Chander Dhingra's Blog

Wednesday, March 31, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) - 65

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra     http://chander1949.blogspot.com/?m=1  ( ६५ ) इन्द्राणी चाय बनाकर लायी और मुझे एक कप पकड़ते पकड़ाते हुए बोली, ' चलो, छत पर चलते हैं, वहां खुली हवा में बैठकर चाय का आनंद लेंगे...' हम छत पर आ गए। मौसम बहुत ही सुहाना था। मंद हवा चल रही थी। दूर की गगनचुम्बी इमारतों में चमक रही लाइट्स मानों प्रदूषण से छिप गए सितारों की पूर्ति कर रहीं थीं। पिशी के घर की छत पर एक बेंच न जाने कब से रखी हुई है। मैं तो बचपन से ही इसे देखता आ रहा हूँ। मुझे इस बेंच की दाहिनी ओर हल्की सी निकली हुई कील का पता है। दो बार वह मुझे चुभ चुकी है। आज मैंने बेंच की उस जगह पर हाथ फेरा तो पाया कि सतह एकदम सामान्य थी। मैंने इन्द्राणी की ओर देखा तो वह समझ गयी। उसने कहा कि अनजाने में वह कील उसे भी कई बार परेशान कर चुकी थी और उसने उसे हथोड़े से ठीक कर दिया था। मैं सोचने लगा कि कैसे ये छोटी छोटी बातें हमारे स्मृति-संसार में हमेशा के लिए घर बना लेती हैं। पिशी के घर की  छत, लकड़ी की पुरानी बेंच और उभरी  कील मेरे स्मृति-पटल पर सदैव बनी रहेंगी।   इन्द्राणी छत की मुंडेर पर एक ओर जा खड़ी हुई थी। उसने काले रंग की तांत वाली बंगाली साड़ी पहनी हुई थी। उसके लंबे-घने बाल हवा में उड़ रहे थे। वह एक पल चाय के कप को संभालती और दूसरे पल उसे एक ओर रख, अपने बालों को पीछे की ओर करती। दूर क्षितिज पर काली घटा उमड़ कर आ रही थी। इन्द्राणी की साड़ी का पल्लू, उसके बिखरे-उड़ते घने बाल, आकाश में छायी काली घटा के साथ ऐसे समरूप हो रहे थे मानों दो दृश्य न होकर, एक ही कैनवास हो। उस क्षण अचानक मुझे इन्द्राणी में प्रसिद्ध बंगाली अभिनेत्री का अक्स दिखाई दिया था। मैंने कहा, ' कभी कभी तुम में सुचित्रा सेन दिखती है...' उसने मुझे चौकतें हुए देखा, ' अच्छा, मेरा मज़ाक उड़ाने का कोई और तरीका नहीं मिला, कहाँ वह, कहाँ मैं ? मैंने कहा कि ऐसी बात न थी और मैं सच में अपने मन की बात कह रहा था। उसने फिर से मुझे देखा और मेरे मन की सत्यता को भाँपने का प्रयास किया। उसने कहा, ' तुम्हें सुन्दर और आकर्षक पत्नी मिली है... मैं तो मनप्रीत के सामने भी खुद को हीन समझती हूँ... और तुम मेरी तुलना सुचित्रा से कर रहे हो, वाह ! भाई हो तो तुम्हारे जैसा, वैसे कहीं तुम यह तो नहीं चाहते कि मैं कहूं कि तुम में मुझे उत्तम कुमार की झलक दिखती है ? खैर छोड़ो ये बातें, बताओ, हमारी मनप्रीत के क्या हालचाल हैं... उसे साथ लेकर आते तो बहुत अच्छा लगता...' इस पर मैंने कुछ न कहा था। इन्द्राणी ने ही बातों का सिलसिला जारी रखते हुए कहा, ' मनप्रीत बहुत समझदार लड़की है... वह साहसी और विनम्र भी है... देखो कैसे वह अपना सब कुछ एक ओर छोड़ कर यहाँ बंगाल के अपरिचित समाज में आ गई है... उसे खुद को यहाँ समायोजित करने में असुविधा तो अवश्य हो रही होगी ? मैंने कहा, ' हां वह बहुत साहसी तो है परन्तु यहाँ उसे खुद को एडजस्ट करने में अधिक असुविधा नहीं हुई है... उसे अच्छा जॉब मिल गया है... वह हमारा रविंद्र संगीत भी सीख रही है... बंगाली समाज सरलता से सबको अपने साथ समेट लेता है... ' इन्द्राणी ने कहा, ' यह सब तो ठीक है परन्तु देखा जाये तो वह भी एक तरह की लाभार्थी है... उसे भी तो एक नामी परिवार की ससुराल मिली है... अच्छे सास-ससुर हैं और सी ए में नेशनल टॉपर लिस्ट वाला हैंडसम पति... किसी भी पंजाबी लड़की के लिए तो यह एक सपने जैसा ही होगा... ' हम दोनों काफी समय तक छत पर बैठे, बहुत कुछ बतियाते रहे थे। फिल्मों की बातें, बचपन की बातें, उन दिनों की कम्युनिस्ट लहर की राजनैतिक बातें और भी बहुत कुछ। वर्षा की बूंदे, हवा के साथ उड़ने-बिखरने लगी थीं। मैंने कहा कि हमें घर के भीतर आ जाना चाहिए परन्तु भीगना अच्छा भी लग रहा था। हम वहीं बैठे रहे। बाद में पिशी ने आवाज देकर बुलाया तो हम नीचे आये। फिर से चाय का दौर चला। वर्षा थम चुकी थी पर मौसम में नमी थी। मैं घर पहुंचा तो पिंकी को प्रतीक्षा करते पाया। उसने हैरान होते हुए कहा, ' क्या बात हुई, आज लेट हो गए ...  सब ठीक है न, आप तो समय से आ जाते हो ?  मैंने कहा, ' बस, ऐसे ही लेट हो गया... ऑफिस से निकलने में ही देर हो गयी थी... काम का प्रेशर कभी कभी हम बैंक वालों पर भी हो जाता है... ' वह हँसने लगी। उसने बिशाखा की ओर देखते हुए कहा, ' आज बाउदी जल्दी आ गयी तो दादा लेट हो गए...  चलो गर्मागर्म अदरक वाली चाय पीते हैं... ' मैंने कहा, ' चाय नहीं, भूख लगी है, सीधे खाना ही कहते हैं... ' फिर सामान्य होते हुए मैंने बिशाखा से पूछा, ' आज क्या बना है ?  माँ भी सामने आ गयी थी। उन्होंने कहा कि भूख तो उन्हें भी लगी थी। बिशाखा खाना परोसने में जुट गयी थी। टेबल पर माँ ने पिंकी से पूछा, ' तुम्हारा म्यूजिक का क्लास कैसा चल रहा है, मनप्रीत ?  उसने कहा कि ठीक ही था, ' सप्ताह में दो दिन, वो भी केवल एक घंटा... जितना हो सकता है, हो रहा है   ... वैसे मैंने एक रविंद्र गीत परफेक्ट कर लिया है... अर्थ नहीं मालूम परन्तु मैं गा सकती हूँ... टीचर कह रही थी कि मेरी पकड़ अच्छी है... ' माँ ने बताया कि क्लब में दो सप्ताह बाद एक संगीत का कार्यक्रम होने जा रहा था और यदि पिंकी कुछ तैयार कर ले तो वह उसके लिए एक गीत गाने की सिफारिश क्लब सेक्रेटरी से कर सकती थी। पिंकी ख़ुशी से चहकने लग गयी थी। मैंने कहा, ' अभी नहीं... अभी ट्रेनिंग पर फोकस करो... बाद में स्टेज पर उतरने की सोचना... ' माँ ने कहा कि ऐसी स्टेज की कोई बात न थी। क्लब का छोटा सा इन-हाउस कार्यक्रम था और मनप्रीत यदि बंगाली रविंद्र संगीत सुनाती है तो सब को अच्छा ही लगेगा। माँ भी उत्साहित थी, ' पंजाबी लड़की और रविंद्र संगीत..अच्छा जमेगा... थोड़ी बहुत त्रुटि हो भी तो भी लोग एन्जॉय करेंगे... ' माँ के तर्क के सामने मैं क्या कहता, चुप हो गया था। पिंकी तो माँ की बात से जोश में आ गयी थी। उसने कहा, ' मम्मी जी मेरा नाम दे दो... दो सप्ताह का समय है न, तब तक एक दम पक्का कर लूंगी... दो सप्ताह में कुछ एक्स्ट्रा क्लास भी कर लूंगी... ' वही हुआ जो पिंकी कह रही थी। अगले दो सप्ताह मानों उसने रविंद्र संगीत के नाम कर दिए थे। वह सुबह कुछ जल्दी जॉगिंग पर गयी और वहीं से संगीत की क्लास में। वह घर पर भी यही संगीत सुनती रही थी। मुझसे भी उसने प्रैक्टिस करवाने का अनुरोध किया था। उसे सिखाना मुझे अच्छा लग रहा था और मैं उसके उत्साह को देख प्रभावित था। कार्यक्रम में दो दिन ही रह गए थे। माँ ने उससे पूछा, ' क्यों मनप्रीत, तैयार हो न, रविवार को तुम्हें गाना है ? पिंकी ने बच्चों की तरह कहा, ' बिल्कुल मम्मी जी, आपका नाम ऊँचा करना है...' माँ ने कहा, ' तो फिर कुछ सुनाओ... ' हम सभी वहीं माँ के पलंग पर बैठ गए थे। पिंकी ने बिना किसी झिझक के एक गीत सुनाया था। गीत समाप्त होने पर माँ ने उसे अपने आलिंगन में भर लिया था। माँ ने कहा, ' अब मुझे चिंता नहीं है...'  रविवार को हम सभी क्लब गए थे। उस दिन वहां काफी रौनक थी। क्लब के विशाल खुले प्रांगण में स्टेज बनाया गया था। चारों ओर हरियाली छायी हुई थी।लोग सामने रखी कुर्सियों पर बैठते जा रहे थे। ये समाज में परिचित और रसूखदार चेहरे थे। कहा जाता है कि कलकत्ता के विशिष्ट और कुलीन बंगाली वर्ग  को देखना हो तो इस क्लब में आना चाहिए। पिंकी बंगाली तांत की पीली साड़ी में अति सुन्दर दिख रही थी। उसे देख कोई भी कह नहीं सकता था कि वह एक पंजाबी लड़की है। बांग्ला टीवी की वह समाचार वाचिका देबजानी भी वहां थी। पिंकी को देख वह पास आयी और उसने पिंकी को अपनी बाँहों में ले लिया, ' अरे, मनप्रीत तुम तो पूरी बंगाली हो गयी हो... कितनी सुन्दर दिख रही हो, इस साड़ी में...' पिंकी मुस्कुरा दी और उसे बताया कि वह भी वहां एक-दो गीत सुनाने वाली थी। उस टीवी समाचार वाचिका ने आश्चर्य दिखाते हुए, ' अच्छा, पंजाबी गाना ? पिंकी ने कहा , ' नहीं जी, आपका रविंद्र संगीत... कुछ भूल-चूक हो जाये तो बुरा मत मानना...  पहला प्रयास है... '  जब पिंकी को स्टेज पर आमंत्रित किया गया तो परिचय में कहा गया कि चंडीगढ़ की पंजाबी लड़की जिसने अपने लिए बंगाली वर चुना था और जिसकी सासू माँ राज्य के महिला आयोग की अध्यक्षा हैं और जिन्होंने अपने अथक प्रयास से, पंजाबी बहू में रविंद्र संगीत के प्रति रूचि जाग्रत की है।  उन्होंने इस अभूतपूर्व संगीत विधा में ट्रेनिंग दी है और मंच पर आने के लिए प्रेरित किया है। उद्घोषणा पर खूब तालियां बजी और जब पिंकी ने अपना गाना समाप्त किया तो और भी अधिक और देर तक तालियाँ बजती रही। कार्यक्रम समाप्ति पर जब हम अपनी कार की और बढ़ रहे थे तो वह टीवी वाली देबजानी दौड़ती हुई आयी। उसने गर्मजोशी से पिंकी से हाथ मिलाते हुए कहा, ' बहुत-बहुत बधाई... बहुत अच्छा गया... तुम्हारी कलकत्ता वाली मम्मी जी ने बहुत अच्छी ट्रेनिंग दी है...  अब तो तुम्हें टीवी पर आना होगा...' फिर उसने मेरी ओर देखते हुए कहा, ' कल हम एक नए शो की रुपरेखा के लिए मीटिंग रहे हैं... आप प्लीज मनप्रीत को लेकर मेरे स्टूडियो में रात आठ बजे आ जाना... मैनें उसके लिए कुछ सोचा है...' उसने पर्स से एक कार्ड निकाल, मुझे पकड़ाया और पक्का करते हुए कहा, ' आपके घर के पास ही है...जरूर आना... आपकी पत्नी के लिए यह एक सुअवसर है... ' ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर...)

