Chander Dhingra's Blog
Wednesday, June 30, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 80 & 81
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ...
( ८०- ८१ ) लवली का अपनी दीदी के प्रति प्यार उमड़ रहा था। वह लगातार उसके पास बैठी हुई थी। अचानक उसने कहा, ' जीजू, उस प्रोडक्शन हाउस की जो हेड हैं, उनका नंबर मिलाइए...' मैंने कहा, 'क्या हुआ...वह तो खुद ही आज पिंकी को देखने आ रही है...उसका फोन आया था...' लवली ने कहा, ' ठीक है, मैं उससे बात करती हूँ...' मैंने कहा, ' उससे कुछ न होगा...पिंकी तो इस काम में बहुत खुश है...कुछ दिनों में अपने कामकाज में लग जाएगी तो सब ठीक हो जायेगा...' लवली को न जाने क्यों लग रहा था कि पिंकी के मानसिक आघात वाली बात इस टीवी सीरियल के काम से जुड़ी हुई थी। शायद उसने ऐसी कहानियां सुनी हुई थी कि किस तरह से फिल्मों और टीवी सीरियल्स में नए कलाकारों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है।
देवयानी आयी तो लवली ने उसे दोषी के रूप में गुस्से से देखा था। मुझे उसका व्यवहार उचित न लग रहा था। देवयानी अपनी ओर से पिंकी को प्रेरित कर रही थी। उसने कहा, ' मनप्रीत, तुम तो छा गयी हो कलकत्ता में ...चलो, काम पर आओ, तुम्हारे साथी और तुम्हारे प्रशंसक प्रतीक्षा कर रहे हैं...' लवली ने उसकी बात सुनी तो कड़क के बोली, ' मैडम, आप इसकी हालत देख रही हैं...आप ने इसका ख्याल नहीं रखा है...ये अब काम नहीं करेगी...इसे पूरा विश्राम चाहिए...' देवयानी सुलझी हुई महिला थी। उसने हँसते हुए कहा, ' हां, रेस्ट तो चाहिए, तुम्हारी सिस्टर को...' फिर उसने पिंकी की और देखते हुए कहा, ' क्यों मनप्रीत, हमने तुम्हारा ख्याल नहीं रखा...बोलो और क्या चाहिए ? पिंकी तो गुमसुम सी बैठी थी उसके बदले लवली ने कहा, ' किसी ने तो हर्ट किया है इसे...जब तक यह स्पष्ट नहीं हो जाता...मनप्रीत कहीं नहीं जाएगी...' इस बात पर देवयानी भी कुछ गंभीर हो चली थी। उसने कहा, ' मनप्रीत की हेल्थ की मुझे भी फ़िक्र है... इसे हर्ट कौन करेगा...मनप्रीत तो सबकी चहेती है...परन्तु, यह टीवी सीरीयल का काम है, इसे यूँ ही अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता...हाँ, हम कुछ दिन प्रतीक्षा कर सकते हैं...' लवली अपने आक्रामक पंजाबी स्वरूप में थी। उसने कहा, ' फिर तो मैडम आपको प्रतीक्षा ही करते रहना होगा...' पिंकी निष्पक्ष सी सब कुछ सुन रही थी। उसकी ओर से कोई प्रतिक्रिया न थी। देवयानी ने अब कुछ न कहा और पिंकी को शुभकामना देते हुए कमरे से बाहर आ गई थी। मैं उसके साथ नीचे कार तक आया था। अब उसने मुझसे बंगाली में कहा, ' मनप्रीत की बहन विषय की गंभीरता को नहीं समझ पा रही है...जवाँ लड़की है, समझ नहीं रही ...इस काम को बीच में अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता...कान के द्रव्य का असंतुलित हो जाना बहुत गंभीर बीमारी नहीं है...अक्सर हो जाता है...आप देखिये और मनप्रीत को और उसकी बहन को समझाइये...' मैंने कहा, ' हां, ये बात तो सही है परन्तु कुछ न्यूरो प्रॉब्लम भी दिखाई दी है ...' मैं ऊपर आकर लवली को यह बात समझाने की कोशिश करने लगा। मैंने उसे कहा, ' अगर पिंकी ने काम न किया तो देवयानी के प्रोडक्शन हाउस की बहुत क्षति होगी...' लवली ने दो शब्दों में उत्तर दिया, ' होने दो...'
पिंकी सब सुन रही थी परन्तु शांत थी। रात में उसने शायद अपनी बहन से कुछ बात की थी। सुबह लवली ने एक हाथ लिखा पत्र मुझे दिखाया। इस पर पिंकी के हस्ताक्षर थे। मैंने पढ़ा तो हैरान रह गया था। यह धारावाहिक के प्रोडक्शन हाउस के लिए था। इसमें लिखा था कि स्वास्थ्य कारण से वह धारावाहिक में काम न कर पायेगी। लवली ने कहा, ' ठीक है न जीजू...' मैंने कहा, ' अरे, तुम्हारी दीदी कुछ दिनों में ठीक हो जाएगी...हम कुछ दिनों का अवकाश लिख देते हैं... एक दम छोड़ने देने की बात क्यों लिखें ? हम दोनों पिंकी के पास आये थे। वह गुमसुम सी बैठी थी। एक डर सा था उसके चेहरे पर। वह मुझसे आँखें छिपा रही थी। मैंने कहा, 'ये क्या, तुम यह सीरियल छोड़ देना चाहती हो ? वह लवली की ओर देखती जा रही थी। उसने उत्तर न दिया था। मैंने फिर कहा, ' यह तुम्हारे लिए एक सुअवसर था...आवेश में मत आओ...' वह इन दिनों बोलती न थी किन्तु उसकी ख़ामोशी में ही मैं उसकी बात सुन लेता था। उसने कहा, ' ये आवेश वाली बात तुम कह रहे हो ? मैंने कहा, ' हाँ...अच्छे से सोच-समझ कर निर्णय लो... निर्णय तो तुम्हें ही लेना...यह काम आरम्भ करने से पहले भी मैंने कहा था, सरल न होगा परन्तु तुम उत्साहित थी...मैं तुम पर काम का प्रेशर आ जाने से चिंतित था परन्तु तुम्हें अपने आप पर, अपनी क्षमता पर पूर्ण विश्वास था...देखो, इस प्रेशर के कारण कैसी समस्या हो गयी है...' पिंकी की ख़ामोशी में ही शब्द थे। उसने कहा, ' आप जानते हो मेरी समस्या किस लिए हुई है और मैं क्यों इस स्थिति में हूँ...' मैंने कहा, ' ठीक है, मैं तुम्हारा ये लेटर भिजवा देता हूँ...तुम्हारी जैसी तबीयत है, उसमें ये काम नहीं हो सकता...हम सब को चिंता है...' मैं बोलता चला जा रहा था। लवली सुन रही थी किन्तु वह समझ ही न पायी कि पिंकी ने कुछ न बोला था और यह एक तरफ़ा संवाद था। उसने कहा, 'देख पिंकी, तूने निर्णय ले लिया है तो ठीक ही है...अब जो होगा देखा जायेगा...जीजू और यहाँ-वहाँ सभी चिंतित हैं...मैं तुझे ठीक करके चली जाऊँगी... मुझे तो इस आदमी की भी फ़िक्र है...' उसने मेरी ओर देखकर, चंचलता से मुस्कुराते हुए कहा था। मुझे लगा अपनी बहन की इस बात पर पिंकी भी मुस्कुरा देगी और धीरे-धीरे सामान्य हो जाएगी किन्तु मैं भूल सोच रहा था। उसके मन में क्या था ? मुझे तो सब पता था। मेरा मस्तिष्क था जो खेल रहा था। एक छिपी हुई चतुराई थी जो चालें चल रही थी। सत्य की सौगंध लेकर अपना जीवन याद कर रहा हूँ तो लगता है एक-एक घटना, एक-एक बात मेरे सामने आ मुझे घूर रही है और चेतावनी सी दे रही थी कि अपराध बोध की जंजीरों से मुक्त होना है तो सब कुछ अपने मन-मस्तिष्क से बाहर निकाल देना होगा।
लवली अपनी बहन के साथ उसके कमरे में ही रहती थी। वह उसे आनंदित और उत्साहित करने का प्रयास करती रहती थी। मैं दो बहनों में खुद को नहीं लाना चाहता था इसलिए मैं अलग ही रहता था किन्तु लवली से पूछता रहता था और अपनी चिंता जाहिर करने में भी न चूकता था। मैं ऑफिस न जा रहा था। रोबी दा का एक-दो बार फोन आया था परन्तु वह मुझे अपने कार्य में आ जाने का दबाव न दे पा रहे थे। मैंने मनोवैज्ञानिक और न्यूरो विशषेज्ञों से संपर्क भी किया था। लवली मेरे हर प्रयास में साथ थी और संतुष्ट थी कि मैं उसकी बहन के लिए सब कुछ कर रहा था। चेन्नई के एक विशेषज्ञ से भी संपर्क किया था। पिंकी की दशा में सुधार न दिख रहा था। एक चिंता की काली छाया मुझ पर भी आ रही थी। लवली हर दिन अपने घर पर और अपने मामाजी को समाचार देती थी। उसकी बातों से पता चलता कि उसने निश्चय किया हुआ था कि वह अपनी दीदी को स्वस्थ करके ही चंडीगढ़ लौटेगी। एक दिन मुझे लवली ने कहा कि उसे लगता था कि पिंकी का स्वास्थ्य दिन दिन बिगड़ता जा रहा था। वह बहुत शांत हो गयी थी और खाने में भी उसकी रूचि समाप्त होती जा रही थी। उसने कहा कि हमें चेन्नई के उस डॉक्टर को दिखाना चाहिए, जिसके साथ हमने सम्पर्क किया था। उस दिन लवली बहुत चिंतित थी। उसकी चिंता देख मैं भी डर गया था। उसने मुझे देखा तो कहा, 'आप तो पिंकी से अधिक कमजोर और रोगी जैसे दिख रहे हैं...आप दुर्बल पड़ जायेंगे तो मेरी दीदी को कौन संभालेगा ? मैंने कहा, ' मैं अभी चेन्नई हॉस्पिटल में बात करता हूँ...आज ही निकल चलते हैं...' मेरी बात समाप्त होते ही उसने अपने पापा को फोन कर दिया कि हम लोग पिंकी को लेकर चेन्नई जा रहे थे। कुछ ही समय में दिल्ली से मामाजी का फोन आ गया था। हमारे चेन्नई जाने की खबर चंडीगढ़ से उन तक पहुँच गयी थी। वह बहुत परेशान हो गए थे। उन्होंने कहा कि क्या वह भी चेन्नई पहुंच जाएं ? बहुत मुश्किल से उन्हें रोका गया था। उस दिन मुझे लगा कि सच में वह पिंकी को अपनी बेटी समझते थे और उन्हें मामाजी की जगह छोटे पापाजी कहना चाहिए। मैंने लवली को यह बात बताई तो वह गर्व से मुस्कुरा दी। उसने कहा, ' आपको भी तो मुझे जीजू न कहकर वीर जी कहने का मन करता है...'
