Chander Dhingra's Blog

Wednesday, May 19, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 74

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra                                                                               http://chander1949.blogspot.com/?m=1    हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ...  ( ७४ ) नर्सिंग होम में बहुत सुबह ही पहुँच गया था। वहां साफ-सफाई का काम समाप्त ही हुआ था। पिंकी अपने बिस्तर पर पीछे की ओर सिर टिकाये बैठी हुई थी। मुझे देख वह हैरान हो गयी थी, ' अरे ! इतनी सुबह आ गए ? मैंने कुछ न कहा और उसके बिस्तर पर ही एक ओर को हल्का सा टिक कर बैठ गया था। उसने अब मुझे गौर से देखा और कहा,' ये क्या वही कल वाले कपड़े पहन कर आ गए हो ? मैं कुछ कहता इससे पहले उस ने खुद ही उत्तर दे दिया, ' जानती हूँ... रात को देर तक सोफे पर बैठे हुए टीवी देखते रहे होगे और वहीं सो गए होगे...अब वैसे ही उठकर यहाँ आ गए हो...चाय पी या नहीं ? मैं अभी भी चुप था। उसने कहा कि रात थर्मस भी भूल गया था और उस में चाय होगी। मैंने थर्मस ली और सामने रखे गिलास में चाय ढाली। गिलास भरी चाय मेरे हाथ में थी। मैं स्वयं और मेरे हाथ में थमी ठंडी-बेस्वाद चाय दोनों एक सामान थे। मैं अपराधी सा, बिना कुछ बोले धीरे-धीरे चाय पीने लगा। पिंकी समझ गयी कि चाय अब पीने योग्य न रही थी। उसने कहा, ' इसे फैंक दो, मेरे कप से ले लो...' मैंने हाथ के इशारे से उसे मना किया। पिंकी कुछ बेहतर तो लग रही थी। उसने कहा, ' देखो, आज काफी अच्छा महसूस  कर रही हूँ... डॉक्टर से पूछना तो कि कब डिस्चार्ज करेंगे...मुझे अब इस तरह से अस्पताल में लेटे रहना अच्छा नहीं लग रहा...' मेरे पास बोलने को कुछ न था। मेरे शब्द तो शायद धुआं बन कहीं उड़ गए थे। मैं ख़ामोश था। एक शिथिलता थी जिसने मुझे रोगी सा बना दिया था। बिना कुछ बोले इशारे से मैंने उसे आराम से रहने को कहा। परंतु वह तो बात करने को उत्सुक थी। उसने कहा, ' कल मामाजी की बात अच्छी नहीं लगी न ? अरे वो तो ऐसा ही करते हैं...उन्हें सब कुछ टॉप क्लास चाहिए...अब देखो, यहाँ का इलाज क्या कुछ कम है, दो दिन में ही मैं ठीक भी हो गयी हूँ...नर्से -डॉक्टर सभी तो अच्छे हैं...आज मामाजी को सब कुछ बता दूँगी और उनकी चिंता दूर कर दूँगी...आप उनकी बातों को मन पर न लिया करो...'   पिंकी मेरा मुख ताक रही थी। वह न जाने क्या सोच रही थी पर अचानक मुझे लगा कि उसे ख़बर थी कि मेरी पिछली रात कैसी कटी थी। हम दोनों ही खामोश थे। पिंकी ने बात आरम्भ की, ' क्या हुआ, बहुत चिंता कर रहे हो ? देखो, आज तो मैं ठीक हो गयी हूँ...आप जैसे लोग छोटी सी बात पर खासा डर जाते हैं... आपकी तो आवाज़ ही बंद हो गयी है...' मैं क्या कहता ? मेरे पास तो केवल ख़ामोशी और घुटन थी। ऐसा लग रहा था मानो एक विशाल सी सागर-लहर मेरे दिमाग में आती थी और भयंकर चोट करती थी। ये क्या हो गया...ये कैसे हो गया... क्षण भर को मानों श्वांस रुक जाती, भय सा लगता और फिर महसूस होता कि वो चिल्लाती हुई लहर जो चोट कर चली गयी थी फिर से लौट कर आ रही थी।  पिंकी ने एक बार फिर से मेरी ख़ामोशी तोड़ी, 'डॉक्टर के आने का समय हो चला है... आप उससे बात कर लो और सब कुछ समझ लो...' कुछ समय में ही डॉक्टर अपनी टीम के साथ आ गए थे। उन्होंने मुझे देखा तो कहा, ' आज तो आपकी पत्नी ठीक लग रही है...परन्तु दो दिन-तीन और रहना होगा...एक तरह की मेडिकल निगरानी की आवश्यकता है...' फिर उन्होंने पिंकी की और देखते हुए कहा, ' क्या बात है, काम में बहुत स्ट्रेस रहता है क्या ? पिंकी मुस्कुरा दी और उसने अंग्रेजी में कहा, ' नो, नथिंग लाइक देट, डॉक्टर...' डॉक्टर ने कमरे से निकलते हुए मेरी और इशारा किया। मैं भी उनके पीछे कमरे से बाहर आ गया था। उन्होंने कहा कि ये जो वर्टिगो की समस्या हुई थी, वो तो कान के द्रव्य के असंतुलन के कारण हुई थी किन्तु कुछ न्यूरो समस्या भी रिपोर्ट में दिखाई दे रही थी जो शायद किसी तरह के प्रेशर और स्ट्रेस के कारण हो सकती थी। डॉक्टर ने मुझे समझाते हुए कहा, ' हम कुछ और देखना चाहते हैं... आशा है तीसरे दिन आप इन्हें घर ले जा सकेंगे...' मैंने केवल इतना कहा, ' जैसा आप उचित समझें...' डॉक्टर आगे बढ़ गए और मैं पिंकी के पास कमरे में लौट आया था। उसने मुझे देखा तो क्या कहा... क्या कहा... कहने लगी। मैंने कहा, 'सब ठीक है... स्ट्रेस के कारण ये सब हुआ है...' मैं यह कह तो गया था परन्तु उसके चेहरे को देखा तो नज़रें मिला न सका था। मैंने कहा, 'रुको मैं थोड़ा बाहर से होकर आता हूँ...' उसने मुस्कुराते हुए कहा, ' सिर्फ चाय पीना, सिगरेट मत फूँकना...' मैंने कुछ न कहा और कमरे से निकल आया। सिगरेट सुलगाने का मन हो रहा था परन्तु पिंकी की बात रोक रही थी। मैं खिन्नता की चरम सीमा पर था। तीन कप चाय पी गया था और हर कप के बाद सिगरेट सुलगाते-सुलगाते रुक जाता था। पिंकी के पास जाने का साहस न जुटा पा रहा था। जानता था कि जाना तो होगा ही। क्या मुझे सब कुछ अपनी पत्नी को बता देना चाहिए ? वह मानसिक समस्या से जूझ रही है, नर्सिंग होम में डॉक्टर की देखरेख में है, ऐसे में क्या करना चाहिए ? अंततः निश्चय किया कि फ़िलहाल मुझे सामान्य रहना चाहिए। वह घर आ जाये फिर देखा जायेगा। यही सब सोचते हुए मैं नर्सिंग होम लौटने लगा। आज उस दिन को सोचते हुए याद कर पा रहा हूँ कि मेरा दिमाग कुछ आश्वस्त सा हो चला था कि समय के साथ सब सामान्य होता चला जायेगा और मैं पिंकी को, जो मेरे और इन्द्राणी के बीच हुआ था उसे एक आकस्मिक घटना के रूप में दिखा पाऊँगा और उसे समझा पाऊँगा कि यह कैसे हो गया था।   मैं उसके बिस्तर के सामने आ बैठा था। वह भी पीठ पीछे तकिया लगा, टिक कर बैठी हुई थी। आज वह कुछ प्रसन्न लग रही थी। मुझे देख उसने पूछा, ' सिगेरट को तो हाथ नहीं लगाया न ? मैंने कहा, ' नहीं, सिर्फ चाय पी है, थर्मस वाली चाय तो बेकार हो गयी थी...' मेरे भीतर कुछ विश्वास सा जाग रहा था। अब वहां से उठने का समय हो चला था। मैंने कहा, ' थोड़ी देर में आता हूँ... ये तुम्हारी समस्या स्ट्रेस के लिए हुई है...दो दिन-तीन दिन और रहना पड़ेगा... फिर घर आ जाओगी ...लेकिन आराम करना होगा...' उसने परेशान सा होते हुए कहा, ' यहाँ रहना होगा, मैं तो घुटकर मर ही जाऊँगी...’  स्वयं के भीतर चल रहे द्वन्द पर विजय पाने के लिए विश्वास की एक हलकी सी लहर ही यथेष्ट होती है। मैं नर्सिंग होम से चला आया था। घर पहुँचने पर माँ ने सबसे पहले अपनी बहू माँ के बारे में पूछा। मैंने कहा कि दो दिन बाद घर आ जाएगी। माँ ने अब मेरे बारे में पूछा,' कैसी रही नर्सिंग होम की बेंच पर तुम्हारी रात ? मैंने हूँ कहा और अपने कमरे में घुस आया और अपने बिस्तर पर पड़ा सोचने लगा, ' ये क्या हो गया है मेरे साथ ? ये क्यों हुआ है मेरे साथ ? अब आगे क्या होगा मेरे साथ ? प्रश्न थे जो घूम-घूम कर आ रहे थे। मैं एक विचित्र सी स्थिति में था। मैं सो जाना चाहता था किन्तु एक बोझ था मेरे मन-मस्तिष्क पर जो क्षण भर के बाद ही न जाने कहाँ से आकर, मुझे किसी पर्वत शिखा से नीचे गहरी खाई में धकेल देता था। ये क्रम चलता ही चला जा रहा था। लगा कि मैं गंभीर मानसिक अवसाद में लिपटता चला जा रहा था। माँ आकर मुझ से बात न करती तो न जाने यूँ ही कब तक चलता रहता। माँ ने कहा, ' मैं किसी काम से निकल रही हूँ, वहाँ मुझे अधिक समय लग सकता है...मैं नर्सिंग होम न जा पाऊँगी...पर तुम यहाँ क्या कर रहे हो, जाओ, बहू माँ के पास जाकर बैठो... वह अकेलापन महसूस कर रही होगी...’ माँ यह कहकर घर से निकल गयी थी और मैं कुछ समय बाद नर्सिंग होम में पिंकी के सामने आकर बैठ गया था। पिंकी मुझे खामोश और व्यथित देख दुखी हो रही थी। उसने कहा, ' ये न जाने मुझे क्या हो गया था उस दिन ? पर अब तो मैं ठीक महसूस कर रही हूँ...मुझे डिस्चार्ज करवाकर निकालो यहाँ से...' मैं उसका मुख देखता रह गया। मैं एक अपराधी बन चुका था। मैंने कहा, ' दो दिन की ही बात है, पूरा चेक अप हो जाने दो...डॉक्टरों को संतुष्ट हो जाने दो...' उसने मेरी बात में सहमति जताते हुए उफ़ का भाव दिखाया था। मैं जितनी देर भी वहां रहा सिर्फ पिंकी की बातों का उत्तर ही देता रहा था। अपनी ओर से कहने को मेरे पास कुछ था ही नहीं। अपराधी के पास भ्रमित होने  के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। मैं स्वयं को किसी कटघरे में महसूस कर रहा था और सामान्य बने रहने का स्वाँग रच रहा था और शायद सफल भी था क्यों कि पिंकी मेरे मौन को उसके प्रति मेरी चिंता समझ रही थी। आज उस दिन को याद कर समझ  पा रहा हूँ कि जो व्यक्ति किताबी ज्ञान से भरा हो और केवल शिक्षा-परीक्षा के श्रेष्ठ परिणामों के आधार पर स्वयं को उच्च मानता हो, वह अनजाने ही किस कदर चतुर होता चला जाता है। शायद यही दिमागी चतुराई अनजाने में उसकी सरलता छीनती चली जाती है और धूर्तता की सीमा को छूने लगती है। अपने स्वधर्म में हो रहे इस परिवर्तन को वह देख ही नहीं पाता, कई कई वर्षों तक और कभी तो जीवन के अंतिम क्षणों तक। ( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे, यहीं पर ...)

