Chander Dhingra's Blog
Wednesday, December 30, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 52
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हफ्ते वार इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे .. )
( ५२ ) कुछ समय बाद माँ और पिंकी लौट आये थे। बाबा के मित्र भी अपने घर जाने का मन बना चुके थे। माँ को देखा तो वह उठ खड़े हुए थे। माँ ने लगभग चिढ़ाते हुए स्वर में कहा, ' ये क्या दादा, मैं आई और आप चल दिए ? काका ने सौम्य सी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ' नहीं ऐसी बात नहीं है, काफी समय से आया हुआ हूँ, अब तो जाने ही वाला था.. अच्छा हुआ जो आप से और बहू माँ से भी मिलना हो गया..' पिंकी समझ गयी थी कि वह पापा जी के घनिष्ट दोस्त थे। उसने माँ की बात सुनी तो तुरंत बोली, ' नहीं अंकल, अब तो आप को कुछ देर रुकना ही होगा.. चलिए, मैं आपको अपने हाथ की पंजाबी चाय पिलाती हूँ..' काका ने कहा कि वह बिशाखा के हाथ की चाय पहले ही पी चुके थे। पिंकी ने हँसते हुए कहा, 'अंकल, जो बिशाखा दीदी ने आपको सर्व की होगी वह तो बंगाली चाय रही होगी और उसे आपने खाया होगा.. मेरी तो पंजाबी चाय होगी, उसे तो पीना पड़ेगा .. ' उसकी इस बात पर सब हँस पड़े थे। माँ भी मुस्कुरायी परन्तु उन्होंने पिंकी से कहा कि वह ज़बरदस्ती चाय पिला रही थी, अब इस कारण उसके अंकल अंकल जी को जो एसिडिटी होगी तो उसके लिए दवा भी पिंकी को ही देनी होगी। ख़ुशी का सा माहौल बनता जा रहा था। पिंकी, बिशाखा का हाथ पकड़ रसोई घर में घुस गयी थी। कुछ की मिनटों में वह एक ट्रे में चाय लेकर आयी साथ में काजू-बादाम भी थे। काका ने देखा तो मुस्कुराते हुए कहा कि वह इन महंगी चीजों के योग्य न थे। उन्हें तो चाय के साथ दो बिस्कुट मिल जाएं, वही यथेष्ट था। पिंकी ने कहा, ' ये क्या बात हुई,अंकल ? आज तो आप जल्दी में हैं वरना आप को चाय के साथ गर्मागर्म पकोड़े भी खिलाती..' पिंकी का मिज़ाज अब काका को समझ आ रहा था। उन्हें आभास हो गया था कि ये लड़की बहुत खुश दिल है। उन्होंने हँसते हुए कहा, ' हाँ, पंजाबी स्टाइल के फूलगोभी के पकोड़े मुझे बहुत पसंद हैं..एक दिन आऊंगा खाने..' माँ ने सुना तो अपने अंदाज़ में चुटकी लेते हुए कहा, ' लो, और चाय ऑफर करो, इन्होंने तो अगली चाय के साथ पकोड़ों का भी प्रबंध कर लिया है..ये बंगाल है, बेटी.. यहाँ सोच-समझ कर बोलना पड़ता है..' पिंकी ने कहा, ' नो वरी, मम्मी .. अंकल आएँगे तो पापा का दिल भी लगा रहेगा.. दोस्तों के साथ, चाय का मज़ा ही कुछ और होता है..पर यह फूलगोभी क्या होता है, हम तो केवल गोभी ही जानते हैं..' मेरे बाबा और काका दोनों बहुत खुश थे। जब काका घर से निकलने को हुए तो उन्होंने बहुत स्नेह से पिंकी को आशीर्वाद दिया और मुझे कानों में कहा, ' बहुत भाग्यशाली हो,बेटा..' वह चले गए थे तो हम सब एक जगह आकर बैठ गए थे। पिंकी ने कहा कि उसे अंकल बहुत अच्छे लगे थे और यह भी कि वह उनका आतिथ्य अच्छे से नहीं कर पाई थी। माँ ने कहा कि ऐसी कोई खास बात न थी और वह तो अपने घर के सदस्य जैसे थे और अक्सर आते-जाते रहते थे। पिंकी ने यह भी कहा कि उसके सामान में दो टी-सेट भी थे और उन्हें उपयोग में लाया जाना चाहिए। वह साथ-साथ उठी और टी-सेट निकालकर ले आयी थी। उसने बिशाखा से कहा कि अब से नया सेट अतिथियों के लिए उपयोग में लाया करे। माँ कुछ नाराज़ सी लगी उन्होंने कहा कि ये बहुत महंगे सेट थे और इन्हें नियमित उपयोग में लाना उचित न था। इन्हें कुछ खास अवसर पर ही निकालना चाहिए। पिंकी ने प्रतिक्रिया दी, ' हाँ, मम्मी यह बात तो ठीक है परन्तु खास अवसर की प्रतीक्षा करते-करते ये ऐसे ही न रखे रह जाएं.. और पुराने न हो जाएं.. किसी भी अवसर को खास अवसर तो हमें ही बनाना होगा..'
