Chander Dhingra's Blog

Wednesday, August 26, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -32

 टू स्टेट्स - एक नई कहानी 
( Two States - A New Story )
-II-
  चन्दर धींगरा / Chander Dhingra

( हफ्ते वार  इस लम्बी कहानी को साझा किया जाना जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ... )
  ( ३२ )    सुबह देखा, माँ और बाबा दोनों सामान्य से दिखे। वे जैसे संतुष्ट थे कि रात को उन्होंने जो मुझे समझाया था, वह काम कर गया था। माँ बार बार मेरे आसपास आ रही थी किंतु कुछ बोल नहीं रही थी। बाबा भी चुपके से मुझे देख ले रहे थे परन्तु शांत थे। माँ ने अचानक बिशाखा को पुकारा, ' बाबू को आज ऑफिस के टिफिन में क्या दे रही हो ? मैंने सुना तो बिशाखा की ओर से उत्तर दिया, ' आज टिफिन नहीं देना..'  माँ ने कारण जानना चाहा।  मैंने कहा कि कुछ विशेष नहीं, बस आज घर के खाना का मन न था। माँ को थोड़ा गुस्सा तो आया होगा परन्तु उन्होंने संयम रखते हुए व्यंग्य भाव से कहा, ' घर का या बंगाली खाने का मन नहीं है..या पंजाबी स्वाद अभी तक जीभ पर अब तक चिपका हुआ है ?  मैंने कहा, ' ऐसी कोई बात नहीं है.. आज चाइनीस मँगवा लूंगा..किमलिंग से..'  किमलिंग हमारे ऑफिस के निकट  एक छोटा सा चाइनीज़ होटल है। हम लोग ऑफिस में कभी-कभी वहां से मंगवा लेते हैं। माँ कुछ नहीं बोली, बस बिशाखा को कुछ दूसरा काम समझाने लगी। मुझ से केवल इतना ही कहा कि रात को तो घर में ही खाऊंगा न ? मैं सुबह की दिनचर्या में लग गया। बाबा ने उस दिन के समाचार पत्र में कुछ विशेष देखा तो मुझे बुलाया, ' ये देखो, क्या छपा है ?  मैं उनके पास गया तो उन्होंने ने एक समाचार दिखाया जिसमें बैंकों के अधिकारी संघ ने एक दिन की हड़ताल की चेतावनी दी थी। मैंने कहा, ' काम कुछ करेंगे नहीं, बस हड़ताल करेंगे..'  उन्हें मेरी इस प्रतिक्रिया की आशा न थी परन्तु उन्होंने भी मेरा साथ देते हुए, ' ठीक कहते हो.. इस काम चोरी की वजह ही से तो हमारा बैंकिंग सिस्टम डूब रहा है..'  अचानक उन्होंने विषय को बदल दिया। शायद इस बेकार के समाचार के ज़रिये वो मुझे अपने पास बुलाना चाहते थे और मुझसे कुछ वार्तालाप करना चाहते थे। उन्होंने अपने मन में दबी बात को सामने लाते हुए बहुत प्यार से कहा, ' माता-पिता जो कहते हैं और करते हैं वह संतान की भलाई के लिए ही होता है, हमनें तुम्हें कल रात जो समझाया, वह तुम्हारे हित के लिए ही है.. आशा है तुमने हमारी बातों को सही अर्थ में लिया होगा..'  मैंने उनकी बात का उत्तर नहीं दिया और वहां से उठकर जाने लगा। बाबा ने मुझे रोकते हुए कहा, ' ये बातें आरम्भ में समझ नहीं आती परन्तु इनका भविष्य से सम्बन्ध होता है.. भावुकता में आकर छोटी सी भूल जीवन भर के लिए गंभीर समस्या बन जाती है.. तुम समझ रहे हो न ?  मैंने अब भी उनकी बातों पर प्रतिक्रिया नहीं दी। शायद उन्हें मेरा बर्ताव अच्छा नहीं  लगा। उन्होंने माँ को आवाज़ दी,' देखो, ये कुछ बात ही नहीं कर रहा..' माँ लपकती सी आ गयी और पिता के साथ सहमति मिलाते हुए बोली, ' अपने पिता की बात हर बेटे को सुननी चाहिए और माननी भी चाहिए..' माँ अधिकतर बाबा की बातों के विपरीत जाती थी परन्तु उस दिन लगभग वही बातें दोहरायी जो मेरे बाबा ने कही थीं। मैं खामोश था और अपने ऑफिस जाने की तैयारी में लगा था। बाबा अपनी कुर्सी पर बैठे हुए थे परन्तु माँ एक तरह की बेचैनी दिखाती हुई, मेरे आसपास घूम रही थी। अचानक उन्होंने दबाव देते हुए कहा, ' जोगेन्दर को तो तुमने फोन कर ही दिया है.. उस लड़की को फोन करने की आवश्यकता नहीं है..' मैंने माँ को इस तरह से देखा कि उन्हें समझ आ गया कि मुझे उनकी यह बात अच्छी नहीं लगी थी। माँ ने कहा, ' आज  धैर्य से हमारी बातों को सोचना.. ' अब मैंने कहा, ' आप दोनों भी मेरे मन को समझने की कोशिश करना.. मुझे पिंकी को फोन करना है और आपका मत बताना है..'  माँ मुझे देखती रह गयी। मैंने अपना ऑफिस बैग उठाया और घर से बाहर निकल आया। 

ऑफिस में चुपचाप अपना काम करता रहा। कुछ समय बाद रोबी दा मेरे पास आये। वे धीमा-धीमा मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने सामने रखी कुर्सी पर बैठते हुआ मेरा हालचाल पूछा, ' घर में बातचीत हुई ? मैंने कहा, ' हाँ '  उन्होंने कहा, ' सब ठीक है न ?  मैंने कहा , ' अभी पता नहीं..मैंने तो सब बता दिया है..'  रोबी दा ने अपनी ओर से मेरे घर आ मेरे माता-पिता से बातचीत करने का सुझाव रखा। मुझे पता था, रोबी दा को व्यक्तिगत समस्याओं में मध्यस्ता करने में बहुत आनंद आता था। वे अक्सर लोगों के घरेलू मामलों में दख़लअंदाज़ी करते देखे जाते थे और इन सब मामलों को, रस भरे अंदाज़ में यहाँ-वहाँ सुनाते हुए भी देखे जाते थे। मैं नहीं चाहता था कि वे घर आएं। उन्होंने उठते हुए कहा, ' अगर आवश्यक लगे तो बताना.. ' मैं अपने कार्य में व्यस्त हो गया। दिन धीरे धीरे निकला जा रहा था। मैं कुछ चिंतित था कि घर जाकर कैसा माहौल होगा ?  मेरी टेबल पर रखा फोन बज उठा। इन्द्राणी दी का फोन था। उन्होंने बताया कि मेरी माँ ने उन्हें फोन किया था और उन्हें बुलाया था कि कोई आवश्यक बात थी। इन्द्राणी दी ने मुझसे जानना चाहा कि क्या हुआ था ?  मेरी माँ ने उन्हें कुछ नहीं बताया था। मैंने सोचा अब ये माँ ने अच्छा झमेला किया था। मैं क्या कहता इतना ही कहा, ' मुझे कुछ नहीं पता.. माँ को कुछ काम होगा..' इन्द्राणी दी संतुष्ट न हुई, ' मुझे लगता है तुम्हारा ही कोई मामला है, क्या तुमने चंडीगढ़ वाली बात बता दी है ? मैं कहा, ' हाँ, बताना तो था ही..'  इन्द्राणी दी ने कहा, ' चलो तुम्हारे घर आती हूँ..सब पता चल जायेगा..' कहकर फोन रख दिया। माँ, मेरी और इन्द्राणी दी की दोस्ती को जानती थी। वे अक्सर कहती थी कि हम उम्र होने के कारण दोनों एक-दूसरे को अच्छे से समझते थे। शायद उन्हें लगा होगा कि इन्द्राणी मुझे समझा सके। वे ये भी कहती थी कि इन्द्राणी मुझसे केवल एक-दो वर्ष ही बड़ी थी किंतु समझदारी में मुझसे बहुत आगे थी। मेरी माँ सही सोचती थी। इन्द्राणी दी वास्तव में किसी भी बात की तह में जाने में गुणी थी। हमारे परिवार में मेरी केवल मेरी माँ ही नहीं, सभी उन्हें पढ़ी-लिखी और समझदार मानते थे। मैंने सोचा, अच्छा हुआ कि वह घर आ रही थी। मैंने भी तो सबसे पहले उनसे ही अपने मन को खोला था। ये सब सोचते सोचते ऑफिस से घर जाने का समय हो आया। ऑफिस से बाहर आ, एक पीली टैक्सी को रोका और घर के लिए निकल आया। आज इतने बरसों बाद जब उन दिनों को याद करता हूँ तो एक तरह की सिहरन सी होने लगती है। मेरे जीवन के सबसे कठिन दिन थे वे। एक ओर माता-पिता का स्नेह और उनके प्रति मेरा दायित्व था और दूसरी ओर मेरा अपना वजूद और अपने लिए निर्णय लेने का बोध। आज घर पर होने वाले वाद-विवाद का विषय मैं ही था जिसको लेकर चर्चा होने जा रही थी। माता-पिता अपनी ओर से सही थे और मेरा मन अपनी ओर से। अब इन्द्राणी दी न जाने अपना मत किस ओर दें ? अचानक मन में एक विचार कौंधा। मैंने एक मिठाई की दुकान के सामने टैक्सी को रुकवाया और वहां से कुछ मिठाई खरीदी। ये एक ऐसी मिठाई थी जिसे सामान्यतः गैर-बंगाली मिठाई कहा जाता है। मैं जानता था कि इन्द्राणी दी को यह पसंद थी। वो आज घर आ रही थी, उन्हीं का सोचकर खरीद लिया था। 

घर पहुंचा तो देखा कि इन्द्राणी दीदी पहले से ही आयी हुई थी। मैंने पूछा कि वे कब आयीं तो पता चला कि वे काफी पहले से ही आयी हुई थीं। शायद उन्होंने खाना भी मेरी माँ के साथ ही खाया था। बाबा भी उस दिन घर पर थे। तीनों ने जमकर चर्चा की होगी। मैंने मिठाई का वो टिब्बा इन्द्राणी दी के हाथों में रखा, ' आपके लिए लाया हूँ..'  इन्द्राणी दी मुस्कुराने लगी, उन्होंने तुरंत डिब्बा खोला, ' वाह, तुम्हें याद रहा, ये तो मेरी पसंद की मिठाई है..'  मैं अपने कमरे में चला आया। मेरे पीछे ही इन्द्राणी दी भी आ गयी। उन्होंने कहा, ' मैंने सबको ठीक से समझा दिया है..तुम चिंता मत करो.. तुम्हारे माता-पिता पहले तो विरोध कर रहे थे परन्तु अंततः मान गए हैं..'  बाद में माँ और बाबा भी वहीँ आ गए। बाबा ने कहा, ' तुम बड़े हो गए हो.. अपने लिए उचित निर्णय ही लोगे..'  माँ ने सहमति जताते हुए कहा, ' माँ-बाप एक उम्र तक ही रास्ता दिखा सकते हैं.. अब तुम्हारा जीवन, तुम्हारा निर्णय.. तुम जोगेन्दर की लड़की को बता देना..मेरी ओर से हाँ है..'  ये क्या हुआ ? मैं तो न जाने क्या-क्या सोच रहा था। यहाँ तो सब कुछ सुलझा हुआ था और मेरे मन के अनुसार था। इन्द्राणी दीदी को मानना पड़ेगा। कुछ समय बाद इन्द्राणी दी को मैंने इशारों में पूछा कि ये सब कैसे हुआ ? उन्होंने मुझे एक ओर ले जाकर कहा, ' मैंने कुछ अधिक नहीं कहा.. यही कहा कि तुम समझदार हो और तुम्हारी बात मान लेना ही उचित है.. यदि ज़िद पर अड़ गए तो समस्या बढ़ जाएगी.. मैंने ये भी कहा कि यदि तुम्हारे नाना जीवित होते तो कभी भी इस सम्बन्ध को अस्वीकार न करते.. यदि जात-पात और भाषा जैसे विषयों पर एक प्रेम सम्बन्ध को रोका गया तो परिवार की बहुत बदनामी होगी और फालतू का बवाल बन जाएगा..तुम्हारे नाना को गए हुए अधिक समय भी नहीं हुआ है..' मैं चुपचाप सुनता चला जा रहा था। इन्द्राणी दी ने बताया कि मेरी माँ, नाना वाली लेफ्ट की पार्टी की सदस्य थी और पार्टी नाना की सुकीर्ति को यूँ ही समाप्त नहीं होने देना चाहती थी। माँ के अपने भी कुछ छिपे-छिपे से सपने थे। लेफ्ट फ्रंट में उन्हें महिला आयोग के अध्यक्ष के पद दिए जाने की बातें चल रही थी। उन्होंने कहा, ' ऐसे में इस तरह की बातों को फ्रंट के विरोध में जाने की सम्भावना है.. मिडीया इसे एक मुद्दा बनाकर उछालेगा.. माँ को ये सब बातें समझ आ गयी..और वह शांत हो गयी..तुम्हारे पिता तो अपनी पत्नी की ओर ही देखते हैं.. उन्होंने भी सहमति दे दी ' 

( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को, यहीं पर  .. ) 

Wednesday, August 19, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 31

                                            टू स्टेट्स - एक नई कहानी 

( Two States - A New Story )
-II-
  चन्दर धींगरा / Chander Dhingra

( हर हफ्ते इस लम्बी कहानी को साझा किया जाना जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ... ) 
( ३१ )      चंडीगढ़ से लौटने के बाद आज ऑफिस में पहला दिन बिता कर घर आया था। माँ का स्नेह उमड़-उमड़ पड़ रहा था। उन्होंने संध्या की चाय के साथ मेरी पसंद की चीजें बिशाखा के हाथों मँगवाकर रखी हुई थी। मैंने माँ को अन्य सब चीजों को अलग कर केवल फिश फ्राई देने को कहा। बिशाखा के हाथ में उसका पैकेट मैंने घर में घुसने से पहले ही देख लिया था। माँ ने कहा, ' ये क्या बात हुई ? ' मैंने कहा, ' कुछ नहीं बस मीठा खाने का मन नहीं है..'  माँ एक प्लेट में फिश फ्राई लेकर आई और उन्होंने हँसते हुए कहा, ' तो क्या यही वहां मिस करते थे ?  मैंने कहा कि ऐसी बात नहीं है, गेस्ट हाउस में शाम को चाय के साथ पकोड़े मिला करते थे और वो भी बहुत अच्छे होते थे।  फिर कुछ याद करते हुए मैंने कहा, ' माँ, क्या तुम्हें ब्रेड पकोड़ा बनाना आता है ? एक दिन बनाओ न.. ' उन्होंने तुरंत उत्तर दिया, ' छी.. वो भी कोई चीज है..  खैर, तुमने कहा है तो एक दिन बना दूंगी.. परन्तु तुम्हारे पिता तो एकदम नहीं खाएंगे..एक बार बनाया था तो हँसने लगे थे कि ब्रेड तो टोस्ट के लिए होती है.. उसका पकोड़ा ?  मैंने कहा, ' और ये जो हम मछली को फ्राई कर उसका पकोड़ा बना देते हैं, वो क्या ?  माँ भी हँसने लगी, ' कल बना दूंगी.. परन्तु, मछली की तुलना ब्रेड से मत करो.. ' मैं आनंद के साथ अपनी मनपसंद चीज़ खाने लगा। मुझे लगा बंगाल की फिश फ्राई का जवाब नहीं। पिंकी यहाँ आएगी तो उसे गरियाहाट के खास होटल का यह आइटम खिलाया जायेगा।  

रात के खाने के लिए भी माँ ने बहुत कुछ बना रखा था। उन्होंने मुझे सब बताया। मैंने कहा, ' इतना सब कुछ क्यों.. एक-दो आइटम ही काफी थे..'  माँ हैरान हो गयी। उन्होंने बहुत प्यार से सब बनाया था। मेरा उत्तर उन्हें अच्छा न लगा। उन्होंने कहा कि क्या हो गया था मुझे ? उन्हें लगा कि चंडीगढ़ से आने के बाद से मैं कुछ शांत सा हो गया था और खाने -पीने में भी रूचि नहीं ले रहा था। मैंने कहा कि ऐसा कुछ नहीं था। माँ नहीं मानी। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फैराते हुए कहा, ' कुछ तो है ? मैं तुम्हारी माँ हूँ.. समझ सकती हूँ.. बताओ क्या बात है ?  मैं,माँ का मुख देखता रह गया। अपनी ओर मुझे इस तरह से देखते हुए माँ के चेहरे पर चिंता के भाव आ गए थे। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे अपने कमरे के एक कोने में बने मंदिर के सामने ले गयी। माँ के इष्ट बाबा लोकनाथ की मूर्ति के आसपास कई देवी-देवताओं की छोटी-छोटी मूर्तियां सजी हुई थी। एक रंगीन बल्ब जल रहा था जिसका प्रकाश बाबा की मूर्ति पर पड़ रहा था। सुबह जो फूलों की माला उन पर चढ़ाई गयी थी, उसके फूल अब तक मुरझा गए थे। धूप-दीये की बत्तियाँ भी अपना दायित्व पूर्ण कर, नीचे बिखरी हुई थी। माँ ने मुझे मंदिर के सामने बिठाया और मुझे आदेश दिया कि आँखे बंद कर शांति से बाबा का ध्यान करूँ। सामान्यत: मैं माँ कि ऐसी बातें अनसुनी सी कर देता हूँ और इधर-उधर निकल जाता हूँ। परन्तु आज मैंने ऐसा कुछ न किया। मैं आंखे मूंद शांति से बैठ गया। माँ मेरे साथ बैठी हुई थी। मैं तो खुद को बहुत सक्षम समझता था और इन बातों से अलग था किंतु आज कुछ भिन्न सा था। मैंने मन में सोचा कि मैं माँ को अपनी बात सही से बता सकूँ और कोई विघ्न न आये। ये सोचना एक तरह की प्रार्थना ही तो थी। मैं कुछ समय तक ध्यान मुद्रा में बैठा रहा और बाद में हाथ जोड़ उठ खड़ा हुआ। माँ भी कुछ समय बाद वहां से उठ गयी। उन्होंने अत्यंत धैर्य से कहा, ' अब बताओ बात क्या है ? मैंने भी उतने ही धैर्य से कहा, ' कुछ भी तो नहीं..'  माँ का दिल अपनी संतान के दिल को देख पाता है, पढ़ पाता है। शायद माँ समझ गयी थी कि कुछ तो बात थी जिसे मैं बताना तो चाहता था परन्तु बता न पा रहा था। उन्होंने मेरा अंतर्मन टटोलने के लिए बात को आगे बढ़ाया,  ' तो चंडीगढ़ कैसा लगा ? मैंने कहा, 'बहुत अच्छा ..'  ' और वहां के लोग ?  माँ किसी तह तक पहुंचना चाहती थी।  ' लोग भी बहुत अच्छे, बहुत फ्रेंडली हैं ..' मैं संक्षिप्त में उत्तर दे रहा था। माँ ने पूछा, ' जोगेन्दर कैसा लगा तुम्हें ? मैंने आश्चर्य जताते हुए कहा, ' जोगेन्दर अंकल ? वो लोग तो बहुत अच्छे हैं.. बहुत केयरिंग हैं.. मेरा बहुत सपोर्ट किया उन लोगों ने.. गेस्ट हाउस का सामान, बेड शीट्स और टॉवेल्स साफ-सुथरे नहीं थे तो उन्होंने अपने घर से भिजवा दिए..मुझे अमृतसर भी घूमवा दिया, उन लोगों ने.. गोल्डन टेम्पल तो अति सुन्दर है..तुमने तो देखा हुआ है, नाना के साथ गयी थी न एक बार ? माँ ने मेरे उत्साह को देख लिया था,  ' जोगेन्दर की तो दो लड़कियां  हैं न ? ' मैंने कहा, ' हाँ, पिंकी और लवली.. पिंकी बड़ी है और लवली छोटी.. पिंकी भी बैंक में काम करती है.. वह सीरियस टाइप है परन्तु लवली नटखट है..' न जाने क्यों मैं खुद से आगे बढ़ कर सब कुछ बताते जा रहा था। माँ ने अब मेरा सामान्य रूप देखा। उन्होंने कहा, ' तुम्हें कौन सी अच्छी लगी ? मेरा तात्पर्य है किसने तुम्हें प्रभावित किया ?  फिर खुद ही उत्तर भी दे दिया, ' मैं जानती हूँ, तुम्हें बड़ी वाली ही अच्छी लगी होगी.. है न ?  मैंने कहा, ' हाँ, पिंकी तो पंजाबी लगती ही नहीं..वो तो हमारे जैसी बंगाली है..'  माँ को मेरे उत्तर ने कुछ सचेत सा कर दिया था। वो अब तक बिस्तर पर तकिये के सहारे लेटी हुई थी, अब तकिये को गोद में लेकर बैठ गयीं, ' तुम्हारा समय तो वहां अच्छे से बीता, है न ? माँ ने मुस्कुराते हुए कहा। मैंने कहा, ' हाँ, वे लोग सच में अच्छे लोग हैं.. पंजाबियों के प्रति तो मेरी धारणा ही बदल गयी है.. ' माँ ने कहा, ' पंजाबी लोग बिज़नेस प्रवर्ति के लोग होते हैं..अपना लाभ-नुकसान पहले देखते हैं..जोगेन्दर ने तुम्हारे प्रति जो इतना किया वह तो तुम्हारे नाना के कारण किया होगा..याद नहीं है उसका भाई सुखबीर जब एक मामले में फँस गया था तो तुम्हारे नाना के पास दौड़ा आया था..नाना तब पार्लियामेंट के मेंबर थे..वह पंजाब के सी एम के लिए एक चिट्ठी ले गया था.. उसका काम हो गया था.. तब ही से तो वह हम लोगों को बहुत मानता है..'  मैंने कहा, ' ये तो कोई बात न हुई.. क्या पंजाब के सभी लोग बिज़नेस प्रवर्ति के होते हैं ..अपना लाभ, अपना स्वार्थ तो हम बंगाली भी खूब देखते हैं.. तुम्हें और नाना को कितने लोगों ने बेवकूफ बनाया हुआ है.. भूल गयी हो.. वे तो अधिकतर बंगाली ही थे..पॉलिटिक्स में नाना को नीचा दिखाने वाले कौन-कौन थे, याद नहीं रहा ?  माँ ने हलकी सी हामी भरी पर कहा, 'अच्छे-बुरे सब जगह होते हैं परन्तु पंजाबियों विशेष कर सरदार जी लोगों का दिमाग अपने हित की ओर अधिक होता है, ऐसा सामान्यत: माना जाता है.. '  माँ ने एक बात ओर कही की कि हर समाज की अपनी विशेषता और दुर्बलता होती है। अचानक माँ के मन में क्या आया कि उन्होंने पूछा, 'क्या वे लोग तुम्हें छोड़ने स्टेशन पर आये थे ? ये प्रश्न इतना अचानक से आया था कि मेरे पास किसी तरह की युक्ति बनाने का अवसर ही न था। मैंने सरलता से कहा, ' हाँ, पिंकी अपने पापा के साथ आयी थी और मेरे खाने के लिए लिए काफी कुछ बनाकर भी लायी थी..'  माँ ने मुस्काते हुए कहा कि इसीलिए मैं ब्रेड पकोड़ा बनाने को कह रहा था। अब माँ को मानों सब कुछ स्पष्ट हो चला था। उन्होंने कहा कि सब कुछ साफ-साफ और सच-सच बताऊँ। मैंने भी अपने भीतर दब रहे गुबार को निकाल देने का यह सही अवसर देखा और सब कुछ एक कहानी सा, माँ को सुना दिया। मैंने वह भी कहा जो पिंकी ने ट्रैन छूटते समय मुझे कहा था कि माँ को जल्दी से जल्दी सब बता देना। मैंने कहा,' मुझे पिंकी को फोन करना है, बोलो, तुम्हारी तरफ से क्या कहूँ ?  माँ लगभग सकते में आ चुकी थी। वो आँखें बंदकर चुपचाप बैठी थी। मैं भी चुप था। कुछ समय बाद हम दोनों सामान्य हुए। माँ ने कहा कि मुझे अपने कलकत्ता पहुँचने की खबर तो जोगेन्दर को देनी चाहिए। मैंने कहा कि मुझे तो पिंकी से बात करनी थी। माँ ने कहा, ' अभी नहीं, तुम्हारे पिता से बात करनी होगी.. ये कोई छोटी बात नहीं है..अभी तो तुम जोगेन्दर को फोन करो, बस.. '  शायद माँ नहीं चाहती थी कि मैं पिंकी को फोन करूँ। इस समय मैंने चुप रहना ही उचित समझा परन्तु मैंने निश्चय कर लिया था कि मैं फोन अवश्य करूँगा और उसे बता दूँगा कि मैंने माँ से बात कर ली है। यदि माँ अपना निर्णय आज ही बता देती तो यह समाचार भी उसे दे देता। 

