' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा
CHANDER DHINGRA
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे...
( १३ ) मैं रविवार की प्रतीक्षा करने लगा। परन्तु मेरे भीतर कोई था जो मुझे सावधान कर रहा था। ये इतनी उत्सुकता कैसी ? ये मेरे लिए नई अनुभूति थी। मैं क्यों सब कुछ सरलता से न ले पा रहा था ? मैं विवश क्यों था ? मैं तो यहां चंडीगढ़ में एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में आया था। इस अनजान शहर में मेरे परिवार के पहचान के लोग, अभिभावक की तरह मेरी सहायता कर रहे हैं। ये अच्छे लोग हैं जो बड़ों का सम्मान करते हैं। मेरे नाना के कारण ही तो ये मेरे प्रति स्नेह दर्शा रहे हैं । ये सब समान्य बातें हैं पर मैं सामान्य रूप में क्यों नहीं ले पा रहा हूँ ? मैंने खुद को फिर से संतुलित किया परन्तु जानता था कुछ समय बाद ही विचारों के प्रवाह में फिर से बहने लगूंगा।
रविवार को मैं जल्दी ही उठ बैठा। पिंकी ने सुबह आने का कहा था। सोचा, नौ बजे से पहले क्या आएगी ? अभी तो सात भी न बजे थे। दो घंटे और थे और वो भी अगर वह ठीक समय से आयी तो ? वैसे यहाँ के लोग सामान्यतः समय के पाबंद हैं। अधिकतर समय पर ही काम करते हैं। यह मैं पिछले कुछ दिनों में महसूस कर चुका था। हमारी ट्रेनिंग की क्लास ठीक समय से ही शुरू हो जाती थी। शुरू होने के बाद बेशक इधर उधर हो जाये और समय बर्बाद होता रहे। मैं तैयार हो गया और प्रतीक्षा करने लगा। ये दो घंटे काटने बहुत मुश्किल हो रहे थे। नाश्ता तो किया ही, दो बार चाय भी पी। नौ बजने को आये तो मैं अपने कमरे में आकर बैठ गया। मैं नहीं चाहता था कि पिंकी को लगे कि मैं उससे मिलने को उत्सुक था और तैयार होकर पहले से ही बैठा हुआ था। नौ बजे ही थे कि नीचे से खबर आयी कि कोई मुझे मिलने आया है। मैं समझ गया कि पिंकी आ गयी है। वह समय की पाबंद जो थी, ठीक नौ बजे पहुँच गयी। मैंने संदेशवाहक को कहा, ' कह दो आता हूँ.. ' मैं तो तैयार हो प्रतीक्षा में ही बैठा हुआ ही था, परन्तु साथ साथ नीचे न उतरा। कुछ देर पिंकी को इंतज़ार करांना ठीक लगा। तुरंत ही आ जाता तो यह लड़की समझती की मैं उससे मिलने की उत्सुकता में हूँ। नीचे आया तो देखा तो पिंकी अपने स्कूटर से टिकी खड़ी थी। मैंने कहा, ' सॉरी.. वेट करना पड़ा.. ' अरे, ये क्या बात हुई, कहकर तो गयी थी कि रेडी रहना.. खैर, छोड़ो.. कम ऑन, फ़ास्ट..' पिंकी ने मुड़कर कहा और स्कूटर को स्ट्रार्ट कर, मुझे पीछे की सीट पर बैठने का इशारा करने लगी। तेज स्पीड में वो मुझे स्कूटर पर लेकर गेट से निकल गयी। कुछ दूर जाने पर मैंने एक बार फिर से सॉरी कहा पर पिंकी सामान्य थी। उसने कहा कि सॉरी की कोई बात नहीं है, ' हम लोग सिर्फ बीस मिनिट ही लेट है.. चिंता नहीं अभी कवर करती हूँ ' पिंकी ने हँसते हुए कहा और स्कूटर को गति देने लगी। कुछ ही समय में उसने स्कूटर को किनारे लगाया। मुझे सामने एक भव्य भवन दिखा। शायद हम लोग गुरूद्वारे आ गए थे। हाँ ये गुरुद्वारा ही था। भीड़भाड़ थी, रौनक थी और लोगों के चेहरों पर ख़ुशी, ताजगी और श्रद्धा के भाव थे। स्कूटर को स्टैंड पर लगा, पिंकी तेजी से आगे बढ़ रही थी। उसने अपने दुप्पटे से सिर को अच्छे से ढक लिया था। मैं पीछे चल रहा था। पिंकी ने पीछे मुड़ मुझे देखा और मेरा हाथ पकड़ मुझे खींच लिया। ' कम ऑन.. फ़ास्ट.. ' उसने कहा और मुझसे पूछा, 'पॉकेट में रुमाल है न ? सिर ढक लो ' मैंने पॉकेट से रुमाल निकाला जिसे देख उसने कहा, ' नहीं यह