Wednesday, March 24, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) - 64

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1  ( ६४ )  पिंकी ने कार स्टार्ट की और मुझे साथ बिठा, मेरे ऑफिस की ओर तेज रफ़्तार में निकल गयी थी। कुछ देर तक हम दोनों ही खामोश थे। मैंने कहा, ' अब खुश ? तुम्हारी कार की कोई समस्या न होगी...' उसने कहा, ' ये बात नहीं है, कार हो या कोई अन्य मशीन, कभी न कभी ब्रेकडाउन तो होगा लेकिन कोई बदमाशी कर परेशान करे तो उससे तो निपटना ही चाहिए ...और ये केवल मेरी कार नहीं है...ये हम सब की है... हमारी फॅमिली कार है...' मैंने कहा, ' नहीं, तुम्हारी ही है, तुम ही चलाती हो... तुम्हारे मामा ने दी है तो तुम्हारी ही है...' उसने कहा, ' आप भी चलाया करो, किसने रोका है... चलो, कल से ड्राइविंग की प्रैक्टिस कराते हैं...पर इसके लिए सुबह तो आपको ही उठना पड़ेगा...' मैंने कुछ न कहा परन्तु मैं समझ न पाया  था कि मैं किसी सामान्य युवक की तरह कार को दौड़ाना चाहता था या किसी भ्रमित से बंगाली युवक की तरह, कार को, समाज के एक विशेष वर्ग का प्रतीक दिखा, उस से दूर रह, स्वयं को बौद्धिक स्तर पर ऊँचा दिखाना चाहता था ? शायद मैं चाहता था कि पिंकी भी कार न चलाये और हम लोग एक ड्राइवर रख लें। कभी-कभार परिवार के साथ कहीं दूर आना-जाना करें।  मेरा ऑफिस आ गया था। पिंकी ने एक ओर कार रोकी। वह नीचे उतर आयी थी। उसने मुझे मुस्कुराते हुए देखा, ' चलो जो हुआ अच्छा ही हुआ, मम्मी जी ने होशियारी से काम करवा दिया, वैसे ये सब काम हम दोनों को ही निपटा देने चाहिए... एक और बात है, ये जिसे गरीब आदमी कह रहे हो न, वह गरीब कम बदमाश ज्यादा है... चक्के में हवा तो उसी ने निकाली थी... वह आगे भी ऐसा ही करता रहेगा... आप देखते जाओ...'  वह कार की ओर मुड़ी तो मेरे अधीनस्थ कार्य करने वाला दिलीप सामने आ गया था। उसने आदर से पिंकी को देखा और कहा, ' नमस्ते, भाभीजी... आप रोज गेट तक आकर चली जाती हैं... आज भीतर भी आइये... ' पिंकी ने कहा, ' आज नहीं भैय्या... फिर किसी दिन, आज पहले ही देर हो चुकी है... आप भी किसी दिन आइये न हमारे घर, मिसेज को लेकर... पंजाबी खाना खिलाऊंगी... ' पिंकी यह कह,कार में बैठ आगे बढ़ गयी थी। मैं और दिलीप सड़क पार कर, ऑफिस गेट की ओर बढ़ गए थे। दिलीप ने कहा कि भाभी बहुत ही स्मार्ट थी और कैसे होशियारी के साथ कार चलाती थी। मैंने हूँ.. कह उसकी बात को नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की थी। मैं सोच रहा था कि पिंकी को ऐसे ही किसी से भी इतना अपनापन नहीं दिखाना चाहिए। इस दिलीप को मैं अच्छे से पहचानता हूँ। ये अब सबको कहता फिरेगा कि मेरी वाइफ कैसे स्मार्टली कार चलाती है और उसने उसे सपत्नीक अपने घर पर आमंत्रित कर, पंजाबी खाने की दावत दी है। मुझे पिंकी का यह खुलापन एक तरह की असुविधा दे रहा था। मैं सोच रहा था कि वह जिस तरह के खुले माहौल से आयी है तो उसका इस तरह का व्यवहार स्वाभाविक था, परन्तु मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि वह बदले हुए माहौल में स्वयं को बदल क्यों नहीं रही थी ? उसे अच्छे से विदित था कि वह एक दूसरे राज्य और भिन्न भाषा-संस्कृति में विवाह कर रही थी तो स्वयं के परिवर्तन के लिए भी उसे तैयार रहना चाहिए था। एक बार फिर से मस्तिष्क ने मेरा साथ दिया था। उसने मेरे मन को समझाया कि किसी भी बदलाव को समय की आवश्यकता होती है, पिंकी भी समय के साथ, यहाँ के अनुरूप हो जाएगी। मेरे मस्तिष्क और मन का यह द्वन्द हमेशा भीतर चलता रहा है। आज, बीते दिनों को एक खुली दृष्टि से देख रहा हूँ तो सोचता हूँ कि हमारा मस्तिष्क तो हमारी सुविधा के अनुरूप ही तो हमें समझाता है। वह वही परामर्श देता है जो हमें प्रिय होता है और जैसा हम चाहते हैं। मेरे मस्तिष्क के पास यह शक्ति भी तो थी कि वह मुझे यह समझाता कि मैं अपनी पत्नी के विवाहोपरांत स्वभाव को अपने हिसाब से क्यों बदलना चाहता था ? क्या उसका हक़ नहीं था कि वह भी मुझ में कुछ परिवर्तन देखे ?  कुछ दिनों के चंडीगढ़ प्रवास के दौरान जो जीवन शैली, मैं वहां देखकर आया था, उससे प्रभावित तो अवश्य ही था। मैं शायद, एक दबी सी हीन भावना से ग्रसित तो नहीं होता जा रहा था ?  वह दिन भी हमेशा की तरह, बासी रोटी सा कटा था। रोबी दा, स्वभावतः आते-जाते टकराये थे और उन्होंने वही कहा जो अक्सर कहा करते थे कि मुझ पर उनकी बहुत उम्मीदें थी कि मैं संगठन को अधिक समय दूंगा और उसे आगे बढ़ाऊंगा। वो दिलीप भी एक बार कह गया था कि उसे पंजाबी भाभीजी बहुत अच्छी लगी थी और वह अवश्य ही किसी दिन, अपनी पत्नी संग हमारे घर आएगा। उसने व्यंग्य सा करते हुए कहा था कि कार तो मुझे ही चलानी चाहिए और भाभीजी को साथ में बिठाना चाहिए क्योंकि ड्राइवर की सीट पर बैठा पति ही ज्यादा अच्छा दिखता है। मैंने सोचा कि उसे कहूं कि आज के समय में पत्नी कार चलाये या पति, कुछ फर्क नहीं पड़ता परन्तु मैं रुक गया था। मैं जानता था कि इस विषय को उसके साथ उठाया तो वह बात को राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर और न जाने कौन कौन से समाज सुधारकों तक ले जायेगा।   संध्या में ऑफिस से निकला तो घर जाने का मन न हुआ था। लगा कि क्यों समय से बंधा घर पहुँच जाता हूँ। कहीं कोई दिनचर्या में नवीनता नहीं है। पैदल चलते हुए, डलहौजी बस स्टैंड की ओर बढ़ गया था। मेरे घर की ओर जाने वाली मिनी बस खड़ी थी। मैं उसमें न चढ़ा और उसकी साथ वाली बस में जा बैठा था। यह बस इन्द्राणी के घर की ओर जाती थी। अपने को सामान्य करते हुए मैंने सोचा कि अपनी पिशी यानि बुआ के घर कुछ समय बिताकर  जाऊंगा। इन्द्राणी ने दरवाजा खोला तो मेरी बगल में झाँकने लगी थी। ' अरे ! इस समय और वो भी अकेले..' मैंने कहा कि ऑफिस से निकला तो ऐसे ही मन बन गया कि पिशी से मिलता जाऊँ। मेरी बात पर उसने कहा, ' ये तुम दूसरी बार अकेले आये हो, अबकी बार मनप्रीत को साथ लेकर न आये तो घर में  प्रवेश न मिलेगा ' मैंने कहा, ' उसे लेकर ही आता परन्तु आज तो सीधे ऑफिस से ही आ गया क्यों कि मनप्रीत को इन दिनों ऑफिस से घर लौटने में देर हो जाती है.. मुझे पहले घर पहुँच उसका  इंतज़ार करना पड़ता है, आज सोचा उसके समय के साथ ही घर पहुंचा जाये..चलो, चाय पिलाओ... पिशी के घर की चाय की बात ही कुछ और है...' मेरे पास कुछ कहने को नहीं था, इसलिए मैंने चाय की बात उठायी थी परन्तु, इन्द्राणी ने यह सुन, मुँह बनाया और इठलाते हुए कहा, ' तुम जानते हो इस घर में चाय मैं ही बनाती हूँ... कभी यह भी कह दिया करो कि इन्द्राणी की चाय की बात ही कुछ और है...मेरी भी तारीफ किया करो...जैसे मैं तुम्हें हीरो और उत्तम कुमार कहती रहती हूँ...' ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर... ) 

Wednesday, March 17, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) -63