मेरे बाबा आज न जाने क्यों घर लौटने में विलम्ब  कर रहे थे। सामान्यतः वे सात बजे तक आ जाते थे। माँ इधर-उधर चहल कदमी कर रही थी। उनकी बेचैनी देखी जा सकती थी। मुझे दुःख हुआ कि माँ की बेचैनी का सबब मैं ही था। मैं भी तो खुद में परेशान था। क्या किया जा सकता था ? माँ कुछ बोल नहीं रही थी। बस एक कमरे से दूसरे कमरे, खुद को बे वजह व्यस्त कर रही थी। डोर बेल बजी तो माँ ने लपकते हुए दरवाज़ा खोला। बाबा आ गए थे। माँ ने पूछा, ' आज इतनी देर ? बाबा ने हमेशा वाला उत्तर दिया, ' आज कुछ काम अधिक था..' माँ ने आज चाय की तैयारी की हुई थी। बाबा जूते उतार कर बैठे ही थे कि माँ पानी का ग्लास लेकर आ गयी, ' चाय तैयार है ..आ जाइये..' उन्होंने कहा। माँ के बदले व्यवहार पर बाबा हैरान थे। सामान्यतः ये सब काम बिशाखा किया करती थी।  बाबा ने कहा, 'चाय रहने दो.. देर हो चुकी है, आज सीधा खाना ही खा लेते हैं.. '  फिर उन्होंने मेरे बारे में पूछा। माँ ने सीधे सीधे कहा, ' आ गया है.. ' उनके इस उत्तर छोटे से उत्तर में नाराज़गी और परेशानी का स्वर साफ दिखाई दे रहा था। मैं अपने में परेशान और खिन्न था। बार बार यही ख्याल आता था कि अभी तक चंडीगढ़ में फोन नहीं किया था। पिंकी प्रतीक्षा में होगी। चलो अभी कर लेता हूँ। माँ ने भी कहा है कि मुझे जोगेन्दर अंकल को अपने ठीक ठाक घर पहुँच जाने की सूचना देनी चाहिए। शायद पिंकी ही फोन उठाये। मैं माँ के कमरे में आया क्यों कि फोन वहीं था। माँ भी कमरे ही थी। मैंने फोन उठाया ही था कि माँ ने पूछा, ' जोगेन्दर को कर रहे हो ? मैंने हाँ में सिर हिलाया। दूसरी ओर से जोगेन्दर अंकल की आवाज़ सुनाई दी। मैंने उन्हें अपने पहुँच जाने और आज से ऑफिस ज्वाइन कर लेने की सूचना दी। वे संतुष्ट दिखे और मेरे माता-पिता का हालचाल पूछने लगे। मैंने उनका धन्यवाद किया कि उन्होंने मेरे लिए इतना कुछ किया। मैंने पिंकी-लवली का हाल पूछा और कहा कि उनसे बाद में कभी बात करूँगा। माँ ने मेरे हाथ से फोन लिया और जोगेन्दर अंकल से बात करने लगी। माँ ने कहा कि मैं उनकी बहुत प्रशंसा कर रहा था और ये भी उनके कारण मुझे कुछ भी असुविधा नहीं हुई थी। मैं सोच पा रहा था कि दूसरी ओर से जोगेन्दर अंकल, ' ओह..  नहीं जी..ऐसी कोई बात नहीं है.. अपना घर है जी.. आप भी कभी आइये.. ' ऐसी ही सब बातें कह रहे होंगे। माँ ने एक बात और कही कि मेरे नाना उन सब को अपना मानते थे और ये भी कि उन्हें भी कभी कलकत्ता आना चाहिए। फोन रख माँ कमरे से निकल गयी। बाबा फ्रेश होकर आ गए थे और खाने की टेबल पर थे। हम तीनों बैठे थे,अपने में सिमटे हुए। बिशाखा ने खाना परोसा। बाबा ने हँसते हुए कहा कि आज बेटे की आवभगत  में उन्हें भी अच्छे पकवान मिल रहे थे। बाबा ने खाना खा कहा कि वे थके हुए थे और जल्दी सोना चाहते थे। किन्तु माँ ने कहा कि आज उनको बहुत आवश्यक बात करनी थी, उनके सोने से पहले। दोनों में देर तक बातचीत चलती रही। मैं भी जगा रहा और सोचता रहा कि सुबह न जाने कैसी होगी ? रात को दोनों मेरे कमरे में आ गए। उन्हें पता चल गया था कि मैं जाग रहा था। बाबा ने बात शुरू की। उन्होंने कहा कि माँ ने सब कुछ बता दिया था। उन्हें नहीं लगता कि ये एक सफल सम्बन्ध होगा। माँ ने भी ऐसा ही कहा। बाबा का मानना था कि दोनों समाजों में बहुत भिन्नता थी, संस्कृति भिन्न-भिन्न थी और ये सम्बन्ध मेरे और परिवार के हित में नहीं थे। माँ ने सांत्वना देते हुए कहा कि उम्र के इस पड़ाव में लड़का-लड़की में इस तरह का आकर्षण स्वाभाविक होता है जो समय के साथ यह मिट जायेगा। वो दोनों ही बोल रहे थे, मैं तो किसी आज्ञाकारी विद्यार्थी की तरह सुनता चला जा रहा था। रात काफी बीत चुकी थी।  मेरी खामोशी से दोनों बहुत संतुष्ट से थे। बाबा ने मुझे सो जाने को कहा। माँ ने स्नेह से सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ' सब ठीक हो जायेगा ..' दोनों मेरे कमरे से निकल गए। मैंने अपने मन में  एक निश्चय को दोहराया। माता-पिता सामान्य की तरह एक बेटे को समझा रहे थे किन्तु मुझे हर तरह की स्थिति से मुकाबला करना था। मेरे भीतर किसी कोने में दुबक कर बैठा मेरा विद्रोही मन, धीरे-धीरे अंगड़ाई ले रहा था। 
( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर ) 

Wednesday, August 12, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी (Two States - A New Story ) -30

टू स्टेट्स - एक नई कहानी 
(Two States - A New Story ) 
                                                              ----II---                                                                     
     चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra 
                    
