, अभी समय नहीं है, तुम भी चलो और अच्छे बच्चों की तरह क्लास में जाओ और पढाई पर ध्यान दो.. ' वह हिंदी-अंग्रेजी में बात कर रही थी। हँसते -खिलखिलाते हुए पिंकी बाहर निकल गयी।  मैं अपनी जगह पर आकर बैठ गया।  मुझे लगा एक ताज़ी हवा का झोंका था जो मुझे छूकर निकल गया है। हाँ, हवा के झोंके जैसा ही था पिंकी का आना और फिर एक ताजगी की अनुभूति दे, निकल जाना। क्लास में क्या चल रहा था, मेरे दिलोदिमाग से गायब  हो चुका था। मन न जाने कहाँ बादल सा उड़ चला था। टेबल पर मेरी उँगलियाँ किसी संगीत की धुन उगाने में व्यस्त थी। एक रबिन्द्र संगीत था जो मुझे भीतर तक आनंदित कर रहा था।  

( आगे अगले सप्ताह, यहीं पर, आज ही के दिन ) 

Thursday, March 12, 2020

' टू स्टेट्स - मेरी कहानी ' ' Two States - My Story ' - 6

                                                          ' टू स्टेट्स - मेरी कहानी '  
' Two States - My Story ' 
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चन्दर धींगरा 

 हर सप्ताह इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला शुरू है। आज गुरुवार है, अब आगे...  

( ६ )   सुबह सिर में भारीपन के साथ उठा। घर की अनुपस्थिति का अहसास था या कुछ अन्य, समझ नहीं पाया। माँ और बाबा  यानि मेरे मम्मी-पापा की एक तस्वीर मेरे पास रहती है। उसे निकाला और देखता रहा। ये उनके युवा दिनों की तस्वीर थी। माँ का रोबदार और गर्व से भरा चेहरा, बाबा, दबे-दबे से सौम्य और शांत। चाय आ गयी थी। पीते- पीते मैंने जोगेन्दर अंकल और आंटी के घर की चाय को याद किया और खुद से कह उठा, ' अब यहाँ गेस्ट हाउस में वहां जैसी चाय तो मिलेगी नहीं ? पी लो, जो भी  मिलता है... तैयार हो नीचे डाइनिंग हॉल में आया और नाश्ते का इंतज़ार करते हुए स्थानीय अखबार देखने लगा।  घड़ी देखी तो लगा शायद मैं कुछ जल्दी आ गया हूँ। यहाँ का अखबार मुझे अपने घर आने वाले ' स्टेट्समैन ' से कुछ अलग लगा। स्वाभाविक था।  बचपन से 'स्टेट्समैन' की आदत है। यहाँ वाला एक पुराना अंग्रेजी अखबार है जिसका प्रकाशन सौ साल से पहले लाहौर से हुआ करता था। मुझे याद आ रहा था कि वर्षों पहले एक सरदारजी रिपोर्टर हमारे घर आये थे और उन्होंने नाना का इंटरव्यू लिया था। उनके पास एक फाइल में इस अखबार की कुछ विशेष अंकों की फोटोज और कटिंग्स थीं जो उन्होंने हम सब को दिखाई थी। उनकी फाइल में उस दिन का मुखपृष्ठ भी था जिस पर भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की फांसी का समाचार और भगत सिंह की फोटो छपी थी। नाना उस दिन बहुत उत्साहित थे और बड़े जोश से उस रिपोर्टर को पंजाब के साथियों के बारे में बता रहे थे। उनके चेहरे  पर आ रही चमक देखने लायक थी।  
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अपनी कहानी लिखने की और अपने भीतर बैठे झूठ से दो-दो हाथ करने की जब ठान ली थी तो उस क्षण मैं एक विजेता सा था। मुझ में गर्व और एक विजेता का भाव उबल रहा था। मैंने प्रतिज्ञा की थी केवल सत्य बताने की। शायद यह एक बहुत कठिन प्रतिज्ञा थी। महाभारत के भीष्म की प्रतिज्ञा जैसी। मैं उतना मानसिक बलशाली तो हो नहीं सकता था। मेरा लेखन बंद हो गया। मैं रुक गया और महीनों तक रुका रहा। ये कुछ लिखे पन्ने यूँ ही बेकार के कागज से इधर उधर बिखरे रहे। सत्य का ही दूसरा पक्ष साहस है जो मुझे विचलित करता रहा है। इन दिनों फिर से सिर्फ अपने आप में सिमटा रहा। अपने आप से साक्षात्कार करता रहा। ये मैं क्या करने जा रहा हूँ ? मेरे समक्ष मैं खुद ही बैठा था। शतरंज का खेल बिछा था हम दोनों के बीच। इस ओर काले मोहरे और सामने सफ़ेद। मैं किसे हराना चाहता था ? सामने मैं ही तो था ? खुद से ही कैसी जीत, कैसी हार ? जीत भी गया तो अपने आप से ही तो जीतूंगा ? अपने परिवार, अपने समाज से तो हार ही जाऊंगा ? ये कैसा द्वंद चल रहा था, जो मुझे तोड़ रहा था ? क्या होगा इस सब से ? छोड़ ये सब बातें। सब कुछ ठीक ही तो चल रहा है। इतने सालों से मैं सबकी सहानुभूति का पात्र बना हुआ हूँ तो क्यों न बना ही रहूं ? ये संसार यूँ ही चलता है और चलता रहेगा। न जाने कितनी अनकही कहानियां छिपी पड़ी हैं, हमारे समाज में, हम सब के बीच ? मैं ही क्या सबसे से भिन्न हूँ ? क्यों अपने आप से द्वन्द करता रहता हूँ मैं ? किस दोष का परिणाम मेरे भीतर, मेरे दिलोदिमाग पर छा गया है और मुझे हर क्षण व्यथित करता रहता है ?

