Chander Dhingra's Blog

Wednesday, July 15, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ' Two States - A New Story ' -24

टू स्टेट्स - एक नई कहानी 
' Two States - A New Story ' 
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चन्दर धींगरा 
Chander Dhingra 
      (२४ )    चंडीगढ़ वापसी की यात्रा में सभी शांत थे। सभी थके और नींद से भरे हुए थे। मैं पिंकी के संग स्वर्णमंदिर में हमारे बीच चल रही बातचीत को आगे बढ़ाना चाहता था परन्तु यहाँ कार में ऐसा माहौल न था। पिंकी खुद भी आँखें मूंद सो रही थी या किसी चिंतन में थी। न जाने मुझे ऐसा क्यों लगा कि मेरी ही तरह वह भी अपने आप से जूझ रही थी। मैं पिंकी को लेकर न जाने क्या-क्या सोचने लग गया था। मैं अपने भीतर एक परिवर्तन सा महसूस कर रहा था। जोगेन्दर अंकल ने कार के भीतर चल रही शांति को तोड़ते हुए कहा, ' ओये .. सभी थक गए हो क्या ?  भई हमें तो ऐसी खामोशी पसंद नहीं है.. '  लवली जो अब तक शांत थी, सबसे पहले बोल उठी, ' पापा, सभी तो आप के जैसे स्ट्रांग नहीं हो सकते हैं.. दिन भर आप हमें इधर-उधर घूमाते रहे हो.. अब जरा आराम कर लेने दो और चुपचाप गाड़ी चलाओ ..'  आंटी ने सलाह दी कि आगे रास्ते में किसी अच्छी जगह रुक कर चाय पियेंगे। चाय के नाम पर पिंकी भी उठ बैठी। ' हाँ, चाय तो पीनी है और हमारे बाबू मोशाय तो चाय-कॉफी के खास शौकीन हैं..' उसने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा। मैंने एक बार बातों-बातों में उसे अपनी चाय-कॉफ़ी की रूचि के बारे में बताया था। मुझे अच्छा लगा कि उसे ये बात याद रही थी। मैंने कहा ' हाँ, चाय तो ऐसे लम्बे ड्राइव में मिलनी ही चाहिए..' अपनी बात को पक्का करते हुए मैंने उन्हें बताया कि जब कभी भी हम कलकत्ता से दीघा के समुद्र तट पर जाते हैं तो बीच रास्ते में एक-दो जगह टी-ब्रेक लेते ही हैं। अंकल ने मुझ से दीघा के बारे में पूछा तो मैंने उन्हें इस सुन्दर सागर तट के बारे में बताया कि कैसे कलकत्ता के लोग यहाँ दो-तीन दिन का विश्राम लेने आते हैं। अंकल-आंटी पुरी-भुवनेश्वर घूम कर आये हुए थे। आंटी ने वहां के अपने ट्रिप के बारे में बताया। उन्हें पुरी का समुद्र तट बहुत सुहाना लगा था। उन्होंने कहा कि जब वे पुरी गए थे तब पिंकी का जन्म नहीं हुआ था। पिंकी तो चुप रही परन्तु लवली ने कुछ जिद सा भाव दिखते हुए कहा कि वो इस दीवाली के समय पुरी जाएगी। अब पिंकी ने भी हाँ मिलायी कि दीघा और पुरी दोनों जगह जाना चाहिए। उसने मेरी तरफ देखकर कहा, ' क्यों ठीक है न ? हमारे गाइड तो आप ही रहोगे..'  एक शरारत भरी मुस्कान उसके चेहरे पर थी। मैंने कहा, ' क्यों नहीं.. तुम लोग जब भी कलकत्ता आओगे  तो..मैं ऑफिस से छुट्टी ले लूंगा, जितने दिन आप लोग वहां रहोगे.. लेकिन वहां पंजाबी खाना नहीं मिलेगा.. बंगाली  मछली-चावल खाना पड़ेगा..' मैं शायद पहली बार इतनी लम्बी बात कह गया था। इस पंजाबी सिख परिवार के साथ जो प्रारंभिक असुविधा हो रही थी, वह धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। दोनों बहनों ने एक साथ प्रतिक्रिया देते हुए जोर से कहा, ' श्योर..' लवली तो एक कदम आगे बढ़ गयी, उसने हँसते हुए कहा, ' फिश-राइस एंड रसगुल्ला... ' मैं भी हँसने लगा। मुझे लगा बंगाल से बाहर लोगों को हमारे बारे में केवल इतना ही पता है। मछली और रसगुल्ला। मैंने सोचा ये वक्त है इनका सामान्य ज्ञान बढ़ाने का। मैंने उन्हें बताया कि बंगालियों के लिए मछली एक ही आइटम नहीं है। तरह-तरह की मछलियाँ और उनसे बने तरह तरह के व्यंजन होते हैं और बंगाली मिठाइयां तो विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। मैंने लवली की ओर देखते हुए कहा, ' कभी बंगाल की दही खाई है ? मैंने कहा तो था लवली को देखते हुए परन्तु मेरे मन में पिंकी थी और उसने मेरी बात को सुना भी। इससे पहले की लवली कोई उत्तर देती वह बोल उठी, ' हाँ मैंने खाई है.. यह सादी सामान्य दही नहीं, मीठी दही होती है.. यह एक तरह का डस्सेर्ट है.. मेरी एक फ्रेंड ने एक बार खिलाई थी...सो यम्मी..'  अपनी मिष्ठी दही की तारीफ मुझे अच्छी लगी परन्तु इसके लिए यम्मी शब्द कुछ अटपटा लगा। हमारी मिष्ठी दही इससे कुछ ऊपर है। मैं सोचने लगा कि ये आजकल का यम्मी शब्द किस बंगाली व्यंजन के साथ जायेगा ? अचानक दिमाग ने साथ दिया कि हमारी आम-खजूर वाली चटनी को यम्मी कहा जा सकता है। मैंने कहा, 'पिंकी, हमारे बंगाल में आम-खजूर की चटनी होती है.. उसे यम्मी कहना सटीक होगा..' वह हँसने लगी। सटीक शब्द उसे अच्छा लगा। बंगाली मिठाइयों को लेकर बचपन में सुनी एक छोटी सी कविता मुझे याद आ रही थी। लगा वो कविता सुना दूँ परन्तु दूसरे ही क्षण लगा कि इन पंजाबी लड़कियों का कविता से क्या सम्बन्ध ? कविता सुनाऊँ और कहीं खुद मैं ही हँसी का पात्र न बन जाऊँ ?

कुछ समय बाद अंकल ने एक ढाबा नुमा जगह पर गाड़ी रोक दी। वो तेजी से उतर टॉयलेट की तरफ दौड़े। मैं भी और बाद में तीनों महिलाएं भी। हल्के हो, हम टेबल पर आकर बैठे और वहां रखे मेनू कार्ड  देखने लगे। आंटी को पहले से ही अंदाज़ा था कि वहाँ क्या-क्या मिल सकता था। उन्होंने चाय और साथ में कुछ स्नेक्स मंगवाया। यहाँ भी मैं यही सोचता रहा कि यदि कभी ये लोग कलकत्ता आएँगे और हम लोग दीघा या कहीं और जा रहे होंगे और ऐसी ही परिस्थिति होगी तो चाय के साथ इन सब के लिए क्या क्या मँगवाऊंगा ? मैं पिछले वर्ष दोस्तों के साथ दीघा गया था। आज मुझे लगा कि यहाँ जैसे हाई वे रिसोर्ट या ढाबे वहां के रास्तों पर क्यों नहीं हैं ?  इन लोगों, विशेष कर पिंकी को वहां कैसा लगेगा ? मैं इन्हें हमारे कलकत्ता के चाइना टाउन के चाईनीज़ रेस्टोरेंट्स में ले जाऊँगा। बालीगंज के मशहूर बंगाली रेस्टॉरेंट में भी ले जाऊंगा। चौरंगी के एक ऊँचे होटल के बंगाली रेस्टॉरेंट में भी जा सकते हैं। मैं सोचता ही जा रहा था कि अंकल ने सबसे गाड़ी में जाकर बैठने को कहा।  'अब चलना चाहिए वरना बहुत देर हो जाएगी..'  उन्होंने आदेश के स्वर में कहा। मैंने देखा कि दोनों लड़कियाँ एकदम से चुपचाप कार में जाकर बैठ गयी। लगभग दो घंटे बाद हम चंडीगढ़ पहुँच गए। मेरा गेस्ट हाउस पहले आता था। मुझे अंकल ने गेट पर उतारा। सभी लोग कुछ समय के लिए कार से उतर आये। अंकल ने मुझे अपना ख्याल रखने को कहा। आंटी ने कहा कि किसी चीज़ की जरुरत हो तो निसंकोच बताना। पिंकी और लवली ने कहा, सत श्री अकाल, गुड नाइट, बाय। मैं दूर जाती उनकी कार को देखता रहा। आगे मोड़ पर जब वह ओझल हो गयी तब मैं गेस्ट हाउस के गेट के भीतर आया। कैंटीन का हॉल खाली पड़ा था और सामान समेटा जा रहा था। कैंटीन के मैनेजर ने पूछा कि आज बहुत देर हो गयी थी। मैंने उसे बताया कि अमृतसर गया था। उसने कहा, ' अच्छा, मत्था टेकने गए थे.. बैठो खाना लगता हूँ ..'  मैंने कहा, ' थोड़ा सा ही देना, ज्यादा भूख नहीं है..'  उसने एक प्लेट में दो गर्म रोटी, दाल, सब्जी और सलाद लगा दिया। मुझे याद आया कि पिंकी ने भी मंदिर में मत्था टेकने की बात कही थी न कि दर्शन करने की। भाव एक जैसा है परन्तु गुरु के सामने माथा टिकाना अधिक आस्था पूर्ण लगता है। 