 ( ३० )    ऑफिस में सब कुछ सामान्य था। ऐसा लग रहा था मानों एक वीकएण्ड था जिसे बिता, मैं फिर से अपनी सीट पर आ बैठा था। साथियों ने चंडीगढ़ के प्रवास और वहां हुई ट्रेनिंग के बारे में जानना चाहा। कुछ ने छेड़ते हुए लहज़े में कहा , ' क्या लाये हो, हमारे लिए ? मैं मुस्कुराता रहा। बस यही कहा, ' मैं खुद आ गया हूँ, यही क्या कम है ?  लेकिन भीतर मुझे लगा कि दोस्तों के लिए कुछ न कुछ तो लाना चाहिए था। दिन यूँ ही मिलने-मिलाने में बीत रहा था। मैं रोबी दा से मिलना चाहता था। वे अक्सर इधर-उधर दिख जाया करते थे परन्तु आज न जाने कहाँ थे ? मैं उनसे दिल की एक बात साझा करना चाहता था। संध्या के एक खास समय पर वे ऑफिस के बाहर एक चाय के स्टाल पर आया करते थे। उन्होंने एक बार बताया था कि शाम की यह चाय उनकी सालों की आदत थी। मैं उनसे मिलने को इतना उतावला हो रहा था कि घड़ी में समय देखा और तेजी से सीढ़ियां लांघता हुआ, ऑफिस से बाहर निकल आया और उस चाय के स्टाल पर पहुँच गया। जैसी आशा थी रोबी दा अपने कुछ खास साथियों के साथ वहां पर बैठे हुए थे। मुझे देखते ही उन्होंने.. आओ.. कह मुस्कुराते हुए मेरा हालचाल पूछा, ' चंडीगढ़ में कोई असुविधा तो नहीं हुई थी ? मैंने ना में सिर हिलाया तो उन्होंने मुझे अपने पास बैठने का संकेत किया और चाय वाले से चाय का एक कप अधिक करने को कहा। मैंने कहा कि चाय रहने दीजिये। वे हंसने लगे, 'अरे, चंडीगढ़ में ऐसी चाय थोड़े ही मिलती होगी ?  मैंने कहा, ' चाय ही नहीं, सड़क के किनारे लगे ऐसे टी-स्टाल भी वहां नहीं दिखते..'  उन्होंने मेरी बात को स्वीकार करते हुए कहा, 'हाँ यह बात तो सच है, कलकत्ता जैसी चाय कहीं नहीं..'  मैंने उनका हालचाल पूछा तो उन्होंने सब कुछ सामान्य वाला संकेत दिया। कलकत्ता की सड़कों पर छोटे-छोटे टी-स्टालों पर मिलने वाली चाय की तरह यह सब कुछ सामान्य वाला, ' चोल छे ' यानि चलता है, भी केवल कलकत्ता में ही दिखता है। चाय की चुस्की लेते हुए मैंने कहा कि उनसे मुझे कुछ खास बात करनी थी। रोबी दा ने तुरंत कहा कि बताओ। उन्होंने खुद बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ' क्या ऑफिस में कुछ प्रॉब्लम हुई है ? मैंने तो तुम्हारे बॉस से तुम्हारे नाना के देहांत की खबर दे दी थी और उन्हें कह दिया था कि तुम पर किसी तरह का प्रेशर न डाला जाये..'  मैंने उन्हें रोका और कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं था। अब वो उत्सुक हो गए। मैंने कहा कि कुछ व्यक्तिगत बातें थीं। वो वहीं पर सुनना चाहते थे परन्तु मैंने उनसे एकांत में बात करने को कहा। उन्होंने कहा ' ठीक है, जब तुम चाहो..' फिर वे उठ गए और उन्होंने कहा कि उस दिन वे अपनी कार लेकर आये थे। उन्होंने सुझाव दिया कि ऑफिस के बाद मैं उनके साथ कार में चलूँ और वो मुझे मेरे घर पर छोड़ देंगे और रास्ते में बात भी हो जाएगी। मुझे ये सुझाव अच्छा लगा।  ऑफिस समाप्त कर मैं नीचे कार पार्किंग में आ गया और रोबी दा की प्रतीक्षा करने लगा। मैं उनकी कार को पहचानता था। उनके ड्राइवर से भी मेरा परिचय था। ये एक पुरानी काले रंग की एम्बेसेडर कार थी। रोबी दा कभी-कभी ही इस कार से ऑफिस आते थे। उनका मानना था कि ट्राम उनके लिए अधिक सुविधाजनक थी। उनका ड्राइवर भी प्रतीक्षा में था। मुझे देख वह पास आया और मेरा हालचाल पूछने लगा। दो-चार बार मैं रोबी दा की कार में इधर-उधर जा चुका था और वह मुझे पहचानता था। मैं कहा, ' आज तुम्हारे साथ जा रहा हूँ..' उसने ख़ुशी जताई। उसे भी मेरे नाना के गुजर जाने की खबर थी। वह ही रोबी दा को हमारे घर लेकर गया था। वह कहने लगा कि मेरे नाना जैसे अच्छे लोग धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे थे और उन जैसे लोगों के लिए ही देश आज़ाद हुआ था। नाना के प्रति ऐसी बातें मैं अक्सर सुनता रहता था। मैं उसे क्या कहता ? कुछ ही समय में रोबी दा आ गए। हम दोनों पीछे बैठ गए। रोबी दा ने ड्राइवर से जल्दी चलने को कहा। उन्होंने उसे हिदायत दी कि मुझे मेरे घर छोड़, उन्हें किसी अन्य से मिलने भी जाना था और उनके पास काम अधिक और समय कम था। मैंने मन ही मन सोचा यह स्थिति तो हम सबके साथ थी। कार ऑफिस के गेट से निकली ही थी कि रोबी दा ने कहा, ' हाँ, अब बताओ क्या समस्या है ?  मैंने कहा कि समस्या तो कुछ नहीं है बस ऐसे ही। वे मुस्कुराने लगे। उन्होंने कहा कि उनकी ज़िंदगी गुजरी है लोगों के बीच। ऐसे ही कोई बात नहीं करता। उन्होंने मुझसे खुलकर बात करने को कहा। ' तुम्हारे नाना मेरे आदर्श रहे हैं.. अब वो नहीं हैं.. उन्होंने एक बार मुझसे तुम्हारा ख्याल रखने को कहा था..जो कुछ भी समस्या है, मुझे बताओ..'  मैंने संकोच करते हुए उन्हें चंडीगढ़ और जोगेन्दर अंकल के बारे में बताया। मैंने कहा कि वे बहुत अच्छे लोग थे और इन्होंने मेरा पूरा ख्याल रखा था और मेरे स्थानीय अभिभावक की ज़िम्मेवारी निभाई थी। रोबी दा ने कहा कि ये सब मेरे नाना की  सुकीर्ति के कारण हुआ था। उन्होंने बात को आगे बढ़ाते हुए मुझसे जोगेन्दर साहब के परिवार के बारे में जानना चाहा। मैंने उन्हें उनके व्यवसाय और पिंकी-लवली के बारे बताया। घर पहुँचने से पहले ही मैं उन्हें पिंकी के बारे में बता देना चाहता था। रोबी दा अनुभवी व्यक्ति थे। जोगेन्दर सिंह जी की दो लड़कियों के बारे में जानते ही उनकी उत्सुकता बढ़ गयी। उन्होंने साफ शब्दों में जानना चाहा कि दोनों बहनों में मुझे किसने अधिक प्रभावित किया। मैंने तुरंत पिंकी का नाम लेना चाहा परन्तु बात को सँभालते हुए कहा, ' बड़ी वाली ने..छोटी वाली तो नासमझ जैसी है..' अब रोबी दा असल मुद्दे पर आ गए, ' तो तुम बड़ी यानि पिंकी के प्रति आकर्षित हो गए..' मैंने कोई उत्तर न दिया।  रोबी दा ही बोलते गए, ' ऐसा हो जाता है.. ये उम्र का तकाजा है..इसमें कुछ अनहोना नहीं है..तुम्हें किसी तरह का अपराध बोध नहीं होना चाहिए.. परन्तु समाज की कुछ बाध्यताएँ हैं, उनका पालन तो करना होता है.. क्या तुमने उस लड़की से इस सम्बन्ध में बात की है ? मैने कहा, ' सीधे सीधे तो नहीं परन्तु हम दोनों के बीच सांकेतिक संवाद तो अवश्य हुआ है.. ' रोबी दा ने जानना चाहा, ' क्या तुम ने उसका मन टटोलने की कोशिश की ? इस बात के उत्तर में मैंने पिंकी की रेलवे स्टेशन पर की गयी बात बताई। रोबी दा  इस पर हल्के से मुस्कुरा दिये मानों कह रहे हों, ' तो आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई थी.. है न ? मैंने कहा, 'रोबी दा, ये सब छोड़िये,अब आगे क्या किया जाये,ये बताइये, मैंने इसलिए तो आपसे बात की है ?  रोबी दा सीट पर पीछे की ओर टिक गए और उन्होंने कहा, ' घर में बात की है ?  मैंने न में सिर हिलाया। उन्होंने कहा, ' घर में तो बताना ही होगा..और इसमें विलम्ब करना ठीक नहीं.. मुझे नहीं लगता कि घर वाले सरलता से मान जायेंगे ?  लगता था रोबी दा को मेरी बातों में एक तरह का आनंद रस मिलने लगा था। वे बोलते गए, ' मैं तुम्हारी माँ को अच्छे से जानता हूँ.. तुम्हारे बाबा तो शायद समझ जायें परन्तु तुम्हारी माँ अवश्य समस्या खड़ी करेंगी.. तुम माँ-पिता से बात करो फिर देखते हैं.. मैं आऊंगा एक दिन तुम्हारे घर, चिंता मत करो..'  वह हंसने लगे, ' जब प्यार किया है तो फिर डरना क्या.. ' रोबी दा सदैव से हिंदी फिल्मों और गानों का मखौल उड़ाते रहे थे परन्तु आज अपनी बात को जमाने के लिए उन्होंने एक फ़िल्मी गाने का सहारा लिया था। मैं क्या कह सकता था ?  रोबी दा मेरे लिए एक समझदार व्यक्ति थे। मैंने उनको समस्त बात बता दी थी। वो जो कुछ कह रहे थे, मुझे पहले से ही पता था। मैं जानता था कि घर में इस बात को सुनते ही एक भूचाल सा आ जायेगा परन्तु घर में बात को उठाने से पूर्व मैं अपने मन के बोझ को कुछ हल्का कर लेना चाहता था। इसीलिए मैंने  इन्द्राणी दीदी और रोबी दादा के समक्ष खुद को खोल दिया था। अब शायद अपने माता-पिता के सामने मैं सहज हो सकूंगा।  मेरा घर आने ही वाला था। जिस भीड़ भरे बाजार के सामने से हम गुजर रहे थे उसके कुछ आगे जाकर ही एक बड़ा चौराहा और उससे बायीं ओर मुड़कर तीसरी गली के छोर पर ही हमारा घर था। रोबी दा ने बाजार का नज़ारा देखा तो अपने ही अंदाज़ में बोल उठे, ' तुम्हारा घर बहुत अच्छे इलाके में है, बाजार एकदम पास में है, कोई असुविधा नहीं, मछली-सब्जी सब कुछ आराम से हर समय मिलता है..यहाँ किसी तरह का गन्दा माहौल भी नहीं है.. कोई झगड़ा-झमेला नहीं होता..शांति और मिल मिलाप है.. '  कलकत्ता के लोगों में मुहल्लों से जुडी ऐसी बातें अक्सर सुनी जाती हैं। मैंने उन्हें हाँ कहा किन्तु सोचने लगा, चंडीगढ़ में भी तो मोहल्लों वाला झगड़ा-झमेला कहीं नहीं देखा था और न ही सुना था। वहां हर ओर माहौल शांति और दोस्ती भरा ही दिखता था। पिंकी ने भी कभी इस तरह की बात नहीं उठाई थी। कार ने हमारे घर वाली गली में प्रवेश ले लिया था। घर के सामने कार रुक गयी। रोबी दा ने एक बार फिर से मुझे आश्वस्त किया। उन्होंने कहा कि आज उनके पास समय कम था वर्ना वे मेरी माँ से मिलते हुए और उनके हाथ की चाय पीते हुए जाते। उन्होंने किसी एक दिन हमारे घर आने की बात की। मैं कार से उतरा तो लगा, एक बोझ कुछ कम हुआ है। रोबी दा की कार आगे बढ़ गयी। सामने से बिशाखा आते हुए दिखी। माँ ने शायद कुछ खरीद लाने के लिए उसे पास की दुकान में भेजा होगा। उसके हाथ में एक छोटा प्लास्टिक का पैकेट था। मैंने पूछा,' बिशाखा मासी क्या लेने गयी थी ? उसने कहा, ' तुम इतने दिन यहाँ नहीं थे, इसलिए माँ ने कुछ मिठाई लाने को कहा था, तुम ऑफिस से आते ही खाते हो न.. साथ में तुम्हारी पसंद की गर्मागरम फिश फ्राई भी लायी हूँ..' मैं सोचने लगा हमारी बंगाली माओं को अपनी संतान को उनकी पसंद का खिलाने की कितनी फ़िक्र होती है। ये बच्चों को खिलाने की उनकी प्रक्रिया स्कूल के दिनों से ही शुरू हो जाती है। मैं तेजी से घर की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। मेरे मुँह में न जाने कहाँ से मेरी मनपसंद बंगाली भेटकी मछली से बनी फिश फ्राई और सरसों से बनी चटनी  का चटपटा स्वाद घुलता चला आ रहा था।
 ( आज बस, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर )  

Wednesday, July 29, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) 27 - 28

टू स्टेट्स - एक नई कहानी 
( Two States - A New Story ) 
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      चन्दर धींगरा / Chander Dhingra 
 
 ( २७-२८ )                चंडीगढ़ से दिल्ली और वहाँ से हावड़ा यानि मेरे शहर कलकत्ता की यह ट्रैन यात्रा बहुत लंबी प्रतीत हो रही थी। यात्रा के हर क्षण पिंकी मेरे साथ थी। मैं और वह न जाने क्या क्या बातें कर रहे थे। लगता था सामने की सीट पर वह बैठी थी और मुझे मेरे प्रत्येक कार्य के लिए आदेशपूर्ण सलाह दे रही थी। मैं सीट पर विश्राम के लिए लेटा तो उसने कहा, ' क्यों थक गए हो क्या ? जब चाय दी गयी तो उसने कहा, ' चाय तो एक बार पी चुके हो, अब ये फिर से..' मैंने कहा, ' तुम पंजाबी लोग चाय पीते हो, हम बंगाली तो चाय खाते हैं, पहली तुम्हारी ओर से मैंने पी थी, अब ये दूसरी वाली मेरी ओर से तुम खा लो..'  उसने हँसते हुए उत्तर दिया, ' हम पंजाबी जब चाय पीते हैं तो उसके साथ कुछ खाते भी हैं, अब तुम बंगाली चाय खिला रहे हो तो साथ में कम से कम एक बिस्कुट भी तो पिलाओ.. '  यात्रा में ऐसी न जाने कितनी बातें होती चली गयी। बीच-बीच में पिंकी के साथ में होने का भ्रम टूट जाता और मैं वास्तविक जगत में लौट आता था। राजधानी एक्सप्रेस के उस  कम्पार्टमेंट में बैठे अन्य यात्री ऐसे लगते मानों मुझे घूर रहे हों और कह रहे हों, ' हम तुम्हारी सब बातें जानते हैं ..'  मैं खुद को सहज करने का प्रयास करता। एक बात जो मेरे अंतर्मन के साथ जुड़ गयी थी वह थी मेरे ट्रैन में चढ़ते समय पिंकी द्वारा कहे गए शब्द,  ' घर में जल्दी बात करना.. देर मत करना..'  शायद वह जान गयी थी कि मैं अपने माता-पिता से अपने अनजाने और स्वतः से बन गए प्रेम सम्बन्ध को सरलता से न बता पाऊँगा। हम दोनों के बीच जो कुछ भी बातें हुई थी उसमें किसी भी ओर से कोई प्रस्ताव या प्रस्ताव का इशारा नहीं था। हम तो सामान्य परिचितों के बीच होने वाली बातें ही किया करते थे। परन्तु शायद हम दोनों के अंतर्मन कुछ और ही वार्तालाप में लिप्त रहते थे। जिसे केवल हम दोनों ही सुन और समझ पाते थे। बातों बातों में उसने एक बार कहा था कि जब से उसने शिक्षा समाप्त कर नौकरी आरम्भ की थी, उसके माता-पिता उसके विवाह को लेकर सोचने लगे थे। मैंने उस समय इस बात को सामान्य दोस्ती की बात के रूप में लिया था परन्तु आज  इस  बात का कुछ अन्य ही अर्थ निकालने लगा था। कहीं किसी खास वजह से तो पिंकी ने ये बात नहीं उठाई थी ? अगर कहीं उसके विवाह की बात कुछ आगे बढ़ चुकी होगी तो ये सिख लोग हैं, पीछे न हटेंगे। ट्रैन की गति तेज थी और मेरे विचारों की भी। मैंने निश्चय किया कि घर पहुँच कर ही माँ से बात करूँगा और उन्हें अपना मन दिखा दूँगा। सोचता, माँ कैसी प्रतिक्रिया देगी ? और बाबा ? वे तो तुरंत हां कर देंगे और शायद न करें। वे तो माँ की ओर देखने लगेंगे। माँ, उनकी ओर देखती मानों कह रही हो, 'अब सम्भालो अपने लाड़ले को..आप ने ही इसे खूब छूट दी है...अब पंजाबियों को अपना रिश्तेदार बनाओ..'  घर में काफी उथल-पथल चलेगी और कई दिनों तक चलेगी परन्तु मैं अपने माता-पिता को अच्छे से जानता था। अंततः मेरी बात माननी ही होगी। बंगाली परिवार में पंजाबी - सिख बहू ? ये विचार ही बहुत रोमांटिक लग रहा था। मन ने कहा, जो होगा उसे देखा जायेगा। पहले कलकत्ता पहुँचने तो दो। 