नहीं चलेगा ' फिर वैसे ही मेरा हाथ पकड़े हुए, मुझे गुरूद्वारे के मैन गेट के पास लगे एक स्टाल पर ले गयी। यहाँ उसने एक नीले रंग बड़ा सा स्कार्फ ख़रीदा। असल में यह सिर ढकने के लिए ही था। सिर पर पहन कर इसे पीछे से बांध सकते थे। सामने माथे पर सिखों का धर्मचिन्ह आ जाता था। पिंकी ने उत्साह के साथ मुझे यह पहनाया और फिर यह भी देखा कि वह धर्मचिन्ह माथे पर सही जगह यानि केंद्र में है या नहीं। थोड़ा सा इधर-उधर किया और ठीक होने पर उसने हँसते हुए कहा, ' ये हुई न बात.. अब बाबू मोशाय से सिंह साहब बन गए हो..' पिंकी के उत्साह ने मुझे भी थोड़ा सहज कर दिया था। जिस तरह से उसने मेरे सिर पर स्कार्फ ढकवाया था, मुझे उसमें अपनापन सा दिखा था। हम दोनों ने अपने जूते उतारे और आगे बने स्टाल में रख दिए। हमें एक टोकन दिया गया। यह व्यवस्था बहुत अच्छी थी। बाद में पिंकी से मालूम चला कि यहां काम कर रहे लोग, गुरुद्वारे के कर्मचारी नहीं अपितु यहाँ के नागरिक हैं जो सेवा भाव से ये कार्य करते हैं। वे न केवल जूते संभाल कर सही स्थान पर रखते हैं बल्कि उन्हें झाड़पोंछ कर साफ भी करते हैं। पिंकी ने बताया कि उसके पापा भी सेवा के लिए यहाँ आते हैं।
हम गुरूद्वारे के भीतर गए। भजन कीर्तन चल रहा था। बहुत ही श्रद्धामय और पावन माहौल था। सामने एक मंच था जहाँ लोग आगे बढ़ते हुए, झुक जाते थे। मैंने भी हाथ जोड़ प्रणाम किया। पिंकी ने देखा तो कहा, 'मत्था टेको..' मैं इन सब बातों में विश्वास नहीं रखता, मैंने कहा, ' हाथ जोड़ दिए हैं..' पिंकी ने कुछ आदेश वाले भाव में मेरे पास आ धीरे से कहा, 'माथा टेको.. अच्छा होता है..' इस बार उसने मत्था नहीं माथा कहा था। मैंने क्षण भर को अपना बचपन याद किया जब प्रसाद के लालच में मंदिर मैं झुक कर प्रणाम किया करता था। मैंने मुस्कुराकर पिंकी को ओके जैसा भाव दिया और अच्छे से घुटनों के बल झुक कर शीश को भूमि पर लगाते हुए प्रणाम किया और दोनों हथेलियों को जोड़ कर प्रसाद ग्रहण किया। वहां हॉल में हम दोनों कुछ देर तक बैठे। पिंकी महिलाओं वाले खंड में बैठी थी और मैं इस ओर पुरुषों वाले खंड में। पिंकी दूर थी परन्तु मैं उसे देख पा रहा था। वह आँखे मूँद, ध्यान मुद्रा में बैठी थी। मैं एकाग्रचित न हो पा रहा था। बार-बार पिंकी की ओर देख लेता था। वह केवल ध्यान में थी और दुनिया से बेखबर। मेरे आसपास जो लोग बैठे थे, वे भी प्रार्थना में मग्न थे। मेरे दिमाग ने प्रश्न उठाया, यहाँ बैठे लोगों में अधिकतर बड़े-बूढ़े थे, उनका इस तरह का व्यवहार तो बनता था परन्तु पिंकी ? वह तो पढ़ी-लिखी युवा लड़की है, वह क्यों इतनी भक्ति दिखा रही है ?ये भी एक तरह का नया चलन तो नहीं है ? मैंने चारों ओर नज़र घूमाकर देखा। दीवारों पर बड़ी बड़ी तस्वीरें लगी हुई थी। ये सैनिकों या योद्धाओं के चित्र लग रहे थे। कुछ समय बाद मैंने देखा कि पिंकी मुझे बाहर आने का इशारा कर रही थी। मैं उठ गया। न जाने मुझसे ये अनायास कैसे हो गया, मैंने हाथ जोड़ प्रणाम किया और उठकर बाहर आ गया। शायद मैं पिंकी को दिखाना चाहता कि मुझे यहाँ आकर अच्छा लगा था और मुझ में श्रद्धा का भाव जग गया था। शायद कहीं न कहीं मैं पिंकी को प्रभावित करना चाहता था। कुछ समय को हम दोनों शांत थे। अचानक पिंकी को कुछ परिचित लोग दिखे तो उसने अभिवादन में परम्परा के अनुसार हाथ जोड़ 'सत श्री अकाल ' कहा। मुझे इस अभिवादन की जानकारी थी। मैंने कई सिख लोगों को नाना के पास आते देखा था। वे सत श्री अकाल और नमस्ते दोनों