 खाना खा मैं अपने कमरे में आ बिस्तर पर धम से लेट गया। दिन भर की थकावट थी लेकिन मेरे भीतर चल रहे विचारों का अंत नहीं हो रहा था।  वे तेज प्रवाह से किसी पहाड़ी नदी की तरह  इधर-उधर बिखरे पत्थरों से टकराते हुए, बहे चले आ रहे थे। गुरुद्वारे में लंगर के समय एक बात और हुई थी। लंगर की पंक्ति में बैठने पर, सेवा करने वाले को मैंने एक रोटी देने को कहा था तो उसने मुझे रोटी नहीं ' प्रसादा ' बोलने को कहा था। उसने अतिविनम्रता के साथ कहा था परन्तु मुझे अच्छा न लगा था। बाद में पिंकी ने मुझे सिखाया था कि यह दो हाथों में स्वीकार किया जाता है और इसे प्रसादा कहते हैं। मैंने उस समय उसे बंगाल में साल भर होते रहने वाले तरह-तरह के पूजा आयोजनों और उन अवसरों पर वितरित होने वाले 'भोग' के बारे में बताया था। लेकिन अब मुझे लगने लगा था कि गुरुद्वारे के लंगर में जो श्रद्धा और आस्था का भाव मैंने देखा था वह बंगाल के भोग में नहीं दिखता। साथ ही मैंने स्वयं को एक स्पष्टीकरण भी दे दिया कि यहाँ के लोग अधिक सम्पन्न हैं और वे अधिक धनराशि ऐसे आयोजनों पर दान स्वरुप दे सकते हैं। इसीलिए यहाँ अधिक सुदृढ़  व्यवस्था होती है। याद आया कि नाना ने एक बार मुझसे कहा था कि जो भी काम किया जाये उसे पूर्ण निष्ठा के साथ करना चाहिए। आज अमृतसर के गोल्डन टेम्पल में मैंने कार्य के प्रति जिस तरह की निष्ठा देखी थी, वैसी ही निष्ठा हमारे आयोजनों में भी होनी चाहिए। मैं यही सब सोचते-सोचते न जाने कब सो गया। 
 ( आज यहीं तक, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर  .. )

Wednesday, July 8, 2020

' टू स्टेट्स - नई कहानी ' ' Two States - A New Story ' -23


                                            ' टू स्टेट्स - नई कहानी '
' Two States - A New Story ' 
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चन्दर धींगरा 
Chander Dhingra 

 इस लम्बी कहानी ( उपन्यास ) को साझा करने का सिलसिला शुरू है। आज गुरुवार है, आगे बढ़ते हैं  ...  
( २३ )             हम दोनों मंदिर के पवित्र सरोवर की सीढ़ियों पर खामोश बैठे थे। बाहर मौन था परन्तु दोनों के भीतर संवाद चल रहा था। मन के इसी वार्तालाप में मैंने खुद से कहा, ' मैं अपने से ही बातें कर रहा हूँ, पर क्या पिंकी मेरा मन सुन पा रही है ?  स्वर्ण मंदिर का दिव्य दर्शन सामने था। न जाने कितने सत्य छिपे हुए थे इस दिव्यता की छांव में ? इस तरह की दिव्यता संभवतः कलकत्ता के समीप बेलूर मठ में ही महसूस होती है। वहां के किसी अन्य मंदिर में नहीं। हम दोनों के बीच छाए मौन को तोड़ते हुए, मैंने बात आरम्भ की। कहीं से तो करनी थी, लगा क्यों न किसी फिल्म की बात से शुरू करूँ ? हमारे समाज में फिल्म और राजनीति ऐसे विषय हैं जिन पर पर कभी भी बात की जा सकती है। मैंने कहा, ' पिंकी क्या तुमने देवदॉस फिल्म देखी है ?  उसका न सुन मैं हैरान रह गया। उसने कहा कि फिल्म तो नहीं देखी थी परन्तु यह उपन्यास उसने दो बार पढ़ा था और उसने इसके सम्बन्ध में एक लेख लिखा था जो कॉलेज की अंग्रेजी की पत्रिका में प्रकाशित भी हुआ था। उसने कहा कि वह इस कहानी के पात्रों से बहुत प्रभावित हुई थी।  ' कौन सा पात्र सबसे अधिक प्रभावशाली लगा है? मैंने पूछा। न जाने क्यों मैं इस विषय को आगे बढ़ाना चाहता था।  'ऑफ़ कोर्स, पारो..' उसने अपने पंजाबी अंदाज़ में कहा। इसके बाद उसने कहा कि देवदॉस की कहानी को दुनिया की श्रेष्ठम प्रेम कहानियों में रखा जाना चाहिए। मुझे उसकी यह बात अच्छी लगी। मैंने कहा कि क्या उसे कहानी का दुखद अंत पसंद आया था और क्या इसका सुखद अंत नहीं किया जा सकता था ? वो हंसने लगी, ' तुम्हारा मतलब है देवदॉस और पारो अंत पति-पत्नी की तरह मिल जाते.. अरे, तुम तो इस कहानी को बॉम्बे की फिल्म बना देते..'  मुझे उसकी बात प्रभावशाली लगी।  मैंने कहा, ' तुम्हें नहीं लगता, दुनिया में हर किसी के पास अपनी एक कहानी छिपी होती है..'  ' हाँ, जरूर, सबकी अपनी-अपनी कहानी है.. मेरे पापा-मम्मी की भी एक प्रेम कहानी है... इन दोनों ने अपने पेरेंट्स की इच्छा के विरुद्ध शादी की थी..'  वह मुस्कुराने लगी। मैंने कहा, ' अच्छा.. तो सुनो, मेरे माँ-बाबा की भी लव स्टोरी है..' मैं झूठ बोल रहा था और उसे प्रभावित करना चाहता था। मेरे माँ-बाबा की तो सामान्य दो परिवारों के बीच तय की हुई शादी थी। वह बाबा शब्द पर अटकी। उसने पूछा, ' बाबा..माने ?  मैंने उसे स्पष्ट किया कि बंगाली भाषा में बाबा का अर्थ है पिता.. जैसे वह मम्मी-पापा कहती है वैसे ही हम माँ-बाबा कहते हैं..' मैं अपने माँ-बाबा की लव स्टोरी पर बे वजह का झूठ बोल गया था। अब पिंकी ने उनकी लव स्टोरी जाननी चाही। लड़कियों को इस तरह के विषयों में खासी रूचि रहती है। मैंने कहा कि कुछ विशेष नही था। अब मैं इस विषय को यहीं समाप्त करना चाहता था। परन्तु वह ज़िद करने लगी। मुझे एक कहानी गढ़नी पड़ी। मैं कहानी गढ़ने की अपनी क़ाबलियत पर मुग्ध हो रहा था। मैंने माँ के ब्राह्मण तथा बाबा के कायस्थ होने के साथ साथ कई इधर-उधर की बातें जोड़ी और एक अनोखी प्रेम कथा उसे सुना दी। पिंकी ने सुना और सरलता से कहा कि वह तो बंगाली लोगों को बहुत पढ़ा-लिखा और खुले दिमाग वाला समझती थी। परन्तु वहां भी इस तरह की जात-पात की बातें थीं। 

