Chander Dhingra's Blog

Wednesday, January 13, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) - 54

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1                                (  हफ्ते वार इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ..  )  ( ५४ )     उस राजस्थानी परिवार के उत्सव में खाना तो शाकाहारी होना ही था। मैं तो हमेशा से नॉन वेजेटेरियन खाने का शौकीन रहा हूँ परन्तु यहाँ जो खाना खिलाया गया था, वह भी मुझे अच्छा लग रहा था। पिंकी बहुत आनंद के खा रही थी। उसकी नयी बनी मित्र और भाभी, उसके प्रति विशेष स्नेह दिखा रही थी। खाने के बाद भी उन्होंने हमें रोके रखा था और अपने सगे-सम्बन्धियों से पिंकी का परिचय करवाया था। वो लोग एक-दूसरे से संपर्क नंबर ले-दे रहे थे। पिंकी आकर्षण का केंद्र बनी हुई थी। मुझे अच्छा तो लग रहा था परन्तु मैं नहीं चाहता था कि मेरी पत्नी इन व्यवसायी परिवारों में घिरती चली जाये। अब जब सत्य को अपने साथ लेकर बैठा हूँ तो छुपाने का प्रयास नहीं करूँगा। उस दिन मैं एक हीन भावना से ग्रसित हो रहा था। उस धनाढ्य मारवाड़ी परिवार में, मैं खुद को जमा नहीं पा रहा था। मैं उनकी व्यावसायिक सफलता से अपने बंगाली समाज की असफलता को जोड़ कर देख रहा था। मैं भीतर ही भीतर  तैश में था। एक द्वन्द सा था जो मुझे विचलित किये जा रहा था। मैं खुद को सहज-सरल दिखाने को विवश था। मेरी अत्यंत विकट स्थिति बनी हुई थी। दूसरी ओर पिंकी थी जो सभी से सरलता और मुक्त ह्रदय से मिलजुल रही थी। वह अपने नाम के अनुरूप मनप्रीत बनी हुई थी। वह मेरी ओर देखती तो मैं मुस्कुरा देता था। मेरी मुस्कान में एक तरह का सन्देश छिपा होता था कि अब हमें चलना चाहिए। वह यह छिपा सन्देश पढ़ भी लेती थी और इशारे से कहती कि बस थोड़ी देर में चलते हैं।  कुछ समय बाद हम विदा लेने को तैयार हुए तो पिंकी की केडिया भाभी ने उसे प्रसाद के नाम पर एक बड़ा सा पैकेट पकड़ाया। पिंकी ने कहा कि हम तो प्रसाद ग्रहण कर चुके थे। उन्होंने कहा कि ये घर वालों के लिए था। फिर उन्होंने अपनी कार से हमें पहुंचा देने की पेशकश भी की। मुझे अच्छा तो नहीं लग रहा था परन्तु पिंकी ने थैंक यू और सो नाइस आदि कह दिया था, मुझे मान लेना पड़ा था। कार में बैठते ही मैंने  कहा, ' ऐसी जगहों पर मैं असुविधा महसूस करता हूँ..प्लीज, भविष्य में मुझे साथ चलने के लिए मत कहना..'  पिंकी ने आश्चर्य सा भाव दिखाया मानों कह रही हो, ' अरे यह क्या बात हुई..' कुछ क्षण बाद उसने कहा, ' पहली बार मिले थे न  इस लिए कम्फर्टेबल नहीं थे..दोस्ती हो जाएगी तो ठीक हो जायेगा..मुझे भी शुरू में ऐसा ही लगा था पर बाद में मुझे ये लोग अच्छे लगने लगे..' उसकी इस बात पर मैंने कोई प्रतिक्रिया न दी थी। पिंकी को शायद लगा था कि मैं उसकी बात से सहमत हो गया था परन्तु मैं सोच रहा था कि बाद में यह खुद ही समझ जाएगी कि व्यावसायिक समाज के लोगों से घनिष्टता अच्छी नहीं होती। बौद्धिक स्तर पर हम उनके साथ नहीं मिल सकते। हमारा घर अधिक दूर न था। कुछ ही मिनटों में हम घर के सामने थे। पिंकी ने हैरानी दिखाते हुए कहा, ' अरे पहुँच भी गए ? मैंने कहा, ' हाँ, वाकिंग डिस्टेंस ही तो है.. हम आराम से पैदल चल कर आ सकते थे..तुमने बेकार में उनकी कार ली..' पिंकी ने हँसते हुए कहा, ' मैंने क्या ली..वो इतने  प्यार से कह रही थी तो ना कहना अच्छा थोड़े ही लगता ? पिंकी ने भैया कहकर ड्राइवर को धन्यवाद दिया था। उसने भी आदर के साथ गुड नाइट कहते हुए, फिर से कभी आने के लिए कहा था। उसके हावभाव से मैं समझ गया था कि वह बिहार का था। उस समय मैंने सोचा था कि इस तरह के ड्राइवर और काम वाले मिलना सौभाग्य की बात थी। साथ ही मैंने यह भी सोचा कि इन व्यापारी अमीर लोगों से इन्हें अच्छी तनख्वाह मिलती है तभी तो ये अच्छे से काम करते हैं।  ऊपर घर पर प्रवेश करने पर माँ को प्रतीक्षा करते पाया था। वह कुछ गंभीर भी दिखीं थी। मैंने इशारे से पूछा कि सब ठीक था न ? उन्होंने कहा, 'हाँ, सब ठीक है..' फिर उन्होंने पिंकी की ओर देखते हुए कहा, ' मनप्रीत, कैसी रही तुम्हारी पूजा-पार्टी ?  पिंकी मुस्कुरा दी, 'पार्टी नहीं मम्मी जी  ..पूजा और लंगर प्रसाद.. बहुत अच्छा लगा..पर आपका बेटा वहां बोर हो रहा था..' माँ ने मेरी ओर देखते हुए कहा, ' इसका पूजा-पाठ में दिल थोड़े ही लगेगा..ये बचपन से ही ऐसा है..अच्छा सुनो, कल का कोई कार्यक्रम न रखना.. कल मनप्रीत को मेरे साथ कहीं जाना है..'  मैंने मामला जानना चाहा तो माँ ने बताया कि जद्दूबाबू बाजार इलाके के किसी पंजाबी परिवार की एक घटना, वहां के पुलिस थाने में दर्ज हुई थी। पारिवारिक हिंसा का मामला था। क्षेत्र के सांसद ने उन्हें फोन किया था कि माँ को परिवार वालों से जाकर मिलना चाहिए। बाद में पुलिस थाने और स्थानीय विधायक के फोन भी आये थे। अब बात यह थी कि विधायक विपक्ष की पार्टी के थे। सांसद जो वामफ्रंट के थे, मेरे नाना के अनुयायी थे, वह चाहते थे कि माँ, मनप्रीत के साथ वहां जाये ताकि माँ की पंजाबी बहू होने का प्रभाव डाला जा सके। पिंकी ने जब यह सब सुना तो उत्साहित हो गयी थी। उसने कहा, ' मैं तो जरूर जाऊंगी..और बंगाली साड़ी पहनूंगी..'  माँ ने उसे टोक दिया, ' अरे, बंगाली साड़ी किसी और दिन पहनना..कल तो तुम्हें पक्की पंजाबन बनकर मेरे साथ जाना होगा..मामला एक पंजाबी परिवार का है..समझी ?  पिंकी हंसने लगी। बाद में उसने गहरे लाल रंग की पंजाबी ड्रैस निकालकर मुझे दिखाई थी और पूछा था कि वह ड्रेस अगले दिन  के लिए कैसी रहेगी ? मैंने बिना देखे कहा था, ' जो भी पहनो, ठीक है..' उसने कहा, 'ये क्या बात हुई, बिना देखे कह रहे हो कि ठीक है ? मैं थोड़ा सा झुंझला गया था। मैंने कहा, ' अब मैं क्या कहूं..बंगाल में हो तो तुम्हें यहाँ जैसी ही दिखना चाहिए.. यहाँ भी पंजाबी ही बन कर रहना चाहती हो तो मैं क्या कहूं ? वह मुझे देखती रह गयी थी। उसने कहा कि वह तो मम्मी जी के आदेश का ही पालन कर रही थी, उन्होंने ही उसे पंजाबी ड्रेस पहनने को कहा था। मैंने आँखे चुराते हुए, उसकी बात में सहमति जताई थी परन्तु मेरे दूसरी ओर मुंह फेर लेने से वह मेरा मन भांप गयी थी। उसने कहा, ' मम्मी जी की बात को न तो नहीं कह सकती.. और देखा जाये तो उनका कहना गलत नहीं है क्यों कि वह मुझे किसी पंजाबी सिख परिवार में ले जा रही हैं..' मैंने बात को समाप्त करते हुए कहा था, ' चलो छोड़ो इस बात को..तुम जानोऔर माँ जाने..'  अगले दिन माँ और पिंकी अपने मिशन पर निकलने को तैयार थे। मैं पिंकी को देखता रह गया था। उसने इशारे से पूछा कि वह कैसी लग रही थी ? मैं मुस्कुरा दिया था। मुझे मुस्कुराता देख, वह खिलखिलाई और माँ की ओर देख बोली, ' मम्मी जी मैं रेडी हूँ.. चलें.. ' माँ भी तैयार हो चुकी थी। दोनों राज्य महिला आयोग का बोर्ड लगी गाड़ी में निकल गए थे। मुझे अच्छा तो न लग रहा था कि माँ उसे अपने शासकीय कार्य में ले गयी थी परन्तु मैं समझ पा रहा था कि इस तरह के कार्यों में जोड़तोड़ तो लगाया ही जाता है। इसके साथ, इसी बहाने नवविवाहिता पंजाबी बहू को कलकत्ता की गतिविधियाँ देखने को मिल रहीं थी। मैं औंधें लेटे हुए कल्पना कर रहा था कि वो दोनों अब तक घटना स्थल वाले घर पहुँच गए होंगे और माँ अपने मिज़ाज़ के हिसाब से रुवाब दिखा रही होंगी और पिंकी चुपचाप एक ओर खड़ी, कलकत्ता के सिख-पंजाबी परिवार की स्थिति का अंदाज़ा लगा रही होगी। शायद कुछ ही समय में वह उस परिवार में घुलमिल भी जाएगी। साथ ही साथ सोच की एक अन्य लहर भी दौड़ी चली जा रही थी कि क्या मेरी पत्नी का इस तरह से सब से घुलमिल जाना और सब को अपना बना लेना, न जाने, हमारे पारिवारिक जीवन के लिए कैसा होगा ? उसने मेरे माँ-बाबा, बिशाखा, बाबा के मित्र और मेरे काका के साथ साथ, केडिया परिवार और उस बांग्ला टीवी की समाचार एंकर को तो प्रभावित कर ही लिया था। माँ, महिला आयोग के काम में उसका सहयोग अपने लिए अच्छा मानने लगी थी। केडिया भाभी ने तो मानों उसे अपनी सबसे प्रिय सहेली बना लिया था। वह टीवी एंकर जिससे मैं प्रभावित हुआ करता था, अपना विजिटिंग कार्ड पिंकी को दे चुकी थी और उससे आश्वासन ले चुकी थी कि कभी वह पंजाब सम्बंधित टीवी कार्यक्रम बनाएगी तो उसमें उसे जरूर भाग लेना होगा। पिंकी का मोबाइल नंबर भी उसने, मनप्रीत कौर के नाम से रख लिया था। मैं इन ख्यालों में भटका हुआ था कि रोबी दा का फोन आ गया था। उन्होंने क्षमा दर्शाते हुए बात आरम्भ की थी। उन्होंने कहा कि वह समझ सकते थे कि मैं अपनी पत्नी के साथ व्यस्त होऊँगा और अवकाश का आनंद ले रहा होऊंगा परन्तु उनकी आवश्यकता अपरिहार्य थी। उन्होंने मुझे संध्या चार बजे एक बैठक, जो काशीपुर क्षेत्र में होने जा रही थी, में उनके प्रतिनिधि के रूप में जाने का आग्रह किया था। उन्होंने बताया था कि अस्वस्थ होने के कारण वह न जा पा रहे थे। उन्होंने आयोजकों को इसकी सूचना भी भिजवा दी थी। रोबी दा ने आग्रह शब्द तो कहा था परन्तु उनके स्वर में निर्देश का भाव था। मैं क्या कहता ? ' ठीक है, रोबी दा ..' कहने के अतिरिक्त मेरे पास कोई विकल्प न था।  काशीपुर एक भीड़भाड़ वाला क्षेत्र है। वहां पहुँचने के लिए काफी समय लग जाता है। मुझे वैसे भी वह क्षेत्र अच्छा न लगता था। उस दिन कलकत्ता का मौसम भी प्रतिकूल था। वर्षा अपना विराट रूप दिखाने के मिज़ाज़ में थी। बेमना सा मैं, परेशान  था। मैंने बिशाखा को बुला, उसे मेरे लिए खाना बनाने को कहा था। मैंने उसे कहा कि मुझे किसी अत्यंत आवश्यक कार्य के लिए बाहर जाना था। वह मुझे देखती रह गयी मानों कह रही हो, ' बहूमाँ तो आ जाए .. एक साथ खाना..'  मैंने भी उसका मन पढ़ लिया था और कहा, ' माँ अपनी बहू को लेकर गयी हुई हैं.. वे दोनों कब कब लौटेंगी, कुछ ठीक नहीं.. मैं खाना खा कर निकल जाता हूँ.. बहुत आवश्यक कार्य है, मैं विलम्ब नहीं कर सकता..तुम उन्हें बता देना ..'    जैसा अनुमान था वैसा ही हुआ था। मेरे घर से निकलने के कुछ समय बाद ही मौसम ने करवट ले ली थी। तेज प्रवाह से हवाएं चलने लगी थी और जोर से वर्षा होने का आभास होने लगा था। कलकत्ता की सड़कों में पानी जमने में देर नहीं लगती। मैं गरियाहाट तक पैदल चल पहुंचा था और वहां से किसी तरह एक भीड़भाड़ वाली बस में चढ़ तो गया किन्तु मैं समझ पा रहा था कि एक-डेढ़ घंटे बाद जब गंतव्य पर उतरूँगा तो मेरी दशा कैसी होगी ? मेरे जूते भीग चुके थे और छाता अपने काम में नाकाम हो रहा था। मैं रोबी दा को मन ही मन कोस रहा था कि उन्होंने मुझे फँसा दिया था। काशीपुर पहुँचने पर मैं टूट चुका था। इधर-उधर पूछते हुए बैठक स्थल पर पहुंचा था। यह पार्टी का उस क्षेत्र का कार्यालय था। कुछ ही लोग आये हुए थे। मैंने अपना परिचय संयोजक महोदय को दिया तो उन्होंने एक कुर्सी की ओर बैठने का संकेत किया और आगे निकल गए थे। सब खामोश बैठे थे। लगता था वे सब मेरे ही तरह किसी वरिष्ठ का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और आपस में उनका एक-दूसरे से परिचय न था। मेरे पास बैठे सज्जन ने मौसम का हवाला देते हुए बात आरम्भ की थी। उसका आरोप था कि नगर की जलनिकासी की पुख्ता व्यवस्था नहीं की जा रही थी। वह मेरी ही उम्र का युवक था। वह अपनी ओर से कई बातें किये जा रहा था। वह जिस स्थान से आया था, वह काफी दूर था और तीन बसें बदलकर वहां पहुंचा था। मैं उसकी बातें चुपचाप सुने जा रहा था। मैंने उससे केवल इतना कहा, ' मीटिंग कब आरम्भ होगी, समय तो हो चुका था ? उसने तीन नाम लिए थे और बताया था कि जब तक वे नहीं पहुँच जाते, मीटिंग आरम्भ होने का प्रश्न ही नहीं था। अब मैं उठा और बाहर चला आया था। सामने एक चाय की दुकान थी। वहां एक कप चाय पी थी। हम कलकत्ता वासी चाय के लिए कप शब्द का प्रयोग करते हैं परन्तु यहाँ यह चाय का कप, एक मिटटी का भाड़ होता है जिसे गैर बंगाली लोग कुल्हड़ कहते हैं। मैंने एक सिगरेट भी सुलगायी थी हालाँकि  पिंकी को याद कर मैंने दो कश के बाद ही उसे एक ओर फेंक दिया था। मैं सोच रहा था कि अब तक वह घर आ चुकी होगी। मुझे यह भी आभास था कि उसने माँ का अच्छे से सहयोग किया होगा और उस पीड़िता को न्याय का पूरा भरोसा दिया होगा। पीड़िता ने पिंकी में एक सच्ची सहेली देखी होगी। माँ ने अपने मिशन की सफलता पर, घर पहुँचते ही कई जगह फोन किये होंगे और घटना को बढ़ा -चढ़ा कर बताया होगा। वह अपनी बहू पर स्नेह वर्षा कर रही होंगी और अपना स्नेह कुछ यूँ दर्शाया होगा, ' मनप्रीत, आज तुम्हारे हाथ के बने,आलू के पराठें खाने का मन है..'  ( आज यहीं तक, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर   .. )

Wednesday, January 6, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -53

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1                                (  हफ्ते वार इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ..  ) ( ५३ ) मैंने चार सप्ताह की छुट्टी ली हुई थी तो ऑफिस की ओर से निश्चिंत था। न सुबह की दौड़ा-दौड़ी और न शाम को देर से घर लौटने की चिंता। मैं और पिंकी एक बेसुध से संसार में थे। पिंकी ने सुबह जॉगिंग जाना शुरू कर दिया था। पहली सुबह माँ ने उसके साथ बिशाखा को भेजा था परन्तु दूसरे दिन से उसने अकेले जाना शुरू कर दिया था। उसका कहना था कि उसने लेक का क्षेत्र और पथ समझ लिया था। पिंकी ने कहा कि साथ चलना हो तो मुझे ही चलना चाहिए वर्ना वह अकेले ही जाया करेगी। मैं एक दिन गया भी था। पिंकी पूरी तैयारी के साथ जाती थी। जॉगिंग सूट, जॉगिंग शू, सिर पर कैप और पीछे पैंट के पॉकेट में छोटी सी वाटर-बॉटल। दो-चार दिन में ही उसने कुछ मित्र भी बना लिए थे जो हमारे घर के आसपास ही रहते थे। ये मारवाड़ी परिवार से थे और अब पिंकी उन्हीं के साथ वापिस आती थी। एक दिन वह मुझे उनसे मिलाने ले गयी थी। मैं नानुकर करता रहा परन्तु अंततः एक दिन जाना ही पड़ा था। ये दो दंपति थे जो गुरुसदा रोड के एक महंगे आवासीय परिसर में रहते थे और हमारे घर के पास से गुजरते थे। वे अपनी अपनी कार लेकर उस खूबसूरत लेक तक जाते थे और लौटते में पिंकी को ड्राप कर देते थे। मैं उनसे मिला तो थोड़ा सा असहज महसूस कर रहा था। पिंकी तो उनसे घुलमिल गयी थी। अब तो सच ही लिखने बैठा हूँ और सच कहूं तो मैं हीन भावना से ग्रस्त हो रहा था। पिंकी ने बाद में मुझे मेरी असहजता का अहसास दिलाया था। उसने कहा, 'तुम्हारा व्यवहार ऐसा नहीं होना चाहिए..जिस से भी मिलो, खुलकर मिलो..'  मैंने कहा, ' मुझे न जाने क्यों इन व्यापारी लोगों से असुविधा सी होती है..और मैं हिंदी में बातचीत भी नहीं कर पाता..' पिंकी ने हैरान होते होते हुए कहा, ' पर वे लोग तो तुमसे बंगाली में बात कर रहे थे ..उन्हें तो बड़ा अच्छा लगा था जब मैंने उन्हें बताया था कि मैं एक सिख पंजाबी हूँ और मेरे हस्बैंड बंगाली.. इसीलिए तो वे तुमसे मिलना चाहते थे ..उन्होंने तो हमें सैटरडे शाम को घर पर बुलाया भी है.. कोई पूजा-पाठ है ..  मैंने ये सुना तो तपाक से कहा, ' मैं नहीं जाऊँगा..तुम चली जाना..' पिंकी ने भी उतने ही तपाक से जवाब देते हुए कहा, ' अरे ये क्या बात हुई, मैं अकेले ? दोनों को बुलाया है, दोनों जायेंगे..' मैंने फिर से ना - ना किया तो उसने कहा कि अकेले तो वह बिल्कुल नहीं जाएगी और उन्हें मना कर देगी। पिंकी का मिज़ाज देखते हुए मैंने कहा, ' ठीक है, तुम ज़िद कर रही हो तो चलेंगे परन्तु मेरा मन तो नहीं है..' दो दिन बाद ही शनिवार था। उस सुबह ही पिंकी ने मुझे याद दिला दिया था कि शाम को केडिया भाभी के घर जाना है। ये सुन स्वतः ही मेरा मुँह बन गया था और पिंकी ने देख भी लिया था। उसने कहा, ' ऐसा मुँह मत बनाओ, मैं कह रही हूँ न कि वे अच्छे लोग हैं, तुम्हें वहां अच्छा लगेगा.. तुम्हें ऐसे लोगों के साथ उठना-बैठना चाहिए..