आज बहुत अंतराल के बाद फिर से संभाला है खुद को। नहीं, मुझे बरसों के असत्य से बाहर निकलना ही है। मैं खुद को ही हराता रहा हूँ, इतने वर्षों तक। यदि यह संसार एक नाटक है तो मैं एक झूठा सेहरा बांधे, समाज की प्रथम पंक्ति के सम्मानजनक आसन पर विराजमान होने का नाटक ही करता रहा हूँ।  यह कैसी स्थिति आन पड़ी है मेरे मन के द्वार ? केवल मैं ही जानता  हूँ कि मेरा स्थान कहाँ होना चाहिए ? मैं अपना जीवन जी ही नहीं रहा हूँ, मैं तो मर रहा हूँ। मन के किसी कोने में एक छोटा सा सफ़ेद तिल है जिसने मुझे जीने को उकसाया है। जिसने मुझे सत्य बोलने को प्रेरित किया है और प्रकाश की किरण सी दिखलाई है। परन्तु न जाने कितने काले तिल छिपे बैठे हैं  मेरे दिल की हर एक पर्त में जो मुझे विचलित करते रहते हैं। ये मुझसे कहते हैं, ' जो है वही ठीक है.. कुछ मत कर.. यथास्थिति बनाये रख.. दुनिया को दुनिया की तरह जी.. मत याद कर बीते समय को। जो लिखा है अब तक, उसे नष्ट कर दे। 

दुर्बल होते स्वयं को मैंने एक बार फिर से स्थिर किया। नहीं, मुझे पराजित नहीं होना है। मैंने अब तक जो लिखा था उसे प्रारम्भ से पढ़ा। चंडीगढ़ के गेस्ट हाउस की छवि मेरे सामने फिर से ऐसे फ़ैल गयी, मानों  कल की ही बात हो। एक एलबम सा था जो मेरे सामने खुलता चला गया था। मेरे जीवन का एक एक दिन था जो एक एक सत्य-चित्र सा था और प्रकाश पुंज सा खिलता चला गया। मैं एक बार फिर से कागज-कलम ले बैठ गया। 



( आगे अगले सप्ताह आज ही के दिन, यहीं पर )

Friday, March 6, 2020

' टू स्टेट्स - मेरी कहानी ' ' Two States - My Story ' -5

                                                           ' टू स्टेट्स - मेरी कहानी '  
' Two States - My Story ' 
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चन्दर धींगरा 

 हर सप्ताह इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला शुरू है। आज गुरुवार है, अब आगे...  