पिंकी ने कहा कि हम दोनों के माता-पिता प्रेम विवाह से बंधे थे तो कहीं न कहीं हमारे परिवारों में कुछ समानता थी। मैं भीतर तक शंकित सा हो गया था। अब लगा कि मुझे ये झूठी कहानी नहीं बनानी चाहिए थी। कहीं यह बात उठ गयी तो ? दिमाग ने हमेशा की तरह फिर से मेरा साथ दिया, 'अब जो होगा देखा जायेगा..'  पिंकी ने जब परिवारों की समानता की बात की तो मैंने उसकी भाव भंगिमा पढ़नी चाही। शायद वह सामान्य थी परन्तु मुझे लगा कि कोई सन्देश देना चाहती थी। मैंने कहा कि वह अपने लिए कैसा विवाह चाहेगी, प्रेम विवाह या पारिवारिक विवाह। पिंकी ने तुरंत कहा कि वह कुछ कह नहीं सकती परन्तु अपने होने वाले जीवन-साथी को बिना जाने-समझे वह कैसे किसी से विवाह कर सकती थी। मैंने पूछा, ' क्या तुम इंटरकास्ट मैरिज करोगी ? उसने हँसते हुए कहा कि पारिवारिक व्यवस्थित विवाह हो या कुछ और, वह अपने होने वाले पति को अच्छे से जानना और समझना तो अवश्य ही चाहेगी। मैंने भी उसकी बात में हामी भरी, ' हाँ, होने वाले जीवन साथी को जानना तो आवश्यक है..परन्तु एक दो बार मिलने-मिलाने से कितना जान सकते हैं..  हमारी परम्परा में पारिवारिक जानकारी का आधार होना एक अधिक अच्छी प्रणाली है.. परिवार की पृष्ठभूमि सभी कुछ स्पष्ट कर देती है..'  अब उसके हाँ कहने की बारी थी, ' दोनों बातें अपनी-अपनी जगह हैं..'  मैं विषय से अलग नहीं होना चाहता था। मैंने हलके अंदाज़ में पूछा, ' अच्छा, हम दोनों कुछ दिनों से एक-दूसरे से मिल रहे हैं, तुम मुझे कितना जान सकी हो ? पिंकी इस तरह मुस्कुराई मानों मेरी चतुराई को भांप रही हो। उसने कहा, ' सच कहूँगी तो तुम बुरा मान जाओगे..'  मैंने कहा कि नहीं ऐसा नहीं होगा। उसने उसी अंदाज़ में कहा, ' तो सुनो..तुम पढ़े-लिखे सिंपल टाइप हो..पर अच्छे हो..अपनी वाइफ को खुश रखोगे.. परन्तु अभी मैं पूरे विश्वास के साथ नहीं कह सकती..' यह कह कर वह हँसने लगी। उसकी सरल स्पष्टता प्रभावशाली थी। मैं न जाने क्यों झेंप रहा था। सामने की ओर देखा, अंकल,आंटी और लवली मंदिर का चक्कर लगाकर वापिस चले आ रहे थे। हम दोनों खड़े हो गए। पिंकी ने मंदिर की ओर शीश झुका कर प्रणाम किया। उसने मुझे भी ऐसा करने का इशारा किया। मैंने भी झुक कर नमन किया। मैं स्वयं को बहुत बुद्धिमान समझता रहा हूँ कि मैं ईश्वर और प्रार्थना आदि को नहीं मानता कि मैं बंगाल की प्रगतिशील विचारधारा में बड़ा हुआ था। मुझे मंदिर और पूजा-पाठ सदैव से एक तरह का आडम्बर लगते रहे थे। मेरे हिसाब से ये बातें मनुष्य की दुर्बलता दर्शाती थी। परन्तु आज न जाने मेरे मन ने भीतर ही भीतर क्यों कहा ' हे ! पवित्र मंदिर, तुम्हारे दर्शन को पुनः आऊँगा, अपने माँ, बाबा और पत्नी के साथ..' अचानक मुझे लगा कि क्या मैं भी दुर्बल हो रहा था ? मेरे दिमाग ने हमेशा की तरह मेरा साथ दिया कि नहीं यह कोई प्रार्थना नहीं थी। यह तो मैं केवल अपनी इच्छा को अपने से ही व्यक्त कर रहा था। 
( आज यहीं तक, इससे आगे गुरुवार को, यहीं पर )

Wednesday, July 1, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' - 22


                                                 ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हर गुरुवार को इस लम्बी कहानी ( उपन्यास ) को साझा किया जाता है। आज फिर एक गुरुवार है, अब आगे..  

( २२ )                     चंडीगढ़ का वो गेस्ट हाउस मेरे लिए अब पहले जैसा अनजाना न था। इन कुछ ही दिनों में यह अपना सा लगने लगा था। अक्सर ऐसा ही होता है, नया व्यक्ति हो या नया स्थान, आरम्भ में अपरिचित होता है परन्तु कुछ समय बाद वह परिचित और अपना सा हो जाता है। कभी कभी यह अपना हो जाने वाला समय कुछ मिनटों या घंटों का ही होता है। मुझे तो लगता है कोई-कोई अपरिचित तो मुलाकात के प्रथम कुछ क्षणों में ही परिचित हो जाता है और कभी अपना बनाने के प्रयास में हम सालों साल लगे रहते हैं परन्तु अपरिचय की यह दूरी तय ही नहीं होती।

 आने वाले रविवार का इंतज़ार था। उस दिन अमृतसर जाना था। इस बीच एक दिन में जोगेन्दर अंकल के घर पर हो आया था। वो सभी मुझे सहज करने की कोशिश करते दिखे। पिंकी ने घर पर हमारे अमृतसर जाने की बात की हुई थी। बातों बातों में पता चला कि वे सभी जायेंगे। मैंने अंकल से कहा कि जो खर्च आ आएगा, उसमें मुझसे मेरा भाग लेना होगा। अंकल हँसने लगे। उन्होंने कहा, ' ये क्या बात हुई.. तुम अपने घर के ही हो.. दो बच्चे साथ हैं तो अब समझो तीन हैं.. ' उनकी बात में एक तरह की ग्रामीण सादगी थी। उन्होंने मेरी बात को अपनी बातों में इधर-उधर कर दिया। उन्होंने मुझे अमृतसर शहर के बारे में बताया। अमृतसर को पंजाब का सबसे महत्वपूर्ण और विश्व का एक पवित्र नगर माना जाता है। दुनिया के बहुत ज्यादा लोग यहाँ के पवित्र स्वर्ण मंदिर को देखने आते हैं। उन्होंने बताया कि अमृतसर ने सबसे ज्यादा युद्ध और अत्याचार सहे हैं। देश के बंटवारे के समय भी सबसे बड़ी आग अमृतसर को ही सहनी पड़ी थी। उन्होंने कहा कि जलियांवाला बाग के बारे में तो सभी जानते ही हैं। मैंने कहा, ' अंकल उस नरसंहार को तो पूरी दुनिया जानती है.. हमारे रबीन्द्रनाथ टैगोर ने तो अंग्रेज़ों  द्वारा दिया गया ' नाईटहुड ' सम्मान ही वापिस कर दिया था..'  मैंने बताया कि जब अमृतसर में जलिआंवाला बाग को लेकर एक समारोह हुआ था तो नाना को भी स्वतंत्रता सेनानी के रूप में वहां आमंत्रित किया गया था। उस समय बंगाल से कई लोग आये थे। अंकल ने कहा, ' संडे को तुम अंग्रेजों के अत्याचार की तस्वीर देखना..'  रविवार को सुबह जल्दी निकल जाने का निर्णय हुआ क्योंकि संध्या तक वापिस लौट आना था। पिंकी ने सलाह दी कि मुझे पांच बजे तक तैयार रहना चाहिये और वो लोग मुझे गेस्ट हाउस से ले लेंगे क्योंकि वह रास्ते में ही पड़ता था। रविवार सुबह पांच बजे ? मुझे असुविधा लग रही थी। इतनी जल्दी शायद मैं जाग ही न पाऊँ ? मैंने पिंकी को बताया तो उसने सलाह दी कि मुझे गेस्ट हाउस के रात की ड्यूटी के चौकीदार को बता कर रखना होगा। वो मुझे उठा देगा।  

शनिवार की रात को मैंने गेस्ट हाउस के गेट इंचार्ज को अपनी मुश्किल बता दी। सुबह चार बजे चौकीदार मुझे जगा गया। पांच बजे तक मैं तैयार था और गेट पर आकर बैठ गया। थोड़ी देर में जोगेन्दर अंकल अपनी गाड़ी में पहुँच गए। वे गाड़ी चला रहे थे। आंटी बगल वाली सीट पर थी। दोनों बहनें पीछे बैठी थी। पिंकी ने अपनी ओर वाला दरवाजा खोला और मुझे अंदर बुलाया। सभी लोग बहुत खुश नज़र आ रहे थे। लवली ने जरूर एक बार इतनी सुबह सुबह जाने पर पर मुँह बनाया। दोनों बहनें बहुत स्मार्ट दिख रही थी। पिंकी कुछ गंभीर सी दिखी। वह शायद हरमंदिर साहेब जाने के कारण अभी से गुरु स्मरण की मुद्रा में थी। गाड़ी जब शहर के बाहर आ गयी तो मैंने पिंकी की ओर नज़र घुमाई। वह आँखें मूंद गहन ध्यान मुद्रा में दिखी। आंटी भी हलके स्वर में  भजन गुनगुना रही थीं। अंकल होशियारी से गाड़ी चला रहे थे। लवली पावर नेप ले रही थी। अंकल ने बताया कि चार घंटे में वे अमृतसर पहुँच जायेंगे परन्तु कुछ समय के लिए बीच में एक स्थान पर रुकेंगे। मैंने अंकल से पूछा कि पूरा रास्ता वह ही कार चलाएंगे तो थक जायेंगे। उन्होंने कहा, ' अरे, ऐसी कोई बात नहीं है   .. जरुरत पड़ी तो तुम्हारी आंटी या पिंकी चला लेंगी..' लवली ने यह बात सुनी तो हंसने लगी, ' सभी थक गए तो मैं हूँ ना..' मुझे खुद में एक तरह की क्षीणता सी लगी कि यहाँ सभी कार चला सकते हैं सिवाय मेरे। 