उसी शाम की फ्लाइट से हम तीनों चेन्नई चले गए थे। अगली सुबह डॉक्टर का अपॉइंटमेंट था। मामाजी के कई फोन आ चुके थे। हमें चेन्नई में तीन दिन रुकना पड़ा था। अंत नतीजा यही निकला कि जो इलाज और दवाइयां कलकत्ता के विशेषज्ञ ने दी थी वही चलती रहेंगी। पिंकी को हर तरह से सामान्य वातावरण चाहिए होगा, किसी तरह का तनाव नहीं होना चाहिए। हमें बताया गया कि रोगी की इस तरह की अवस्था के बारे में यह नहीं बताया जा सकता कि यह कब तक चलेगा ? परिवार के सभी सदस्यों को सहयोग करना होगा और पिंकी को प्रेरित करते रहना होगा। हम वापिस लौट आये थे, मानों खाली हाथ थे। पिंकी के मम्मी-पापा दोनों बहुत चिंतित थे और कलकत्ता आना चाहते थे। इसी तरह की अवस्था पिंकी के मामाजी और मामीजी की भी थी। इधर लवली भी परेशान थी कि अब क्या करे ? उसने मुझसे बात की तो मुझे भी समझ न आया कि उसे क्या करना चाहिए ? फिर उसने खुद ही सुझाया कि वह अभी के लिए वापस चली जाएगी और कुछ दिनों बाद, आवश्यक हुआ तो फिर से आ जाएगी। मैंने माँ को बताया तो उन्हें भी यह सही लगा। उसकी वापसी की टिकट तीन दिन बाद की हो गयी थी। उसने पिंकी को यह बताया तो उसने कोई प्रतिक्रिया न दी थी। मैंने कहा, 'तुम्हारी बहन जा रही है...तुम भी साथ में जाओगी ? पिंकी बस मेरा मुँह ताकती रह गयी थी। अब मैंने लवली को कहा, ' चलो, कल गुरुद्वारे में पूजा करके आते हैं...नानक बाबा का आशीर्वाद चाहिए...' मेरे मुख से यह बात सुन लवली खुश हो गयी थी किन्तु पिंकी के मुख पर ऐसे भाव थे मानो कह रही हो, ' तुम्हें नानक बाबा का आशीर्वाद नहीं लेना बल्कि एक दिखावा करना है...' उसकी अनकही बात मुझे बरबस सुनाई दे गयी थी। ऐसा ही चल रहा था उन दिनों। पिंकी कुछ कहती न थी परन्तु मैं न जाने क्या क्या सुन लेता था और उत्तर भी दे देता था।
अगली सुबह लवली को लेकर गुरूद्वारे गया था। वह चंचल सी लड़की न जाने कैसे गंभीर और पूजा-पाठ वाली लड़की बन गयी थी। वह अत्यंत सौम्य दिख रही थी। मैं स्वयं भी तो अपने भीतर एक परिवर्तन सा देख पा रहा था। चेन्नई से लौट आने के बाद से मुझे लगता कि ईश्वर पिंकी को फिर से सामान्य कर दें। मुझे यह तो लगता कि मुझसे एक अपराध हुआ था किन्तु मेरा मस्तिष्क तर्क देता कि यह कोई जघन्य अपराध न था। एक क्षणिक भूल थी। कभी कभी मैं इन्द्राणी के बारे में भी सोचता था। उसने तो सब कुछ सहजता से लिया था।
गुरूद्वारे में मैं सिर ढक कर प्रवेश कर रहा था तो लवली ने मुझे प्रवेश द्वार की दहलीज़ पर प्रणाम करने को कहा। अचानक मुझे अमृतसर की यात्रा और स्वर्ण मंदिर की याद हो आयी थी। तब मैंने इसे एक ढकोसला समझा था परन्तु आज मुझे यह एक ऐसी परम्परा प्रतीत हुई जिसमें स्वयं को शीर्ष के समक्ष समर्पित कर देने की परम्परा थी। मैं मत्था टेक कर एक और कोने में शांत मुद्रा में बैठ गया था। लवली दूसरी ओर के कोने में बैठी थी। कुछ समय बाद वह उठ खड़ी हुई और मेरे पास आयी थी। उसने मुझे चलने का इशारा किया तो मैंने कहा, ' कुछ देर और बैठो, अच्छा लग रहा है...'
बाहर आने पर गुरुद्वारे के सामने की चाय की दुकान पर दृष्टि गयी और उस दिन की याद बन आयी जब अपनी माँ और पिंकी की मम्मी के साथ आया था। उस दिन इन्द्राणी भी साथ थी। मैंने लवली को यह बात बताई तो वह मुस्कुरा दी। उसने कहा, ' हाँ, मम्मी को कलकत्ता का यह गुरुद्वारा बहुत अच्छा लगा था...चलो, एक-एक कप चाय पी लेते हैं...' हम भीड़भाड़ भरी सड़क पार कर उस चाय की दुकान की ओर बढे ही थे कि अचानक किसी ने आवाज़ दे मुझे पुकारा। सामने इन्द्राणी खड़ी थी। वह मुस्कुरा रही थी। मैंने सोचा क्या संजोग था। अभी कुछ क्षण पहले ही मैं उसे याद कर रहा था। मैंने आश्चर्य से उसे देखा और उसने लवली और मुझे। इन्द्राणी ने हँसते हुए कहा, ' अरे,अपनी साली को कलकत्ता की मशहूर चाय पिलाने लाये हो ? मैं क्या कहता ? लवली उसे पहचान गयी थी और अपनी चंचल शैली में बोली, ' आपने तो नहीं पिलाई तो मेरे जीजा ही पिलायेंगे...' इन्द्राणी हंसने लगी। उसके साथ एक सज्जन खड़े थे। टिप टॉप और महंगा काला चश्मा लगाए हुए। चेहरे पर रोब की छाया, उम्रदार लग रहे थे। इन्द्राणी ने उन्हें इशारा किया तो वह सामने आ गए। इन्द्राणी ने परिचय कराते हुए कहा, ' ये अभिजीत, मेरा कजिन...मेरे मामा का बेटा.. और ये हैं जावेद साहब...' फिर परिचय को आगे बढ़ाते हुए उसने कहा, ' अभिजीत, इनका छोटा बेटा मेरा स्टूडेंट है...' अब लवली का हाथ पकड़ कर उसने परिचय कराते हुए कहा, ' ये इनकी पंजाबी साली है, लवली...असली नाम क्या है मुझे नहीं पता, हाँ, इसकी दीदी का नाम पता है, मनप्रीत... और हाँ लवली, कलकत्ता में जब कभी बिरयानी खाओ और स्वाद में मज़ा आ जाये तो समझ लेना, जावेद साहब के होटल की है...कलकत्ता की बिरयानी पर इनका कब्ज़ा है...' वह हँसती जा रही थी। मैं खामोश था। चाय पीकर हम बाय करते हुए अलग हुए। मैंने देखा, इन्द्राणी जावेद साहब के साथ एक महंगी कार में बैठ रही थी।
रास्ते में लवली ने कहा, ' आपकी इन्द्राणी दीदी बहुत स्मार्ट हैं ? घर पहुँचते ही वह दौड़ते हुए पिंकी के पास गयी और उसे गुरूद्वारे का प्रसाद दिया। उसने कहा, ' लो, अब तुम ठीक हो जाओगी, मैं और जीजू अरदास करके आये हैं...' इधर-उधर की बात कर उसने कहा, ' पिंकी, वहां जो चाय का स्टाल है, उसकी चाय तो बहुत कड़क है...मज़ा आ गया और वहां इन्द्राणी दीदी भी मिली थी...' मुझे लगा था कि इन्द्राणी का नाम सुनकर पिंकी कुछ प्रतिक्रिया देगी परन्तु वह तो अपने में ही सिमटी हुई थी। लवली ने भी इन्द्राणी को लेकर बात बढ़ाते हुए और मचलते हुए कहा, ' जीजू की कजिन बहुत स्मार्ट है...वह स्वीट नहीं, साल्टी है...क्यों है न ? लवली हँस रही थी किन्तु इस बात पर भी पिंकी निष्पक्ष थी। शायद वह किसी पीड़ा का अनुभव कर रही थी। मैंने उसके पास जाकर कहा, ' क्या बात है, सिर में दर्द तो नहीं हो रहा ? पिंकी ने हल्का सा मेरी ओर देखा था। एक बार फिर से वही हुआ, उसने कुछ न कहा परन्तु मैंने सुना, ' आप जानते हो मुझे कहाँ दर्द हो रहा है ? मैंने तुरंत उत्तर देते हुए कहा, ' मैं डॉक्टर को बुलाता हूँ...लगता है तेज़ हेड-एक हो रहा है...' मैं फोन के लिए लपका। लवली मेरे पास आ खड़ी हुई थी। उसने भी कुछ बोला नहीं किन्तु मेरे मस्तिष्क ने सुना, ' जीजू, आप से तो पिंकी का हल्का सा कष्ट भी नहीं देखा जाता...मुझे तो आपकी भी चिंता होने लगी है...' मैंने लवली की ओर देखा और कहा, ' याद नहीं चेन्नई के डॉक्टर ने कहा था कि इस रोग में कभी कभी बहुत तेज सिर दर्द होता है और ऐसे में डॉक्टर को खबर देनी चाहिए...और हाँ, वो फाइल निकालना ऐसी हालत के लिए एक इमर्जेन्सी टेबलेट लिखी थी...मैं लेकर आता हूँ...' मैंने डॉक्टर को फोन कर दिया था। उसने भी एक टेबलेट बताई थी। मैं दौड़ता हुआ नीचे गया था। एक केमिस्ट मुख्य सड़क पर कुछ आगे जाने पर ही था। पिंकी को वह टेबलेट दी। शायद उसने मन ही मन कहा, ' मुझे सिर दर्द कहाँ हो रहा है खैर, तुम कहते हो तो मैं यह टेबलेट ले लेती हूँ...' हम दोनों के बीच यह अजीब सा एक तरफ़ा संवाद हो जाता था। मैंने कहा, ' यह आवश्यक है...चेन्नई के डॉक्टर रामचंद्रन ने यही कहा था और हमारे डॉक्टर सेन भी कह रहे हैं... लवली बीच में आ गयी थी। उसने कहा, ' पिंकी, तू अगर जल्दी ठीक न हुई तो जीजू भी बीमार हो जायेंगे...मैं दो-दो मरीजों का न संभाल पाऊँगी...' उसकी बात में चंचलता थी परन्तु पिंकी तो निष्प्राण सी लेटी हुई थी। लवली ने कहा, ' मैं परसों जा रही हूँ...अब तुझे अपना और जीजू का ख्याल रखना होगा...मैं कुछ दिनों बाद आ जाऊँगी...तुझे एकदम फिट हो जाना है... मुझे कलकत्ता घूमना है...इस बार तो तूने बोर कर दिया है...' मैंने कहा, ' नहीं, तेरी दीदी ठीक हो जाएगी और तुझे खूब घुमाएगी...हम लोग पुरी भी घूमने जाएंगे...वहां का बीच तो बहुत सुन्दर है...' ( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे ...)