सुबह हो गयी थी।  चाय दी जा चुकी थी। राजधानी एक्सप्रेस की गति कुछ धीमी होती दिखी। मैंने अक्सर देखा है कि गंतव्य पर पहुँचने से पहले भारतीय रेल गाड़ियाँ धीमी हो जाती हैं। हावड़ा पहुँचने से पहले तो होता ही है। ये ऐसा समय होता है जब आप अपनों से मिलने को उत्सुक हो रहे होते हैं और आपकी ट्रैन आपका साथ नहीं दे रही होती। रेल व्यवस्था का यह एक प्रकार का षड्यंत्र प्रतीत होता है जो आपके मिलन को थोड़ा और गहरा बना देना चाहता है। खिड़की के सामने से मैंने पर्दे को एक ओर कर बाहर देखने की कोशिश की। सूर्य पृथ्वी को अपने दर्शन दे चुका था। उसकी नव किरणें चारों ओर फ़ैल चुकी थीं। दूर दूर तक हरियाली फैली हुई थी। कहीं कहीं गीली मिट्टी और वर्षा-जल से बन आये छोटे-छोटे गड्डे दिख जाते थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि माँ की बिछाई हरे पीले फूलों वाली चादर पर घर के बच्चों ने अपने छोटे छोटे खिलौने बिखरा दिए हों। ऐसा मनोरम दृश्य, मन में ताजगी भर गया। ट्रैन अब मेरे बंगाल में थी।  

बाबा कह रहे थे कि वे स्टेशन पर आएंगे। परन्तु मैंने जोर देकर मना कर दिया था। हावड़ा स्टेशन अपने आप में एक अद्भुत सी दुनिया है। लोग भाग रहे  होते हैं, एक दूसरे को रौंदते से। हर कोई जल्दी में होता है। ऐसा लगता है मानों हर किसी का कुछ न कुछ लुट चुका है या फिर विलम्ब हुआ तो लुट जायेगा। पिंकी यहाँ का नज़ारा देखेगी तो क्या सोचेगी ? नहीं वह तो फ्लाइट से आएगी। यही सब सोचते हुए मैं टैक्सी की लाइन में जा लगा। लम्बी लाइन और एक-दूसरे पर झुंझलाते लोग, अपने बच्चों, परिवारजनों और सामान को संभालते और इंचों में आगे की ओर खिसकते। बाहर कहीं से भी घर लौटने पर हमेशा खुश होता रहा हूँ परन्तु आज न जाने क्यों मैं निराश सा था। एक खिन्नता सी थी जो मुझे घेर रही थी। बस अब जितना जल्दी हो सके मुझे घर पहुँचना था। टैक्सी की लंबी लाइन में अपनी-अपनी सीट पर बैठे ड्राइवर, आने वाले ग्राहक की प्रतीक्षा में मेरी ही तरह खिन्न दिख रहे थे। हम लोग सोच रहे थे कि जल्दी से टैक्सी और अच्छा ड्राइवर मिले और वो सोच रहे थे कि दूर की अच्छी सवारी मिले। एक पुरानी टैक्सी में सरदार जी ड्राइवर दिखे। उनके चेहरे ने फिर से चंडीगढ़ की याद दिला दी। मन ने कहा यही टैक्सी मेरे भाग्य में हो। आज पहली बार मैंने सरदार जी टैक्सी वाला सोचा। अब तक मैं पंजाबी टैक्सी वाला ही कहा करता था। कलकत्ता में बहुत हैं। आज उनमें मुझे कोई अपना दिखा। भाग्य ने मेरा सुना और उन्हीं सरदार जी की टैक्सी मुझे मिली। एक बे मतलब सा संतोष हुआ। ड्राइवर सरदार जी बुजुर्ग थे। उन्होंने मेरा पता लिया और भीड़ में इधर-उधर टैक्सी को करते हुए, कलकत्ता की पहचान बन चुके, हावड़ा ब्रिज के ऊपर से, मुझे मेरे घर की ओर ले चले। टैक्सी की खिड़की से मैं अपने कलकत्ता की सड़कों, इमारतों और दोनों ओर फुटपाथ पर फैले संसार को ऐसे देख रहा था मानों इन सब से मेरा परिचय आज ही हो रहा हो। कुछ ही समय में मैं अपने घर के सामने था। टैक्सी से उतर और अपना सामान ले, मैंने सरदार जी से, सत श्री अकाल कहा। वे बुजुर्ग मेरी और देखते रह गए और मेरा अभिवादन स्वीकार किया। घर में मेरी प्रतीक्षा की जा रही थी। मैंने माँ और बाबा के पाँव छुए और आशीर्वाद लिया। हर माँ की तरह, अपनी माँ को मैं दुबला नज़र आया। उसने कहा, ' हाथ मुँह धो लो, मैं खाना लगाती हूँ ..'   

मैं अपने कमरे में आ गया। इधर-उधर देखा। सब कुछ वैसा ही था जैसा छोड़ गया था। मेरी बुक सेल्फ व्यवस्थित सी दिखी। जरूर माँ ने इधर हाथ दिया होगा। मेरे अपने हिसाब से रखी पुस्तकों को यहाँ-वहाँ, ऊपर-नीचे कर दिया होगा। अब जरुरत के समय मुझे अपनी पुस्तक न मिलेगी। मैं चिल्लाऊंगा और माँ कहेगी, ' जैसा था वैसा ही तो है, मैंने कुछ नहीं किया..'  फिर मैं समस्त पुस्तकों को बिस्तर पर गिराऊंगा और वह पुस्तक जिसे मैं ऊपर के रैक में रखा करता हूँ मुझे नीचे के रेक में दबी हुई मिलेगी। माँ से झड़प होगी और वो कहेगी, ' मैंने तेरी चीजों को छुआ तक नहीं..'  सालों से यही होता आ रहा था।  

मैं ट्रैन यात्रा के बाद की सुस्ती में लेटा हुआ था कि अचानक उठ अपनी पुस्तकों में एक खास पुस्तक खोजने लगा। पुस्तक तो यहीं रहती थी पर आज नहीं थी। मैंने माँ को आवाज़ दी। वह दौड़ती हुई आई। उन्हें पता था कि कुछ है जो मुझे मिल नहीं रहा। एक बार फिर से माँ-बेटे में झड़प होने वाली थी। उन्होंने कहा, ' क्या हुआ, क्यों चिल्ला रहे हो ?  ' होना क्या है, फिर से मेरे कमरे से छेड़छाड़ की गयी है.. ' मैंने कहा। माँ ने रटी रटाई बात फिर से दोहरा दी कि उसे मेरे कमरे, मेरे सामान से क्या लेना। फिर उसने पूछा कि अब क्या नहीं मिल रहा। मैंने कहा, ' वो किताब कहाँ है जो नाना को उनके पंजाब के दोस्त देकर गए थे और नाना ने मुझे दे दी थी..' माँ ने तुरंत प्रतिक्रिया दी, ' अरे वो.. वो तो साइड वाले रैक में पीछे की ओर रखी है..'  मैंने माथा पकड़ लिया, अगर माँ ने मेरे कमरे में हाथ नहीं दिया तो कैसे बता दिया कि वो किताब कहाँ रखी है ? मैंने किताब निकाली। यह किताब नाना से मिलने आये एक सरदारजी अंकल ने उन्हें दी थी। वे पंजाब यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे। अंग्रेजी भाषा की यह किताब सिख धर्म के बारे में थी। मैंने अपनी अन्य किताबों के साथ रख दिया था। इसके कवर पर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर का चित्र था जो मुझे याद था। मैंने इस किताब के पन्ने पलटना शुरू किया। मेरी स्मृतियों की किताब के हर पन्ने पर भी एक-एक चित्र उभर कर आ रहा था। माँ ने उस किताब के साथ मुझे देखा तो हैरान हो गयी। 
माँ ने मेरे पसंद की दो अन्य चीजें भी बनायीं हुई थी। एक थी आम-खजूर की मीठी चटनी और दूसरी चावल वाली गुड़ वाली पायस यानि खीर। मैंने भर पेट खा लिया था परन्तु इन दो चीजों का लोभ न छोड़ सका और दोनों को काफी मात्रा में खा गया। माँ मुझे भरपूर खाता देख संतुष्ट होती रही कि उन्होंने अच्छे से सब कुछ बनाया था। खाना खा मैं और बाबा दोनों विश्राम की मुद्रा में आ गए। माँ और उनकी सहायिका बिशाखा सामान समेटने में लगे हुए थे। हम दोनों सो गए। इतना भरपूर लंच लेने के बाद सोने के अतिरिक्त कोई विकल्प न था। मुझे इतना हैवी लंच नहीं लेना चाहिए था। ' हैवी लंच ' का सोच मैं अपने भीतर ही मुस्कुराने लगा। पिंकी जब ये शब्द सुनेगी तो खूब हँसेगी। कोई भी बेहतरीन चीज बंगाल में हैवी हो जाती है।  हैवी पिक्चर,  हैवी एक्टिंग, हैवी ड्रेस ..और न जाने क्या क्या ? मैंने सोचा, जब पिंकी यहाँ आकर तांत की साड़ी पहनेगी तो मैं उसे जरूर कहूंगा, 'आज तो हैवी लग रही हो..' मैं जानता था वह क्या कहेगी। वह जोर से हँसेगी और कहेगी, ' मैं तो बंगाली साड़ी में हैवी लग रही हूँ परन्तु, आप क्यों इस नीली सी शर्ट में लाइट बने बैठे हो ? यूँ ही न जाने क्या क्या सोचते नींद में सो गया। उठा, तो संध्या ढल आयी थी। बाबा तो उठ चुके थे परन्तु माँ अपने ऊँचे पलंग पर अब भी सो रही थी। पलंग के एक ओर फर्श पर अपनी पुरानी चटाई बिछा, बिशाखा भी सो रही थी।  
( आज यही तक, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर )

Wednesday, July 22, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी (Two States - A New Story) 25 & 26

टू स्टेट्स - एक नई कहानी 
 (Two States - A New Story) 
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चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra 
( २५ - २६ )                  
अगले तीन दिन ऐसे ही बीत गए। यह प्रशिक्षण मेरे लिए अर्थहीन हो चुका था। मैं किसी तरह समय बिता रहा था। अपने आप से द्वन्द करते  हुए मैंने सोचा कि अंतिम बार अंकल के घर हो ही आता हूँ। शाम को एक प्लास्टिक बैग में उनकी बेड शीट्स और टॉवल रखे और उनके घर पहुँच गया। मन में भीतर कहीं यह भी लग रहा था कि क्या मेरा उनके घर जाना ठीक था ?  मैं तो खुद ही प्रश्न करता हूँ और खुद ही निर्णयात्मक उत्तर भी  दे देता हूँ, ' हाँ ठीक ही तो है..उनका सामान तो मुझे लौटना ही है..'  हालाँकि मैं जानता था कि ये सामान लौटना महज एक बहाना था। भीतर ही भीतर मन वहाँ जाना चाहता था। घर पर आंटी अकेली थी। मुझे देख वे हैरान सी हो गयी। उन्होंने पूछा, ' सब ठीक है न, बेटा..'   मैंने कहा, ' हाँ आंटी सब ठीक है.. अब अगले सप्ताह वापिस चले जाना है.. आपका सामान था.. लौटने आ गया..'  उन्होंने कहा कि ऐसी क्या जल्दी थी। किसी दिन पिंकी ऑफिस से लौटते वक्त ले आती। उन्होंने मुझे अंदर बिठाया और अपने काम में लग गयीं। उन्होंने कहा कि पिंकी और लवली अपने पापा के साथ मार्किट गयी हुई थीं और थोड़ी देर में आ जाएँगी। उनके आने पर एक साथ बैठकर चाय पियेंगे। वे आते-जाते और काम करते-करते बात कर रही थीं। मैं चुपचाप एक ओर बैठा हुआ था। मुझे लगा कि मुझे इस समय यहाँ नहीं आना चाहिए था। इस बार जब आंटी कमरे में आयी तो मैंने कहा, 'अच्छा आंटी मैं चलता हूँ ..' उन्होंने कहा, ' अरे रुको.. सब लोग आते ही होंगे..' वे पास की कुर्सी पर बैठ गयी। बातचीत के मकसद से उन्होंने मेरा हालचाल फिर से पूछा। उन्होंने मेरी वापसी के बारे में पूछा। मैंने उन्हें बताया कि सोमवार को चले जाना था । 