वहां और भी कई लोग मिलेंगे..' मैंने कुछ न कहा परन्तु मैं जानता था कि वहाँ मुझे कैसा लगेगा।  पिंकी ने दिन में ही मेरे और अपने लिए, शाम को पहनी जाने वाली ड्रेस निकाल कर रख दी थी। मेरे लिए उसने काली टी-शर्ट और हल्के नीले रंग की जीन्स चुनी थी। मैंने देखा तो थोड़ा उखड़ गया, ' ये क्या ? मैं अपनी बंगाली पोशाक में ही जाऊँगा..मेरा कुरता-पजामा ही ठीक है..' पिंकी ने विरोध सा दिखाते हुए कहा कि ये टी-शर्ट मुझ पर बहुत खिलेगी। उसने यह भी कहा कि उसी के साथ मैच करती ड्रेस उसने अपने लिए भी निकाली है। दोनों अच्छे दिखेंगे। मैं न-न करता रह गया था परन्तु शाम को उसकी चुनी ड्रेस पहन तैयार हो गया था। हम दोनों नीचे आये तो मेरी माँ हमें देखती ही रह गयी थी। उन्होंने बिशाखा को लाल मिर्च जलाकर लाने को कहा, ' क्या जोड़ी सजी है.. आओ नज़र उतार दूँ .. ' फिर उन्होंने पूछा, ' वहां कैसे जाओगे ? पिंकी ने मेरी ओर देखा था। मैंने कहा, ' पास में ही तो जाना है.. पैदल ही चले जायेंगे या फिर टैक्सी ले लेंगे हैं..'  अब पिंकी ने कहा, ' यहाँ की टैक्सी की हालत में देख चुकी हूँ..सो डर्टी एंड खटारा .. मैं टैक्सी में नहीं जाऊँगी.. वाक ही कर लेते हैं..'  माँ ने कहा कि उनकी ऑफिस की कार आयी हुई थी क्यों कि उन्हें कहीं जाना था, वह हमें छोड़ देंगी। अब पिंकी ने कहा कि अपनी एक कार होनी चाहिए। फिर आवेश में उसने कहा कि उसके मामाजी के पास तीन कारें थी और जब उसने ऑफिस ज्वाइन किया था तब वे एक छोटी कार उसे देना चाहते थे। वह उनसे कहेगी तो वह भिजवा देंगे। माँ ने कहा, ' तुम दोनों देख लो ..जैसा ठीक लगे, करो..' मैंने कहा कि मामाजी से कार लेना उचित न था। पिंकी ने कहा कि संकोच की कोई बात न थी क्यों कि उस कार को ऐसे ही रखा हुआ था। मामाजी के लिए उसका कुछ उपयोग नहीं था। वह जब भी दिल्ली जाती थी तो इस कार को निकालती थी। उसने कहा कि वह रात को ही अपने मामाजी को फोन करेगी। मैंने न तो कहा था परन्तु उसमें एक तरह का हाँ छिपा था। मैं भीतर ही भीतर कुछ और ही सोच रहा रहा था कि कार आएगी तो पिंकी ही चलाएगी मुझे तो ड्राइविंग नहीं आती थी। माँ भी तैयार हो चुकी थी। उन्होंने हमें साथ लिया और अपने ड्राइवर से कहा, ' शिबू, इन्हें गुरुसदा रोड पर छोड़ते हुए जाना है..'  रास्ते में उन्होंने बताया कि अगले दिन किसी क्लब के महिला विभाग की ओर से उन्हें एक गोष्ठी में आमंत्रित किया गया था और मनप्रीत को भी उनके साथ जाना होगा।  हम केडिया भाभी के नौवें फ्लोर के फ्लैट में पहुंचे तो वहां काफी धूमधाम देखी थी। मैंने पिंकी से पूछा, ' केडिया भाभी कहती हो परन्तु उनका नाम क्या है   ..' पिंकी ने कहा, ' कोमल  .. कोमल केडिया   ..' उनका बहुत बड़ा फ्लैट था। लिफ्ट से उनके फ्लोर पर उतरते ही उनके घर पर हो रही पूजा का माहौल दिखने लग गया था। फूलों से पूरे फ्लोर को भव्य रूप से सजाया गया था। केडिया भाभी बहुत प्यार से मिली थी। उन्होंने पिंकी को गले लगाया, ' मनप्रीत, बहुत आभार, तुम आई हो, मेरे घर..चलो पहले मंदिर में दर्शन कर लो..' मुझे भी उन्होंने भैया कहकर नमस्ते कहा था। वह पिंकी को हाथ पकड़कर पूजा घर ले गयी। मैं पीछे पीछे था। उनका पूजा घर एक बड़े कमरे में था। एक ओर संगमरमर का अति सुन्दर मंदिर था। उसके सामने महिलाएं बैठी हुई थी। राधा-कृष्ण की मूर्तियां सजी हुई थी और भजन की ध्वनि महक रही थी। मैं अपरिचित और ठगा सा एक ओर खड़ा था। केडिया भाभी, पिंकी को अपनी माँ और अन्य महिलाओं से मिलवा रही थी। अचानक मैंने देखा कि बांग्ला टीवी की एक प्रसिद्द समाचार वाचिका भी वहां थी। भाभी ने पिंकी को उससे मिलवाया, ' ये मेरी नयी फ्रेंड हैं, मनप्रीत कौर.. ये चंडीगढ़ से आयी है..यहाँ कलकत्ता में इसकी बंगाली ससुराल है..'  उस समाचार वाचिका से मैं बहुत प्रभावित हुआ करता था। उसका बांग्ला भाषा में वाचन और बंगाली साड़ी और माथे की बिंदिया मुझे बहुत प्रभावित किया करती थी। मेरा मन हुआ कि उससे मिलूं। तभी पिंकी ने मुझे इशारे से बुलाया और उससे कहा, ' ये हैं मेरे हस्बैंड, अभिजीत रॉय..'  उसने मेरी ओर हाथ बढ़ा दिया और तपाक से हेलो कहा। उसके इस अंदाज़ से क्षण भर को मैं असहज हुआ क्यों कि समाचार पढ़ते उसे देखता था तो मुझे उसमें आदर्श बंगाली नारी दिखती थी। यहाँ वह एकदम आधुनिका नारी सी दिख रही थी। मैंने बांग्ला में कहा, 'आप यहाँ ? उसने केडिया भाभी की ओर इशारा करते हुए अंगेरजी में उत्तर दिया, ' कोमल मेरी पुरानी और बहुत अच्छी मित्र है ..' मैं कुछ और बात करता इससे पहले ही वह आगे बढ़ गयी थी और दूसरों से मिलने-जुलने लगी थी। मैं सोच में था कि दूरदर्शन पर ये कितनी सौम्य और बंगाली दिखती है और वास्तविकता में अत्यंत आधुनिक और फ़ास्ट लेडी। मैंने इधर-उधर नज़रें घुमाई। हर ओर मुझे वैभवता ही दिख रही थी। मैं सोचने लगा कि ये मारवाड़ी लोग कलकत्ता में आकर कितने धन वान हो जाते हैं। अपने क्षेत्र में तो ये लोग शायद किसी छोटी-मोटी दुकान के मालिक भी न हों। उस बंगाली समाचार वाचिका के व्यवहार और इस मारवाड़ी घर की भव्यता ने मुझे खिन्न सा कर दिया था। मैंने मौका लगते ही पिंकी से घर लौटने को कहा था। वह हैरान हो मुझे देखने लगी थी। उसने कहा कि अभी तो आरती होगी और उसके बाद खाना भी था, ऐसे में जल्दी से लौट जाना ठीक नहीं लगता। मैंने कहा कि किसी आवश्यक कार्य का बहाना बना दो। परन्तु उसने मेरी बात का नकार दिया था और मुझे भाभी के हस्बैंड के साथ बातचीत करने को कहा था। उसने दूर खड़े एक सज्जन की ओर इशारा करते हुए कहा, ' वह उधर खड़े हैं दिनेश भैया, आओ तुम्हें मिलवा दूँ ..' मुझे यह विचित्र सा लगा था। मैं जन्म से कलकत्ता का रहने वाला और यह पहली बार पंजाब से आयी लड़की, मुझे ही एक अन्य कलकत्तावासी से मिलवा रही थी। मैंने कहा, ' छोड़ो न, क्या करना है इनसे मिलकर..हमें तो अभी यहाँ से निकलना ही है ..'  एक क्षण को मुझे उसका दिनेश भैया वाला संबोधन भी खटका था। मेरा शिकायती मन गतिशील हो रहा था। मैंने सोचा कि उन्हें मुझसे मिलना चाहिए था क्योंकि हम उनके घर आये हुए थे। पिंकी शायद मेरा मन भांप गयी थी। उसने कहा कि इतने लोग आये हुए थे शायद वह व्यस्तता में खुद से आगे बढ़ मिलने न आ पाए होंगे। उसने धीमे से यह बात कही थी। धीमी या मन ही मन में कही बात भी कभी कभी अपने गंतव्य तक पहुंच जाती है। कुछ ही समय में केडिया साहब, हम दोनों के पास चले आये और मुझसे से नमस्ते करते हुए कहा, ' बहुत अच्छा हुआ जो आप आये.. मनप्रीत जी से आपके बारे में सुना था .. आज मिलना भी हो गया.. आराम से बैठिये.. अपना ही घर समझिये  ..' फिर उन्होंने आगे बढ़ते हुए कहा, ' आप भी सुबह मॉर्निंग वाक पर आया करिये..सुबह की सैर बहुत अच्छी होती है..हमारा ब्लड प्रेशर और शुगर तो इसी से कंट्रोल में रहता है..' मैं केवल मुस्कुरा दिया था और वह आगे बढ़ गए थे।  पिंकी ने हल्की सी नाराज़गी दिखाते हुए मेरे कान में कहा, ' आपको कुछ कहना चाहिए था.. उन्हें अपने घर इन्वाइट करना चाहिए था..इसी तरह से तो दोस्ती बढ़ती है..'  मैंने उसकी बात का उत्तर न दिया था परन्तु मेरा दिमाग़ संवाद कर रहा था। उसने कहा, ' ये व्यापारी और हर सम्बन्ध में लाभ-हानि सोचने वाले लोग, हमारे बंगाली स्वतंत्रता सेनानी के घर में क्या पाएंगे..'( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे, यहीं पर   ..)