                        
                    ( ५ )   कैंटीन से लौटकर आया  तो मन में कुछ उबल सा रहा था। ये प्रवासी बंगाली पूरे बंगाल की प्रतिष्ठा को ख़राब कर रहे हैं। इनकी वजह से ही बंगाल से बाहर आकर हमें शर्मिंदगी सहनी पड़ती है। ये लोग बंगाल के बारे में ठीक से जानते ही नहीं। बंगाल की संस्कृति का इन्हें ज्ञान ही नहीं है। बाहर के लोग इन्हें ही बंगाल और बंगाली समझते हैं और गलत धारणा बना लेते हैं। फिर मन के किसी कोने से आवाज़ आई, ' इतनी भी गंभीर बात नहीं है  ..  ठीक है, अब छोड़ो भी इस बात को...    लेकिन मेरा तार्किक दिमाग था जो जोर दे रहा था और छोड़ने वाला नहीं था। ये कौन था मेरे भीतर जिसे मैं हराना चाहता था ?  मेरा ध्यान इधर-उधर भटक रहा था। अचानक मुझे कलकत्ता का अपना ऑफिस याद आ गया। मुझे याद आया वो शर्मा जिसे कलकत्ता और बंगाल की हर बात में खोट नज़र आती थी। वो राजस्थान का रहने वाला था और वहां से स्थानांतरित होकर आया था। बात-बात में वहां तो ऐसा होता है, इसे ऐसा क्यों नहीं कर सकते ? ऐसा करने से आसानी रहेगी..  जैसी बातें करता था। हम लोग उसे सिखाने की कोशिश करते कि भाई ये कलकत्ता है, तुम्हारा राजस्थान नहीं। ऑफिस में कभी कुछ खाने-पीने का कार्यक्रम बनता तो वह राजी तो हो जाता परन्तु यही कहता कि ' इस बार कुछ नया करो, वही मछली...  वैसे वह यह भी कहता था कि मछली बहुत अच्छी मिलती है कलकत्ता में, पर कांटें बहुत होते हैं... वह समय से ऑफिस आता था और काम-धाम में भी ठीक था। परन्तु उसकी बातों में मुझे एक तरह का हल्कापन सा दिखता था। मुझे लगता उसे सिर्फ ऑफिस का काम ही आता है, साहित्य-संगीत आदि से उसका कुछ लेना  देना नहीं। उसने अपनी टेबल को अच्छे से सुसज्जित कर लिया था। वह सुबह आकर अपनी मेज-कुर्सी को साफ़ करता क्यों कि जब वह आता तब तक ऑफिस के चपरासी आदि नहीं पहुंचे होते थे। वह शिकायत करता परन्तु कुछ होता नहीं था। सबको मालूम था कि इन नीचे ग्रेड वालों को समय से ऑफिस लाना, कोई सरल काम नहीं है। वो सीनियर मैनेजर से कहता कि सख्त होना चाहिए परन्तु फिर वह कहता, ' जब सीनियर स्टाफ खुद ही लेट आता है तो ये लोग क्यों समय से आयेंगे? उसे कोलकाता आये हुए दो साल हो चले थे। अब वह पहले सा आक्रामक नहीं था। वह समय से तो आता परन्तु देर से आने वालों को दोष देने से बचता। उसे लगने लगा था कि यहाँ ऐसा ही चलेगा। रोबी दा ने भी एक बार कहा था कि समय के साथ ये शर्मा भी ठीक हो जायेगा और इसे भी कलकत्ता का काम का तरीका समझ आ जायेगा। न जाने उस पर स्थानीय रंग चढ़ा था या नहीं परन्तु वह अब इस प्रयास में लग गया था कि उसे शीघ्र से शीघ्र यहाँ से निकल जाना है। मेरी उससे कुछ नजदीकी हुई थी। वह मुझसे अपनी कई बातें करता। वह एक किराये के मकान में रहता था। वह बताता कि कैसे उसकी पत्नी और बेटा परेशान रहते हैं। कैसे आस-पड़ोस से कोई सहयोग नहीं मिलता और कैसे पत्नी दिनभर एक प्रकार के दिमागी बोझ से जूझती रहती है। मैं उसे चुपचाप सुनता पर मुझे लगता कि वह नाहक परेशान है। यह सब तो होता ही है ज़िन्दगी में। एक बार घर में मैंने माँ से उसकी बात कही तो उन्होंने ने कहा कि किसी भी नयी जगह में जाओ तो कुछ न कुछ परेशानी होती ही है। उन्होंने बताया था कि किस प्रकार मेरे बाबा को जब एक बाहर की पोस्टिंग मिली तो कैसे उन्हें संघर्ष करना पड़ा था। मैंने बाबा से भी बातों-बातों में शर्मा का जिक्र किया तो उन्होंने कहा कि वह राजस्थान के किसी छोटे शहर से आया है, कोलकाता जैसे महानगर में एडजस्ट होने में समय तो लगेगा ही। मुझे भी ऐसा ही लगा। शर्मा को भी मैंने ऐसा ही कहा। उसने कहा,' अब एडजस्ट कितना करें ? यहाँ का माहौल ही काम न करने का है। ट्रान्सफर मिल जाय उसी में भला है...  मेरे भीतर ही छिपा एक दूसरा मैं मुझ से वार्तालाप करता ही चला जा रहा था। अचानक मैं जागा और अपने भीतर चल रहे इस वार्तालाप को रोकने का प्रयास करने लगा। मैं  एक बार फिर से चंडीगढ़ में था और सोचने लगा कि यहाँ जोगेन्दर अंकल के घर पर बंध जाऊंगा। मैंने भीतर ही भीतर निश्चित किया कि आज अंकल से बात करूँगा और अपने गेस्ट हाउस में शिफ्ट कर जाऊंगा। 