कुछ ही देर में अंकल और पिंकी -लवली आ गए। उनके आते ही घर का माहौल बदल गया। अंकल ने अपने पंजाबी अंदाज़ में वाह..वाह.. आओ जी..  कहा। पिंकी और लवली से हेलो हुई। पिंकी ने किनारे पर रखे हुए बैग को देखा तो हैरान हो पूछा, ' अरे, तुम इसे ले आये .. मैं आकर ले जाती.. मैं सोच ही रही थी, तुम्हारे पास आने का..'  मैंने कहा, मंडे यहाँ से चले जाना है.. सोचा अंकल-आंटी से मिलना भी हो जायेगा..'  कुछ ही समय में आंटी चाय लेकर आ गयी। बातें होती रही, कुछ मेरी ट्रेनिंग की, कुछ कलकत्ता की और कुछ तब के राजनैतिक माहौल की। पिंकी ने कहा कि उसके कमरे में चलते हैं। हम तीनों अपने अपने चाय के कप लेकर उसके कमरे में आ गए। पिंकी ने कमरा बहुत अच्छे से सजाया हुआ था। सब सामान क़ायदे से रखा हुआ था। एक और बुक शेल्फ था जिसमें कई अंग्रेजी की पुस्तकें रखी हुई थी। ये देख मुझे अच्छा लगा। मैंने पिंकी से कहा कि सोमवार  की मेरी ट्रैन थी और मुझे अब चले जाना था। उसने तुरंत प्रतिक्रिया दी, ' ठीक है तो यह यहाँ तुम्हारा अंतिम संडे है, तुम्हें चंडीगढ़ घुमाते हैं..' मैंने कहा, ' एक बार फिर से यहाँ के गुरुद्वारे जाने की इच्छा है, मेरी..'  उसने कहा, ' ओके, गुरूद्वारे भी चलते हैं..'  मैं सच में गुरूद्वारे जाने का इच्छुक न था। मैं तो पिंकी को प्रभावित करना चाहता था। उसने कहा कि संडे वह मुझे गेस्ट हाउस में मिलेगी और हम दिन भर साथ रहेंगे, लंच भी बाहर ही करेंगे। हम तीनों इधर -उधर और फिल्मों की बातें करते रहे। कुछ समय बिता, मैं वहां से लौट आया। 

मैं बेचैन हो रहा था,आने वाले संडे के लिए और साथ ही उत्साहित भी था अपने घर कलकत्ता लौटने के बारे में सोचते हुए। बचपन से ही मैं घर से बाहर जाने के लिए जितना उत्साहित होता हूँ, वापिस घर लौटने के लिए भी उतना ही बेचैन भी होता हूँ। मेरी माँ कहती है कि मैं छुट्टियों में कहीं बाहर जाने की बहुत ज़िद किया करता था और नयी जगह पहुँच कर दो-चार दिन में ही वापिस घर चलो की रट लगाने लगता था। शायद मेरा बचपन अभी तक मेरे साथ था। हम लोग शाम को कहीं निकल जाते थे और रात का खाना बाहर से खाकर आते थे। इन दिनों मैं अपनी मर्जी का नॉन-वेजीटेरियन खा रहा था और संतुष्ट था। मैंने कुछ सामान भी खरीदा था । बाबा के लिए एक टी-शर्ट लेते हुए, अपने लिए भी शोख रंग की टी-शर्ट ले ली। मैंने यहाँ के युवकों को ऐसी टी-शर्ट पहने देखा था। मन में कहीं था कि रविवार को इस नई टी-शर्ट को पहना जायेगा। 

पहली बार की तरह, रविवार को पिंकी की प्रतीक्षा में ब्रेकफास्ट करने के बाद ही तैयार हो गया था। वह देर से आयी ग्यारह बजे के बाद। आज पहली बार वह मेरे कमरे  में आयी और कमरे की दशा देख हँसने लगी। उसने जल्दी जल्दी में इधर उधर पड़ी चीजों को व्यवस्थित किया। उसने पूछा कि क्या मेरा कलकत्ता वाला कमरा भी ऐसा ही रहता था ?  मैं थोड़ा संकोच में आ गया। मैंने कहा, ' कलकत्ता में तो मम्मी हैं, वह ठीक कर देती हैं..' आज शायद पहली बार मैंने अपनी माँ के लिए मम्मी शब्द का  प्रयोग किया था। मन ही मन मैं  चाहता था कि वह कहे कि जब मैं आ जाऊंगी तो सब ठीक कर दूंगी। पर उसने ऐसा नहीं कहा। मेरा दिमाग कुछ ज्यादा चतुर है। मैंने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ' मेरी माँ कहती है, मेरी पत्नी आ जाएगी तो वह मुझे अनुशासित कर देगी..'  पिंकी मुस्कुराने लगी। उसने कहा, ' और, कब आ रही है आपकी वाइफ मेरा मतलब आपकी पत्नी ? मेरे मुख से अनायास ही निकल गया, ' तो कब आ रही हो तुम ?  पिंकी ने सिर घुमा लिया और कुछ नहीं कहा। बाद में उसने जल्दी चलने के लिए कहा क्यों कि मुझे चंडीगढ़ की बहुत सी जगह दिखानी थी और लंच भी करना था। वह कई जगह मुझे अपनी स्कूटी में बिठा घुमाती रही। एक अच्छे रेस्टॉरेंट में हमने लंच किया। शाम हो आयी थी। हम दोनों गुरूद्वारे गए। पिंकी ने आज फिर मुझे सिर ढकना सिखाया। वह आज भी घर से मेरे लिए एक स्कार्फ़ लेकर आयी थी। मत्था टेक हम दोनों ध्यान की मुद्रा में बैठे रहे। काफी समय निकल गया। मेरे लिए यह पहला अनुभव था जब में मौन की स्थिति में  इतनी देर तक बैठा रहा। बाहर आ स्कूटी पर बैठने से पहले मैंने उससे पूछा, ' मंदिर में ध्यान में बैठी, क्या सोच रही थी ?  उसने कहा, ' कुछ नहीं, अपने बाबा नानक से प्रार्थना कर रही थी कि उनकी कृपा हमेशा बनी रहे..'  मैंने कहा, 'और कुछ ?  उसने कहा, ' बाबा की कृपा रहे, और क्या चाहिए .. ' मैंने कहा, ' पिंकी, चिंता मत करो, अगर तुम कलकत्ता आने का निश्चय करती हो तो मैं तुम्हें भरोसा दिलाता हूँ कि सब ठीक रहेगा.. विश्वास रखो.. '  उसने अब मेरी तरफ देखा।  उसकी आखों में एक जिज्ञासा भरी चमक थी। उसने कहा, ' चलो तुम्हें तुम्हारे गेस्ट हाउस में छोड़ दूँ.. अब रेलवे स्टेशन पर ही मुलाकात होगी.. छोड़ने आऊंगी..'
     क्या हम दोनों बिना अधिक बात किये, कुछ निश्चित कर चुके थे ? इन कुछ दिनों में ही हम दोनों के मध्य एक संवाद सा बन चुका था। जो दिखता न था पर चल रहा था। मैं तो कहीं बहुत पहले ही निश्चित कर चुका था कि मेरी इच्छा क्या थी और मुझे करना क्या था?  पिंकी की ओर से मैं समझ न पा रहा था। कोई संकेत न था। क्या पिंकी जैसी सिख धर्म की लड़की मुझ जैसे बंगाली लड़के के प्रति आकर्षित होगी ? मुझे तो अपनी पराजय ही दिखती थी। मैं अपने आप में कहीं आत्मविहीन सा था। मुझे यहाँ चंडीगढ़ के जीवन-व्यवहार ने सोचने को विवश कर दिया था कि मैं क्यों ऐसा न हो सका था। मुझे तो मोटर साइकिल तक चलाना नहीं आता था। आजकल की आधुनिक लड़की मुझ में क्या देख पायेगी ? परन्तु आज के पिंकी के व्यवहार ने स्पष्ट कर दिया कि कुछ तो ऐसा है जिसे उसने मुझ में देखा था। एक गुदगुदी सी थी मेरे भीतर। मैं एक जगह स्थिर न हो पा रहा था। बिस्तर पर लेट जाता, फिर दूसरे क्षण ही उठ बैठता। बाहर निकल आता। प्यास महसूस करता, पानी के दो-चार घूंठ पीता। बे मन से किसी पुस्तक के पन्ने पलटता। फिर बिस्तर पर आ गिरता। ये कैसा बर्ताव था मेरा,अपने ही साथ ? मैं खुश था,उदास था या व्याकुल ?  यूँ ही इधर-उधर उड़ते मन को बांधने की कोशिश में मैं उस दिन को याद करने लगा जब मैं चंडीगढ़ पहुंचा था। कैसे कलकत्ता से निकलते वक्त अनिश्चितता में था ? कैसे गेस्ट हाउस के खाने से विचलित था ? कैसे इन दिनों जब घर से दूर था, मैंने अपने नाना को खो दिया था ? और कैसे अब अंतिम दिन में मुझे लग रहा था कि कुछ दिन और यहाँ रहने को मिल जाता तो अच्छा होता ? मैं अपने घर तो पहुंच,अपने माता-पिता से मिलना तो चाहता था परन्तु मैं यह भी चाहता था, ऐसा कुछ हो जाये कि दो-तीन यहाँ और मिल जायें । कल की ट्रैन यदि कैंसिल हो जाय तो क्या ही अच्छा हो। ये क्या हो गया था मुझे ? ये कैसी स्कूल के बच्चों जैसी सोच कि आज वर्षा हो जाये तो छुट्टी मिल जाये और फिर मज़ा ही मज़ा ? 

रात देर तक जागता रहा। पिंकी के बारे में सोचता रहा। उसके साथ कलकत्ता की सड़कों, बाज़ारों में घूमता रहा। कल बहुत जल्दी उठना भी था क्यों कि सामान पैक करना था, साथ ही सब से अंतिम बार मिलना भी था। मुझे कभी इस बात का अंदेशा न था कि इस चंडीगढ़ नगर से, यहाँ के गेस्ट हाउस से कुछ ऐसा गहरा सा रिश्ता बन जायेगा। मैं तो यही सोचकर कलकत्ता से चला था कि एक सामान्य ट्रेनिंग कोर्स था, जो आपको पसंद हो या न हो करना ही था। मैंने तो यही सोचा था कि चंडीगढ़ घूमना ही हो जायेगा और अपने सर्विस रिकॉर्ड में भी आ जायेगा। आज की रात न जाने कैसे कटेगी? अब तो रेलवे स्टेशन पहुंचना था और पिंकी से अंतिम बार मिलना था। बहुत सी बातें थी जो मेरे मन की खिड़की से इधर-उधर झांक रही थी। न जाने कल क्या होगा ? क्या वह अकेली ही आएगी ? शायद सभी आयें ? शायद पिंकी और उसके पापा ही आयें ? 
 
सुबह सब से पहले कैंटीन के स्टाफ से मिला। कृष्णा थोड़ा उदास दिखा। उसने कहा ' दादा फिर आना, आप बहुत अच्छे हो..' मैंने भी उसे कलकत्ता आने का निमंत्रण दिया। कुछ साथी भी मिले। हम सब गले मिल रहे थे। मैं इलाहाबाद वाले तपन को खोज रहा था। वह न जाने कहाँ था ? मैं गेट के इंचार्ज से मिलने गया। इन सरदारजी से मिलने तपन भी वहां आया हुआ था। वह गले मिला और स्नेहपूर्वक बात करने लगा। उसने कहा कि कलकत्ता आया तो मुझे अवश्य मिलेगा। उसने मेरा पता लिया और अपना इलाहाबाद का पता दिया। आज वह एक नया सा व्यक्ति लग रहा था। उसने एक बात और बताई कि उसकी बुआ जो कलकत्ता में रहती थी, राज्य सरकार के मुख्यालय में अच्छे पद पर कार्य करती थी और रबिन्द्र संगीत की गायिकाओं में उसका नाम था। वह आकाशवाणी और दूरदर्शन पर अपने गायन का प्रदर्शन भी करती रहती थीं। तपन ने कहा कि कभी मैं उनसे मिलने जा सकता था, उन्हें अच्छा लगेगा। मैं हैरान था कि वह आज अंतिम मुलाकात में इतना सब कुछ क्यों बता रहा था ? वह खुलकर, अपनापन दिखाते हुए बात कर रहा था। आज वह बातचीत भी बांग्ला में ही कर रहा था। पहली बार जब मिला था तब वह मुझ से अनदेखी कर रहा था। आज स्थिति विपरीत थी। आज मेरा मन उससे घनिष्टता करने का न था। मैंने औपचारिक सी बात की और आगे बढ़ गया। गेस्ट हाउस का मैनेजर हाथ में एक लिस्ट लेकर घूम रहा था। मुझे देख वह दूर से चिल्लाया, ' दादा,आप तो आज ही निकल रहे हो न ? उसने लिस्ट में मेरा नाम देखा और कहा, ' आपकी दिल्ली शताब्दी है और वहां से कलकत्ता की राजधानी.. आपको ग्यारह बजे हमारी गाड़ी स्टेशन छोड़ आएगी ..' गेट पर समय से आ जाइएगा..वरना अपना इंतज़ाम खुद करना पड़ेगा..'  समय से पहले ही मैं अपना सामान ले गेट पर आ गया। थोड़ी देर में दो और लड़के भी आ गए। इन्हें भी शताब्दी से ही जाना था। कुछ ही समय में हमें स्टेशन पर उतार दिया गया। मैं इधर-उधर पिंकी को ढूंढने लगा। मेरी ट्रैन का समय हो चला था। मैंने एक दोस्त से पूछा कि हमारी ट्रैन का समय तो हो गया था। उसने कहा कि अभी भी चालीस मिनट थे। सरदारों का शहर है तो  हमारी ट्रैन भी बारह बजे ही चलेगी। वो हँस रहा था परन्तु मुझे परेशानी हो रही थी। पिंकी विलम्ब क्यों कर रही थी ? समय से आ जाती तो कुछ बातें जो मेरे मन में उठ रही थी, शायद वो हो जाती। मैं प्लेटफॉर्म पर इधर -उधर टहल रहा था। एक-एक मिनट भारी लग रहा था।  