Wednesday, May 12, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) - 73

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra                                                                               http://chander1949.blogspot.com/?m=1    हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ..     ( ७३ ) इन्द्राणी ने मुझे उदास सा देखा तो कहा, ' यह क्या हुआ हमारे नायक बाबू को... पत्नी की जरा सी तबीयत ख़राब होने से परेशान हो गए ? अरे, ये तो जीवन है, यहाँ कुछ न कुछ तो होता ही रहेगा...' मैं मुस्कुरा दिया था और कहा, ' चिंता तो होनी ही है...क्या तुम चलोगी नर्सिंग होम ? उसने तपाक से कहा, ' हाँ, इसलिए तो आई हूँ... तुम्हारे साथ ही जाऊँगी, कब जा रहे हो ? मैंने कहा कि कुछ ही समय में चलते हैं, खाना खाकर। मैंने माँ से कहा तो उन्होंने कहा कि नर्सिंग होम में थोड़ी-बहुत तकलीफ तो होगी किन्तु मुझे वहीं बहू माँ के पास रहना होगा और उसका हौसला बढ़ाना होगा। उन्होंने मुझे एक बड़ी शॉल भी रात में ओढ़ने के लिए दी और बिशाखा से कहा कि मुझे एक थर्मस में चाय भी दे।  मैं और इन्द्राणी पैदल ही बढ़ चले थे। इन्द्राणी ने अपनी चिंता एक बार फिर से जताते हुए पूछा, ' डॉक्टर ने कोई गंभीर समस्या या भय की बात तो नहीं बताई है न ? मैंने कहा कि ऐसा कुछ तो नहीं लगता परन्तु वे लोग कुछ न्यूरो टेस्ट्स भी करवा रहे हैं...' इन्द्राणी ने मुझे ढाढ़स बंधवाते हुए कहा कि मुझे नर्सिंग होम में रात को तकलीफ हुई होगी। मैंने हाँ में सिर हिलाया और कहा कि इन नर्सिंग होम्स में अच्छी व्यवस्था तो होती नहीं है, कमरा छोटा है और अटेंडेंट के लिए एक बेंच है, उसी पर सोना होता है। नर्सिंग होम के उस कमरे में पहुंचे तो पिंकी को सोते हुए पाया। इन्द्राणी ने उसके पास जाकर हल्के स्वर में कहा, ' मनप्रीत... ' उसने एक बार की आवाज़ में आंखें खोल दी थी। इन्द्राणी ने पूछा, ' अब कैसी हो ? पिंकी पर शायद दवाइयों का असर था। उंसने मुस्कुराकर कहा, ' ठीक हूँ दीदी...आपको भी बेकार में परेशान किया...' उसकी आवाज़ में जोर कम था परन्तु उसका चेहरा आत्मविश्वास से चमक रहा था। उसने बैठने की कोशिश की परन्तु मैंने उसे लेटे रहने को कहा था। मैं उसके पास जाकर बैठ गया था। मैंने कहा, ' घबराने की बात नहीं है परन्तु डॉक्टर हर ओर से सुनिश्चित हो जाना चाहते हैं...तुम्हें कुछ दिन ऑब्जरवेशन में रहना होगा...वर्टिगो का असल कारण स्पष्ट हो जाना चाहिए...' पिंकी ने मेरी इस बात पर लम्बी हामी भरते हुए श्वांस ली थी। मुझे लगा मानो कह रही हो, ' मेरा सब काम उल्टा-पुल्टा हो गया है...ऑफिस का भी और देवयानी वाला भी...' मैं उसकी मन की बात समझ गया था और अपनी ओर से कहा, ' अपने काम और शिडूल की फ़िक्र मत करो...' इन्द्राणी ने सामने रखी बेंच की ओर देखते हुए कहा, ' तुम्हें रात को इस बेंच पर सोना पड़ता है ? इस बात को सुन पिंकी ने मेरी ओर देखते हुए कहा, ' आप रात को घर चले जाना... मैं तो सो ही जाती हूँ और कुछ बात हो तो नर्स ड्यूटी पर रहती ही है...' मैंने कहा कि ये सब तो ठीक है ... मुझे तो साथ ही रहना चाहिए। पिंकी ने जोर देते हुए इन्द्राणी से कहा,' घर तो पास ही है...रात को चले जाएं और सुबह आ जाएं...क्यों दीदी ठीक है न ?  इन्द्राणी चुप रही मानो कह रही हो, ' मनप्रीत के सुझाव में कुछ गलत तो नहीं है...' मैं खामोश था और कुछ क्षण बाद बोला, ' देखा जायेगा...माँ से बात करेंगे...' हम तीनों इधर-उधर की बातें करते रहे थे।  इस बीच पिंकी के पापा और मामाजी का फोन आया था। पापा जी तो ठीक थे परन्तु मामाजी किसी अच्छे हॉस्पिटल में शिफ्ट कराने का जोर दे रहे थे। जब उन्होंने कहा कि वह खुद कलकत्ता आकर व्यवस्था कर देते हैं तो मैं झुँझला गया था। मैंने कहा, ' आपको क्या विश्वास नहीं है कि मैं आपकी भांजी का ख्याल नहीं रख पा रहा ? मैंने मोबाइल पिंकी को देते हुए कहा, ' लो, तुम्हीं अपने मामाजी को समझाओ, उन्हें मुझ पर विश्वास नहीं है...' पिंकी ने मामाजी को जोर से समझाते हुए कहा कि सब ठीक से चल रहा था और चिंता की बात न थी। फिर वह हाँ-हाँ, ठीक है, ओक-ओके कहने लगी। मुझे समझ में आया कि पिंकी के मामाजी उस पर भी दबाव डाल रहे थे कि किसी बड़े अस्पताल में अच्छे डॉक्टर के अंतर्गत इलाज होना चाहिए। अब मैंने पिंकी से फोन लिया और कुछ कड़े स्वर में कहा, ' पिंकी को जो प्रॉब्लम हुई है उसमें किसी तरह का मानसिक दबाव नहीं होना चाहिए... ये बात आपको समझनी चाहिए...अगर आवश्यक हुआ तो बड़े अस्पताल में शिफ्ट कर देंगे...आप न टेंशन लें और न टेंशन दें...' कुछ समय बाद नर्स ने आकर आगंतुकों को चले जाने का निर्देश दिया और कहा कि विजिटिंग टाइम समाप्त हो चुका था। इन्द्राणी उठ खड़ी हुई। मैं बैठा रहा। मुझे देख पिंकी ने कहा, 'आप भी जाइये, यहाँ कोई प्रॉब्लम नहीं है...मैं अब ठीक हूँ...'  मामाजी से हुई बातचीत से मैं उलझा हुआ था, मैं उठ खड़ा हुआ, ' अच्छा तो मैं सुबह आता हूँ ' कहकर, इन्द्राणी के साथ बाहर निकल आया था।   बाहर आ मैंने इन्द्राणी को उसके घर तक छोड़ आने का सुझाव दिया। उसके घर के दरवाजे पर पहुंचे तो इन्द्राणी ने कहा कि मामी मेरे घर लौटकर आने पर नाराज़ हो जाएगी। मैं भी सोच में आ गया था। इन्द्राणी ने सुझाव दिया कि मैं उसके घर पर ही रुक जाऊँ। मुझे यह प्रस्ताव ठीक लगा। कहीं भी सोना ही तो था। घर में प्रवेश करते ही पीशी ने मनप्रीत के बारे में पूछा। मैं कुछ कहता इससे पहले ही इन्द्राणी ने कहा, ' माँ, अभिजीत आज रात यहीं रहेगा...पिशी थोड़ा चौंकी और कहा, ' नर्सिंग होम में बहूमाँ के पास कौन है ? इन्द्राणी ने उसे संमझाते हुए कहा, ' तुम अधिक चिंता मत करो, सब ठीक है...' पिशी खामोश हो गयी थी। हमेशा से ही वह अपनी बेटी के आगे कुछ न बोला करती थी। पिशी मेरे बिस्तर की व्यवस्था करने लगी। इन्द्राणी ने कहा, ' कुछ अलग से करने की आवश्यकता नहीं है, अभिजीत मेरे कमरे में ही सो जायेगा...' हम दोनों ऊपर इन्द्राणी के कमरे में आ गए। इन्द्राणी ने चाय की पेशकश की तो मैंने न नहीं कहा था। चाय पीते हुए इन्द्राणी ने पिंकी के मामा की बात छेड़ दी, ' इन पैसे वाले लोगों की यही समस्या है, इन्हें सब कुछ टॉप क्लास चाहिए...अब सामान्य सी वर्टिगो की तकलीफ है तो भी वुडलैंड में ले जाओ, बेल-व्यू में ले जाओ,नामी हॉस्पिटल होना चाहिए...' मैंने सहमति में सिर हिलाया तो उसने बात आगे बढ़ा दी कि मामा को समझ नहीं थी तो मनप्रीत को ही समझाना चाहिए था। उसने कहा, ' उसे कहना चाहिए था कि वे उसके मामले में न पड़ें...उसका पति जो उचित है वही कर रहा है...' अब मैंने कहा, ' यही तो मुश्किल बात है...ये लोग आगे बढ़ विरोध करना नहीं जानते...मामा ने कहा है तो हाँ-हाँ करते जाओ... और ये मामा बिज़नेस करते हैं और सिर्फ धन कमाते हैं... आधारभूत रूप में अनपढ़ हैं...'  मैं क्रोध में था। आज मामाजी की जगह मैं मामा कह रहा था। इन्द्राणी न जाने किस मानसिकता में थी। उसने कहा, ' अगर उन्हें लगता है कि यहाँ ठीक से नहीं हो रहा तो अपनी भांजी को दिल्ली ले जायें और वहां बड़े अस्पताल में किसी बड़े डॉक्टर से इलाज करवायें...' उसके स्वर में तंज़ था। मैंने मौन रहकर उसकी बात को स्वीकृति दी थी और मन ही मन सोचा कि मामा ने अब इस सम्बन्ध कुछ बात की तो मैं यही बात कहूंगा।   इन्द्राणी का बिस्तर मुलायम और सुखमय था। मुझे नर्सिंग होम की बेंच और माँ की दी शॉल याद आ गयी थी। इन्द्राणी ने लाइट ऑफ कर दी थी और गुड नाईट कह दिया था किन्तु हम अभी भी बातचीत कर रहे थे। न जाने किस बात पर हम दोनों एक दूसरे के करीब आ गए थे। इन्द्राणी ने पूछा, ' अलग से दूसरा तकिया लाकर दूँ ? मैंने कहा, ' अपने लिए चाहिए हो तो ले लो...मुझे तो हम दोनों के लिए ये एक तकिया ही यथेष्ट लग रहा है...' इन्द्राणी हँस दी और उसने मेरी बाँह को अपनी गर्दन के नीचे रखते हुए खुद को मुझसे जोड़ लिया। एक मूक संवाद चल रहा था दोनों के बीच, शब्द तो न थे परन्तु शारीरिक गतिविधियां थी जो हमें एक-दूसरे में समेटती जा रही थी। हम अज्ञान से कहीं गहरे में डूबते जा रहे थे। उभर कर ऊपर आते और फिर किसी आवेश में    डूबने लगते। रात कब कटी, कैसे कटी कुछ समझ ही न पाए थे।   सुबह असमंजस में लिपटी हुई थी। ये क्या हो गया था ? एक अपराध, एक पाप का सा बोध था। इन्द्राणी सामान्य थी पर जैसे कुछ छिपा रही थी। मैं नर्सिंग होम के लिए निकलने लगा तो वह मेरे पास आयी तो धीरे से कहा, ' अभिजीत, अधिक मत सोचना और मन पर बोझ न लेना...मैंने कहीं पढ़ा है कि युवा कज़िन्स के बीच एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हो जाना सामान्य और स्वाभाविक होता है...'( आज यहीं तक, अगले गुरुवार को आगे, यहीं पर  ... )

Wednesday, May 5, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 72