सुबह फिर पिछले दिन जैसी। कायदे से पेश किया गया चाय का पहला कप। नाश्ते के समय अंकल से मुलाकात हुई।  उन्होंने गर्मजोशी के साथ हाल-चाल पूछा।  कुछ इधर-उधर की बात के बाद मैंने कहा कि मैं गेस्ट हाउस में शिफ्ट कर जाऊँगा। उन्होंने चौंकते हुए प्रतिक्रिया दी, ' अरे ! यहाँ क्या तकलीफ है ? मैंने कहा, ' ऐसी कोई बात नहीं है, बस अन्य ट्रेनिंग में आये अन्य लोग भी वहीं हैं तो यही उचित रहेगा...  उन्होंने कहा, ' अरे इतनी बड़ी कोठी है, तुम्हारे लिए अपना अलग से कमरा है, आराम से अपने घर में रहो, बहनजी ने तो हमें खास हिदायत दी है कि तुम्हें कोई तकलीफ न हो...  मैंने कहा,  ' नहीं, कोई  परेशानी नहीं है, मैं आता-जाता रहूँगा और कुछ जरुरत होगी तो आप को बताऊंगा...  आंटी ने जब मेरे गेस्ट हाउस जाने की बात सुनी तो उन्होंने भी वहीं उनके घर पर रह जाने और बड़ी कोठी की बात कही परन्तु बाद में कहा, ' जैसा तुम्हें ठीक लगे, वैसे घर तुम्हारा अपना ही है...   शाम को गेस्ट हाउस में चले जाने का तय हुआ। रात के खाने के बाद सभी मिलकर मुझे गेस्ट हाउस छोड़ आये।  गेस्ट हाउस के कमरे में  कुछ देर रुके। गेस्ट हाउस किसी सरकारी गेस्ट हाउस जैसा ही था।  लवली इधर-उधर की कमियां निकालती  रही परन्तु पिंकी ने कहा सब कुछ ठीक ही तो है। उसका मानना था कि गेस्ट हाउस ऐसे ही होते हैं परन्तु, उसने ये भी कहा कि मुझे कुछ चीजें जैसे तोलिया, चादरें आदि अपने वाले ही उपयोग करने चाहिए क्यों कि गेस्ट हाउस वाले इन चीजों की सफाई -धुलाई आदि पर उसे भरोसा न था। आंटी ने भी इस बात में हाँ मिलाते हुए, घर से ये सब भिजवाने का कहा। पिंकी ने आगे बढ़ माँ की बात का समर्थन किया और अगले दिन ऑफिस जाते वक्त ये सब मुझे देते हुए जाने की बात की। लवली ने मुस्कुराते हुए, नटखट अंदाज़ में कहा, 'अरे वाह ! इतना काम तुम मेरा कभी नहीं करती ?  पिंकी ने भी खास अंदाज़ में मुस्कुराते हुए जवाब दिया, 'आदमी-आदमी देखकर काम करना पड़ता है...   दो बहनों का व्यवहार साधारणरूप में ऐसा ही होता है। एक बांग्ला कहानी में मैंने ऐसा देखा था। छोटी शरारती और चुलबुली और दायित्व बोध से दूर, बड़ी समझदार और माता-पिता तथा परिवार के प्रति दायित्व भरी।  उस दिन पहली बार मैंने पिंकी को चोर नज़र से देखा था। वह मुझे सुन्दर लगी थी। अब तक तो वह सामान्य लड़की सी ही दिखती थी।  वे लोग चले गए तो में तकिया टिका कर बिस्तर में सुस्ताने के मूड में बैठ गया।  आँखें बंद की ही थी कि मुझे पिंकी की बात याद आ गयी कि गेस्ट हाउस के तकिये, तोलिये और चादरों की सफाई-धुलाई पर उसे भरोसा न था। एक झटके में मैंने तकिये को अपने से दूर किया। कुछ समय बाद में बाथरूम गया तो वहां भी ऐसा ही लगा और वहाँ झूल रहे तोलिये का इस्तेमाल नहीं किया। अपने सूटकेस से छोटा तोलिया निकाल लाया जो माँ ने मुझे रास्ते में व्यवहार करने के लिए दिया था। मैंने टीवी चालू किया और चॅनेल्स को ऊपर-नीचे करता रहा। कुछ देर बाद सोने के लिए बिस्तर पर लेट गया तो उस पर बिछी चादर कुछ परेशान करने लगी। मुझे पिंकी की बात याद हो आई। चादर अच्छी खासी साफ़-सुथरी थी फिर मुझे क्यों ठीक से धुली नहीं लग रही थी ? 
 
( आगे अगले सप्ताह यहीं पर, आज ही के दिन .. ) 

' टू स्टेट्स - मेरी कहानी ' ' Two States - My Story ' - 4

                                                            ' टू स्टेट्स - मेरी कहानी '  
' Two States - My Story ' 
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चन्दर धींगरा 

 इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला शुरू है। आज गुरुवार है, आगे बढ़ते हैं। 

                   ( ४ )       अंकल के साथ खाने की टेबल पर मुलाकात हुई। उन्होंने भी मेरा हाल-चाल पूछा, ' कोलकाता में मम्मी से बात हुई ? मेरे ना कहने पर आश्चर्य  दिखाते हुए उन्होंने तुरंत पॉकेट से अपना मोबाइल निकाला और कहा ' नंबर क्या है ?  ये उन दिनों की बात है जब मोबाइल बहुत सामान्य नहीं था और यह गिने चुने अमीर लोगों के पास ही हुआ करता था। मैंने कहा, ' सब ठीक है अंकल.. मैंने कल बात की थी..  एक-दो दिन बाद फिर कर लूँगा.. ' उन्होंने हँसते हुए कहा, ' ओय जी.. आज भी करो, कल भी कर लेना, परसों भी करना.. नंबर बताओ जी.. मैंने नंबर बताया । अंकल ने नंबर मिलाकर मोबाइल मुझे पकड़ा दिया। माँ ने फोन उठाया। मैंने उन्हें सब ठीक है कहा। मैं सबके सामने अधिक बात नहीं करना चाहता था। पर अंकल कुछ ऐसा इशारा कर रहे थे कि खुलकर बात करूं। मैंने सामान्य सी बात की। फिर अंकल ने मेरे हाथ से फोन ले लिया। उन्होंने गर्म जोशी से बात की कि मेरे बारे में चिंता बिलकुल न करें, कि मैं खाता-पीता बहुत कम हूँ और कि वे मुझे हट्टा-कट्टा बना कर वापिस भेजेंगे। एक बार फिर उन्होंने मेरे बारे में चिंता न करने का आश्वासन दिया। वे माँ को ' बहिन जी ' कहकर संबोधित कर रहे थे।