ये सब बातें चल ही रही थी कि फोन की घंटी बज उठी थी। मैंने ही फोन उठाया था। मंत्रालय से फोन आया था। किसी मंत्री जी के सचिव का था और वह माँ बात करना चाहते थे। माँ फोन पर बात सुनती गयी थी। बाद में उन्होंने बताया कि राज्य के पर्वतीय क्षेत्र में किसी नेपाली लड़की के साथ कुछ अप्रिय घटना हुई थी। मंत्री जी एक स्टेटमेंट भिजवा रहे थे और माँ को हस्ताक्षर कर, महिला आयोग की ओर से जारी करना था। माँ ने कहा कि घटना की पूरी जानकारी के बिना वह कैसे आयोग की ओर से कोई प्रतिक्रिया जारी कर सकती थी ? मैंने कहा कि जब मंत्री महोदय स्वयं से भिजवा रहे थे तो ठीक ही होगा। पिंकी खामोश बैठी सब सुन रही थी। उसने मुझसे धीरे से नेपाली लड़की के बारे में पूछा था। मैंने उसे बताया की दार्जिलिंग के स्थानीय निवासियों को हम लोग नेपाली कहते हैं। अब उसने कहा कि बिना पूर्ण जानकारी प्राप्त किये, हस्ताक्षर कर देना ठीक न था। बाबा ने भी सहमति में सिर हिलाया परन्तु कहा कि घटना की जानकारी मिलती कहाँ से ? उसके लिए भी तो मंत्रालय की मशीनरी पर ही निर्भर करना होता है और यह बनी बनाई विज्ञप्ति वहीं से ही तो आ रही थी। माँ खामोश थी। अचानक उन्होंने फोन उठाया और एक नंबर घुमाया। मैंने पूछा, ' किस से बात करना चाहती हो ? माँ ने संक्षिप्त उत्तर दिया, ' रुको, बताती हूँ..' वह बात करने लगी और यह विज्ञप्ति वाली बात बताई थी। अब मुझे समझ आ गया था कि फोन के दूसरे छोर पर पार्टी के अध्यक्ष थे। ये मेरे नाना के मित्र थे और माँ किसी भी समस्या का निदान उन्हीं से पाया करती थी। कुछ समय बाद माँ ने बताया कि उनके काका घटना की विस्तृत जानकारी, पार्टी के संबंधित क्षेत्र के संचालक से प्राप्त कर, माँ को अवगत कराएँगे। उसके बाद ही विज्ञप्ति का जारी किया जाना उचित होगा। काफी देर रात तक बातें चलती रही थी। पिंकी का मत था कि पीड़िता को न्याय मिलना चाहिए था। माँ भी यही चाहती थी। मैं मंत्रालय के पक्ष में था क्योंकि जनता के पक्ष की आधिकारिक ज़िम्मेदारी उन्हीं पर थी। पिंकी का मानना था कि महिला आयोग को स्वतंत्र और स्वायत संस्था होना चाहिए। माँ ने विषय को विराम लगाते हुए कहा, ' देखो, काका क्या रिपोर्ट देते हैं ? यदि आवश्यकता हुई तो मैं स्वयं उस पर्वतीय क्षेत्र में जाऊंगी..' उन्होंने पिंकी की ओर देखते हुए कहा, ' क्यों, ठीक है न मनप्रीत ? पिंकी ने सहमति में सिर हिलाया परन्तु मुझे माँ का प्रस्ताव उचित न लगा था। मैंने कहा कि इस तरह के आयोग दिखावे मात्र के लिए होते हैं और उनका महत्व आभूषण की तरह होता है। मैंने माँ को कहा कि यह सत्य उन्हें भी देर- सबेर समझ आ जायेगा।रात काफी आगे बढ़ चुकी थी। हम चारों अपने कमरों में सोने के लिए आ गए थे।