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1    ( ६३ )  मेरे पीछे पीछे पिंकी भी ऊपर कमरे में आ गयी थी। उसने आते ही कहा, ' मेरी बात का बुरा मान गए क्या ? मैं तो आपके भले के लिए ही कह रही हूँ कि सिगरेट पीना ठीक नहीं होता... इसे छोड़ देना ही उचित है... जितनी देर होती जाएगी, उतना ही इस लत से छुटकारा पाना मुश्किल होता जाता जायेगा ...' मैंने कुछ उत्तर न दिया था। उसने बात को आगे करते हुए कहा , ' हमारे पड़ोस में एक गुप्ता अंकल रहते थे, उनको इस सिगरेट की लत थी...वह हार्ट और लंग्स के मरीज हो गए थे... फिर उन्हें बचाया न जा सका था...डॉक्टरों  का मानना था कि सिगरेट की लत के कारण ही उनकी यह दुर्गति हुई थी...'  मैं अब भी खामोश था। उसने कहा, ' मुझे गलत न समझना... दोस्त अपनी जगह हैं परन्तु अपना भला-बुरा आपको ही देखना है...' मुझे लगा कि वह मुझे अपने दोस्तों से एक तरह की दूरी बनाने को कह रही थी। अब मैंने कहा, ' बचपन और स्कूल के दिनों की दोस्ती है... ऐसा मैं नहीं कर सकता.. मुझे इस तरह की स्वार्थी बातें अच्छी नहीं लगती...मैं अपने दोस्तों और घर वालों से अलग नहीं हो सकता...'  पिंकी ने मुझे देखा और कहा, ' मैं दोस्तों से दूर चले जाने के लिए तो नहीं कह रही, बस उनकी बुरी आदतों से दूर हो जाने को कह रही हूँ...' मैंने कहा, ' यही तो बात है, तुम्हें सिगरेट बुरी लगती है, मुझे और मेरे दोस्तों को एक सामान्य शौक...'  ' अच्छा, मुझे ही क्यों ? किसी भी डॉक्टर से पूछ लो, वह इसे बुरी आदत ही बताएगा..वेस्टर्न वर्ड में भी अब स्मोकिंग कम होती जा रही है...'  उसने तर्क देते हुए कहा था। मैं तो झुंझलाया हुआ था ही, मैंने उसे चिढ़ाते हुए कहा, ' अच्छा, जो वेस्ट करे, वही हम भी करें... तुम भी शायद उन लोगों में हो जो गोरों को दुनिया का मार्ग-दर्शक समझते हैं...मैं सिगरेट यदकदा ही पीता हूँ...परन्तु, कभी छोडूंगा तो अपनी मर्जी से... किसी दूसरे के कहने से नहीं...अंग्रेजों के कहने से तो बिलकुल भी नहीं...' पिंकी हैरान सी थी। उसने कहा, ' मैं कोई दूसरा नहीं हूँ और न ही मैं अंग्रेज हूँ, मैं एक स्मोकर की वाइफ हूँ और मेरी बात में एक सलाह है, एक सच्ची बात है... खैर छोड़ो, अभी आपका मूड ठीक नहीं है... बताओ क्या हुआ है ? मैंने उसी अंदाज़ में बात को जारी रखते हुए कहा, ' मेरा मूड ठीक है... ऐसी कोई बात नहीं है... देर हो गयी है.. सो जाओ..' पिंकी अपने स्वभाव से बंधी थी। उसने मुस्कुराते हुए कहा, ' ऐसे कैसे सो जायें... पहले आपका मूड ठीक करेंगे, फिर सोयेंगे... बताओ क्या हुआ है, कुछ तो अवश्य हुआ है ? मैं उसकी सरलता देखता रह गया था और मुस्कुरा दिया था। उसने देखा तो कहा, ' उन मिस्टर रवि के साथ किसी मीटिंग में गए थे न ? वहीँ कुछ फ़िजूल सी बातें हुई होंगी और मूड बिगड़ गया होगा.. ठीक कहा न मैंने..' उसने शायद ठीक ही कहा था परन्तु मैं भी अपने स्वधर्म से बंधा था। मैंने कहा, ' ये रोबी दा कहाँ से बीच में आ गए ? और वह रोबी दा हैं, मिस्टर रवि नहीं..' वह मुस्कुरायी, ' मिस्टर रवि शब्द में ज्यादा दम है, रोबी दा में वो बात नहीं.. और मैं पहले ही कह चुकी हूँ कि मेरे लिए वह मिस्टर रवि हैं और मुझे एकदम पसंद नहीं हैं.. अब बताओ, उन्हीं की किसी बात से मूड ऑफ हुआ है न ? मैंने कुछ न कहते हुए मुँह घुमा लिया था। कभी कभी शब्दों से अधिक आघात आपकी भावभंगिमा कर जाती है। शायद उस दिन ऐसा ही हुआ था। पिंकी ने मेरा आचरण देखा तो वह भी नाराज़ हुई थी। उसने कहा, ' जवाब नहीं है तो मुँह फेर रहे हो...  जो करना है करो... सिगरेट पीयो, यूनियनबाजी करो...  पॉलिटिक्स करो...' हम दोनों अब चुप थे और नींद की प्रतीक्षा कर रहे थे।  सुबह, हम सो कर उठे थे या रतजगा कर, कह नहीं सकता। पिंकी हर सुबह किसी चिड़िया सी चहचाहती थी। माँ, बिशाखा उसके उठते ही स्फूर्तिमय हो जाते थे। आरम्भ के कुछ दिनों तक वह सबको गुड मॉर्निंग कहती थी... गुड मॉर्निंग मम्मी, गुड मॉर्निंग पापा और गुड मॉर्निंग बिशाखा दीदी ..परन्तु इन दिनों उसने गुड मॉर्निंग के साथ साथ, हरे कृष्णा और सत श्री अकाल भी कहना शुरू कर दिया था। सबको उसका यह अंदाज़ बहुत पसंद आया था। माँ तो सिर्फ गुड मॉर्निंग कहकर उत्तर देती थी परन्तु बाबा अत्यंत स्नेह से हरे कृष्णा और सत श्री अकाल से उसके सम्बोधन का जवाब देते थे। कभी कभी सुप्रभात, मनप्रीत देवी भी कहते थे। उस दिन की सुबह कुछ अलग थी। ये पहली बार था कि पिंकी के मुख पर हल्की सी नाराज़गी थी। मैं बीती रात के हमारे बीच हुए वार्तालाप को देख पा रहा था। वह रोज की तरह अपने काम में जुटी हुई थी परन्तु मुझे अनदेखा सा कर रही थी। मैंने सोचा वह किसी ओर को नहीं परन्तु अपने मामा को ये सिगरेट वाली बात अवश्य बताएगी और वह अपने अंदाज़ में उस पर दबाव डालेंगे कि कुछ भी हो जाये, यह सिगरेट पीना छुड़वाना ही होगा। मैंने भी एक बार फिर से सोचा, ' मामाजी कहें या उसके मम्मी-पापा, सिगरेट छोडूंगा तो अपने निर्णय पर किसी के कहने पर नहीं  ...'  समय से वह तैयार हो गयी थी और घर से निकलने को थी। उसने अब मेरी ओर देखा पर कुछ कहा नहीं। मैंने अपनी ओर से कहा, ' आज तुम चली जाओ   .. मैं बाद में कुछ देर से जाऊंगा..'  मैं भी तैयार तो था परन्तु किस लिए उसे अकेले जाने के लिए कहा था, उस समय समझ न पाया था। आज जब यादों की किताब खोलकर और सत्य की प्रतिज्ञा के साथ बैठा हूँ तो उस समय की अपनी मनस्थिति को देख पा रहा हूँ। चुपचाप उसके साथ चले जाने में, मेरी पराजय थी। मैं चाहता था कि वह कुछ ऐसा कहे कि मैं स्वयंतुष्ट और अधिकार संपन्न महसूस कर सकूँ। उसने मुस्कुराते हुए ओके कहा और निकल गयी थी। मैं बालकनी में आ गया और उसे अपनी कार की ओर बढ़ते हुए देखने लगा था। वह कार तक गयी थी, कुछ क्षण वहाँ रुकी और ऊपर आ गयी थी। मैं समझ रहा था कि वह कहेगी, ' तैयार तो हो ही गए हो, चलो साथ ही चलते हैं..' उसने ऐसा कुछ न कहा था और सीधे ऊपर वाले अपने कमरे में घुस गयी थी। मैंने सोचा जाकर पूछूं कि क्या हुआ था परन्तु मैंने ऐसा कुछ न किया और वहीं उस दिन के अखबार के साथ बैठा रहा था। बिशाखा ने माँ को सूचित किया कि न जाने क्यों बहू माँ वापिस लौट आयी थी और अपने कमरे में थी। माँ ने आवाज़ देकर मुझसे जानना चाहा तो मैंने कहा कि शायद कुछ भूल गयी होगी और लेने आयी होगी। कुछ समय बाद पिंकी को आवाज़ दी तो वह नीचे आयी और कहा कि कुछ विशेष बात नहीं थी और उसका मन ऑफिस जाने का न था। माँ को लगा कि शायद उसकी तबीयत ठीक न थी। उन्होंने जानना चाहा तो पिंकी ने कहा, ' कैसे जाऊँ मम्मी जी, कार का चक्का तो आज फिर बैठा हुआ है..' मैंने सुना तो सामान्य बनते हुए कहा, ' आज फिर ? पिंकी ने मेरी ओर ताकते हुए कहा, ' कल सामने का था और आज पीछे का..' माँ ने बिशाखा से शांतु को तुरंत बुला लाने को कहा, ' ये ऐसे कैसे रोज रोज कार का पंचर हो जाता है.. आज देखती हूँ..' बिशाखा के साथ ही शांतु आ गया था। उसने माँ की बात सुनी तो मेरी ओर देखते हुए कहा, ' कल ही तो मैं ठीक करवाकर लाया था..अब फिर से कैसे हो गया  ? उसकी इस बात पर पिंकी ने मेरी ओर ताका, उसने कहा, ' आपके अभिजीत दादा ने कल आपको आगे वाले दाएं चक्के के लिए भेजा था और आज आपको पीछे दाएं वाले चक्के के लिए भेजेंगे.. कल लेफ्ट फ्रंट और उसके अगले दिन लेफ्ट बैक..' मुझे ऐसा लगा था कि वह मुझ से ही कह रही थी कि क्या यही आदमी मिला था, इस काम के लिए और वह उससे बात छिपाने के लिए, ताना दे रही थी।  माँ ने अपना राजनैतिक दिमाग चलाया था। उन्होंने शांतु को कहा कि उसे ही हमारी कार की देखरेख करनी होगी। उन्होंने उसके भाई के जिसके पास कुछ काम न था, के लिए एक प्रस्ताव रखा कि उसे हर सुबह कार को धोना और पौंछ देना होगा और इसके लिए उसे एक मासिक मेहनताना दिया जायेगा। इसे आकर्षित करने के लिए उन्होंने एक लालच सा दिया कि अगर वह ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त कर लेता है तो भविष्य में उसे ड्राइवर का काम भी दिलवा देंगी। शांतु खुश दिखा था। उसने माँ को आश्वासन दिया था कि उनकी कार अब ठीक से रहेगी और यह उसकी जिम्मेदारी थी। माँ ने उसे कहा, ' अब जाओ, तुरंत चक्के में हवा भरवाकर लाओ.. बहूमाँ  को ऑफिस के लिए विलम्ब हो रहा है..'  पिंकी ने मुझे ऐसे देखा मानों कह रही हो, ' मम्मी जी से कुछ सीखो..ऐसे काम करवाए जाते हैं, इन छोटे लोगों से..'  शांतु, कार की चाबी लेकर चला गया था। अब पिंकी ने मुझसे बात की और कहा कि जो बात मेरी माँ ने उस गुंडे से की थी, वह असल में मुझे ही करनी चाहिए थी। मैं चुप था सिर्फ इतना कहा कि वे गरीब लोग थे और उन्हें गुंडा या बदमाश कहना ठीक न था। कुछ ही समय में शांतु आ गया और कार की चाबी दे गया था। चाबी देते समय उसने कहा, ' हां, सच में हवा ही न थी चक्के में..' माँ ने उसे शाबाशी देते हुए दस का नोट पकड़ा दिया था। पिंकी मुस्कुराते हुए मेरी ओर देख रही थी। उसने कहा, ' अब चलें रॉय साहब, आपको ऑफिस के लिए देर हो रही है.. अनुमति हो तो आपको छोड़ दूँ..'  उसकी बात सुन माँ भी मुस्कुराने लगी थी। उन्होंने एक समस्या का समाधान जो कर दिया था। ( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे, यहीं पर  ...)