                    अगले दिन खुद से ऑफिस गया। अंकल तो छोड़ आने की बात कर रहे थे परन्तु यह ठीक नहीं था। पिंकी और मैं साथ-साथ घर से निकले। पिंकी अपने स्कूटर से जाती थी। अंकल ने कहा एक साथ निकल जाओ। एक मोड़ पर वह मुझे उतार देगी, वहां से पैदल का रास्ता है। पिंकी ने स्कूटर निकाला और मुझसे पूछा कि क्या मैं स्कूटर चलाऊंगा ? मेरे न कहने पर उसने कहा कि यहाँ का ट्रेफिक कोलकाता जैसा नहीं है। मैं आराम से चला सकता हूँ बल्कि उसे उसके ऑफिस में उतार कर अपने ट्रेनिंग सेण्टर तक ले जा सकता हूँ। मैं कहा, ' नहीं..नहीं.. नयी जगह है '  मैं झूठ बोल गया था। मुझे तो स्कूटर चलाना आता ही न था। कोलकाता में तो बस से ही आना-जाना होता है। मुझे लगा कि इस युग में स्कूटर चलाना नहीं आता कहूँगा तो विचित्र सा लगेगा ? मुझे वो दिन याद आये जब मैंने स्कूटर लेने की बात कही थी तो घर में कैसा विरोध हुआ था। माँ कहती कलकत्ता में स्कूटर चलाना कितना रिस्की है ?  बाबा कहते घर के बाहर ही से तो सीधे ऑफिस तक की बस मिल जाती है तो स्कूटर का क्या फायदा ? मैंने थोड़ी बहुत जिद की परन्तु जब ऑफिस के मेरे वरिष्ट रोबी दा ने भी कहा कि मेरे बाबा-माँ ठीक ही कह रहे हैं तो मैंने जिद छोड़ दी। रोबी दा ने तो एक घटना भी सुनाई कि कैसे उनके मुह्हले का एक लड़का कुछ समय पहले एक मोटर साइकिल दुर्घटना में मारा गया था। उसने भी शौक से मोटर साइकिल खरीदी थी। उन्होंने सलाह दी थी कि कोलकाता के लिए बस ही सबसे सुविधाजनक है और जहाँ हमारा घर है वहां से तो बस से ही आना-जाना सबसे उचित है।  छुट्टी के दिन कहीं जाना हो तो टैक्सी है ही। कलकत्ता तो वैसे भी पीली टैक्सी का नगर के नाम से जाना ही जाता है। न जाने क्यों मुझे रोबी दा की बातें ठीक लगती थी। उन्हें हमारे परिवार के बारे में जानकारी थी। नानाजी के जीवन और देश की आज़ादी के संग्राम में उनके योगदान के बारे में वे जानते थे। वे अक्सर मेरे नानाजी का हाल-चाल पूछते और मुझे सलाह देते रहते थे। ऑफिस में जब मुझे कम्प्यूटर अनुभाग से सम्बंधित काम दिया गया तो उन्होंने ही सलाह दी थी कि यह काम ठीक नहीं है। इसमें समय का बंधन हो जाता है और काम पूरा कर ही शाम को घर जाना पड़ता है। जब मैंने कहा कि कम्प्यूटर का काम मुझे पसंद है तो उन्होंने कहा कि ऑफिस में कम्प्यूटर चलाने के तो बहुत अवसर हैं परन्तु इस काम से जुड़ गए तो समझो, बंध गए..  पक्के समय पर आना और शाम को घर वापिस जाने का कुछ ठीक नहीं..' रोबी दा ने ही सीनियर मैनेजर से बात कर मुझे इस कम्प्यूटर वाली ड्यूटी से मुक्ति दिलाई थी। रोबी दा बैंक यूनियन के अध्यक्ष रह चुके थे। उनकी  स्थानीय यूनियन संघों और राजनैतिक हलकों  में अच्छी खासी पहुँच थी। इसी कारण हमारे बैंक के उच्च अधिकारीगण उनकी किसी बात को टालते न थे। रोबी दा का बहुत प्रभाव था, वे यह अच्छे से जानते व समझते थे किन्तु इसे दिखाते न थे। वे अपने बर्ताव में बहुत सरल और मधुर बने रहते थे। मैंने सदैव उन्हें श्वेत धोती-कुर्ते में ही देखा था। मुझे ये अच्छा लगता था कि वे बंगाली पोशाक एवं अन्य परम्पराओं के पक्षधर थे। 
आज ये बातें याद आ रही थी। मुझे लगा कि कभी कभी हमें अपने मन की बात मान लेनी चाहिए। अक्सर हमें लगता है कि हम सही निर्णय न ले पाएंगे और  इसी भ्रम में धीरे-धीरे आत्मविश्वास खोते जाते हैं। 