सुबह नाश्ते के समय सब मिले तो न जाने कहाँ से रात वाली बात की ही कड़ी मिल गयी थी। माँ को लग रहा था कि किसी कुछ ही समय में मंत्रालय से कोई विज्ञप्ति लेकर आ जायेगा। समस्या यह थी कि तुरंत हस्ताक्षर कर दिया जाना संभव न था क्यों कि पार्टी की ओर से घटना की जानकारी भी आने वाली थी। उस सुबह माँ को उलझा हुआ सा देखा था। पिंकी भी स्थिति को समझ रही थी। उसने अपनी ओर से माँ को कहा, ' मम्मी जी आप इस प्रेस-रिलीज़ को रख लेना और सोच-समझ कर उसे बाद में वापिस भेजना..' माँ ने कहा, ' बेटा, ऐसी बातों को साथ साथ निपटना होता है..सरकारी फाइल की तरह उन्हें रोक कर नहीं रखा जा सकता..प्रार्थना करती हूँ काका की तरफ से रिपोर्ट पहले मिल जाए.. आयोग की अध्यक्षा के नाते यह मेरा पहला महत्वपूर्ण कार्य है, मैं कोई त्रुटि नहीं चाहती..' पिंकी एक अच्छी बहू की तरह, अपनी सास की बातों को सिर हिलाकर सहमति दे रही थी। जैसी माँ की इच्छा थी, कुछ समय बाद उनके काका का फोन आ गया था और उन्होंने माँ को स्वीकृति दे दी थी कि मंत्रालय से आने वाली विज्ञप्ति पर हस्ताक्षर कर दें। माँ ने उनसे पूछना चाहा कि क्या उन्हें अपने सूत्रों से घटना की जानकारी मिल गयी थी ? इस पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस इतना कहा कि हस्ताक्षर कर देना ठीक था। बाद में जब बात मेरे बाबा के कानों में आयी तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, ' अरे, गणेश काका ने रात में ही सीधे मंत्री जी से बात कर ली होगी..और उन्हें अनुमान लगा लिया होगा कि मामला क्या है और आयोग की ओर से जनता में क्या सन्देश दिया जाना चाहिए.. इस स्तर पर इसी तरह से काम होते हैं..' उनकी इस बात पर मैं और पिंकी दोनों हँस दिए थे। माँ अब निश्चिंत थी। उन्होंने पिंकी को दुलारते हुए कहा, ' जब हमारी बहू सौभाग्यशील है तो सब काम सरलता से ही होने हैं..' ( आज बस, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर )
Wednesday, December 23, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -51
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हफ्ते वार इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे .. )
( ५१ ) चार दिन कैसे बीत गए, पता ही न चला था। हम नाश्ता कर चुके थे। कुछ ही समय में हमें फ्लाइट पकड़नी थी और कलकत्ता लौट जाना था। इन दिनों हम लगातार कलकत्ता, चंडीगढ़ और दिल्ली में बातचीत करते रहे थे। मेरी माँ, कलकत्ता के सब समाचार दे देती रहती थी। उन्होंने महिला आयोग की अध्यक्षा का पद ग्रहण कर लिया था। उन्होंने बताया था कि वह राज्यपाल महोदय से भी मिलने का आवेदन कर चुकी थीं। उन्हें आशा थी कि शीघ्र ही मुलाकात की तिथि और समय की सूचना मिल जाएगी। उनकी बातचीत से स्पष्ट हो रहा था कि वह पिंकी को अपने साथ राजभवन ले जाना चाहती थी। उनकी यह इच्छा स्वाभाविक थी कि अपनी नव पुत्रवधू को प्रभावित करें। वैसे भी कोई भी पिंकी जैसी लड़की का साथ चाहेगा। पिंकी