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra                                           http://chander1949.blogspot.com/?m=1  हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ..  ( ७२ ) उसका हर बात को अपने ईश, अपने बाबा तक ले आना मुझे अज्ञानता सा लगता था। मुझे ऐसा प्रतीत होता कि सब कुछ होते भी यह लड़की एक तरह कि धार्मिक संकीर्णता से जकड़ी हुई थी। एक दिन मैंने इस सम्बन्ध में कहा तो उसी ने मुझे किताबी कीड़ा कह दिया जिसे प्रकृति और ईश्वर का कोई ज्ञान न था। हम दोनों अपनी-अपनी स्थिति और स्वधर्म में थे। उसने कहा था कि वह एक साधारण लड़की थी जो अपने नगर अपने परिवार और अपने कार्य में संतुष्ट थी, उसने कभी सोचा भी न था कि वह देश के एक शीर्ष स्वतंत्रता सेनानी के परिवार का सदस्य बन जाएगी और कलकत्ता जैसे महानगर लोग उसे पहचानने लगेंगे। उसका मानना था कि यह सब नानक बाबा की कृपा के ही द्वारा हुआ था। उसकी बात पर मैं व्यंग्य  भाव में मुस्कुरा दिया था। मुझे देख उसने कहा था, ' आप जो भी समझो...मुझे दकियानूसी मानो परन्तु सत्य यही है कि मेरे नानक बाबा का आशीर्वाद है मुझ पर जो मुझे ये सब मिला है...' पिंकी की इस बात पर मुझे कुछ गर्व की अनुभूति हुई थी।    समय बीतता जा रहा था। पिंकी सबकी चहेती बन चुकी थी। मैं खुद में सिमटा हुआ रोबी दा के साथ बेवजह सा जुड़ता जा रहा था। मैं परेशान रहता था या नाराज़ समझ पाना मुश्किल था। इन्द्राणी के साथ अपना मन साझा कर देना मुझे कुछ राहत सा देता था। मैंने उसे एक दिन बातों-बातों में बता दिया था कि न जाने क्यों मेरा मन अब आरम्भ के प्रेम-उत्साह से दूर होता चला जा रहा था। मैंने उसे यह भी कहा था कि पिंकी मेरे मन की बेचैनी से अनभिज्ञ थी और सामान्य थी। इन्द्राणी मेरी स्थिति को समझ पा रही थी और बार बार यही कहती थी कि सब ठीक हो जायेगा। उसने यह भी कहा कि हम दोनों बचपन के मित्र थे और वह मेरी हितैषी थी और मुझे कभी भी निराश नहीं देखना चाहेगी। उसने एक बार फिर से यह बात दोहराई कि हमारे विवाह में दो संस्कृतियों का जोड़ था जिस में एकरूपता होना असंभव तो नहीं परन्तु अत्यंत कठिन था।   पिंकी ने एक शाम सिरदर्द और माथा घूमने की बात उठायी थी। मुझे यही लगा कि बहुत अधिक काम और व्यस्त दिनचर्या के कारण यह हो रहा होगा। मैंने उसकी बात पर ध्यान न दिया था। मैंने उसे यही कहा था कि उसे तो मालूम था कि ऐसे में कौन सी टेबलेट लेनी होती है और उसके बाद विश्राम करना होता है। उसने मेरी बात का उत्तर न दिया और एक ओर को बिस्तर पर लेट गयी थी। कुछ समय बाद जब बिशाखा उससे चाय को पूछने को आयी तो उसने माँ को बुला लाने को कहा। माँ चिंतित हो गयी थी। उसने तुरंत पिंकी को एक टेबलेट खिलाई और उसे आश्वस्त किया कि कुछ समय में ही दर्द ठीक हो जायेगा। पिंकी ने बिस्तर से उठने की कोशिश की तो वह चक्कर खा गई थी और बैठ गयी थी। माँ ने उसे सहारा दिया था। रात में फिर ऐसा ही हुआ और वह गिर गयी। अब माँ को बहुत चिंता हुई। बाबा ने अपने परिचित डॉक्टर को फोन घुमाया तो उसने तुरंत एक नर्सिंग होम में ले आने की सलाह दी। मैंने कहा, ' ये डॉक्टर लोग यूँ ही सभी को घबरा देते हैं...हमें आज की रात देखनी चाहिए...' माँ ने किन्तु मेरी बात न मानी और उस नर्सिंग होम को फोन कर एम्बुलेंस भेजने को कहा। कुछ ही देर में पिंकी को वहां एडमिट करा दिया गया। मैं अभी तक इसे थकावट और ठीक से नींद न होने के कारण की परेशानी मान रहा था। डॉक्टर से मेरी बात हुई तब भी मैंने यही कहा था। उसका उत्तर था, ' देखते हैं पर इसे सहजता से नहीं छोड़ा जा सकता  ...'  माँ और बाबा रात में ही नर्सिंग होम से घर लौट आये थे। मुझे रात वहीं रहना था। यहाँ भी वैसा ही एक बार फिर से हुआ था। उठने पर ही उसे चक्कर आ जाता था। वह खड़ी न हो पा रही थी। मैंने उसे सो जाने का कहा। वह ठीक से सो भी न पा रही थी। किसी तरह से उसने कहा कि ये उसके साथ क्या हो रहा था ? मैंने धीरे से उसके कान में कहा कि सब ठीक हो जायेगा, दवा दे दी गयी है, नींद आ जाने और आराम करने से सुबह तक वह उठ खड़ी होगी। इस दर्द और बेचैनी में भी वह मुस्कुरा दी थी और उसने पूछा कि कौन सा अस्पताल था ? मैंने कहा, ' अभी तुम ये सब छोड़ो...सुबह बात करेंगे...'  यह हमारे घर के समीप का एक नर्सिंग होम था। हमारे परिवार में जब भी कभी आवश्यकता होने पर यहीं आया जाता था। नाना को तो कई बार यहां इलाज के लिए लाया गया था। उन्हें तो यह अपना घर जैसा लगता था। यहां के अधिकांश कर्मी लोग हमारे परिवार से परिचित थे। पिंकी को नींद के लिए उचित दवा दे दी गयी थी। मैं कुछ देर इधर- उधर नर्सिंग होम में टहलता रहा और वहां की गतिविधियों की जानकारी लेता रहा था। मैंने इन्द्राणी को फोन कर यह खबर दे दी थी। वह चिंता करने लगी और उसने कहा कि वह अगले दिन मिलने आएगी। साथ ही उसने मुझे साहस देते हुए बताया कि कुछ वर्ष पूर्व उसे भी इस तरह की समस्या हुई थी। उसने मेरी व्यवस्था के बारे में भी पूछा। मैंने बताया कि पिंकी के छोटे  कमरे में ही एक बेंच थी जिस पर मुझे रात काटनी थी। वह हंसने लगी, ' पत्नी के लिए ऐसी क़ुरबानी तो देनी ही होती है...' मैंने भी हँसते हुए कहा, ' हाँ, वो तो है लेकिंन तुम्हें कैसे पता चला ? वह जोर से हंसी और कहा, ' हमारी रसोई नहीं है तो क्या हुआ, हमें ये तो पता है कि रसोई कैसी होनी चाहिए...'   वह रात करवट बदलते कटी थी। पिंकी दवा के प्रभाव में थी। मैं उसकी ओर देखता तो चिंतित हो उठता कि कहीं कोई गंभीर समस्या न हो। इस स्थिति में भी उसका चेहरा चमक रहा था। चिंता के साथ साथ मुझे एक तरह का गुस्सा भी आ रहा था कि क्यों उसने खुद को इस तरह से व्यस्त कर लिया था ? मुझे लगता था कि यह सब उसके यथोचित विश्राम न लेने के कारण हुआ था। मैं डॉक्टर के आने की प्रतीक्षा में था कि पता चल सके कि क्या समस्या थी ? रात में ही कुछ टेस्ट्स हो गए थे। सुबह देर तक वह सोती रही थी। बाद में जागते ही उसने पूछा कि उसे क्या हुआ था। मैंने धैर्य दिलाते हुए कहा, ' आज पता चल जायेगा...परन्तु सामान्य थकावट के कारण ही यह सब हुआ है...अब से तुम्हें अपना रूटीन ठीक करना होगा और आराम के लिए भी समय निकालना होगा...' उसके चेहरे पर मुस्कराहट आयी किन्तु वह सामान्य न थी, यह साफ दिख रहा था। उसने धीरे से पूछा कि कहीं मैंने चंडीगढ़ और दिल्ली में तो न बता दिया था ? उसका कहना था कि उसके मम्मी-पापा  छोटी सी बात पर ही चिंतित हो जाते हैं सो उन्हें बताना उचित न था। मैंने उसे आश्वस्त किया कि यह कोई ऐसी बात न थी जिसे बताया जाये परन्तु कुछ समय बाद जब माँ पहुंची तो उन्होंने आते ही बताया कि दोनों जगह सूचना दी जा चुकी थी। यह सुन पिंकी मुस्कुरा दी और ऐसा भाव दिया मानो कहना चाह रही हो, ' अरे ! मम्मी जी आप भी न...' वह अभी भी दर्द और परेशानी में थी किन्तु पिछली रात से कुछ बेहतर दिख रही थी। डॉक्टर ने आकर हमारे सामने हालचाल लिए थे। वह माँ को मैडम कह कर बुला रहा था। उसने बताया कि प्रारंभिक तौर पर यह कान की एक समस्या दिख रही थी परन्तु ऐसे लक्षणों में पूरी तरह से आश्वस्त होना आवश्यक हो जाता है कि कहीं कोई न्युरॉ सम्बंधित समस्या न हो। माँ ने उसे एक तरह का निर्देश देते हुए कहा कि सब कुछ ठीक से चेक किया जाना चाहिए। उनके बीच हुई बातचीत से ऐसा लगा कि पिंकी को कुछ दिन वहां रहना होगा। मैंने अधिक कुछ न कहा बस यही कहा कि क्या किसी विशेषज्ञ का परामर्श आवश्यक था ? डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा, ' देखते हैं...'  एक दिन बाद पिंकी के उस वर्टिगो समस्या में सुधार था। वह सामान्य बातचीत कर पा रही थी, यद्यपि दुर्बलता महसूस कर रही थी। उसे देवयानी के कार्य में बाधा होने की चिंता थी। मैं उसकी इस बात से परेशान था। मैंने कहा, ' जो होगा देखा जायेगा, तुम पूरी तरह से आराम करो...' उसने अपना मोबाइल लिया और सबसे पहले ऑफिस में फोन किया था। मैंने तुरंत उससे मोबाइल ले लिया था। वह देवयानी के साथ बात न कर सकी थी। उसने मुझसे  प्रोडक्शन हाउस में फोन कर सूचना देने को कहा था। मैं उसकी इस तरह की कर्तव्यनिष्ठा पर झुँझला रहा था। मैंने कहा, ' ये तुम्हें क्या हो रहा है ? ऐसी स्थिति में भी सबकी चिंता है...मैं वहां बता दूंगा...फ़िलहाल दिमाग़ पर ज़ोर नहीं देना है...' बाद में मैंने बाहर जाकर देवयानी के ऑफिस में फोन कर दिया था। कुछ समय बाद ही मेरे मोबाइल पर लगातार कॉल आने लग गए थे। देवयानी बहुत घबराई हुई थी। उसके मैनेजर और कुछ साथियों के फोन भी आये थे। दिल्ली से उसके मामाजी पिंकी को तुरंत किसी बड़े अस्पताल में शिफ्ट किये जाने का दबाव दे रहे थे। वह मेरी किसी बात को समझने को तैयार न थे। उसके पापाजी सामान्य थे। उन्होंने कहा कि मैं एक समझदार लड़का था और जो भी उचित था वही कर रहा था। वह आश्वस्त दिखे थे। उन्होंने किसी भी तरह की सहायता या उनके कलकत्ता आ जाने का सुझाव भी रखा था जो मैंने न कर दिया था। उस दिन शाम को डॉक्टर ने आकर कहा था कि कान के द्रव्य के असंतुलित हो जाने के कारण उसे यह समस्या हुई थी परन्तु उसे अभी कुछ दिन चिकित्सा-अवलोकन में  रहना होगा और कुछ अन्य न्यूरो सम्बंधित टेस्ट्स भी किये जाने होंगे। मुझे तुरंत यह लगा था कि यह नर्सिंग होम का बिल बढ़ाने का तरीका था।  