अमृतसर आने पर हम लोग सीधे स्वर्ण मंदिर गए। पिंकी ने मुझे सिर ढकने के लिए कहा। वह मेरे लिए एक स्कार्फ़ घर से ही लेकर आयी थी। मंदिर में बहुत रौनक थी। श्रद्धा से भरे लोग, कतार में लगे हुए थे। मैं मन्त्र मुग्ध था। क्या अनुशासन, क्या साफ-सफाई .. सब कुछ देखने लायक था। बहुत आस्था के साथ हम सब ने दर्शन किये और लंगर खाया। लंगर के बारे में मुझे पिंकी ने बहुत कुछ बताया। लवली और अंकल -आंटी आगे आगे चल रहे थे। मैं और पिंकी पीछे थे। सिख समाज के बारे में मुझे इतना कुछ मालूम न था। पिंकी से आज बहुत कुछ पता चल रहा था। मैं सोचता रह गया कि हमारे देश और संस्कृति के लिए इन लोगों ने कितना कुछ बलिदान किया था। मैंने भी पिंकी को बंगाल की कुर्बानियों के बारे में बताया। कुछ समय विश्राम कर हम लोग जलिआंवाला बाग पहुँच गए। यहाँ आकर ऐसा लगने लगा कि मानों हम इतिहास के उस दिन में आ गए हों जब ब्रिटिश अधिकारी जनरल डायर ने निहत्थे और शांति से सभा कर रहे भारतीय लोगों पर गोलियां बरसा दी थीं। पिंकी को यहाँ का पूरा इतिहास मालूम था। उसने मुझे कई बातें बताई कि कैसे रौलेट एक्ट के प्रति विरोध जाहिर करने को जमा लोगों को मार दिया गया था। उसने यह भी बताया कि शहीद भगत सिंह की सोच को बनाने में जलिआंवाला बाग़ की घटना प्रमुख है। पिंकी को काफी कुछ पता था। वह कई बार यहाँ आ चुकी थी परन्तु उसे अधिक जानकारी अपने स्कूल के एक टूर में मिली थी। उसने बताया कि कैसे सरदार उधमसिंह ने जलिआंवाला बाग का बदला इंग्लॅण्ड में डायर को मार कर लिया था। मैं उसकी इतिहास में रूचि पर मुग्ध था। साथ ही मैं बंगाल के ऐतहासिक घटनाओं के बारे में भी सोच रहा था। शहीद खुदीराम, मास्टर दा सूर्यसेन, बागा जतिन आदि मेरे दिमाग में आ रहे थे। मुझे लगा कि क्या ये लड़की जो मुझे इतना कुछ बता रही थी, उसे बंगाल के क्रांतिकारियों के बारे में भी जानकारी थी ?  मैंने सोचा, मौका मिलेगा तो मैं भी पिंकी को अपने बंगाल के बारे में सब कुछ बताऊंगा। 

हम सभी काफी थक गए थे। किसी का भी वागा बॉर्डर जाने का मन नहीं था। शायद मेरे लिए ही वे वहां जाने वाले थे। मैं वागा बॉर्डर का कार्यक्रम टीवी पर देख चुका था। मैंने एक बंगाली पत्रिका में इसके बारे में पढ़ा भी था कि यहाँ संध्या में होने वाली फौजी रस्म देशभक्ति को नहीं बल्कि दोनों ओर वहां आये दर्शकों के मध्य भावना भड़काने वाली जैसी होती है। मेरी भी वहां जाने की इच्छा न थी। जैसे ही मैंने वागा बॉर्डर न जाने की बात की, सभी के चेहरे खिल उठे। ये निश्चित किया गया कि एक बार फिर हरमंदिर साहेब जायेंगे और वहां कुछ समय बिताकर चंडीगढ़ लौट जायेंगे। मुझे अमृतसर का माहौल बहुत पसंद आ गया था। मैंने सोचा, माँ को फोन कर सब बताऊंगा। हम लोग स्वर्ण मंदिर आ गए और वहां सरोवर की सीढ़ियों पर बैठ गए। सभी आँखें मूंद ध्यान की मुद्रा में थे। लवली जो सामान्यतः चुलबुल सी रहती थी, इस समय अपने पापा के पास बैठी, ईश्वर की भक्ति कर रही थी। उसे इस तरह गंभीर देखना अच्छा लगा। कुछ समय बाद आंटी ने कहा, ' एक चक्कर लगा लेते हैं, फिर वापिस चलते हैं..'  पिंकी ने कहा, ' मम्मी, आप लोग हो आओ मैं यहीं बैठी हूँ..'  वो लोग आगे बढ़ गए। मैं उठा तो परन्तु फिर मुझे भी कुछ देर बैठ जाना ही अच्छा विकल्प लगा। मैं कहा, ' अंकल, मैं भी यहीं रुकता हूँ.. पिंकी के साथ ..'   
( आज बस, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर )

Wednesday, June 24, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ( ' Two States - A Story ' ) - 21

                                                     ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
                 (  ' Two States - A Story ' )
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हर हफ्ते इस लम्बी कहानी ( उपन्यास ) को साझा किया जाता है। आज गुरुवार है, अब आगे..  

( २१ )       अगले दो दिन इधर-उधर के श्राद्ध सम्बन्धी कार्यों में ही बीत गए। पंडित जी दोनों दिन आये और न जाने माँ से क्या-क्या करवाते रहे। बारह दिन बाद नाना का श्राद्ध था। इस दिन बहुत लोगों के आने की सम्भावना थी। माँ चाहती थी कि ये सब काम अच्छे से होना चाहिए। मेरे बाबा इस कार्यक्रम को घर पर ही करवाना चाहते थे परन्तु माँ का मानना था कि घर पर स्थान छोटा था और व्यवस्था ठीक से न हो पायेगी। एक बार पुनः बाबा को पराजित होना पड़ा और श्राद्ध  के लिए रासबिहारी इलाके का गौड़िया मठ चुना गया। मैं और माँ वहां जाकर सब बात कर आये। ये एक पैकेज जैसी व्यवस्था थी। सब कुछ मठ वाले करने वाले थे हमें केवल भुगतान कर देना था। नियम अनुसार हमने अग्रिम भुगतान कर दिया। जब हम वहाँ पहुंचे तो किसी के श्राद्ध का कार्यक्रम चल रहा था। प्रबंधक ने बताया कि सुबह एक और अपरान्ह ने दूसरा श्राद्ध का कार्यक्रम था। उन्होंने ये भी कहा कि अच्छा हुआ की हम समय से पहुँच गए वर्ना शायद बुकिंग न मिल पाती। मुझे लगा कि शादी-ब्याह के लिए, यदि समय से बुक न किया जाये तो जैसे बैंक्वेट हॉल नहीं मिल पाते, वैसे ही श्राद्ध आदि के लिए इन मठों की भी बहुत मांग है। हम लोग श्राद्ध के कार्ड्स  प्रिंटिंग प्रेस में छपने को देते हुए घर आये। प्रेस वाले को निर्देश दिया गया कि यह काम आज ही हो जाना चाहिए। शाम को घर पर कार्ड्स पहुँच गए। माँ विलम्ब नहीं चाहती थी। मेरे चंडीगढ़ लौटने से पहले वह चाहती थी कि ये कार्ड्स सबको नहीं तो कुछ खास खास लोगों को तो पहुँचा ही दिए जाएँ । माँ का मानना था कि मेरे लौट जाने पर वह फिर से अकेली पड़ जायगी। न जाने उसे क्यों लगता था कि मेरे बाबा ये सब काम न कर पाएंगे ?

माँ के साथ कार्ड्स वितरित करते हुए रविवार आ गया। आज मुझे आ लौट जाना था। माँ ने फिर से कहा कि रुक जाता तो अच्छा था परन्तु बाबा ने कहा, 'ड्यूटी तो ड्यूटी है..'  माँ और बाबा दोनों की आँखे नम थी। टैक्सी में बिठाने के लिए दोनों आये। व्यस्तता ने मुझे ऐसा उलझा दिया था कि मैं सब कुछ भूल ही गया था। माँ के साथ यहाँ-वहां दौड़ता रहा। अब टैक्सी में निढाल हो बैठा तो पहली बात दिमाग में यह आयी कि पिंकी दिल्ली एयरपोर्ट पर आएगी तो ? यदि न आई तो समस्या हो जाएगी। मुझे एक बार फिर से फोन करना चाहिए था। वैसे वह बात की पक्की लड़की थी। उसने कहा था एयरपोर्ट पर मिलेगी, तो जरूर मिलेगी ही। उसे मेरी फ्लाइट की पूरी जानकारी थी। मैं नाहक परेशान हो रहा था, पिंकी नहीं आयी तो देखा जायेगा। बस से चंडीगढ़ निकल जाऊँगा परन्तु, बस से बहुत वक्त लग जायेगा। पहुँचते-पहुँचते रात हो जाएगी। सोचा, एयरपोर्ट पर किसी बूथ से उसे फोन कर लूंगा मैं पूरी हवाई यात्रा में चिंतित सा रहा। परन्तु कुछ भी इधर उधर न हुआ। समय से दिल्ली पहुँच गया। एयरपोर्ट से बाहर निकल देखा, दूर एक ओर पिंकी मुस्कुरा रही थी। उसने हाथ उठा हेलो कहा और मेरा सूटकेस ले लिया। चंडीगढ़ से आया ड्राइवर साथ था। सूटकेस ले वह आगे आगे बढ़ा और हम दोनों उसके पीछे। ' सब ठीक ठाक .. कोई परेशानी तो नहीं हुई न ?  मैंने ना में सिर हिलाया। उसने कहा कि मामा जी के घर से होते हुए जाना था, वे मुझसे मिलना चाहते थे। मुझे असुविधा सी लगी परन्तु मैं कुछ कह न सका सिर्फ यही कहा, ' मुझे कल सुबह क्लास अटेंड करनी है..'  पिंकी हंसी, ' कल सुबह न ? हम लोग तो आज शाम को ही पहुँच जाएंगे..'

