Chander Dhingra's Blog

Wednesday, June 24, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ( ' Two States - A Story ' ) - 21

                                                     ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
                 (  ' Two States - A Story ' )
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हर हफ्ते इस लम्बी कहानी ( उपन्यास ) को साझा किया जाता है। आज गुरुवार है, अब आगे..  

( २१ )       अगले दो दिन इधर-उधर के श्राद्ध सम्बन्धी कार्यों में ही बीत गए। पंडित जी दोनों दिन आये और न जाने माँ से क्या-क्या करवाते रहे। बारह दिन बाद नाना का श्राद्ध था। इस दिन बहुत लोगों के आने की सम्भावना थी। माँ चाहती थी कि ये सब काम अच्छे से होना चाहिए। मेरे बाबा इस कार्यक्रम को घर पर ही करवाना चाहते थे परन्तु माँ का मानना था कि घर पर स्थान छोटा था और व्यवस्था ठीक से न हो पायेगी। एक बार पुनः बाबा को पराजित होना पड़ा और श्राद्ध  के लिए रासबिहारी इलाके का गौड़िया मठ चुना गया। मैं और माँ वहां जाकर सब बात कर आये। ये एक पैकेज जैसी व्यवस्था थी। सब कुछ मठ वाले करने वाले थे हमें केवल भुगतान कर देना था। नियम अनुसार हमने अग्रिम भुगतान कर दिया। जब हम वहाँ पहुंचे तो किसी के श्राद्ध का कार्यक्रम चल रहा था। प्रबंधक ने बताया कि सुबह एक और अपरान्ह ने दूसरा श्राद्ध का कार्यक्रम था। उन्होंने ये भी कहा कि अच्छा हुआ की हम समय से पहुँच गए वर्ना शायद बुकिंग न मिल पाती। मुझे लगा कि शादी-ब्याह के लिए, यदि समय से बुक न किया जाये तो जैसे बैंक्वेट हॉल नहीं मिल पाते, वैसे ही श्राद्ध आदि के लिए इन मठों की भी बहुत मांग है। हम लोग श्राद्ध के कार्ड्स  प्रिंटिंग प्रेस में छपने को देते हुए घर आये। प्रेस वाले को निर्देश दिया गया कि यह काम आज ही हो जाना चाहिए। शाम को घर पर कार्ड्स पहुँच गए। माँ विलम्ब नहीं चाहती थी। मेरे चंडीगढ़ लौटने से पहले वह चाहती थी कि ये कार्ड्स सबको नहीं तो कुछ खास खास लोगों को तो पहुँचा ही दिए जाएँ । माँ का मानना था कि मेरे लौट जाने पर वह फिर से अकेली पड़ जायगी। न जाने उसे क्यों लगता था कि मेरे बाबा ये सब काम न कर पाएंगे ?

माँ के साथ कार्ड्स वितरित करते हुए रविवार आ गया। आज मुझे आ लौट जाना था। माँ ने फिर से कहा कि रुक जाता तो अच्छा था परन्तु बाबा ने कहा, 'ड्यूटी तो ड्यूटी है..'  माँ और बाबा दोनों की आँखे नम थी। टैक्सी में बिठाने के लिए दोनों आये। व्यस्तता ने मुझे ऐसा उलझा दिया था कि मैं सब कुछ भूल ही गया था। माँ के साथ यहाँ-वहां दौड़ता रहा। अब टैक्सी में निढाल हो बैठा तो पहली बात दिमाग में यह आयी कि पिंकी दिल्ली एयरपोर्ट पर आएगी तो ? यदि न आई तो समस्या हो जाएगी। मुझे एक बार फिर से फोन करना चाहिए था। वैसे वह बात की पक्की लड़की थी। उसने कहा था एयरपोर्ट पर मिलेगी, तो जरूर मिलेगी ही। उसे मेरी फ्लाइट की पूरी जानकारी थी। मैं नाहक परेशान हो रहा था, पिंकी नहीं आयी तो देखा जायेगा। बस से चंडीगढ़ निकल जाऊँगा परन्तु, बस से बहुत वक्त लग जायेगा। पहुँचते-पहुँचते रात हो जाएगी। सोचा, एयरपोर्ट पर किसी बूथ से उसे फोन कर लूंगा। मैं पूरी हवाई यात्रा में चिंतित सा रहा। परन्तु कुछ भी इधर उधर न हुआ। समय से दिल्ली पहुँच गया। एयरपोर्ट से बाहर निकल देखा, दूर एक ओर पिंकी मुस्कुरा रही थी। उसने हाथ उठा हेलो कहा और मेरा सूटकेस ले लिया। चंडीगढ़ से आया ड्राइवर साथ था। सूटकेस ले वह आगे आगे बढ़ा और हम दोनों उसके पीछे। ' सब ठीक ठाक .. कोई परेशानी तो नहीं हुई न ?  मैंने ना में सिर हिलाया। उसने कहा कि मामा जी के घर से होते हुए जाना था, वे मुझसे मिलना चाहते थे। मुझे असुविधा सी लगी परन्तु मैं कुछ कह न सका सिर्फ यही कहा, ' मुझे कल सुबह क्लास अटेंड करनी है..'  पिंकी हंसी, ' कल सुबह न ? हम लोग तो आज शाम को ही पहुँच जाएंगे..'

पिंकी के मामा का घर तो जोगिन्दर अंकल के घर से भी अधिक शानदार था। एक विशाल भवन था जो दिल्ली के महंगे इलाके में था। मैं देखता ही रह गया। उन्होंने बहुत गर्मजोशी से मुलाकात की। एक बार पुनः नाना के न रहने पर मुझे सांत्वना दी। वे नाना की बहुत प्रशंसा कर रहे थे। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग अब धीरे धीरे चले जा रहे थे। उन्होंने कहा,' इन लोगों ने देश को आज़ाद कराया और आज के नेताओं को देखो, कैसे स्वार्थी हैं ?  उनकी बातों में एक सामान्य नागरिक की वाणी थी। उनका घर और वैभवता देख मैं सोचने लगा, ये सरदारजी बड़ी बड़ी बातें तो कर रहे हैं परन्तु खुद कैसे कैसे हथकंडे किये होंगे जो ऐसी भव्यता हासिल की है ? ये भी तो देश की आज़ादी के बाद दूर पंजाब के किसी गांव से दिल्ली में विस्थापित बन आये होंगे और छोटा-मोटा  व्यापार शुरू किया होगा। मैंने चंडीगढ़ में जोगेन्दर अंकल का घर देखा और अब यहाँ दिल्ली में इनका। मैं आश्चर्यचकित था। हम बंगाल में इतना कुछ हासिल न कर सके। हालात तो दोनों राज्यों में एक से थे। क्या हम लोग केवल राजनीति ही करते रह गए और नए मिले अवसरों का लाभ न ले सके ? मुझे यह भी लगा कि न जाने क्यों हम बंगाली लोग मेहनत करने में पीछे रह गए ?

हमने वहां लंच किया। एक बेहतरीन पंजाबी लंच। घर से निकलते समय पिंकी की मामी ने मेरे हाथ में एक पैकेट पकड़ाया। मैंने पिंकी की ओर जिज्ञासा से देखा। उसने कहा रख लीजिये। मामी ने प्यार जतलाते हुए कहा, ' हमारे घर पहली बार आये हो...खाली हाथ थोड़े ही जाओगे..' मैंने संकोच के साथ ' थैंक यू आंटी' कहा। हम कार में पीछे की सीट पर बैठ गए और चंडीगढ़ की ओर निकल गए। कार थोड़ी दूर ही गयी होगी कि मैंने कहा, ' देखें, तुम्हारी मामी जी ने क्या दिया है ? मैंने पैकेट खोला। सुन्दर और महँगा सूट का सेट था। मन ने एक बार फिर से प्रश्न किया। पैसे वाले हैं तो ऐसी महंगी गिफ्ट ही देंगे, कोई दूसरी गिफ्ट जैसे पुस्तक आदि देने का विचार इन सरदारजी लोगों को थोड़ा ही आएगा ? 