Wednesday, December 30, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 52

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1                    (  हफ्ते वार इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  .. ) ( ५२ )      कुछ समय बाद माँ और पिंकी लौट आये थे। बाबा के मित्र भी अपने घर जाने का मन बना चुके थे। माँ को देखा तो वह उठ खड़े हुए थे। माँ ने लगभग चिढ़ाते हुए स्वर में कहा, ' ये क्या दादा, मैं आई और आप चल दिए ? काका ने सौम्य सी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ' नहीं ऐसी बात नहीं है, काफी समय से आया हुआ हूँ, अब तो जाने ही वाला था.. अच्छा हुआ जो आप से और बहू माँ से भी मिलना हो गया..' पिंकी समझ गयी थी कि वह पापा जी के घनिष्ट दोस्त थे। उसने माँ की बात सुनी तो तुरंत बोली, ' नहीं अंकल, अब तो आप को कुछ देर रुकना ही होगा.. चलिए, मैं आपको अपने हाथ की पंजाबी चाय पिलाती हूँ..' काका ने कहा कि वह बिशाखा के हाथ की चाय पहले ही पी चुके थे। पिंकी ने हँसते हुए कहा, 'अंकल, जो बिशाखा दीदी ने आपको सर्व की होगी वह तो बंगाली चाय रही होगी और उसे आपने खाया होगा.. मेरी  तो पंजाबी चाय होगी, उसे तो पीना पड़ेगा .. ' उसकी इस बात पर सब हँस पड़े थे। माँ भी मुस्कुरायी परन्तु उन्होंने पिंकी से कहा कि वह ज़बरदस्ती चाय पिला रही थी, अब इस कारण उसके अंकल अंकल जी को जो एसिडिटी होगी तो उसके लिए दवा भी पिंकी को ही देनी होगी। ख़ुशी का सा माहौल बनता जा रहा था। पिंकी, बिशाखा का हाथ पकड़ रसोई घर में घुस गयी थी। कुछ की मिनटों में वह एक ट्रे में चाय लेकर आयी साथ में काजू-बादाम भी थे। काका ने देखा तो मुस्कुराते हुए कहा कि वह इन महंगी चीजों के योग्य न थे। उन्हें तो चाय के साथ दो बिस्कुट मिल जाएं, वही यथेष्ट था। पिंकी ने कहा, ' ये क्या बात हुई,अंकल ? आज तो आप जल्दी में हैं वरना आप को चाय के साथ गर्मागर्म पकोड़े भी खिलाती..' पिंकी का मिज़ाज अब काका को समझ आ रहा था। उन्हें आभास हो गया था कि ये लड़की बहुत खुश दिल है। उन्होंने हँसते हुए कहा, ' हाँ, पंजाबी स्टाइल के फूलगोभी के पकोड़े मुझे बहुत पसंद हैं..एक दिन आऊंगा  खाने..' माँ ने सुना तो अपने अंदाज़ में चुटकी लेते हुए कहा, ' लो, और चाय ऑफर करो, इन्होंने तो अगली चाय के साथ पकोड़ों का भी प्रबंध कर लिया है..ये बंगाल है, बेटी.. यहाँ सोच-समझ कर बोलना पड़ता है..' पिंकी ने कहा, ' नो वरी, मम्मी .. अंकल आएँगे तो पापा का दिल भी लगा रहेगा.. दोस्तों के साथ, चाय का मज़ा ही कुछ और होता है..पर यह फूलगोभी क्या होता है, हम तो केवल गोभी ही जानते हैं..'  मेरे बाबा और काका दोनों बहुत खुश थे। जब काका घर से निकलने को हुए तो उन्होंने बहुत स्नेह से पिंकी को आशीर्वाद दिया और मुझे कानों में कहा, ' बहुत भाग्यशाली हो,बेटा..' वह चले गए थे तो हम सब एक जगह आकर बैठ गए थे। पिंकी ने कहा कि उसे अंकल बहुत अच्छे लगे थे और यह भी कि वह उनका आतिथ्य अच्छे से नहीं कर पाई थी। माँ ने कहा कि ऐसी कोई खास बात न थी और वह तो अपने घर के सदस्य जैसे थे और अक्सर आते-जाते रहते थे। पिंकी ने यह भी कहा कि उसके सामान में दो टी-सेट भी थे और उन्हें उपयोग में लाया जाना चाहिए। वह साथ-साथ उठी और टी-सेट निकालकर ले आयी थी। उसने बिशाखा से कहा कि अब से नया सेट अतिथियों के लिए उपयोग में लाया करे। माँ कुछ नाराज़ सी लगी उन्होंने कहा कि ये बहुत महंगे सेट थे और इन्हें नियमित उपयोग में लाना उचित न था। इन्हें कुछ खास अवसर पर ही निकालना चाहिए। पिंकी ने प्रतिक्रिया दी, ' हाँ, मम्मी यह बात तो ठीक है परन्तु खास अवसर की प्रतीक्षा करते-करते ये ऐसे ही न रखे रह जाएं.. और पुराने न हो जाएं.. किसी भी अवसर को खास अवसर तो हमें ही बनाना होगा..'  ये सब बातें चल ही रही थी कि फोन की घंटी बज उठी थी। मैंने ही फोन उठाया था। मंत्रालय से फोन आया था। किसी मंत्री जी के सचिव का था और वह माँ बात करना चाहते थे। माँ फोन पर बात सुनती गयी थी। बाद में उन्होंने बताया कि राज्य के पर्वतीय क्षेत्र में किसी नेपाली लड़की के साथ कुछ अप्रिय घटना हुई थी। मंत्री जी एक स्टेटमेंट भिजवा रहे थे और माँ को हस्ताक्षर कर, महिला आयोग की ओर से जारी करना था। माँ ने कहा कि घटना की पूरी जानकारी के बिना वह कैसे आयोग की ओर से कोई प्रतिक्रिया  जारी कर सकती थी ? मैंने कहा कि जब मंत्री महोदय स्वयं से भिजवा रहे थे तो ठीक ही होगा। पिंकी खामोश बैठी सब सुन रही थी। उसने मुझसे धीरे से नेपाली लड़की के बारे में पूछा था। मैंने उसे बताया की दार्जिलिंग के स्थानीय निवासियों को हम लोग नेपाली कहते हैं। अब उसने कहा कि बिना पूर्ण जानकारी प्राप्त किये, हस्ताक्षर कर देना ठीक न था। बाबा ने भी सहमति में सिर हिलाया परन्तु कहा कि घटना की जानकारी मिलती कहाँ से ? उसके लिए भी तो मंत्रालय की मशीनरी पर ही निर्भर करना होता है और यह बनी बनाई विज्ञप्ति वहीं से ही तो आ रही थी। माँ खामोश थी। अचानक उन्होंने फोन उठाया और एक नंबर घुमाया। मैंने पूछा, ' किस से बात करना चाहती हो ? माँ ने संक्षिप्त उत्तर दिया, ' रुको, बताती हूँ..' वह बात करने लगी और यह विज्ञप्ति वाली बात बताई थी। अब मुझे समझ आ गया था कि फोन के दूसरे छोर पर पार्टी के अध्यक्ष थे। ये मेरे नाना के मित्र थे और माँ किसी भी समस्या का निदान उन्हीं से पाया करती थी। कुछ समय बाद माँ ने बताया कि उनके काका घटना की विस्तृत जानकारी, पार्टी के संबंधित क्षेत्र के संचालक से प्राप्त कर, माँ को अवगत कराएँगे। उसके बाद ही विज्ञप्ति का जारी किया जाना उचित होगा। काफी देर रात तक बातें चलती रही थी। पिंकी का मत था कि पीड़िता को न्याय मिलना चाहिए था। माँ भी यही चाहती थी। मैं मंत्रालय के पक्ष में था क्योंकि जनता के पक्ष की आधिकारिक ज़िम्मेदारी उन्हीं पर थी। पिंकी का मानना था कि महिला आयोग को स्वतंत्र और स्वायत संस्था होना चाहिए। माँ ने विषय को विराम लगाते हुए कहा, ' देखो, काका क्या रिपोर्ट देते हैं ? यदि आवश्यकता हुई तो मैं स्वयं उस पर्वतीय क्षेत्र में जाऊंगी..' उन्होंने पिंकी की ओर देखते हुए कहा, ' क्यों, ठीक है न मनप्रीत ? पिंकी ने सहमति में सिर हिलाया परन्तु मुझे माँ का प्रस्ताव उचित न लगा था। मैंने कहा कि इस तरह के आयोग दिखावे मात्र के लिए होते हैं और उनका महत्व आभूषण की तरह होता है। मैंने माँ को कहा कि यह सत्य उन्हें भी देर- सबेर समझ आ जायेगा।रात काफी आगे बढ़ चुकी थी। हम चारों अपने कमरों में सोने के लिए आ गए थे।  सुबह नाश्ते के समय सब मिले तो न जाने कहाँ से रात वाली बात की ही कड़ी मिल गयी थी। माँ को लग रहा था कि किसी कुछ ही समय में मंत्रालय से कोई विज्ञप्ति लेकर आ जायेगा। समस्या यह थी कि तुरंत हस्ताक्षर कर दिया जाना संभव न था क्यों कि पार्टी की ओर से घटना की जानकारी भी आने वाली थी। उस सुबह माँ को उलझा हुआ सा देखा था। पिंकी भी स्थिति को समझ रही थी। उसने अपनी ओर से माँ को कहा, ' मम्मी जी आप इस प्रेस-रिलीज़ को रख लेना और सोच-समझ कर उसे बाद में वापिस भेजना..'  माँ ने कहा, ' बेटा, ऐसी बातों को साथ साथ निपटना होता है..सरकारी फाइल की तरह उन्हें रोक कर नहीं रखा जा सकता..प्रार्थना करती हूँ काका की तरफ से रिपोर्ट पहले मिल जाए.. आयोग की अध्यक्षा के नाते यह मेरा पहला महत्वपूर्ण कार्य है, मैं कोई त्रुटि नहीं चाहती..' पिंकी एक अच्छी बहू की तरह, अपनी सास की बातों को सिर हिलाकर सहमति दे रही थी। जैसी माँ की इच्छा थी, कुछ समय बाद उनके काका का फोन आ गया था और उन्होंने माँ को स्वीकृति दे दी थी कि मंत्रालय से आने वाली विज्ञप्ति पर हस्ताक्षर कर दें। माँ ने उनसे पूछना चाहा कि क्या उन्हें अपने सूत्रों से घटना की जानकारी मिल गयी थी ? इस पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस इतना कहा कि हस्ताक्षर कर देना ठीक था।  बाद में जब बात मेरे बाबा के कानों में आयी तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, ' अरे, गणेश काका ने रात में ही सीधे मंत्री जी से बात कर ली होगी..और उन्हें अनुमान लगा लिया होगा कि मामला क्या है और आयोग की ओर से जनता में क्या सन्देश दिया जाना चाहिए.. इस स्तर पर इसी तरह से काम होते हैं..' उनकी इस बात पर मैं और पिंकी दोनों हँस दिए थे। माँ अब निश्चिंत थी। उन्होंने पिंकी को दुलारते हुए कहा, ' जब हमारी बहू सौभाग्यशील है तो सब काम सरलता से ही होने हैं..' ( आज बस, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर )

Wednesday, December 23, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -51

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II-चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1                    (  हफ्ते वार इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ..  ) ( ५१ ) चार दिन कैसे बीत गए, पता ही न चला था। हम नाश्ता कर चुके थे। कुछ ही समय में हमें फ्लाइट पकड़नी थी और कलकत्ता लौट जाना था। इन दिनों हम लगातार कलकत्ता, चंडीगढ़ और दिल्ली में बातचीत करते रहे थे। मेरी माँ, कलकत्ता के सब समाचार दे देती रहती थी। उन्होंने महिला आयोग की अध्यक्षा का पद ग्रहण कर लिया था। उन्होंने बताया था कि वह राज्यपाल महोदय से भी मिलने का आवेदन कर चुकी थीं। उन्हें आशा थी कि शीघ्र ही मुलाकात की तिथि और समय की सूचना मिल जाएगी। उनकी बातचीत से स्पष्ट हो रहा था कि वह पिंकी को अपने साथ राजभवन ले जाना चाहती थी। उनकी यह इच्छा स्वाभाविक थी कि अपनी नव पुत्रवधू को प्रभावित करें। वैसे भी कोई भी पिंकी जैसी लड़की का साथ चाहेगा। पिंकी किसी को भी प्रभावित करने में सक्षम थी। मैं यह भी समझ पा रहा था कि पंजाबी-सिख परिवार से होने के कारण उसका माँ के साथ दिखना, माँ के नए पद की गरिमा बढ़ाने में सहायक था। मैं इन बातों में खुद से उलझा हुआ था कि पिंकी ने आकर, समय से चेक आउट कराने की सलाह दी। हम समय से एयरपोर्ट पहुंचे और फिर समय से ही कलकत्ता भी आ गए थे। माँ एयरपोर्ट पर आयी हुई थी। मैंने अपने बाबा के बारे में पूछा। माँ ने बताया कि उनकी ऑफिस में कोई मीटिंग चल रही थी इसलिए उनका आना संभव न था। माँ जिस कार से आयी थी, मैं उस कार को देखता रह गया। उस पर लाल बत्ती लगी थी और सामने महिला आयोग का बोर्ड था। पिंकी ने भी देखा और उसने वाह के अंदाज़ में एक मुस्कान दिखाई थी। मैं सामान कार में रखने को आगे बढ़ा ही था कि माँ ने मुझे रोक दिया। उन्होंने कहा, ' इसमें नहीं, एक और कार भी है..तुम उसमे घर जाओ.. मैं और मनप्रीत इस कार से आते हैं..' मैं कुछ समझ पाता कि उन्होंने स्पष्ट किया कि एक संस्था की महिलाओं ने उन्हें आमंत्रित किया हुआ था। समय अधिक न था इसलिए वह एयरपोर्ट पर आ गयी और मनप्रीत को सब से मिलाकर घर पहुँच जाएँगी। मैं कुछ कहता इस पहले ही पिंकी ने असंतुष्ट सा भाव देते हुए कहा, ' मैं अकेले, अभिजीत नहीं ? माँ ने कहा कि महिलाओं की गोष्ठी थी, वहाँ मेरा जाना नहीं बनता था। मैं मुस्कुराया और माँ अपनी बहू को ले निकल गयी थी। मैं घर के दरवाज़े पर पहुंचा तो देखा बाबा भी अपना ऑफिस वाला बैग लेकर आ रहे थे। वह ऑफिस से लौट रहे थे। मुझे अकेला देख उन्होंने कहा, ' हमारी बहुमा कहाँ है ? मैंने उन्हें सब बताया तो वह हंसने लगे, ' तुम्हारी माँ को अब बहू चाहिए, बेटा नहीं..' उनके मुख से बहूमा सुंनना अच्छा लगा था। एक क्षण को बंगाली परंपरा पर गर्वानुभूति हुई थी कि हम पुत्रवधू को माँ का दर्जा देते हैं। पश्चिमी संस्कृति में तो वह ' कानून से बेटी ' होती है।  हम दोनों ने एक साथ घर में प्रवेश किया। बिशाखा ने दरवाज़ा खोला और हैरान हो पूछा, ' ये क्या अकेले, बहुमा को कहाँ छोड़ आये हो ? मैं थोड़ा झुँझलाया और कहा, ' अंदर चलो और पहले चाय पिलाओ..'  बिशाखा चाय लेकर आयी और जो उसने प्रश्न पूछा था उसका स्वयं से ही उत्तर देने लगी।  उसने कहा, ' तुम बताओ या न बताओ, मैं समझ गयी हूँ कि माँ, हमारी बहुमा को लेकर किसी मीटिंग में चली गयी हैं..वह आज शाम की मीटिंग की बात कर रही थीं, मैंने सुना था.. ठीक पकड़ा न..'  मैं बिशाखा का यह गुण जानता था। मैंने कई बार यह देखा था कि वह घर में हो रही बातों को सुन पूरा वृतांत समझ जाती थी। कई बार तो वह राजनैतिक गतिविधियों पर भी सटीक टिप्पणी कर देती थी। बाबा के स्कूल दिनों के वह लेखक और कवि दोस्त भी अचानक आ पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि वह उस तरफ से कहीं जा रहे थे सो मिलने चले आये थे। बाबा उनको देख बहुत खुश हो गए थे । उनके चेहरे पर चमक आ गयी थी। मैंने भी काका कह उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने मुझे आशीर्वाद देते हुए कहा कि मेरे पिता उन्हें तो बाराती बनाकर नहीं ले गए थे।  फिर उन्होंने कहा, ' अरे ! ठीक भी है, दिल्ली की ऊँची शादी में वह कहाँ खपते ?  मैंने देखा बाबा कुछ शर्मिंदगी सी महसूस कर रहे थे परन्तु दोनों मित्र एक दूसरे की स्थिति को समझ रहे थे। यही तो मित्रता होती है जो बिन कुछ कहे सब समझ जाती है।  बाबा ने उन्हें बताया कि मैं अभी ही गोवा से लौटा था और मेरी पत्नी को उसकी सास कहीं लेकर गयी थी। वे दोनों मित्र हंसने लगे थे। बिना बात बढ़ाये दोनों स्थिति को समझ गए थे। मैं अनुमान लगाता रह गया कि मेरी माँ के महिला आयोग वाले पद ग्रहण की बात उठेगी परन्तु यहाँ तो जैसे सब कुछ शीत जल सा स्पष्ट था। अचानक काका ने चाय की चुस्की लेते हुए मुझसे पूछा, ' कैसा रहा तुम्हारा मधुचंद्र ? इससे पहले की मैं समझ पाता, उन्होंने खुद ही हँसते हुए अंग्रेजी में कहा, ' आई मीन हनीमून ..'  मैंने सिर्फ मुस्कुराकर उत्तर दिया। उन्होंने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ' कोई तकरार तो नहीं हुई न ? गलत मत समझना, कहा जाता है कि पति-पत्नी की पहली तकरार हनीमून के दौरान ही होती है  ..'  मैं मुस्कुराये ही जा रहा था।  मैंने सोचा बात तो उनकी सही थी। जब गोवा में पिंकी ने गुरूद्वारे जाने की बात कही थी तो मैं झुँझला गया था। मैंने उसे कहा था, ' ये क्या ? यहाँ भी गुरुद्वारा ? अब कहीं भी जाएंगे तो गुरूद्वारे जाना ही पड़ेगा ?  पिंकी क्षण भर को चुप हो गयी थी और उसने कहा था कि कोई बात नहीं थी यदि मेरा मन नहीं था और मैं विश्राम करना चाहता था तो वह अकेले ही हो आयेगी। मैंने स्थिति को संभाल लिया था यह कह कर कि उस दिन नहीं, अगले दिन सुबह चलेंगे। परन्तु उस शाम हम दोनों शांत थे। रात का खाना भी बिना कुछ बात किये खाया था। क्या यही हमारी हनीमून वाली दाम्पत्य जीवन की पहली तकरार थी ? बाबा अपने मित्र को लेकर छत पर चले गए। वह सिगरेट नहीं पीते थे परन्तु कभी अपने किसी पुराने मित्र से मिलते तो एक सिगरेट सुलगा लेते थे और  नौजवान जैसे अंदाज़ में कश लगाते हुए, यादों की गलियों में खो जाने का प्रयास करने लगते थे। आज तो वह कुछ अधिक ही प्रसन्न थे क्योंकि उनकी पत्नी की आतंकी रोक-टोक न थी। मुझे भी उनका यह उन्मुक्त चेहरा अच्छा लग रहा था। ( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे, यहीं पर  ..) 