Wednesday, March 10, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) -62

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra                                             http://chander1949.blogspot.com/?m=1  ( ६२ )  ऑफिस से मैंने पिंकी को फ़ोन लगाया, ' तुम्हारी कार ठीक करवा दी है.. पंचर ही था... '  उसने तुरंत कहा, '  हो ही नहीं सकता... उन गुंडों ने रात में हवा निकाली होगी... ' मैंने जोर देते हुए कहा, अरे नहीं...एक आदमी भेजा था...वह चक्का खोलकर ले गया था और ठीक करवाकर लाया था और उसने फिक्स भी कर दिया था... सौ रुपये भी लगे और मुझे ऑफिस पहुँचने में देर भी हो गयी...' मैंने उसे यह न बताया कि वह आदमी और कोई नहीं वही बस्ती का शांतु था। मैंने उसे इस काम के लिए बक्शीश भी दी थी। वह मेरी बात से असंतुष्ट लगी। उसने कहा, ' वह आदमी व्हील में हवा भर कर ले आया होगा और तुमसे बेकार में पैसे वसूल कर गया होगा... आई एम श्योर...' मैंने कहा कि वह बेफिजूल शक कर रही थी और कार में पंचर तो कभी भी हो सकता था। उसने कहा कि चलो जो हुआ सो हुआ अब आगे से न हो। मैंने उफ्फ कहते हुए कहा, 'पंचर तो कभी भी हो सकता है ... गाड़ी है, कभी कभी समस्या तो देगी ही.. चलो शाम को मिलते हैं... समय से आ जाना...' उसने कहा, ' देखती हूँ परन्तु आज भी काम कुछ अधिक ही है ...' मैंने कहा, ' ये तुम्हारा काम तो बढ़ता ही जा रहा है, यूँ ही बढ़चढ़ कर काम दिखाती रहोगी तो प्रेशर बढ़ता ही जायेगा...आज कह देना की घर में कुछ काम है और निकल आना... ऐसा करना ही पड़ता है... अधिक सच्चाई और कर्तव्यनिष्ठा अच्छी नहीं होती...'  मैं समझ पा रहा था कि उस ओर वह मेरी बात पर मुस्कुरा रही थी।  उस दिन रोबी दा ने संदेश भिजवाया कि लंच के बाद हम लोगों को कहीं जाना था। मैं तो अपना काम निपटाने में जुटा हुआ था। परन्तु रोबी दा ने फोन पर बताया कि मेरा उनके साथ जाना आवश्यक था और उन्होंने मेरे अधिकारी से इस सम्बन्ध में बात कर ली थी और मुझे चिंता की आवश्यकता न थी। उन्होंने बताया कि बैठक का स्थल मेरे घर के समीप ही था और बैठक के बाद मैं सीधे घर लौट सकता था। मुझे भी यह बात ठीक लगी और मैंने उन्हें हाँ कह दिया । लंच के कुछ समय बाद ही हम लोग ऑफिस से निकल आये थे। कार में उन्होंने एक बार फिर से कहा, 'चलो, आज घर जल्दी पहुँच जाओगे और अपनी पत्नी के साथ शाम बिता पाओगे..' मैंने उन्हें पिंकी के व्यस्त दिनचर्या के बारे में बताया। मैंने कहा कि उसका ऑफिस से लौटना पूरी तरह अनिश्चित होता जा रहा था। उन्होंने कहा कि मुझे अपनी पत्नी को समझाना चाहिए कि ऑफिस के काम में अधिक उलझते नहीं जाना चाहिए। मैंने कहा, ' मैं तो उसे समझाने की कोशिश करता रहता हूँ परन्तु वह थोड़ी जिद्दी है और अपने दायित्व को अधिक महत्व देती है...' उन्होंने कहा कि मेरी पत्नी पंजाब की थी और उसे यहाँ के हिसाब से समायोजित होने में समय तो लगेगा ही। मैंने कहा, ' हाँ वह तो ठीक है परन्तु रोबी दा, कितना समय लगेगा... आप तो दुनियादारी समझते हैं...' रोबी दा हँस पड़े थे। उन्होंने  कहा कि अंतर्जातीय विवाह किया है तो मुझे बहुत कुछ सहना भी होगा। मैं रोबी दा से हमेशा से प्रभावित रहा हूँ। उनकी इस बात ने मुझे चिंता में डाल दिया था। मैं खुद में उलझने लगा था। रोबी दा की यह बैठक भी किसी राजनीतिक दल की बैठक जैसी थी। मैं खामोश सा उनके साथ बैठा रहा था, वहाँ क्या चर्चा हो रही थी, उससे अनभिज्ञ। मेरे मन को रोबी दा के शब्द रोंध रहे थे कि अंतर्जातीय विवाह किया है तो बहुत कुछ सहना भी पड़ेगा। घर पहुँच, किसी बेचारा सा, बिस्तर पर पड़ा रहा था। कई तरह के विचार आ रहे थे। क्या मैं इसी नौकरी में रहते, धीरे-धीरे सड़ तो न जाऊंगा ? क्या मुझे अपनी शिक्षा स्तर के बारे में न सोचना चाहिए ? पिंकी तो अपने कर्म क्षेत्र में अच्छा कर रही है ? उसने अपना मित्र-वर्ग भी बढ़ा लिया है। न जाने कौन कौन सी शंकाएं मेरे भीतर, सागर की लहरों की तरह उठ उठ कर आ रही थी और अनजाने तट से टकरा रही थी, फिर से अधिक प्रबल प्रवाह से लौट आने के लिए। मुझे लगता, बैंगलोर, मुंबई या किसी अन्य शहर में जाना चाहिए जहाँ कर्म क्षेत्र के विभिन्न आयाम हैं। दूसरे ही पल लगता कि मुझे रोबी दा के साथ पूरी तरह से जुड़ जाना चाहिए और संगठन और यूनियन के प्रति समर्पित हो जाना चाहिए। एक बार यह भी लगा कि मेरा छोटा सा घर संसार हो, पिंकी सरल गृहणी की तरह इसे संभाले, मैं शाम को लौटूँ तो वह मुझे प्रतीक्षारत मिले। एक विचार यह भी आया कि अर्थ शास्त्र में आगे शिक्षा लूँ और विदेश में जाकर इस विषय पर कुछ कर दिखाऊँ। मैं मानसिक रूप से अस्तव्यस्त हो रहा था कि पिंकी का फोन आया। उसने सूचना दी कि उसे घर लौटने में विलम्ब होगा। मैंने खुद को हताश महसूस किया और नीचे जाकर, हमेशा की तरह,ऐसी  मनस्थिति में सामने की दुकान से सिगरेट सुलगाकर, बिना कुछ सोचे, दिशाहीन सा, आगे की ओर बढ़ने लगा। दो नाम मुझे मानों अपनी और आकर्षित कर रहे थे। मेरा मित्र सुब्रत और इन्द्राणी। उस दिन मैं, सुब्रत के घर की ओर बढ़ गया था।  सुब्रत पुराना साथी था। हम दोनों अपना अपना मन एक-दूसरे के साथ साझा किया करते थे। वह घर पर ही था। उस दिन, उसने सरदार अभिजीत सिंह के सम्बोधन से मेरा स्वागत किया था। उसने कहा, ' अच्छा हुआ तुम आ गए, मैं बोर हो रहा था, पर चलो थोड़ा आस-पास का चक्कर लगाकर आते हैं... ' मैंने कहा, ' ठीक है...' जैसा हुआ करता था वैसा ही उस दिन भी हुआ था। उसने सिगरेट का पैकेट निकाला और मेरी और बढ़ाया था। मैंने ना कहा तो वह हंसने लगा, ' अरे, हमारी पंजाबी भाभी ने सिगरेट पर रोक लगा दी है क्या ? मैंने उसे बताया कि ऐसी बात नहीं थी और मैंने रास्ते में ही एक सिगरेट फूंकी थी। उसने कहा कि एक फूंकी है तो दूसरी भी फूँक लेनी चाहिए। मैंने उससे सिगरेट ली और लम्बा कश लगाया। उसने कहा, 'लगता है बीबी से कुछ गर्मागर्मी हुई है...' मैंने कहा कि उसे अपनी अटकलें नहीं लगाना चाहिए, पिंकी अपने ऑफिस से देर से आने वाली थी इसलिए समय बिताने के लिए उसके पास आ गया था। हम लोग आगे बढ़ते जा रहे थे। सुब्रत लगभग एक चैन स्मोकर है। कुछ समय बाद उसने फिर मेरी ओर सिगरेट का पैकेट बढ़ा दिया था और इस बार मैंने बिना कुछ कहे सिगरेट सुलगा ली थी। सुब्रत कुछ समझने की कोशिश कर रहा था। हम एक पार्क की बैंच पर आ बैठे थे। उसने मेरा मन खंगालने की कोशिश करते हुए कहा, ' पति-पत्नी का सम्बन्ध ऐसा है कि आरम्भ में एक-दूसरे को समझने में बहुत असुविधा होती है... धीरे धीरे सब सामान्य होता जाता है या यूँ कहें कि सामान्य कर लेना होता है...' उसकी बात ने मुझे प्रोत्साहित कर दिया था और मैंने उसे कहा कि मुझे कलकत्ता से बाहर जाकर, किसी बड़ी कम्पनी में कुछ कर दिखाना चाहिए। उसका मत था कि मैं अपने माता-पिता को यहाँ छोड़कर कहीं कैसे जा सकता था। उसने यह भी कहा कि अब मेरी पत्नी का भी तो एक अच्छा-खासा जॉब है सो आर्थिक रूप से मुंबई या बैंगलोर जाना अर्थहीन होगा। साथ ही यहाँ की पारिवारिक सरलता और सहयोग बाहर न मिल पायेगा, बाहर तनावपूर्ण जीवन हो जाएगा। हम दोनों की बातें यूँ ही चल रही थी और उसके पैकेट की सिगरेटें कम होते हुए, अंतिम दो-चार ही रह गयी थीं। काफी समय बाद हम वहां से उठे तो सुब्रत ने हमारे वार्तालाप का निचोड़ निकालते हुए कहा, 'बंगाल की अपनी एक संस्कृति है... हम एक ऐसे वातावरण में बढ़े हुए हैं जहाँ से अलग हो पाना लगभग असंभव है... यहाँ का सरल जीवन है जो अनुशासन के कठोर नियम से बंधा नहीं रह सकता... हम सहज रूप से जीना चाहते हैं... सहजता हमारी जीवन पद्धति है जिसमें आलस्य है, लापरवाही है और उन्मुक्तता है... हम अल्प में संतुष्ट हैं... ऊपर उठने की होड़, प्रतिस्पर्धता तो सीखा सकती है, सहजता नहीं... तुम्हारी पत्नी इस माहौल से विपरीत सामाजिक पद्धति से आयी है, उसे भी वैसी ही कठिनाइयां स्वीकार करनी होंगी जैसी तुम्हें, यदि तुम्हें मुंबई या बैंगलोर में बसना पड़े... वैसे समय सबको परिवर्तित होना सीखा देता है...