कहते थे। यहाँ भी मैंने लोगों को यही अभिवादन करते हुए देखा था। जब पिंकी ने अपने परिचितजनों को आदरपूर्वक प्रणाम किया तो उन्होंने प्रत्युत्तर में पिंकी और साथ में मुझे भी सत श्री अकाल कहा। थोड़ा आगे बढ़े तो मैंने पिंकी को रोका और कहा, ' पिंकी, थोड़ा अपने गुरूद्वारे और यहाँ के बारे में तो बताओ..' मैंने पहली बार उसे नाम से पुकारा था। पिंकी को मेरी ये जिज्ञासा अच्छी लगी। उसने कहा कि वे लोग अपने पवित्र ग्रन्थ की पूजा करते हैं। हमने जो आते ही माथा टेका था वह गुरु ग्रन्थ साहब के सामने था। ये जो हम यहाँ आने पर सिर ढक लेते हैं, वह भी गुरु के प्रति हमारे सम्मान का प्रतीक है। पिंकी थोड़ा गंभीर हो रही थी। मैं भी सिख धर्म के बारे में जानने को उत्सुक था। मैं कहा, ' चलो कहीं बैठकर बात करते हैं.. पिंकी ने हाँ में सिर हिलाया। हम लोगों ने अपने जूते पहने और सामने रखी बैंच पर बैठ गए। पिंकी ने बताया, ' गुरु नानक देव जी हमारे पहले गुरु हैं। उनके बाद नौ और गुरु हैं इस तरह हमारे दस गुरु हुए हैं..' मैंने चुटकी लेते हुए पूछा, ' सब गुरुओं के नाम याद हैं ? पिंकी ने तपाक से उत्तर दिया, ' ऑफ़ कोर्स..' फिर उसने ऊँगली से गिनाना शुरू किया, गुरु नानक देव जी, गुरु अंगद देव जी, गुरु अमर दास जी, गुरु राम दास जी, गुरु अर्जन देव जी..' मैंने हँसते हुए उसे रोका, 'अरे मैं तो यूँ ही कह रहा था..' लेकिन पिंकी नहीं रुकी और उसने सब नाम गिनवा दिए। सिख, जिन्हें हम बंगाली लोग पंजाबी कहते हैं, के बारे में मेरे मन में कई प्रश्न थे। आज कुछ जानने को मौका है। मैंने कहा, ' तुम्हें नॉलिज है, कुछ बातें पूछता हूँ, सिख लोग ये छोटी सी तलवार क्यों अपने पास रखते हैं ? मुझे पता था ये जरूर पूछोगे.. हम लोगों को पांच चीजें रखना आवश्यक है.. उन में से एक ये है जिसे किरपान कहते हैं..और अन्य चार हैं केश, कच्छ, कड़ा और कंगा...ये हैं हमारे पांच ' के ' हैं। हँसते हुए उसने बात आगे बढ़ाई, ' तुम्हारा अगला सवाल क्या है, बताऊँ ? अब तुम पूछोगे, सिखों में सारे पुरुष सिंह और महिलाएं कौर क्यों हैं ? मैं मुस्कुराने लगा। सच में, ये प्रश्न भी मेरी जिज्ञासा सूचि में था। मैंने कहा, ' हाँ, बताओ..' पिंकी ने कहा, सिंह का मतलब है शेर अर्थात निडर और कौर है प्रिंसस यानि राजकुमारी.. ये टाइटल्स हमें जाति वगैहरा के बंधन से ऊपर उठाते हैं और समझाते हैं कि हम सब एक सामान हैं.. किरपान रखने के पीछे भी एक बात है कि हमें दुर्बल का साथ देते हुए अन्याय का विरोध करना है। मैं बहुत प्रभावित था। आज मुझे पिंकी में एक सुन्दर लड़की के साथ साथ एक समझदार लड़की भी दिख रही थी। मैंने कहा, ' मुझे तुमसे बहुत कुछ पूछना है, बहुत कुछ सीखना है..' पिंकी मुस्कुराई और उसने टेढ़ी नज़रों से मुझे देखा और कहा, ' मुझे भी आपसे बहुत बहुत कुछ पूछना है, बंगाल के कल्चर के बारे में.. बंगाल के क्रांतिकारियों के बारे में.. बंगाली लिटरेचर के बारे में.. और बहुत कुछ.. पर चलो, अब चलते हैं.. आपको चंडीगढ़ के मशहूर गर्मागरम छोले-भठूरे खिलाते है.. ' पिंकी ने स्कूटर स्टार्ट किया और हम लोग वहां से निकल आये।
( आज बस, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर )
बहुत दिनों से था मन मे कि कहानी पढी जाए एक बार शुरू भी किया था किंतु एक भाग पढ़कर बिजी हो गई थी तो छूट गया था। आज 13 भाग पढ़े बहुत बढ़िया लिखा जा रहा है। उत्सुकता बनाने में कामयाब है आप।
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