रास्ते में फिर से विविध विषयों पर बातें हुई। पिंकी नाना जी के अंतिम संस्कार के बारे में जानना चाहती थी। मैंने उसे सब बताया। मैंने गुरूद्वारे से आये शव वाहन और अंतिम यात्रा में एक वरिष्ठ मंत्री जी के आने के बारे में भी बताया और ये भी कि बहुत लोग आये थे। पिंकी प्रभावित थी परन्तु वह चाहती थी कि इतने बड़े स्वतंत्रता सेनानी को श्रद्धांजलि और अधिक सम्मान से दी जानी चाहिए थी। उसने कहा, ' तुम्हारे नानाजी यदि पंजाब में होते तो देखते.. कैसे भव्य रूप से विदा किये जाते..'  मैं उसका मुख देखता रह गया। वह सत्य कह रही थी। मैंने नाना से पंजाब में शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों को दिए जाने वाले सम्मान के बारे में बहुत कुछ सुना हुआ था।  पंजाब ने भगत सिंह की माँ को 'पंजाब माता' के ख़िताब से सम्मान दिया है। बातों बातों में अमृतसर के जलियांवाला बाग़ की चर्चा भी हुई। अचानक पिंकी ने उछलते हुए कहा, ' चलो तुम्हें अमृतसर घूमाकर लाते हैं..'  अगले संडे चलते हैं.. स्वर्णमंदिर, जलियांवाला बाग और वागा बार्डर..'   उसके निर्मल उत्साह को मैं देखता ही रह गया। मैंने मुस्कुराते हुए कहा, ' अरे.. मेरे लिए इतना करोगी.. पर जब तुम  कलकत्ता आओगी तो मैं इतना कुछ न कर पाऊंगा.. कलकत्ता का हिसाब ऐसा नहीं है..'  पिंकी ने हँसते हुए कहा, ' मत करना यार.. ' उसके मुख से यार शब्द सुनना मुझे अच्छा लगा।  ' तो फिर संडे सुबह मैं, तुम और लवली.. अमृतसर ट्रिप.. फाइनल.. ओके ..' पिंकी का उत्साह बढ़ता जा रहा था। मैं भीतर ही भीतर खुश हो रहा था कि चलो, जलियांवाला बाग़ घूमना हो जायेगा। मैंने नाना से इसकी पूरी कहानी सुनी हुई थी। मुझे गर्व होता था कि कैसे गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ने इसका विरोध किया था और अंग्रेज़ों द्वारा दिए गए सम्मान को लौटा दिया था। मेरे नाना जब भी दिल्ली आते तो मौका मिलते ही अमृतसर का चक्कर लगा लेते। वह अमृतसर के खाने की बहुत प्रशंसा किया करते थे। माँ उन्हें चिढ़ाने के लिए कभी कभी कहती, ' तुम तो पिछले जन्म के पंजाबी हो  .. '  

यूँ ही हँसते हंसाते हम चंडीगढ़ की ओर बढ़ रहे थे। मैं कलकत्ता के अपने घर और नाना के चले जाने की वेदना को भूल गया था। पिंकी के कारण ही यह हुआ था। अचानक ड्राइवर ने पंजाबी भाषा में पिंकी से कुछ कहा और पिंकी ने मुझसे पूछा कि वो रिसोर्ट जहाँ हमने दिल्ली जाते समय लंच किया था आ रहा था और क्यों न हम छोटा सा ब्रेक वहीँ ले लें। मुझे लगा मानों पिंकी ने मेरा मन पढ़ लिया था क्योंकि मैं स्वयं ही इस ढाबे के बारे में सोच रहा था। हम लोग वहां कुछ देर रुके और गरम गरम पकोड़े और चाय ली। मुझे दिखा कि आसपास की टेबल्स पर भी कुछ ऐसा ही चल रहा था। मन में आया कि पिंकी से चिकन के पकोड़े और फिश फ्राई के बारे में पूँछू पर संकोच कर गया। मुझे अपने कलकत्ता की याद आ रही थी कि कैसे कभी कभी हम वहां गरियाहाट जाकर, एक खास जगह से फिश फ्राई खाया करते थे। ये पनीर और आलू के पकोड़े उसका मुकाबला नहीं कर सकते थे। हरी पुदीने की चटनी खाते वक्त मुझे अपनी सरसों की सॉस जिसे कासुंदी कहा जाता है, याद आई। मैंने पिंकी से पूछा कि इस तरफ पंजाब में फिश आदि नहीं मिलते। पिंकी ठहाका लगा हंसने लगी। उसने कहा, ' वाह, हमारे बंगाली बाबू मोशाय को अपनी प्यारी मछली की याद आ गई... थोड़ा रुको, अगले संडे अमृतसर जा ही रहे हैं, तुम्हें असली अमृतसरी फिश खिलाएंगे...उसे खा कलकत्ता की मछली भूल जाओगे...'  
( आज बस, आगे यहीं पर, अगले गुरुवार को.. ) 

Wednesday, June 17, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' -20


                                              ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
( Two States - A Story )
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हर हफ्ते इस लम्बी कहानी ( उपन्यास ) को साझा किया जाता है। आज गुरुवार है, अब आगे..  

 ( २० )     फ्लाइट समय से कलकत्ता एयरपोर्ट पर उतरी। बाबा मुझे लेने आये हुए थे। टैक्सी से हम दोनों कुछ समय में घर पहुँच गए। माँ के पांव छुए तो उन्होंने गले लगा लिया और रोने लगी। मैं नाना के चले जाने के दुखद समाचार मिलने से अब तक रोया न था। शायद मेरे आँसू सही अवसर की प्रतीक्षा में थे। माँ से मिलना वही अवसर था। माँ से लिपट मैं भी रोने लगा। आंसू थे कि बहे जा रहे थे। माँ को सहसा अहसास हुआ कि मैं बहुत दूर से अकेला आया हूँ। उन्होंने खुद को संभाला और मुझे ढाढ़स देने लगी। मेरा हाथ पकड़ वे मुझे नाना के कमरे में ले गयी। यहाँ उनका पार्थिव शरीर रखा हुआ था। माँ ने बताया कि अंतिम कार्य मेरी प्रतीक्षा में रुका हुआ था। नाना को इस रूप में देखने की मैंने कभी कल्पना न की थी। मुझे लगा कि वे शांत सोये हुए थे, जैसे हमेशा थक जाने पर सो जाते थे और अभी उठकर मुझसे सुखबीर सिंह, उसके चंडीगढ़ वाले भाई, उनके परिवार और पंजाब के बारे में पूछेंगे। क्षण भर को मैं भूल गया कि वे चिरनिद्रा में थे। मैं सच में उनके उठने और बोलने की प्रतीक्षा में था परन्तु ऐसा न होना था और न हुआ। मेरे नाना, जिन्होंने हमारी आज़ादी की लड़ाई में सबके साथ मिलकर भाग लिया था, जिन्होंने कई बार जेल यात्राएं और कई तरह की प्रताड़नाएं सही थी, आज अपने में हज़ारों अनकही कहानियां और स्वतंत्र भारत के लिए कई कई अपूर्ण सपने लिए चुपचाप हमेशा-हमेशा के लिए सोये थे। माँ लगातार रोये जा रही थी। मेरे बाबा ने हम दोनों को सँभालने की कोशिश की और हमें कमरे से बाहर ले आये। 

घर पर सगे-सम्बन्धियों, आसपड़ोस के साथ-साथ कई अन्य लोग आये हुए थे। नाना के परिचितों और प्रशंसकों का एक बहुत बड़ा दायरा था। वे वामपंथी विचारधारा से जुड़े थे एवं राज्य सभा के सदस्य भी रह चुके थे। मुझे घर में ऐसी ही भीड़भाड़ की आशा थी। मेरे यहाँ पहुँचने के बाद से ही हलचल आरम्भ हो गयी थी। शव यात्रा के सारे प्रबंध हो चुके थे। मैं घर के किसी कोने में एकांत में कुछ क्षण बैठना चाहता था परन्तु माहौल कुछ ऐसा था कि सभी विलम्ब नहीं चाहते थे। मुझे मेरे चाचा का स्वर सुनाई दिया, ' केवराटोला में कभी कभी बहुत भीड़ होती है .. और विलम्ब किया तो आधी रात के बाद नंबर आएगा..'  माँ ने उन्हें रोकते हुए कहा, ' बेटा अभी अभी दूर से आया है..चंडीगढ़ से दिल्ली और फिर कलकत्ता.. उसे साँस तो ले लेने दो..'  चाचा खामोश हो गए, कुछ ऐसा सोचकर कि उनका कर्तव्य था सो उन्होंने कह दिया। माँ ने मुझसे पूछा कि मैंने कुछ खाया था कि नहीं ? मैं माँ को देखता रह गया। ये माँ ही होती है जिसे अपने पिता के शव के दूसरे कमरे में होने पर भी दूर से घर  लौटे बेटे ने कुछ खाया है या नहीं, यह चिंता रहती है।