Wednesday, December 16, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -50

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II-    चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1                                        ( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ) ( ५० )   प्रातः हम देर तक सोये रहे थे। माँ, जो घर में सभी से भोर में उठ जाने की आशा किया करती थी, आज शांत थी। हम दोनों नीचे आये तब तक दस बस चुके थे। पिंकी ने माँ के पांव छुए। माँ ने आशीर्वाद देते हुए पूछा कि नींद कैसी रही थी ? साथ ही उन्होंने यह भी पूछ लिया कि उसके घर में सब लोग कितने बजे जाग जाते थे ? माँ का दिमाग चल रहा था। असल में वह तो केवल उसी के सुबह उठ जाने का समय जानना चाहती थी और उसे  यह भी बता देने चाहती थी कि उनके घर में इतनी देर तक सोया रहना स्वीकार न था। उन्होंने कहा, ' मोनप्रीत, कल रात तो विलम्ब हो गया था.. तुम थकी हुई भी थी..यहाँ सब समय से बिस्तर छोड़ देते हैं..' पिंकी को माँ के मुख से मनप्रीत शब्द को बंगाली ध्वनि में सुनना अच्छा लगा होगा। वह मुस्कुरा दी थी। उसने कहा, ' मम्मी जी, मैं तो घर में सबसे पहले उठ जाती हूँ.. मैं तो जॉगिंग के लिए भी जाती हूँ.. यहाँ भी तो वाकिंग और जॉगिंग के लिए लोग जाते होंगे, कोई आसपास पार्क तो होगा ही ? माँ ने बताया कि कुछ ही दूर पर एक सुन्दर लेक है जहाँ लोग जाते हैं और वह भी वहाँ जा सकती थी। माँ ने कहा, ' गोवा घूम आओ, मैं सब व्यवस्था कर दूंगी..' एक ओर होने पर उसने मुझसे पूछा, ' अभिजीत, मम्मी जी कौन सी व्यवस्था के बारे में कह रहीं थी ? मैंने तो जॉगिंग पर जाने के लिए कहा था.. ' मैंने उसे समझाया कि वह शायद सुबह तुम्हारे साथ जाने के लिए किसी को कहेंगी, उन्हें पता है कि मैं तो भोर में उठकर कहीं नहीं जाऊंगा। पिंकी मुस्कुरा दी, ' जॉगिंग के लिए मेरे साथ कोई ? ये क्या बात हुई ? मैं क्या बेबी हूँ ? मेरे साथ केवल तुम ही चलोगे.. वरना मैं अकेले ही जाऊँगी..' मैंने कहा कि देखा जायेगा क्योंकि मैं जानता था कि माँ शहर से अपरिचित इस लड़की को अकेले सुनसान से लेक क्षेत्र में नहीं जाने देना चाहेंगी। मैंने विषय को बदलते हुए  उसे बताया कि हमें लंच के बाद ही निकल जाना होगा क्योंकि साढ़े पांच बजे की फ्लाइट थी। उसने अपना सामान  पैक करना आरम्भ किया और मुझे कहा कि मैं भी अपना सब कुछ ठीक से रख लूँ। साथ ही उसने याद से स्विमऔर ट्रैक्किंग सूट रख लेने के लिए भी कहा था।  दोपहर का खाना खा हम दोनों एयरपोर्ट जाने के लिए तैयार थे। मैंने कहा, ' अभी कुछ समय रुक सकते हैं.. दिन के इस समय अधिक समय न लगेगा  .. सड़कें खाली होती हैं.. ' पिंकी मुझे चलने के लिए उकसाती जा रही थी। मैंने  जानना चाहा तो उसने कहा, ' मम्मी कह रही थी कि यहाँ का गुरुद्वारा बहुत अच्छा है..क्यों न वहां मत्था टेकते हुए जायें ? मैंने मुंह बना दिया और मन में सोचा कि मैं माँ के साथ मंदिर और आश्रम आदि जगहों पर जाने से कतराता रहा हूँ और अब ये गुरुद्वारा और मत्था टेकना ? क्या एक नया झमेला तो नहीं होने जा रहा मेरे जीवन में ? मेरा रूखापन देख पिंकी ने कहा, ' कोई बात नहीं.. तुम्हारा मन नहीं है तो नहीं जाते..' अब मैंने सूटकेस उठाया और कहा, ' नहीं..नहीं ऐसी बात नहीं है .. चलो चलते हैं..' मैंने बिशाखा को नीचे जाकर एक टैक्सी को रोकने के लिए कहा। मेरी यह बात पिंकी को खटकी। उसने अंग्रेजी में कहा, 'अरे, उन्हें क्यों टैक्सी के लिए भेज रहे हो, खुद ही जाओ न..' उसने यह वाक्य अंग्रेजी में इसलिए कहा था कि बिशाखा को समझ न आये लेकिन कुछ बातें जिस अंदाज़ कही जानती हैं, वे शब्दों की मोहताज़ नहीं होती, वे अर्थ स्वयं से स्पष्ट कर देती हैं। बिशाखा को हमारे घर में हर छोटे-बड़े काम के लिए यहाँ-वहाँ दौड़ाया जाता था। कभी उसकी सुविधा-असुविधा की ओर नहीं देखा जाता था। आज शायद पहली बार किसी ने उसके बारे में सोचा था। बिशाखा बात समझ गयी थी। उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी जो कह रही थी, कोई तो आया मेरा मन पढ़ने वाला। मैं टैक्सी लाने के लिए आगे बढ़ा ही था कि पिंकी बोल पड़ी, ' वैसे टैक्सी लाने की क्या जरुरत है, दो सूटकेस हैं.. एक-एक सूटकेस लेते हैं और बाहर जाकर टैक्सी ले लेते हैं  .. ' मैं किसी निक्कमा सा, हूँ..  हूँ.. ही कहता रह गया और वह दोनों सूटकेस खींच लायी थी। हमने माँ को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लिया और सीढ़ी से नीचे उतर घर से बाहर निकल आये थे।  कलकत्ता की ये पीलिया टैक्सी यूँ तो आवारा छोकरों सी यहाँ-तहाँ भटकती रहती हैं पर उस पहले दिन न जाने कहाँ किसी षड्यंत्र की तरह छिप गयी थीं। मानों बाहर से आयी लड़की को अपनी असलियत बता रही हों। मैंने पिंकी को यह बात बतायी तो उसने कहा कि कलकत्ता की टैक्सियों की हालत के बारे में उसने सुन रखा था। उसने कोई नाराजगी न दिखाई बल्कि मेरे साथ-साथ, हाथ हिलाकर, आती-जाती टैक्सियों को रोकने की कोशिश करने लगी। कई टैक्सियां दाएं-बाएं हो गुजर गयी परन्तु खाली टैक्सी एक भी न दिखी। मैं निराश हो रहा था परन्तु पिंकी हर टैक्सी को रोकने का प्रयास कर रही थी। अंततः वह सफल हुई और एक टैक्सी के रुकते ही उस में अपना सामान चढ़ाने लगी। मैंने कहा, ' पहले उससे पूछ तो लो..जायेगा या नहीं..' वह हैरान हो मुझे देखने लगी, ' अरे, टैक्सी है.. जायेगा क्यों नहीं..टैक्सी वाला नो नहीं कर सकता  ..' मेरे मन में आया कि कहूं ' ये तुम्हारा चण्डीगढ़ नहीं है  ..यह कलकत्ता है  ..' पर चुप रह गया था और टैक्सी ड्राइवर से बात करने लगा था। वह राजी था और हमें ले गुरुद्वारे की ओर निकल गया। गुरूद्वारे के सामने पहुँच मैंने पिंकी को कहा कि मैं टैक्सी में रहूँगा और वह जल्दी से प्रणाम कर आ जाये। उसने कहा कि दोनों ही गुरूद्वारे के भीतर जायेंगे। मैंने उसे समझाया कि टैक्सी में सामान था और उसे छोड़ना उचित न था। उसने कहा कि टैक्सी का नंबर नोट कर लेते हैं। फिर एक बार मन में आया कि कहूँ, ' ये तुम्हारा चंडीगढ़ नहीं है.. कलकत्ता है..' परन्तु एक बार फिर से मैं चुप रह गया था और टैक्सी वाले से कहा. ' पांच मिनिट में आते हैं..'  कनखियों से मैंने टैक्सी का नंबर देख लिया था। हम तुरंत ही लौट आये थे, वहां बैठे नहीं थे और समय से एयरपोर्ट पहुँच गए और रात को गोवा के होटल में। गोवा एयरपोर्ट पर होटल की ओर से स्वागत किया गया था। किसी भी असुविधा का प्रश्न ही न था।  गोवा में चार दिन कैसे बीत गए थे, पता ही न चला था। मैं बहुत ही खुश था। पिंकी का आकर्षणीय व्यक्तित्व मुझ पर और उसके संपर्क में आने वाले सभी पर छा रहा था। इन चार दिनों में ही वह होटल के स्टाफ के बीच प्रिय बन गयी थी। सभी हमारा मुस्कुरा कर स्वागत करते थे। हम दोनों यहाँ के गुरूद्वारे में भी गए थे। यह बहुत सुन्दर गुरुद्वारा बेटिम फेरी के पास ही था। होटल के कर्मचारियों में एक सिख लड़का भी दिखा था। पिंकी ने उससे बात की थी। वह लुधियाना का था। उस लड़के ने ही इस गुरूद्वारे के बारे में बताया था। इसका उद्घाटन राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह द्वारा किया गया था। पिंकी को गुरूद्वारे में  सिख धर्म से सम्बंधित एक अंग्रेजी पुस्तक मिल गयी थी। उसने मुझे देते हुए कहा, ' इसे पढ़ना.. बुक शेल्फ में सजाकर न रख देना ..'( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को, यहीं पर .. )   

Wednesday, December 9, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -49