पिंकी बहुत विश्वास के साथ स्कूटर चला रही थी। वह एक जगह रुकी भी और उसने जल्दी में अपने लिए कुछ ख़रीदा। बहुत होशयारी और चुस्ती से उसने पेट्रोल  पंप की ओर अपना स्कूटर घुमाया और पेट्रोल लिया। उचित जगह पर उतार उसने मुझे बाय कहा और 'सी यू इन इवनिंग ..' कहकर तेजी से आगे निकल गयी। पिंकी अच्छी कद काठी की स्मार्ट और सुन्दर लड़की थी जो किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेने में सक्षम थी। कहीं न कहीं मैं भी उससे आकर्षित और प्रभावित हो रहा था। 
             आज ट्रेनिंग का दूसरा ही दिन था। यहाँ अलग अलग स्थानों से आये हम सब एक-दूसरे से अच्छे से परचित न थे। कैंटीन में सब एक दूसरे मिलजुल रहे थे। मैं पीछे की और था। तपन को देखने की कोशिश की तो  पाया कि वह एक कोने में तीन-चार लड़कों से घिरा ठहाके लगा रहा था। मैं उसकी ओर बढ़ गया परन्तु उसने कुछ फीकी सी ही मुस्कान दी। मैंने बांग्ला में उससे पूछा कि वह कैसा है। उसने अंग्रेजी में उत्तर दिया। मुझे आशा थी कि अपनी भाषा में बात करने पर वह मेरे निकट आएगा। परन्तु ऐसा नहीं हुआ। वह तो सब से हिंदी-अग्रेजी में ही बात कर रहा था। मेरे साथ उसका रवैया निकटता का नहीं था। मैंने मन में सोचा आज दूसरा ही दिन है। बाद में दोस्ती हो ही जाएगी। आधा दिन बीत गया। सबने शाम का कार्यक्रम बना लिया था। मुझे भी शाम को एक खास जगह पर मिलने को कहा। लंच के समय मैंने तपन से जानना चाहा कि क्या उसका कोई सम्बन्धी बंगाल में है ?  उसने बताया कि कई रिश्तेदार वहां हैं। एक बुआ तो कोलकाता में ही है। मुझे बुआ समझ नहीं आया। बाद में उसी ने कहा बुआ यानि पिशी।  उसके मुंह से पिशी सुनकर मुझे अच्छा लगा। मैंने कहा कि चलो बांग्ला के रिश्ते तो उसे याद हैं। उसने मेरी बात को हंसी में उड़ाते हुए कहा कि ऐसी बात नहीं है। घर में सब बांग्ला में ही बातचीत करते हैं। मैंने कहा,' तुम कोलकाता पिछली बार कब गए थे ?  उसने कहा,' मैं दो वर्ष पहले गया था.. बहुत भीड़ है.. कहीं कहीं तो चलना तक मुश्किल हो जाता है...हमें तो अपना इलाहाबाद ही अच्छा लगता है... ' 

( आगे अगले सप्ताह, यहीं पर, आज ही के दिन यानि गुरुवार को ) 

' टू स्टेट्स - मेरी कहानी ' ' Two States - My Story ' - 3

                                                           ' टू स्टेट्स - मेरी कहानी '  
' Two States - My Story ' 
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चन्दर धींगरा 

 इस कहानी को साँझा करने का सिलसिला शुरू है। आज गुरुवार है, आगे बढ़ते हैं। 

            ( ३ )   अगले दिन से एक नयी दिनचर्या आरम्भ हो गयी। मैं काफी जल्दी उठ गया। अच्छे से तैयार हो गया और अपने पेपर-फाइल आदि ठीक से रख लिए। सुबह के नाश्ते की मुझे कुछ जानकारी न थी। मैं अपने कमरे में ही बैठा रहा। बाहर झाँकने की कोशिश की तो कुछ समझ नहीं आया। एक बार फिर घड़ी में देखा। अभी साढ़े सात ही बजे थे। कुछ क्षण बाद पिंकी और लवली दोनों मेरे कमरे में आई। वे चाय लेकर आई थी। मुझे तैयार देख वे हैरान हो गयी, 'अरे ! आप तो नहा-धोकर रेडी हैं ..'  पिंकी ने आश्चर्य जताते हुए कहा। लवली बेमतलब हंसने लगी। मुझे समझ नहीं आया कि वह क्यों हंसी ?  वे दोनों जॉगिंग या जिम से होकर आई थी और इसी तरह की ड्रेस में थी और स्पोर्ट्स शू पहने थे। चाय रख कर वे चली गयी। चाय, सीधे-सीधे कप या गिलास में न थी। पूरी ट्रे थी। चाय, दूध और चीनी। एक छोटा सुन्दर सा बॉक्स भी था जिसके दो भाग थे और दोनों में अलग तरह के बिस्कुट रखे थे। मुझे अपने घर की चाय याद आ गयी। सीधे-सीधे कप और प्लेट और उसी प्लेट में किनारे पर रखे दो बिस्कुट। मैंने सोचा ये लोग कितने ढंग से सब कुछ करते हैं। हम बंगाली लोग ऐसा क्यों नहीं करते ? फिर मुझे लगा, हमें पढने- लिखने का शौक होता है। ये लोग उधर ध्यान नहीं देते, ये दुनियादारी वाली बातों में ध्यान देते हैं। वैसे भी चाय को इस तरह से पेश करना तो अपनी शानोशौकत दिखाने जैसा है। चाय का असली मज़ा तो वैसे पीने में है जैसे बंगाल में पी जाती है। नहीं-नहीं चाय तो ऐसे ही पीनी चाहिए। अंग्रेज लोग भी तो ऐसे ही पीते हैं। मेरा दिमाग तर्क में जुटा हुआ था कि अंकल आ गए। उन्होंने कहा कि वे मुझे आज मेरे सेंटर तक छोड़ आयेंगे। मुझे लगा कि ये कुछ ज्यादा ही हो रहा था। मैं इन लोगों के लिए बोझ बनता जा रहा हूँ। मेरा अपने गेस्ट हाउस में शिफ्ट हो जाना ही उचित होगा। इतना सब कुछ मेरे लिए एक तरह का मानसिक दबाव हो जायेगा और शायद घुटन भी। मैंने सोचा, बाद में इस विषय पर अंकल से बात करूँगा। अभी तो ट्रेनिंग शुरू की जाये। 