अब पिंकी का हालचाल पूछने वाले आने लगे थे। देवयानी के साथ तीन अन्य लोग आये थे। उसके होटल के तो कई साथी थे। उसका बॉस भी आया था। मैं इन लोगों से निपटने में लगा रहा। बाद में घर आया और सोचने लगा कि न जाने पिंकी का स्वास्थ्य किस दिशा में जाये ? उसके मामाजी का फोन आया था। माँ ने उन्हें जानकारी दे दी थी। अब मेरे मोबाइल में आया तो वह पिंकी को किसी अच्छे और बड़े अस्पताल में शिफ्ट करने की बात फिर से करने लगे थे। उन्होंने कहा, ' पैसे की फ़िक्र मत करना...अच्छे से अच्छा इलाज करवाना... मुझे हर रोज की खबर देना वर्ना मैं कलकत्ता पहुंच जाऊंगा...' उनकी इस आखिरी बात पर मुझे गुस्सा आ गया था। मैं सोचने लगा कि सरदार मामा आखिर सरदार ही रहेगा। पिंकी की खोज-खबर लेने वालों का सोचकर मैं हैरान था कि कैसे इस लड़की ने कुछ ही महीनों में अपने मित्र और चाहने वाले बना लिए थे। मैं ये बात सोच ही रहा था कि इन्द्राणी आ पहुंची थी।  घर के बाहर  ही उसे शांतु की पत्नी मिल गयी थी। वह भी उसके साथ आयी थी। वह चिंता जता रही थी। शांतु की पत्नी ने पूछा कि क्या वह अपनी भाभी से नर्सिंग होम में जाकर मिल सकती थी ? मैंने हां में सिर हिलाया कि बिशाखा बीच में कूद पड़ी। उसने शांतु की पत्नी से कहा, ' जब तुम जाओगी तो मुझे भी साथ ले जाना...' मैंने उसे डाँटते हुए कहा, ' वहां क्या तमाशा लगाना है...नर्सिंग होम है, भीड़ नहीं जुटानी है...सभी वहां नहीं जा सकते...' आज याद कर रहा हूँ तो अपने मन को स्पष्ट देख पा रहा हूँ कि उस समय मैं पिंकी के प्रति सभी के उत्साह और स्नेह से नाराज था।  ( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे, यहीं पर  ... )

Wednesday, April 28, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) : 70 - 71

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra                                                                               http://chander1949.blogspot.com/?m=1    हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ..  ( ७०- ७१ )  यह बात किसी सामान्य घटना सी गुजर जाती किन्तु मेरी अंतिम बात शायद उसे आहत कर गयी थी। वह अपनी दिनचर्या में जुटी हुई थी किन्तु किसी से बात न कर रही थी। मैंने सामान्य होते हुए उससे कहा कि आज थोड़ा विलम्ब से ऑफिस जाऊँगा। उसने जवाब न दिया और माँ से मिल, अपने ऑफिस को निकल गयी  थी। मुझे आशा थी कि वह मेरे विलम्ब से जाने का कारण पूछेगी परन्तु, ऐसा न हुआ। उसके जाने के बाद मैं भी  निकलने को तैयार था। माँ ने देखा तो कहा, ' अभी तो मनप्रीत से कह रहे थे कि देर से जाऊंगा ? मैंने कहा, ' हाँ, मुझे कहीं ओर से होते हुए जाना है, थोड़ा विलम्ब तो हो ही जायेगा...' माँ ने कुछ न कहा था, बस चेहरे पर एक प्रश्न चिन्ह सा भाव दिखाया था। मैं घर से निकल तो आया था परन्तु अब ऑफिस तो विलम्ब से जाना था। मैं इन्द्राणी के घर कि ओर बढ़ गया था। मेरी पिशी ने दरवाजा खोला तो  इस अनजाने समय में मुझे देख हैरान हो गयी, ' अरे इस समय... आज क्या ऑफिस नहीं है ? मैंने कहा कि इधर कुछ काम था। मेरी आवाज़ सुन इन्द्राणी भी सामने आ गयी थी। वह भी आश्चर्य में थी।  पिशी तो रसोई घर में चली गयी और इन्द्राणी भी अपने स्कूल जाने के अनुसार तैयार हो रही थी। दोनों अपने काम में व्यस्त थे। मुझे लगा कि मुझे इस समय पर नहीं आना चाहिए था। इन्द्राणी कुछ क्षण के लिए मेरे पास आ बैठी थी। उसने कहा, ' यह समय तो तुम्हारे पास बैठ, कुछ बात करने का नहीं है  ... सॉरी अभिजीत...' मैंने कहा, ' ऐसी कोई बात नहीं है... बस यूँ ही चला आया...मैं भी चलूँगा...' इन्द्राणी ने कहा, ' नहीं रुको, चाय लाती हूँ... ' मैंने ना कहा और उठ खड़ा हुआ। इन्द्राणी ने कहा, ' चलो एक साथ निकलते हैं... कुछ दूर तक तो हमारा एक ही पथ है... चलते चलते कुछ बातचीत हो जाएगी...'  इन्द्राणी ने कहा, ' तुम्हारे चेहरे पर देख पा रही हूँ कि कुछ बात है... बताओ क्या हुआ ? मैंने आरम्भ में कुछ नहीं कहा परन्तु इन्द्राणी के जोर देने पर उसे बताया कि कैसे पिंकी इन दिनों व्यस्त होती जा रही थी और घर के लिए उसके पास समय कम होता जा रहा था। वह मुस्कुराने लगी। उसने एक चाय के स्टॉल की ओर संकेत करते हुए कहा, ' चलो, वहां बैठकर बात करते हैं... एक-एक कप चाय भी हो जाएगी...' यह फुटपाथ का टी-स्टाल था। दो ओर बेंच लगी थी। कलकत्ता के ऐसे स्टॉल की चाय अक्सर मूड ताज़ा कर देने वाली होती है।  इन्द्राणी ने कहा, ' मनप्रीत की व्यस्तता में उसका कोई दोष नहीं है... स्थितियाँ ही ऐसी बन गयी हैं कि वह व्यस्त हो गयी है...और तुम्हें चंडीगढ़ जाने की उसकी बात को ऐसे न नहीं लेना चाहिए था... उसे घर की याद आना तो स्वाभाविक है...तुम वहां नहीं जाना चाहते तो बाद में उसे समझा देते...' मैंने कहा, ' मैं उसे आहत तो नहीं करना चाहता था परन्तु बात कुछ ऐसे चली कि मुझे एकदम से न कहना पड़ा...' इन्द्राणी ने कहा कि हम दोनों ही अपनी अपनी जगह सही थे, ' उसे भी समझना चाहिए था कि किसी नयी जगह कुछ दिन के लिए जाना चाहिए...पर ये सब स्वाभाविक है... आज शाम को तुम्हें उसे कहीं घुमाने ले जाना चाहिए...' इन्द्राणी मुस्कुरा रही थी। हम दोनों उठ खड़े हुए और सामने के बस स्टॉप की ओर बढ़ चले थे। मुझे लगा कि इन्द्राणी सही कह रही थी। उसे आगे से दूसरी ओर मुड़ जाना था। कुछ क्षण को हम रुके।  इन्द्राणी ने अचानक कहा, ' वैसे बाकि तो सब ठीक है न तुम दोनों के बीच ? मैंने कहा, ' वैसा क्या ? इन्द्राणी हँसने लगी, ' अरे वही रात की पति-पत्नी की बातें...' मैंने कहा, ' ठीक ही है...' वह चलते चलते रुक गयी, ' शायद ठीक नहीं है, बाद में बात होगी...' मैंने कहा, ' वह व्यस्त है और देर से थक कर लौटती है... इसी से समझ जाओ...' इन्द्राणी मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गयी थी।  ऑफिस पहुंचा तो रोबी दा का संदेश टेबल पर रखा हुआ मिला। वह मेरे पास आये थे किसी आवश्यक काम के लिए। मैंने उनसे पहले मिल लेना उचित समझा। उनके पास गया तो उन्हें दो लोगों के साथ व्यस्त पाया। उन्होंने मुझे इशारे से एक ओर बैठने को कहा। कुछ समय में उन्होंने काम निपटा दिया और मेरी ओर देखते हुए कहा, ' आज क्या हुआ देर से आये ? मैंने बताया, ' पिशी के घर से होते हुए आया...' उन्होंने कहा, ' क्या हुआ ? मैंने कहा, ' कुछ नहीं यूँ ही कुछ काम था...आप बताइए मुझ से कुछ काम था ? उन्होंने कहा, ' हाँ, ये जो लोग आये हुए थे उन्हीं का काम था... मैं चाहता था तुम देखो... लेकिन अब तो हो गया है...उनके आवेदन हैं, वे तुम्हारे पास आएंगे...थोड़ा देख लेना...' उन्होंने आराम की मुद्रा में आते हुए कहा, ' और घर पर सब कैसे हैं...तुम्हारा सब कैसा चल रहा है ? फिर उन्होंने खुद से ही मानों उत्तर देते हुए कहा, ' तुम्हारी पत्नी तो व्यस्त होगी...उसका काम ही ऐसा है...' मैंने कहा, ' हाँ वह तो दिन दिन व्यस्त होती जा रही है...टीवी का धारावाहिक है और साथ ही ऑफिस का भी दायित्वपूर्ण काम है...' उन्होंने लम्बी साँस ली और कहा, ' जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ, तुम्हारी पत्नी बहुत सफलता पायेगी लेकिन सफलता के लिए कुछ तो खोना पड़ता है...' मैंने कहा, ' नहीं रोबी दा, ऐसा नहीं है... वह सब भली भांति समझती है...' उन्होंने ने मुस्कुरा दिया और कहा, ' ये तुम्हारे बंगाली संस्कार हैं जो तुम ऐसा कह रहे हो...वह जिस समाज से आयी है, वहां सफलता का अर्थ धन और प्रतिष्ठा है...मैं पंजाब की लड़की को अच्छे से समझ सकता हूँ... अत्यंत कर्मनिष्ट और दायित्वपूर्ण परन्तु ये दोनों गुण परिवार के सुख से ऊपर नहीं होते... मैं ईश्वर से प्रार्थना  करता हूँ कि तुम्हारा जीवन सुखी रहे... '  इन्द्राणी और रोबी दा की बातें देर तक मेरे जहन में छायी रहीं थी। मैं अपना ध्यान इधर-उधर करने की कोशिश करता परन्तु एक भय सा था जो मुझे घेर ले रहा था। घर पहुँच में पिंकी का इंतज़ार करने लगा था। मैं माँ के कमरे में सजे उस लोकनाथ बाबा के छोटे से मंदिर से हमेशा दूर ही रहा हूँ परन्तु आज न  जाने क्या हुआ कि मैं चुपके से वहां माँ के अंदाज़ में सामने जा बैठ गया था। न जाने मेरे भीतर क्या चल रहा था ? बचपन से माँ इस तरह से बैठकर पूजा करना सिखाती रही थी और मैं सीखने में आनाकानी करता रहा था परन्तु, आज खुद से ही वैसे बैठा हुआ था, जैसा माँ सिखाती थी।  पिंकी कुछ समय बाद पहुँच गयी थी। अक्सर उसे देर हो जाती थी किन्तु आज वह उतनी विलम्ब से न आयी थी। उसने मुझे सुस्ताते हुए देखा तो कुछ न बोली बस खुद ही पास आ बैठ गयी थी। मैंने कहा, ' आज तो समय से आ गयी हो ? उसने उत्तर न दिया।  