अब तुमने अंतरजातीय सम्बन्ध बनाया है तो उससे पैदा होने वाली कठिनाइयों को भी स्वीकार करना होगा.. '  मैं अपने मित्र के ज्ञान पर मुग्ध था। परन्तु वह कुछ ऐसा न कह रहा था जिसे मैं न जानता था। लगभग हर बांग्ला साहित्यक पुस्तक पढ़ने के पश्चात मुझे  कुछ ऐसा ही लगता रहा है। सुब्रत से मिलने से पहले मैं जितना उलझन में था, उससे अधिक अब मिलने के बाद था। सिगरेट का कड़वा  धुवाँ जो मेरे मुँह में चिपका हुआ था, अब दिमाग पर भारीपन बन रहा था। पिंकी मेरे धूम्रपान के खिलाफ थी। उसने मुझे इस आदत को छोड़ देने का दबाव तो कभी न दिया था परन्तु मैं उसकी इच्छा समझ सकता था और इससे दूर रहना चाहता था। आज मेरे भीतर ही भीतर एक की दोष और अपराधी भावना जाग्रत हो रही थी। उस दिन मैंने मन ही मन निश्चय किया था कि अबसे सिगरेट से दूर रहूँगा।  घर पहुँचने पर , पिंकी ने ही दरवाजा खोला था। उसने मेरे प्रवेश करते ही कहा, ' खूब सिगरेट पी कर आये हो.. तुम जानते हो ये अच्छी चीज़ नहीं है... ' माँ और बाबा सामने ही बैठे हुए थे। उन दोनों को विदित था कि मैं कभी कभी सिगरेट पी लेता था। वे चुप थे। पिंकी ने कहा, ' मुझे ये गन्दी आदत एकदम पसंद नहीं है...' अब माँ ने कहा, ' इसे आदत नहीं है... बस कभी कभी-कभार दोस्तों के साथ...'  पिंकी ने कहा, ' नहीं, कभी भी नहीं ... मेरा हस्बैंड कभी भी सिगरेट नहीं पीयेगा...' मैं समझ पा रहा था कि वह गुस्से में थी इसलिए उसकी आवाज़ में आदेश का स्वर था। मैंने कहा कि छोड़ो, कभी कभार दोस्त मिल जाये तो हो जाती है। उसे न जाने उस दिन क्या हो गया था। उसने कहा, ' ऑफिस में भी दो लोग हैं जो बिना सिगरेट के नहीं रह पाते और यहाँ घर पर भी पतिदेव हैं जो दोस्तों के नाम पर सिगरेट का धुँवा उड़ाते हैं.. ' मैंने उसे फिर से कहा कि यह कोई बहुत बड़ी बात न थी परन्तु उसने कहा, ' यह बहुत बड़ी बात है... मेरे साथ यह आदत न चलेगी...' अब मैं भी झुंझला गया था। मैं दिन भर से एक तरह के तनाव में था। मैंने भी कहा, ' ये तुम्हारा पंजाब नहीं है... जो हर काम वहाँ जैसा हो... यहाँ सिगरेट सामान्य चीज है, उसे इशू नहीं बनाया जाता...'  यह कह ऊपर कमरे में, बिस्तर पर आ गिरा था। मैं सोच रहा था कि एक तरह का दबाव मुझ पर आ रहा था। शायद पिंकी का सिगरेट विरोध नहीं बल्कि उसका खुला व्यक्तित्व था जो मेरे लिए तनाव का कारण बनता जा रहा था। ( आज बस, गुरुवार को आगे, यहीं पर...) 

Wednesday, March 3, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -61

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra                 http://chander1949.blogspot.com/?m=1    ( ६१ ) हम दोनों घर से निकलने को हुए तो कुछ तय न किया था कि कौन सी पिक्चर देखेंगे। मैंने पिंकी को सुझाव दिया कि हिंदी पिक्चर ही देख लेते हैं। उसने तुरंत न कर दिया, ' नहीं, आज तो बंगाली मूवी ही देखेंगे... आज के दो कार्यक्रम नष्ट हो चुके हैं, अब बंगाली पिक्चर भी न देखी तो पूरा दोष मुझ ही आ जायेगा.. ना, आज तो बंगाली मूवी ही देखनी है '  घर के बाहर आ मैंने कहा कि बंगाली पिक्चर के लिए तो दूर के सिनेमा हॉल में जाना होगा जब कि हिंदी पिक्चर पास के ही सिनेमा हॉल में चल रही थी और वहां हम पैदल ही जा सकते थे। पिंकी हंसने लगी, ' ये दूर-पास का बहाना न चलेगा..मैं कार की चाबी लेकर ही आयी हूँ... जितना भी दूर जाना हो, पिक्चर तो बंगाली ही देखेंगे...' वह दूर खड़ी अपनी कार की ओर बढ़ गयी थी। हमारे घर का कार का गैराज है किंतु अपनी कार न होने के कारण हमने उसे किराये पर दे रखा था। पिंकी की कार घर के एक कोने में खुले में रखनी होती थी। उसने देखा कि कार पर कुछ गंदे कपड़े, धोकर सूखने के लिए डाले हुए थे। ये साथ की बस्ती के लोगों का काम था। पिंकी मुझसे पहले भी इस बात की शिकायत कर चुकी थी कि हर सुबह उसे उन कपड़ों को हटाने के लिए, बस्ती वालों को आवाज़ देनी होती थी और उसे विलम्ब हो जाता था। मैंने उसे तब कहा था कि मैं उन लोगों को कह दूँगा। आज फिर अपनी कार पर कपड़ों को पाया था वह गुस्से में आ गयी थी। उसने मुझे कहा, ' देखो, ये हाल है.. अब पहले इन्हें हटाओ फिर कार निकालो ...मैं नहीं कुछ करुँगी ... जो कुछ करना है, आप ही करो ... मुझे मेरी कार पर गंदगी नहीं चाहिए...जिनके कपड़े हैं अपने घर में सुखायें...मेरी कार इस काम के लिए नहीं है... ' मैंने उससे शांत रहने को कहा और बस्ती के एक लड़के को आवाज़ देकर बुलाया और कपड़े हटा देने को कहा। पिंकी ने कहा, ' आज ही नहीं..कभी भी कार पर कपड़े नहीं होने चाहिए... अगर दिखे तो मैं छोडूंगी नहीं...चाहे पुलिस को रिपोर्ट करनी पड़े...' मैं उसे शांत रहने का प्रयत्न करने लगा। लड़का कपड़े समेट ही रहा था कि उसका पिता सामने आ गया था। उसने शायद पुलिस शब्द सुन लिया था। उसने मुझसे कहा, ' इतना क्या हो गया कि भाभीजी नाराज़ हो गयी हैं... खड़ी गाड़ी पर दो-चार कपड़े सूखने डाल देने से क्या गाड़ी ख़राब हो जाएगी ? मैं उसे जानता था और शान्तु दा कहकर बुलाता था। मैंने उसे समझाते हुए कहा कि ऐसी कोई बात नहीं थी बस कार पर कपड़े न डाला करो। उसने कहा, ' रात भर  कार की देखभाल भी हम ही तो करते हैं... भाभी तो पुलिस की बात कर रही है...अब तो इस कार से हम दूर ही रहेंगे... बड़े लोगों की बात है, हम तो गरीब काम-काजी लोग हैं ...' उसकी बात में एक तरह का तंज़ था। मैं समझ रहा था कि असल में वह क्या कह रहा था। मैंने उस शांत रहने का इशारा किया और पिंकी को कहा कि चलो।  हम दोनों निकल तो आये परन्तु पिंकी का मूड उखड़ा हुआ था। उसने कहा कि वह आदमी तो गुंडा जैसा लग रहा था और मुझे उससे डाँटकर बात करनी चाहिए थी। उसने कहा, ' चंडीगढ़ होता तो इसे दिखा देती...' मैंने कहा, ' इन लोगों के मुँह नहीं लगना चाहिए... बाद मैं मौका देखकर मैं इसे समझा दूँगा   ...' पिंकी ने हूँ कहकर, गाड़ी के एक्सीलेटर पर पैर दबा दिया था। उसने कहा कि ऐसे लोगों से उन्हीं की भाषा में बात की जानी चाहिए, ' कल देखती हूँ, अगर मेरी कार पर कपड़े सुखाये तो देख लूंगी...' मैंने उसे गुस्सा दिखाते हुए कहा, ' अब बस भी करो, कहा तो है, मैं बात करूँगा...वे बस्ती के काम काजी लोग हैं, उनसे सोच-समझकर  निपटना होता है...' पिंकी अभी भी सहज न थी। उसने कहा, ' देखती हूँ आपकी समझदारी और टेक्ट ?  हम लोग कार को एक और खड़ा कर बाहर आ गए। सिनेमा हॉल के प्रवेश द्वार के ऊपर बड़े पोस्टर को देख वह हंसने लगी। पोस्टर में फिल्म के नायक के गले में फूलों की मालायें डाली हुई थी। उसने हैरान होते हुए कहा, ' ये क्या, हीरो का ऐसा सम्मान ?  मैंने कुछ न कहा बस उसे अंदर आने को कहा। पिक्चर हॉल का वातावरण देख कर वह चौंक गयी थी। शायद यह चंडीगढ़ से भिन्न सा था। यह एक बंगाली फिल्म प्रचलित फिल्म थी। मैं जानता था कि बांग्ला सिनेमा जिसने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की हुई है, से यह पूर्णतः उससे अलग फिल्म थी। मैं उसे यह फिल्म न दिखाना भी न चाहता था परन्तु विवश था। पिंकी किसी तरह फिल्म देखती रही थी। पूरा समय वह कभी हंसती, कभी चुटकी लेती और कभी हैरान हो जाती थी। उसे वहां का माहौल और दर्शक वर्ग अच्छे न लगे थे। फिल्म समाप्ति पर बाहर आये तो उसने कहा, ' इससे अच्छा तो हिंदी फिल्म ही देख लेते...' मैंने उसे समझाते हुए कहा, अरे ! ऐसी फिल्में भी बनती हैं, ये आम लोगों के लिए हैं... किसी अन्य दिन अच्छी बांग्ला फिल्म देखेंगे...