मैंने माँ को आश्वस्त किया कि मैंने खाना खाया हुआ था और मैं ठीक था। माँ ने मुझे तैयार होने को कहा और फिर बाबा से कहा कि अब शव को ले चलना चाहिए। मैं ऊपर वाले कमरे में चला आया। यहाँ मेरा और माँ-बाबा के साथ साथ सटे दो कमरे थे। मैंने माँ के कमरे में रखे फोन से जोगेन्दर अंकल का नंबर मिलाया और उन्हें अपने ठीक ठाक से कलकत्ता पहुँच जाने की खबर दी। उन्होंने मेरा उत्साह बढ़ाते हुए बताया कि लुधियाना से उनके बड़े भाई सुखबीर भी कलकत्ता आने की सोच रहे थे और वे मेरी माँ से एक बार फिर से बात करेंगे। जोगेन्दर अंकल से फोन पर बस इतनी ही बात हुई। हमेशा की तरह मुझे अकेलापन सा लग रहा था। मैंने अपनी पॉकेट से छोटी सी डायरी निकाली। इस डायरी में खास टेलीफोन नंबर रखा करता था। मैं जल्दी में किसी एक नंबर को खोज रहा था। मुझे नीचे उतर अपनी माँ और बाबा के साथ नाना की अंतिम यात्रा के कार्य में जुटना भी था। परन्तु मैं एक फोन कर लेना चाहता था। मैंने दिल्ली का एक नंबर घुमाया। ये पिंकी के मामा के घर का नंबर था जो उसने मुझे दिल्ली एयरपोर्ट पर लिखवाया था। जिन्होंने फोन उठाया न मालूम कौन थे परन्तु मेरे मुँह से कलकत्ता का नाम सुनते ही उन्होंने अपनी ओर से अफ़सोस जाहिर करना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि देश ने एक बहुत बड़े शख्स को खो दिया था। उन्होंने बताया कि कई साल पहले जब नाना दिल्ली आये थे तब वे उनसे मिलने बंगाल भवन गए थे। मैं समझ गया था कि वे बंग भवन कहना चाह रहे थे क्योंकि दिल्ली आने पर नाना यही रुकते थे। फोन पर पिंकी के मामा ही थे। वे अंग्रेजी में बात कर रहे थे। मैं तो यस सर- यस अंकल ही कर रहा था। अपने भीतर मुझे पिंकी से बात करने की उत्सुकता थी। संकोच करते हुए मैंने कहा, ' पिंकी है, अंकल ?  पिंकी फोन पर आयी और उसने मेरा हालचाल पूछा। मेरी तरह वह भी कुछ जल्दी में थी। उसने कहा कि बाद में अच्छे से बात करेंगे। फोन रख मैं नीचे आ गया। शव यात्रा की तैयारी हो चुकी थी। नाना जीवनपर्यन्त रूढ़िवादिता का विरोध करते रहे परन्तु आज उनकी बेटी अंतिम संस्कार पूरे हिंदू विधि-विधान और मान्यताओं के साथ करना चाहती थी। दो पंडित आये हुए थे। वे माँ को पग पग पर सलाह दे रहे थे। बाबा हमेशा की तरह लाचार और तटस्थ से, माँ द्वारा की जा रही व्यवस्था को देख रहे थे। मुझे सुनाई दिया कि मृत देह को ले जाने हेतु जो वाहन आने वाला था,वह स्थानीय गुरूद्वारे से बुलाया जा रहा था। शव यात्रा निकलने को ही थी कि खबर आयी कि राज्य शासन के एक बड़े मंत्री जो श्मशान घाट पहुँचने वाले थे,अब यहीं आ रहे थे और श्मशान घाट तक साथ जाने वाले थे। यात्रा को रोक दिया गया। बाबा ने कहा कि इस तरह विलम्ब करना उचित नहीं परन्तु माँ ने कहा कि एक बड़े मंत्री राज्य की मंत्री सभा का प्रतिनिधित्व करने आ रहे थे, तो रुकना ही होगा और साथ ही वे नाना के पुराने मित्र भी थे। कुछ ही समय में मंत्री जी की गाड़ी और दो अन्य गाड़ियां वहां पहुंच गयीं। हम लोग उनकी प्रतीक्षा में बाहर ही खड़े थे। हमारा घर मुख्य सड़क से भीतर आती हुई गली के एक छोर पर है। मंत्री जी के साथ पुलिस के अधिकारी भी थे। उन्होंने माँ और मुझे सांत्वना दी। मेरे बाबा साथ ही खड़े थे। उन्होंने मेरे चंडीगढ़ से आने और विलम्ब के बारे में बताया। मंत्री जी ने साथ आये पुलिस अधिकारी से बात की और फिर माँ को बताया कि श्मशान घाट में किसी तरह की देरी और असुविधा न होगी। वहां पर सूचना भिजवा दी गयी थी। शव यात्रा आरम्भ हो गयी। घर से मुख्य सड़क तक मंत्री जी साथ चले फिर अपनी गाड़ी में बैठ गए। गुरूद्वारे वाले वाहन मैं, बाबा और चाचा तथा अन्य गाड़ियों में सभी लोग केवराटोला श्मशान घाट की ओर बढ़ गये। हमारे घर के आसपास रहने वाले परिचित लड़के, शव वाहन के ऊपर आ गए थे। वे हरि बोल..हरि बोल की ध्वनि कर रहे थे। उनके हाथ में कुछ बड़े पैकेट मुड़ी के थे जो पूरी शव-यात्रा में वे लोग बिखेर रहे थे। घर से चलते वक्त कुछ सिक्के भी बिखेरे गए थे जिसे बटोरने के लिए आसपास रहने वाले गरीब बच्चे पहले से ही तैयार थे। हरि बोल..  हरि बोल..की ध्वनि सुन मुझे कलकत्ता में होने वाली राजनैतिक जलूसों में की जाने वाली चोलबे ना..चोलबे ना.. की ध्वनि सुनाई दे रही थी। ये चोलबे ना..चोलबे ना.. उन दिनों बहुत प्रचलित था और विरोध प्रदर्शन का सूत्र जाना जाता था। 

मंत्री जी और पुलिस के साथ होने के कारण सभी कार्य सुविधापूर्वक संपन्न होता चला गया। कुछ घंटों बाद कार्य पूर्ण कर सब लौट आये। घर पहुँचने पर लगा कि मुझे अब विश्राम की आवश्यकता थी। माँ ने कहा कि वे मेरे उच्च अधिकारियों से बात करेंगी कि मुझे वापिस न जाना पड़े और मुझे इस प्रशिक्षण के अगले सत्र में भेजा जाये। उन्होंने मंत्री जी को भी इस सम्बन्ध में बताया था। मेरे कार्यालय के अधिकारियों के साथ रोबी दा भी आये थे। उन्होंने माँ को आश्वस्त किया था कि चिंता न करें। मैंने जब ये सुना तो अपना विरोध जताया। मैंने कहा कि आधा कोर्स हो चुका था, इसे पूरा कर लेना ही ठीक था और मैं पूरा सामान भी लेकर नहीं आया था। माँ ने कहा, ' देखा जायेगा..'  मैं कहीं न कहीं मन बना चुका था कि निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ही लौटूंगा। बात करने को मेरा लहजा देख, माँ भी समझ चुकी थी कि इस विषय को यहीं रोकना उचित होगा और यह कि मैं मन बना चुका था। उन्हें लग रहा था कि मैं अब किसी की भी नहीं सुनने वाला था।
( आज बस, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर ) 

Wednesday, June 10, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' -19



                                               ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा किया जाता है। आज गुरुवार है, अब आगे..  
              
( १९ )       मैं सोच में आ गया कि जोगेन्दर अंकल ने यह कैसे कहा कि वे मेरा कलकत्ता जाने का प्रबंध कर रहे थे? मेरा कोर्स तो अभी चल रहा था। वैसे मैं नाना की खबर से दुखी था। मुझसे उन्हें बहुत प्यार था। उनसे मैंने देश की आज़ादी के संग्राम की और अंतरर्राष्ट्रीय समाज की बहुत सी बातें व किस्से सुने थे। वे खुले नज़रिये वाले शख्स थे जिन्हें  पंजाब और उससे आगे फ्रंटियर प्रान्त वाले लोगों से आंतरिक स्नेह रहा था। मैं नहीं चाहता था कि वे मुझसे मिले बिना चले जाएं। मैं तो खुद कलकत्ता वापिस लौटने पर उन्हें चंडीगढ़, जोगेन्दर अंकल के घर और यहाँ की बहुत सी बातें सुनाना चाहता था। मैं जानता हूँ वे बहुत खुश होते और मेरी एक एक बात के साथ अपने अनुभवों की पोटली से कई कई  संस्मरण निकालते जाते। मैं उदास था। क्लास में नहीं गया। नीचे आ एक बेंच पर चुपचाप बैठ गया, यूँ ही। न आँखों में आंसू थे, न कोई विशेष सी बेचैनी। मैं अकेला था और बस यही अकेलापन इस वक्त मेरे साथ था। अक्सर आंसू तब ही आते हैं जब उन्हें देखने और आपसे सहानुभूति दिखाने वाला कोई साथ हो। यह सहानुभूति भले ही औपचारिक ही क्यों न हो। मुझे क्लास में न लौटता देख कुछ साथी नीचे आ गए। वे शांत थे। मेरे नाना के इस दुनिया से चले जाने की खबर सुन वे सहानुभूति की मुद्रा में आ गए थे। एक ने नाना की आयु पूछी और अधिक आयु जानने पर कुछ संतोष का सा भाव दिखाया। मुझे लगा कि किसी का अधिक आयु में संसार से चले जाने को एक सामान्य घटना कैसे माना जा सकता है ? अब मेरी आंखे नम होने लगी थीं। इलाहाबाद वाला तपन भी वहीं था। वह मेरे पास आया और उसने धीरे से बांग्ला में मुझसे पूछा कि अब मेरा क्या करने का विचार था ? मैंने उसकी ओर देखा और कहा कि कुछ पता नहीं पर मेरा इस समय घर पर अपनी माँ के साथ होना आवश्यक था। आज यहाँ घर से दूर चंडीगढ़ में किसी से अपनी बांग्ला भाषा में संवाद करना अच्छा लग रहा था। 