Wednesday, June 23, 2021
टू स्टेट्स -एक नई कहानी (Two States - A New Story) - 79
टू स्टेट्स -एक नई कहानी (Two States - A New Story)
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ..
( ७९ ) पिशी और इन्द्राणी अपने घर को लौटने को हुए तो मैं एक बार फिर से भयभीत हुआ था। मुझे लगा न जाने पिंकी की प्रतिक्रिया कैसी होगी ? इन्द्राणी जाते-जाते उसके पास आयी और स्नेह दर्शाते हुए बोली, ' तुम जल्द ही एकदम ठीक हो जाओगी...किसी बात की चिंता न करना...तुम बहुत प्यारी लड़की हो, हम सब तुम्हें चाहते हैं...जीवन में बहुत कुछ होता रहता है, मन मलीन नहीं करना चाहिए...मैं फिर आऊँगी मिलने...' मैं पास में ही खड़ा था। उसकी बातों को मैं अपने हिसाब से सुन रहा था। मुझे लगा कि उसे इतना सब कहने की क्या आवश्यकता थी ? सीढ़ी से नीचे उतरते हुए उसने एक चुटीले अंदाज़ में मेरी ओर देखते हुए कहा, ' तुम भी सुन लो...जीवन में बहुत कुछ होता रहता है...इसे सरलता से लेना चाहिए...अब तुम्हें अपनी पत्नी का पूरा ख्याल रखना चाहिए...' मैं उसे देखता रह गया। नीचे पहुँच उसने ऊपर की ओर देखा और ऊँची आवाज़ में कहा, ' मेरे घर आना...'
मेरे लिए यह सब अब सामान्य न था। मैंने मन ही मन सोचा, ' ये इन्द्राणी भी अजीब लड़की है... हम दोनों के बीच इतना कुछ हो गया है और इस पर कुछ असर नहीं है...यह अपने सामान्य स्वरूप में है...कोई रोष-दोष नहीं है...बस कुछ हुआ था और बीत गया...' मैं पिंकी के पास आया और कहा, ' चलो, अपने कमरे में चलते हैं... ' उसने कुछ न कहा बस संकेत दिया कि वह वहीं ठीक थी। मैंने कहा कि माँ का पलंग था और शायद उन्हें भी आराम करना होगा। अब पिंकी उठ खड़ी हुई और ऊपर जाने लगी। मैंने सहारा देने को हाथ बढ़ाया तो उसने न कर दिया, ' मैं ठीक हूँ...' पिंकी अपने कमरे में प्रवेश करते ही बिस्तर और अन्य चीजों को व्यवस्थित करने लगती थी किन्तु आज उसने ऐसा कुछ न किया था और बिस्तर पर लेट गयी थी। मैंने उसके सिर के नीचे तकिया रखना चाहा तो उसने कहा, ' नहीं चाहिए, ऐसे ही ठीक हूँ...' मैंने कहा, ' तुम्हें आराम चाहिए, इसे रख लो...' उसने कुछ न कहा परन्तु मैंने कुछ सुना कि वह कह रही थी कि यह सहानुभूति रहने दो। पिंकी ने आँखें बंद की हुई थी। शायद कुछ आंसू बाहर आना चाहते थे, जिन्हें वह रोक रही थी। मैंने दबे स्वर में कहा, ' क्या तबीयत ठीक नहीं लग रही...कुछ ऐसी दवाइयाँ दी गयी हैं जिनका प्रभाव कुछ दिन तक रहता है...धीरे-धीरे ठीक हो जाओगी...' उसने हल्के से आँखें खोली और मुझे ऐसे देखा मानों कह रही हो, ' कुछ बिमारियां भी ऐसी होती हैं जिनका प्रभाव दिन दिन बढ़ता है, वे दवाइयों से कम या ठीक नहीं होती...' मैंने पास रखे पानी के गिलास को उसकी ओर बढ़ाया, ' पानी पी लो...' उसने पानी के दो घूंठ पीये और गिलास मुझे वापिस कर दिया। वह कुछ क्षण खामोश रही फिर कहा, ' आप इन्द्राणी दीदी के घर जाकर सोते थे, यह मुझे तो नहीं बताया...' मैंने कहा, ऐसी कोई विशेष बात न थी...क्या बताता... पिशी चाहती थी कि उनके पास आ जाया करूँ... ' उसने मुझे ऐसे देखा मानो कह रही हो, ' क्यों झूठ बोल रहे हो ? वह अधिक बोल न पा रही थी पर उसने अब कहा, ' इन्द्राणी और आप तो बचपन के साथी हो, क्यों नहीं कहते कि उसने कहा था कि उसके पास आ जाओ...बुआ जी का नाम क्यों ले रहे हो...मम्मीजी को भी तो भी नहीं बताया...' अचानक न जाने मुझे क्या हुआ कि मैं उठ खड़ा हुआ और ऊँची आवाज़ में कहा, ' हाँ... नहीं बताया... माँ को नहीं बताया...तुम्हें नहीं बताया...बाबा को नहीं बताया... बिशाखा को नहीं बताया...किसी को नहीं बताया... इन्द्राणी बचपन की दोस्त है...चलो, उसके साथ दो रात बिता दी तो क्या हुआ, यह एक सामान्य बात है...युवा लोगों में हो जाती है...' वह धक से मुझे देखती रह गयी थी। आवेश में आकर मैंने उसके मन में उठ रहे संदेह के बुलबुलों को साफ कर दिया था। उसने कहा, ' जो बात किसी के लिए सामान्य हो वह दूसरे के लिए असामान्य और घातक भी हो सकती है...' उसने तकिये को थोड़ा नीचा किया और आँखें बंद कर ली थी। अचानक मुझे लगा मेरे सामने जो थी वह पिंकी नहीं कोई और थी, एक रोगी थी जो किसी गंभीर बीमारी से जूझ रही थी। शायद मैंने भूल की थी और मुझे अपने आवेश पर नियंत्रण रखना चाहिए था। लगभग दस मिनट के बाद पिंकी ने आंखें खोली और कहा, ' प्लीज़, मेरी बहन लवली को बुला लो...' मैंने कहा, ' ठीक है...' वह करवट बदल दूसरी ओर को लेट गयी थी। इतने लम्बे समय बाद भी मुझे सब याद है। वह पिंकी के साथ मेरा अंतिम वार्तालाप था। हम दोनों में बात तो होती थी परन्तु वह तो कुछ भी न बोलती थी, परन्तु मैं ही न जाने क्या क्या सुन लेता था। वह तो मुरझाती तुलसी सी होती जा रही थी जिसे अब न इच्छा थी कि कोई भोर में जल दे और संध्या समय उसके पास प्रदीप जलाये।
मैंने चंडीगढ़ में फोन किया था और बताया कि पिंकी चाहती थी कि लवली कुछ दिनों के लिए उसके पास आ जाये। पिंकी के पापाजी से बात हुई थी। उन्होंने चिंता जताते हुए अपनी बेटी का हाल जानना चाहा था। मैंने उन्हें आश्वस्त किया था कि ठीक है परन्तु शायद घर की याद में है। उन्होंने कहा कि वह लवली को कलकत्ता भेज देंगे लेकिन कुछ दिनों के बाद क्यों कि वह किसी परीक्षा की तैयारी में थी और कुछ सप्ताह के बाद ही जा पायेगी। मैंने पिंकी को यह बताया तो उसने आश्चर्य से देखा। स्वर तो न थे परन्तु मैं सुन पा रहा था, ' ऐसी कौन सी परीक्षा है जो मेरे से मिलने और मेरे साथ रहने से अधिक आवश्यक है ? मैंने कहा, ' मैं समझ पा रहा हूँ कि तुम्हें अपने घर की याद आ रही है और वहां से कोई इस समय आ जाये तो अच्छा रहेगा परन्तु सब की अपनी मज़बूरी होती है... अब लवली की परीक्षा है तो वह कैसे आ पायेगी ? पिंकी मेरा मुंह ही ताक रही थी मानो कह रही हो 'बहनों का प्यार समझ पाना सब के बस की बात नहीं होती...' मैंने कहा, ' अगर तुम कहो तो मैं सीधे लवली से बात करता हूँ...' पिंकी के चेहरे पर कोई भाव न था परन्तु मैंने अंदाज़ा लगाया कि वह कह रही थी, ' मुझे अकेले ही झूझना होगा वह बेचारी यहाँ आकर क्यों परेशान हो...'