मैंने कहा, ' चलो आज मौके से दोनों समय से घर आ गए हैं, आज बिशाखा को छुट्टी दे देते हैं और कहीं बाहर खा कर आते हैं। अब भी उसने उत्तर न दिया। मैंने फिर से कहा, ' क्या हुआ, तबीयत तो ठीक है ना ? अब उसने उत्तर दिया, ' सब ठीक है पर कहीं बाहर जाने का मूड नहीं है...' मैंने थोड़ा सा बचपना दिखाते हुए कहा, ' चलो न, पास ही में कहीं खाकर आते हैं...' उसने कहा, ' ठीक है, कुछ देर रुको...पर चाइनीस खिलाना पड़ेगा...' मैंने हामी भरी। हम उसी नए रेस्टॉरेंट में गए जहाँ मैं इन्द्राणी के साथ गया था। बातों बातों में उसने कहा, ' अच्छा रेस्टॉरेंट है, पहले कभी आये हो यहाँ ? मैं क्षण भर को सकपकाया पर मैंने न जाने क्यों कहा, ' नहीं...' पिंकी को पंजाबी खाने से चाइनीस खाना ज्यादा पसंद था और मुझे भी अपने बंगाली खाने से चाइनीस ज्यादा अच्छा लगता था परन्तु मैं उसकी तरह यह बात खुले मन से स्वीकार न करता था और बंगाली खाने की प्रशंसा किया करता था। पिंकी ने बताया कि एक विज्ञापन संस्था ने उसे फोन किया था। वे पंजाब के एक प्रोडक्ट के बंगाल में प्रमोशन के लिए उससे बात करना चाहते थे परन्तु उसने न कर दिया था। साथ ही उसने बताया कि अगले सप्ताह उसे अपने होटल के सिलसिले में एक दिन के लिए मुंबई जाना होगा। उसने कहा, ' आप भी चलिए... थोड़ा चेंज हो जाएगा...' मैंने कहा, ' एक दिन के लिए काफी खर्चा हो जायेगा...' वह हँसने लगी, ' यह मेरी तरफ से है... होटल तो फ्री है... एयरफेयर मैं दे दूंगी...' मैंने कहा कि कोई भी दे, खर्च तो होगा ही और वह भी केवल एक दिन के लिए। उसने कहा कि ऐसा सोचना उचित नहीं था। उसने कहा,' हमें मुंबई में दो शामें मिल रही हैं...'  मैंने कुछ न कहा।  तीन दिन बाद वह मुंबई के लिए रवाना हो गयी थी। बहुत कहने पर भी मैं उसके साथ न गया और यह तर्क देता रहा कि वह तो अपने काम में व्यस्त रहेगी और मैं वहां बोर होता रहूँगा। जाने से पहले उसने हँसते हुए कहा, ' वहां तो दो शाम साथ होते, अब यहाँ बोर होते रहना...' मैं मुस्कुरा दिया था। मैंने कहा, ' मैं पूरा समय रोबी दा के साथ बिता दूँगा...वह अक्सर कहते हैं कि मैं उन्हें समय नहीं देता...' उसने कहा, 'उफ़ !  किस आदमी का नाम लिया है...उनके साथ ज्यादा रहोगे तो वैसा ही बन जाओगे...' उसने मुंबई पहुँच कर, तीन बार फोन किया था। हर बार यह बात की कि मुंबई का काम का वातावरण कलकत्ता से अच्छा था। मुझे भी इस बात का अहसास था। मेरे दो मित्र जो मुंबई में थे, वे भी अक्सर ऐसा ही कहा करते थे।   वापिस लौटने पर भी वह मुंबई की बात किया करती थी। एक दिन उसने कहा कि मुझे भी मुंबई की किसी बड़ी संस्था में कोशिश करनी चाहिए क्यों कि मेरा शैक्षणिक रिकॉर्ड बहुत बेहतरीन था और मुंबई की कोई भी बड़ी कम्पनी मुझे सहर्ष अपने एकाउंट्स विभाग में ले लेगी और वहां मुझे और आगे बढ़ने के भी अवसर मिलेंगे। उसने यह भी कहा कि यदि मुझे वहां अच्छा अवसर मिल जाता है तो वह भी सरलता से मुंबई के होटल में ट्रांसफर ले सकती थी। उसकी इस बात पर मैं चौंक गया था किन्तु मुझे अच्छा लगा था कि वह मेरी प्रशंसा भी कर रही थी। दूसरी ओर मैंने सोचा कि शायद रोबी दा की बात सत्य थी और पिंकी की ऊपर उठने और धन-प्रतिष्ठा पाने की इच्छाएं प्रबल हो रही थी। मैंने उसे कहा, ' मैं यहीं अपने सीमित में ही खुश हूँ... अपने घर में अपने माता-पिता के साथ हूँ, यही काफी है... ' मैंने कहा तो नहीं किन्तु कहीं मेरे मन में था कि वह आगे बढ़ना चाहती थी तो उसे अधिकार था। पिंकी ने कहा, ' छोड़ो इन बातों को... मेरे टीवी सीरियल की सारणी बढ़ती जा रही है और मुझे उधर अधिक समय देना होगा...' मैंने कहा, ' हां वह तो है... यह सीरियल तो हिट हो चला है... देवयानी  तो बहुत खुश होगी... तुम्हारे साथ तो अब मेरा पब्लिक में जाना मुश्किल होता जा रहा है...देखा था न उस दिन चाइनीस रेस्टोरेंट में लोग तुम्हें देख रहे थे...' उसने कहा, ' ये तो होना ही था...हिंदी सीरियल या फिल्म होती तो जीना दूभर हो जाता...' उसने तो ये बात सामान्य रूप में कही थी किन्तु न जाने मुझे लगा कि वह चाहती थी कि उसे हिंदी सीरियल या फिल्म में काम मिले और उसके लाखों चाहने वाले हों। आज बरसों बाद एक-एक दृश्य सामने आ रहा है और मुझे मेरी हीन मानसिकता से परिचित कराता जा रहा है।  पिंकी की सफलता आगे बढ़ रही थी और उसका समय सिमटता जा रहा था। न रविवार था और न कोई अवकाश। यहाँ से आओ तो वहां जाओ, फिर वहां से लौटो तो आगे के कार्यक्रम हेतु निकल जाओ। इस बीच उस के ऑफिस की ओर से उसे एक नयी कार मिल गयी थी। शांतु की पत्नी तो उसकी चहेती बन चुकी थी। उसने एक दिन बताया कि शांतु का कोई निश्चित काम न था और उसकी पत्नी बहुत चिंता में रहती थी। पिंकी ने मुझसे पूछा कि अब हमारे पास नई कार आ गयी है तो क्यों न हम शांतु को अपना ड्राइवर रख लें ? मैं हैरान था क्यों कि वह तो शांतु को एक गुंडा मानती थी और आज उसी को अपना ड्राइवर रखना चाहती थी। मेरी शंका का खुद पिंकी ने ही समाधान कर दिया था। उसने कहा, ' उसके पास ठीक से कोई रोजगार न था सो वह इधर-उधर की किया करता था, उसके पास ड्राइविंग लाइसेंस है, यदि काम मिल जाये तो वह ठीक हो जायेगा...उसकी पत्नी कितनी अच्छी है, उसकी भी मदद हो जाएगी...' मैंने हूँ कहा तो वह मुस्कुराने लगी और उसने बिशाखा को कह कर शांतु की पत्नी को बुला भेजा था। शांतु की पत्नी बहुत खुश थी कि पिंकी ने उनकी एक बड़ी समस्या को सुलझा दिया था। कुछ ही समय में शांतु भी मिलने आया था और आभार प्रदर्शित करने लगा था। पिंकी ने उसे गाड़ी की चाबी दे दी। शांतु ने कहा, ' कल सुबह कितने बजे गाड़ी लगा दूँ ? पिंकी ने उसे सब समझाया। वह खुश हो और हाँ...हाँ... करता चला गया था। मैंने पिंकी से कहा कि अब इस ड्राइवर की तनख्वाह का बोझ भी आएगा। वह अपनी आदत के अनुसार मेरी बात पर हंसने लगी थी। उसने कहा, ' अरे, हम कमाते किस लिए हैं...ऐसी चिंता हमें कुछ बढ़ा करने से रोकती है...जरा सोचो, नानक बाबा के आशीर्वाद से हम इतने सक्षम हैं कि किसी को रोजगार दे रहे हैं...'   ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर... )

Wednesday, April 21, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) : 68 -69

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra                                                                               http://chander1949.blogspot.com/?m=1    हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ..    ( ६८ - ६९ ) शुक्रवार की शाम हम सभी टीवी के सामने बैठ गए थे। पिंकी ऑफिस से न लौटी थी। उसने फोन कर बताया था कि शाम के एक लोकप्रिय कार्यक्रम के दौरान, उसके धारावाहिक का प्रमोशनल विज्ञापन आने वाला था। उसने यह भी बताया कि यह विज्ञापन सामान्य विज्ञापनों से लम्बा होगा।  उसने कहा कि कुछ समय के बाद एक और विज्ञापन आएगा और फिर यह क्रम चलता रहेगा। एक बार ये, एक बार वो। उसने कहा कि उसे लौटने में विलम्ब हो जायेगा।   समय से धारावाहिक का प्रमोशनल  एक चमक के साथ प्रसारित हो गया था। हम सब आनंदित थे। पिंकी को टीवी पर देख ऐसा लगा कि यह कोई दूसरी ही लड़की थी। उसके पात्र के अनुसार उसने पंजाबी रंग-ढंग में दो पंक्तियाँ भी बोली थी। मुझे लगा कि इस प्रमोशनल में बम्बई वाला अंदाज़ था। कुछ समय बाद दूसरा वाला प्रमोशनल आया। वह तो और भी तेज अंदाज़ में था। इसमें पार्क स्ट्रीट वाले आउटडोर के दृश्य थे। पिंकी को अपनी दो सहेलियों के साथ, कार से उतर कर होटल में जाने, का दृश्य था। फिर किसी डिस्को का दृश्य था और पिंकी का एक क्लोज़अप था जिसमें वह किसी अमीरज़ादे को गुस्से और बदले की भावना से देख रही थी। दोनों विज्ञापन देखने के तुरंत बाद ही माँ ने घोषणा कर दी थी कि यह धारावाहिक बंगाली टीवी सीरियल्स के तमाम रिकॉर्ड तोड़ देगा। बाबा ने कहा, ' अभी से कुछ नहीं कहा जा सकत...मुझे तो हमारी बंगाली संस्कृति वाले धारावाहिक और फिल्में ही अच्छी लगती हैं...देखें, ये टीवी पर क्या नया गुल खिलाता है...' मैंने कुछ न कहा था बस पिंकी के घर लौटने की प्रतीक्षा कर रहा था। कुछ ही समय में वह आ गयी थी। वह बहुत खुश थी। उसने हँसते हँसते मेरे हाथ में फूलों का गुलदस्ता देते हुए कहा, 'ये आपकी वाइफ को उसके जनरल मैनेजर की ओर से मिला है... ' फिर उसने माँ की ओर मुखातिब होते हुए बताया कि होटल की लॉबी में बड़े टीवी पर सभी ने एक साथ पहले प्रमोशनल को देखा था और जोर से तालियां बजायी थी। उसने कहा कि उसके जी एम तो बहुत खुश थे और चाहते थे कि बड़े होटल वाले दृष्यों की शूटिंग उनके होटल में की जाये। पिंकी ने कहा, ' मैं कल ही देवयानी से इस सम्बन्ध में बात करुँगी...हमारे होटल में सब तरह की सुविधाएं भी मिलेंगी...' मैंने कहा, ' अरे, तुम क्यों इन बातों में पड़ती हो...