थोड़ी देर में जोगेन्दर अंकल का फिर से फोन आया। उन्होंने कहा कि फ्लाइट से मेरे कलकत्ता जाने की व्यवस्था हो गयी थी। फ्लाइट दिल्ली से थी उन्होंने कहा कि वे मुझसे मिलने आ रहे थे और मुझे तैयार रहने को भी कहा क्यों कि तुरंत ही दिल्ली के लिए निकल जाना था। मैं चकित सा रह गया। कमरे में आ सामान अपने सूटकेस में रखने  लगा। तपन मेरे साथ था। अब मेरे मन की स्थिति ऐसी थी कि नाना की मृत्यु पीछे रह गयी थी और कलकत्ता वापिस लौटना, अपनों से अचानक मिलना और प्रथम हवाई यात्रा का होने वाला अनुभव आगे आ गये थे। कुछ ही समय में अंकल आ गए। उनके साथ पिंकी भी थी। उसे देख मैं हैरान रह गया। अब अंकल ने पूरी बात बताई। उन्होंने बताया कि कलकत्ता में मेरे ऑफिस में बात कर ली गयी थी और उन्होंने भी यहाँ मेरे इंस्टिट्यूट के डायरेक्टर से बात कर ली थी। मुझे एक दिन का विशेष अवकाश दिया गया था। साथ ही रविवार और एक राष्ट्रीय अवकाश का दिन था। सो चार दिन हो गए। दिल्ली से शाम की फ्लाइट थी। पिंकी को दिल्ली में अपने मामा के पास जाना था। उन्होंने कहा कि वह मुझे एयरपोर्ट पर छोड़ देगी और वहां से अपने मामा के घर चली जाएगी। उसके मामा कुछ दिनों से चाह रहे थे कि पिंकी कुछ दिन उनके पास आकर रहे। तीन दिन बाद वह मुझे लेते हुए वापिस चंडीगढ़ आ जाएगी। एक साथ दोनों काम हो जायेंगे। वे अपने ड्राइवर के साथ पूरी तैयारी कर के आये थे। प्रशिक्षण को बीच में नहीं छोड़ा जा सकता था परन्तु मैं अपनी माँ को जानता था। उन्होंने नाना का नाम लेकर पूरा प्रभाव लगा दिया होगा तकि मैं कुछ दिन के लिए घर लौट सकूँ। मैं अपने कमरे में गया और सूटकेस लेकर नीचे आ गया। थोड़ी देर में मैं और पिंकी दिल्ली की ओर रवाना हो गए। 

रास्ते में पिंकी ने मुझे बताया कि किस तरह से सब संजोग बनते चले गए और सब कुछ ठीक से हो गया। उसके दिल्ली वाले मामा कई दिनों से उसे बुला रहे थे परन्तु जाना न हो पा रहा था। पिंकी ने पहली बार मुझे ढाढ़स बांधने की कोशिश की, बताया कि उसने भी अपने नाना को बचपन में ही खो दिया था। उसे अपने नाना की बहुत हल्की सी यादें थी। मेरे नाना के बारे में वह लुधियाना वाले सुखबीर अंकल से कई बार सुन चुकी थी। उसे बहुत गर्व था कि कैसे उस समय के लोग देश के लिए सब कुछ लुटा देने को तैयार रहते थे। मैं तो जोगिन्दर अंकल के स्नेह और प्यार से अभिभूत था। मैं उनका कोई सम्बन्धी न था और प्रथम बार उनसे मिला था परन्तु वह कैसे वे मेरे प्रति अपने दायित्व को निभा रहे थे। पिंकी और मैंने इस दौरान बहुत विषयों पर बातें की। चंडीगढ़ से दिल्ली का सड़क मार्ग अत्यंत साफ सुथरा और बेहतरीन था। गाड़ियाँ बहुत तेजी से दौड़ रही थीं। लगता था हम किसी विदेशी हाइवे पर थे। हम लोग मार्ग में एक ढाबे पर रुके। इस दिन को याद कर रहा हूँ तो यहाँ खाये भोजन को कैसे भूल सकता हूँ ? आज भी वो स्वाद मानों मुँह में बसा है। खाना जायकेदार था, पिंकी जैसी खुश मिज़ाज एक नयी दोस्त साथ में थी और मेरे मन में घर पहुँचने की प्रतीक्षा। मैं नाना के चले जाने की दुखद बात को भूल ही गया था। हम दोनों ने इन कुछ घंटों में कई बातें की। फिल्मों की, गीत-संगीत की और देश की। पिंकी हर बात को एक नया और आनंदभरा स्वर देने में माहिर लगी। किसी किसी बात पर तो वह ऐसा ठहाका लगाती कि लगता निर्मल आनंद का फुव्वारा फूट पड़ा हो। जब मैंने उसे किसी की मृत्यु पर होने वाली बंगाली रस्मोरिवाज के बारे में बताया तो वह आश्चर्यचकित हो सुनती रही। नियमभंग और इस अवसर पर होने वाले समाज भोज का सुन वह हंस पड़ी। मैंने अपने बंगाली आडम्बरों को न्यायसंगत करने की कोशिश न की। उसकी हंसी में मुझे समाज के प्रति तिरस्कार नहीं अपितु विडम्बना का भाव दिखा था। इन कुछ घंटों में मैं पंजाब और पंजाबियों को एक नयी नज़र से देखने में सक्षम हो गया था। हम दिल्ली पहुँच चुके थे। भीड़ भाड़ वाली सड़कों से होते हुए, हम एयरपोर्ट पर पहुंचे। गाड़ी से उतरने पर पिंकी ने मुझे उसकी ओर से घर में सभी को हेलो कहने को कहा। उसने मुझे गले लगाया और कहा कि तीन दिन बाद शाम को वह मुझे यहीं एयरपोर्ट पर मिलेगी। अपना ख्याल रखना कह, वह  कार  में बैठ अपने मामा के घर की ओर निकल गयी। मैं कु फिर से एक बार अकेलापन सा महसूस करने लगा। 

यह मेरी पहली हवाई यात्रा थी। मैं रोमांचित था। मुझे यह सोचकर एक सुखद अनुभूति हो रही थी कि अभी दिल्ली में था और दो-तीन घंटे में कलकत्ता में अपने घर पर पहुंच जाने वाला था। ज़िंदगी की कई पहली बातें हमेशा-हमेशा के लिए दिल पर जगह बना लेती हैं। यह यात्रा भी कभी न भूलेगी। पूरे सफर मेरा दिल पिंकी के साथ जुड़ा रहा। पिंकी दिल्ली में अपने मामा के घर चली गयी थी। मैंने उसके मामा को और उनके का घर को कभी न देखा था परन्तु मुझे लग रहा था कि वे जोगेन्दर अंकल जैसे ही रहे होंगे और उनका घर भी चंडीगढ़ के पिंकी के घर जैसा ही होगा। पिंकी ने बताया था कि उनकी कोई संतान नहीं थी। मामा-मामी, उसे और लवली को बहुत प्यार करते थे। बातों-बातों में यह भी पता चला था कि वे काफी अमीर थे। मैं पिंकी को अब तक काफी समझने लगा था। मैं कल्पना करने लगा कि अपने अकेले रह रहे, मामा-मामी के घर पहुँच कर, वह वहाँ कैसे खुशियां बिखेर रही होगी। मैंने बहुत पहले एक हिंदी फिल्म देखी थी। शायद मेरी पहली हिंदी फिल्म थी, ' खूबसूरत ' नाम याद आया, ये फिल्म मैंने घर में माँ के साथ टीवी पर देखी थी। न जाने क्यों मुझे पिंकी में उस फिल्म की नायिका का प्रतिबिम्ब दिख रहा था। सुन्दर, उन्मुक्त और निर्मल। इस फिल्म की नायिका रेखा थी जिसने फिल्म में चरित्र के साथ पूरा न्याय किया था। फिल्म में वह अपनी उपस्थिति से किसी भी माहौल को आनंदमय बना देती थी।
( आज बस, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर )

Wednesday, June 3, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story '---18

                                               ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '---
चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा किया जाता है। आज गुरुवार है, अब आगे...   

( १८ )     मैंने ऐसा महसूस किया था कि जब भी मैं जोगेन्दर अंकल-आंटी के घर पर कुछ समय बिताकर लौटता तो खुद को अधिक अकेला सा पाता था। पंजाबियों के प्रति मेरी सोच कुछ ऐसी रही थी कि ये लोग बहुत मेहनती होते हैं और व्यापार आदि में बहुत सफल हैं। मैं हमेशा से केवल सिखों को ही पंजाबी कहता रहा हूँ। अधिकतर बंगाली यही समझते हैं। इन सिखों का भारतीय सेना में बड़ा योगदान है। मेरी इधर-उधर की जानकारी यह भी थी कि बंगाल के बाद, देश के  स्वतंत्रता संग्राम में पंजाब का सबसे बड़ा योगदान रहा है। नाना से मुझे पंजाब और पंजाबियों के सम्बन्ध में कई कहानियां सुनने को मिलती रही हैं। मुझे यह भी लगता रहा है कि बौद्धिक स्तर पर ये सरदारजी लोग पीछे हैं। खाना-पीना और मौज मस्ती ही इनकी प्राथमिकता है। पिछली शाम ने मुझे अलग से सोचने पर मज़बूर किया कि गीत-संगीत में भी इनकी रूचि है। मेरा मन हमेशा मुझे उलझा देता है। एक सामान्य सी बात से आरम्भ हो, मैं न जाने कहाँ तक निकलता जाता हूँ। आज भी ऐसा ही हो रहा था। मैंने सोचा कि यह तो एक पंजाबी परिवार के साथ मेरा अनुभव है। अधिकतर सिख लोग ऐसे न होते होंगे ? मेरी इस धारणा के पीछे सरदारों के साथ जुड़े हुए हंसी-मज़ाक के किस्से भी थे जो यार-दोस्तों की महफ़िलों में चलते हैं। आज पहली बार मुझे ऐसा लगा कि बिना अधिक जानकारी लिए हमें समाज के किसी वर्ग के बारे में कोई धारणा नहीं बना लेनी चाहिए। यह बात बिहारियों, मारवाड़ियों और दक्षिण भारतियों के बारे में भी प्रासंगिक है। मैं अच्छे से समझता था कि हमारा बंगाली वर्ग इन लोगों को किस दृष्टि से देखता है ?  