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II-    चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra   http://chander1949.blogspot.com/?m=1                                        ( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )  ( ४९ )   बहूभात वाली पार्टी में माँ ही छायी हुई थी। सभी देख रहे थे कि वह दुलाल चक्रवर्ती के साथ-साथ रहने की फ़िराक में थीं। मेरे बाबा ने संकेत भी दिए थे कि उन्हें सभी अतिथियों की ओर देखना चाहिये और नई बहू का परिचय सबसे करवाना चाहिए। परन्तु, माँ ने  हाँ-हूँ कहकर उन्हें एक ओर कर दिया था। उनसे जो भी मिलने आता, वह उससे एक ही बात सुनना चाहती थी कि वह नए पद पर सफल हों। कोई उन्हें बेटे के विवाह की बधाई देता तो वह अपनी ओर से बे वजह कहती कि उन्होंने सदैव ही भाषा और प्रान्त के बारे में कभी नहीं सोचा था। उन्होंने अपने घर में एक तरह के स्वनिर्णय का माहौल बनाया हुआ था इसीलिए उन्होंने बेटे की पंजाबी पसंद को स्वीकार किया था। वह अपने पिता यानि मेरे नाना का नाम भी बात-बात में ले लेती थीं कि कैसे उन्होंने देश के लिए कितने साल जेल में गुजारे थे और अपना जीवन आज़ादी के कार्यों हेतु झोंक दिया था। दुलाल बाबू ने एक बार उनकी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा कि वह अपने स्वतंत्रता सेनानी पिता की सच्ची विरासत थीं और उन्होंने अपने लिए एक पंजाबी बहू का चुनाव कर यह सिद्ध कर दिया था कि वाम फ्रंट की सहयोगी उनकी पार्टी ने उन्हें महिला आयोग का अध्यक्ष बनाने का सही निर्णय लिया था। वह सच में  इस पद के लिए उचित और सक्षम प्रत्याशी थी। वह समाज का हित करने में सफल होने वाली थी। इसी तरह की बातें इधर-उधर हो रहीं थीं। कभी-कभी मुझे और पिंकी को और साथ ही मेरे बाबा को अकेलापन सा महसूस होने लगता था हालाँकि पार्टी में काफी लोग थे। अपने लोगों के बीच में लगने वाली नीरवता एक तरह का अस्पष्टीकृत कष्ट ही होता है।  संध्या से आरम्भ हुई पार्टी कुछ घंटों में ही क्षीण होने लगी थी। पिंकी ने पूछा, ' क्या बात है, लोग घर लौट रहे हैं ? मैंने कहा, ' यह चंडीगढ़ या दिल्ली नहीं है.. जो देर रात तक खाना-पीना चलता रहे .. ये बंगाल के संस्कार हैं कि समय से घर पर लौट आया जाये ..' पिंकी ने कुछ आश्चर्य के साथ मेरी बात सुनी थी। उसे देख मैं मुस्कुरा दिया था और कहा, ' ये घरेलू कार्यक्रम है, इसलिए.. वैसे देर रात तक चलने वाली पार्टियाँ तो कलकत्ता में भी जम कर होती हैं..'  ग्यारह बजे तक सब लोग जा चुके थे। परिवार के लोग और कुछ सम्बन्धी ही रह गए थे। इन्द्राणी भी हमारे पास आकर बैठ गयी थी। मैंने उनसे पूछा कि सब कैसा रहा था ? वह मुस्कुरायी और कहा कि ठीक ही था किंतु उसे दिल्ली वाली पार्टी में अधिक मज़ा आया था। पिंकी ने उसकी बात सुनी तो कहा, ' हमारे अभिजीत साहब को तो दिल्ली की पार्टी बहुत लंबी लगी थी.. इन्हें तो समय से घर पहुँच जाना पसंद है..'  मैंने सफाई देते हुए कहा, ' ये बात नहीं है..बस यूँ ही कहा था कि कलकत्ता में लोग समय से पार्टी में खा कर घर लौट जाते हैं..'  इन्द्राणी ने हँसते हुए पिंकी को देखा और कहा, ' अरे, पार्टी का अर्थ केवल खाना थोड़ा ही होता है ..कौन समझाए, अब तुम ही इस लड़के को तैयार करना.. हम तो फेल हो चुके हैं..'  बाबा और माँ भी हमारे पास आ बैठे थे। बाबा ने और विलम्ब न कर घर जाने की बात उठाई तो मैंने पिंकी की ओर देखा और मुस्काया। वह भी मुस्कुरा दी। हम दोनों समझ गए थे कि सच में बंगाली लोग समय से घर आ जाने में विश्वास रखते हैं।  माँ ने यहाँ अंतिम क्षणों में भी अपनी ही बात उठायी थी। उन्होंने कहा कि दुलाल बाबू काफी मददगार हो रहे थे। वह उनकी प्रशंसा किये जा रही थी। उन्होंने बताया कि दो-तीन दिन के भीतर ही उन्हें ने पद ग्रहण कर लेने की उम्मीद थी। मैंने कहा, ' परन्तु हम तो यहाँ होंगे नहीं.. हम तो कल संध्या की फ्लाइट से गोवा निकल जायेंगे और पांच दिन बाद लौटेंगे..' माँ ने कहा कि इससे कुछ अंतर नहीं पड़ेगा। हमें तो गोवा जाना ही होगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा, ' लेकिन इस अवसर पर यदि मनप्रीत यहाँ होती तो वह अपनी मम्मी जी का सम्मान होते देख लेती..उसके हमारे घर में प्रवेश के साथ ही तो यह शुभ समाचार आया था..भाग्यवान बहू है, मेरी ..' उन्होंने पिंकी को स्नेह से दुलारा था। पिंकी ने मुस्काते हुए कहा, ' मम्मी जी, ऐसा करते हैं, मैं अपनी टिकट कैंसल करवा देती हूँ.. ये अकेले घूमकर आ जाएं.. मेरा तो गोवा देखा हुआ भी है..' उसका शरारतीपन झलक रहा था। इन्द्राणी ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ' टिकट कैंसल करवाने की आवश्यकता नहीं है मनप्रीत, तुम्हारी टिकट पर मैं चली जाती हूँ..' इस बात पर सब हँस पड़े थे। पिंकी ने इन्द्राणी की ओर देखते हुए कहा, ' आईडिया बुरा नहीं है.. कैंसलेशन के पैसे भी नष्ट नहीं होंगे..' उन दोनों की इन बातों में मैं झेंप रहा था। बाबा ने पुनः घर की ओर निकल जाने की उत्सुकता दिखाई थी। उन्होंने कहा, ' इस जगह की बुकिंग साढ़े दस बजे तक की है, अब ग्यारह बज चुके हैं..वे लोग एक्स्ट्रा चार्ज लगा देंगे..'  माँ ने कहा, ' छोड़ो..एक्स्ट्रा चार्ज  ..लगाएंगे तो लगाने दो..बहुभात है, समय तो लगेगा ही..'  माँ की बात सुन पिंकी ने प्रतिक्रिया दी, ' अरे ! अब तो मम्मी जी तो वीमेन कमीशन की चेयरमैन हैं.. किसी की एक्स्ट्रा चार्ज करने की हिम्मत ही न होगी..'  इन्द्राणी ने कहा, ' चेयरमैन नहीं, चेयर वूमेन..' माँ को भी इस बात पर उत्सुकता जगी। उन्होंने अपने पति की ओर देखा। मेरे बाबा ने कहा, ' ऐसे में अंग्रेजी में चेयर पर्सन कहते हैं.. कुछ भी कहते हों, पद तो पद है, अब चलो.. बहू को भी नींद आ रही होगी..'  हम लोग घर आ गए थे। यहाँ फिर से बातें आरम्भ हो गयी थीं। माँ को अपने नए कार्यालय की चिंता हो रही थी। बाबा ने कहा कि जहाँ सरकार कार्यालय देगी वहीं से काम करना होगा। माँ ने हूँ कर दिया, ' ऐसे कैसे ? मुझे अपनी कार्य सुविधा देखनी होगी.. जब तक मुझे मेरे हिसाब से कार्यालय नहीं मिलेगा, मैं पदभार ग्रहण नहीं करुँगी..' बाबा ने चुटकी लेते हुए कहा, ' अधिक नखरे मत दिखाओ  ..वरना वो अभिनेत्री इंतज़ार में बैठी है, उसे पद दे दिया गया तो हाथ मलती रह जाओगी..' इस बात पर माँ चौंक गयी थी, ' ठीक है, तब तक मैं घर से ही काम करुँगी.. कल ही दुलाल दा से बात करुँगी ..' पिंकी चुपचाप एक ओर बैठी बातें थी। मैंने ही उसे कहा, ' चलो, सोने चलते हैं  ..' हम दोनों अपने कमरे में आ गए। मैंने देखा, कमरा कुछ अधिक ही सुव्यस्थित सा दिख रहा था। मैंने आश्चर्य जताया और पूछा, ' पिंकी, यह हमारा कमरा इतना अच्छा कैसे हो गया ..' उसने तड़ाक से उत्तर दिया, ' पहली बात मुझे पिंकी नहीं बुलाओगे, मेरा नाम मनप्रीत है.. दूसरे हमारे पास एक जादू है जिससे काम चुटकी बजाते ही हो जाते हैं..' मैंने कहा, ' मेरे लिए तो तुम पिंकी ही हो.. हाँ, दूसरों के सामने तुम्हें मनप्रीत कहूंगा..खुश.. अब बताओ, कमरा ठीक कैसे किया ? उसने कहा, 'खुद सोचो..' फिर उसने कहा, ' पार्टी कुछ ढीली सी रही..' मैंने भी उसी के अंदाज़ में कहा, ' पहली बात ये कोई पार्टी नहीं थी, यह एक पारम्परिक अनुष्ठान था जिसे बहुभात कहते हैं ..' वह मुस्कुरा दी, ' मेरे लिए तो यह रिसेप्शन पार्टी थी.. हाँ, सबके सामने मैं बहुभात ही कहूँगी.. अब खुश ? हम दोनों हँस पड़े थे। ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर  ..)