सीरियल बनाने वालों को जहाँ ठीक लगेगा, वहीं करेंगे...वे लोग खुद निर्णय लेंगे...' मेरी इस बात पर पिंकी चटक गयी, ' ये क्या बात हुई... मेरे होटल को फ्री की पब्लिसिटी मिलेगी और देवयानी को फ्री की लोकेशन...मैं तो दोनों का हित देख रही हूँ...मेरा तो कुछ नहीं जाता...' मैंने चिढ़ते हुए स्वर में कहा, ' मैंने समझाना था सो समझा दिया... अब जो तुम्हारी मर्जी...ऐसे मामलों में दखलअंदाज़ी न करना ही ठीक होता है...' पिंकी ने आगे कुछ न कहा पर मुझे महसूस हुआ कि उसने जो मन बनाना था, बना लिया था। वह उठकर एक ओर गयी और अपनी बहन लवली को फोन लगाया और उसे सारा वृतांत हँसते हँसते बता दिया। उसने फोन मुझे थमाते हुए शरारती अंदाज़ में कहा, ' आपकी प्यारी साली है, बात करो...' मैंने कहा, ' तुमने तो सब बता ही दिया है, अब मैं क्या बात करूँ...' वह मुझे जबरदस्ती फोन दे, आगे किचन घुस गयी। उसने बिशाखा से कहा, ' दीदी, आज तो लकी दिन है, कुछ बढ़िया खिला रही हो  तो ? बिशाखा ने उसकी हिंदी को समझते हुए, अपनी स्टाइल की हिंदी में कहा, ' जा आप बोलेगा  ...मैं बना देगी...' मैं लवली से बात कर रहा था पर मैंने यह सुन लिया था। पिंकी ने घर का वातावरण सुखद बना दिया था। माँ, बाबा, बिशाखा सभी खुश थे। एक मैं ही था जो न जाने किस मानसिक स्थिति में था। आज याद कर रहा हूँ तो अपनी मनस्थिति को पढ़ पा रहा हूँ। मैं खिन्न था और कुछ क्रोधित भी था। एक तरह की नाराज़गी और उदासीनता मेरे भीतर घर कर रही थी। मैं बाहर से सामान्य बनने का प्रयास कर रहा था और भीतर मन में उथल-पुथल छायी हुई थी।     अगले दिन सुबह पिंकी ने अपनी एक साड़ी शान्तु की पत्नी को दी थी। वह बहुत खुश हुई और आशीर्वाद देने लगी। पिंकी ने स्नेह से उसे अपनी बाँह में लपेट लिया और कहा, ' तुम कितनी प्यारी हो...क्या लगाती हो, तुम्हारी स्किन इतनी मुलायम कैसे है ? वह हँसने लगी। मैंने इशारे से पिंकी को बुलाया और कहा कि विलंब हो रहा था। ऑफिस पहुँचते ही साथियों की बधाइयाँ मिलने लगी थी। रोबी दा ने भी वह टीवी प्रमोशनल देखा था। उन्होंने फोन किया था। वह मुस्कुराते हुए पूछ रहे थे कि मेरी पत्नी का लक्ष्य क्या था ? उन्होंने कहा कि मेरी पत्नी बहुत महत्वाकांक्षी प्रतीत होती है और उसे इस महानगर में आगे बढ़ने के बहुत से आयाम दिख रहे थे। उन्होंने एक बार फिर से बधाई देते हुए पूछा, 'ये धारावाहिक कब से प्रसारित होने जा रहा है... कल इसके विज्ञापन को देखने के बाद हमारी उत्सुकता बढ़ गयी है... ' मैंने कहा कि दो-तीन सप्ताह बाद से यह धारावाहिक आरम्भ होने जा रहा था। दिन भर मैं इसी धारावाहिक और उस में पिंकी के पात्र के ख्यालों में उलझा रहा था। मैंने पिंकी को फोन लगाया तो वह बहुत उत्साहित और आनंदित दिखी थी। उसने कहा, ' क्या बताऊँ ? सभी साथी धारावाहिक की प्रतीक्षा कर रहे हैं... देवयानी का भी फोन आया था... वह कह रही थी कि रिस्पांस बहुत ही पॉजिटिव रहा है... वह चार दिन लगातार शूटिंग की बात कर रही थी... मुझे छुट्टी लेनी होगी, मैंने अपने बॉस को संकेत तो दे दिया है... इस ओर से कुछ समस्या न होगी...' फिर वह खिलखिलाते हुए कहने लगी, ' कल से शूटिंग शुरू...कलकत्ता टीवी का नया चेहरा... मनप्रीत कौर राय...' मैंने कहा, 'अभी से इतना खुश न हो... धारावाहिक को आरम्भ होने दो, तुम्हारे अतिरिक्त इस धारावाहिक में दो चेहरे और भी हैं और उनके रोल भी बराबरी की टक्कर के हैं...' पिंकी ने मेरी बात में सहमति जताई। उसने कहा कि वह तो सब कुछ अपने नानक बाबा के ऊपर छोड़ रही थी।   पिंकी शूटिंग आदि में पूरी तरह व्यस्त हो गयी थी। वह सुबह नाश्ता कर निकल जाती और फिर उसके लौटने का कुछ ठीक न रहता था। घर आने पर वह हम सब को बहुत उत्साह के साथ, दिन भर के  घटनाक्रम को सुनाती।थी। धारावाहिक के होर्डिंग्स भी नगर के कई प्रमुख स्थानों पर लग चुके थे। देवयानी का प्रोडक्शन हाउस इस धारावाहिक के प्रति जन-कौतूहल बनाने में सफल हो गया था। निश्चित दिन सभी को पहले पर्व की प्रतीक्षा थी। आज एक बार फिर से हम सभी टीवी के सामने बैठे हुए थे। पिंकी तो साथियों के साथ किसी अन्य जगह में थी। उसका फोन आया तो उसने बताया कि वे लोग एक क्लब में सीरियल के पहले एपिसोड देखने के लिए बैठे हुए थे और वहां पर पिकनिक जैसा माहौल बना हुआ था। उसके फोन लगातार आ रहे थे। मुझे मालूम था कि उसे इस एपिसोड के बारे में सब कुछ पता था परन्तु वह जोश में थी कि हम लोग इसे देखें और अपनी प्रतिक्रिया दें।  समय से एपिसोड आया। इसमें एक तरह की तीव्रता थी जो दर्शकों को बांधे रखने में सफल थी। इस एपिसोड में कहानी और पात्रों के परिचय के रूप में पेश किया गया था। ये कहानी एक बड़े कॉरपोरेट घराने और उसमें चलने वाली घटनाओं और षड्यंत्रों में गुंधी हुई थी। पिंकी ने मुझे सारांश एक बार बताया था। माँ ने एपिसोड समाप्त होने पर तालियाँ बजाते हुए, घोषणा कर दी थी कि यह सीरियल बांग्ला टीवी में एक ट्रेंड सेटर का काम करेगा और बम्बई के सीरियल्स को टक्कर देगा। मैंने असहमति दिखाई और कहा, ' ऐसा कभी हो ही नहीं सकता... बंगाली दर्शकों की मानसिकता ऐसी कहानियों को स्वीकार न करेगी... देख लेना... कुछ सप्ताह बाद ही लोग ऊब जायेंगे...'  बाबा भी मेरी इस बात से सहमत थे। इन्द्राणी का फोन आया था। उसका मत तो माँ की तरफ था। माँ निश्चिंत थी कि मनप्रीत सफल होगी क्योंकि वह अपने पात्र में एक दम फिट थी। इन्द्राणी ने तो एक कदम आगे की बात कह दी थी।  उसने कहा, ' कोई आश्चर्य नहीं कि किसी दिन हिंदी धारावाहिक में उसे ऑफर मिल जाये...'  पिंकी देर से पहुंची थी। आज पहली बार वह कुछ थकी सी दिखी थी। उसने स्वीकार भी किया कि पिछले कई दिनों से वह  लगातार काम से जूझती रही थी। उसने कहा कि उसने इस अभिनय के कार्य को एक शौक के रूप में लिया था और उसे लगता था कि यह सरल सा कार्य था किन्तु अब उसे लगने लगा कि इसमें केवल शारीरिक ही नहीं मानसिक थकावट और तनाव भी होता है। उसने यह भी कहा कि उसे इसमें आनंद भी मिल रहा था। माँ ने उससे शूटिंग के वातावरण आदि के बारे में पूछा तो उसने कहा कि सभी साथी बहुत अच्छे थे और उसके साथ सहयोग कर रहे थे। पिंकी देवयानी की कार्य क्षमता से भी प्रभावित लगी थी।   चार-पांच एपिसोड की शूटिंग हो चुकी थी लेकिन काम लगातार चल रहा था। प्रोडक्शन टीम ने पिंकी के काम को इस तरह से सुनियोजित किया हुआ था  कि उसे केवल रविवार को ही आना पड़े। यह साप्ताहिक धारावाहिक कुछ ही समय में प्रसिद्धि के शिखर पर था। इसकी प्रतीक्षा की जाने लगी थी। पिंकी को सराहा जा रहा था। मैं उसके साथ कहीं निकलता तो लोग उसके पास आने का प्रयास करते। एक दिन मैंने उसे कहा कि यह मुझे अच्छा नहीं लगता है और मैं उसके साथ भीड़ वाले वाले स्थानों में नहीं जाया करूँगा। उसने अवाक होते हुए कहा, 'ये क्या बात हुई, ये तो सामान्य सी बात है... कलकत्ता में तो मुंबई जैसा हाल नहीं है... यहाँ तो लोग बस थोड़ा पास आना चाहते हैं...' मैंने कहा कि जो भी मैं अब से उसके साथ, यहाँ-वहाँ नहीं जा पाऊंगा और उसे माँ या बिशाखा का साथ लेना होगा। पिंकी कुछ असंतुष्ट थी परन्तु उसने बात आगे न बढ़ाई। मैंने सोचा था कि वह मुझे मनाने की कोशिश करेगी। ऐसा कुछ न हुआ था। पिंकी अपने काम में हमेशा की तरह लगी हुई थी। वह अपनी संगीत की क्लास भी जा रही थी और जब आवश्यक होता देवयानी के साथ होती। माँ ने तो मान लिया था कि उनकी बहू बहुत व्यस्त हो चली थी। एक विज्ञापन संस्था ने भी उससे संपर्क किया था। उसका पांच सितारा होटल में कार्य करना उसके काम आ रहा था। हम दोनों केवल रात में ही मिल पाते थे। एक दिन मैंने उससे कहा कि उसे कुछ दिन का ब्रेक लेना चाहिए। मैंने सुझाव दिया कि क्यों न हम दोनों एक सप्ताह के लिए कहीं बाहर हो आयें। उसने कुछ इस अंदाज़ से मुझे देखा कि मानों कह रही हो, ' मेरे लिए यह संभव नहीं है...मैं किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में काम नहीं करती...' हो सकता है वह ऐसा नहीं सोच रही थी और यह मेरा अपना भ्रम था। मैंने कहा, ' हां, तुम तो न कहोगी ही... तुम तो सुपर बिजी हो...' वह मुस्कुरा दी और कहा, ' नहीं ऐसी बात नहीं है... इस सीरियल के काम को तो नहीं छोड़ा जा सकता...मैं देवयानी से बात करुँगी...शायद वह मेरे शेडूल में कुछ एडजेस्ट कर दे तो हम कुछ दिन के लिए कहीं हो आते हैं...' वह क्षण भर के लिए रुकी मानों कोई विचार उसके दिमाग में चमक गया हो। वह बोली, ' चंडीगढ़ जायेंगे... दिल्ली से होते हुए...' उसकी बात पर मैं झुंझला गया था। मैं कहा, ' बस तुम्हें अपना घर ही याद आया... मैं नहीं जाऊँगा तुम्हारे चंडीगढ़...' आज सत्य की सौगंध लेकर बैठा, उस समय को याद कर रहा हूँ तो देख पा रहा हूँ कि पिंकी की सफलता में न जाने क्यों मुझे अपनी पराजय दिखती थी? यही मेरी बेचैनी और अस्थिरता का कारण था।  ( आज यही तक, गुरुवार को इससे आगे, यहीं पर...)