काफी समय बाद पिंकी और जोगेन्दर अंकल आते हुए दिखे। स्टेशन पर बहुत रौनक थी। गाड़ी चलने में कुछ ही समय बचा था। भीड़भाड़ के बीच पिंकी सबसे अलग और आकर्षित दिख रही थी। उसने हेलो कहा और जोगेन्दर अंकल ने मेरे साथ हाथ मिलाते हुए कहा, ' सो, चंडीगढ़ स्टोरी ओवर ...'  मैंने मन ही मन में सोचा, स्टोरी तो अब शुरू हो रही थी। पिंकी ने सॉरी कहते हुए कहा कि पापा की वजह से देर हो गयी थी। पिंकी ने दो पैकेट मुझे पकड़ाए। उसने कहा, ' ये खाने के लिए है.. और ये दूसरा मम्मी ने तुम्हें गिफ्ट दिया है..'  मैंने कहा, ' खाने के लिए ? यहाँ से शताब्दी है और दिल्ली से राजधानी.. दोनों में खाने की समस्या नहीं है.. तुम बेकार लायी हो..'  पिंकी ने कहा कि रख लो। मैंने दूसरे पैकेट की ओर देखते हुए कहा, ' और इसमें क्या है, गिफ्ट तो तुम्हारे दिल्ली वाले मामाजी ने दे ही  दिया ही था ?  पिंकी ने हँसते हुए कहा, ' वो दिल्ली का गिफ्ट था, ये चंडीगढ़ का.. देखकर बताना कहाँ का ज्यादा अच्छा है..'  अंकल जो एक ओर खड़े थे, सामने आ गए। उन्होंने कहा, ' बेटा, कलकत्ता पहुँच कर खबर देना..  बहन जी और भाई साहब को सत श्री अकाल कहना.. बहन जी से कहना, हर बार लुधियाना में सुखबीर के पास जाती हैं, कभी चंडीगढ़ में जोगेन्दर के पास भी आयें..' ट्रैन छूटने ही वाली थी। उन्होंने मुझे ट्रैन पर चढ़ जाने को कहा और भीड़ के पीछे हो गए। पिंकी का चेहरा उदास सा दिख रहा था। वो मेरे पास आयी, मैं ट्रैन में चढ़ने के लिए आगे बढ़ रहा था। उसने धीरे से कहा, ' घर में जल्दी बात करना.. देर मत करना.. फोन करना .. बाय-बाय  ..'  

( आज यहीं तक, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर..)

Wednesday, July 15, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ' Two States - A New Story ' -24

टू स्टेट्स - एक नई कहानी 
' Two States - A New Story ' 
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चन्दर धींगरा 
Chander Dhingra 
      (२४ )    चंडीगढ़ वापसी की यात्रा में सभी शांत थे। सभी थके और नींद से भरे हुए थे। मैं पिंकी के संग स्वर्णमंदिर में हमारे बीच चल रही बातचीत को आगे बढ़ाना चाहता था परन्तु यहाँ कार में ऐसा माहौल न था। पिंकी खुद भी आँखें मूंद सो रही थी या किसी चिंतन में थी। न जाने मुझे ऐसा क्यों लगा कि मेरी ही तरह वह भी अपने आप से जूझ रही थी। मैं पिंकी को लेकर न जाने क्या-क्या सोचने लग गया था। मैं अपने भीतर एक परिवर्तन सा महसूस कर रहा था। जोगेन्दर अंकल ने कार के भीतर चल रही शांति को तोड़ते हुए कहा, ' ओये .. सभी थक गए हो क्या ?  भई हमें तो ऐसी खामोशी पसंद नहीं है.. '  लवली जो अब तक शांत थी, सबसे पहले बोल उठी, ' पापा, सभी तो आप के जैसे स्ट्रांग नहीं हो सकते हैं.. दिन भर आप हमें इधर-उधर घूमाते रहे हो.. अब जरा आराम कर लेने दो और चुपचाप गाड़ी चलाओ ..'  आंटी ने सलाह दी कि आगे रास्ते में किसी अच्छी जगह रुक कर चाय पियेंगे। चाय के नाम पर पिंकी भी उठ बैठी। ' हाँ, चाय तो पीनी है और हमारे बाबू मोशाय तो चाय-कॉफी के खास शौकीन हैं..' उसने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा। मैंने एक बार बातों-बातों में उसे अपनी चाय-कॉफ़ी की रूचि के बारे में बताया था। मुझे अच्छा लगा कि उसे ये बात याद रही थी। मैंने कहा ' हाँ, चाय तो ऐसे लम्बे ड्राइव में मिलनी ही चाहिए..' अपनी बात को पक्का करते हुए मैंने उन्हें बताया कि जब कभी भी हम कलकत्ता से दीघा के समुद्र तट पर जाते हैं तो बीच रास्ते में एक-दो जगह टी-ब्रेक लेते ही हैं। अंकल ने मुझ से दीघा के बारे में पूछा तो मैंने उन्हें इस सुन्दर सागर तट के बारे में बताया कि कैसे कलकत्ता के लोग यहाँ दो-तीन दिन का विश्राम लेने आते हैं। अंकल-आंटी पुरी-भुवनेश्वर घूम कर आये हुए थे। आंटी ने वहां के अपने ट्रिप के बारे में बताया। उन्हें पुरी का समुद्र तट बहुत सुहाना लगा था। उन्होंने कहा कि जब वे पुरी गए थे तब पिंकी का जन्म नहीं हुआ था। पिंकी तो चुप रही परन्तु लवली ने कुछ जिद सा भाव दिखते हुए कहा कि वो इस दीवाली के समय पुरी जाएगी। अब पिंकी ने भी हाँ मिलायी कि दीघा और पुरी दोनों जगह जाना चाहिए। उसने मेरी तरफ देखकर कहा, ' क्यों ठीक है न ? हमारे गाइड तो आप ही रहोगे..'  एक शरारत भरी मुस्कान उसके चेहरे पर थी। मैंने कहा, ' क्यों नहीं.. तुम लोग जब भी कलकत्ता आओगे  तो..मैं ऑफिस से छुट्टी ले लूंगा, जितने दिन आप लोग वहां रहोगे.. लेकिन वहां पंजाबी खाना नहीं मिलेगा.. बंगाली  मछली-चावल खाना पड़ेगा..' मैं शायद पहली बार इतनी लम्बी बात कह गया था। इस पंजाबी सिख परिवार के साथ जो प्रारंभिक असुविधा हो रही थी, वह धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। दोनों बहनों ने एक साथ प्रतिक्रिया देते हुए जोर से कहा, ' श्योर..' लवली तो एक कदम आगे बढ़ गयी, उसने हँसते हुए कहा, ' फिश-राइस एंड रसगुल्ला... ' मैं भी हँसने लगा। मुझे लगा बंगाल से बाहर लोगों को हमारे बारे में केवल इतना ही पता है। मछली और रसगुल्ला। मैंने सोचा ये वक्त है इनका सामान्य ज्ञान बढ़ाने का। मैंने उन्हें बताया कि बंगालियों के लिए मछली एक ही आइटम नहीं है। तरह-तरह की मछलियाँ और उनसे बने तरह तरह के व्यंजन होते हैं और बंगाली मिठाइयां तो विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। मैंने लवली की ओर देखते हुए कहा, ' कभी बंगाल की दही खाई है ? मैंने कहा तो था लवली को देखते हुए परन्तु मेरे मन में पिंकी थी और उसने मेरी बात को सुना भी। इससे पहले की लवली कोई उत्तर देती वह बोल उठी, ' हाँ मैंने खाई है.. यह सादी सामान्य दही नहीं, मीठी दही होती है.. यह एक तरह का डस्सेर्ट है.. मेरी एक फ्रेंड ने एक बार खिलाई थी...सो यम्मी..'  अपनी मिष्ठी दही की तारीफ मुझे अच्छी लगी परन्तु इसके लिए यम्मी शब्द कुछ अटपटा लगा। हमारी मिष्ठी दही इससे कुछ ऊपर है। मैं सोचने लगा कि ये आजकल का यम्मी शब्द किस बंगाली व्यंजन के साथ जायेगा ? अचानक दिमाग ने साथ दिया कि हमारी आम-खजूर वाली चटनी को यम्मी कहा जा सकता है। मैंने कहा, 'पिंकी, हमारे बंगाल में आम-खजूर की चटनी होती है.. उसे यम्मी कहना सटीक होगा..' वह हँसने लगी। सटीक शब्द उसे अच्छा लगा। बंगाली मिठाइयों को लेकर बचपन में सुनी एक छोटी सी कविता मुझे याद आ रही थी। लगा वो कविता सुना दूँ परन्तु दूसरे ही क्षण लगा कि इन पंजाबी लड़कियों का कविता से क्या सम्बन्ध ? कविता सुनाऊँ और कहीं खुद मैं ही हँसी का पात्र न बन जाऊँ ?

कुछ समय बाद अंकल ने एक ढाबा नुमा जगह पर गाड़ी रोक दी। वो तेजी से उतर टॉयलेट की तरफ दौड़े। मैं भी और बाद में तीनों महिलाएं भी। हल्के हो, हम टेबल पर आकर बैठे और वहां रखे मेनू कार्ड  देखने लगे। आंटी को पहले से ही अंदाज़ा था कि वहाँ क्या-क्या मिल सकता था। उन्होंने चाय और साथ में कुछ स्नेक्स मंगवाया। यहाँ भी मैं यही सोचता रहा कि यदि कभी ये लोग कलकत्ता आएँगे और हम लोग दीघा या कहीं और जा रहे होंगे और ऐसी ही परिस्थिति होगी तो चाय के साथ इन सब के लिए क्या क्या मँगवाऊंगा ? मैं पिछले वर्ष दोस्तों के साथ दीघा गया था। आज मुझे लगा कि यहाँ जैसे हाई वे रिसोर्ट या ढाबे वहां के रास्तों पर क्यों नहीं हैं ?  इन लोगों, विशेष कर पिंकी को वहां कैसा लगेगा ? मैं इन्हें हमारे कलकत्ता के चाइना टाउन के चाईनीज़ रेस्टोरेंट्स में ले जाऊँगा। बालीगंज के मशहूर बंगाली रेस्टॉरेंट में भी ले जाऊंगा। चौरंगी के एक ऊँचे होटल के बंगाली रेस्टॉरेंट में भी जा सकते हैं। मैं सोचता ही जा रहा था कि अंकल ने सबसे गाड़ी में जाकर बैठने को कहा।  'अब चलना चाहिए वरना बहुत देर हो जाएगी..'  उन्होंने आदेश के स्वर में कहा। मैंने देखा कि दोनों लड़कियाँ एकदम से चुपचाप कार में जाकर बैठ गयी। लगभग दो घंटे बाद हम चंडीगढ़ पहुँच गए। मेरा गेस्ट हाउस पहले आता था। मुझे अंकल ने गेट पर उतारा। सभी लोग कुछ समय के लिए कार से उतर आये। अंकल ने मुझे अपना ख्याल रखने को कहा। आंटी ने कहा कि किसी चीज़ की जरुरत हो तो निसंकोच बताना। पिंकी और लवली ने कहा, सत श्री अकाल, गुड नाइट, बाय। मैं दूर जाती उनकी कार को देखता रहा। आगे मोड़ पर जब वह ओझल हो गयी तब मैं गेस्ट हाउस के गेट के भीतर आया। कैंटीन का हॉल खाली पड़ा था और सामान समेटा जा रहा था। कैंटीन के मैनेजर ने पूछा कि आज बहुत देर हो गयी थी। मैंने उसे बताया कि अमृतसर गया था। उसने कहा, ' अच्छा, मत्था टेकने गए थे.. बैठो खाना लगता हूँ ..'  मैंने कहा, ' थोड़ा सा ही देना, ज्यादा भूख नहीं है..'  उसने एक प्लेट में दो गर्म रोटी, दाल, सब्जी और सलाद लगा दिया। मुझे याद आया कि पिंकी ने भी मंदिर में मत्था टेकने की बात कही थी न कि दर्शन करने की। भाव एक जैसा है परन्तु गुरु के सामने माथा टिकाना अधिक आस्था पूर्ण लगता है। 