नाना से ऐसे विषयों पर अक्सर बातें होती रहती हैं। उनका एक संतुलित दृष्टिकोण रहा है। इस विषय पर सोचते हुए मैं उन्हें ही याद करने लगा। न जाने अब उनकी सेहत कैसी होगी ? मैंने माँ को फोन करने की सोची। आज जब यह सब लिख रहा हूँ, आपस में संपर्क कितना सरल हो चुका है। सबके हाथ में मोबाइल फोन है। कहीं भी कभी भी किसी से संपर्क किया जा सकता है परन्तु उन दिनों यह इतना सरल न था। मोबाइल गिनेचुने लोगों के पास ही होता था। मैं बाहर आया और गेस्ट हाउस के दाहिने छोर से आगे निकल एक टेलीफोन बूथ में चला आया। यह एक छोटी सी दैनिक सामान की दुकान थी और यहीं से मैं पहले भी घर पर फोन कर चुका था। फोन मिलाया, दूसरी ओर से माँ की आवाज़ सुनाई दी। वे शायद मेरे फोन की ही प्रतीक्षा कर रही थीं। मेरे हेलो कहते ही उन्होंने मेरा हालचाल पूछना शुरू कर दिया। उन्हें मेरे खानपान की चिंता थी। हर माँ का दिल ऐसा ही होता है। मैंने किसी तरह उन्हें आश्वस्त किया कि सब ठीक ठाक है और उनसे नाना के बारे में पूछा तो वो विचलित हो गयीं। उन्होंने बताया कि वे अभी भी अस्पताल में थे बल्कि पिछली रात से उन्हें आई सी यू में रखा गया था। कई तरह की स्वास्थ्य सम्बन्धी जटिलताएं देखी जा रही थीं। उनकी बढ़ती आयु और दुर्बलता सबसे बड़ी समस्या थी। माँ ने बताया कि उन दिनों वे बहुत दबाव में थीं। सब कुछ उन्हें ही संभालना पड़ रहा था। मैंने बाबा के बारे में पूछा तो जैसा अपेक्षित था, माँ से वैसा ही उत्तर मिला कि उनका होना न होना एक सामान था। उन्हें ही घर-बाहर सब अकेले देखना पड़ रहा था। बाबा के बारे में मुझे अपनी माँ की ये बात अच्छी न लगी। मेरे बाबा ऐसे नहीं हैं पर माँ उन्हें कुछ करने ही न देती होंगी। बात समाप्त करने से पहले मैंने कहा कि क्या मैं वापिस आ जाऊं तो उन्होंने जोर देकर कहा कि नहीं, वे संभाल लेंगी। 

उस रात नींद न आयी। मैं अपने घर, माँ, बाबा और नाना के बारे में ही सोचता रहा। अगला दिन भी ऐसे ही बीत गया। मुझे लग रहा था कि इस समय मुझे घर पर अपने माँ-पिता के पास होना चाहिए था। मैं इस ट्रेनिंग से भी धीरे-धीरे ऊब रहा था। ऐसा लगता ये सब लेक्चर बेमानी हैं। मुझे इस विषय पर पिंकी की कही बातें अब सार्थक लग रही थीं। रात  इधर-उधर होते कटी। अगली सुबह भी बोझ सी लगी। मन किया कि बच्चों सा कोई बहाना बनाऊँ और क्लास न जाऊँ। परन्तु बेमना और लाचार, मैं यह सोचकर क्लास में चला गया कि दिन भर कमरे में अकेले पड़ा भी क्या करूँगा ? क्लास का पहला  घंटा अभी आधा भी न हुआ था कि एक चपरासी सूचना दे गया कि मेरा फोन आया है। मैं तेजी से निकला। न जाने किसका फोन है ? शायद पिंकी का हो ? क्लास रूम के दाहिने छोर पर ऑफिस में एक ओर फोन रखा था। मैंने हेलो कहा तो उधर से जोगेन्दर अंकल की आवाज़ आयी। उन्होंने धीरे से कहा, ' बेटा कैसे हो ?  मैंने सीधे सीधे कहा, ' हाँ अंकल मैं बिलकुल ठीक हूँ..'  वे क्षण भर को शांत रहे। मैं भी सोचने लगा कि उन्होंने अचानक फोन क्यों किया ? अंकल ने बात आगे बढ़ाई, ' बेटा, एक ख़राब खबर है, तुम्हारे नानाजी नहीं रहे..'  खराब खबर का सुनते ही मुझे अनुमान हो गया था कि कौन सी खबर है। मैंने उनसे पूछा कि ये कब हुआ। उन्होंने बताया कि अभी लुधियाना से सुखबीर भाई साहब का फोन आया है। मेरी माँ ने उन्हें फोन किया था। उन्होंने मुझे ढाढ़स बांधते हुए कहा कि उन्होंने भी कलकत्ता में मेरे घर पर बात की थी। वे मेरा कलकत्ता जाने का इंतेज़ाम कर रहे थे। उन्होंने एक बार फिर से मुझे तसल्ली दी और कहा कि सब वाहे गुरूजी की इच्छा है, इंसान के हाथ में कुछ नहीं होता, धैर्य रखना होता है। किसी अपने की मृत्यु पर ऐसी बातें हम सब एक-दूसरे से कहते रहते हैं। प्रेम निवेदन और सांत्वना प्रदर्शन के ही कुछ शब्द हैं जो संभवतः दुनिया के प्रत्येक समाज, प्रत्येक भाषा में एक से हैं।  
( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को यहीं पर )

Wednesday, May 27, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' -17

                                                  टू स्टेट्स - एक कहानी 
                                 TWO STATES -A STORY
                                                 
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा किया जाता है। आज गुरुवार है, अब आगे...   

( १७ )       ट्रेनिंग को आरम्भ हुए आधा समय बीत चुका था। मुझे ऐसा लगने लगा था कि यह एक सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है। बैंक और अन्य विभागों के अधिकारियों को इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में समय समय पर भाग लेना ही होता है। मुझे पिंकी की बातें याद हो आयी कि सबसे पहले काम के प्रति दायित्व और उत्साह जाग्रत किया जाना चाहिए और उसके बाद ही सेवाओं को बेहतर बनाने के प्रयास होने चाहिए। ट्रेनिंग में आये साथियों से बात होती तो यही निष्कर्ष निकल कर आता कि रूटीन ट्रेनिंग है सो करनी पड़ती है। अधिकतर साथी इसे एक माह की 'पेड लीव'  के रूप में देखते थे। 
उस शाम हम सब दोस्त मिलकर उस प्रसिद्द स्थान पर गए। यह चंडीगढ़ नगर से बाहर की ओर जा रहे मार्ग पर है। गेस्ट हाउस के मैनेजर ने एक छोटी वातानुकूलित बस की व्यवस्था करवा दी थी। यह जगह नगर से लगभग पंद्रह-बीस किलोमीटर बाहर थी। यह एक रिसोर्ट है जहाँ लोग एक दो दिन के विश्राम या मौज़ मस्ती के लिए आते हैं। यहाँ का रेस्टोरेंट बहुत विख्यात है। कहना गलत न होगा कि यहाँ का वातावरण बहुत ही सुन्दर था और हर दृष्टि से विकसित था। उस दिन हमारी क्लास समय से पहले समाप्त कर दी गयी थी। शाम तक हम लोग वहाँ घूमते- घामते रहे। फिर उस प्रसिद्द रेस्टोरेंट में डिनर हेतु गए। हम सभी बहुत प्रभावित थे। जगह महंगी थी परन्तु सभी का यह मानना था कि अच्छी चीज़ चाहिए तो दाम देना ही पड़ेगा। वापिस लौटते समय मैं सोच रहा था कि कल पिंकी को इस जगह के बारे में बताऊंगा और उससे कहूंगा कि उसे भी यहाँ घूमने आना चाहिए। फिर दिमाग ने मेरी हंसी उड़ाई, ' तुम क्या समझते हो, अंकल- आंटी अपनी बेटियों को लेकर यहाँ न आये होंगे ? तुम तो एक शाम के लिए आये हो, वे लोग तो वीक-एन्ड बिताकर गए होंगे.. ' एक बार को मुझे लगा कि ऐसी सुन्दर जगह पर ट्रेनिंग वाले दोस्तों के साथ नहीं बल्कि पिंकी जैसी दोस्त के साथ आना चाहिए। शायद कभी संजोग बन जाये और हम दोनों यहाँ आयें। 