Wednesday, December 2, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 48

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II-      चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1                                      ( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )  ( ४८ ) रात के खाने के समय माँ और बाबा दोनों पिंकी का ही ख्याल रखे हुए थे। बंगाली भोजन था। उन्हें चिंता थी कि नई दुल्हन को असुविधा न हो रही हो। माँ बार-बार पिंकी से पूछ रही थी कि उसे हमारे घर का खाना कैसा लग रहा था। माँ और बिशाखा ने अपने हिसाब से सुरुचिपूर्ण ही बनाया था परन्तु मैं समझ पा  रहा था कि उसे कुछ तो परेशानी हो रही थी जो स्वाभाविक थी। पिंकी अपनी ओर से सहज हो रही थी। हम लोगों को हाथ से खाता देख वह वह कुछ पल को सहमी थी। मैं जानता था इसलिए उसे सहज करने के लिए कहा, ' हम बंगाली लोग घर में हाथ से ही खाते हैं, तुम बे झिझक स्पून ले लो..' उसने कहा, ' नहीं, मुझे तो अच्छा लग रहा है.. सिर्फ ये मछली बहुत काँटे वाली है..' बाबा ने तुरंत बिशाखा को बुला एक मछली का नाम बताया जिसमे काँटे कम होते हैं और कहा कि कल वही मछली बनाना। ये सब चल ही रहा था कि टेलीफ़ोन की घंटी सुनाई दी। मैं उठा ही था कि माँ ने मुझे रोक दिया और खुद उठ गयी थी। माँ कुछ देर बाद वापिस आयी तो चुपचाप बैठ गई थी। मैंने पूछा, 'क्या हुआ ? किसका फोन था ? उन्होंने कहा कि खाना खा लो फिर बताती हूँ। हम लोग तो लगभग खा ही चुके थे। मीठा खा रहे थे। इन बंगाली मिठाइयों को देख और इनके स्वाद से पिंकी अभिभूत थी। वह बार बार यम्मी यम्मी कह रही थी। मैंने और बाबा ने माँ से फिर एक बार टेलीफ़ोन के बार में पूछा। अब माँ के चेहरे पर एक छिपी सी मुस्कान, धीरे से खिलने लगी थी। उन्होंने कहा कि पार्टी के अध्यक्ष का फोन था। उन्होंने माँ को सूचना दी थी कि उनका नाम राज्य की महिला आयोग की अध्यक्षा के लिए चुना गया था। मैंने यह सुन सबसे पहले जोर से ताली बजायी थी । फिर सभी ताली बजाने लगे थे। अब तक माँ की ख़ुशी खुलकर सामने आ गयी थी। उन्होंने कहा, ' ये बहुत ज़िम्मेदारी का पद है..और उनके साथ उनके पिता का सु-नाम जुड़ा है..'  पिंकी ने भी कहा कि यह बहुत बड़ी खबर थी। अब माँ उठी और उन्होंने पिंकी के पास जाकर स्नेह से उसका माथा चूम लिया, ' तुमने हमारे घर में कदम रखा और आते ही ये बड़ी खबर आ गई.. शुभ कदम हैं हमारी बहू के ..'  पिंकी ने उत्साहित होते हुए कहा, 'मैं अपने पापा को बताती हूँ..' माँ ने उसे रोक दिया क्योंकि पार्टी की ओर से अभी किसी को बताने से मना किया गया था। कल तक समाचार आ जायेगा तब बताना उचित होगा। मैं सचमुच बहुत खुश हो रहा था। मैंने कहा, ' माँ तुम्हें तो अब ड्राइवर के साथ गाड़ी मिलेगी .. लाल बत्ती वाली ..' माँ ने कहा, ' गाड़ी दिखाई दे रही है.. साथ में जो भारी ज़िम्मेदारी आ रही है वह दिखाई नहीं दे रही..' माँ ने बताया कि एक अन्य महिला जिसका फिल्म उद्योग से सम्बन्ध था, इस पद के लिए उसका नाम भी आ रहा था। अगले दिन बैठक थी, उसमें ही सब कुछ स्पष्ट हो जाना था। माँ ने कहा कि हमें प्रतीक्षा करनी चाहिए और हम सब को ऊपर जाकर बाबा लोक नाथ जी के सामने हाथ जोड़कर बैठना चाहिए कि सब कुछ ठीक से हो जाये। हम सभी माँ के कमरे में गए और उनके मंदिर के सामने बैठ गए। अचानक पिंकी उठी और अपने सूट केस से एक फोटो फ्रेम निकालकर लायी और उसे मंदिर में रख दिया। यह बाबा गुरु नानक का सुन्दर चित्र था।  हम सब ध्यान मुद्रा में बैठ गए। मैं मन ही मन सोच रहा था कि यह माँ और हमारे परिवार के लिए एक बहुत बड़ा सम्मान था। माँ ध्यान मुद्रा में अवश्य थी परन्तु बेचैनी उनके चेहरे पर झलक रही थी। उन्होंने शीघ्रता में अपनी प्रार्थना की और हाथ जोड़ कर उठ खड़ी हुई थी। वह उठकर फोन करने बैठ गयी थी। उन्होंने एक नंबर घुमाया और आदर से प्रणाम करते हुए बात आरम्भ की। मैं समझ गया कि दूसरी ओर नाना के एक पुराने साथी थे जिन्हें माँ काका कहकर संबोधित कर रही थी। माँ ने कुछ समय पूर्व मिली सूचना की खबर उन्हें दी थी परन्तु जिनसे वह बात कर रही थी उन्हें पहले से ही यह बात मालूम थी। माँ की बातों से हम दूसरी ओर की बात का अंदाज़ा लगा रहे थे। मैं और बाबा एक ओर खड़े थे। पिंकी अनजान सी दूर रखी कुर्सी पर बैठी थी। माँ, हाँ-न ही कह रही थी। माँ ने कहा कि अच्छा होता यदि उन्हें इस दायित्व से मुक्त रखा जाता। परन्तु माँ के आग्रह में सत्यता वाला जोर न था। उन्होंने तो एक बार यह भी कहा कि विधानसभा का एक पद जो विधायक की अकस्मात मृत्यु के कारण रिक्त हुआ था, उसके लिए उन्हें चुना जाना अधिक उपयुक्त होता। कुछ समय तक बातचीत होती रही थी। माँ ने फोन रखा तो बताया कि दुलाल काका ने ही उनका नाम प्रस्तावित किया था। दुलाल काका पार्टी में विशेष प्रभाव रखते थे। उन्हें मेरे नाना ही राजनीति में लाये थे और वह नाना एवं हमारे परिवार का बहुत सम्मान करते थे। वह चाहते थे कि माँ, इस महिला आयोग वाले पद को अवश्य स्वीकार करें क्योंकि यह एक गरिमामय पद था और इसमें राजनैतिक झमले अपेक्षाकृत कम थे। मैंने भी कहा कि दुलाल दादू ठीक ही कह रहे थे। वह अक्सर नाना के पास आया करते थे और मैं उन्हें दादू कहा करता था। माँ ने एक बार फिर कहा कि हमें कल की पार्टी की बैठक में लिए जाने वाले निर्णय को देखना चाहिए। वैसे दुलाल दादू से बातचीत के बाद माँ निश्चिंत सी थी कि उनका नाम ही स्वीकार किया जायेगा। मैं भी खुश हो रहा था कि नाना के जाने बाद अब मेरी माँ पार्टी में स्थान लेने जा रही थी। अगले दिन बहूभात का कार्यक्रम था। मैं जानता था कि शाम तक माँ के आयोग की अध्यक्षा होने का निर्णय आ चुका होगा और यह समाचार वहाँ हमारे उत्सव में चर्चा का मुख्य विषय होगा।  अगली सुबह माँ सामान्य से पहले उठ गयी थी। वह स्नान और पूजा-पाठ कर चुकी थी। मैं जब नीचे आया तो उन्होंने पिंकी के बारे में पूछा। पिंकी सो रही थी। माँ कुछ चिंतित सी थी। एक तो आज शाम का समारोह था और दूसरे पार्टी की बैठक का निर्णय। बहूभात के लिए सारी व्यवस्था एक व्यावसायिक संस्था को दी गयी थी, हमें कुछ न करना था। दक्षिण कलकत्ता के एक बैंक्वेट हॉल को संध्या के लिए ले लिया गया था और साज-सज्जा और खाने-पीने की व्यवस्था वहीं होनी थी। जो छोटे-मोटे काम थे, उनका दायित्व बाबा ने ले रखा था। पिंकी सो कर उठी तो माँ के पास गयी थी। माँ ने उसे स्नेह से गले लगाया और कहा कि आज का दिन बहुत व्यस्त होने वाला था। उन्होंने वह साड़ी दिखाई जो उसे संध्या को को पहननी थी। पिंकी को साड़ी तो पसंद आयी पर उसने कहा,' इतनी भारी ? मैं तो संभाल ही न पाऊँगी.. मुझे तो वैसे भी साड़ी का बहुत अनुभव नहीं है..' माँ ने कहा, ' इन्द्राणी है न, वह तुम्हें तैयार कर देगी.. आज तो सब हमारी बहू को देखते ही रह जायेंगे..यह साड़ी खास आज के लिए ही बनवाई है, बाजार में ऐसी साड़ी दूसरी न मिलेगी..' दिन यूँ ही व्यस्तता में बीतता जा रहा था। पिंकी संध्या वाले कार्यक्रम के लिए उत्साहित थी। मैंने उसे बताया कि इन्द्राणी उसे एक ब्यूटी पार्लर ले जायेंगी। मैं माँ के समाचार की भी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहा था। माँ भी अधीर हो रही थी। चार बजे के आसपास दुलाल दादू का फोन आया। उन्होंने माँ को बधाई दी कि वह राज्य के महिला आयोग की अध्यक्षा होने जा रही थी। मैंने माँ को बाहों में ले लिया था। अब फोन का ताँता लग गया था। रोबी दा का भी फोन आया था। उन्होंने मुझे बधाई दी और कहा कि संध्या में तो मिलेंगे ही।  सच, संध्या में पिंकी को सब देखते ही रह गए थे। पंजाब की सुंदर लड़की, बंगाली साड़ी में अभूतपूर्व सौंदर्य बिखेर रही थी। माँ को दो ओर से बधाइयाँ मिल रही थी। सुन्दर बहू  के लिए एवं महत्वपूर्ण पद पाने के लिए।  राजनैतिक हलकों के कई लोग आये हुए थे। दुलाल दादू की सलाह पर मेरे नाना की एक बड़ी फोटो भी एक ओर लगायी गयी थी। दुलाल दादू इन दिनों काफी सुर्ख़ियों में थे। राज्य की वामपंथी सरकार की ओर से केंद्र की सरकार के साथ समन्वय के कार्यों के लिए उन्हें ही चुना जाता था। ऐसा माना जाता था कि कई केंद्रीय मंत्रियों के साथ उनके अच्छे सम्बन्ध थे। वे मझे हुए राजनैतिक खिलाड़ी के रूप में उभरकर आ रहे थे। माँ ये सब जानती थी। वह उनसे धीरे-धीरे घनिष्टता बढ़ा रही थी। आज का दिन माँ के पास एक सुअवसर के रूप में आया था। घर के आयोजन में, माँ की भूमिका से अधिक वह महिला आयोग की अध्यक्षा अधिक नज़र आ रही थी। मैंने पिंकी से पूछा,' पिंकी, कैसा लग रहा हैं, यहाँ  ..' उसने कहा, ' अच्छा लग रहा है, पर मुझे हमेशा पिंकी ही बुलाओगे या कभी मनप्रीत भी कहोगे ? मैंने कहा, ' पिंकी ही अच्छा लगता है..' वह मुस्कुरा दी। उसने कहा, ' मम्मी जी तो पूरी मिनिस्टर जैसी लग रही हैं..' मैंने कहा, ' सच बताऊँ, उनका तो एक छिपा सपना है.. मंत्री सभा में जाने का.. '( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को, यहीं पर ...)