                    यहाँ के ट्रेनिंग सेंटर का माहौल कुछ अलग सा था। बैंक सम्बन्धी कार्यों की आधुनिक जानकारी एवं ट्रेनिंग हेतु इस केंद्र का नाम था। लंच में खाना- खाने साथियों के साथ कैंटीन गया। कैंटीन अच्छी थी परन्तु मुझे तो कुछ अलग सा और अलग तरीके से खाने की आदत थी। कैंटीन की साफ़-सफाई भी कोलकाता से अच्छी थी। ट्रेनिंग रूम्स, ऑफिस आदि भी वहां से ज्यादा अच्छे ढंग से व्यवस्थित थे। पहला दिन था, मिलने-मिलाने में ही बीत गया। इस ट्रेनिंग में 25 लोगों के नाम थे परन्तु वहां आये  केवल 18 थे। ये सब अलग-अलग शहरों से आये थे। एक जो इलाहबाद से था, बंगाली- तपन बनर्जी था। मैंने उससे परिचय करने का सोचा। लगा इससे दोस्ती ठीक रहेगी। परन्तु थोड़ी सी बात करने के बाद ही  मुझे लगने लगा कि वह सिर्फ नाम का बंगाली है। वह अच्छी हिंदी में बात कर रहा था। मैंने जब बांग्ला में कुछ पूछना चाहा तो वह हल्का सा उत्तर देकर चुप हो गया। फिर उसने कहा कि उसका जन्म और पढाई-लिखाई यूपी में ही हुई है इसलिए उसकी बंगाली अच्छी नहीं है। जब उसने बांग्ला की जगह बंगाली कहा तो मुझे अखरा।
कैंटीन में भी उसने चावल की जगह रोटी खायी। वह मुझे कुछ अनदेखा सा कर रहा था। मैं उससे बात करने का प्रयास करता तो वह संक्षेप में जवाब दे चुप हो जाता। कलकत्ता के अपने साथियों-दोस्तों से प्रवासी बंगालियों के बारे में अक्सर सुना था कि अपने ' देश ' से बाहर रह कर ये लोग ' बाहर वालों ' जैसे ही हो जाते  हैं। परन्तु क्या यह ' बाहर वाले जैसा हो जाना ' एक स्वाभाविक परिवर्तन नहीं है ?

            शाम को  वापिस लौटा तो आंटी ने स्वागत किया। लवली ने उत्सुक होते हुए पूछा, ' सो, होऊ वाज द डे ? ' मैंने सिर्फ ओके कहा। आंटी ने कुछ खाने-पीने के बारे में पूछा। लवली एक ट्रे में रखकर एक गिलास में पानी लेकर आई। साथ में एक खाली गिलास और दो कोल्ड ड्रिंक की बोतलें थी। उसने इशारे से पूछा, ' ओरंज
आर लेमन ? ' यह साधारण सा प्रश्न था। मुझे तुरंत एक किसी एक का नाम बता देना चाहिए था, परन्तु मेरे लिए इस तरह का  स्वागत नया सा था। हमारे घर में ऐसा नहीं होता था कि शाम को ऑफिस से लौटो और कोई अपने से कोल्ड ड्रिंक आदि ले आये। फिर यहाँ का माहौल भी हाई-फाई था। मैं आं ..ऊं .. में उलझ कर रह गया। पानी का गिलास उठाते हुए कहा, ' नहीं, सिर्फ पानी ही ठीक है '  आंटी अपने घर के कामों में व्यस्त थी। अंकल- और पिंकी शायद घर में नहीं थे। मैं संकोच करता हुआ सोफे में बैठा रहा। बगल में कई अंग्रेजी की पत्रिकाएँ रखी थी, एक को उठा कर उसमें झाँकने लगा। ये अंग्रेजी की एक फ़िल्मी पत्रिका थी। हिंदी फिल्मों के रंगीन चित्र और गप-शप। मैं पन्ने पलट रहा था। पढने को तो ऐसी पत्रिकाओं में कुछ होता नहीं और वैसे भी हिंदी फिल्में मुझे फिजूल लगती हैं। समझ नहीं आ रहा था कि कैसे उठूँ और अपने कमरे में जाऊं? मेरी निगाहें अपने काम में व्यस्त आंटी और लवली को देख रही थीं। मैंने सोचा, ये आधुनिक टाइप की बेटी कैसे माँ का हाथ बटा रही है और ये आंटी भी इस उम्र में कितनी चुस्त हैं। पत्रिका में अचानक मुझे एक बंगाली फिल्म निर्देशक के बारे में कुछ दिखा तो मैं रूक गया। ये बांग्ला फिल्मों के नामी निदेशक हैं। लिखा था कि वे शरतचन्द्र की एक कहानी पर हिंदी में फिल्म बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं। जिस कहानी पर वे काम कर रहे हैं, वह शरतचंद्र की अत्यंत प्रसिद्द रचना है और इस पर बांग्ला में पहले ही फिल्म बन चुकी थी। मैं दो-तीन बार इस कहानी को पढ़ चुका हूँ. इसके एक नारी चरित्र ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। मुझे लगा कि हिंदी में इस तरह की कहानी पर क्या फिल्म बनेगी ? उस पात्र के साथ न्याय कर सके, ऐसी अभिनेत्री ही तो हिंदी फिल्म जगत में नहीं है और फिर ऐसी कहानियों में रुचि रखने वाले  हिंदी दर्शक ही कहाँ हैं ? मैं खुद में उलझा हुआ ही था कि आंटी एक प्लेट में कुछ फल लेकर आ गयी और सामने बैठ काटने लगी। उन्होंने स्नेह से कहा, ' कैसा लगा हमारा चंडीगढ़ ?' और एक छोटी प्लेट में सेब  काट कर मेरी ओर बढ़ा दिया। प्लेट में एक छोटा सा फोर्क रखा हुआ था। मैंने कहा, ' अच्छा है .. यह तो प्लांड सिटी है, अच्छा तो होना ही है.. '  ' हाँ, अच्छा तो है पर, सब कुछ अच्छा नहीं है, चंडीगढ़ महंगा बहुत है ', उन्होंने कहा और मेरी प्लेट में चीकू के कुछ टुकड़े रख दिए।  कुछ देर तक मैं यूँ ही शर्माता-झिझकता रहा। आंटी ने कहा कि शायद मैं थक गया होऊंगा और मुझे थोड़ा आराम कर लेना  चाहिए। मैं उठ कर अपने कमरे में आ गया। यहाँ बिस्तर पर बैठ मुझे सकून सा लगा। ये सब  कितना सत्कार कर रहे हैं, कितना ख्याल रख रहे हैं फिर भी मैं कहीं और जाने कि क्यों सोच रहा हूँ ? यदि कहीं और गया तो शायद ये लोग सोचें कि उनके आव-भगत  में कुछ त्रुटि रह गयी है ?