अगले दिन पहले की तरह ही प्रतीक्षागत रहा। मैं सोचता रहा, ऑफिस से लौटते हुए, पिंकी यहाँ मेरे गेस्ट हाउस में आएगी और हम दोनों स्कूटर से उसके घर जायेंगे। मैं क्लास के समाप्त होते ही तैयार हो गया। बार बार घड़ी पर नज़र जाती। समय आगे बढ़ रहा था और साथ ही मेरी बेचैनी भी। देरी होती जा रही थी। पिंकी को अधिक से अधिक छह बजे तक आ जाना चाहिए था। अचानक नीचे गेट से सूचना आयी कि कोई गेस्ट आया है। मैं समझ गया कि पिंकी पहुँच गयी है। एक बार आईने में खुद को देखा, बाल सँवारे और तेजी से गेट की ओर बढ़ आया। बाहर पिंकी तो नहीं थी, अंकल अपनी कार के साथ टिके प्रतीक्षा कर रहे थे। ' मैं इस ओर आया हुआ था, तुम्हें लेते हुआ जाना था..परन्तु काम में थोड़ा विलम्ब हो गया..' उन्होंने कहा और मुझे कार में सामने बैठने का इशारा किया। घर पहुँचने पर देखा कि सभी इंतज़ार कर रहे थे। पिंकी भीतर कमरे में थी। हम लोगों के पहुँचने की आवाज़ पर वो तेजी से बाहर आयी। उसने कहा, ' इतनी देर कर दी.. पापा ही देर से आये होंगे.. मैं ही आपको स्कूटर से लेती आती तो ठीक होता.. ये पापा ऐसे ही काम में फँस जाते हैं और लेट हो जाते हैं..'  पिंकी एक साँस में बोल गयी। जब हम किसी के प्रति उत्सुकता और बेचैनी में होते हैं तो हमें दूसरे में भी इसी तरह के भाव दिखते हैं। मेरी मनस्थिति भी ऐसी ही थी। शायद पिंकी भी मेरी ही तरह उत्सुक थी। मेरी मनस्थिति का एक दूसरा पहलू भी था जो मुझे कह रहा था कि एक बंगाली लड़के के प्रति एक पंजाबी लड़की क्यों उत्सुक और आकर्षित होगी ? मेरे मन का यह पक्ष मुझे भावुक होने से रोक रहा था और व्यवहारकुशल बना रहा था। वह मुझे समझा रहा था कि मुझे पारिवारिक संबंधों की मर्यादा में रहना चाहिए और इससे अधिक कुछ न सोचना चाहिए। 

आंटी ने  बाहर बरामदे  में सबको बुलाया। उन्होंने वहाँ एक ओर कुर्सियां लगा दी थी। बीच में एक छोटी गोल मेज थी जिस पर सुन्दर कड़ाई किया हुआ टेबल क्लॉथ बिछा था। हम सब आराम से बैठ गए। आंटी ने सबको कोल्ड ड्रिंक्स दिया। अंकल ने अपने लिए गिलास में कुछऔर ही लिया, शायद विस्की थी। उन्होंने हल्के से मेरी ओर भी इशारा किया। मैंने मुस्कुराते हुए न कहा। मुझे बच्चों के बीच उनका इस तरह विस्की पीना उचित न लगा परन्तु पिंकी-लवली सामान्य दिख रही थी। लगता है अंकल का इस तरह का गिलास लेना, हर शाम की बात थी। अंकल ने कुर्सी पर टिकते हुए जोर देते हुए कहा, ' तो कौन शुरू कर रहा है ? आंटी ने कहा, ' शुरू तो लवली ही करती है.. लवली को कुछ संकोच नहीं था। उसने हिंदी फिल्म का गाना गाया। पर पिंकी ने मुझे धीरे से बताया कि वह गुरुद्वारों में गया जाने वाले भजन पर आधारित गीत था। लवली की आवाज़ मधुर थी और वह कुछ सुनाने को उत्सुक भी हो रही थी। उसने एक और फिल्म का गाना भी सुनाया। इस गाने को आंटी भी हलके हलके साथ में गुनगुना रही थीं। अंकल ने कहा, ' चलो जी अब बंगाली गाना सुनते हैं..'  उनका इशारा मेरी ओर था। मैं अभी सहज न था। मैंने पिंकी से कहा कि वह कुछ सुना दे, उसके बाद मैं। पिंकी ने क्या सुनाऊँ करते हुए एक फ़िल्मी  गाना सुनाया। लवली की तरह उसका गला भी मधुर था। जो  गाना उसने सुनाया वह एक पुरानी हिंदी फिल्म का प्रचलित गाना था और कई बार सुना हुआ था। वह सहज रूप से गा रही थी। हिंदी गानों मेरी रूचि कम ही है पर न जाने क्यों मुझे पिंकी का गाया यह गाना प्रभावित कर गया था। अब मेरी बारी थी। मैं रबिन्द्र संगीत के एक गीत के साथ तैयार था। गाते गाते मैंने देखा लवली तो चंचल हो रही थी परन्तु पिंकी संजीदा थी और आँखे मूँदकर सुन रही थी। मेरी इस गीत पर अच्छी पकड़ थी। मैं सहजता से गा रहा था। गीत की समाप्ति पर लवली हंसने लगी। ' ये तो दुखभरा गाना था, कुछ मस्ती भरा सुनाइए.. ' आंटी ने उसे चुप रहने को कहा। पिंकी ने इस गीत का अर्थ जानना चाहा, उसने कहा, ' मुझे तो कुछ गंभीर बात सुनाई दे रही थी, इस गाने में... ' मैंने उसे बताया कि इस गीत में अपने मन की अशांति और असंतोष के लिए ईश्वर से क्षमा की प्रार्थना की गयी है। पिंकी क्षण भर को रुकी और फिर सोचने लगी। उसने कहा, ' दादा, एक गाना और..' उसकी इस मांग पर लवली मुंह बनाने लगी, ' एक और इस तरह का गाना  .. मुझे तो नींद ही आ जाएगी..' पिंकी ने कहा कि मुझे इस नादान लड़की की बातों की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए। मैंने एक और रबिन्द्र गीत सुनाया। अंकल-आंटी मौन से बैठे थे मानों घर आये अतिथि के सम्मान में मज़बूर हों। खाना खा, हम सब उठे तो अंकल ने कलकत्ता में सब का हालचाल जानना चाहा।  मैं कहा,' दो दिन पहले माँ से बात हुई थी वैसे तो सब ठीक हैं परन्तु नाना बीमार हैं.. उन्हें इमरजेंसी में हॉस्पिटल में ले जाना पड़ा था.. देखो, अब कल फिर बात करूँगा..'
( आज यहीं तक, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर ) 

Wednesday, May 20, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' -16

                                                     ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हर सप्ताह इस लम्बी कहानी को साझा किया जाता है। आज गुरुवार है, अब आगे...   


( १६ )               पिंकी ने मंगलवार को अपने क्लब के समारोह में मुझे ले चलने को कहा था। सच कहूँ, सोमवार का पूरा दिन मंगलवार की प्रतीक्षा में ही कटा। अगले दिन यानि मंगलवार को सुबह से ही मुझे न जाने क्यों ऐसा लगने लगा कि आज का दिन बहुत व्यस्त वाला है। नाश्ते के समय एक मित्र ने सुझाव रखा कि आज का डिनर कैंटीन में नहीं करते। उसने बताया कि नगर के बाहरी छोर पर एक बहुत प्रसिद्द ढाबा है। बाहर से आये लोग एक बार तो यहाँ के खाने का स्वाद लेने आते ही हैं। सुझाव का सब ने स्वागत किया परन्तु मैंने आवश्यक व्यस्तता दिखाते हुए न कर दिया। मेरे कहने पर उन्होंने ये  कार्यक्रम अगले दिन पर टाल दिया। दिन जैसे धीमी गति से गुजर रहा था। ऐसा होता ही है। जब आप किसी की प्रतीक्षा में हों तो ऐसा लगता है मानों घड़ी की सुइयाँ धीरे-धीरे खिसकते और मुस्कुराते हुए आपको चिड़ा रही हों। घड़ी का इस तरह का बर्ताव मैं पहले भी कई बार देख चुका हूँ परन्तु आज कुछ ज्यादा महसूस हो रहा था। 

 शाम हो आयी। क्लब का फंक्शन है यह सोचकर मैंने अपने बॉक्स से काली टी शर्ट और आकाशी रंग की जीन्स निकाली। मैं पिंकी की प्रतीक्षा में तैयार होकर बैठ गया। समय की पक्की पिंकी आज कुछ विलम्ब कर रही थी या मेरी अपनी आतुरता सामान्य को विलम्ब दिखा रही थी। गेट से उसके आने की सूचना आयी तो मैं तुरंत वहां पहुँच गया। पिंकी ने अपनी घड़ी में देखते हुए कहा, ' सॉरी, थोड़ा लेट हो गयी.. चलो, समय से पहुँचना है.. ' मैं स्कूटर पर पीछे बैठ गया और पिंकी ने स्कूटर को गति दे दी। कुछ ही समय में हम क्लब पहुँच गए। मुझे लगा कि यह जगह अंकल के घर के आसपास ही कहीं है। मैंने पिंकी से पूछा तो उसने बताया कि यहाँ से दस-पंद्रह मिनिट की ड्राइव है। उसने ये भी बताया कि पापा, मम्मी और लवली भी आएंगे। बातों बातों में पता चला कि आज का यह कार्यक्रम क्लब का इनहॉउस कार्यक्रम है जो माह के एक खास दिन को होता है और क्लब के सदस्य या उनके मेहमान ही इसमें भाग लेते हैं। इस कार्यक्रम में कोई कुछ भी सुना सकता है, कुछ भी दिखा सकता है। गाना, नाच कुछ भी। क्लब अच्छा लग रहा था। मेरे बाबा भी कलकत्ता के एक नामी क्लब के सदस्य हैं। बाबा कभी कभार ही वहाँ जाते हैं। मैं और माँ, महीने दो महीने में एक बार तो वहां हो ही आते हैं। मैंने देखा है कि ऐसे क्लब में ज्यादातर लोगों की रूचि बार रूम और कार्ड रूम तक सीमित होती है। यहाँ का क्लब, कलकत्ता के क्लब जैसा बड़ा न लग रहा था परन्तु अच्छा था। साज़-सजावट सुरूचिपूर्ण थी। हमारे पहुँचने के कुछ समय बाद ही अंकल, आंटी और लवली भी पहुँच गए। क्लब में अधिक भीड़ न थी। पिंकी ने बताया कि वीक डे था और शाम का समय होने के कारण इस कार्यक्रम में कम ही लोग आते हैं। जितने भी लोग थे, वे हँसी-ख़ुशी और उत्साह के मूड में दिख रहे थे। हम लोग हॉल की ओर बढ़ रहे थे कि एक सरदारजी ने जोगेन्दर अंकल के सामने आकर हाथ मिलाया और बड़े जोश से मिले। एक दो बातें हुई तो अंकल ने उनसे कहा, ' सेक्रेटरी साहब, आइये आप को इनसे मिलाते हैं..' कहकर अंकल ने मुझे उनसे मिलवाया। वे क्लब के सेक्रेटरी थे। अंकल ने नाना का नाम भी लिया और बताया कि कैसे वे और उनके चाचा आज़ादी के दिनों के साथी रहे थे और देश के नामी फ्रीडम फाइटर्स में जाने जाते हैं। सेक्रेटरी महोदय ने सम्मान के साथ मेरा स्वागत किया, कहा कि ये उनका और क्लब का सौभाग्य है कि ऐसे  सम्मानीय परिवार का एक सदस्य उनके बीच है। मुझ से इंजॉय करने का कहकर वे आगे बढ़े फिर अचानक रूक कर मुझसे बोले, 'आप चाहें तो आज हमें कोई बंगाली गाना सुना सकते हैं..' मुस्कुराते हुए वे अपने काम में व्यस्त हो गए। कार्यक्रम शुरू हो चुका था। हम सामने की दूसरी पंक्ति में बैठे थे। 