माँ पिंकी के पास आयी और उसका हालचाल पूछने लगी परन्तु पिंकी शांत थी। मेरे बाबा हमारे कमरे में किसी काम से ही आया करते थे, ने वहां आकर पिंकी से बात की किन्तु वह केवल सुनती रही थी। बाबा समझ ही न पाए थे कि पिंकी ने उनसे कुछ भी न कहा था। उन्होंने मुझसे कहा. ' जो दवाइयां दी गयी हैं वे ठीक से खिला रहे हो तो ? तुम्हारी जिम्मेदारी है हमारी बहू माँ का पूरा ख्याल रखने की... कोई भी त्रुटि नहीं होनी चाहिए...' मैंने सिर हिलाया और उन्हें आश्वस्त किया कि सब ठीक से चल रहा था।
पिंकी ने अगले दो दिन मुझसे बात न की थी। बाद में मुझे लगा कि वह किसी से भी अधिक बात न कर रही थी। केवल आवश्यकता अनुसार हाँ या न कह रही थी। बिशाखा ने ऊपर आकर उससे पूछना चाहा कि यदि वह कुछ विशेष खाना चाहे तो वह बना देगी। पिंकी ने न हाँ कहा और न ही ना। विशाखा अपनी ओर से बात करती रही कि कैसे उसे भी एक बार तीव्र ज्वर आया था तो उसका पाचन तंत्र नष्ट हो गया था और उसकी भी कई दिनों तक कुछ भी खाने की इच्छा न होती थी। उसने बताया कि कैसे नींबू और आंवले के अचार से उसका भोजन के प्रति स्वाद जागा था। मैंने सुना तो कहा कि वह वही अचार पिंकी के लिए भी ले आये। बिशाखा के मुख पर निर्मल मुस्कान थी परन्तु पिंकी ऐसे थी जैसे कुछ हुआ ही न हो। मैंने उससे कहा कि लवली को फ़ोन किया था और उसे पिंकी के स्वास्थ्य के बारे में बताया था। मैंने कहा, ' तुम्हारी बहन जल्द ही यहाँ पहुँच जाएगी और वह परीक्षा अगले सत्र में देगी...' मुझे लगा कि वह यह सुन खुश हो जाएगी परन्तु वह खामोश थी। चार दिन बाद लवली आ गयी थी। उसे देख भी पिंकी के मुख पर एक बार को मुस्कराहट आयी थी परन्तु क्षण भर बाद ही एक स्थिरता थी। उसने अपने मम्मी-पापा अपने चंडीगढ़ के बारे में कुछ न पूछा था। मुझे लगा दोनों बहनों को एकांत दिया जाना चाहिए। शायद पिंकी इससे अपने स्वाभाविक स्वरूप में आ जाये ?
दोनों बहनें एक ऊपर के कमरे में साथ थी। कुछ समय बाद लवली नीचे आयी तो बोली, ' जीजाजी, पिंकी की तबीयत तो ठीक नहीं लगती...वह तो कुछ बोल ही नहीं रही...डॉक्टर ने क्या कहा है ? मैंने कहा, ' वैसे तो सब ठीक है...जो वर्टिगो की समस्या हुई थी वह तो कान के कारण थी लेकिन डॉक्टर ने किसी भी तरह के स्ट्रेस से दूर रहने की सलाह दी है...मैं कल फिर डॉक्टर से मिलूंगा...तुम भी मेरे साथ चलना...अब तुम आ गयी हो तो मुझे भी थोड़ा सपोर्ट मिल गया है...मैं तो अकेला था...' कोई था जो मेरे भीतर बैठा मुझसे चतुराई भरी बातें करवा रहा था और मैं अपने प्रति सहानुभूति जाग्रत करने की चेष्टा में था। लवली ने मुझे प्यार से देखा और कहा, ' जीजू आप इतना कुछ कर रहे हैं, आपका ऑफिस भी तो है ? मैंने कहा, ' ऑफिस बाद में है वो पिंकी से आगे नहीं है... आवश्यक हुआ तो कुछ महीनों की छुट्टी ले लूंगा...' लवली ने मेरे गले में अपनी बाहें डाल दी और कहा, ' माय डिअर जीजू, यू आर ग्रेट...' उसने कहा, 'मम्मी और मामाजी को फोन करना है...' उसने अपना मोबाइल निकाला और पहले चंडीगढ़ का नंबर मिलाया। मैंने उससे कहा कि लैंडलाइन से फोन करे क्योंकि मोबाइल में अधिक बिल आता है तो वह खिलखिला पड़ी और कहा कि अब लैंडलाइन में उसे मज़ा नहीं आता था। उधर से आवाज़ आयी तो उसने कहा, ' मम्मी, पिंकी बहुत कमजोर हो गयी है...बात ही नहीं कर रही...डॉक्टर ने एकदम स्ट्रेस लेने से मना किया है...' शायद उधर से मम्मी ने कहा कि उसे दो-दो काम नहीं करने चाहिए थे। लवली ने कहा, 'हाँ, मम्मी मैं इसका टीवी सीरियल वाला काम छुड़वा दूंगी...बहुत हीरोइन बनने चली है...अब मैं आ गयी हूँ, देखती हूँ इस पगली को किस बात का स्ट्रेस है...उसकी मम्मी ने शायद अब मेरे बारे में पूछा था। उसने कहा, ' अरे, जीजू ही तो सब संभाल रहे हैं... वो तो दो-तीन महीने की छुट्टी भी लेने की कह रहे हैं...कल मैं डॉक्टर से खुद जाकर मिलूंगी और आपको बताऊँगी...' लवली की बातें मुझे अच्छी लग रही थी। मैंने कहा, ' मामाजी को भी फोन कर लो...' उसने हूँ कहकर दिल्ली का नंबर घुमाया और उन्हें भी ऐसा ही सब कहा। मामाजी ने मुझसे बात करनी चाही तो लवली ने फोन मेरे हाथ में दे दिया। मैं मामाजी की बात सुनता रहा। वह किसी स्पेशलिस्ट से परामर्श लेने का जोर दे रहे थे। उन्होंने कहा कि मैं पिंकी को दिल्ली ले आऊं और यहाँ एम्स के किसी बड़े डॉक्टर को दिखाया जाये। वह बीच-बीच में यह कह देते थे कि पैसे की फ़िक्र न करना। मेरी ओर से चुप्पी देख उन्होंने कहा, ' पिंकी से बात करवाओ...' मैंने पिंकी को फोन पकड़ाया, ' मामाजी हैं, बात कर लो...' पिंकी ने मेरी ओर न देखा। वह स्थिर थी और चुपचाप मामाजी की बात सुनती चली गयी थी। मुझे लगा कि पिंकी की ख़ामोशी ने मामाजी को चिंतित कर दिया होगा और वह कहीं कलकत्ता ही न पहुँच जाएं ?
लवली मेरे साथ उसी नर्सिंग होम के डॉक्टर के पास गयी थी। डॉक्टर ने एक नया प्रिस्क्रिप्शन बनाया था। लवली संतुष्ट न थी। उसने मामाजी को सब खबर दी और उन्होंने तुरंत किसी न्यूरो विशेषज्ञ से मिलने को कहा था। मैंने इधर-उधर फोन किया और उसी शाम हम दोनों, सभी रिपोर्ट्स लेकर विशेषज्ञ से मिले थे। ये कलकत्ता के एक नामी डॉक्टर थे। उनकी अपॉइंटमेंट सरलता से न मिलती थी। नाना और माँ के नाम पर यह संभव हो सका था। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट्स के साथ साथ रोगी से भी मिलना होगा। लवली ने कहा कि इसे किसी और दिन पर नहीं टाला जा सकता। वह घर गयी और पिंकी को साथ लेकर आ गयी थी। मैं वहीं प्रतीक्षा कर रहा था। पिंकी को आते देख मैं अचरज में आ गया। वह सच में किसी गंभीर रोगी सी दिख रही थी। मैं मन में सोचा ईश्वर करे इस डॉक्टर के इलाज से वह स्वस्थ हो जाये। आज लवली भी बहुत गंभीर दिखी थी। डॉक्टर ने कहा कि पिंकी शायद किसी गहरे मानसिक आघात की शिकार हुई थी। पिंकी केवल हाँ - हूँ कर रही थी। नई औषधी दी गयी थी और कुछ नए टेस्ट्स की सलाह दी गयी थी। लवली ने घर आते ही चंडीगढ़ और दिल्ली में सूचना दे दी थी। पिंकी के पापा और मामा दोनों का मानना था कि टीवी धारावाहिक का काम वह न संभाल पा रही थी और वहीं कुछ हुआ था। उन्होंने मुझसे भी बात की थी। मैंने भी कहा था कि यही कारण हो सकता था।( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे, यहीं पर ...)
Sunday, June 20, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -78
टू स्टेट्स - एक नई कहानी
( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे...