 खाना खा मैं अपने कमरे में आ बिस्तर पर धम से लेट गया। दिन भर की थकावट थी लेकिन मेरे भीतर चल रहे विचारों का अंत नहीं हो रहा था।  वे तेज प्रवाह से किसी पहाड़ी नदी की तरह  इधर-उधर बिखरे पत्थरों से टकराते हुए, बहे चले आ रहे थे। गुरुद्वारे में लंगर के समय एक बात और हुई थी। लंगर की पंक्ति में बैठने पर, सेवा करने वाले को मैंने एक रोटी देने को कहा था तो उसने मुझे रोटी नहीं ' प्रसादा ' बोलने को कहा था। उसने अतिविनम्रता के साथ कहा था परन्तु मुझे अच्छा न लगा था। बाद में पिंकी ने मुझे सिखाया था कि यह दो हाथों में स्वीकार किया जाता है और इसे प्रसादा कहते हैं। मैंने उस समय उसे बंगाल में साल भर होते रहने वाले तरह-तरह के पूजा आयोजनों और उन अवसरों पर वितरित होने वाले 'भोग' के बारे में बताया था। लेकिन अब मुझे लगने लगा था कि गुरुद्वारे के लंगर में जो श्रद्धा और आस्था का भाव मैंने देखा था वह बंगाल के भोग में नहीं दिखता। साथ ही मैंने स्वयं को एक स्पष्टीकरण भी दे दिया कि यहाँ के लोग अधिक सम्पन्न हैं और वे अधिक धनराशि ऐसे आयोजनों पर दान स्वरुप दे सकते हैं। इसीलिए यहाँ अधिक सुदृढ़  व्यवस्था होती है। याद आया कि नाना ने एक बार मुझसे कहा था कि जो भी काम किया जाये उसे पूर्ण निष्ठा के साथ करना चाहिए। आज अमृतसर के गोल्डन टेम्पल में मैंने कार्य के प्रति जिस तरह की निष्ठा देखी थी, वैसी ही निष्ठा हमारे आयोजनों में भी होनी चाहिए। मैं यही सब सोचते-सोचते न जाने कब सो गया। 
 ( आज यहीं तक, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर  .. )

Wednesday, July 8, 2020

' टू स्टेट्स - नई कहानी ' ' Two States - A New Story ' -23


                                            ' टू स्टेट्स - नई कहानी '
' Two States - A New Story ' 
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चन्दर धींगरा 
Chander Dhingra 

 इस लम्बी कहानी ( उपन्यास ) को साझा करने का सिलसिला शुरू है। आज गुरुवार है, आगे बढ़ते हैं  ...  
( २३ )             हम दोनों मंदिर के पवित्र सरोवर की सीढ़ियों पर खामोश बैठे थे। बाहर मौन था परन्तु दोनों के भीतर संवाद चल रहा था। मन के इसी वार्तालाप में मैंने खुद से कहा, ' मैं अपने से ही बातें कर रहा हूँ, पर क्या पिंकी मेरा मन सुन पा रही है ?  स्वर्ण मंदिर का दिव्य दर्शन सामने था। न जाने कितने सत्य छिपे हुए थे इस दिव्यता की छांव में ? इस तरह की दिव्यता संभवतः कलकत्ता के समीप बेलूर मठ में ही महसूस होती है। वहां के किसी अन्य मंदिर में नहीं। हम दोनों के बीच छाए मौन को तोड़ते हुए, मैंने बात आरम्भ की। कहीं से तो करनी थी, लगा क्यों न किसी फिल्म की बात से शुरू करूँ ? हमारे समाज में फिल्म और राजनीति ऐसे विषय हैं जिन पर पर कभी भी बात की जा सकती है। मैंने कहा, ' पिंकी क्या तुमने देवदॉस फिल्म देखी है ?  उसका न सुन मैं हैरान रह गया। उसने कहा कि फिल्म तो नहीं देखी थी परन्तु यह उपन्यास उसने दो बार पढ़ा था और उसने इसके सम्बन्ध में एक लेख लिखा था जो कॉलेज की अंग्रेजी की पत्रिका में प्रकाशित भी हुआ था। उसने कहा कि वह इस कहानी के पात्रों से बहुत प्रभावित हुई थी।  ' कौन सा पात्र सबसे अधिक प्रभावशाली लगा है? मैंने पूछा। न जाने क्यों मैं इस विषय को आगे बढ़ाना चाहता था।  'ऑफ़ कोर्स, पारो..' उसने अपने पंजाबी अंदाज़ में कहा। इसके बाद उसने कहा कि देवदॉस की कहानी को दुनिया की श्रेष्ठम प्रेम कहानियों में रखा जाना चाहिए। मुझे उसकी यह बात अच्छी लगी। मैंने कहा कि क्या उसे कहानी का दुखद अंत पसंद आया था और क्या इसका सुखद अंत नहीं किया जा सकता था ? वो हंसने लगी, ' तुम्हारा मतलब है देवदॉस और पारो अंत पति-पत्नी की तरह मिल जाते.. अरे, तुम तो इस कहानी को बॉम्बे की फिल्म बना देते..'  मुझे उसकी बात प्रभावशाली लगी।  मैंने कहा, ' तुम्हें नहीं लगता, दुनिया में हर किसी के पास अपनी एक कहानी छिपी होती है..'  ' हाँ, जरूर, सबकी अपनी-अपनी कहानी है.. मेरे पापा-मम्मी की भी एक प्रेम कहानी है... इन दोनों ने अपने पेरेंट्स की इच्छा के विरुद्ध शादी की थी..'  वह मुस्कुराने लगी। मैंने कहा, ' अच्छा.. तो सुनो, मेरे माँ-बाबा की भी लव स्टोरी है..' मैं झूठ बोल रहा था और उसे प्रभावित करना चाहता था। मेरे माँ-बाबा की तो सामान्य दो परिवारों के बीच तय की हुई शादी थी। वह बाबा शब्द पर अटकी। उसने पूछा, ' बाबा..माने ?  मैंने उसे स्पष्ट किया कि बंगाली भाषा में बाबा का अर्थ है पिता.. जैसे वह मम्मी-पापा कहती है वैसे ही हम माँ-बाबा कहते हैं..' मैं अपने माँ-बाबा की लव स्टोरी पर बे वजह का झूठ बोल गया था। अब पिंकी ने उनकी लव स्टोरी जाननी चाही। लड़कियों को इस तरह के विषयों में खासी रूचि रहती है। मैंने कहा कि कुछ विशेष नही था। अब मैं इस विषय को यहीं समाप्त करना चाहता था। परन्तु वह ज़िद करने लगी। मुझे एक कहानी गढ़नी पड़ी। मैं कहानी गढ़ने की अपनी क़ाबलियत पर मुग्ध हो रहा था। मैंने माँ के ब्राह्मण तथा बाबा के कायस्थ होने के साथ साथ कई इधर-उधर की बातें जोड़ी और एक अनोखी प्रेम कथा उसे सुना दी। पिंकी ने सुना और सरलता से कहा कि वह तो बंगाली लोगों को बहुत पढ़ा-लिखा और खुले दिमाग वाला समझती थी। परन्तु वहां भी इस तरह की जात-पात की बातें थीं। 

पिंकी ने कहा कि हम दोनों के माता-पिता प्रेम विवाह से बंधे थे तो कहीं न कहीं हमारे परिवारों में कुछ समानता थी। मैं भीतर तक शंकित सा हो गया था। अब लगा कि मुझे ये झूठी कहानी नहीं बनानी चाहिए थी। कहीं यह बात उठ गयी तो ? दिमाग ने हमेशा की तरह फिर से मेरा साथ दिया, 'अब जो होगा देखा जायेगा..'  पिंकी ने जब परिवारों की समानता की बात की तो मैंने उसकी भाव भंगिमा पढ़नी चाही। शायद वह सामान्य थी परन्तु मुझे लगा कि कोई सन्देश देना चाहती थी। मैंने कहा कि वह अपने लिए कैसा विवाह चाहेगी, प्रेम विवाह या पारिवारिक विवाह। पिंकी ने तुरंत कहा कि वह कुछ कह नहीं सकती परन्तु अपने होने वाले जीवन-साथी को बिना जाने-समझे वह कैसे किसी से विवाह कर सकती थी। मैंने पूछा, ' क्या तुम इंटरकास्ट मैरिज करोगी ? उसने हँसते हुए कहा कि पारिवारिक व्यवस्थित विवाह हो या कुछ और, वह अपने होने वाले पति को अच्छे से जानना और समझना तो अवश्य ही चाहेगी। मैंने भी उसकी बात में हामी भरी, ' हाँ, होने वाले जीवन साथी को जानना तो आवश्यक है..परन्तु एक दो बार मिलने-मिलाने से कितना जान सकते हैं..  हमारी परम्परा में पारिवारिक जानकारी का आधार होना एक अधिक अच्छी प्रणाली है.. परिवार की पृष्ठभूमि सभी कुछ स्पष्ट कर देती है..'  अब उसके हाँ कहने की बारी थी, ' दोनों बातें अपनी-अपनी जगह हैं..'  मैं विषय से अलग नहीं होना चाहता था। मैंने हलके अंदाज़ में पूछा, ' अच्छा, हम दोनों कुछ दिनों से एक-दूसरे से मिल रहे हैं, तुम मुझे कितना जान सकी हो ? पिंकी इस तरह मुस्कुराई मानों मेरी चतुराई को भांप रही हो। उसने कहा, ' सच कहूँगी तो तुम बुरा मान जाओगे..'  मैंने कहा कि नहीं ऐसा नहीं होगा। उसने उसी अंदाज़ में कहा, ' तो सुनो..तुम पढ़े-लिखे सिंपल टाइप हो..पर अच्छे हो..अपनी वाइफ को खुश रखोगे.. परन्तु अभी मैं पूरे विश्वास के साथ नहीं कह सकती..' यह कह कर वह हँसने लगी। उसकी सरल स्पष्टता प्रभावशाली थी। मैं न जाने क्यों झेंप रहा था। सामने की ओर देखा, अंकल,आंटी और लवली मंदिर का चक्कर लगाकर वापिस चले आ रहे थे। हम दोनों खड़े हो गए। पिंकी ने मंदिर की ओर शीश झुका कर प्रणाम किया। उसने मुझे भी ऐसा करने का इशारा किया। मैंने भी झुक कर नमन किया। मैं स्वयं को बहुत बुद्धिमान समझता रहा हूँ कि मैं ईश्वर और प्रार्थना आदि को नहीं मानता कि मैं बंगाल की प्रगतिशील विचारधारा में बड़ा हुआ था। मुझे मंदिर और पूजा-पाठ सदैव से एक तरह का आडम्बर लगते रहे थे। मेरे हिसाब से ये बातें मनुष्य की दुर्बलता दर्शाती थी। परन्तु आज न जाने मेरे मन ने भीतर ही भीतर क्यों कहा ' हे ! पवित्र मंदिर, तुम्हारे दर्शन को पुनः आऊँगा, अपने माँ, बाबा और पत्नी के साथ..' अचानक मुझे लगा कि क्या मैं भी दुर्बल हो रहा था ? मेरे दिमाग ने हमेशा की तरह मेरा साथ दिया कि नहीं यह कोई प्रार्थना नहीं थी। यह तो मैं केवल अपनी इच्छा को अपने से ही व्यक्त कर रहा था। 
( आज यहीं तक, इससे आगे गुरुवार को, यहीं पर )