Wednesday, April 14, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -67

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra   http://chander1949.blogspot.com/?m=1    हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ..  ( ६७ )    पिंकी मेरी बात के पीछे छिपा सन्देश समझ गयी थी। उसने मामा जी को सरलता से बताया कि यह केवल एक प्रस्ताव था और अभी कुछ भी पक्का नहीं था और वह अपनी नौकरी में ही खुश थी। उसने कहा कि यदि इस टीवी धारावाहिक में उसका चयन हो भी गया तो भी वह एक हॉबी के रूप में उसे करेगी। मैं टेलीफोन पर हो रही बात सुन रहा था परन्तु अपने में ही मग्न होने का अंदाज़ दिखा रहा था। इधर की बात सुन, उधर की बात का अनुमान कर लेना, हम भारतीयों का ईश्वर-प्रदत्त गुण है। मुझे आभास हो रहा था कि मामाजी पिंकी से इस इस टीवी से वह कितना कमा लेगी, जानना चाहते थे। पिंकी ने कहा, ' क्या मामाजी, आप हर चीज को कमाई और पैसे से तौलते हैं, ऐसे भी कुछ काम होते हैं जिन्हें शौक के लिए किया जाता है...' वह क्षण भर को खामोश थी और उधर से मामाजी की बात को सुन रही थी। उसने कहा, ' मामाजी, आप भी तो गुरुद्वारे जाते हो और वहां बहुत सारे काम और सेवा करते हो, वो क्या पैसा कमाने के लिए करते हो ? आप इसलिए करते हो क्योंकि आपको अच्छा लगता है...  मैं भी यह सीरियल करुँगी क्योंकि मुझे ख़ुशी मिलेगी...' मुझे पिंकी की बातें ठीक लग रही थीं। वह फिर कुछ समय के लिए खामोश थी। मैं समझ रहा था कि मामाजी उसे टीवी के काम की, गुरुद्वारे की सेवा से तुलना न करने की सलाह दे रहे थे। अब पिंकी ने बात की समाप्ति करते हुए कहा, ' ठीक है...ठीक है... मैं ख्याल रखूँगी... हाँ कह दूँगी कि मेरे काम के लिए उन्हें इतना तो देना होगा... और इधर-उधर के सारे खर्चे देने होंगे... चलो, अब रखती हूँ...'  अगले दिन ऑफिस में पिंकी का फोन आया कि वह शाम को देवयानी के पास से होते हुए घर आएगी। मैंने कहा कि उसे घर आ जाना चाहिए और फिर वहां से दोनों जायेंगे। उसने कहा कि ऑफिस में कुछ विलम्ब हो सकता है, सो सीधे वहीं से होकर आना ठीक होगा। मैं कहा, ' देवयानी से तुम एक बार ही मिली हो... अकेले जाओगी... यह ठीक नहीं है...' उसने कहा कि सब ठीक है, ' पहले घर आऊं, फिर दौड़ते-दौड़ते वहां वहां पहुंचे... ये ठीक है या काम निपटाते हुए, आराम से घर आऊं, यह ठीक है...' मैं झुंझला गया, ' जो  ठीक लगता है वही करो...' मैंने  तड़ाक से फोन रह दिया था। मेरी सांसे तेज थी। मैं सोच रहा था कि एक पति के नाते मैं अपनी पत्नी की मदद करना चाहता था और कुछ नहीं, परन्तु मेरी पत्नी खुद को ही पूर्ण और स्वालम्बी समझती है।  मैं अपने में ही क्रोधित हो रहा था और चाह रहा था कि पिंकी की यह बात किसी से साझा करूँ। एक बार को मन में आया कि इन्द्राणी को फोन कर बताऊँ। आज, इस घटना याद करते हुए सोचता हूँ कि क्या उस दिन मैं किसी से पिंकी की शिकायत करना चाह रहा था ?  कुछ समय बाद फिर से पिंकी का फोन आया था। मैं अभी तक उस झुंझलाहट भरी मनस्थिति में था, ' हाँ बोलो, अब क्या हुआ ? उसने अपने मुस्कराहट भरे अंदाज़ में कहा, ' सर जी, कुछ हुआ नहीं है, बस एक आईडिया आया है दिमाग में... ऐसा करते हैं, आप घर से चाय-वाय पीकर पहुंचो और मैं यहाँ से सीधे पहुँचती हूँ... वहीं मिलते हैं... मोबाइल पास में  रखना... टच में रहेंगे...क्यों यह ठीक रहेगा न... चलो, अभी बहुत बिजी हूँ...शाम को मिलते हैं... बाय।  पिंकी का फोन एक तेज हवा के झोंके सा आया था। मैं अभी भी नाराज था, सोचा, ' मुझे तो बात करने का मौका ही नहीं मिला... मैं शाम को नहीं जाऊंगा  ... वैसे भी वहां जाकर मैं क्या करूँगा... उसे ही अपना काम समझना है...' अब मैंने इन्द्राणी को फोन घुमाया। इन्द्राणी ने इस समय मेरे फोन को पा, हैरानी दिखाते हुए कहा, ' अरे ! क्या हुआ, इस समय, सब ठीक है न ? मैंने कहा, ' हाँ, सब ठीक है... ' फिर मैंने उसे सारा वृतांत बताया। मैंने कहा, ' ये लड़कियाँ भी विचित्र होती हैं...सहायता भी नहीं लेना चाहती...' इन्द्राणी हँसने लगी। उसने कहा, ' ये सामान्य बात है... उसे कुछ विलम्ब हो रहा होगा सो ठीक ही है कि वह देवयानी के स्टूडियो से होती हुई घर आये... तुम घर से सीधे वहां चले जाना... मुझे तो यह ठीक ही लग रहा है...' मैं चुप रहा और बात को घुमा, अपनी पिशी के बारे में पूछने लगा। भीतर ही भीतर मैं तय कर चुका था कि मैं देवयानी के स्टूडियो न जाऊंगा। ऑफिस समाप्ति से कुछ समय पूर्व मैंने पिंकी को फोन किया, ' सुनो, मुझे भी आज देर हो रही है... मैं वहां स्टूडियो में न आ सकूंगा... तुम काम निपटाकर आ जाना... घर पर ही मिलेंगे.. ' पिंकी ने सरलता से कहा, ' चलो ठीक है, डोन्ट वरी... घर आकर बताती हूँ कि देवयानी से क्या बात हुई... ओके '  मैं ऑफिस से निकल आया और सोचने लगा कि क्या किया जाये ? आज घर तो विलंब से पहुंचना था। साथी लोग भी ऑफिस से निकल रहे थे। कुछ उनसे बातचीत की। चाय पीने का प्रस्ताव आया तो मैंने ना नहीं कहा और उनके साथ आगे बढ़ गया। हम लोग ऐसे संध्या के अवसर पर, ऑफिस के पीछे की गली में एक खास स्टाल पर चाय पीने जाते थे। वहां पर गरमागरम तली हुई कुछ खास चीजों के साथ, चाय का मज़ा बढ़ जाता था। आज तो मेरे पास समय था, मैं चाहता था कि इसी बहाने समय बिताया जाये। कुछ समय तक हम मित्रगण वहां रहे। अभी भी समय था। वहां से निकल, आर्ट्स एकेडमी में चला आया। यहाँ हमेशा कुछ न कुछ गतिविधि रहती है। यहाँ समय बिताना उचित लगा था।  आठ बजे के बाद मैं घर पहुंचा था। माँ ने विलम्ब का कारण पूछा तो मैंने कहा, ' बस यूँ ही... कुछ काम था...' माँ ने कहा, ' मनप्रीत भी नहीं आयी... ' मैं चुप रहा। बिशाखा ने चाय के लिए पूछा तो मैंने इस तरह न किया मानों घर की चाय में वो  बात नहीं जो ऑफिस के पास वाले स्टाल या आर्ट्स अकेडमी वाली कैंटीन में होती है। कुछ समय बाद पिंकी आ गयी थी। वह बहुत  खुश थी। उसने मुझे कहा कि देवयानी ने उसका रोल फाइनल कर दिया था। शूटिंग भी कुछ ही दिनों में शुरू होने वाली थी। माँ ने मुस्कुराते हुए वही बात पूछी जो उसके मामाजी कह रहे थे, ' देवयानी कुछ दे भी रही है या यूँ ही...'  पिंकी ने बताया कि धारावाहिक में तीन मुख्य महिला पात्र थे और तीनों नए कलाकार थे और तीनों को एक समान फीस दी जाएगी। माँ ने पूछा, ' लेकिन कितनी ? इस पर पिंकी ने ऐसा मुँह बनाया मानों कह रही हो, नहीं पता लेकिन क्षण भर बाद उसने कहा, ' शायद पचास हज़ार ...' अब माँ के मुंह बनाने की बारी थी, मानों कह रही हों, ये राशि तो ठीक है...   रात में पिंकी ने मुझे विस्तार से सब बात बताई। एक बात जो झलक रही थी कि देवयानी और उसके अन्य साथी पिंकी को अपने धारावाहिक में लेने का पक्का निश्चय कर चुके थे। पिंकी ने ऑफिस में भी अपने सीनियर से इस धारावाहिक प्रपोजल के बारे में बता दिया था। उन्हें कोई आपत्ति न थी यदि यह काम वह अपने ऑफिस के काम के बाद करती है। पिंकी ने बताया कि उसके सीनियर स्वयं भी शौकिया रूप में बंगाली थिएटर में काम करते थे और उन्हें पिंकी का यह काम करना अच्छा लगा था। देवयानी के इस धारावाहिक का विज्ञापन भी कुछ ही दिनों में टीवी पर दिखाई देने वाला था और इसके लिए अगले रविवार को पिंकी को वहां कुछ शूट देने के लिए जाना था। मैंने सुना तो कहा, ' लो, अब रविवार को भी तुम घर से बाहर...' पिंकी ने इसे स्वीकार करते हुए कहा, ' कुछ पाने के लिए तो कुछ खोना ही पड़ता है... वैसे भी मेरा जॉब देखते हुए देवयानी ने मेरे शॉट्स को, जहाँ तक संभव हो, रविवार को  रखने का वादा किया है... अब से मुझे अपना संडे कुर्बान करना होगा...  मम्मी जी को भी बता दूँगी...'  मैं तो खुद में ही खिन्न हुआ बैठा था, पिंकी की इस बात ने मुझे और भी झुंझला दिया था। मैंने मन ही मन सोचा, ' चलो, अब से मैं भी अपना रविवार, रोबी दा के साथ बिताया करूँगा...'  अगले दिन देवयानी के प्रोडक्शन हाउस और पिंकी के बीच एक कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर भी किये गए थे। पिंकी ने यह सब खबर अपने घर और मामाजी को दे दी थी। वो सभी बहुत हर्षित थे और पिंकी को बधाइयाँ दे रहे थे।  रविवार को सुबह ही एक गाड़ी आयी और पिंकी को धारावाहिक के प्रमोशनल शूट के लिए ले गयी। कुछ क्लोज शॉट्स स्टूडियो में ही होने थे और कुछ आउटडोर थे जिनके लिए पार्क स्ट्रीट को चुना गया था। पिंकी के घर लौटने तक शाम के सात बज गए थे। वह बहुत उत्साहित और खुश थी कि कैसे पार्क स्ट्रीट में शूटिंग देखने के लिए भीड़ जाम हो गयी थी और कैसे देवयानी, डायरेक्टर और कैमरामैन उसके काम से प्रभावित थे। पिंकी ने बताया कि सभी को विश्वास था कि वह अपने रोल में पूरी तरह सफल होगी। पिंकी ने मेरे पास आ कहा, ' आप खुश हो न ? मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा, ' बिल्कुल... अब तो तुम्हारे प्रमोशनल शॉट्स का इंतज़ार है... कब दिखाएंगे टीवी पर ? उसने कहा, फ्राइडे रात से यह विज्ञापन शुरू हो जायेगा... कुछ खास जगहों पर होर्डिंग्स भी लग जायेंगे... हमारा प्रोडक्शन हाउस इस धारावाहिक को सफल करने के लिए पूरी कोशिश में जुटा है... ' मैंने कहा, ' अब से तो तुम्हारा चेहरा रविवार को भी नहीं दिखेगा... छह दिन होटल के बॉस देखेंगे और रविवार को देवयानी... हस्बैंड को तो तुम धारावाहिक में ही दिखोगी...' पिंकी ने यह बात सुनी तो मुझे बाँहों में लपेट लिया, ' ओह माय डिअर हस्बैंड, तुम्हारे लिए तो सातों रात हैं... और संडे को शूटिंग में तो आप साथ रहोगे ही...' मैंने कहा, ' अरे, मैं तुम्हारा बॉडी गॉर्ड बनकर कहीं नहीं जाने वाला... मैं अपने लिए कुछ और काम करूँगा... अब से मेरा भी अपना संडे होगा...'  ( आज बस, गुरुवार को आगे, यहीं पर  ...)

Wednesday, April 7, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 66

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra                                                                               http://chander1949.blogspot.com/?m=1    हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ..    ( ६६ ) पिंकी को देवयानी की ओर से मिले प्रस्ताव से माँ बहुत खुश हो रही थी। बाबा भी कार में एक ओर बैठे, अपनी विशेष टिप्पणियां करते जा रहे थे। उनका मानना था कि वह तो अपनी बहू माँ के गीत में खो ही गए थे। उन्होंने कहा कि बहू माँ के गाने में एक भी खटकने वाली त्रुटि न थी। मैं खामोश था। कुछ समय बाद मैंने कहा, ' रविंद्र संगीत कोई सरल कला नहीं है... एक दो गानों के अभ्यास से यह कला पूर्ण नहीं हो जाती... इस में पूरी तरह से डूब जाना पड़ता है... खुद को समर्पित कर देना होता है...'  इस पर पिंकी हंसने लगी, ' तो ठीक है, मैं भी डूब जाऊँगी और खुद को समर्पित कर दूंगी... मुझे तो यह बंगाली संगीत अच्छा भी लगने लगा है...' अब मैंने पूछा कि उसका तो ऑफिस भी है, समय कहाँ से लाएगी। इस पर उसने कहा कि समय का क्या था, दिन में चौबीस घंटे होते हैं उसी में सब कुछ एडजस्ट करना होता है और वह यह सब कर लेगी। घर आने पर कार से उतरते हुए मैंने कहा, ' आज मिली प्रशंसा से फूल मत जाना... यह तालियाँ एक पंजाबी लड़की के बंगाली रविंद्र संगीत गाने के कारण मिल रही थी...हम बंगाली बड़े दिल के होते हैं, कोई अबंगाली हमारी भाषा में गाये तो हम उसे सिर पर बिठा लेते हैं...लेकिन यह फ़िल्मी संगीत नहीं है...'पिंकी तो आज  उत्साह में उछल रही थी। उसने माँ की ओर देखते हुए और हँसते हुए कहा, ' मम्मी जी, क्या आपको भी कुछ जलने की गंध आ रही है ?  हम हँसते-हँसते घर में प्रवेश कर रहे थे। मैं भी पिंकी की बात पर मुस्कुरा तो रहा था परन्तु मेरी मुस्कान में एक झेंप छिपी हुई थी।   रात को पिंकी ने ख़ुशी से उछलते हुए टीवी समाचार वाचिका की बात उठायी। मैंने तुरंत कहा, 'अरे छोड़ो न उसे... टीवी पर ऐसे समाचार पढ़ने वाले बहुत मिलेंगे...'  पिंकी ने कहा कि वह ऐसी वैसी नहीं लगती थी। मैंने उसका दिया हुआ विजिटिंग कार्ड जेब से निकाला तो पाया कि उसका अपना एक स्टूडियो था और वह टीवी कार्यक्रमों की निर्माता भी थी। अब मेरे दिमाग ने उसका सम्बन्ध केडिया परिवार से जोड़ा और खुद से कुछ ऐसा अनुमान लगाया, ' तो यह बात है, मारवाड़ी पैसा लगा हुआ है, इस बंगाली लड़की के स्टूडियो में...'  मुझे समझ आ गया कि देवयानी एक पेशेवर और महत्वाकांक्षी महिला थी। मैं सोचने लगा कि ऐसे लोग ही तो सफलता पाते हैं। देवयानी भी एक दिन अपना टीवी चैनल खोल लेगी। अभी कुछ दिन पूर्व ही मैंने इसी तरह की एक बंगाली महिला की सफलता की कहानी पढ़ी थी जिसने हेल्थ केयर व्यवसाय में सफलता पायी थी और जिसका सपना था कि वह कलकत्ता में एक विश्व स्तरीय अस्पताल लाये। बिस्तर पर लेटते हुए पिंकी ने कहा, ' कल देवयानी के स्टूडियो तो जायेंगे... देखें उसकी योजना क्या है ? मैंने एक बार फिर से उसे नज़रअंदाज़ करने को कहा किन्तु देवयानी के आकर्षक विजिटिंग कार्ड ने मुझे कुछ उत्साहित तो कर ही दिया था। मैंने कहा, ' ठीक है, तुम्हारा मन है तो चलते हैं... मिल लेते हैं... तुम क्या कल ऑफिस से समय पर घर आ पाओगी... तुम्हारा कार्य और समय तो निश्चित होता नहीं है...' पिंकी ने कहा, ' एक संयोग बन रहा है... मैं तो समय से आ जाऊँगी... आप मिस्टर रवि के साथ किसी मीटिंग में न फँस जाना...' मैंने उत्तर न दिया था और कुछ सोचते हुए नींद की प्रतीक्षा करने लगा था।  सुबह पिंकी ने मुझे ऑफिस में उतारते हुए फिर से याद दिलाया कि आज शाम को समय से घर पहुँच जाना था और आठ बजे देवयानी से मिलने जाना  था। उसकी बात पर मैं मुस्कुरा दिया था। कार्य में दिन भर जुटा रहा था किन्तु बीच बीच में शाम का ख्याल आ जाता था कि समय से घर पहुंचना था। यदि रोबी दा की ओर से भी शाम के लिए कोई निर्देश आया तो आज उन्हें भी न कह देना था। परन्तु उस दिन ऐसा कुछ हुआ ही नहीं। घड़ी में देखा, ऑफिस से निकलने का समय हो चला था। अचानक न जाने क्यों इन्द्राणी को फ़ोन लगा दिया था। उसे कल शाम की क्लब में हुई, पिंकी की सफलता का बताया। वह  खुश हुई थी और उसने मुझे बधाई दी थी। उसका मानना था कि मेरी पत्नी एक गुणवान लड़की थी और यदि बंगाली संगीत में उसकी रूचि थी तो उसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए था। तब मैंने उसे देबजानी के स्टूडियो जाने वाली बात बताई थी। उसकी प्रतिक्रिया वाह की थी। उसने बताया कि यह तो बहुत अच्छी बात थी क्योंकि उन दिनों देवयानी का टीवी जगत में प्रभाव बढ़ रहा था। मैंने कहा कि वह शायद पिंकी के पंजाबी समाज से होने का लाभ उठाना चाहती थी। साथ ही साथ माँ के महिला आयोग की अध्यक्षा हो जाने का भी प्रभाव था। इन्द्राणी ने कहा कि इस तरह का लाभ और स्वार्थ हर कोई लेता है और यदि वह लेती है तो इसमें कुछ अनुचित नहीं है। इन्द्राणी ने कहा कि मुझे देवयानी के प्रस्ताव को देखना चाहिए। उसने यह भी कहा कि वह रात को ही मुझे फोन करेगी और जानेगी कि देवयानी की मीटिंग में क्या हुआ ? संध्या में हम दोनों देवयानी के स्टूडियो पहुँच गए थे। स्टूडियो सच में हमारे घर से अधिक दूर न था। मैं सोच रहा था कि यह छोटा-मोटा रिकॉडिंग स्टूडियो होगा किन्तु देख कर आश्चर्य हुआ कि यह एक पूर्ण विकसित और व्यवस्थित स्टूडियो था। उसका अपना सुन्दर ऑफिस था। हमें वही बिठाया गया था। वह कुछ समय बाद हमें मिलने आयी थी। उसने गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया। पिंकी को अपने ऑफिस में देख,देवयानी बहुत प्रसन्न दिख रही थी। उसने अपने एक अन्य साथी को भी बुलवा भेजा और हमें अपने एक प्रस्तावित कार्यक्रम की रूपरेखा के बारे में बताया। यह एक लम्बा चलने वाला धारावाहिक था। जिसकी कहानी तीन सहेलियों के इर्दगिर्द घूमती है। इसमें एक पंजाबी लड़की का चरित्र भी था जिसका लालन-पालन और शिक्षा कलकत्ता में हुई थी। उसने बताया कि उसकी कल्पना में जो चरित्र था, वह मानों मनप्रीत के लिए ही लिखा गया था। मैंने उसे कहा कि मनप्रीत को तो अभिनय क्षेत्र में कोई अनुभव नहीं था। मेरे यह कहने पर पिंकी ने ख़ामोशी भरी नज़रों से मुझे ऐसे देखा था मानों कहना चाहती हो कि वह कोशिश कर लेगी। मेरी बात पर देवयानी ने कहा जो दो अन्य लड़कियां ली जा रही थीं वे भी नयी एवं अनुभव वाली नहीं थी। उसने कहा कि उसे विश्वास था कि मनप्रीत इस चरित्र में खुद को ढाल लेगी। मैंने हूँ... कह, उसकी बात को हल्का कर देने का प्रयास किया था और कहा कि शायद उसे विदित न था कि मनप्रीत ने पांच सितारा होटल में एक अत्यंत व्यस्त कार्य भी संभाल रखा था और शायद वह इस धारावाहिक के लिए पूरा समय न दे पायेगी। अब पिंकी आगे आ गयी थी। उसने कहा, ' यह मैं अपने ऑफिस से बात कर सब मैनेज कर लूंगी...' चाय आ गई थी। मुझे अच्छा लगा कि रोबी दा की मीटिंग की तरह यहाँ प्लास्टिक के कप न थे। यहाँ सुन्दर क्रॉकरी में सजाकर चाय लायी गई थी। चाय पीते हुए कुछ बातें और हुई। देवयानी के सहयोगी ने कहा कि मनप्रीत जी को एक दिन और आना होगा और वह उस अधिक जानकारी देंगे और रुपरेखा समझा देंगे। फिर उन्होंने पिंकी को कुछ कागज देते हुए अंग्रेजी में कहा,' मनप्रीत जी, आप यदि इसे पढ़ लें तो अच्छा होगा... ये कहानी के सिनोप्सिस हैं और क्या आप कल इसी समय एक बार फिर आ सकेंगी ? मैं पिंकी का मुख देखता रह गया था। उसने तपाक से कहा, ' क्यों नहीं... मैं आ जाऊँगी और सिनोप्सिस तो आज रात को ही पढ़ लूँगी...'  घर लौटने पर पिंकी ने सबसे पहले माँ को पूरी जानकारी दी थी। उनके सामने ही वह सिनोप्सिस भी पढ़ने बैठ गयी थी। मैंने कहा कि इतनी आतुरता दिखाने की जरूरत न थी और उसे बाद में आराम से पढ़ना चाहिए। उसने कहा, ' समय है तो अभी पढ़ लेना ठीक है...तीन-चार पृष्ठ ही तो हैं...' कुछ समय बाद ही उसने माँ को कहा, ' मम्मी जी बहुत स्ट्रांग स्टोरी है... अगर मौका मिला तो मैं अवश्य इसमें काम करुँगी...'  यह कह उसने एक फोन लगाया। मैंने पूछा, ' किसे फोन कर रही हो ? उसने कहा, ' सस्पेंस है... रुको अभी पता चल जायेगा...' मैं तो समझ ही रहा था कि वह अपने घर पर यह खबर देना चाहती थी। मैंने कहा, ' अभी किसी को मत बताओ... अभी कुछ भी फाइनल नहीं किया गया है...' उसने सिर्फ इतना कहा, ' किसी को नहीं बता रही... लवली को बता रही हूँ...'  मैंने मन में सोचा कि लवली से होते हुए यह खबर सब तक आज ही पहुंच जाएगी। पिंकी ने फोन पर बात शुरू की और बालकनी की तरह निकल गयी। मुझे जो सुनाई दिया वह था, ' सुन लवली, जबरदस्त न्यूज़ है... सुनेगी तो न जाने तेरा क्या हाल होगा...' वह लगभग दस मिनिट तक अपनी बहन से बात करती रही थी। ससुराल से बड़ी बहन अपनी छोटी बहन से जैसी बातें करती हैं, पिंकी का लहजा वैसा ही था, एक सहेली जैसा। लौटकर कमरे में आने पर उसने कहा, ' मैंने लवली को कह दिया है कि मम्मी-पापा को छोड़कर, अभी किसी को न बताये...'  हम लोग खाना खाकर सोने की तैयारी कर ही रहे थे कि उसके मामाजी का फोन आ गया था। माँ ने फोन उठाया था। मामाजी ने उन्हें बधाई दी और फिर मेरे साथ बात की। उन्होंने कहा, ' वाह भाई, आपने तो कमाल कर दिया... हमारी बेटी को टीवी पर लगवा दिया... लाख लाख बधाइयाँ जी...' मैं सोचने लगा इन सरदार जी को लगता है टीवी पर कोई नौकरी लग गयी है। इन्हें क्या पता कि एक धारावाहिक में अभिनय का प्रस्ताव आया है और वह भी अभी पूरी तरह से निश्चित नहीं है। मैंने फोन पिंकी को थमाते हुए कहा, ' लो, चंडीगढ़ से बात दिल्ली पहुँच गयी है...अब तुम ही समझाओ...तुम्हारे मामाजी समझ रहे हैं कि टीवी स्टेशन में कोई अच्छी खासी नौकरी मिल गयी है ? ( आज यहीं तक, अगले गुरुवार को इससे आगे, यहीं पर )