( ७८ ) मैं इन्द्राणी के आने की टोह लेने लगा था। हालांकि जानता था कि वह स्कूल की ड्यूटी समाप्त कर शाम को ही आ पायेगी। मैं पिंकी के पास बैठा हुआ था। मैंने उसकी ओर ऐसे देखा कि मानों पूछना चाहता था कि अब वह कैसा महसूस कर रही थी ? उसने मुझे देख कहा, ' आप बहुत चिंतित दिख रहे हो...मैं बिलकुल ठीक हूँ...मुझे अपने काम पर जुट जाने दो तो समझ ही न पाओगे कि मैं कल तक हॉस्पिटल में थी...' वह हंस रही थी। मैंने कहा, ' अपने काम को तुम भूल नहीं पा रही हो... इतना सब कर के क्या पाओगी...हाई सैलेरी ? उसने कहा, ' सैलेरी मुझे कभी भी आकर्षित नहीं कर पायी है...धन जो दे सकता है, उसके लिए मेरे पापा और मेरे मामाजी हैं न...उन्होंने कभी भी मेरी इच्छाओं को दबने नहीं दिया है...और नानक बाबा की ऐसी कृपा है कि मेरी इच्छायें कभी भी ऊँची उड़ानों की मोहताज़ नहीं रही हैं...हाँ, एक सुख है जो अपने काम में सफल होने पर मुझे मिलता है...बस यही सुख है जो मुझे अपने काम, अपने दायित्व की ओर खींचता है...' मैंने कहा, ' यह जिसे सुख कह रही हो न, एक लालसा है कि नाम कमाना है, सबको पीछे छोड़ आगे बढ़ जाना है... प्रतिष्ठा और लोकप्रियता ... ऐसा सोचना भी सही नहीं है...देखो, डॉक्टर ने तुम्हें तनाव मुक्त रहने को कहा है...काम में जुट जाओगी तो यहाँ-वहाँ तनाव आएगा ही...तुम आराम करो...बाकि सब मुझ पर छोड़ दो...' वह मुस्कुराने लगी मानों कह रही हो कि तुम मेरा कितना ख्याल रखते हो। अब मैं भी मुस्कुराया और माहौल को सहज करते हुए मैंने कहा, ' आज बुआजी आ रही हैं, तुमसे मिलने...' पिंकी ने इठलाते हुए कहा, ' अच्छा, फिर तो इन्द्राणी दीदी भी आएगी...चलो, उनके लिए बाहर से कुछ खास मंगवाते हैं...बुआजी को क्या पसंद है ? मैंने कहा, ' तुम चिंता न करो...मैं सब कर लूंगा, तुम केवल स्ट्रेस फ्री रहने की कोशिश करो...' वह हूँ...कह कर बैठ गयी फिर बच्चों की तरह जिद्द करने लगी कि बताओ, बुआजी को क्या क्या पसंद है ? मैंने कहा, ' वह तो सब कुछ पसंद करती हैं, हाँ, उन्हें एक खास दुकान की गुड़ की मिठाई बहुत पसंद है, वह मैं ले आऊंगा और इन्द्राणी तो फिश फ्राई की शौकीन है...बस हो जायेगा...' उसने कहा, ' ठीक है परन्तु कुछ पेस्ट्रीज और किसी अच्छी दुकान से गुजराती ढोकला भी ले आना...थोड़ी वेरायटी होनी चाहिए...' मैंने कुछ न कहा पर मन में सोचा ये ढोकला भी कोई खाने की चीज है ? मैं घर से बाहर निकल आया था।
एक बार फिर से सोचने लगा था कि न जाने जब इन्द्राणी आएगी तो क्या होगा ? मेरा मस्तिष्क मुझे भरोसा दे रहा था कि सब ठीक रहेगा और वे लोग पिंकी का हालचाल पूछ चले जायेंगे। सब सामान्य हो जायेगा और ये जो मेरे मन की भटकन है, वह भी समय के साथ स्थिर होती चली जाएगी। शाम को पिशी और इन्द्राणी समय से आ गए थे। यहाँ-वहाँ की बातें चल रही थी इन्द्राणी अपने सामान्य स्वरुप में थी। वह एक कमरे से दूसरे कमरे में चहलकदमी कर रही थी। मैं उसके सामने आने से कतरा रहा था। वह पिंकी से औपचारिक बात कर दूसरी ओर निकल गयी थी। पिशी काफी समय तक पिंकी के पास बैठी रही थी। जब बिशाखा चाय लेकर आयी तो उसने सभी को वहां बुला लिया था। पिंकी माँ के बड़े पलंग पर ही आराम कर रही थी। माँ ने कहा कि सभी यहीं बैठकर चाय पीते हैं। माँ और पिशी पिंकी के दायें-बायें बैठी थी। इन्द्राणी पलंग के दूसरे छोर पर बैठ गयी थी। मैं और मेरे बाबा कोने में रखी दो कुर्सियों पर बैठे थे। मेरे भीतर बैठे भय और शंका को ऐसा लगा मानों कोई खेल होने जा रहा था और बिसात बिछी गयी थी। खिलाड़ी तो दो ही थे। मैंने इन्द्राणी की ओर देखा। वह खिलखिला रही थी। वह अपने सामान्य स्वरुप में थी। पिंकी भी प्रसन्न थी। उसके हाथ में मोबाइल था। शायद उसे किसी के कॉल की प्रतीक्षा थी या मैं ही ऐसा सोच रहा था और चाहता था कि माहौल किसी अन्य विषय की ओर चला जाये। मुझे लगा कि यदि पिंकी के मामाजी का फोन आ जाये तो वह अपने जोक्स और हल्की बातों में सभी को बहा ले जायेंगे।
पिशी ने कहा, ' हमारा अभिजीत तो अपनी पत्नी के लिए सब कुछ भूल गया है... लगता है यही बीमार था...' माँ ने हाँ मिलाते हुए कहा, ' यह बात तो सही है...ये बात अच्छी भी है...पत्नी की फ़िक्र तो हर पति को करनी ही चाहिए...मैं तो इसे प्रोत्साहित करती रहती हूँ...नर्सिंग होम में रात के लिए हम लोगों ने एक अलग नर्स की व्यवस्था कर दी थी परन्तु इसे मैं रात में वहीं रहने के लिए भेज देती थी...तीन रात इसने वहाँ की बेंच पर काटी हैं...' पिशी ने चौंकते हुए कहा, ' पर हमारी बहू माँ भी तो अपने पति का ख्याल रखती है...वह कहाँ उसे बेंच पर सोने देती...वह इसे घर जाकर आराम से सोने को भेज देती थी...' अब माँ के चौंकने की बारी थी। उन्होंने मुझे देखते हुए कहा, ' अरे, तुम तो घर आते न थे तो कहाँ चले जाते थे ? मैंने कुछ न कहा परन्तु पिशी ने कहा, ' जायेगा कहाँ ? सोने के लिए मेरे घर आ जाता था...' माँ हैरान थी, ' ये क्या बात हुई ? मुझे तो पता ही नहीं...' पिंकी ने भी मेरी और देखा। वह भी हैरान थी। माँ ने फिर से हैरानी जताते हुए कहा, ' रात के लिए तो यह थर्मस में चाय भी ले जाता था...सुबह जब आता था तो मैं समझती थी कि नर्सिंग होम से आया है और शायद ठीक से नींद नहीं हुई है...अगर नर्सिंग होम में नहीं सोना था तो अपने घर में आ जाना चाहिए था...पिशी का घर तो दूर भी पड़ता है...वहां क्या करते थे...' इन्द्राणी ख़ुद में मंद मंद मुस्कुरा रही थी। अब उसने कहा, ' यहाँ अकेले क्या करता, मनप्रीत तो थी नहीं ? वहां तो मैं थी...' उसकी बात में एक तरह का कटाक्ष था। उसने पिंकी की ओर इस अंदाज़ से देखा मानों कह रही हो, ' तुम गौरी हो, अच्छी कद काठी की हो, सुन्दर और पढ़ी-लिखी हो, कामकाज में स्मार्ट हो...परन्तु जादू तो मेरे पास है...बंगाली जादू का नाम सुना है न, काला जादू ? पिंकी से उसकी आँखे मिली तो दोनों में एक मूक संवाद सा हो गया था। पिंकी ने अब मेरी ओर देखा। उन दोनों के मूक संवाद में अब मैं भी शामिल था। किसी को कुछ कहने की आवश्यकता न रह गयी थी।
सामान्य बातें चलती चली जा रही थी। माँ, पिशी न जाने क्या क्या बातें कर रहे थे। हम तीनों खामोश थे। इन्द्राणी का चेहरा किसी विजयी की तरह चुलबुला रहा था। पिंकी अचानक अस्वस्थ सी दिखने लगी थी जैसे डॉक्टर ने किसी गंभीर बीमारी की जानकारी दे दी हो। मैं अपने चेहरे को बिना देखे, पढ़ पा रहा था। एक अपराधी भाव था जो खुद को निर्दोष दिखाने की कोशिश में था या यह दिखाना चाह रहा था कि सब सामान्य था। मैं चाहता था कि पिशी और इन्द्राणी अब प्रस्थान कर जाएं। मैं कमरे से बाहर निकल आया था। मेरे पीछे इन्द्राणी भी आ गयी थी। मैं नहीं चाहता था कि वह मेरे साथ नज़दीकी दिखलाये। पिंकी ने भी उसे मेरे पीछे जाते हुए देखा और कुछ आशंकित सी दिखी। मैं बालकॉनी में जा खड़ा हुआ। इन्द्राणी ने पीछे से आ मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ' क्या हुआ, ऐसे घबराये हुए क्यों हो ? मैंने कहा, ' ऐसी तो कोई बात नहीं है...' उसने कहा, ' मुझे इन बातों का अनुभव है... मैं तुम्हारी मानसिकता समझ पा रही हूँ... कुछ नहीं हुआ है, खुद को सामान्य रखो...' मैंने उसे घूमकर, गुस्से से उसकी ओर देखा और कहा, 'तुम सामान्य व्यवहार क्यों नहीं कर रही, मेरे पीछे आ गयी हो ? इन्द्राणी ने जवाब नहीं दिया और कमरे में लौटकर पिंकी के पास जा बैठी थी। उसके चेहरे पर नाराज़गी थी। उसने बनावटी हँसी दिखाते हुए, पिंकी का हाथ पकड़ लिया और बोली, ' चिंता मत करो मनप्रीत, जीवन में बहुत कुछ होता रहता है पर वह चलता रहता है...तुम तो समझदार लड़की हो...अभिजीत भी समझदार लड़का है...' पिंकी चुपचाप उसकी बात सुनती रही। मैं बालकॉनी एक कोने से दोनों को देख पा रहा था और समझने की कोशिश कर रहा था कि इन्द्राणी की बात का पिंकी पर कैसा प्रभाव होता है।
( आज बस, गुरुवार को आगे, यहीं पर ... )
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -77
टू स्टेट्स - एक नई कहानी
( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ..
( ७७ ) अगले दिन पिंकी को नर्सिंग होम से मुक्ति दे दी गयी थी। वह बहुत प्रसन्न थी कि फिर से अपने काम में जुट सकेगी। मुझे डॉक्टर ने कहा था कि यद्यपि बहुत अधिक चिंता की बात तो न लगती थी परन्तु रिपोर्ट्स में न्यूरो समस्या की ओर इशारा था। डॉक्टर ने कहा था कि उसे स्ट्रेस और किसी भी तरह के तनाव से दूर रहना होगा साथ ही तीन माह बाद चेकअप भी करवाना होगा। ये चेकअप नियमित रूप से आगे भी चलेगा। कुछ दवाइयाँ भी दी गयी थी। मैंने माँ और बाबा को यह सब बताया तो वे भी चिंता में आ गए थे। लेकिन पिंकी सामान्य थी। उसने कहा, ' हमारे देश के डॉक्टर्स किसी को भी भयभीत कर देने में खासी महारत रखते हैं...मैं अपने काम में व्यस्त हो जाऊँगी तो सब ठीक जायेगा... अगली रिपोर्ट एकदम नार्मल होगी...' माँ ने उसकी बात में हां मिलायी और कहा, ' सब कुछ ठीक है हमारी बहू माँ में...बेवजह चिन्ता करना ठीक नहीं होता...इस तरह की समस्या तो हम सभी के साथ होती रहती हैं...'
माँ और मैं जब पिंकी को नर्सिंग होम से लेकर आ रहे थे तो उसकी देखभाल करने वाली दो सिस्टर भावुक हो गयी थी। वे और कुछ अन्य स्टाफ पिंकी के पास आ गए थे। लगता है पिंकी ने अपनी जिंदादिली से उन सबका मन जीत लिया था। ये दोनों सिस्टर देश के नार्थ-ईस्ट क्षेत्र की प्रतीत हो रही थी। मैंने अक्सर महसूस किया है कि पर्वतीय क्षेत्रों से आयी ये लड़कियाँ, सेवा भाव से भरपूर होती हैं। इनके योगदान को हम बड़े शहरों वाले पहचान ही नहीं पाते। एक सिस्टर ने सामने आकर स्नेह से पिंकी के हाथ पकड़ लिए। उसने कहा, ' हम लोग तो ऐसा काम करते हैं कि किसी को ‘ फिर आना ‘ नहीं कह सकते परन्तु आपने हमारा दिल जीता है ... पूरी तरह से ठीक हो जाने पर हम बहनों से कभी मिलने आ जाना...' पिंकी भी इस बात पर भावुक हो गयी थी। उसने प्यार से दोनों को गले से लगा लिया और कहा, ' तुम दोनों को तो मैं कभी भी न भूल सकूँगी... मेरी छोटी सिस्टर चंडीगढ़ में है परन्तु यहाँ मुझे उसके बदले तुम दो मिल गयी हो... जरूर मिलने आऊँगी, वैसे भी एक सप्ताह बाद मुझे चेकअप के लिए आना ही है...सब अपना ख्याल रखना...' पिंकी ने एक दिन पहले मुझ से चॉकलेट के कुछ डिब्बे मंगवाये थे, उसने वे सब में बांटे थे । माँ उसके इस अंदाज़ से बहुत प्रभावित थी। मेरी मनस्थिति तो विचलित थी। मैं एक ओर खड़ा था और झुँझला रहा था कि क्यों पिंकी बेकार में स्नेह लुटा, आदर बटोर रही थी। इन नर्सिंग होम वालों ने अपना काम किया था और हमने उसका पैसा दिया था, बस। मैंने कहा, 'अब चलो, देर हो रही है...' मेरी इस बात पर पिंकी हंसने लगी। उसने उन लड़कियों की ओर देखते हुए अंग्रेजी में कहा, ' मेरे से ज्यादा तो मेरे हस्बैंड की तबीयत ख़राब लगती है...ऐसा लगता है मैं नहीं बल्कि ये इलाज करवा कर घर जा रहे हैं...' इस बात पर वे दोनों मुस्कुरा दी थीं।
बिशाखा स्वागत के लिए द्वार पर ही खड़ी थी। शांतु की पत्नी भी वहीं थी। पिंकी ने दोनों को स्नेह से आलिंगन में ले लिया था। बिशाखा उसे सहारा दे कर अंदर ले जाने लगी तो पिंकी ने कहा, ' ऐसी गम्भीर बीमार नहीं हूँ... सब ठीक है...ऐसा करोगी तो सच में बीमार हो जाऊँगी...' वह माँ के बिस्तर पर बैठ गयी और उसने बिशाखा से कहा, ' दीदी, एक कप कड़क चाय पीला दो...वहाँ की चाय तो पूछो मत क्या थी, जो भी थी पर चाय तो न थी...' माँ भी उसके पास ही बैठी थी। वह खुश दिख रही थी कि उनकी बहू सकुशल घर आ गई थी। किन्तु वह दो-तीन बार यह चुकी थी कि मनप्रीत को आराम चाहिए और अभी उसे कम से कम एक सप्ताह छुट्टी लेनी होगी। उन्होंने डॉक्टर की सलाह की बात भी उठायी थी। पिंकी लेकिन बेफिक्र थी जैसे कुछ हुआ ही न हो। मैं चुपचाप था। एक अपराधी का दोष-भाव था जो मुझे सामान्य नहीं होने दे रहा था। पिंकी ने मुझे बुलाया और कहा कि चंडीगढ़ में फोन कर बता दूँ कि सब ठीक है और मैं घर आ चुकी हूँ। उसने मुझे शांत देखा तो कहा, ' अरे मैं बिल्कुल ठीक हूँ, चिंता मत करो...आज बिशाखा से कहकर मनपसंद मछली बनवाते हैं और लंच एन्जॉय करते हैं...' मैंने चंडीगढ़ में फोन किया और पिंकी की मम्मी को सब खबर दी। वह बहुत संतुष्ट थी कि उनकी बेटी कुशल और स्वस्थ थी। उन्होंने बार बार मेरा भी धन्यवाद दिया कि मैंने पिंकी का इतना अच्छे से ख्याल रखा था। वह कह रही थी कि नानक बाबा का आशीर्वाद था कि उनकी बेटी को इतना अच्छा ससुराल और पति मिला था। मैं ख़ामोशी से उनकी बातें सुन रहा था। मैंने अंत में कहा, ' मामाजी को भी सब बता देना...' कुछ ही समय में मामाजी का फोन आ गया था। वह भी संतुष्ट थे परन्तु नाराज़ थे कि मैंने उन्हें फोन क्यों न किया था ? मैंने उनसे अधिक बात न की थी और पिंकी को फोन पकड़ा दिया था। लवली का भी फोन आया था। वह तो चहक रही थी। उसने कहा, ' जीजू, यू आर ग्रेट... मन करता है अभी उड़कर आप से मिलने आ जाऊँ... ' उसके साथ भी मैं सामान्य न हो पा रहा था। मैंने कहा, ' जब तुम्हारा मन करे, आ जाना... तुम्हारी बहन भी खुश हो जाएगी...' मैं सामान्य होने का प्रयास करता रहा था किन्तु हो न पा रहा था। शायद लवली भी फोन पर ही मेरी असुविधा देख पा रही थी। उसने कहा, ' आप तो अभी तक चिंता में लग रहे हो...जीजू, आप पिंकी के लिए इतना सोचते हो...लव यू जीजू... मैं पिंकी से नहीं आप से मिलने आऊँगी...मैं कलकत्ता आने का प्रोग्राम बनाती हूँ...सब से मिलने को तरस रही हूँ...मुझे पूरा कलकत्ता घूमना होगा और ख़ूब खिलाना-पिलाना होगा ...’
वह दिन यूँ ही बीत रहा था। पिंकी बार बार झपकी ले लेती थी। मैं भी यहाँ-वहाँ हो रहा था। इन्द्राणी का फोन आया और उसने बताया कि वह अपनी माँ के साथ कल पिंकी से मिलने आएगी। उसके पिंकी से मिलने की बात पर बेचैनी हुई थी। मैं केवल यही कह पाया था,' ठीक है...' मुझे उसके आने की और पिंकी से मिलने की प्रतीक्षा होने लगी थी। मैं अपने भीतर ही सिमटा जा रहा था। क्या मुझे इन्द्राणी से, उसके यहाँ आने से पहले मिल लेना चाहिए ? क्या मुझे उसे समझाना चाहिए कि वह अभी पिंकी से न मिले ? क्या वह मेरी बात, मेरी मनस्थिति समझ पायेगी ? प्रश्न थे जो मेरे पीछे दौड़ते आ रहे थे। उत्तर तो कहीं न थे। मेरे दिमांग ने मुझे समझाना चाहा कि इन्द्राणी बहुत समझदार थी और परिस्थिति के अनुसार व्यवहार करने में कुशल थी। वह सब संभाल लेगी और कुछ भी अप्रिय न होने देगी।
( आज यहीं तक, गुरुवार को इससे आगे, यहीं पर )
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -76
टू स्टेट्स - एक नई कहानी
( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ..
( ७६ ) घर का दरवाजा इन्द्राणी ने ही खोला था। मुझे देख वह ऐसे मुस्कुराई, मानो वह कुछ ऐसा कहने का प्रयास कर रही हो कि उसे पूर्ण विश्वास था कि मैं आऊँगा ही । उसने माँ को आवाज़ दी और कहा, ' माँ, अभिजीत आया है...' पिशी रसोई घर से सामने निकल आयी और हाथ पोंछते हुए कहा, ' अब कैसी है हमारी बहू माँ...' मैं कुछ उत्तर देता इससे पहले ही उन्होंने स्वयं ही उत्तर दिया, ' सुना है अभी डॉक्टरी निगरानी में रहना होगा...' अब मैंने हां कहा और न जाने क्यों अपनी ओर से बात बढ़ाते हुए कहा, ' वह नहीं चाहती कि मैं नर्सिंग होम में रात काटूँ...दिन भर उसके पास रहता हूँ...वह अब ठीक है...दो रात की बात है फिर घर आ जाएगी...' पिशी ने हां में सिर हिलाया और कहा, 'अच्छा, बहू माँ अब कुछ बांग्ला भी बोल पाती है... मुझे पिशी कहती है या अपनी भाषा में बुआ ? मैंने कहा, ' बोलने का प्रयास तो करती है और कुछ शब्द सीख भी गयी है परन्तु आपको तो बुआ ही कहती है...' पिशी मुझे आराम करने का कह कर, रसोई घर में चली गयी। इन्द्राणी ने एक ख़ास अन्दाज़ में मुझसे पूछा, ' खाना खाओगे ? मैंने कहा, ' खाना खा लिया है...पर इस थर्मस में चाय है, वह पी लूँगा...' इन्द्राणी ने कहा, ' मेरे कमरे में चलो, मैं कप और साथ में कुछ खाने का लेकर आती हूँ...' इन्द्राणी कुछ समय बाद कमरे में आयी थी। उसके हाथ में एक बड़ी ट्रे थी। मैं संकोच कर रहा था और अपने में ही सिमटे जा रहा था किन्तु इन्द्राणी सामान्य दिख रही थी। उसने कहा, ' आज होटल से खाना मंगवाया गया था...माँ ने खा लिया है किन्तु मैंने नहीं खाया...चलो तुम भी मेरे साथ कुछ शेयर लो...' मैं तो कुछ भी बोल पाने की स्थिति में न था। इन्द्राणी ने एक प्लेट में कुछ परोसा और मुझे पकड़ाते हुए कहा, ' इस तरह घबराए हुए क्यों हो ? हम दोनों बचपन के साथी और दोस्त हैं, तुम एक शिक्षित युवक हो, जो हुआ है उसके बारे में तुम्हारे मन में स्पष्ट दृष्टिकोण होना चाहिए...ऐसा हो जाना स्वाभाविक होता है ... किसी साधारण युवक सा मत दिखो...मुझे अच्छा नहीं लगता...’ अब मैंने उसकी ओर देखा और कहा, ' जो हुआ, वह होना तो नहीं चाहिए था...' इन्द्राणी ने अपनी प्लेट में से फिश फ्राई का एक टुकड़ा उठाया और मेरी प्लेट में रखते हुए कहा, ' तुम ये खा लो... मैंने शाम को ही खाया है...' उसने मेरी बात के उत्तर में कहा, ' ये चाहिए या नहीं चाहिए की बात नहीं है...हम बहुत कुछ चाहते हैं जो नहीं होता और अनजाने ही वो जाता है जो नहीं चाहते... ये सब अपने आप में स्वाभाविक प्रक्रिया है...' मैंने कहा, ' जिसे सामाजिक स्वीकृति नहीं वह स्वाभाविक कैसे हो सकता है ? इन्द्राणी को मैं हमेशा से बौद्धिक स्तर पर खुद से श्रेष्ठ मानता रहा था। उसने कहा, ' सामाजिक स्वीकृति या अस्वीकृति एक कृत्य है जिसे हम स्वयं ही बनाते हैं और अपनी सुविधानुसार उसमें परिवर्तन भी करते रहते हैं...जो कल तक अस्वीकृत था, आज स्वीकृत हो सकता है...' इन्द्राणी ने मेरी ओर ऐसे देखा मानो मेरी प्रतिक्रिया जानने की कोशिश कर रही हो। मैं उसके साथ दृष्टि न मिला पा रहा था। मैंने कहा, ' तुम सदैव से ही हमारे परिवार में गुणी और बुद्धिवान जानी जाती हो...तुम्हारी बातों में किसी को भी सहमत करा लेने की क्षमता है...' हम दोनों अब चुपचाप खाना खा रहे थे। अचानक इन्द्राणी उठी और उसने टीवी ऑन कर दिया। समाचारों का प्रसारण हो रहा था। तत्कालीन मुख्यमंत्री किसी विषय पर विचार रख रहे थे। वह कह रहे थे कि राज्यों की स्वायत्ता पर किसी भी तरह का आघात उन्हें स्वीकार न होगा। यह वह समय था जब पश्चिम बंगाल राज्य में वाम फ्रंट की सरकार थी और केंद्र सरकार के साथ एक तनाव सा बना रहता था। उन दिनों मैं और मेरी उम्र के अनेकों युवा किसी नई सोच और नई व्यवस्था के स्वपन में जी रहे थे। हमें लगता था कि यह जो आर्थिक और पूंजीवादी शक्ति थी वह हमारे सपनों को साकार न होने दे रही थी। मैंने इन्द्राणी की ओर देखते हुए कहा, ' हम बंगालियों के सामाजिक समता के सपने न जाने कब पूर्ण होंगे ? इन्द्राणी मुस्कुरायी और उसने कहा, ' सामजिक और आर्थिक समानता एक स्वपन है जो हमेशा स्वपन ही रहेगा... यह पूर्ण तो कभी न होगा किन्तु समाज में एक तरह का विद्वेष बनाये रखेगा...' मैंने कहा, ' शायद हमारा प्रदेश कुछ कर दिखाए...नया नेतृत्व है...' इन्द्राणी मुस्कुराई और मुझे देखते हुए कहा, ' नया कुछ नहीं है, एक नया रंग है जो वक्त के साथ पुराने रंग में ही घुलमिल जायेगा... अच्छा, खा लिया हो तो प्लेट दो, मैं रखकर आती हूँ...' वह बाहर गयी और कुछ समय बाद आयी। उसके हाथ में पान था । उसने कहा, ‘ पान खाओगे ? मेरा उत्तर सुने बिना ही उसने दाँत से आधा काट लिया और आधा मेरे मुँह में डाल दिया। पिशी भी साथ थी। वह यह देख हँसने लगी। टीवी चल रहा था। उन्होंने कहा, ' ये दिल्ली वाली सरकार हमें कुछ करने न देगी...हमारे मुख्यमंत्री जो भी करें ये लोग उसी पुराने तरीके से रोड़े अटकाते रहेंगे...' पिशी की इस बात पर मैंने इन्द्राणी की ओर देखा तो वह हँसते हुए बोल उठी, ' अरे, मेरी माँ तो पक्की कम्युनिस्ट समर्थक है...ज्योति बसु तो उसके लिए उत्तम कुमार के सामान एक हीरो हैं...'
इन्द्राणी के कमरे में आज बिस्तर पर एक नयी चादर बिछी हुई थी। कमरा कुछ अधिक व्यवस्थित भी लग रहा था। बिस्तर के साथ लगी छोटी टेबल पर पानी से भरा जग और दो गिलास रखे हुए थे जो कल न थे । तकिये पर एक इंग्लिश पुस्तक रखी थी। मैंने उसे उठाया। यह उपन्यास था। मैंने इसके बारे में स्थानीय अंग्रेज़ी समाचार पत्र में पढ़ा था कि यह प्रेमकथा आधारित उपन्यास कैसे विश्व प्रसिद्द हो रहा था और बेस्ट सेलर की श्रेणी में आ गया था। मुझे पुस्तक को देखते हुए देख, इन्द्राणी ने कहा, ' मैंने पढ़ लिया है... अच्छा उपन्यास है, तुम ले जाना...' मैंने कहा, ' ये इंग्लिश के पेपरबैक हमारे बांग्ला उपन्यासों का क्या मुकाबला करेंगे...बांग्ला साहित्य सर्वश्रेष्ठ है...' मैंने पुस्तक को एक ओर रख दिया था। हम दोनों लेटे-लेटे यहाँ-वहाँ की बातें करते रहे परन्तु मन था जो बातों से दूर कुछ और ही सोच रहा था। कुछ समय बाद जब इन्द्राणी ने लाइट ऑफ की तो बरबस दोनों एक-दूसरे में सिमट गए। मुझे ऐसा लगा कि यह कल वाली ही रात थी जो अधूरी रह गयी थी। मैंने हल्के से यह बात इन्द्राणी के कानों में कही तो वह खिलखिलाई और उसने कहा, ' एक रात और है...इस रात को कल तक और ले चलना...उसके बाद तो तुम्हारा घर संसार मेरा अपना संसार ...’ मैंने कुछ न कहा किन्तु मेरी ख़ामोशी ने उसकी बात में हाँ मिलायी ही थी। सच अगले दिन भी मैं, चाय भरी थर्मस के साथ वहां फिर से पहुँच गया था। पिशी ने मुझे देखा तो कहा, ' बहू माँ तुम्हारी सुविधा-असुविधा का कितना सोचती है...वहां नर्सिंग होम में ठीक से सो न पाओगे, इसलिए तुम्हें यहाँ भेज देती है...ईश्वर उसे स्वस्थ रखे...कल तो घर आ ही जाएगी...उसे लेकर यहाँ मेरे घर आना...'
( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर )
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -75
टू स्टेट्स - एक नई कहानी
( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ..
( ७५ ) मैं शाम को तैयार हो रहा था कि बिशाखा ने मुझे चाय से भरी हुई थर्मस पकड़ा दी थी। वह जानती थी कि मैं रात को नर्सिंग होम में रहूँगा। उसने मुझे शान्त और चिंतित देखा तो कहा, ' अरे ! तुम तो दो दिन में ही इतने दुर्बल हो गए हो...पत्नी के प्रति ऐसा प्रेम तो इन दिनों यदाकदा ही देखने को मिलता है... सौभाग्यशाली है हमारी बहू माँ...’ वह हाथ जोड़कर ईश्वर से प्रार्थना करने लगी कि वह मुझे सामर्थ्य दे और मेरी पत्नी को स्वस्थ कर दे। नर्सिंग होम पहुँचने से पहले ही इन्द्राणी का फोन आ गया था। वह सब हालचाल पूछ रही थी। उसकी बातों से ऐसा लग रहा था कि वह सामान्य थी मानो हम दोनों के बीच जो हो गया था वह स्वाभाविक था और उसमें कुछ भी ऐसा न था जो विचलित कर दे। इस ओर से मैं तो केवल सुन रहा था। उत्तर के लिए मेरे पास केवल हूँ और हाँ दो शब्द ही रह गए थे। उसने कहा, ' नर्सिंग होम की वो बेंच तो आज भी वैसी ही होगी, तुम संकोच मत करना और यहाँ अपनी पिशी के घर ही आ जाना...' मैंने अब भी कुछ न कहा था।
पिंकी अब कुछ हद तक अपने स्वाभाविक स्वभाव में आ चुकी थी। मुझे देख उसके मुख पर मुस्कान आ गयी थी। परन्तु जो मेरे मुख पर आयी थी उसे मैं देख तो न पा रहा था परन्तु महसूस कर पा रहा था। मुस्कान के नाम पर जो मेरे मुख पर थी, वह एक झेंप थी। पिंकी ने बताया कि उसने अपने पापाजी और मामाजी के साथ बात कर ली थी। दोनों बहुत संतुष्ट थे और मामाजी तो मेरे प्रति कृतज्ञ थे और ऐसा दामाद मिलने पर रब का शुक्रिया कर रहे थे। उसने कहा कि वे दोनों तो कलकत्ता आना भी चाहते थे परन्तु उसने ही मना कर दिया था। पिंकी ने यह भी बताया कि देवयानी भी उसकी स्वस्थता देख प्रसन्न थी। उसने तो आगामी सप्ताह के बाद से एक शूटिंग का नया शिडूल भी बना लिया था। उसके होटेल वाले भी संतुष्ट थे और चाहते थे कि वह जल्द ही अपना काम ज्वाइन करे। उसकी हर बात पर मैं केवल धीमा सा मुस्कुराता रहा था। मुझे लगा कि अभी वह माँ के साथ उनके महिला आयोग वाले काम, सुबह की संगीत क्लास और जॉगिंग और केडिया भाभी की बात भी करेगी। शायद वह करना भी चाहती थी। उसकी केडिया भाभी और भैय्या उस से मिलने भी आये थे और शायद बहुत सी बातें छोड़ गए थे जो वह मेरे साथ साझा करना चाहती थी। अपने आसपास बन चुके इस स्नेह-चक्र से वह खुश थी। उसने बात को आगे बढ़ाया, ' यहाँ से निकलने के बाद पहला काम जो करना है, वह है बेलूर मठ जाना, बंगाली होटल में मछली वाला लंच और एक अच्छी बंगाली मूवी...इस सब के बाद कुछ और देखा जायेगा...क्यों ठीक है न ' वह उस दिन की मेरी नाराज़गी को दूर करना चाह रही थी। मैं अपनी यथास्थिति में था। केवल इतना कहा, ' हाँ सब हो जायेगा...' वह इन दिनों की अपनी चुप्पी और व्यथा को पूरी तरह से समाप्त कर देना चाहती थी। उसने कहा, ' लवली कुछ दिनों के लिए मेरे पास आना चाहती थी तब आपने कहा था कि अभी नहीं बाद में, सोच रही हूँ उसे अब आ जाने को कह दूँ... मैं भी उससे मिलने को तरस रही हूँ...ऐसा करते हैं ये बेलूर मठ वाला कार्यक्रम अभी स्थगित कर देते हैं, लवली को तो वहां ले जाना ही होगा... उसके साथ ही जायेंगे...' वह हंसने लगी और बात बढ़ाते हुए उसने कहा, ' परन्तु ये बंगाली लंच और मूवी वाला कार्यक्रम तो जरूर होगा...ऑफिस ज्वाइन करने से पहले ही...काम में फँस गयी तो ये फिर से अटक जायेगा...' मैं तो बोल ही न रहा था।अचानक मुझे मेरे मस्तिष्क ने सचेत किया कि मेरी ख़ामोशी कहीं अस्वाभाविक न दिखे, मुझे कुछ न कुछ तो बोलना चाहिए। मैंने कहा, ' कल डॉक्टर मेरे जाने के बाद फिर से आये थे, कुछ कहा उन्होंने ? पिंकी ने कहा, ' आये थे परन्तु बात वही थी कि अभी मुझे यहाँ ऑब्ज़र्वेशन में रहना होगा... न जाने क्या देखना चाहते हैं...उनका आने का समय हो चला है... आप ही बात कर लेना...' मैंने कहा ठीक है। मैंने देखा कि उसके बिस्तर के दूसरी ओर रखी छोटी टेबल पर फूलों के गुच्छे रखे थे। मुझे उत्सुकता हुई और मैंने उस ओर जाकर देखा। तीन सुंदर बुके रखे थे। एक पिंकी के ऑफिस की ओर से था और दूसरा केडिया भाभी की ओर से और तीसरा बिना नाम से था। शायद धारावाहिक के प्रॉडशन हाउस की तरफ़ से था। कुछ कार्ड्स भी थे जिनमें उसके सुस्वास्थ्य की कामना की गयी थी। मुझे आश्चर्य हुआ कि पिंकी के इतने शुभ चिंतक बन चुके थे। एक कार्ड में सुस्वास्थ्य की कामना के साथ साथ मिलने का निमंत्रण भी था। ये शायद ऑफिस के किसी साथी का था।
मैंने बेंच को थोड़ा व्यवस्थित करने का प्रयास किया तो पिंकी बोल उठी, ' अरे, घर जाकर आराम से सोना...यहाँ बेवजह परेशान होगे...यहाँ रहे तो बिमार हो जाओगे... कल ही तो बात हुई थी कि रात को चले जाओगे और सुबह आ जाओगे...' मैंने कहा, ' नहीं, यहीं ठीक है...माँ भी चाहती है कि रात तुम्हारे साथ रहूं...' उसने कहा कि माँ की चिंता स्वाभाविक थी परन्तु ऐसी कोई बात नहीं थी और मुझे घर चले जाना चाहिए था। मैं खामोश था। पिंकी ने कहा कि थर्मस की चाय को दोनों मिलकर समाप्त कर लेते हैं । मैंने पिंकी के कप में चाय ढाली और साथ रखे गिलास में अपने लिए ले ली। थर्मस में अभी भी चाय बाकी थी। पिंकी ने अपने बचपन की एक कहानी सुनाई कि कैसे जब वह बीमार हो गयी थी और उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। जब उसे अस्पताल ले जा रहे थे तो वह ऐसे रोमांचित और खुश थी मानो कि जैसे किसी बड़े होटल में रहने जा रही हो। वह हँस रही थी कि डॉक्टर ने प्रवेश किया। डॉक्टर ने देखा तो मुस्कुराते हुए कहा, ' क्यों मिसेज रॉय, आज तो फिट दिख रही हैं... परन्तु घर जाना तो दो दिन बाद ही होगा...' डॉक्टर ने बताया कि न्यूरो रिपोर्ट में थोड़ा सा कुछ ऐसा दिखा है जिसका निवारण करना उचित होगा। उसने यह भी कहा कि कुछ मेडिसिन लेनी होंगीं और आराम करना करना होगा। किसी भी भी तरह की चिंता या तनाव नहीं होना चाहिए। उसने हमें आश्वस्त करते हुए कहा कि यह कोई बहुत गंभीर बात न थी। पिंकी सुन रही थी और मुझे देख ऐसा भाव दिखाया मानों कह रही हो, ' ये तो डॉक्टरों की बातें हैं...वे तो सब कुछ बढ़ा-चढ़ा कर कहते हैं...' डॉक्टर के चले जाने के बाद एकदम यही बात पिंकी ने कही थी। मैं भीतर ही भीतर प्रसन्न था कि मैंने उसकी हँसी में छिपे भाव सही पकड़े थे।
विजिटिंग टाइम समाप्त हो गया था। मैं किसी उलझन में था। मैंने एक बार फिर से उस कमरे में रखी बेंच को व्यवस्थित करने का प्रयास किया। पिंकी ने कहा, ' अरे ! इसे छोड़ो और घर जाकर सोओ...मेरी चिंता मत करो...यहाँ रात काटी तो बीमार ख़ुद ही बीमार हो जाओगे और इस बिस्तर पर सोना होगा...' वह हँस रही थी, ' जाओ, घर जाओ, सुबह आ जाना और न्यूज़ पेपर लेते आना...' मैं उठ खड़ा हुआ और पिंकी की ओर ऐसे देखा जैसे उसका आदेश था सो मान रहा था। मैं थर्मस वाला बैग कंधे पर झुलाये घर की ओर बढ़ चला था। एक गली थी जिसके दायीं ओर मुड़ जाने पर हमारा घर आ जाता था और सीधे बढ़ जाने पर मुख्य सड़क। मैं सीधा बढ़ा और मुख्य सड़क पर आगे आ गया था। अब मैं अनायास ही अपनी पिशी के घर की ओर चला जा रहा था।
( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को, यहीं पर )
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