पिंकी के मामा का घर तो जोगिन्दर अंकल के घर से भी अधिक शानदार था। एक विशाल भवन था जो दिल्ली के महंगे इलाके में था। मैं देखता ही रह गया। उन्होंने बहुत गर्मजोशी से मुलाकात की। एक बार पुनः नाना के न रहने पर मुझे सांत्वना दी। वे नाना की बहुत प्रशंसा कर रहे थे। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग अब धीरे धीरे चले जा रहे थे। उन्होंने कहा,' इन लोगों ने देश को आज़ाद कराया और आज के नेताओं को देखो, कैसे स्वार्थी हैं ?  उनकी बातों में एक सामान्य नागरिक की वाणी थी। उनका घर और वैभवता देख मैं सोचने लगा, ये सरदारजी बड़ी बड़ी बातें तो कर रहे हैं परन्तु खुद कैसे कैसे हथकंडे किये होंगे जो ऐसी भव्यता हासिल की है ? ये भी तो देश की आज़ादी के बाद दूर पंजाब के किसी गांव से दिल्ली में विस्थापित बन आये होंगे और छोटा-मोटा  व्यापार शुरू किया होगा। मैंने चंडीगढ़ में जोगेन्दर अंकल का घर देखा और अब यहाँ दिल्ली में इनका। मैं आश्चर्यचकित था। हम बंगाल में इतना कुछ हासिल न कर सके। हालात तो दोनों राज्यों में एक से थे। क्या हम लोग केवल राजनीति ही करते रह गए और नए मिले अवसरों का लाभ न ले सके ? मुझे यह भी लगा कि न जाने क्यों हम बंगाली लोग मेहनत करने में पीछे रह गए ?

हमने वहां लंच किया। एक बेहतरीन पंजाबी लंच। घर से निकलते समय पिंकी की मामी ने मेरे हाथ में एक पैकेट पकड़ाया। मैंने पिंकी की ओर जिज्ञासा से देखा। उसने कहा रख लीजिये। मामी ने प्यार जतलाते हुए कहा, ' हमारे घर पहली बार आये हो...खाली हाथ थोड़े ही जाओगे..' मैंने संकोच के साथ ' थैंक यू आंटी' कहा। हम कार में पीछे की सीट पर बैठ गए और चंडीगढ़ की ओर निकल गए। कार थोड़ी दूर ही गयी होगी कि मैंने कहा, ' देखें, तुम्हारी मामी जी ने क्या दिया है ? मैंने पैकेट खोला। सुन्दर और महँगा सूट का सेट था। मन ने एक बार फिर से प्रश्न किया। पैसे वाले हैं तो ऐसी महंगी गिफ्ट ही देंगे, कोई दूसरी गिफ्ट जैसे पुस्तक आदि देने का विचार इन सरदारजी लोगों को थोड़ा ही आएगा ? 

रास्ते में फिर से विविध विषयों पर बातें हुई। पिंकी नाना जी के अंतिम संस्कार के बारे में जानना चाहती थी। मैंने उसे सब बताया। मैंने गुरूद्वारे से आये शव वाहन और अंतिम यात्रा में एक वरिष्ठ मंत्री जी के आने के बारे में भी बताया और ये भी कि बहुत लोग आये थे। पिंकी प्रभावित थी परन्तु वह चाहती थी कि इतने बड़े स्वतंत्रता सेनानी को श्रद्धांजलि और अधिक सम्मान से दी जानी चाहिए थी। उसने कहा, ' तुम्हारे नानाजी यदि पंजाब में होते तो देखते.. कैसे भव्य रूप से विदा किये जाते..'  मैं उसका मुख देखता रह गया। वह सत्य कह रही थी। मैंने नाना से पंजाब में शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों को दिए जाने वाले सम्मान के बारे में बहुत कुछ सुना हुआ था।  पंजाब ने भगत सिंह की माँ को 'पंजाब माता' के ख़िताब से सम्मान दिया है। बातों बातों में अमृतसर के जलियांवाला बाग़ की चर्चा भी हुई। अचानक पिंकी ने उछलते हुए कहा, ' चलो तुम्हें अमृतसर घूमाकर लाते हैं..'  अगले संडे चलते हैं.. स्वर्णमंदिर, जलियांवाला बाग और वागा बार्डर..'   उसके निर्मल उत्साह को मैं देखता ही रह गया। मैंने मुस्कुराते हुए कहा, ' अरे.. मेरे लिए इतना करोगी.. पर जब तुम  कलकत्ता आओगी तो मैं इतना कुछ न कर पाऊंगा.. कलकत्ता का हिसाब ऐसा नहीं है..'  पिंकी ने हँसते हुए कहा, ' मत करना यार.. ' उसके मुख से यार शब्द सुनना मुझे अच्छा लगा।  ' तो फिर संडे सुबह मैं, तुम और लवली.. अमृतसर ट्रिप.. फाइनल.. ओके ..' पिंकी का उत्साह बढ़ता जा रहा था। मैं भीतर ही भीतर खुश हो रहा था कि चलो, जलियांवाला बाग़ घूमना हो जायेगा। मैंने नाना से इसकी पूरी कहानी सुनी हुई थी। मुझे गर्व होता था कि कैसे गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ने इसका विरोध किया था और अंग्रेज़ों द्वारा दिए गए सम्मान को लौटा दिया था। मेरे नाना जब भी दिल्ली आते तो मौका मिलते ही अमृतसर का चक्कर लगा लेते। वह अमृतसर के खाने की बहुत प्रशंसा किया करते थे। माँ उन्हें चिढ़ाने के लिए कभी कभी कहती, ' तुम तो पिछले जन्म के पंजाबी हो  .. '  

यूँ ही हँसते हंसाते हम चंडीगढ़ की ओर बढ़ रहे थे। मैं कलकत्ता के अपने घर और नाना के चले जाने की वेदना को भूल गया था। पिंकी के कारण ही यह हुआ था। अचानक ड्राइवर ने पंजाबी भाषा में पिंकी से कुछ कहा और पिंकी ने मुझसे पूछा कि वो रिसोर्ट जहाँ हमने दिल्ली जाते समय लंच किया था आ रहा था और क्यों न हम छोटा सा ब्रेक वहीँ ले लें। मुझे लगा मानों पिंकी ने मेरा मन पढ़ लिया था क्योंकि मैं स्वयं ही इस ढाबे के बारे में सोच रहा था। हम लोग वहां कुछ देर रुके और गरम गरम पकोड़े और चाय ली। मुझे दिखा कि आसपास की टेबल्स पर भी कुछ ऐसा ही चल रहा था। मन में आया कि पिंकी से चिकन के पकोड़े और फिश फ्राई के बारे में पूँछू पर संकोच कर गया। मुझे अपने कलकत्ता की याद आ रही थी कि कैसे कभी कभी हम वहां गरियाहाट जाकर, एक खास जगह से फिश फ्राई खाया करते थे। ये पनीर और आलू के पकोड़े उसका मुकाबला नहीं कर सकते थे। हरी पुदीने की चटनी खाते वक्त मुझे अपनी सरसों की सॉस जिसे कासुंदी कहा जाता है, याद आई। मैंने पिंकी से पूछा कि इस तरफ पंजाब में फिश आदि नहीं मिलते। पिंकी ठहाका लगा हंसने लगी। उसने कहा, ' वाह, हमारे बंगाली बाबू मोशाय को अपनी प्यारी मछली की याद आ गई... थोड़ा रुको, अगले संडे अमृतसर जा ही रहे हैं, तुम्हें असली अमृतसरी फिश खिलाएंगे...उसे खा कलकत्ता की मछली भूल जाओगे...'  
( आज बस, आगे यहीं पर, अगले गुरुवार को.. ) 

Wednesday, June 17, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' -20


                                              ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
( Two States - A Story )
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हर हफ्ते इस लम्बी कहानी ( उपन्यास ) को साझा किया जाता है। आज गुरुवार है, अब आगे..  

 ( २० )     फ्लाइट समय से कलकत्ता एयरपोर्ट पर उतरी। बाबा मुझे लेने आये हुए थे। टैक्सी से हम दोनों कुछ समय में घर पहुँच गए। माँ के पांव छुए तो उन्होंने गले लगा लिया और रोने लगी। मैं नाना के चले जाने के दुखद समाचार मिलने से अब तक रोया न था। शायद मेरे आँसू सही अवसर की प्रतीक्षा में थे। माँ से मिलना वही अवसर था। माँ से लिपट मैं भी रोने लगा। आंसू थे कि बहे जा रहे थे। माँ को सहसा अहसास हुआ कि मैं बहुत दूर से अकेला आया हूँ। उन्होंने खुद को संभाला और मुझे ढाढ़स देने लगी। मेरा हाथ पकड़ वे मुझे नाना के कमरे में ले गयी। यहाँ उनका पार्थिव शरीर रखा हुआ था। माँ ने बताया कि अंतिम कार्य मेरी प्रतीक्षा में रुका हुआ था। नाना को इस रूप में देखने की मैंने कभी कल्पना न की थी। मुझे लगा कि वे शांत सोये हुए थे, जैसे हमेशा थक जाने पर सो जाते थे और अभी उठकर मुझसे सुखबीर सिंह, उसके चंडीगढ़ वाले भाई, उनके परिवार और पंजाब के बारे में पूछेंगे। क्षण भर को मैं भूल गया कि वे चिरनिद्रा में थे। मैं सच में उनके उठने और बोलने की प्रतीक्षा में था परन्तु ऐसा न होना था और न हुआ। मेरे नाना, जिन्होंने हमारी आज़ादी की लड़ाई में सबके साथ मिलकर भाग लिया था, जिन्होंने कई बार जेल यात्राएं और कई तरह की प्रताड़नाएं सही थी, आज अपने में हज़ारों अनकही कहानियां और स्वतंत्र भारत के लिए कई कई अपूर्ण सपने लिए चुपचाप हमेशा-हमेशा के लिए सोये थे। माँ लगातार रोये जा रही थी। मेरे बाबा ने हम दोनों को सँभालने की कोशिश की और हमें कमरे से बाहर ले आये। 

घर पर सगे-सम्बन्धियों, आसपड़ोस के साथ-साथ कई अन्य लोग आये हुए थे। नाना के परिचितों और प्रशंसकों का एक बहुत बड़ा दायरा था। वे वामपंथी विचारधारा से जुड़े थे एवं राज्य सभा के सदस्य भी रह चुके थे। मुझे घर में ऐसी ही भीड़भाड़ की आशा थी। मेरे यहाँ पहुँचने के बाद से ही हलचल आरम्भ हो गयी थी। शव यात्रा के सारे प्रबंध हो चुके थे। मैं घर के किसी कोने में एकांत में कुछ क्षण बैठना चाहता था परन्तु माहौल कुछ ऐसा था कि सभी विलम्ब नहीं चाहते थे। मुझे मेरे चाचा का स्वर सुनाई दिया, ' केवराटोला में कभी कभी बहुत भीड़ होती है .. और विलम्ब किया तो आधी रात के बाद नंबर आएगा..'  माँ ने उन्हें रोकते हुए कहा, ' बेटा अभी अभी दूर से आया है..चंडीगढ़ से दिल्ली और फिर कलकत्ता.. उसे साँस तो ले लेने दो..'  चाचा खामोश हो गए, कुछ ऐसा सोचकर कि उनका कर्तव्य था सो उन्होंने कह दिया। माँ ने मुझसे पूछा कि मैंने कुछ खाया था कि नहीं ? मैं माँ को देखता रह गया। ये माँ ही होती है जिसे अपने पिता के शव के दूसरे कमरे में होने पर भी दूर से घर  लौटे बेटे ने कुछ खाया है या नहीं, यह चिंता रहती है।

मैंने माँ को आश्वस्त किया कि मैंने खाना खाया हुआ था और मैं ठीक था। माँ ने मुझे तैयार होने को कहा और फिर बाबा से कहा कि अब शव को ले चलना चाहिए। मैं ऊपर वाले कमरे में चला आया। यहाँ मेरा और माँ-बाबा के साथ साथ सटे दो कमरे थे। मैंने माँ के कमरे में रखे फोन से जोगेन्दर अंकल का नंबर मिलाया और उन्हें अपने ठीक ठाक से कलकत्ता पहुँच जाने की खबर दी। उन्होंने मेरा उत्साह बढ़ाते हुए बताया कि लुधियाना से उनके बड़े भाई सुखबीर भी कलकत्ता आने की सोच रहे थे और वे मेरी माँ से एक बार फिर से बात करेंगे। जोगेन्दर अंकल से फोन पर बस इतनी ही बात हुई। हमेशा की तरह मुझे अकेलापन सा लग रहा था। मैंने अपनी पॉकेट से छोटी सी डायरी निकाली। इस डायरी में खास टेलीफोन नंबर रखा करता था। मैं जल्दी में किसी एक नंबर को खोज रहा था। मुझे नीचे उतर अपनी माँ और बाबा के साथ नाना की अंतिम यात्रा के कार्य में जुटना भी था। परन्तु मैं एक फोन कर लेना चाहता था। मैंने दिल्ली का एक नंबर घुमाया। ये पिंकी के मामा के घर का नंबर था जो उसने मुझे दिल्ली एयरपोर्ट पर लिखवाया था। जिन्होंने फोन उठाया न मालूम कौन थे परन्तु मेरे मुँह से कलकत्ता का नाम सुनते ही उन्होंने अपनी ओर से अफ़सोस जाहिर करना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि देश ने एक बहुत बड़े शख्स को खो दिया था। उन्होंने बताया कि कई साल पहले जब नाना दिल्ली आये थे तब वे उनसे मिलने बंगाल भवन गए थे। मैं समझ गया था कि वे बंग भवन कहना चाह रहे थे क्योंकि दिल्ली आने पर नाना यही रुकते थे। फोन पर पिंकी के मामा ही थे। वे अंग्रेजी में बात कर रहे थे। मैं तो यस सर- यस अंकल ही कर रहा था। अपने भीतर मुझे पिंकी से बात करने की उत्सुकता थी। संकोच करते हुए मैंने कहा, ' पिंकी है, अंकल ?  पिंकी फोन पर आयी और उसने मेरा हालचाल पूछा। मेरी तरह वह भी कुछ जल्दी में थी। उसने कहा कि बाद में अच्छे से बात करेंगे। फोन रख मैं नीचे आ गया। शव यात्रा की तैयारी हो चुकी थी। नाना जीवनपर्यन्त रूढ़िवादिता का विरोध करते रहे परन्तु आज उनकी बेटी अंतिम संस्कार पूरे हिंदू विधि-विधान और मान्यताओं के साथ करना चाहती थी। दो पंडित आये हुए थे। वे माँ को पग पग पर सलाह दे रहे थे। बाबा हमेशा की तरह लाचार और तटस्थ से, माँ द्वारा की जा रही व्यवस्था को देख रहे थे। मुझे सुनाई दिया कि मृत देह को ले जाने हेतु जो वाहन आने वाला था,वह स्थानीय गुरूद्वारे से बुलाया जा रहा था। शव यात्रा निकलने को ही थी कि खबर आयी कि राज्य शासन के एक बड़े मंत्री जो श्मशान घाट पहुँचने वाले थे,अब यहीं आ रहे थे और श्मशान घाट तक साथ जाने वाले थे। यात्रा को रोक दिया गया। बाबा ने कहा कि इस तरह विलम्ब करना उचित नहीं परन्तु माँ ने कहा कि एक बड़े मंत्री राज्य की मंत्री सभा का प्रतिनिधित्व करने आ रहे थे, तो रुकना ही होगा और साथ ही वे नाना के पुराने मित्र भी थे। कुछ ही समय में मंत्री जी की गाड़ी और दो अन्य गाड़ियां वहां पहुंच गयीं। हम लोग उनकी प्रतीक्षा में बाहर ही खड़े थे। हमारा घर मुख्य सड़क से भीतर आती हुई गली के एक छोर पर है। मंत्री जी के साथ पुलिस के अधिकारी भी थे। उन्होंने माँ और मुझे सांत्वना दी। मेरे बाबा साथ ही खड़े थे। उन्होंने मेरे चंडीगढ़ से आने और विलम्ब के बारे में बताया। मंत्री जी ने साथ आये पुलिस अधिकारी से बात की और फिर माँ को बताया कि श्मशान घाट में किसी तरह की देरी और असुविधा न होगी। वहां पर सूचना भिजवा दी गयी थी। शव यात्रा आरम्भ हो गयी। घर से मुख्य सड़क तक मंत्री जी साथ चले फिर अपनी गाड़ी में बैठ गए। गुरूद्वारे वाले वाहन मैं, बाबा और चाचा तथा अन्य गाड़ियों में सभी लोग केवराटोला श्मशान घाट की ओर बढ़ गये। हमारे घर के आसपास रहने वाले परिचित लड़के, शव वाहन के ऊपर आ गए थे। वे हरि बोल..हरि बोल की ध्वनि कर रहे थे। उनके हाथ में कुछ बड़े पैकेट मुड़ी के थे जो पूरी शव-यात्रा में वे लोग बिखेर रहे थे। घर से चलते वक्त कुछ सिक्के भी बिखेरे गए थे जिसे बटोरने के लिए आसपास रहने वाले गरीब बच्चे पहले से ही तैयार थे। हरि बोल..  हरि बोल..की ध्वनि सुन मुझे कलकत्ता में होने वाली राजनैतिक जलूसों में की जाने वाली चोलबे ना..चोलबे ना.. की ध्वनि सुनाई दे रही थी। ये चोलबे ना..चोलबे ना.. उन दिनों बहुत प्रचलित था और विरोध प्रदर्शन का सूत्र जाना जाता था। 

मंत्री जी और पुलिस के साथ होने के कारण सभी कार्य सुविधापूर्वक संपन्न होता चला गया। कुछ घंटों बाद कार्य पूर्ण कर सब लौट आये। घर पहुँचने पर लगा कि मुझे अब विश्राम की आवश्यकता थी। माँ ने कहा कि वे मेरे उच्च अधिकारियों से बात करेंगी कि मुझे वापिस न जाना पड़े और मुझे इस प्रशिक्षण के अगले सत्र में भेजा जाये। उन्होंने मंत्री जी को भी इस सम्बन्ध में बताया था। मेरे कार्यालय के अधिकारियों के साथ रोबी दा भी आये थे। उन्होंने माँ को आश्वस्त किया था कि चिंता न करें। मैंने जब ये सुना तो अपना विरोध जताया। मैंने कहा कि आधा कोर्स हो चुका था, इसे पूरा कर लेना ही ठीक था और मैं पूरा सामान भी लेकर नहीं आया था। माँ ने कहा, ' देखा जायेगा..'  मैं कहीं न कहीं मन बना चुका था कि निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ही लौटूंगा। बात करने को मेरा लहजा देख, माँ भी समझ चुकी थी कि इस विषय को यहीं रोकना उचित होगा और यह कि मैं मन बना चुका था। उन्हें लग रहा था कि मैं अब किसी की भी नहीं सुनने वाला था।
( आज बस, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर ) 

Wednesday, June 10, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' -19



                                               ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा किया जाता है। आज गुरुवार है, अब आगे..  
              
( १९ )       मैं सोच में आ गया कि जोगेन्दर अंकल ने यह कैसे कहा कि वे मेरा कलकत्ता जाने का प्रबंध कर रहे थे? मेरा कोर्स तो अभी चल रहा था। वैसे मैं नाना की खबर से दुखी था। मुझसे उन्हें बहुत प्यार था। उनसे मैंने देश की आज़ादी के संग्राम की और अंतरर्राष्ट्रीय समाज की बहुत सी बातें व किस्से सुने थे। वे खुले नज़रिये वाले शख्स थे जिन्हें  पंजाब और उससे आगे फ्रंटियर प्रान्त वाले लोगों से आंतरिक स्नेह रहा था। मैं नहीं चाहता था कि वे मुझसे मिले बिना चले जाएं। मैं तो खुद कलकत्ता वापिस लौटने पर उन्हें चंडीगढ़, जोगेन्दर अंकल के घर और यहाँ की बहुत सी बातें सुनाना चाहता था। मैं जानता हूँ वे बहुत खुश होते और मेरी एक एक बात के साथ अपने अनुभवों की पोटली से कई कई  संस्मरण निकालते जाते। मैं उदास था। क्लास में नहीं गया। नीचे आ एक बेंच पर चुपचाप बैठ गया, यूँ ही। न आँखों में आंसू थे, न कोई विशेष सी बेचैनी। मैं अकेला था और बस यही अकेलापन इस वक्त मेरे साथ था। अक्सर आंसू तब ही आते हैं जब उन्हें देखने और आपसे सहानुभूति दिखाने वाला कोई साथ हो। यह सहानुभूति भले ही औपचारिक ही क्यों न हो। मुझे क्लास में न लौटता देख कुछ साथी नीचे आ गए। वे शांत थे। मेरे नाना के इस दुनिया से चले जाने की खबर सुन वे सहानुभूति की मुद्रा में आ गए थे। एक ने नाना की आयु पूछी और अधिक आयु जानने पर कुछ संतोष का सा भाव दिखाया। मुझे लगा कि किसी का अधिक आयु में संसार से चले जाने को एक सामान्य घटना कैसे माना जा सकता है ? अब मेरी आंखे नम होने लगी थीं। इलाहाबाद वाला तपन भी वहीं था। वह मेरे पास आया और उसने धीरे से बांग्ला में मुझसे पूछा कि अब मेरा क्या करने का विचार था ? मैंने उसकी ओर देखा और कहा कि कुछ पता नहीं पर मेरा इस समय घर पर अपनी माँ के साथ होना आवश्यक था। आज यहाँ घर से दूर चंडीगढ़ में किसी से अपनी बांग्ला भाषा में संवाद करना अच्छा लग रहा था। 

थोड़ी देर में जोगेन्दर अंकल का फिर से फोन आया। उन्होंने कहा कि फ्लाइट से मेरे कलकत्ता जाने की व्यवस्था हो गयी थी। फ्लाइट दिल्ली से थी उन्होंने कहा कि वे मुझसे मिलने आ रहे थे और मुझे तैयार रहने को भी कहा क्यों कि तुरंत ही दिल्ली के लिए निकल जाना था। मैं चकित सा रह गया। कमरे में आ सामान अपने सूटकेस में रखने  लगा। तपन मेरे साथ था। अब मेरे मन की स्थिति ऐसी थी कि नाना की मृत्यु पीछे रह गयी थी और कलकत्ता वापिस लौटना, अपनों से अचानक मिलना और प्रथम हवाई यात्रा का होने वाला अनुभव आगे आ गये थे। कुछ ही समय में अंकल आ गए। उनके साथ पिंकी भी थी। उसे देख मैं हैरान रह गया। अब अंकल ने पूरी बात बताई। उन्होंने बताया कि कलकत्ता में मेरे ऑफिस में बात कर ली गयी थी और उन्होंने भी यहाँ मेरे इंस्टिट्यूट के डायरेक्टर से बात कर ली थी। मुझे एक दिन का विशेष अवकाश दिया गया था। साथ ही रविवार और एक राष्ट्रीय अवकाश का दिन था। सो चार दिन हो गए। दिल्ली से शाम की फ्लाइट थी। पिंकी को दिल्ली में अपने मामा के पास जाना था। उन्होंने कहा कि वह मुझे एयरपोर्ट पर छोड़ देगी और वहां से अपने मामा के घर चली जाएगी। उसके मामा कुछ दिनों से चाह रहे थे कि पिंकी कुछ दिन उनके पास आकर रहे। तीन दिन बाद वह मुझे लेते हुए वापिस चंडीगढ़ आ जाएगी। एक साथ दोनों काम हो जायेंगे। वे अपने ड्राइवर के साथ पूरी तैयारी कर के आये थे। प्रशिक्षण को बीच में नहीं छोड़ा जा सकता था परन्तु मैं अपनी माँ को जानता था। उन्होंने नाना का नाम लेकर पूरा प्रभाव लगा दिया होगा तकि मैं कुछ दिन के लिए घर लौट सकूँ। मैं अपने कमरे में गया और सूटकेस लेकर नीचे आ गया। थोड़ी देर में मैं और पिंकी दिल्ली की ओर रवाना हो गए। 

रास्ते में पिंकी ने मुझे बताया कि किस तरह से सब संजोग बनते चले गए और सब कुछ ठीक से हो गया। उसके दिल्ली वाले मामा कई दिनों से उसे बुला रहे थे परन्तु जाना न हो पा रहा था। पिंकी ने पहली बार मुझे ढाढ़स बांधने की कोशिश की, बताया कि उसने भी अपने नाना को बचपन में ही खो दिया था। उसे अपने नाना की बहुत हल्की सी यादें थी। मेरे नाना के बारे में वह लुधियाना वाले सुखबीर अंकल से कई बार सुन चुकी थी। उसे बहुत गर्व था कि कैसे उस समय के लोग देश के लिए सब कुछ लुटा देने को तैयार रहते थे। मैं तो जोगिन्दर अंकल के स्नेह और प्यार से अभिभूत था। मैं उनका कोई सम्बन्धी न था और प्रथम बार उनसे मिला था परन्तु वह कैसे वे मेरे प्रति अपने दायित्व को निभा रहे थे। पिंकी और मैंने इस दौरान बहुत विषयों पर बातें की। चंडीगढ़ से दिल्ली का सड़क मार्ग अत्यंत साफ सुथरा और बेहतरीन था। गाड़ियाँ बहुत तेजी से दौड़ रही थीं। लगता था हम किसी विदेशी हाइवे पर थे। हम लोग मार्ग में एक ढाबे पर रुके। इस दिन को याद कर रहा हूँ तो यहाँ खाये भोजन को कैसे भूल सकता हूँ ? आज भी वो स्वाद मानों मुँह में बसा है। खाना जायकेदार था, पिंकी जैसी खुश मिज़ाज एक नयी दोस्त साथ में थी और मेरे मन में घर पहुँचने की प्रतीक्षा। मैं नाना के चले जाने की दुखद बात को भूल ही गया था। हम दोनों ने इन कुछ घंटों में कई बातें की। फिल्मों की, गीत-संगीत की और देश की। पिंकी हर बात को एक नया और आनंदभरा स्वर देने में माहिर लगी। किसी किसी बात पर तो वह ऐसा ठहाका लगाती कि लगता निर्मल आनंद का फुव्वारा फूट पड़ा हो। जब मैंने उसे किसी की मृत्यु पर होने वाली बंगाली रस्मोरिवाज के बारे में बताया तो वह आश्चर्यचकित हो सुनती रही। नियमभंग और इस अवसर पर होने वाले समाज भोज का सुन वह हंस पड़ी। मैंने अपने बंगाली आडम्बरों को न्यायसंगत करने की कोशिश न की। उसकी हंसी में मुझे समाज के प्रति तिरस्कार नहीं अपितु विडम्बना का भाव दिखा था। इन कुछ घंटों में मैं पंजाब और पंजाबियों को एक नयी नज़र से देखने में सक्षम हो गया था। हम दिल्ली पहुँच चुके थे। भीड़ भाड़ वाली सड़कों से होते हुए, हम एयरपोर्ट पर पहुंचे। गाड़ी से उतरने पर पिंकी ने मुझे उसकी ओर से घर में सभी को हेलो कहने को कहा। उसने मुझे गले लगाया और कहा कि तीन दिन बाद शाम को वह मुझे यहीं एयरपोर्ट पर मिलेगी। अपना ख्याल रखना कह, वह  कार  में बैठ अपने मामा के घर की ओर निकल गयी। मैं कु फिर से एक बार अकेलापन सा महसूस करने लगा। 

यह मेरी पहली हवाई यात्रा थी। मैं रोमांचित था। मुझे यह सोचकर एक सुखद अनुभूति हो रही थी कि अभी दिल्ली में था और दो-तीन घंटे में कलकत्ता में अपने घर पर पहुंच जाने वाला था। ज़िंदगी की कई पहली बातें हमेशा-हमेशा के लिए दिल पर जगह बना लेती हैं। यह यात्रा भी कभी न भूलेगी। पूरे सफर मेरा दिल पिंकी के साथ जुड़ा रहा। पिंकी दिल्ली में अपने मामा के घर चली गयी थी। मैंने उसके मामा को और उनके का घर को कभी न देखा था परन्तु मुझे लग रहा था कि वे जोगेन्दर अंकल जैसे ही रहे होंगे और उनका घर भी चंडीगढ़ के पिंकी के घर जैसा ही होगा। पिंकी ने बताया था कि उनकी कोई संतान नहीं थी। मामा-मामी, उसे और लवली को बहुत प्यार करते थे। बातों-बातों में यह भी पता चला था कि वे काफी अमीर थे। मैं पिंकी को अब तक काफी समझने लगा था। मैं कल्पना करने लगा कि अपने अकेले रह रहे, मामा-मामी के घर पहुँच कर, वह वहाँ कैसे खुशियां बिखेर रही होगी। मैंने बहुत पहले एक हिंदी फिल्म देखी थी। शायद मेरी पहली हिंदी फिल्म थी, ' खूबसूरत ' नाम याद आया, ये फिल्म मैंने घर में माँ के साथ टीवी पर देखी थी। न जाने क्यों मुझे पिंकी में उस फिल्म की नायिका का प्रतिबिम्ब दिख रहा था। सुन्दर, उन्मुक्त और निर्मल। इस फिल्म की नायिका रेखा थी जिसने फिल्म में चरित्र के साथ पूरा न्याय किया था। फिल्म में वह अपनी उपस्थिति से किसी भी माहौल को आनंदमय बना देती थी।
( आज बस, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर )

Wednesday, June 3, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story '---18

                                               ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '---
चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा किया जाता है। आज गुरुवार है, अब आगे...   

( १८ )     मैंने ऐसा महसूस किया था कि जब भी मैं जोगेन्दर अंकल-आंटी के घर पर कुछ समय बिताकर लौटता तो खुद को अधिक अकेला सा पाता था। पंजाबियों के प्रति मेरी सोच कुछ ऐसी रही थी कि ये लोग बहुत मेहनती होते हैं और व्यापार आदि में बहुत सफल हैं। मैं हमेशा से केवल सिखों को ही पंजाबी कहता रहा हूँ। अधिकतर बंगाली यही समझते हैं। इन सिखों का भारतीय सेना में बड़ा योगदान है। मेरी इधर-उधर की जानकारी यह भी थी कि बंगाल के बाद, देश के  स्वतंत्रता संग्राम में पंजाब का सबसे बड़ा योगदान रहा है। नाना से मुझे पंजाब और पंजाबियों के सम्बन्ध में कई कहानियां सुनने को मिलती रही हैं। मुझे यह भी लगता रहा है कि बौद्धिक स्तर पर ये सरदारजी लोग पीछे हैं। खाना-पीना और मौज मस्ती ही इनकी प्राथमिकता है। पिछली शाम ने मुझे अलग से सोचने पर मज़बूर किया कि गीत-संगीत में भी इनकी रूचि है। मेरा मन हमेशा मुझे उलझा देता है। एक सामान्य सी बात से आरम्भ हो, मैं न जाने कहाँ तक निकलता जाता हूँ। आज भी ऐसा ही हो रहा था। मैंने सोचा कि यह तो एक पंजाबी परिवार के साथ मेरा अनुभव है। अधिकतर सिख लोग ऐसे न होते होंगे ? मेरी इस धारणा के पीछे सरदारों के साथ जुड़े हुए हंसी-मज़ाक के किस्से भी थे जो यार-दोस्तों की महफ़िलों में चलते हैं। आज पहली बार मुझे ऐसा लगा कि बिना अधिक जानकारी लिए हमें समाज के किसी वर्ग के बारे में कोई धारणा नहीं बना लेनी चाहिए। यह बात बिहारियों, मारवाड़ियों और दक्षिण भारतियों के बारे में भी प्रासंगिक है। मैं अच्छे से समझता था कि हमारा बंगाली वर्ग इन लोगों को किस दृष्टि से देखता है ?  

नाना से ऐसे विषयों पर अक्सर बातें होती रहती हैं। उनका एक संतुलित दृष्टिकोण रहा है। इस विषय पर सोचते हुए मैं उन्हें ही याद करने लगा। न जाने अब उनकी सेहत कैसी होगी ? मैंने माँ को फोन करने की सोची। आज जब यह सब लिख रहा हूँ, आपस में संपर्क कितना सरल हो चुका है। सबके हाथ में मोबाइल फोन है। कहीं भी कभी भी किसी से संपर्क किया जा सकता है परन्तु उन दिनों यह इतना सरल न था। मोबाइल गिनेचुने लोगों के पास ही होता था। मैं बाहर आया और गेस्ट हाउस के दाहिने छोर से आगे निकल एक टेलीफोन बूथ में चला आया। यह एक छोटी सी दैनिक सामान की दुकान थी और यहीं से मैं पहले भी घर पर फोन कर चुका था। फोन मिलाया, दूसरी ओर से माँ की आवाज़ सुनाई दी। वे शायद मेरे फोन की ही प्रतीक्षा कर रही थीं। मेरे हेलो कहते ही उन्होंने मेरा हालचाल पूछना शुरू कर दिया। उन्हें मेरे खानपान की चिंता थी। हर माँ का दिल ऐसा ही होता है। मैंने किसी तरह उन्हें आश्वस्त किया कि सब ठीक ठाक है और उनसे नाना के बारे में पूछा तो वो विचलित हो गयीं। उन्होंने बताया कि वे अभी भी अस्पताल में थे बल्कि पिछली रात से उन्हें आई सी यू में रखा गया था। कई तरह की स्वास्थ्य सम्बन्धी जटिलताएं देखी जा रही थीं। उनकी बढ़ती आयु और दुर्बलता सबसे बड़ी समस्या थी। माँ ने बताया कि उन दिनों वे बहुत दबाव में थीं। सब कुछ उन्हें ही संभालना पड़ रहा था। मैंने बाबा के बारे में पूछा तो जैसा अपेक्षित था, माँ से वैसा ही उत्तर मिला कि उनका होना न होना एक सामान था। उन्हें ही घर-बाहर सब अकेले देखना पड़ रहा था। बाबा के बारे में मुझे अपनी माँ की ये बात अच्छी न लगी। मेरे बाबा ऐसे नहीं हैं पर माँ उन्हें कुछ करने ही न देती होंगी। बात समाप्त करने से पहले मैंने कहा कि क्या मैं वापिस आ जाऊं तो उन्होंने जोर देकर कहा कि नहीं, वे संभाल लेंगी। 

उस रात नींद न आयी। मैं अपने घर, माँ, बाबा और नाना के बारे में ही सोचता रहा। अगला दिन भी ऐसे ही बीत गया। मुझे लग रहा था कि इस समय मुझे घर पर अपने माँ-पिता के पास होना चाहिए था। मैं इस ट्रेनिंग से भी धीरे-धीरे ऊब रहा था। ऐसा लगता ये सब लेक्चर बेमानी हैं। मुझे इस विषय पर पिंकी की कही बातें अब सार्थक लग रही थीं। रात  इधर-उधर होते कटी। अगली सुबह भी बोझ सी लगी। मन किया कि बच्चों सा कोई बहाना बनाऊँ और क्लास न जाऊँ। परन्तु बेमना और लाचार, मैं यह सोचकर क्लास में चला गया कि दिन भर कमरे में अकेले पड़ा भी क्या करूँगा ? क्लास का पहला  घंटा अभी आधा भी न हुआ था कि एक चपरासी सूचना दे गया कि मेरा फोन आया है। मैं तेजी से निकला। न जाने किसका फोन है ? शायद पिंकी का हो ? क्लास रूम के दाहिने छोर पर ऑफिस में एक ओर फोन रखा था। मैंने हेलो कहा तो उधर से जोगेन्दर अंकल की आवाज़ आयी। उन्होंने धीरे से कहा, ' बेटा कैसे हो ?  मैंने सीधे सीधे कहा, ' हाँ अंकल मैं बिलकुल ठीक हूँ..'  वे क्षण भर को शांत रहे। मैं भी सोचने लगा कि उन्होंने अचानक फोन क्यों किया ? अंकल ने बात आगे बढ़ाई, ' बेटा, एक ख़राब खबर है, तुम्हारे नानाजी नहीं रहे..'  खराब खबर का सुनते ही मुझे अनुमान हो गया था कि कौन सी खबर है। मैंने उनसे पूछा कि ये कब हुआ। उन्होंने बताया कि अभी लुधियाना से सुखबीर भाई साहब का फोन आया है। मेरी माँ ने उन्हें फोन किया था। उन्होंने मुझे ढाढ़स बांधते हुए कहा कि उन्होंने भी कलकत्ता में मेरे घर पर बात की थी। वे मेरा कलकत्ता जाने का इंतेज़ाम कर रहे थे। उन्होंने एक बार फिर से मुझे तसल्ली दी और कहा कि सब वाहे गुरूजी की इच्छा है, इंसान के हाथ में कुछ नहीं होता, धैर्य रखना होता है। किसी अपने की मृत्यु पर ऐसी बातें हम सब एक-दूसरे से कहते रहते हैं। प्रेम निवेदन और सांत्वना प्रदर्शन के ही कुछ शब्द हैं जो संभवतः दुनिया के प्रत्येक समाज, प्रत्येक भाषा में एक से हैं।  
( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को यहीं पर )