पिंकी, लवली और मैं एक साथ बैठे थे। पिंकी मेरी बगल वाली सीट पर थी। उसने धीरे से कहा कि मुझे सेक्रेटरी के सुझाव पर गौर करना चाहिए और एक बंगाली गाना सुना देना चाहिए। मैंने कहा कि ये यहाँ संभव नहीं है। स्टेज पर एक महिला हिंदी फिल्म का एक ग़ज़लनुमा गाना सुना रही थी। उनसे पहले भी एक सज्जन फ़िल्मी गाना सुना गए थे। पिंकी ने जोर देते हुए कहा, ' शर्माने की बात नहीं है.. अगर आप को आता है तो सुना सकते हैं.. घर जैसा ही माहौल है '  मैंने कहा, ' यहाँ नहीं, अलग से बाद में तुम लोगों को सुना दूंगा.. मुझे रबिन्द्र संगीत पसंद है.. पर पता नहीं, तुम लोगों को पसंद आये या न आये..'  पिंकी ने हँसते हुए ओके कहा और तुरंत अपने पापा को ये बात बता दी। अंकल-आंटी खुश हो गए और अंकल ने कहा, ' तो कल ही हो जाये, घर पर महफ़िल..'  मुझे उनका यह झटपट और हाथोंहाथ कुछ तय कर देने का बर्ताव बहुत प्रभावित कर गया। आंटी ने बात आगे बढ़ाई, ' तो फिर अपने बंगाली बाबू को मैं भी अमृतसरी फिश बनाकर खिलाऊंगी..'  मैं समझ न पा रहा था कि क्या रिएक्शन दूँ ? मैंने कहा, 'आंटी, कल नहीं किसी और दिन.. कल तो हम सभी दोस्त कहीं डिनर पर जा रहे हैं ' अंकल ने सुना और एक बार फिर से तुरंत तय कर दिया , 'ओय, ठीक है जी, कल नहीं तो परसों..'  लवली ने ताली बजाकर ख़ुशी जाहिर की परन्तु पिंकी सहज ही रही। लगता है लवली को उसकी मम्मी का अमृतसरी फिश वाला सुझाव बहुत पसंद आ गया था। स्टेज पर कार्यक्रम चल रहा था। मैं अपने आप में एक बार फिर से व्यस्त हो रहा था। मुझे इन लोगों को बंगाली गाना सुनाना होगा, क्या गाऊंगा ? मेरी  तो रबिन्द्र संगीत में रूचि है और मेरी पकड़ भी है। स्कूल, कॉलेज और ऑफिस के कार्यक्रमों में सुनाता रहा हूँ परन्तु यहाँ पंजाबियों के बीच ? इन्हें तो रबिन्द्र संगीत की गहराई ही समझ न आएगी। मेरे पास तो रबिन्द्र संगीत के सिवा कोई चारा भी नहीं है। बीच बीच में पिंकी मुझ से कुछ बात कहती तो मैं जरुरत भर उत्तर दे देता। मुझे लगा कि मेरा यह व्यवहार उसे रूखापन न लग जाये। मैंने अपनी ओर से बात की, ' अंकल -आंटी को कैसे गाने पसंद हैं ? पिंकी ने बताया कि मम्मी-पापा दोनों को पुरानी फिल्मों के गाने पसंद हैं। मुझे लगा अपनी झिझक दूर करने और इन लोगों को प्रभावित करने का यह अवसर है। वहीं बैठे-बैठे मैंने मन ही मन एक रबिन्द्र संगीत का गीत सोच लिया जो मुझे सुनाना चाहिये। यह गीत मैं तीन-चार बार यहाँ-वहाँ सुना चुका हूँ और प्रशंसा भी पा चुका हूँ। मुझे कुछ हिंदी गाने भी आधे-अधूरे याद आये परन्तु उनके बारे में मैं आश्वस्त न था। उसी क्षण मन ने कहा, ' तुम गुलाम अली की वो ग़ज़ल भी सुना सकते हो.. अभी तुम्हारे पास कल का दिन है, तैयार कर लेना..' 

 कार्यक्रम समाप्त होने को था। घोषणा कर दी गयी थी कि अब कुछ अंतिम प्रस्तुतियां ही रह गयी हैं। आंटी को मज़ा नहीं आ रहा था। उन्होंने चलने को कहा। अंकल का मन भी कार्यक्रम में नहीं रम रहा था। वे तुरंत उठ खड़े हुए और उनके साथ ही हम तीनों भी। हॉल से बाहर आ हम लोग लाउन्ज में बैठ गए। आंटी का चाय का मूड था सो चाय मंगवाई गयी। चाय पी हम लोग बाहर निकल आये। तय हुआ कि पिंकी और लवली स्कूटर से घर चली जाएं।अंकल-आंटी कार में मुझे मेरे गेस्ट हाउस छोड़कर आएंगे। अंकल तो चाहते थे कि मैं उनके साथ घर चलूँ और वहां से डिनर कर लौटूं परन्तु मुझे वहीं से सीधा लौटना उचित लगा। उन्होंने मुझे गेस्ट हाउस के गेट पर उतार दिया। गाड़ी को यू टर्न कराते हुए अंकल ने मुझे याद दिलाया कि हम लोग एक दिन बाद फिर से उनके घर पर मिल रहे हैं। 
( आज बस, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर )



Wednesday, May 13, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' -15

                                                     ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे...    
 
( १५ )       मुझे नीचे गेट पर छोड़, पिंकी अपने घर चली गयी। मैं हर बार की तरह अपने बिस्तर पर धम से आ गिरा। यहाँ मेरे पास हॉस्टल का छोटा सा  कमरा और बिस्तर ही तो था जहाँ मैं खुद में सिमट सकता था। मेरा मन अपनी आदत से मजबूर इधर-उधर भटक रहा था। मैं कभी अपनी माँ को याद करता, कभी अपने बाबा को। घड़ी में समय देखा तो अचानक नाना की याद हो आयी। वे अपने कमरे से चिल्ला रहे होंगे, ' रविवार है, एक कप एक्स्ट्रा चाय तो पिला दो ..' आज का अख़बार तो उन्होंने पूरा चबा लिया होगा, अब तक। कुछ कटिंग्स भी रख ली होंगी। संडे का वह स्टेट्समैन जिसका कुछ घंटों पहले तक उन्हें बेसब्री से इंतज़ार था, अब तक कोने में रखी टेबल के नीचे रद्दी में जा चुका होगा। अपने दूर दराज के मित्रों को एक-दो पत्र भी लिखे जा चुके होंगे। उनका रविवार ऐसे ही बीतता है। आज उन्हें लंच में अपनी पसंद की मछली के साथ-साथ गोश्त की भी तड़प रहती है। संध्या में उन्हें कुछ दोस्तों के आने का इंतज़ार रहता है। वे स्वयं इन दिनों घर से कम ही निकलते हैं। उनके गिरते स्वास्थ्य को देख माँ ने उन पर कई तरह की पाबंदियाँ लगायी हुई हैं। कलकत्ता के अपने घर से भटकता हुआ मेरा मन फिर इधर चंडीगढ़ की डाल पर आ बैठा। मैं पिंकी के बारे में सोचने लगा। उसे अपने धर्म और रीति-रिवाजों के बारे में सब कुछ पता है। वह आधुनिक समाज की होते हुए भी परम्परा के साथ बंधी है। माता-पिता से कोई गहरा विरोध नहीं। बड़ों का सम्मान जैसे पारिवारिक संस्कार हों। उसमें दूसरों से भी बहुत कुछ जानने की इच्छा है। मैं देख चुका था कि कैसे उसने बंगाल और कलकत्ता के बारे में अपनी जिज्ञासा दिखाई थी। मैं मन ही मन योजनाएं बनाने लग गया था। जब पिंकी कलकत्ता आएगी तो उसे कहाँ-हाँ ले जाऊंगा और क्या-क्या दिखलाऊंगा ? वो तो मुझे अपने स्कूटर में यहाँ वहां ले जा सकती है, पर कलकत्ता में क्या उसे बस में घुमाऊंगा ? ये ऊँचे लोग हैं, इन्हें बस में ? और वो भी कलकत्ता की बस में ?  सोच कर ही मुझे घबराहट होने लगी। दिमाग ने सहारा दिया, 'अरे चिंता की क्या बात है ? टैक्सी हैं न ? नहीं, टैक्सी बहुत महंगी पड़ेगी..'  खुद को ही मेरा सपाट उत्तर था। फिर सोचा, चाचा हैं उनकी कार और ड्राइवर ले लेंगे। एक दिन में कलकत्ता के सारे विजिटिंग स्पॉट्स हो जायेंगे और दूसरे दिन इधर-उधर। अचानक दिमाग ने मन को डांटा, ' अरे, उसे कलकत्ता आने तो दो.. तब देखा जायेगा.. ' 