सत्यजीत रे और मृणाल सेन का नाम सुना है न ? उसने कहा, ' मैं जानती हूँ कमर्शियल सिनेमा होता है... परन्तु ये फिल्म तो उस हिसाब से भी नहीं थी, ये तो रूढ़िवादी भावनाओं को प्रोत्साहित करने वाली, बहुत ही बेकार फिल्म थी... समय बेकार गया ... इससे अच्छा तो घर में ही आराम करते और टीवी देखते...' मैंने चिढ़ते हुए कहा, ' अब बस भी करो...तुम्हें सत्यजीत रे की फिल्म दिखाऊंगा.. तब तुम्हें पता चलेगा कि असली सिनेमा क्या होता है और कहानी क्या होती है ...'  हम घर पहुंचे तो कार खड़ी करते हुए फिर से वही बात आ गयी, ' फिर से मेरी कार पर कपड़े सूखते हुए दिखे तो देखना, कैसा मज़ा चखाती हूँ, इन गधों को...' मैंने कहा, ' अंदर चलो, उन लोगों ने सुन लिया तो बे वजह एक झंझट उठ खड़ा होगा... ऐसे लोग तो मौके की तलाश में रहते हैं कि कोई इशू मिले   ...' हम अंदर आये तो माँ ने फिल्म के बारे में पूछा। फिल्म का नाम सुनते ही वह पारंपरिक बंगाली अंदाज़ में छी.. छी.. करने लगी थी। उन्होंने कहा, ' अरे! कोई अच्छी फिल्म दिखाते...' पिंकी ने चुटकी लेते हुए, व्यंग्य भाव से कहा, ' इन्हें ऐसी ही फिल्में पसंद होंगी, इसीलिए मुझे ले गए थे ...' मैं झेंप गया था। पिंकी ने कार पर कपड़े सुखाने वाली बात भी माँ को बताई। मैंने कहा, ' तुम्हें कहा है न, मैं बात करूँगा ...अब माँ को बताने की क्या जरुरत थी...' माँ ने मेरा विरोध करते हुए कहा कि बताया तो क्या हुआ था ? साथ ही उन्होंने मुझे हिदायत देते हुए कहा, शांतु से कहना कि मैंने मना किया है, हमारी कार पर कोई कपड़ा-वपडा न डाले ...मेरा नाम लेना... वो बदमाश आदमी है, तुम्हारी बात न सुनेगा ...' मुझे माँ की यह बात ठीक न लगी थी। मैंने कहा कि शांतु मेरी बात क्यों न सुनेगा ? माँ की बातों से पिंकी भी थोड़े जोश में आ गयी थी।   सुबह रोज की तरह वह अपने ऑफिस के लिए निकली थी। उसने देखा कि एक पुराना और एक गन्दा जीन्स पेंट उसकी कार की शोभा बड़ा रहा था। वह गुस्से में आ गयी थी और उसने उसे एक ओर फेंक दिया था और कार स्टार्ट कर निकल गयी। मैं ऊपर बालकोनी से देख रहा था और समझ रहा था कि यह  ठीक न हुआ था। शाम को वह देर से लौटी थी। वह थकी हुई भी लग रही थी। मैंने सुबह वाली बात उठाई और उससे कहा कि किसी का कपड़ा एक और नहीं फेंक देना चाहिए था। उसने मुझे निराशा से देखा और कहा कि आज का दिन वह बहुत व्यस्त रही थी और थकी हुई थी और इस फ़िजूल से विषय में नहीं उलझना चाहती थी।  मैंने व्यंग्य के स्वर में कहा, ' तुम और थकान, कैसी पंजाबी लड़की हो ? उसने भी कड़ा सा जवाब दिया, ' हाँ, पंजाबी लोग थकते थोड़े ही हैं... वे तो स्टील के बने होते हैं ..' उसने बिशाखा से भी जोर के भाव में कहा, ' दीदी, कुछ खाने को मिलेगा ? कुछ भी दो जल्दी दो.. इस पंजाबी लड़की को भूख भी लगती है...' मैं उसका मुँह ताकता रह गया था। उसने जल्दी जल्दी जो भी परोसा गया था, खाया और ऊपर कमरे में चली गई थी। मैंने वहां जाकर उससे पूछना चाहा तो वह एक बार फिर से छिटक गयी और कहा, ' आप रहने दो...अपने रोबी दादा की छत्र छाया में आराम करो... मुझे आज सोने दो...'  मैं क्या कहता बस यही सोचकर रह गया कि एक बड़े संस्थान के दायित्व पूर्ण पद पर काम कर रही है, तो मानसिक दबाव होगा ही। हम दोनों चुपचाप लेट गए थे। एक-दो घंटे बाद मैंने उसे टटोलने का प्रयास किया तो उसने झुंझलाते हुए मुझे अलग कर दिया और दो शब्द कहे, ' सोने दो... ' इन दो शब्दों में इतना प्रभाव था कि मैं एक ओर हो गया था और काफी देर तक जागता रहा था। मैं सोच रहा था कि कहीं उसका कोई अपरिचित रूप तो सामने नहीं आ रहा था ? सुबह, वह हर दिन की तरह सामान्य थी। बिशाखा और माँ से हँस-हँस कर बातें कर रही थी। रात वाला आक्रोश अब उसके चेहरे पर न था। उसने बताया कि वह दिन भी खूब व्यस्त जाने वाला था। तीन मीटिंग्स भी थी। मैंने उसे कहा कि अगर ऐसी बात थी तो उसे उस दिन म्यूजिक क्लास छोड़ देनी चाहिए थी। उसने एक अनोखा सा अंदाज़ दिखाते हुए कहा, ' अरे वाह ! ऑफिस में काम है तो सुबह की रूटीन मिस कर दूँ ? हम पंजाबी हैं, बाबू मोशाय ! किछू भी छोड़ेंगे नहीं.. ' वहऑफिस के लिए तैयार हो नीचे आ गयी थी। उसने देखा कि कार का एक चक्का बैठा हुआ था। वह परेशान हो गयी थी। उसने नीचे से ही बिशाखा और मुझे आवाजें दी। मैंने बालकनी से झाँका तो उसने इशारे से मुझे कार का बैठा हुआ चक्का दिखाया। मैं दौड़ता हुआ नीचे गया। वह गुस्से में थी, ' देखो, क्या किया है ...'   मैंने कहा, ' अरे पंचर हो गया है ? तुम आज टैक्सी से चली जाओ ...' उसने कहा, ' पंचर नहीं हुआ है...हवा निकाली  गयी है... और इन लोगों को सिर पर चढ़ाओ...' मैंने उसे धैर्य रखने को कहा। भाग्य से एक टैक्सी मिल गयी और मैंने उसे बिठाया और रवाना किया। जाते जाते वह गयी कि अपने उस बदमाश दादा से इस समस्या को सुलझा कर रखना। पिंकी तो चली गयी थी परन्तु मैं उसकी कार को ठीक करवाने में लग गया था और विलम्ब से अपने ऑफिस पहुंचा था। मैं बहुत खिन्न हो रहा था और सोच रहा था कि कार को रखना तो सरल काम न था। ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर ... )

Wednesday, February 24, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) - 60

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra     http://chander1949.blogspot.com/?m=1  ( ६० )  पिंकी ने इन कुछ माह में ही अपने कार्य स्थल पर अच्छी खासी जगह बना ली थी। हर शाम हम परिवार वाले मिलते तो पिंकी की ही बातें होती थी। उसके घर लौटने का समय अब अनिश्चित सा हो गया था। अक्सर देर से पहुँच पाती थी। आज ये हो गया था, आज वो हो गया था.. आज मीटिंग थी.. आज वहां जाना पड़ गया था ..' वह घर आती तो ऐसी बातों से ही शुरुवात होती थी। एक दिन मैंने उसे कहा था कि अपने काम में उतना ही उलझना चाहिए, जितना आवश्यक हो, उससे अधिक नहीं। परन्तु उसने कहा था कि अपने काम को उस स्तर तक ले जाना चाहिए जो श्रेष्ठम हो, भले ही इसके लिए कितना ही श्रम और समय क्यों न देना पड़े। बाबा मेरी बात में सहमति जताते और उसे कहते कि वह थक जाती होगी। इस पर वह कहती कि क्या उन्हें वह थकी-हारी दिखती थी ? उसका तर्क होता कि जब वह किसी दायित्व को सम्पूर्णता में निपटाती है तो उसे जो संतोष मिलता है वह उसके लिए सबसे विश्राम वाला पल होता है। वह सदैव स्फूर्ति से भरी दिखती थी। मुझे सुस्ताता देखती तो हँसते हुए कहती, ' क्यों, क्या आज फिर अधिक खा लिया है ? बिशाखा से कहूँगी, आपको माछ-भात कम दिया करे .. ' मैं मुस्कुरा देता था और कहता, ' चलो, तुमने माछ-भात कहना तो सीख लिया है.. आराम भी आवश्यक है, ज़िन्दगी में.. तुम भी सुस्ता लिया करो.. माछ-भात खा कर.. ' उसका जवाब होता, ' संडे है न रिलैक्स करने के लिए ..'  मैं उसकी बात पर मन ही मन सोचता कि इस  लड़की ने अपनी कैसी दिनचर्या बना रखी है। सप्ताह में सुबह चार दिन जॉगिंग और दो दिन म्यूजिक क्लास जाती है, फिर भागते-दौड़ते प्रातः के कर्म निपटाती है और बाय मम्मी जी - बाय पापा जी कहते हुए, अपने होटल की तरफ दौड़ती है। घर लौटने का कोई निश्चित समय नहीं। संडे की बात कर रही है पर उस दिन तो यह बिशाखा को छुट्टी दे देती है। उसे कहती है, ' दीदी, आज आप बैठो...आज मैं खिलाती हूँ...' इसके अलावा माँ भी उसको अपने साथ यहाँ-वहाँ ले जाने को आतुर रहती है। पिंकी को अपने साथ ले चलने में क्या माँ को एक तरह का आत्मबल मिलता था ?  मैंने निश्चय किया कि एक रविवार को पिंकी को साथ लेकर कहीं घूमने जाया जायेगा। मैंने उसे दो दिन पहले ही कहा था, 'संडे को फ्री रहना.. हम लोग कहीं दूर जायेंगे.. ' फिर मैंने उसे बताया कि सुबह बेलूर मठ जायेंगे, लंच एक खास बंगाली होटल में खाएंगे और फिर एक पिक्चर देखेंगे..' वह बहुत खुश थी। उसने कहा, ' बंगाली पिक्चर दिखानी होगी..लवली पूछती रहती है कि कोई बंगाली पिक्चर देखी या नहीं ? मुझे उसका प्रस्ताव अच्छा लगा था। मैंने कहा कि बंगाली पिक्चर ही देखेंगे। मैं दो दिन तक रविवार का इंतज़ार करता रहा था। आज रविवार था। हम दोनों ही उत्साहित थे। रात को ही यह तय किया था कि सुबह ही निकल जाएँगे। सब ठीक था कि पिंकी के लिए उसके कार्यालय से फ़ोन आ गया था। कुछ विशेष कार्य आन पड़ा था और उसे बुलाया जा रहा था। पिंकी ने स्पष्ट शब्दों में इनकार कर दिया था। उसने कहा कि उसके कुछ कार्यक्रम पहले से ही तय थे और किसी भी हाल में उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता था। हम घर से निकल ही रहे थे कि उसका मोबाइल बज उठा था। ये उसके विभाग के वरिष्ठ प्रबंधक का कॉल था। पिंकी, एक ओर होकर मोबाइल पर ग़ौर से बात सुनती रही और यस सर कहकर मेरे पास आयी। उसने कहा, ‘ मैं होकर आती हूँ .. इस काम को टाला नहीं जा सकता .. मैं एक-दो घंटे में ही आ जाऊँगी..’ मैंने कहा, ‘ तुम्हें एकदम पक्का होकर ना कहना चाहिए था.. सप्ताह में एक दिन तो अपने लिए होना ही चाहिए..’ उसने कहा, सर ने ख़ुद कॉल किया था, उन्हें ना नहीं किया जा सकता..’ मैंने कहा,’क्यों नहीं.. आज संडे है..’ उसने कहा, ‘ जब दायित्व होता है और किसी को आप पर विश्वास होता है तो ना नहीं कर सकते..’ मैंने कहा,’ तुम्हारी जगह मैं होता तो कभी न जाता..’ पिंकी को मेरी बात असत्य सी लगी थी। उसने कहा, ‘ क्या आप अपने रवि साहब को उस दिन ना कर पाए थे ? थोड़ा संयम रखो ..मैं होकर आती हूँ .. बेलूर मठ किसी अन्य दिन चले जायेंगे ..आज लंच एक साथ लेंगे और पिक्चर भी देखेंगे ..और दोनों बंगाली ..’ उसने मुस्कुराते हुए मेरा हाथ दबा दिया था। मैं परेशान तो हो रहा था परंतु मैं भी मुस्कुरा दिया था। मैंने कहा, ‘ चलो ..जल्दी आना .. लेकिन तुम्हारे ऑफिस के काम और रोबी दा के काम में फ़र्क़ है ..वह सामाजिक दायित्व है.. दोनों का अंतर तुम्हें समझना चाहिए ..’ उसने कुछ भी उत्तर न दिया और मुस्कुराते हुए निकल गयी थी, यह कहकर कि जल्दी आने की कोशिश करेगी। मैं उसकी प्रतीक्षा में उबासियाँ ले रहा था। एक बंगाली उपन्यास हाथ में था जो मेरा साथ दे रहा था। मैं पन्ने उलटता रहा और उस कहानी को किसी-किसी मोड़ पर खुद से जोड़ता रहा था। अचानक घड़ी में देखा तो सुइयाँ एक बजे की स्थिति को पाने की होड़ में दौड़ रही थीं। अरे! यह पंजाबी लड़की अभी तक नहीं आयी ? यह बेचैनी उस उपन्यास के लेखक पर पड़ी थी। मैंने प्रथम पृष्ठ पर छपे उसके नाम को अपने पैन से इस तरह से उलझाया था कि उसके अर्थ को अनर्थ कर दिया था और पुस्तक को अलग पटक दिया था। लगभग दो घंटे बाद पिंकी ने घर में प्रवेश किया। वह सॉरी -सॉरी कह रही थी और मैं खामोश था। उसने कहा,' क्या बताऊँ.. निकल ही रही थी तो निखिल ने खबर दी और मैं रुक गयी ..निखिल ने कहा कि अजय देवगन होटल में आ रहा था  .. मैंने सोचा उसे पास से देखने का मौका है .. थोड़ी देर रुक जाती हूँ..मेरा पसंदीदा एक्टर है ..बस यह थोड़ी देर, अधिक होती चली गयी और मैं वहीं  अटक गयी.परन्तु,  इस रुकने का फायदा भी हुआ..मेरी एक फोटो उसके साथ खिंच गयी है..मिलेगी तो लवली को भेजूंगी..' वह किसी बच्चे की तरह एक साँस में कह गयी थी। मैं बहुत ही अधिक कुढ़ा हुआ था और भूख से भी ग्रस्त था। मैंने मन ही मन उसके सहायक निखिल को मनपसंद गाली दी और उसे कहा, ' एक तो सुबह का प्लान खत्म हो चुका था और अब तुमने लंच भी बेकार कर दिया.. अजय देवगन है क्या जो उसके लिए इतनी देर तक छुट्टी बेकार कर दी ? उसने मुझे देखा और कहा, ' सॉरी पर अजय देवगन को पास से देखने का मौका था.. कैसे छोड़ देती ? मैंने कहा, ' वो पंजाबी है इसीलिए न ? पिंकी ने मुझे घूरते हुए कहा, ' ये बात नहीं है.. वो अच्छा अभिनेता है और मेरा पसंदीदा है.. क्या तुम ने उसकी कोई फिल्म देखी है ? और  पंजाबी-वंजाबी वाली बात होती तो आज मैं यहाँ ने होती.. मेरी तरह उसने भी एक बंगाली से शादी की है..' वह हँस रही थी। मैंने पैर पटकते हुए बिशाखा को आवाज़ दी और पूछा, ' कुछ खाने को मिलेगा, तुम्हारी बहू माँ ने लंच के बारह बजा दिए हैं..' पिंकी ने हँसते हुए कहा, ' बारह लंच के नहीं हम सरदारों के बजते हैं ..आपके लंच के तो तीन बज रहे हैं.. देर हो रही थी तो मैं रास्ते से तुम्हारा मनपसंद चाइनीस पैक करवा कर लायी हूँ .. आओ मुझे भी बहुत भूख लग रही है..' उसने बैग से लंच के चार डिब्बे निकाले। मैंने देखा, वह एक महंगे रेस्टॉरेंट का खाना था। मैंने कहा, ' इतने महंगे रेस्टॉरेंट से लाने की क्या जरूरत थी..' उसने फिर से चुटकी लेते हुए कहा ..' कभी कभी चलता है..हर बार महँगा-सस्ता नहीं देखा जाता..' बिशाखा ने प्लेटें लगा दी। पिंकी ने मुझे बुलाते हुए कहा, ' जल्दी आओ, अभी गरम है, खा लो ..' भूख तो लगी हुई थी, मैं खाने बैठ गया था। पिंकी भी चाव से खा रही थी। उसने बिशाखा से पूछा, मम्मी जी-पापा जी खाये छे ? '  इन दिनों वह बांग्ला बोलने का प्रयास करती थी। मैंने कहा, ' और नहीं तो क्या तुम्हारे इंतज़ार में बैठे रहते ? उसे मेरे कहने का अंदाज़ अच्छा न लगा था, ' वे दोनों तो घर पर ही खाने वाले थे..बाहर जाकर तो हम दोनों को ही खाना था..आप बिना वज़ह नाराज़ हो रहे हैं ..कभी कभी ऐसा हो ही जाता है.. इसमें इतना कुछ खोजने की क्या जरुरत है..' कभी हल्की सी बात भी अनचाहे ही गहरी हो जाती है। शायद उस दिन ऐसा ही हुआ था। आज सालों बाद याद कर रहा हूँ तो खुद पर क्रोधित और शर्मशार हो रहा हूँ। पिंकी अपने दायित्व को ही तो निभा रही थी। उसे शायद मुझसे सहानुभूति और कुछ स्नेह भरे शब्दों की आशा थी। एक मैं था, जो अधिक तो न बोल रहा था परन्तु मेरी बातों में एक तंज़ का स्वर था। किसी अभिनेता के प्रति झुकाव किसी भी लड़की के लिए स्वाभाविक है। एक उम्र के लड़के लड़कियों में यह होता ही है। मैं स्वयं भी तो उन दिनों एक बंगाली अभिनेता के प्रति आकर्षित हुआ करता था। उस दिन वह स्वादिष्ट लंच एक फ़ांस सा हो गया था। हम दोनों खा तो रहे थे परन्तु खामोश थे। ऐसा खाना केवल पेट के लिए होता है। वह भूख को समाप्त तो कर सकता है परन्तु आनंद और संतुष्टि नहीं दे सकता।  शाम को सरलता लाने के मकसद से मैं पिंकी के करीब आया था। वह माँ के बिस्तर पर ही विश्राम कर रही थी। मैंने उसे कहा, ' पिक्चर चलना है न ? उसने तुरंत तो उत्तर न दिया परन्तु मेरे दोबारा पूछने पर कहा, 'अब मन नहीं हो रहा .. थोड़ा सिरदर्द भी है ..आज नहीं, फिर कभी ..' मैंने उसे मनाने की कोशिश न की थी और न ही कुछ अधिक बोला था।  मैंने केवल कहा, ' मैं समझ सकता हूँ.. काम का प्रेशर हो रहा है, तुम पर..आराम करो ..' वह बोली नहीं ऐसी कोई बात नहीं है .. चलो चलते हैं..बेलूर मठ जाने और बंगाली लंच का कार्यक्रम तो खत्म हो गया है.. अब  बंगाली फिल्म का कार्यक्रम तो हो ही जाये.. चलो, मैं पांच मिनिट में तैयार हो जाती हूँ.. ' वह एक बार फिर से अपने स्वभाविक खुशमिज़ाज़ स्वरुप में थी। ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर )

Wednesday, February 17, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )- 59

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra                   http://chander1949.blogspot.com/?m=1  ( ५९ )  दूसरे  दिन जब हम सभी नाश्ते पर मिले तो माँ ने उस सेमिनार की बात फिर से छेड़ दी थी। उन्होंने मुझे कहा कि एक दिन का समय हाथ में था सो मुझे मनप्रीत को गाइड करना चाहिए। मैनें कहा कि उसे किसी मार्गदर्शन की आवश्यकता न थी। किंतु माँ ने कहा कि हमें मिलकर विषय का पुनर्पठन करना चाहिए। साथ ही कलकत्ता कार्पोरेशन और पश्चिम बंगाल के नियमों आदि के बारे में मुझे मनप्रीत को बताना चाहिए। मैंने पिंकी की ओर देखा तो ऐसा लगा कि वह माँ की बात से सहमत थी। मैंने कहा, ' ऊपर चलो, कुछ देख लेते हैं जो शायद कल तुम्हारे का आ जाये..' हम अपने कमरे में आ गए और मैं जहाँ तक संभव हो सका, उसे संभावित बातों और विषयों की जानकारी देता रहा था। पिंकी खुद में बहुत सुलझी हुई लड़की थी। वह किसी भी बात की पूरी जानकारी लेने में संकोच न कर रही थी। पूरा दिन उसी के साथ बीत गया था। दोपहर का खाना और शाम की चाय भी बिशाखा ऊपर ही दे गयी थी। देर से हम लोग, माँ के बुलाने पर पर नीचे आने लगे तो पिंकी ने कहा, ' एकाउंट्स पर आपकी जो पकड़ है, वह अद्भुत है..इतना सब ज्ञान कहाँ से प्राप्त किया ? उसकी प्रशंसा मुझे अच्छी लगी थी। मैंने कहा, ' तुम भी कुछ कम नहीं हो..कल तो तुम जीतकर ही आओगी.. मैं लिख कर दे सकता हूँ ..' माँ ने हम दोनों को हँसते हुए देखा तो कहा कि अब आराम करना चाहिए क्यों कि पूरा दिन हम विषय पर ही चर्चा करते रहे थे और मुझे इंटरव्यू में फ्रेश दिमाग के साथ जाना चाहिए। पिंकी ने कहा, ' हाँ, मम्मी जी, अब बस..जितना कुछ कर सकते थे कर लिया, अब बाबा का आशीर्वाद चाहिए .. ' बाबा का आशीर्वाद, यह सुन माँ ने पिंकी का माथा चूम लिया था। पिंकी ने तो अपने नानक बाबा का आशीर्वाद माँगा था किंतु माँ ने शायद इसे अपने लोक नाथ बाबा से जोड़ लिया था।  सुबह पिंकी उत्साह से भरी दिखी थी। उंसने कहा कि वह मुझे मेरे ऑफिस पर ड्राप कर इंटरव्यू  के लिए निकल जाएगी। हम दोनों समय से तैयार थे। पिंकी अपनी पंजाबी पोशाक में, किसी को भी अभिभूत कर लेने की क्षमता में थी। एक चमक थी उसके चेहरे पर जो आत्मविश्वास को साफ दिखा रही थी। उसने माँ-बाबा के पाँव छुए तो कुछ बिना कुछ बोले ही उनके आशीर्वाद के स्वर झरते दिखे थे। बाबा ने अवश्य कहा, ' तुम को असफल करे, इतना साहस किसी में न होगा.. निश्चिंत होकर जाओ..'  मैं भी जानता था कि वह निश्चय ही सफल होगी। मुझे मेरे ऑफिस के समीप उतार, वह मुस्कुरा कर कार से बाहर आयी और हमने एक-दूसरे को आलिंगन में लिया। मैंने कहा, ' आल द बेस्ट..' वह एक चुस्त-दुरुस्त एग्जीक्यूटिव की तरह, अपनी मारुती कार में आगे निकल गयी थी।  मैं ऑफिस में काफी समय तक उसके ही बारे में सोचता रहा था। फिर अपने काम में ऐसा व्यस्त हुआ कि दिन कब कट गया पता ही न चला। घर फोन किया तो बिशाखा ने बताया कि माँ-बाबा दोनों घर पर न थे और पिंकी अपने कमरे में थी। मैंने कहा, ' ठीक है.. कहना मैंने फोन किया था और मैं समय से घर पहुँच जाऊँगा..' जब मैं घर पहुंचा तो माँ-बाबा भी आ चुके थे। पिंकी उनके साथ हँसते-मुस्कुराते हुए बैठी थी। मैंने घर में घुसते ही उससे पूछा, 'कैसा रहा इंटरव्यू ? उसने मुंह बनाते हुए कहा, ' ठीक था..' उसका मुँह देख माँ-बाबा दोनों जोर से खिलखिला पड़े थे। बाबा ने कहा,' अरे ! हमारी बहू ने तो कमाल ही कर दिया है.. पूछो इससे .. ' मैंने पिंकी की ओर जिज्ञासा के साथ देखा। उसने कहा ,' ऐसा कुछ नहीं है..वे लोग मुझे कुछ एक्स्ट्रा कार्य देना चाहते हैं..मैंने अभी कुछ कहा नहीं है.. ' जब मैंने उससे विस्तार से बताने को कहा तो उसने बताया कि वे उसे फाइनेंस में केवल परियोजना का कार्य देना चाहते हैं  लेकिन उसे साथ में कॉर्पोरेट वर्ग के विशेष अतिथियों के सत्कार विभाग की ज़िम्मेदारी दे रहे हैं। मैंने कहा कि यह तो बहुत अधिक कार्य हो जायेगा और उसे ना कर देना चाहिए। माँ ने कहा,' तुरंत निर्णय नहीं लेना चाहिए ..' मैंने कहा, ' सैलेरी एक और काम दो ? यह उचित नहीं होगा। पिंकी ने कहा कि ऐसी बात नहीं है.. फिर उसने प्रस्तावित सैलेरी के बारे में बताया तो मैं सकते में आ गया था। मेरा राष्ट्रीय कृत बैंक मुझे जो दे रहा था, यह राशि उससे चौगुनी से भी कुछ अधिक थी। अब मैं भी सोचने को विवश था। मैंने कहा, ' पिंकी, तुम पर है, जैसा तुम ठीक समझो..' काफी देर तक चर्चा चलती रही थी। पिंकी ने अपने मामाजी और पापा जी को भी बता दिया था और दोनों का मत था कि उसे यह जॉब जरूर स्वीकार करना चाहिए था। अंत में यही निश्चय हुआ कि अगले दिन पिंकी अपना स्वीकृति पत्र भिजवा देगी और नया कार्य आरम्भ कर देगी। जो प्रस्ताव पत्र उसे मिला था उसमें 'तत्काल प्रभाव से' लिखा था। इसका अर्थ था कि वह चाहे तो कभी भी दायित्व संभाल  सकती थी। बाबा ने कहा कि उसे अपना पत्र तो कल भिजवा देना चाहिए और आगामी एक तारीख से ज्वाइन कर लेना चाहिए। पिंकी को भी यही ठीक लगा था। एक तारीख आने में कुछ ही दिन थे। माँ को भी यह बात ठीक लगी थी। उन्होंने कहा कि कल ही वह उसे लेकर एक आश्रम में जाएँगी और वहाँ पूजा-अर्चना करेंगी। पिंकी मुस्कुरा रही थी, उसने कहा, ' पर, मम्मी जी, कल सुबह पहले मैं आपको गुरुद्वारे लेकर जाऊँगी उसके बाद आपके आश्रम जायेंगे..' उसने मेरी ओर देखते हुए कहा, ' कल आप गुरुद्वारे में मत्था टेकते हुए, ऑफिस जाना..'  मैंने हां में सिर हिलाया और कहा,' ठीक है..'  माँ ने कहा कि मुझे भी साथ में आश्रम जाना चाहिए और एक दिन का अवकाश ले लेना चाहिए। मैंने कहा कि यह संभव नहीं था क्योंकि मुझे रोबी दा ने कुछ कार्य सौंपा हुआ था। अब यह निश्चय किया गया कि गुरुद्वारे से मैं ऑफिस चला जाऊँगा और वो दोनों घर आ जायेंगे और संध्या में उस आश्रम जायेंगे।  सब कार्य ठीक से होते चले गए थे। एक तारीख से पिंकी ने अपना कार्य संभाल लिया था। हम दोनों एक साथ घर से निकलते थे। वह मुझे ड्राप करते हुए आगे बढ़ जाती थी। एक दिन जब में ऑफिस के सामने कार से उतर रहा था तो सामने रोबी दा दिख गए थे। मैंने पिंकी को इशारे से कार से बाहर आ जाने का संकेत दिया। पिंकी ने उन्हें नमस्कार किया तो रोबी दा ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा, ' बहुत अच्छा लग रहा है, तुम दोनों को देखकर..अभिजीत ने मुझे सब कुछ बताया है..  एक साथ अपने अपने काम को निकलते हो..यह बहुत अच्छा है..पर हॉस्पिटलिटी इंडस्ट्री में शाम का लौटना ठीक नहीं होता.. बहुत ज़िम्मेदारी वाला काम होता है .. वर्ना इसे यहाँ से लेते हुए, एक साथ ही घर भी लौटते..' वह एक साँस में सब कह गए थे। पिंकी ने कहा, ' सर, अभी चलती हूँ..एक दिन आइये न हमारे घर..'  वह कार स्टार्ट कर, तेजी से आगे निकल गयी थी। मैं और रोबी दा, अपने संगठन और देश की बिगड़ती स्थिति की बातें करते हुए, अपने कार्यालय की ओर बढ़ गए थे। शाम को पिंकी से बात हुई तो उसने कहा, ' ये तुम्हारे रवि साहब मुझे पसंद नहीं.. ऐसा लगता है... बहुत पेंचदार आदमी हैं...' मैंने कहा, ' नहीं, अच्छे आदमी हैं... मेरे नाना की बहुत इज्जत करते थे और अब माँ को भी बहुत मानते हैं... काफी रुआबदार हैं... राइटर्स बिल्डिंग में बहुत पहुँच है, उनकी...'  ' हाँ, ऐसे ही लोगों की ऊपर तक पहुँच होती है... पर मुझे पसंद नहीं आ रहे, तुम्हारे ये रवि साहब...' पिंकी ने रूखे स्वर में मेरी बात का उत्तर दिया था।  ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर  ... )