पिंकी शायद लौट आई थी। मुझे उसकी आवाज़ सुनाई दी। थोड़ी देर में वह मेरे  कमरे में आई। उसने भी वही सब पूछा। कैसा रहा दिन ?  कैसा है यहाँ का ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट ?, चंडीगढ़ कैसा लगा? आंटी की आवाज़ आई कि चाय तैयार है। वह उठकर जाने लगी और पूछा, ' आप लेंगे चाय ?' मेरे मुंह से फटाक से निकल गया, हाँ  ..  वह दो कप चाय लेकर आई। हम दोनों बात करने लगे। उसने बैंकिंग - ट्रेनिंग और बैंक के कार्य-प्रणाली के बारे में बात चलायी। ' ये ट्रेनिंग- व्रेनिंग सब एक ढकोसला है..  स्टाफ काम तो करता नहीं, फिर ट्रेनिंग देने का मतलब ? मैंने कहा, ' ट्रेनिंग नहीं होगी तो नए सिस्टम्स कैसे पता चलेंगे?  उसने तड़ाक से उत्तर दिया, ' काम करने का मोटीवेशन ही नहीं होगा तो नए सिस्टम्स क्या कर लेंगे? पहले मोटीवेट तो करो ..' मैंने कहा, ' नयी बातें नहीं पता होंगी तो कस्टमर को सर्विस कैसे देंगे?  पिंकी हंसने लगी, ' वाह .. कस्टमर क्या है, उसकी जरूरतें क्या है ? यह पता नहीं पर सर्विस के टूल्स नए-नए हैं .. ये तो दिखावे के लिए ही रखे रह जायेंगे न ? पहले अपने काम के प्रति 'आनेस्टी' और 'सिंसियरिटी' तो दिखाओ ?  मन में सोचा, ' यह पंजाबी लड़की मुझसे क्या तर्क  करेगी ?  परन्तु मैंने कहा, ' हाँ, ये बात तो कुछ हद तक ठीक ही है '  पिंकी थोड़ी संतुष्ट हुई, ' तो आप भी मानते हो कि सबसे पहले काम के प्रति समर्पण होना चाहिए फिर कुछ और...   एक बार फिर सहमति दिखाते हुए मैंने कहा, ' हाँ ये बात तो ठीक ह.. न मालूम मैं हाँ.. हाँ .. क्यों कर रहा था क्यों कि मेरे दिमाग के गहरे तल पर विरोध का भाव था। तो क्या मैं पिंकी के बात करने के अंदाज़ से प्रभावित हो रहा था ? नहीं, ऐसा भी नहीं था। इसमें प्रभावित होने की क्या बात थी ? क्या ये पिंकी का व्यक्तित्व था जो मुझे विवश कर रहा था ? वह एक खुले से व्यक्तित्व की लड़की थी। उसके सामने मैं स्वयं को कमजोर सा क्यों महसूस कर रहा था ?
( आगे अगले सप्ताह, यहीं पर, आज ही के दिन )