छोले-भठूरे स्वयं में पूरा खाना है। मुझे लगा आज लंच को भूल जाना ही बेहतर होगा। परन्तु मैं जानता था बाद में भूख लग जाएगी। मैंने सोचा कैंटीन से कुछ लाकर कमरे में रख लेता हूँ। बाद में भूख लगने पर खा लूंगा। मैं नीचे कैंटीन में गया और उनसे कहा कि मेरा लंच पैक कर के दे दें। कैंटीन का वह लड़का इन कुछ ही दिनों मेरा मित्र जैसा हो चुका था। उसने कहा, ' दादा आप चलिए, मैं लेकर आता हूँ..' वहां से पानी की एक बोतल लेकर मैं ऊपर आ गया। मैंने कपड़े बदल, आरामदायक पजामा और बनियान पहनी। अपने बक्से से एक पुस्तक निकाली। तकिये को सीधा कर टिकाया और पुस्तक के पन्ने उलटने लगा। ये सुनील गंगोपाध्याय की चर्चित बांग्ला पुस्तक थी। मैंने काफी समय पूर्व इसे पढ़ा था परन्तु न जाने क्यों इसे अपने साथ रख लिया था। ये पुस्तक बंगाल नवजागरण से सम्बंधित घटनाओं का कथाकरण है। सुनील गंगोपाध्याय के लेखन से मैं बहुत प्रभावित रहा हूँ। उन्हें बांग्ला के पांच-छह श्रेष्ठम लेखकों में समझता हूँ। मैंने पुस्तक के बीच के किसी एक पृष्ठ को खोल, वहीं से पढ़ना शुरू कर दिया और पढता चला गया। पढ़ी हुई पुस्तकों को मैं ऐसे ही पढता हूँ। कहीं से भी, किसी भी पृष्ठ से। लेखक की शैली में ऐसा वर्णन-सौंदर्य था कि मैं पढ़ी हुई पुस्तक के प्रवाह के साथ बहता चला गया। कैंटीन के लड़के द्वारा दरवाजा खटखटाने पर मेरा यह प्रवाह रुका। मैंने पुस्तक को उसी पृष्ठ पर उलटकर रख दिया। दरवाजे पर कैंटीन का लड़का खड़ा था। वह एक चुस्त और सच्चा गढ़वाली लड़का था। सब उसे किशन कहकर बुलाते थे परन्तु मैं उसे कृष्णा कहता था। उसे यह अच्छा लगता था। एक दिन उसने कहा था, ' मेरा असली नाम तो मेरी माँ जानती है या आप जानते हो.. कृष्णा ..'  खाने को टेबल पर रख मैं फिर से उस पुस्तक में उलझ गया। पढ़ते-पढ़ते कोई सन्दर्भ ऐसा आया कि मैं रुक गया। मुझे लगा कि पिंकी को यह पुस्तक पढ़नी  चाहिए। मुझे लग रहा था कि इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद तो निश्चय ही अब तक नहीं हुआ होगा। हिंदी में ऐसी पुस्तकों के पाठक कहाँ ? इंग्लिश अनुवाद की ' फर्स्ट लाइट ' के नाम से प्रकाशन की योजना थी, यह मैंने कहीं पढ़ा था। मैंने सोचा कि पिंकी को इस पुस्तक को पढ़ने का सुझाव दूंगा। क्यों न उसे एक पुस्तक भेंट स्वरुप दी जाये ? मन ने सुझाव दिया और अपने ही सुझाव पर मैं हर्षित हो उठा। आज शाम को ही किसी बुक स्टोर में जाकर पता करता हूँ। मैं खुद से ही खुश हो रहा था कि क्या उम्दा ख्याल आया है?  खाना तो अनमना सा खाया। एक तो आज भूख न के बराबर थी और दूसरे मुझे रविवार का अपने घर का, बंगाली खाना याद आ रहा था। रविवार के दिन मेरे बाबा घर से दूर गरियाहाट बाजार जाते थे। वे सब्जी आदि तो लाते ही थे परन्तु उनका विशेष फोकस मछली पर होता था। उनका मानना था कि कलकत्ता में सबसे अच्छी मछली तो गरियाहाट बाजार में ही मिलती है। बचपन में मैं भी अक्सर बाबा के साथ रविवार सुबह के बाजार में जाया करता था। मछलियों को देखना मुझे अच्छा लगता था। बाबा बाजार में घूम घूम कर मछली पसंद करते और कई तरह की मछलियाँ खरीदकर लाते थे। 

खाना खाकर मैं कुछ देर के लिए सो गया। शाम को नीचे उतरा तो ट्रेनिंग में आया एक साथी मिल गया। शायद वह भी मेरी तरह अकेलापन महसूस कर रहा था। मैंने पूछा, ' क्या हो रहा है ? उसने कहा, ' कुछ नहीं..सोच रहा हूँ कुछ किया जाये.. चलो कहीं घूमकर आएं .. ' मैंने कहा ठीक है। हम आगे बढ़ गए। दोनों ही चंडीगढ़ की व्यवस्था से प्रभावित थे। इस शहर में कई बातें थी जो कलकत्ता से भिन्न थी। मेरे साथी का भी यही हाल था। वह तो मध्यप्रदेश के भोपाल से आया था और चंडीगढ़ की नगर व्यवस्था की प्रशंसा कर रहा था। मैंने उससे किसी बुक स्टोर में जाने की बात कही। मेरे मन में किसी अच्छी पुस्तक का विचार बार बार आ रहा था। हम ऐसे ही यहाँ-वहाँ भटक रहे थे। एक बुक स्टोर दिखा तो हम अंदर घुस गए। मैंने काउंटर पर खड़ी लड़की से पुस्तक के बारे में पूछा। सुनील गंगोपाध्याय के नाम से ही वह चौंक गयी। उसे पता न था। मैंने अन्य इंग्लिश टाइटल पूछा तो उसने चेक किया और सॉरी कह कर, मुझे कुछ दूसरी पुस्तकों के बारे में बताने लगी। जिन पुस्तकों का वह सुझाव दे रही थी, वे अंग्रेजी की प्रचलित पुस्तकें थी जो सब जगह मिल जाती हैं। कलकत्ता में तो पार्क स्ट्रीट और चौरंगी इलाके में ये पुस्तकें फुटपाथ पर सजे स्टालों पर आसानी से मिल जाती हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि कैसे हमारे समाज का एक प्रभावशाली हिस्सा इन गिनीचुनी अंग्रेजी की पुस्तकों के आधार पर स्वयं को बुद्धिजीवी वर्ग मानने लगा है। मैंने भोपाल के अपने मित्र को कलकत्ता के कॉलेज स्ट्रीट और वहां के पुस्तक बाजार के बारे में बताया। वह आश्चर्यचकित हो गया। मैंने भी सोचा कि पिंकी के कलकत्ता आने पर उसे कॉलेज स्ट्रीट भी दिखाएंगे। चंडीगढ़ के उस बुक स्टोर में मुझे 'गीतांजलि ' का छोटा सा संस्करण दिख गया था। जो मैंने खरीद लिया था। ये एक सुन्दर सा प्रकाशन था जिसके प्रत्येक पृष्ट पर चित्र थे। सोचा, पिंकी के साथ जब अगली मुलाकात होगी तो मैं उसे ये पुस्तक दूँगा। बाजार में समय बिता और चाय पी कर हम दोनों गेस्ट हाउस लौट आये। 

कमरे में जाने से पहले हम दोनों बाहर लगी कुर्सियों पर बैठे। कुछ अन्य साथी भी आ गए थे। सब मिलकर हंसी मजाक करते रहे। मैं अपने ऑफिस की और अन्य मित्र मंडलियों में सरदारजी जोक्स सुनता रहा हूँ। यहां भी इस तरह के जोक्स बीच बीच में आ रहे थे। पहले मुझे कुछ मज़ा आया करता था परन्तु आज मुझे लगा कि जिन लोगों का समाज निर्माण में इतना बड़ा योगदान हो, उन्हें फूहड़ सी हँसी का पात्र बनाना कहाँ तक उचित है ? अचानक मैं सोचने लगा कि मेरी इस नयी और बदली हुई सोच में क्या मेरा पिंकी से मिलना और उसके व्यक्तित्व का मुझ पर पड़ा प्रभाव है ?
( आज बस, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर )