Chander Dhingra's Blog
Wednesday, February 24, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 60
टू स्टेट्स - एक नई कहानी
( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( ६० ) पिंकी ने इन कुछ माह में ही अपने कार्य स्थल पर अच्छी खासी जगह बना ली थी। हर शाम हम परिवार वाले मिलते तो पिंकी की ही बातें होती थी। उसके घर लौटने का समय अब अनिश्चित सा हो गया था। अक्सर देर से पहुँच पाती थी। आज ये हो गया था, आज वो हो गया था.. आज मीटिंग थी.. आज वहां जाना पड़ गया था ..' वह घर आती तो ऐसी बातों से ही शुरुवात होती थी। एक दिन मैंने उसे कहा था कि अपने काम में उतना ही उलझना चाहिए, जितना आवश्यक हो, उससे अधिक नहीं। परन्तु उसने कहा था कि अपने काम को उस स्तर तक ले जाना चाहिए जो श्रेष्ठम हो, भले ही इसके लिए कितना ही श्रम और समय क्यों न देना पड़े। बाबा मेरी बात में सहमति जताते और उसे कहते कि वह थक जाती होगी। इस पर वह कहती कि क्या उन्हें वह थकी-हारी दिखती थी ? उसका तर्क होता कि जब वह किसी दायित्व को सम्पूर्णता में निपटाती है तो उसे जो संतोष मिलता है वह उसके लिए सबसे विश्राम वाला पल होता है। वह सदैव स्फूर्ति से भरी दिखती थी। मुझे सुस्ताता देखती तो हँसते हुए कहती, ' क्यों, क्या आज फिर अधिक खा लिया है ? बिशाखा से कहूँगी, आपको माछ-भात कम दिया करे .. ' मैं मुस्कुरा देता था और कहता, ' चलो, तुमने माछ-भात कहना तो सीख लिया है.. आराम भी आवश्यक है, ज़िन्दगी में.. तुम भी सुस्ता लिया करो.. माछ-भात खा कर.. ' उसका जवाब होता, ' संडे है न रिलैक्स करने के लिए ..' मैं उसकी बात पर मन ही मन सोचता कि इस लड़की ने अपनी कैसी दिनचर्या बना रखी है। सप्ताह में सुबह चार दिन जॉगिंग और दो दिन म्यूजिक क्लास जाती है, फिर भागते-दौड़ते प्रातः के कर्म निपटाती है और बाय मम्मी जी - बाय पापा जी कहते हुए, अपने होटल की तरफ दौड़ती है। घर लौटने का कोई निश्चित समय नहीं। संडे की बात कर रही है पर उस दिन तो यह बिशाखा को छुट्टी दे देती है। उसे कहती है, ' दीदी, आज आप बैठो...आज मैं खिलाती हूँ...' इसके अलावा माँ भी उसको अपने साथ यहाँ-वहाँ ले जाने को आतुर रहती है। पिंकी को अपने साथ ले चलने में क्या माँ को एक तरह का आत्मबल मिलता था ?
मैंने निश्चय किया कि एक रविवार को पिंकी को साथ लेकर कहीं घूमने जाया जायेगा। मैंने उसे दो दिन पहले ही कहा था, 'संडे को फ्री रहना.. हम लोग कहीं दूर जायेंगे.. ' फिर मैंने उसे बताया कि सुबह बेलूर मठ जायेंगे, लंच एक खास बंगाली होटल में खाएंगे और फिर एक पिक्चर देखेंगे..' वह बहुत खुश थी। उसने कहा, ' बंगाली पिक्चर दिखानी होगी..लवली पूछती रहती है कि कोई बंगाली पिक्चर देखी या नहीं ? मुझे उसका प्रस्ताव अच्छा लगा था। मैंने कहा कि बंगाली पिक्चर ही देखेंगे। मैं दो दिन तक रविवार का इंतज़ार करता रहा था। आज रविवार था। हम दोनों ही उत्साहित थे। रात को ही यह तय किया था कि सुबह ही निकल जाएँगे। सब ठीक था कि पिंकी के लिए उसके कार्यालय से फ़ोन आ गया था। कुछ विशेष कार्य आन पड़ा था और उसे बुलाया जा रहा था। पिंकी ने स्पष्ट शब्दों में इनकार कर दिया था। उसने कहा कि उसके कुछ कार्यक्रम पहले से ही तय थे और किसी भी हाल में उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता था। हम घर से निकल ही रहे थे कि उसका मोबाइल बज उठा था। ये उसके विभाग के वरिष्ठ प्रबंधक का कॉल था। पिंकी, एक ओर होकर मोबाइल पर ग़ौर से बात सुनती रही और यस सर कहकर मेरे पास आयी। उसने कहा, ‘ मैं होकर आती हूँ .. इस काम को टाला नहीं जा सकता .. मैं एक-दो घंटे में ही आ जाऊँगी..’ मैंने कहा, ‘ तुम्हें एकदम पक्का होकर ना कहना चाहिए था.. सप्ताह में एक दिन तो अपने लिए होना ही चाहिए..’ उसने कहा, सर ने ख़ुद कॉल किया था, उन्हें ना नहीं किया जा सकता..’ मैंने कहा,’क्यों नहीं.. आज संडे है..’ उसने कहा, ‘ जब दायित्व होता है और किसी को आप पर विश्वास होता है तो ना नहीं कर सकते..’ मैंने कहा,’ तुम्हारी जगह मैं होता तो कभी न जाता..’ पिंकी को मेरी बात असत्य सी लगी थी। उसने कहा, ‘ क्या आप अपने रवि साहब को उस दिन ना कर पाए थे ? थोड़ा संयम रखो ..मैं होकर आती हूँ .. बेलूर मठ किसी अन्य दिन चले जायेंगे ..आज लंच एक साथ लेंगे और पिक्चर भी देखेंगे ..और दोनों बंगाली ..’ उसने मुस्कुराते हुए मेरा हाथ दबा दिया था। मैं परेशान तो हो रहा था परंतु मैं भी मुस्कुरा दिया था। मैंने कहा, ‘ चलो ..जल्दी आना .. लेकिन तुम्हारे ऑफिस के काम और रोबी दा के काम में फ़र्क़ है ..वह सामाजिक दायित्व है.. दोनों का अंतर तुम्हें समझना चाहिए ..’ उसने कुछ भी उत्तर न दिया और मुस्कुराते हुए निकल गयी थी, यह कहकर कि जल्दी आने की कोशिश करेगी।
मैं उसकी प्रतीक्षा में उबासियाँ ले रहा था। एक बंगाली उपन्यास हाथ में था जो मेरा साथ दे रहा था। मैं पन्ने उलटता रहा और उस कहानी को किसी-किसी मोड़ पर खुद से जोड़ता रहा था। अचानक घड़ी में देखा तो सुइयाँ एक बजे की स्थिति को पाने की होड़ में दौड़ रही थीं। अरे! यह पंजाबी लड़की अभी तक नहीं आयी ? यह बेचैनी उस उपन्यास के लेखक पर पड़ी थी। मैंने प्रथम पृष्ठ पर छपे उसके नाम को अपने पैन से इस तरह से उलझाया था कि उसके अर्थ को अनर्थ कर दिया था और पुस्तक को अलग पटक दिया था। लगभग दो घंटे बाद पिंकी ने घर में प्रवेश किया। वह सॉरी -सॉरी कह रही थी और मैं खामोश था। उसने कहा,' क्या बताऊँ.. निकल ही रही थी तो निखिल ने खबर दी और मैं रुक गयी ..निखिल ने कहा कि अजय देवगन होटल में आ रहा था .. मैंने सोचा उसे पास से देखने का मौका है .. थोड़ी देर रुक जाती हूँ..मेरा पसंदीदा एक्टर है ..बस यह थोड़ी देर, अधिक होती चली गयी और मैं वहीं अटक गयी.परन्तु, इस रुकने का फायदा भी हुआ..मेरी एक फोटो उसके साथ खिंच गयी है..मिलेगी तो लवली को भेजूंगी..' वह किसी बच्चे की तरह एक साँस में कह गयी थी। मैं बहुत ही अधिक कुढ़ा हुआ था और भूख से भी ग्रस्त था। मैंने मन ही मन उसके सहायक निखिल को मनपसंद गाली दी और उसे कहा, ' एक तो सुबह का प्लान खत्म हो चुका था और अब तुमने लंच भी बेकार कर दिया.. अजय देवगन है क्या जो उसके लिए इतनी देर तक छुट्टी बेकार कर दी ? उसने मुझे देखा और कहा, ' सॉरी पर अजय देवगन को पास से देखने का मौका था.. कैसे छोड़ देती ? मैंने कहा, ' वो पंजाबी है इसीलिए न ? पिंकी ने मुझे घूरते हुए कहा, ' ये बात नहीं है.. वो अच्छा अभिनेता है और मेरा पसंदीदा है.. क्या तुम ने उसकी कोई फिल्म देखी है ? और पंजाबी-वंजाबी वाली बात होती तो आज मैं यहाँ ने होती.. मेरी तरह उसने भी एक बंगाली से शादी की है..' वह हँस रही थी। मैंने पैर पटकते हुए बिशाखा को आवाज़ दी और पूछा, ' कुछ खाने को मिलेगा, तुम्हारी बहू माँ ने लंच के बारह बजा दिए हैं..' पिंकी ने हँसते हुए कहा, ' बारह लंच के नहीं हम सरदारों के बजते हैं ..आपके लंच के तो तीन बज रहे हैं.. देर हो रही थी तो मैं रास्ते से तुम्हारा मनपसंद चाइनीस पैक करवा कर लायी हूँ .. आओ मुझे भी बहुत भूख लग रही है..' उसने बैग से लंच के चार डिब्बे निकाले। मैंने देखा, वह एक महंगे रेस्टॉरेंट का खाना था। मैंने कहा, ' इतने महंगे रेस्टॉरेंट से लाने की क्या जरूरत थी..' उसने फिर से चुटकी लेते हुए कहा ..' कभी कभी चलता है..हर बार महँगा-सस्ता नहीं देखा जाता..' बिशाखा ने प्लेटें लगा दी। पिंकी ने मुझे बुलाते हुए कहा, ' जल्दी आओ, अभी गरम है, खा लो ..' भूख तो लगी हुई थी, मैं खाने बैठ गया था। पिंकी भी चाव से खा रही थी। उसने बिशाखा से पूछा, मम्मी जी-पापा जी खाये छे ? ' इन दिनों वह बांग्ला बोलने का प्रयास करती थी। मैंने कहा, ' और नहीं तो क्या तुम्हारे इंतज़ार में बैठे रहते ? उसे मेरे कहने का अंदाज़ अच्छा न लगा था, ' वे दोनों तो घर पर ही खाने वाले थे..बाहर जाकर तो हम दोनों को ही खाना था..आप बिना वज़ह नाराज़ हो रहे हैं ..कभी कभी ऐसा हो ही जाता है.. इसमें इतना कुछ खोजने की क्या जरुरत है..' कभी हल्की सी बात भी अनचाहे ही गहरी हो जाती है। शायद उस दिन ऐसा ही हुआ था। आज सालों बाद याद कर रहा हूँ तो खुद पर क्रोधित और शर्मशार हो रहा हूँ। पिंकी अपने दायित्व को ही तो निभा रही थी। उसे शायद मुझसे सहानुभूति और कुछ स्नेह भरे शब्दों की आशा थी। एक मैं था, जो अधिक तो न बोल रहा था परन्तु मेरी बातों में एक तंज़ का स्वर था। किसी अभिनेता के प्रति झुकाव किसी भी लड़की के लिए स्वाभाविक है। एक उम्र के लड़के लड़कियों में यह होता ही है। मैं स्वयं भी तो उन दिनों एक बंगाली अभिनेता के प्रति आकर्षित हुआ करता था। उस दिन वह स्वादिष्ट लंच एक फ़ांस सा हो गया था। हम दोनों खा तो रहे थे परन्तु खामोश थे। ऐसा खाना केवल पेट के लिए होता है। वह भूख को समाप्त तो कर सकता है परन्तु आनंद और संतुष्टि नहीं दे सकता।
शाम को सरलता लाने के मकसद से मैं पिंकी के करीब आया था। वह माँ के बिस्तर पर ही विश्राम कर रही थी। मैंने उसे कहा, ' पिक्चर चलना है न ? उसने तुरंत तो उत्तर न दिया परन्तु मेरे दोबारा पूछने पर कहा, 'अब मन नहीं हो रहा .. थोड़ा सिरदर्द भी है ..आज नहीं, फिर कभी ..' मैंने उसे मनाने की कोशिश न की थी और न ही कुछ अधिक बोला था। मैंने केवल कहा, ' मैं समझ सकता हूँ.. काम का प्रेशर हो रहा है, तुम पर..आराम करो ..' वह बोली नहीं ऐसी कोई बात नहीं है .. चलो चलते हैं..बेलूर मठ जाने और बंगाली लंच का कार्यक्रम तो खत्म हो गया है.. अब बंगाली फिल्म का कार्यक्रम तो हो ही जाये.. चलो, मैं पांच मिनिट में तैयार हो जाती हूँ.. ' वह एक बार फिर से अपने स्वभाविक खुशमिज़ाज़ स्वरुप में थी। ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर )
Wednesday, February 17, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )- 59
टू स्टेट्स - एक नई कहानी
( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( ५९ ) दूसरे दिन जब हम सभी नाश्ते पर मिले तो माँ ने उस सेमिनार की बात फिर से छेड़ दी थी। उन्होंने मुझे कहा कि एक दिन का समय हाथ में था सो मुझे मनप्रीत को गाइड करना चाहिए। मैनें कहा कि उसे किसी मार्गदर्शन की आवश्यकता न थी। किंतु माँ ने कहा कि हमें मिलकर विषय का पुनर्पठन करना चाहिए। साथ ही कलकत्ता कार्पोरेशन और पश्चिम बंगाल के नियमों आदि के बारे में मुझे मनप्रीत को बताना चाहिए। मैंने पिंकी की ओर देखा तो ऐसा लगा कि वह माँ की बात से सहमत थी। मैंने कहा, ' ऊपर चलो, कुछ देख लेते हैं जो शायद कल तुम्हारे का आ जाये..' हम अपने कमरे में आ गए और मैं जहाँ तक संभव हो सका, उसे संभावित बातों और विषयों की जानकारी देता रहा था। पिंकी खुद में बहुत सुलझी हुई लड़की थी। वह किसी भी बात की पूरी जानकारी लेने में संकोच न कर रही थी। पूरा दिन उसी के साथ बीत गया था। दोपहर का खाना और शाम की चाय भी बिशाखा ऊपर ही दे गयी थी। देर से हम लोग, माँ के बुलाने पर पर नीचे आने लगे तो पिंकी ने कहा, ' एकाउंट्स पर आपकी जो पकड़ है, वह अद्भुत है..इतना सब ज्ञान कहाँ से प्राप्त किया ? उसकी प्रशंसा मुझे अच्छी लगी थी। मैंने कहा, ' तुम भी कुछ कम नहीं हो..कल तो तुम जीतकर ही आओगी.. मैं लिख कर दे सकता हूँ ..' माँ ने हम दोनों को हँसते हुए देखा तो कहा कि अब आराम करना चाहिए क्यों कि पूरा दिन हम विषय पर ही चर्चा करते रहे थे और मुझे इंटरव्यू में फ्रेश दिमाग के साथ जाना चाहिए। पिंकी ने कहा, ' हाँ, मम्मी जी, अब बस..जितना कुछ कर सकते थे कर लिया, अब बाबा का आशीर्वाद चाहिए .. ' बाबा का आशीर्वाद, यह सुन माँ ने पिंकी का माथा चूम लिया था। पिंकी ने तो अपने नानक बाबा का आशीर्वाद माँगा था किंतु माँ ने शायद इसे अपने लोक नाथ बाबा से जोड़ लिया था।
सुबह पिंकी उत्साह से भरी दिखी थी। उंसने कहा कि वह मुझे मेरे ऑफिस पर ड्राप कर इंटरव्यू के लिए निकल जाएगी। हम दोनों समय से तैयार थे। पिंकी अपनी पंजाबी पोशाक में, किसी को भी अभिभूत कर लेने की क्षमता में थी। एक चमक थी उसके चेहरे पर जो आत्मविश्वास को साफ दिखा रही थी। उसने माँ-बाबा के पाँव छुए तो कुछ बिना कुछ बोले ही उनके आशीर्वाद के स्वर झरते दिखे थे। बाबा ने अवश्य कहा, ' तुम को असफल करे, इतना साहस किसी में न होगा.. निश्चिंत होकर जाओ..' मैं भी जानता था कि वह निश्चय ही सफल होगी। मुझे मेरे ऑफिस के समीप उतार, वह मुस्कुरा कर कार से बाहर आयी और हमने एक-दूसरे को आलिंगन में लिया। मैंने कहा, ' आल द बेस्ट..' वह एक चुस्त-दुरुस्त एग्जीक्यूटिव की तरह, अपनी मारुती कार में आगे निकल गयी थी।
मैं ऑफिस में काफी समय तक उसके ही बारे में सोचता रहा था। फिर अपने काम में ऐसा व्यस्त हुआ कि दिन कब कट गया पता ही न चला। घर फोन किया तो बिशाखा ने बताया कि माँ-बाबा दोनों घर पर न थे और पिंकी अपने कमरे में थी। मैंने कहा, ' ठीक है.. कहना मैंने फोन किया था और मैं समय से घर पहुँच जाऊँगा..' जब मैं घर पहुंचा तो माँ-बाबा भी आ चुके थे। पिंकी उनके साथ हँसते-मुस्कुराते हुए बैठी थी। मैंने घर में घुसते ही उससे पूछा, 'कैसा रहा इंटरव्यू ? उसने मुंह बनाते हुए कहा, ' ठीक था..' उसका मुँह देख माँ-बाबा दोनों जोर से खिलखिला पड़े थे। बाबा ने कहा,' अरे ! हमारी बहू ने तो कमाल ही कर दिया है.. पूछो इससे .. ' मैंने पिंकी की ओर जिज्ञासा के साथ देखा। उसने कहा ,' ऐसा कुछ नहीं है..वे लोग मुझे कुछ एक्स्ट्रा कार्य देना चाहते हैं..मैंने अभी कुछ कहा नहीं है.. ' जब मैंने उससे विस्तार से बताने को कहा तो उसने बताया कि वे उसे फाइनेंस में केवल परियोजना का कार्य देना चाहते हैं लेकिन उसे साथ में कॉर्पोरेट वर्ग के विशेष अतिथियों के सत्कार विभाग की ज़िम्मेदारी दे रहे हैं। मैंने कहा कि यह तो बहुत अधिक कार्य हो जायेगा और उसे ना कर देना चाहिए। माँ ने कहा,' तुरंत निर्णय नहीं लेना चाहिए ..' मैंने कहा, ' सैलेरी एक और काम दो ? यह उचित नहीं होगा। पिंकी ने कहा कि ऐसी बात नहीं है.. फिर उसने प्रस्तावित सैलेरी के बारे में बताया तो मैं सकते में आ गया था। मेरा राष्ट्रीय कृत बैंक मुझे जो दे रहा था, यह राशि उससे चौगुनी से भी कुछ अधिक थी। अब मैं भी सोचने को विवश था। मैंने कहा, ' पिंकी, तुम पर है, जैसा तुम ठीक समझो..' काफी देर तक चर्चा चलती रही थी। पिंकी ने अपने मामाजी और पापा जी को भी बता दिया था और दोनों का मत था कि उसे यह जॉब जरूर स्वीकार करना चाहिए था। अंत में यही निश्चय हुआ कि अगले दिन पिंकी अपना स्वीकृति पत्र भिजवा देगी और नया कार्य आरम्भ कर देगी। जो प्रस्ताव पत्र उसे मिला था उसमें 'तत्काल प्रभाव से' लिखा था। इसका अर्थ था कि वह चाहे तो कभी भी दायित्व संभाल सकती थी। बाबा ने कहा कि उसे अपना पत्र तो कल भिजवा देना चाहिए और आगामी एक तारीख से ज्वाइन कर लेना चाहिए। पिंकी को भी यही ठीक लगा था। एक तारीख आने में कुछ ही दिन थे। माँ को भी यह बात ठीक लगी थी। उन्होंने कहा कि कल ही वह उसे लेकर एक आश्रम में जाएँगी और वहाँ पूजा-अर्चना करेंगी। पिंकी मुस्कुरा रही थी, उसने कहा, ' पर, मम्मी जी, कल सुबह पहले मैं आपको गुरुद्वारे लेकर जाऊँगी उसके बाद आपके आश्रम जायेंगे..' उसने मेरी ओर देखते हुए कहा, ' कल आप गुरुद्वारे में मत्था टेकते हुए, ऑफिस जाना..' मैंने हां में सिर हिलाया और कहा,' ठीक है..' माँ ने कहा कि मुझे भी साथ में आश्रम जाना चाहिए और एक दिन का अवकाश ले लेना चाहिए। मैंने कहा कि यह संभव नहीं था क्योंकि मुझे रोबी दा ने कुछ कार्य सौंपा हुआ था। अब यह निश्चय किया गया कि गुरुद्वारे से मैं ऑफिस चला जाऊँगा और वो दोनों घर आ जायेंगे और संध्या में उस आश्रम जायेंगे।
सब कार्य ठीक से होते चले गए थे। एक तारीख से पिंकी ने अपना कार्य संभाल लिया था। हम दोनों एक साथ घर से निकलते थे। वह मुझे ड्राप करते हुए आगे बढ़ जाती थी। एक दिन जब में ऑफिस के सामने कार से उतर रहा था तो सामने रोबी दा दिख गए थे। मैंने पिंकी को इशारे से कार से बाहर आ जाने का संकेत दिया। पिंकी ने उन्हें नमस्कार किया तो रोबी दा ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा, ' बहुत अच्छा लग रहा है, तुम दोनों को देखकर..अभिजीत ने मुझे सब कुछ बताया है.. एक साथ अपने अपने काम को निकलते हो..यह बहुत अच्छा है..पर हॉस्पिटलिटी इंडस्ट्री में शाम का लौटना ठीक नहीं होता.. बहुत ज़िम्मेदारी वाला काम होता है .. वर्ना इसे यहाँ से लेते हुए, एक साथ ही घर भी लौटते..' वह एक साँस में सब कह गए थे। पिंकी ने कहा, ' सर, अभी चलती हूँ..एक दिन आइये न हमारे घर..' वह कार स्टार्ट कर, तेजी से आगे निकल गयी थी। मैं और रोबी दा, अपने संगठन और देश की बिगड़ती स्थिति की बातें करते हुए, अपने कार्यालय की ओर बढ़ गए थे। शाम को पिंकी से बात हुई तो उसने कहा, ' ये तुम्हारे रवि साहब मुझे पसंद नहीं.. ऐसा लगता है... बहुत पेंचदार आदमी हैं...' मैंने कहा, ' नहीं, अच्छे आदमी हैं... मेरे नाना की बहुत इज्जत करते थे और अब माँ को भी बहुत मानते हैं... काफी रुआबदार हैं... राइटर्स बिल्डिंग में बहुत पहुँच है, उनकी...' ' हाँ, ऐसे ही लोगों की ऊपर तक पहुँच होती है... पर मुझे पसंद नहीं आ रहे, तुम्हारे ये रवि साहब...' पिंकी ने रूखे स्वर में मेरी बात का उत्तर दिया था।
( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर ... )
Friday, February 12, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 58
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( ५८ ) इन्द्राणी की बातों से मेरे उदास से मन को राहत सी मिली थी। उसने मुझे खाने का निमंत्रण दिया और कहा कि उसकी माँ ने आज घर में हम सब की प्रिय मछली बनायी थी। मैंने कहा कि आज नहीं, आज का डिनर तो मेरी ओर से। मैंने उसे बाहर चलने को कहा। मेरे दिमाग में आज के अख़बार में दिखा एक विज्ञापन घूम रहा था। वह पूछती जा रही थी कि कहाँ जा रहे थे परन्तु मैं खामोश था। जब हम लेक के पास उस रेस्टोरेंट के सामने पहुंचे तो वह हंसने लगी। उसने कहा, ' अरे ! इसके बारे में तो मैंने आज ही एक विज्ञापन देखा था और मैं सोच रही थी कि इसे आज़माया जायेगा.. अच्छा हुआ तुम यहाँ ले आये..' हम दोनों एक ओर कोने की सीट पर जा बैठे थे। यह नया रेस्टोरेंट था और इसका ही विज्ञापन देख ही मैं रुक गया था। अक्सर ऐसा होता है कि किसी छोटी सी बात पर हमारा मन रुक जाता है और कहीं न कहीं मन की किसी सतह पर वह हमें आकर्षित करता रहता है और अपनी ओर खींच ले आता है । मेरे साथ आज कुछ ऐसा ही हुआ था। जब से मैंने इस रेस्टोरेंट के बारे में देखा था, तब से यही लग रहा था कि इसे परखा जाये। कलकत्ता का प्रसिद्द चाइनीस रेस्टॉरेंट था जिसकी एक शाखा अब दक्षिणी कलकत्ता में खुली थी। हमने अपने पसंद के व्यंजनों का आर्डर दिया। इन्द्राणी ने कहा कि मनप्रीत भी साथ होती तो बहुत अच्छा होता। मैंने कहा, ' हाँ, ये बात तो ठीक है .. फिर कभी उसे लेकर आऊंगा.. परन्तु पता नहीं, पंजाबी लड़की को चाइनीस खाना पसंद आएगा या नहीं..हालाँकि कलकत्ता के चाइनीज़ खाने ने देश भर में अपनी पहचान बना ली है ..'
नए रेस्टोरेंट का इंटेरियर बहुत अच्छा था। हल्की ध्वनि में वाद्य संगीत चल रहा था। प्रकाश भी मद्धम था। इन्द्राणी ने आगे की ओर हथेलियों पर चेहरा टिकाते हुए कहा, ' अच्छा, अब बताओ, कैसा चल रहा है, वैवाहिक जीवन .. इतनी सुन्दर और गुणवान पत्नी पायी है, तुमने ..’ मैंने कहा, ' सब ठीक है..उसने नए घर में अच्छे से एडजस्ट कर लिया है..माँ की प्रिय बन गयी है, बाबा भी उससे प्रभावित हैं.. सब ठीक ही चल रहा है ..' इन्द्राणी ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि उसे भी ऐसा ही लग रहा था कि यह एक्टिव लड़की सबका मन मोह लेगी। मैंने कहा कि वह अपने को बहुत जगह व्यस्त करती जा रही थी और अब उसके एक अच्छे जॉब में लग जाने की भी उम्मीद थी और मेरे लिए यह चिंता की बात थी कि उस पर अधिक प्रेशर न बन जाये। इन्द्राणी ने हूँ ..कहा तो मैंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ' नए माहौल में इच्छा होती है, सबको प्रभावित करने की और हम जोश में सब को हां करते जाते हैं और बाद में संभालना कठिन हो जाता है..' इन्द्राणी ने कहा, ' अरे ! तुम तो शादी के बाद समझदार हो गए हो.. अगर तुम्हें लगता है कि वह इतना सब न संभाल पायेगी तो उसे सचेत करो.. परंतु, यह भी याद रखना कि कुछ लोगों की क्षमता, हमारी उम्मीद से अधिक होती है ..' हम बात करते जा रहे थे और चाइनीस व्यंजनों का आनंद भी ले रहे थे। मैंने कहा, ' यहाँ चाइना टाउन वाला स्वाद नहीं है ..पहला ही ओरिजिनल होता है ..बाद में खुलने वाली शाखाओं में सिर्फ नाम ही होता है ..' इन्द्राणी ने कहा, ' नहीं, ऐसी बात तो नहीं..मुझे तो अच्छा लग रहा है, यहाँ का खाना ..' फिर हँसते हुए कहा, ' तुम अपनी वाइफ के साथ नहीं आये हो न इसलिए तुम्हें स्वाद नहीं मिल रहा ..' मैं इस बात पर मुस्कुरा दिया और मैंने कहा, ' शायद यही बात है ..वैसे किसी भी बात को आप जैसे स्पष्ट कर देती हैं,उसका जवाब नहीं..इसीलिए तो आप इन्द्राणी दीदी हैं ..' इन्द्राणी ने मुँह बनाया, ' ख़बरदार जो फिर से दीदी कहना शुरू किया..हम एक उम्र हैं और दोस्त हैं .. '
खाना खा बाहर आये तो मैं खुद को काफी सहज महसूस कर रहा था। इन्द्राणी को उसके घर छोड़, मैं अपने घर पहुंचा तो पाया कि माँ और पिंकी भी आ चुकी थीं। मुझे देखते ही पिंकी दौड़ते हुए आयी और सरलता से कहने लगी, ' आज तो मज़ा ही आ गया ..सेमिनार बहुत अच्छा था.. बहुत कुछ नया जानने को मिला और मज़े की बात, ये सेमिनार उसी होटल में था जहाँ मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाया गया है.. मैं तो सब देख आयी हूँ..बहुत अच्छा है..ये सर्विस तो मैं नहीं छोडूँगी..मम्मी जी ने तो किसी से कहकर सैलेरी का भी अनुमान लगवा लिया है.. ' मैंने कहा ,' ये तो बहुत अच्छी बात है, पर मुझे बैठने तो दो..' फिर उसने व्यंग्य सा करते हुए कहा, ' हाँ - हाँ बहुत मेहनत-मजदूरी कर के आये हो, पहले चाय-पानी पियो, आराम कर लो, फिर बात करना ..' मैंने कहा, ' ऐसा नहीं है पर घर में घुसा हूँ बैठने तो दो..' माँ और वह दोनों हँसने लगी। माँ ने कहा, ' ये ऐसा ही है..इससे थोड़ी देर बाद बात करना..' बाद में माँ ने सारी बात विस्तार में बतायी। पिंकी इतनी उतावली हो रही थी कि वह मुझसे एकाउंट्स की कुछ किताबों के बारे में पूछने लगी थी। उसका कहना था कि वह आज रात से ही तैयारी शुरू कर देगी और मुख्य विषयों का पुनर्पठन कर लेगी। मैं समझ रहा था कि यह नौकरी वह पाकर ही छोड़ेगी। मैंने उसे धैर्य रखने को कहा पर उसका छात्र जैसा मन उसे उकसा रहा था। उसकी उत्सुकता देख, मैंने कुछ पुस्तकें उसे निकालकर दी। वह वहीं एक ओर बैठ, पन्ने पलटने लगी थी। मेरे बाबा जो इधर-उधर मंडरा रहे थे, उसकी जिज्ञासा को देख खुश हो रहे थे। उन्होंने पिंकी के सिर पर हाथ रखते हुए कहा था कि उसे यह जॉब मिलेगा ही और यदि न मिला तो यह उस होटल कंपनी का ही नुकसान होगा क्योंकि वे एक प्रतिभाशाली कर्मचारी को खो देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के इस बड़े होटल उद्योग के लिए प्रतिभा का ही महत्व है। पिंकी ने अपनी प्रशंसा सुनी तो कहा, ' डैडी जी, आपका और मेरे नानक बाबा का आशीर्वाद रहे तो सफलता मिलेगी ही..' मैंने कहा कुछ नहीं, किन्तु मन में सोचा कि इतनी सुन्दर और आकर्षक प्रतिभा को तो सब जगह ही सफलता मिलेगी। यदि मैं इस पद के लिए जाऊँ तो अस्वीकार कर दिया जाऊँगा। अपने मन की बात को मैंने कुछ इस तरह से निकाला, ' अरे, तुम स्मार्ट हो, अट्रैक्टिव हो, तुम्हारा चयन होकर ही रहेगा.. होटल,आतिथ्य-सत्कार का उद्योग है, यहाँ यह सब पहले देखा जाता है.. डिग्रियाँ बाद में देखी जाती हैं ..' पिंकी ने मेरी बात सुनी तो कहा, ' पर मेरे पास तो अच्छी ख़ासी डिग्री भी है..' बाबा ने उसका साथ देते हुए कहा, ' और अनुभव भी.. चाहे एक-दो साल का ही हो.. ' माँ ने अचानक मुझसे खाने के बारे में पूछा, ' खाना खाओगे? हम दोनों तो वहीं से खाकर आये हैं.. सेमिनार के बाद डिनर भी था..' मैंने कहा कि मैं भी खा चुका हूँ ..' पिंकी ने सुना तो कहा, ' अरे कहाँ ? मैंने कहा, ' तुम फाइव स्टार में खाकर आयी हो तो हम भी कहीं अच्छा ही खाकर आये होंगे..' उसने जिद्द सी करते हुए कहा, ' बताओ न कहाँ से खाकर आये हो ? तो मैंने कहा कि इन्द्राणी ने खिला दिया था। उसने मुस्कुराते हुए कहा, ' अच्छा जी ..अकेले अकेले हो आये उनके घर ..' मैं और इन्द्राणी चाइनीस रेस्टोरेंट में खाने गए थे, ये बात मैं न जाने क्यों दबा गया था। क्या कोई चोर था, मेरे भीतर?
( आज बस, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर ...)
Wednesday, February 3, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 57
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( ५७ ) समय आगे बढ़ते चला जा रहा था और साथ ही मेरे मन से वैवाहिक जीवन की गुलाबी रोमांटिकता को फीका भी कर रहा था। मैं यह परिवर्तन महसूस कर पा रहा था। परन्तु लगता कि यह समय से पहले हो रहा था। पिंकी हमेशा की तरह उत्साहित ही थी। वह तो दिन दिन व्यस्त होती जा रही थी। माँ के महिला आयोग वाले कामों में हाथ बटा रही थी। माँ को भी उसका साथ और सहयोग अच्छा लगता था। माँ ने उसे रबिन्द्र संगीत की शिक्षिका से मिलवा दिया था। यह शिक्षिका माँ की पुरानी परिचित थी और पिंकी जैसी सुन्दर और गैर-बंगाली लड़की को अपनी छात्रा के रूप में पा बहुत प्रसन्न थी। पहले दिन मैं ही पिंकी को लेकर उनके पास गया था। पिंकी की गायन क्षमता जानने के लिए जब उन्होंने उसे कुछ गाने के लिए कहा तो पिंकी ने एक पंजाबी भजन सुनाया था। मैं गुरुद्वारे में इस भजन को सुन चुका था। वह शिक्षिका जिन्हें मैं मानसी मासी के नाम से जानता था, बहुत प्रभावित हुई थी। उन्होंने कहा था कि मनप्रीत को रविंद्र संगीत सीखने में अधिक कष्ट न होगा। केवल शब्दों के उच्चारण पकड़ने होंगे। यह तय हुआ था कि सप्ताह में दो दिन वह उनके पास जाया करेगी। घर आकर जब माँ को यह बताया तो वह भी कहने लगी कि उन्हें पूरा विश्वास था कि मनप्रीत इस नए संगीत में दक्षता पा लेगी। उन्होंने मेरी ओर देखते हुए हंसकर कहा, ' तुम भी तो रविंद्र संगीत गाते हो और अच्छा गाते हो, अब दोनों में प्रतिस्पर्धा होगी ..' मैं तो चुप था बस हल्का सा मुस्कुरा दिया था परन्तु पिंकी ने तुरंत प्रतिक्रिया दी थी। उसने कहा, ' मैंने इनका गाना सुना है मम्मी जी, इनके जैसा अच्छा तो मैं कभी न गा पाऊँगी ..'
हम तीनों की बातचीत चल ही रही थी कि बिशाखा एक लिफाफा मेरे हाथ में दे गयी। उसने कहा कि लेटर बॉक्स में था। मैंने देखा तो पाया कि वह मनप्रीत कौर रॉय के नाम का था। मैंने उसे पकड़ाते हुए कहा, ' यह तुम्हारा है ..' वह हैरान रह गयी थी और उसने कहा, ' वाह, कलकत्ता के पते पर मेरा पहला लेटर ..' उसने जब खोलकर पढ़ा तो मेरी ओर देख बोली, ' अरे ! यहाँ तो काम बहुत फ़ास्ट होता है..वो जो अप्लाई किया था, उनका जवाब आ गया है ..' उसने पत्र मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने पढ़ा तो सब समझ आ गया। उसने कलकत्ता के बहुत बड़े और नामी होटल में एकाउंट्स हेड के पद के लिए आवेदन किया था, उसे मिलने के लिए बुलाया गया था। बाबा भी यह सब सुनकर वहां आ गए थे। मैंने कहा, ' पिंकी का इंटरव्यू कॉल आया है ..' बाबा ने पत्र लिया और पढ़ने लगे। उन्होंने कहा कि यह कोई औपचारिक इंटरव्यू लेटर नहीं लगता, सैलरी आदि की बात करना चाहते हैं.. शायद मनप्रीत का सिलेक्शन उन्होंने कर लिया है..' मुझे भी अब ऐसा ही लगा था। मैंने कहा, ' जरूर किसी सरदार जी के हाथ में चयन का अधिकार होगा, मनप्रीत कौर नाम देखकर बुला रहे होंगे वर्ना ऐसा थोड़े ही होता है..' पिंकी ने भी हँसते हुए बात को लिया, ' अच्छा, आपके यहाँ कैंडिडेट का सिलेक्शन नाम से कर लेते हैं.. सी वी वग़ैहरा नहीं देखते ? मैंने मुस्कुराते बात को टाल दिया और कहा, ' दो दिन बात बुलाया है..मैं तुम्हारे साथ चलूँगा.. ' पिंकी फिर एक बार हँसी, ' अच्छा, क्या मेरा स्कूल का एडमिशन है जो गार्डियन बनकर साथ जाओगे.. मैं खुद चली जाऊँगी.. अब तो मेरे पास अपनी कार भी है..' उसकी इस बात पर मुझे थोड़ी बौखलाहट हुई थी। मैंने कहा,' इधर फाइव स्टार होटल में नौकरी करोगी, उधर संगीत की क्लास और फिर माँ के साथ महिला आयोग का काम भी.. इतना सब कर पाओगी..' उसने चुटकी लेते हुए कहा, ' चिंता मत करो.. हम पंजाब के हैं..काम से घबराते नहीं हैं..' अब तो मैं चिढ़ ही गया था। मैंने कहा, ' ये पंजाब-बंगाल क्या है ? मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था..बड़े होटल के एकाउंट्स को संभालना, काफी मेहनत का काम होगा.. काफी समय देना पड़ेगा..तुम्हें लगता है कर लोगी, तो ठीक है.. मुझे क्या..' अब माँ ने कहा कि वहां मिलकर आओ और देखो क्या दे रहे हैं, सैलरी ठीक होनी चाहिए। बाबा को इन सब विषयों का अधिक अनुभव था। उन्होंने कहा कि ऐसी कंपनियों में सैलरी आड़े नहीं आती, यदि कैंडिडेट पसंद है तो वे लोग अच्छी सैलरी ही देते हैं। मैं चुप था। कुछ समय बाद मैंने पिंकी से गंभीर होते हुए कहा कि डाक्यूमेंट्स वगैरह ठीक से रख लेना।
माँ का इधर-उधर आना-जाना इन दिनों बढ़ गया था। उन्होंने कहा कि शाम को किसी सेमिनार में जाना था। उन्होंने सेमिनार का कार्ड पिंकी को देते हुए कहा, ' मनप्रीत, चलोगी ? पिंकी ने कार्ड को सरसरी रूप में देखा और कहा, ' हाँ, मम्मी जी, क्यों नहीं, ये सेमिनार तो स्टेट्समैन वालों का है, अच्छा ही होगा ..' शाम को समय से माँ और पिंकी निकल गए थे। मैं अपने ख्यालों में उलझा हुआ, सुबह का और अब तक बासी हो चुका अख़बार एक बार फिर से कुतरने लग गया था। मेरी दृष्टि समाचारों से अलग स्थानीय विज्ञापनों पर घूम रही थी। अख़बार में छपी जिन बातों को हम अक्सर नज़रअंदाज़ करते रहते हैं, वे सब ऐसे उदास क्षणों में सामने आ जाती हैं। अक्सर बहुत कुछ हमारे आसपास होता रहता है और हम अपरिचित रहते हैं। मैंने देखा, एक जाने माने चाइनीस रेस्टोरेंट की हमारे इलाके में ब्रांच खुल चुकी थी। मुझे तो पता ही न था। यूँ ही खुद से उलझते मैं नीचे उतर आया और अपने चिरपरिचित अंदाज़ में कोने वाली पान की दुकान पर एक ओर को टिक सामने दौड़ती-भागती सड़क को देखता रहा। वह दुकान वाला अच्छे से मुझे जानता था। उसने अपनी ओर से मेरी तरफ सिगरेट बढ़ा दी। फिर उसने कहा कि भाभी बहुत होशियार हैं और क्या आत्मविश्वास के साथ कार चलाती हैं और उसकी दुकान के सामने से तेजी से कार में निकल जाती हैं। मैंने उसकी बातों का जवाब न दिया था और आगे बढ़ गया था।
मैं सिगरेट के कश लगाते हुए, बिना गंतव्य सोचे, चला जा रहा था। फिर मैंने खुद को अपनी बुआ के घर के सामने पाया। शायद भीतर कहीं मेरा मन यहीं आना चाहता था। मैंने डोर बेल बजायी तो बुआ ने ही दरवाज़ा खोला था। वह मेरे दायें बायें देखने लगी। उन्होंने कहा, ' बहू कहाँ है ? मैंने कहा, ' पिशी, वो माँ के साथ किसी काम पर गयी है..मैं घर में अकेला था तो आपसे मिलने चला आया.. ' उन्होंने कहा कि मैंने ठीक किया था और अपनी पिशी से मिलने आया था। उन्होंने मुझे स्नेह से बिठाया और घर का हालचाल पूछने लगी। मैंने पूछा, ' इन्द्राणी घर पर नहीं है ? उन्होंने कहा कि इन्द्राणी ऊपर अपने कमरे में थी और स्कूल का काम कर रही थी। मैं ऊपर चला गया। इन्द्राणी भी मुझे अचानक देख हैरान हो गयी थी। उसे भी मुझे बताना पड़ा कि क्यों मैं अकेला आया था। कुछ इधर-उधर की बातें हुई और उसने चुटकी लेते हुए पूछा, ' और वैवाहिक जीवन कैसा चल रहा है ? मैंने कहा कि सब ठीक था और पिंकी सबकी चहेती बनती जा रही थी। जब बातें और आगे बढ़ी तो छिपता हुआ मेरा मन सामने निकल आया। मैंने कहा, ' अब तो यह मान ही लेना होगा कि हम, दो भिन्न स्टेट्स के संस्कारों और परम्पराओं से जुड़े हैं, समायोजित होने में समय तो लगेगा ही..' इन्द्राणी के लिए इतनी सी बात का इशारा काफी था। उसने कहा कि वह समझ सकती थी। यह सांस्कृतिक अंतर स्वाभाविक था। ( आज यहीं तक, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर ..)
Wednesday, January 27, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -56
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
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( हफ्ते वार इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे .. )
( ५६ ) उस समय पिंकी ने मुझे इशारे से कहा था कि वह मम्मी जी को बाद में समझा देगी। जब वह मुझे एकांत में मिली तो परेशान सी दिखी थी। उसने कहा कि ये क्या बात हुई कि हम जवान लोग ड्राइविंग का आनंद न लें और ड्राइवर रखें ? मैंने उसे माँ की मंशा समझाने की कोशिश की थी कि कलकत्ता का ट्रैफिक बहुत भयंकर था और यहाँ खुद से गाड़ी चलाना सरल न था। परन्तु मेरी बात से वह संतुष्ट न हुई थी। उसका कहना था कि यदि कोई अन्य व्यक्ति ड्राइवर के नाम पर, गाड़ी चला सकता है तो हम क्यों नहीं ? मैं उसे समझाने की कोशिश करता रहा और अंत में विषय पर विराम लगाने के मकसद से यही कहा कि यह कलकत्ता था और यहाँ की बातें उसे धीरे-धीरे समझ में आयेंगी। वह हंसने लगी और उसने कहा, ' आप अंत में इसी बात पर आ जाते हो कि यह कलकत्ता है..पर इस विषय को मैं, धीरे-धीरे नहीं, तुरंत समझना चाहूँगी.. कार आने दो, जिस दिन आएगी, उसी दिन मम्मी जी को घूमाकर लाऊँगी.. तुम भी साथ में बैठना.. उन्हें महसूस होना चाहिए कि ड्राइविंग का आनंद क्या होता है ..' ऐसा ही हुआ था। कुछ ही दिनों में मामाजी ने अपने ड्राइवर के साथ कार भिजवा दी थी। ड्राइवर कार हमें दे, अगली संध्या की कालका मेल ट्रैन से लौट गया था। एक दिन बाद ही पिंकी ने कार में कहीं घूम आने की बात उठाई थी। उसका आग्रह किसी शिशु-जिद्द की तरह था। मैं, बाबा और माँ भी उत्साहित हो, उसके साथ कार में बैठ लिए थे। उसने मुझसे गाइड बनने की बात कही थी । कुछ ठीक न था कि कहाँ जाएं, किधर से होते हुए जाएं ? हम लोग पार्क स्ट्रीट से होते हुए धर्मतला, डलहौजी से ईडन गार्डन, फोर्ट विलियम और विक्टोरिया मेमोरियल का चक्कर लगा कर लौटे। पथ में हम लोगों ने एक लोकप्रिय चाय के स्टाल पर रुक, मसाले वाली चाय भी पी थी। हम सब के लिए यह एक अनूठा अनुभव था। बाबा तो बहुत ही आनन्दित थे। हमारे घर के एक और छोटा सा मंदिर है। इसके आसपास एक बस्ती है। यहाँ रहने वाले लोग इस मंदिर में आये दिन पूजा-पाठ करते रहते हैं और इन आयोजनों के लिए चंदा वसूलते रहते हैं। उन्होंने जब पिंकी को ड्राइवर की सीट से निकलते हुए देखा तो पास आकर, माँ से कुछ बख्शीश मांगने लगे थे। उनकी बात में प्रार्थना या आग्रह नहीं, बल्कि एक तरह के दबाव का भाव था। मानों कह रहे हों, ' अमीर बहू घर आयी है, हमारा भी कुछ बनता है ..'
मैं लिखता तो जा रहा हूँ पर कभी रुक कर सोचता हूँ कि ऐसा क्यों है कि मुझे सब वृतांत स्पष्ट रूप से कैसे याद हैं ? खुद से बात करता हूँ तो पूछता हूँ, ' अभिजीत, तुम्हारी ज़िंदगी तो ठीक ही चल रही थी फिर ऐसा हो गया कि तुम खुद को दोषी मान बैठे ? इस पृथ्वी पर जो भी आया है वह अपने हिस्से के दोष का भागीदार बनने को विवश है। सभी भीड़ का अंग बनकर आगे बढ़ते जा रहे हैं, एक गहरी अंधी खाई में खुद को समाप्त करने के लिए। खाई में खुद को जब तक झोंक न दें तब तक, न जाने कितने मुखोटे पहनते, उतारते और फेंकते चले जाते हैं। कभी नियति, कभी दायित्व, कभी तहजीब, कभी यह, कभी वो, न जाने कौन कौन सी मज़बूरियां हैं जो हमें असत्य के साथ बांधें रखती हैं। सब के साथ तुम भी तो इसी चक्र का हिस्सा हो। तुम ही क्यों रुक बैठे, सत्य का प्रण ले ? जब भी मेरे स्मृति-प्रवाह में इस तरह की लहर उठ आती हैं तो मैं ठहर जाता हूँ और खुद को प्रोत्साहित करने का प्रयास करता हूँ कि मुझे मन की इन अपरिचित लहरों ने ही तो आज तक पराजित किया था। ये दुबकी सी छिपी रहती हैं मेरे भीतर और न जाने क्यों कभी कभी उठ आती हैं, मुझे फिर एक बार भ्रमित और शंकित करने के लिए। परन्तु मैं तो निश्चय कर चुका हूँ खुद से ही युद्ध करने का। मैं पराजय में ही अपनी जय देखता हूँ।
हम दोनों के दिन बीत रहे थे। मैं कभी उत्साहित हो जाता था और कभी निष्पक्ष हो, एक ओर हाशिये पर आ जाता था। पिंकी सदैव उत्साहित थी। वह हर ओर अपना प्रभामंडल फैलाती जा रही थी। पिंकी ने माँ और बाबा के साथ साथ बिशाखा को भी प्रभावित कर लिया था। मार्निंग वाक वाले दल में वह प्रिय बन चुकी थी। अब तो खिलखिलाते हुए उसने बांग्ला शब्दों का प्रयोग शुरू कर दिया था। एक दिन ऑफिस से लौटने पर मैंने उसे माँ के साथ रबिन्द्र संगीत दोहराते हुए देखा था तो हैरान रह गया था। मैंने उसे कहा था कि वह तो बहुत अच्छा गा रही थी। वह खुश थी और चाहती थी कि वह किसी से यह संगीत भली भांति सीखे। माँ को उसका प्रस्ताव अच्छा लगा था और उन्होंने उससे तभी आश्वस्त कर दिया था कि वह इसकी व्यवस्था करवा देंगी। इस बीच पिंकी के मामाजी कलकत्ता दो तीन दिन के लिए आये थे। मुझे लगा था कि उनके प्रति मेरा एक दायित्व है। मैं उनका परिचय अपने कलकत्ता और बंगाल से करवाना चाहता था। मैं वह सब कुछ उन्हें दिखाना चाहता था जिसमें इतिहास था, कला थी और संस्कृति थी। परन्तु उनका प्रभाव कुछ ऐसा था कि वह ही मुझे और अपनी बेटी जैसी भांजी को हमारे नगर का वह रूप दिखाते रहे जिससे अब तक, मैं ही अपरिचित था। कुछ अवसरों पर इन्द्राणी भी हमारे साथ थी। पिंकी ने ही उसे साथ ले लेने का सुझाव दिया था। कभी पांच सितारा होटल में खाना-पीना, कभी नामी क्लब में शाम, कभी खास रेस्टोर में लंच। पिंकी बहुत खुश थी और यह स्वाभाविक भी था। इन्द्राणी, मामाजी की शानोशौकत से प्रभावित थी। वह मुझे कई बार कह चुकी थी कि मैंने क्या तकदीर पाई थी। इन दिनों में मैंने पाया कि ज़िंदगी में बेफिक्री क्या होती है ? बिना मोलतोल के कुछ भी खरीद लेना, कैसा सुख देता है। ये पसंद है, ले लो, ये माँ के लिए ले लो,ये इसके लिए, वो उसके लिए। घर पर जो है, पुराना और अप्रचलित है उसे फेंक, ये नया ले लो। यही सब चलता रहा था। मैं सबके साथ मुस्कुराते हुए घूम-फिर तो रहा था किंतु भीतर ही भीतर उदास और नाराज़ था। मैंने मामाजी से कलकत्ता की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक मार्किट देखने को कहा तो वह अपनी घड़ी देख, समय का हिसाब लगाने लगे थे। फिर एक अवसर पर मैंने उन्हें टैगोर का पुस्तैनी घर दिखाने की बात की तो वह अगली बार कह कर टाल गए थे।
पिंकी चंडीगढ़ वाली नौकरी पर त्यागपत्र दे आयी थी। उसने मुझे जब यह बताया था तो मैंने ओके-गुड तो अवश्य कहा था परन्तु मुझे इसमें एक भूल दिख रही थी। उसे यह निर्णय लेने से पहले मुझसे बात कर लेनी चाहिए थी। पिंकी ने कहा था कि वह कलकत्ता में ही कोई नौकरी ढूंढ लेगी। वह यह भी चाहती थी कि मैं भी किसी नई और भविष्य चमकाने वाली कंपनी में प्रयास करूँ। उसके अनुसार मैंने सी ए में उच्च पच्चीस में स्थान में पाया था तो मुझे इस बैंक की नौकरी से संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए था। मैंने जब उससे कहा कि इसके लिए मुझे कलकत्ता से बाहर जाना होगा तो उसने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, ' सो व्हाट .. ' मैं उससे मन की बात न कह पाया था बस अपना घर और माता-पिता का हवाला देकर विषय को टाल गया था। वास्तविकता यह थी कि मैं समझता था कि मुंबई, बंगलौर या किसी अन्य शहर में, खुश न रह पाऊँगा और अपनी बंगाली मानसिकता के साथ, अकेला जीवन बिताने को विवश हो जाऊँगा।
( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर.. )
Wednesday, January 20, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -55
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
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( हफ्ते वार इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे .. )
( ५५ ) चाय पी कर मीटिंग वाले सभागार में वापिस लौटा तो कुछ हलचल दिखाई दी थी। एक बजुर्ग नेता पहुँच चुके थे और सामने रखी कुर्सी पर बैठे हुए थे। किसी ने उनके सामने माइक रखा तो उन्होंने कहा कि कुछ ही लोग हैं और माइक के बिना भी काम चल जायेगा और उन्हें इसकी आवश्यकता न थी। उन्होंने सम्बोधित करते हुए जानकारी दी कि अचानक मौसम के ख़राब हो जाने के कारण मीटिंग में सभी लोगों के न पहुँच पाने की संभावना थी। फिर उन्होंने दो नाम लिए और दोनों के लिए दा शब्द का प्रयोग किया था। स्पष्ट था कि वे दोनों वरिष्ठजन थे। उन्होंने सूचित किया कि उन दोनों की ओर से, मीटिंग में न आ पाने की सूचना आ चुकी थी। इसके बाद उन्होंने न जाने क्या-क्या बातें की थी। मुझे जो समझ आया वह सार यह था कि बहुत कठिन समय आने वाला था और संगठन को मजबूत करने की आवश्यकता थी। रोबी दा भी ऑफिस में अपने सहयोगियों के साथ बैठ, जब भी बातें किया करते थे तो इसी तरह का स्वर सुनाई देता था। अचानक उन्होंने मुझे सामने आने का संकेत दिया। रोबी दा की ओर से मेरा परिचय देते हुए उन्होंने कहा था कि उन्हें गर्व था कि एक नामी परिवार का सदस्य वहां बैठक में आया था। उन्होंने यह भी कहा कि सी ए की डिग्री होने के बावजूद भी मैंने संगठन को मजबूत बनाने के लिए हाथ बटाया था। उनका मानना था कि मुझ जैसे नवयुवकों को आगे आना चाहिए था। मुझे उनकी बातें अच्छी लग रही थी। कोई भी व्यवस्था युवाजन के बिना आगे नहीं बढ़ सकती, वह ठीक ही तो कह रहे थे। उन्होंने अंत में मेरे नाना के देश के स्वतंत्रता आंदोलन में विशिष्ट योगदान का भी जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि उन जैसे देशभक्तों के कारण ही देश ने अग्रेजों के शासन से आज़ादी पायी थी।
इस मीटिंग में भी प्लास्टिक के कप में चाय दी गयी थी। यह एक छोटी सी बात थी परन्तु अब मुझे ऐसा लगता था कि ये छोटी-छोटी बातें ही हमारे व्यवहार और कर्म के प्रति हमारी मानसिकता को तय करते हैं। क्या मुझ पर यह चंडीगढ़ प्रवास का असर था ? मीटिंग समाप्त होने पर बाहर निकला तो ये लगता रहा था कि रोबी दा जिसे अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण मीटिंग कह रहे थे, उसमें ऐसा क्या था ? मेरे दिमाग ने प्रश्न तो उठाया था परन्तु मेरे मन ने तुरंत एक बहाना जैसा उत्तर भी दे दिया था, 'शायद, मौसम के ख़राब हो जाने के कारण मीटिंग अधूरी सी रह गयी थी..' अब मुझे घर वापिस पहुँचने की फ़िक्र थी। तेज वर्षा के कारण यातायात व्यवस्था लगभग टूट चुकी थी। मैं किसी तरह कलकत्ता के केंद्र बिंदु डलहौजी स्क्वायर पहुंचा था। वहां से मेरे घर की ओर जाने वाली बहुत सी बस उपलब्ध रहती हैं। घर पहुंचा तो मेरी दुर्दशा दर्शनीय हो चुकी थी। पिंकी ने देखा तो परेशान हो गयी थी। उसने जल्दी से कपड़े बदलने को कहा। माँ मेरे प्रति उसकी बेचैनी को देख संतुष्ट हो रही थी। पिंकी ने कहा कि ऐसे मौसम में इतनी दूर जाने की क्या आवश्यकता थी ? वह दो बातों से हैरान थी। एक तो यह कि मैं अपना नया वाला मोबाइल साथ क्यों नहीं ले गया था और दूसरे, इस ख़राब मौसम में, मैंने टैक्सी क्यों न ली थी ? मैं उसे क्या समझाता ? बस इतना कहा कि मोबाइल ले जाना याद न रहा था और उस इलाके में वापसी के लिए टैक्सी मिली ही नहीं थी। मैं जानता था ये दोनों बातें असत्य थी। मोबाइल के लिए मैं चिंतित था कि बारिश के कारण वह ख़राब हो सकता था, इसलिए न ले गया था और टैक्सी के लिए मैंने प्रयास ही नहीं किया था क्यों कि ऐसे मौसम में कलकत्ता के टैक्सीवाले अपनी मनमानी करते हैं और दुगना-तिगुना किराया वसूलते हैं। पर इस चंडीगढ़ की लड़की को क्या-क्या बताता ? कभी कभी थोड़ा-बहुत झूठ बोलना आवश्यक हो जाता है। किसी बात को अपने हिसाब से, झूठ के सहारे, कैसे नया रंग दिया जा सकता है, यह कला, न जाने मैंने किससे सीखी थी ? कहा जाता है कि हम अपने माता-पिता का कुछ अंश स्वाभाविक रूप से पा जाते हैं। यह अंश जीवन के उतार-चढ़ाव के बीच छिपा और दबा सा रहता है परन्तु परिस्थिति विशेष में उभर कर सामने आ जाता है। उस क्षण जो हमारे माता-पिता के समकालीन होते हैं वे बरबस कह उठते हैं, 'अरे ! ऐसा तो तेरी माँ किया करती थी.. या, यह तो एकदम अपने पिता की तरह कर रहा है..' हमारे माँ-बाप हमारे भीतर ही समाये होते हैं, हमेशा के लिए। उस दिन जब मैंने छोटी सी घटना को नया रूप दिया था तो कभी कहीं पढ़ा या सुना, यह तथ्य याद गया था। मैं सोचने लगा था कि यह गुण मुझे माँ से मिला था या पिता से ?
पिंकी मेरी दशा देख परेशान तो थी परन्तु उसने मुझे सहज करने के लिए, हँसते हुए कहा, ' यह मौसम तो गरमागर्म पकोड़े और चाय-काफी का है.. अभी बनाती हूँ.. ' उसने इशारे से बिशाखा को बुलाया। मैं फ्रेश हो चुका था और माँ के पास आकर बैठ गया था। कुछ ही समय में पिंकी एक बड़ी प्लेट में पकोड़े लेकर आ गयी थी। उसने हँसते हुए कहा, ' ये हैं हमारे पंजाबी पकोड़े .. आज केवल प्याज और आलू के ही हैं ..फिर किसी दिन गोभी, पनीर, बैगन और अण्डों के पकोड़े भी खिलाऊँगी .. ' फिर उसने मेरी ओर देखते हुए कहा, ' लगता है यहाँ काफी के शौकीन नहीं हैं..आज चाय ही सही परन्तु अब से इस घर में चाय के साथ साथ कॉफी का ऑप्शन भी रहा करेगा..' मैंने अपने बाबा की ओर देखा। वह बहुत आनंदित दिख रहे थे। चाय-पकोड़ों का आनंद लेते हुए न जाने क्यों मैंने पिंकी के मामाजी से कार लेने वाली बात उठा दी, ' तुमने मामाजी से बात की क्या ? पिंकी ने बताया कि उसने नहीं की थी क्यों कि मैं स्वयं ही तो इसके पक्ष में न था। पिंकी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ' आज देखा, कितनी असुविधा हुई.. टैक्सी नहीं मिली.. और मामाजी की वो मारूति तो ऐसे ही बेकार खड़ी है..मेरे ख्याल में तो ले लेनी चाहिए..' इस बार मैंने कुछ न कहा परन्तु मेरी ख़ामोशी वह समझ गयी और उसने कहा, ' मैं आज ही मामाजी बात करती हूँ..'
उसने रात में अपने मामाजी से बात की और जैसा अनुमान था, मामाजी तुरंत राजी हो गये। उन्होंने हँसते हुए कहा, ' चलो, अच्छा है, इस मारुती रानी को कलकत्ता की सड़कों पर घूमने-घामने का मौका मिलेगा..यहाँ तो बेचारी घर में बंद रहती है..' मामाजी ने मुझसे भी बात की थी और मुझे मारुती कार के कई गुण समझाए थे। उन्होंने यह भी कहा कि वह कार भिजवाने की व्यवस्था करवा देंगे और कुछ ही दिनों में यह कार पहुँच जाएगी। मैं रोमांचित हो रहा था। मैंने मन ही मन सोचा कि मुझे अब ड्राइविंग क्लास लेनी होंगीं। एक ऐसा स्कूल तो हमारे घर से बाहर निकलकर ही मुख्य सड़क पर लगभग सौ मीटर की दूरी पर ही है। उसके बहुत से पोस्टर और गाड़ियां मैं अक्सर देखा करता था। उस समय मुझे उसी ड्राइविंग स्कूल का ख्याल आया था। मैंने पिंकी को बताया तो वह हंसने लगी थी। उसने कहा, ' गाड़ी आयी नहीं और ड्राइविंग स्कूल पहले ही आ गया..अच्छा है, जब तक गाड़ी कलकत्ता आये, ड्राइविंग सीख लोगे..कल से ही ज्वाइन कर लो..सुबह बहुत समय होता है.. मैं जॉगिंग पर जाऊँगी और आप ड्राइविंग पर ..' मैं उसे क्या कहता, उसका उत्साह देखता रह गया था। पिंकी ने कहा कि कल सुबह मैं उसके साथ चलूँ और इस ड्राइविंग वाले मामले को तय कर आएं। मैंने जब कहा कि यह सब इतनी जल्दी नहीं होता और माँ-बाबा से बात करनी होगी तो वह मेरा मुँह ताकती रह गयी थी। उसने मुस्कुराते हुए कहा, ' बड़ों की सलाह लेना अच्छी बात है परन्तु कार और ड्राइविंग जैसे मामलों में आत्मनिर्भर होना चाहिए.. वर्ना ड्राइविंग करोगे कैसे ..' मैंने कहा, ' ठीक है ..कल जब ड्राइविंग स्कूल ज्वाइन कर लूंगा तो आकर माँ को बता दूंगा..'
सुबह पिंकी ने मुझे समय से जगा दिया था। वह पूरी तैयारी में थी। मैं आज नहीं कल करता रह गया था परन्तु वह मुझे तैयार करा नीचे लेकर आ गयी थी। वह आजकल अपनी मारवाड़ी भाभी के साथ लेक तक जाती थी। कुछ ही समय में वह लोग अपनी कार लेकर आ गए। उन्होंने गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया। मुझे देख वे हंसने लगे और भाभी ने मुझसे कहा, ' अच्छा है, भाई साहब आप भी सुबह की सैर पर आने लगे ..' पिंकी ने उन्हें पूरी बात बताई। यह लेक कलकत्ता की बहुत सुन्दर लेक है। कहा जाता है कि इसकी परिकल्पना नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने की थी। यहाँ सुबह का नज़ारा देखने योग्य था। इतने लोग, दूर-दूर तक लगी गाड़ियां और इतनी चहल-पहल। मैं सबके साथ खामोश सा लेक के इस छोर से उस छोर तक चलता रहा था। मुझे अच्छा लग रहा था। एक घंटे के बाद जब हम लोग लौटने को हुए तो उन भाई साहब ने एक ड्राइविंग स्कूल की गाड़ी को देख कहा, ' आइये, आपका काम यहीं करवा देते हैं..' हम उस गाड़ी के पास पहुंचे। उन्होंने ही ड्राइवर और प्रशिक्षक से बात की। वह स्वयं ही स्कूल का कर्ता-धर्ता भी था। यह तय हुआ कि अगले दिन से इसी समय वह मुझे ट्रेनिंग देगा। हम सब एक साथ आएंगे। एक घंटा पिंकी और वे लोग सैर करेंगे और मैं अपनी ड्राइविंग क्लास। उसने एक फॉर्म पर वहीं मेरे हस्ताक्षर लिए और कहा कि मैं कल एक फोटो और फीस जमा कर दे दूँ। सब कुछ बहुत सरलता से हो गया था। मुझे उसी क्षण से लगने लगा था कि मैं अब अपनी कार चला सकता था और पिंकी को बगल में बिठा दूर तक जा सकता था।
घर पहुंचे तो माँ ने हँसते हुए स्वागत किया। उन्होंने पिंकी का हाथ पकड़ कहा, ' मनप्रीत, यह बहुत अच्छा काम किया जो अभिजीत को सुबह उठा, सैर पर ले गयी..वह कुछ कहती इससे पहले ही मैंने ड्राइविंग सीखने वाली बात बताई। उनकी प्रतिक्रिया वैसी ही थी जैसी मैंने आशा की थी। उन्होंने इसे खारिज़ करते हुए, बाबा को बुलाया और कहा, ' ये लोग कलकत्ता जैसे सड़कों पर खुद कार चलाएंगे ? ये खतरनाक काम नहीं होगा.. ड्राइवर रखो..देखते नहीं कितने एक्सीडेंट होते हैं, यहाँ.. ' हम दोनो शांत थे।
Wednesday, January 13, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 54
टू स्टेट्स - एक नई कहानी
( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
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( हफ्ते वार इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे .. )
( ५४ ) उस राजस्थानी परिवार के उत्सव में खाना तो शाकाहारी होना ही था। मैं तो हमेशा से नॉन वेजेटेरियन खाने का शौकीन रहा हूँ परन्तु यहाँ जो खाना खिलाया गया था, वह भी मुझे अच्छा लग रहा था। पिंकी बहुत आनंद के खा रही थी। उसकी नयी बनी मित्र और भाभी, उसके प्रति विशेष स्नेह दिखा रही थी। खाने के बाद भी उन्होंने हमें रोके रखा था और अपने सगे-सम्बन्धियों से पिंकी का परिचय करवाया था। वो लोग एक-दूसरे से संपर्क नंबर ले-दे रहे थे। पिंकी आकर्षण का केंद्र बनी हुई थी। मुझे अच्छा तो लग रहा था परन्तु मैं नहीं चाहता था कि मेरी पत्नी इन व्यवसायी परिवारों में घिरती चली जाये। अब जब सत्य को अपने साथ लेकर बैठा हूँ तो छुपाने का प्रयास नहीं करूँगा। उस दिन मैं एक हीन भावना से ग्रसित हो रहा था। उस धनाढ्य मारवाड़ी परिवार में, मैं खुद को जमा नहीं पा रहा था। मैं उनकी व्यावसायिक सफलता से अपने बंगाली समाज की असफलता को जोड़ कर देख रहा था। मैं भीतर ही भीतर तैश में था। एक द्वन्द सा था जो मुझे विचलित किये जा रहा था। मैं खुद को सहज-सरल दिखाने को विवश था। मेरी अत्यंत विकट स्थिति बनी हुई थी। दूसरी ओर पिंकी थी जो सभी से सरलता और मुक्त ह्रदय से मिलजुल रही थी। वह अपने नाम के अनुरूप मनप्रीत बनी हुई थी। वह मेरी ओर देखती तो मैं मुस्कुरा देता था। मेरी मुस्कान में एक तरह का सन्देश छिपा होता था कि अब हमें चलना चाहिए। वह यह छिपा सन्देश पढ़ भी लेती थी और इशारे से कहती कि बस थोड़ी देर में चलते हैं।
कुछ समय बाद हम विदा लेने को तैयार हुए तो पिंकी की केडिया भाभी ने उसे प्रसाद के नाम पर एक बड़ा सा पैकेट पकड़ाया। पिंकी ने कहा कि हम तो प्रसाद ग्रहण कर चुके थे। उन्होंने कहा कि ये घर वालों के लिए था। फिर उन्होंने अपनी कार से हमें पहुंचा देने की पेशकश भी की। मुझे अच्छा तो नहीं लग रहा था परन्तु पिंकी ने थैंक यू और सो नाइस आदि कह दिया था, मुझे मान लेना पड़ा था। कार में बैठते ही मैंने कहा, ' ऐसी जगहों पर मैं असुविधा महसूस करता हूँ..प्लीज, भविष्य में मुझे साथ चलने के लिए मत कहना..' पिंकी ने आश्चर्य सा भाव दिखाया मानों कह रही हो, ' अरे यह क्या बात हुई..' कुछ क्षण बाद उसने कहा, ' पहली बार मिले थे न इस लिए कम्फर्टेबल नहीं थे..दोस्ती हो जाएगी तो ठीक हो जायेगा..मुझे भी शुरू में ऐसा ही लगा था पर बाद में मुझे ये लोग अच्छे लगने लगे..' उसकी इस बात पर मैंने कोई प्रतिक्रिया न दी थी। पिंकी को शायद लगा था कि मैं उसकी बात से सहमत हो गया था परन्तु मैं सोच रहा था कि बाद में यह खुद ही समझ जाएगी कि व्यावसायिक समाज के लोगों से घनिष्टता अच्छी नहीं होती। बौद्धिक स्तर पर हम उनके साथ नहीं मिल सकते। हमारा घर अधिक दूर न था। कुछ ही मिनटों में हम घर के सामने थे। पिंकी ने हैरानी दिखाते हुए कहा, ' अरे पहुँच भी गए ? मैंने कहा, ' हाँ, वाकिंग डिस्टेंस ही तो है.. हम आराम से पैदल चल कर आ सकते थे..तुमने बेकार में उनकी कार ली..' पिंकी ने हँसते हुए कहा, ' मैंने क्या ली..वो इतने प्यार से कह रही थी तो ना कहना अच्छा थोड़े ही लगता ? पिंकी ने भैया कहकर ड्राइवर को धन्यवाद दिया था। उसने भी आदर के साथ गुड नाइट कहते हुए, फिर से कभी आने के लिए कहा था। उसके हावभाव से मैं समझ गया था कि वह बिहार का था। उस समय मैंने सोचा था कि इस तरह के ड्राइवर और काम वाले मिलना सौभाग्य की बात थी। साथ ही मैंने यह भी सोचा कि इन व्यापारी अमीर लोगों से इन्हें अच्छी तनख्वाह मिलती है तभी तो ये अच्छे से काम करते हैं।
ऊपर घर पर प्रवेश करने पर माँ को प्रतीक्षा करते पाया था। वह कुछ गंभीर भी दिखीं थी। मैंने इशारे से पूछा कि सब ठीक था न ? उन्होंने कहा, 'हाँ, सब ठीक है..' फिर उन्होंने पिंकी की ओर देखते हुए कहा, ' मनप्रीत, कैसी रही तुम्हारी पूजा-पार्टी ? पिंकी मुस्कुरा दी, 'पार्टी नहीं मम्मी जी ..पूजा और लंगर प्रसाद.. बहुत अच्छा लगा..पर आपका बेटा वहां बोर हो रहा था..' माँ ने मेरी ओर देखते हुए कहा, ' इसका पूजा-पाठ में दिल थोड़े ही लगेगा..ये बचपन से ही ऐसा है..अच्छा सुनो, कल का कोई कार्यक्रम न रखना.. कल मनप्रीत को मेरे साथ कहीं जाना है..' मैंने मामला जानना चाहा तो माँ ने बताया कि जद्दूबाबू बाजार इलाके के किसी पंजाबी परिवार की एक घटना, वहां के पुलिस थाने में दर्ज हुई थी। पारिवारिक हिंसा का मामला था। क्षेत्र के सांसद ने उन्हें फोन किया था कि माँ को परिवार वालों से जाकर मिलना चाहिए। बाद में पुलिस थाने और स्थानीय विधायक के फोन भी आये थे। अब बात यह थी कि विधायक विपक्ष की पार्टी के थे। सांसद जो वामफ्रंट के थे, मेरे नाना के अनुयायी थे, वह चाहते थे कि माँ, मनप्रीत के साथ वहां जाये ताकि माँ की पंजाबी बहू होने का प्रभाव डाला जा सके। पिंकी ने जब यह सब सुना तो उत्साहित हो गयी थी। उसने कहा, ' मैं तो जरूर जाऊंगी..और बंगाली साड़ी पहनूंगी..' माँ ने उसे टोक दिया, ' अरे, बंगाली साड़ी किसी और दिन पहनना..कल तो तुम्हें पक्की पंजाबन बनकर मेरे साथ जाना होगा..मामला एक पंजाबी परिवार का है..समझी ? पिंकी हंसने लगी। बाद में उसने गहरे लाल रंग की पंजाबी ड्रैस निकालकर मुझे दिखाई थी और पूछा था कि वह ड्रेस अगले दिन के लिए कैसी रहेगी ? मैंने बिना देखे कहा था, ' जो भी पहनो, ठीक है..' उसने कहा, 'ये क्या बात हुई, बिना देखे कह रहे हो कि ठीक है ? मैं थोड़ा सा झुंझला गया था। मैंने कहा, ' अब मैं क्या कहूं..बंगाल में हो तो तुम्हें यहाँ जैसी ही दिखना चाहिए.. यहाँ भी पंजाबी ही बन कर रहना चाहती हो तो मैं क्या कहूं ? वह मुझे देखती रह गयी थी। उसने कहा कि वह तो मम्मी जी के आदेश का ही पालन कर रही थी, उन्होंने ही उसे पंजाबी ड्रेस पहनने को कहा था। मैंने आँखे चुराते हुए, उसकी बात में सहमति जताई थी परन्तु मेरे दूसरी ओर मुंह फेर लेने से वह मेरा मन भांप गयी थी। उसने कहा, ' मम्मी जी की बात को न तो नहीं कह सकती.. और देखा जाये तो उनका कहना गलत नहीं है क्यों कि वह मुझे किसी पंजाबी सिख परिवार में ले जा रही हैं..' मैंने बात को समाप्त करते हुए कहा था, ' चलो छोड़ो इस बात को..तुम जानोऔर माँ जाने..'
अगले दिन माँ और पिंकी अपने मिशन पर निकलने को तैयार थे। मैं पिंकी को देखता रह गया था। उसने इशारे से पूछा कि वह कैसी लग रही थी ? मैं मुस्कुरा दिया था। मुझे मुस्कुराता देख, वह खिलखिलाई और माँ की ओर देख बोली, ' मम्मी जी मैं रेडी हूँ.. चलें.. ' माँ भी तैयार हो चुकी थी। दोनों राज्य महिला आयोग का बोर्ड लगी गाड़ी में निकल गए थे। मुझे अच्छा तो न लग रहा था कि माँ उसे अपने शासकीय कार्य में ले गयी थी परन्तु मैं समझ पा रहा था कि इस तरह के कार्यों में जोड़तोड़ तो लगाया ही जाता है। इसके साथ, इसी बहाने नवविवाहिता पंजाबी बहू को कलकत्ता की गतिविधियाँ देखने को मिल रहीं थी। मैं औंधें लेटे हुए कल्पना कर रहा था कि वो दोनों अब तक घटना स्थल वाले घर पहुँच गए होंगे और माँ अपने मिज़ाज़ के हिसाब से रुवाब दिखा रही होंगी और पिंकी चुपचाप एक ओर खड़ी, कलकत्ता के सिख-पंजाबी परिवार की स्थिति का अंदाज़ा लगा रही होगी। शायद कुछ ही समय में वह उस परिवार में घुलमिल भी जाएगी। साथ ही साथ सोच की एक अन्य लहर भी दौड़ी चली जा रही थी कि क्या मेरी पत्नी का इस तरह से सब से घुलमिल जाना और सब को अपना बना लेना, न जाने, हमारे पारिवारिक जीवन के लिए कैसा होगा ? उसने मेरे माँ-बाबा, बिशाखा, बाबा के मित्र और मेरे काका के साथ साथ, केडिया परिवार और उस बांग्ला टीवी की समाचार एंकर को तो प्रभावित कर ही लिया था। माँ, महिला आयोग के काम में उसका सहयोग अपने लिए अच्छा मानने लगी थी। केडिया भाभी ने तो मानों उसे अपनी सबसे प्रिय सहेली बना लिया था। वह टीवी एंकर जिससे मैं प्रभावित हुआ करता था, अपना विजिटिंग कार्ड पिंकी को दे चुकी थी और उससे आश्वासन ले चुकी थी कि कभी वह पंजाब सम्बंधित टीवी कार्यक्रम बनाएगी तो उसमें उसे जरूर भाग लेना होगा। पिंकी का मोबाइल नंबर भी उसने, मनप्रीत कौर के नाम से रख लिया था। मैं इन ख्यालों में भटका हुआ था कि रोबी दा का फोन आ गया था। उन्होंने क्षमा दर्शाते हुए बात आरम्भ की थी। उन्होंने कहा कि वह समझ सकते थे कि मैं अपनी पत्नी के साथ व्यस्त होऊँगा और अवकाश का आनंद ले रहा होऊंगा परन्तु उनकी आवश्यकता अपरिहार्य थी। उन्होंने मुझे संध्या चार बजे एक बैठक, जो काशीपुर क्षेत्र में होने जा रही थी, में उनके प्रतिनिधि के रूप में जाने का आग्रह किया था। उन्होंने बताया था कि अस्वस्थ होने के कारण वह न जा पा रहे थे। उन्होंने आयोजकों को इसकी सूचना भी भिजवा दी थी। रोबी दा ने आग्रह शब्द तो कहा था परन्तु उनके स्वर में निर्देश का भाव था। मैं क्या कहता ? ' ठीक है, रोबी दा ..' कहने के अतिरिक्त मेरे पास कोई विकल्प न था।
काशीपुर एक भीड़भाड़ वाला क्षेत्र है। वहां पहुँचने के लिए काफी समय लग जाता है। मुझे वैसे भी वह क्षेत्र अच्छा न लगता था। उस दिन कलकत्ता का मौसम भी प्रतिकूल था। वर्षा अपना विराट रूप दिखाने के मिज़ाज़ में थी। बेमना सा मैं, परेशान था। मैंने बिशाखा को बुला, उसे मेरे लिए खाना बनाने को कहा था। मैंने उसे कहा कि मुझे किसी अत्यंत आवश्यक कार्य के लिए बाहर जाना था। वह मुझे देखती रह गयी मानों कह रही हो, ' बहूमाँ तो आ जाए .. एक साथ खाना..' मैंने भी उसका मन पढ़ लिया था और कहा, ' माँ अपनी बहू को लेकर गयी हुई हैं.. वे दोनों कब कब लौटेंगी, कुछ ठीक नहीं.. मैं खाना खा कर निकल जाता हूँ.. बहुत आवश्यक कार्य है, मैं विलम्ब नहीं कर सकता..तुम उन्हें बता देना ..'
जैसा अनुमान था वैसा ही हुआ था। मेरे घर से निकलने के कुछ समय बाद ही मौसम ने करवट ले ली थी। तेज प्रवाह से हवाएं चलने लगी थी और जोर से वर्षा होने का आभास होने लगा था। कलकत्ता की सड़कों में पानी जमने में देर नहीं लगती। मैं गरियाहाट तक पैदल चल पहुंचा था और वहां से किसी तरह एक भीड़भाड़ वाली बस में चढ़ तो गया किन्तु मैं समझ पा रहा था कि एक-डेढ़ घंटे बाद जब गंतव्य पर उतरूँगा तो मेरी दशा कैसी होगी ? मेरे जूते भीग चुके थे और छाता अपने काम में नाकाम हो रहा था। मैं रोबी दा को मन ही मन कोस रहा था कि उन्होंने मुझे फँसा दिया था। काशीपुर पहुँचने पर मैं टूट चुका था। इधर-उधर पूछते हुए बैठक स्थल पर पहुंचा था। यह पार्टी का उस क्षेत्र का कार्यालय था। कुछ ही लोग आये हुए थे। मैंने अपना परिचय संयोजक महोदय को दिया तो उन्होंने एक कुर्सी की ओर बैठने का संकेत किया और आगे निकल गए थे। सब खामोश बैठे थे। लगता था वे सब मेरे ही तरह किसी वरिष्ठ का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और आपस में उनका एक-दूसरे से परिचय न था। मेरे पास बैठे सज्जन ने मौसम का हवाला देते हुए बात आरम्भ की थी। उसका आरोप था कि नगर की जलनिकासी की पुख्ता व्यवस्था नहीं की जा रही थी। वह मेरी ही उम्र का युवक था। वह अपनी ओर से कई बातें किये जा रहा था। वह जिस स्थान से आया था, वह काफी दूर था और तीन बसें बदलकर वहां पहुंचा था। मैं उसकी बातें चुपचाप सुने जा रहा था। मैंने उससे केवल इतना कहा, ' मीटिंग कब आरम्भ होगी, समय तो हो चुका था ? उसने तीन नाम लिए थे और बताया था कि जब तक वे नहीं पहुँच जाते, मीटिंग आरम्भ होने का प्रश्न ही नहीं था। अब मैं उठा और बाहर चला आया था। सामने एक चाय की दुकान थी। वहां एक कप चाय पी थी। हम कलकत्ता वासी चाय के लिए कप शब्द का प्रयोग करते हैं परन्तु यहाँ यह चाय का कप, एक मिटटी का भाड़ होता है जिसे गैर बंगाली लोग कुल्हड़ कहते हैं। मैंने एक सिगरेट भी सुलगायी थी हालाँकि पिंकी को याद कर मैंने दो कश के बाद ही उसे एक ओर फेंक दिया था। मैं सोच रहा था कि अब तक वह घर आ चुकी होगी। मुझे यह भी आभास था कि उसने माँ का अच्छे से सहयोग किया होगा और उस पीड़िता को न्याय का पूरा भरोसा दिया होगा। पीड़िता ने पिंकी में एक सच्ची सहेली देखी होगी। माँ ने अपने मिशन की सफलता पर, घर पहुँचते ही कई जगह फोन किये होंगे और घटना को बढ़ा -चढ़ा कर बताया होगा। वह अपनी बहू पर स्नेह वर्षा कर रही होंगी और अपना स्नेह कुछ यूँ दर्शाया होगा, ' मनप्रीत, आज तुम्हारे हाथ के बने,आलू के पराठें खाने का मन है..'
( आज यहीं तक, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर .. )
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