किसी को भी प्रभावित करने में सक्षम थी। मैं यह भी समझ पा रहा था कि पंजाबी-सिख परिवार से होने के कारण उसका माँ के साथ दिखना, माँ के नए पद की गरिमा बढ़ाने में सहायक था। मैं इन बातों में खुद से उलझा हुआ था कि पिंकी ने आकर, समय से चेक आउट कराने की सलाह दी। हम समय से एयरपोर्ट पहुंचे और फिर समय से ही कलकत्ता भी आ गए थे। माँ एयरपोर्ट पर आयी हुई थी। मैंने अपने बाबा के बारे में पूछा। माँ ने बताया कि उनकी ऑफिस में कोई मीटिंग चल रही थी इसलिए उनका आना संभव न था। माँ जिस कार से आयी थी, मैं उस कार को देखता रह गया। उस पर लाल बत्ती लगी थी और सामने महिला आयोग का बोर्ड था। पिंकी ने भी देखा और उसने वाह के अंदाज़ में एक मुस्कान दिखाई थी। मैं सामान कार में रखने को आगे बढ़ा ही था कि माँ ने मुझे रोक दिया। उन्होंने कहा, ' इसमें नहीं, एक और कार भी है..तुम उसमे घर जाओ.. मैं और मनप्रीत इस कार से आते हैं..' मैं कुछ समझ पाता कि उन्होंने स्पष्ट किया कि एक संस्था की महिलाओं ने उन्हें आमंत्रित किया हुआ था। समय अधिक न था इसलिए वह एयरपोर्ट पर आ गयी और मनप्रीत को सब से मिलाकर घर पहुँच जाएँगी। मैं कुछ कहता इस पहले ही पिंकी ने असंतुष्ट सा भाव देते हुए कहा, ' मैं अकेले, अभिजीत नहीं ? माँ ने कहा कि महिलाओं की गोष्ठी थी, वहाँ मेरा जाना नहीं बनता था। मैं मुस्कुराया और माँ अपनी बहू को ले निकल गयी थी। मैं घर के दरवाज़े पर पहुंचा तो देखा बाबा भी अपना ऑफिस वाला बैग लेकर आ रहे थे। वह ऑफिस से लौट रहे थे। मुझे अकेला देख उन्होंने कहा, ' हमारी बहुमा कहाँ है ? मैंने उन्हें सब बताया तो वह हंसने लगे, ' तुम्हारी माँ को अब बहू चाहिए, बेटा नहीं..' उनके मुख से बहूमा सुंनना अच्छा लगा था। एक क्षण को बंगाली परंपरा पर गर्वानुभूति हुई थी कि हम पुत्रवधू को माँ का दर्जा देते हैं। पश्चिमी संस्कृति में तो वह ' कानून से बेटी ' होती है।
हम दोनों ने एक साथ घर में प्रवेश किया। बिशाखा ने दरवाज़ा खोला और हैरान हो पूछा, ' ये क्या अकेले, बहुमा को कहाँ छोड़ आये हो ? मैं थोड़ा झुँझलाया और कहा, ' अंदर चलो और पहले चाय पिलाओ..' बिशाखा चाय लेकर आयी और जो उसने प्रश्न पूछा था उसका स्वयं से ही उत्तर देने लगी। उसने कहा, ' तुम बताओ या न बताओ, मैं समझ गयी हूँ कि माँ, हमारी बहुमा को लेकर किसी मीटिंग में चली गयी हैं..वह आज शाम की मीटिंग की बात कर रही थीं, मैंने सुना था.. ठीक पकड़ा न..' मैं बिशाखा का यह गुण जानता था। मैंने कई बार यह देखा था कि वह घर में हो रही बातों को सुन पूरा वृतांत समझ जाती थी। कई बार तो वह राजनैतिक गतिविधियों पर भी सटीक टिप्पणी कर देती थी। बाबा के स्कूल दिनों के वह लेखक और कवि दोस्त भी अचानक आ पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि वह उस तरफ से कहीं जा रहे थे सो मिलने चले आये थे। बाबा उनको देख बहुत खुश हो गए थे । उनके चेहरे पर चमक आ गयी थी। मैंने भी काका कह उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने मुझे आशीर्वाद देते हुए कहा कि मेरे पिता उन्हें तो बाराती बनाकर नहीं ले गए थे। फिर उन्होंने कहा, ' अरे ! ठीक भी है, दिल्ली की ऊँची शादी में वह कहाँ खपते ? मैंने देखा बाबा कुछ शर्मिंदगी सी महसूस कर रहे थे परन्तु दोनों मित्र एक दूसरे की स्थिति को समझ रहे थे। यही तो मित्रता होती है जो बिन कुछ कहे सब समझ जाती है। बाबा ने उन्हें बताया कि मैं अभी ही गोवा से लौटा था और मेरी पत्नी को उसकी सास कहीं लेकर गयी थी। वे दोनों मित्र हंसने लगे थे। बिना बात बढ़ाये दोनों स्थिति को समझ गए थे। मैं अनुमान लगाता रह गया कि मेरी माँ के महिला आयोग वाले पद ग्रहण की बात उठेगी परन्तु यहाँ तो जैसे सब कुछ शीत जल सा स्पष्ट था। अचानक काका ने चाय की चुस्की लेते हुए मुझसे पूछा, ' कैसा रहा तुम्हारा मधुचंद्र ? इससे पहले की मैं समझ पाता, उन्होंने खुद ही हँसते हुए अंग्रेजी में कहा, ' आई मीन हनीमून ..' मैंने सिर्फ मुस्कुराकर उत्तर दिया। उन्होंने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ' कोई तकरार तो नहीं हुई न ? गलत मत समझना, कहा जाता है कि पति-पत्नी की पहली तकरार हनीमून के दौरान ही होती है ..' मैं मुस्कुराये ही जा रहा था। मैंने सोचा बात तो उनकी सही थी। जब गोवा में पिंकी ने गुरूद्वारे जाने की बात कही थी तो मैं झुँझला गया था। मैंने उसे कहा था, ' ये क्या ? यहाँ भी गुरुद्वारा ? अब कहीं भी जाएंगे तो गुरूद्वारे जाना ही पड़ेगा ? पिंकी क्षण भर को चुप हो गयी थी और उसने कहा था कि कोई बात नहीं थी यदि मेरा मन नहीं था और मैं विश्राम करना चाहता था तो वह अकेले ही हो आयेगी। मैंने स्थिति को संभाल लिया था यह कह कर कि उस दिन नहीं, अगले दिन सुबह चलेंगे। परन्तु उस शाम हम दोनों शांत थे। रात का खाना भी बिना कुछ बात किये खाया था। क्या यही हमारी हनीमून वाली दाम्पत्य जीवन की पहली तकरार थी ?
बाबा अपने मित्र को लेकर छत पर चले गए। वह सिगरेट नहीं पीते थे परन्तु कभी अपने किसी पुराने मित्र से मिलते तो एक सिगरेट सुलगा लेते थे और नौजवान जैसे अंदाज़ में कश लगाते हुए, यादों की गलियों में खो जाने का प्रयास करने लगते थे। आज तो वह कुछ अधिक ही प्रसन्न थे क्योंकि उनकी पत्नी की आतंकी रोक-टोक न थी। मुझे भी उनका यह उन्मुक्त चेहरा अच्छा लग रहा था। ( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे, यहीं पर ..)
Wednesday, December 16, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -50
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )
( ५० ) प्रातः हम देर तक सोये रहे थे। माँ, जो घर में सभी से भोर में उठ जाने की आशा किया करती थी, आज शांत थी। हम दोनों नीचे आये तब तक दस बस चुके थे। पिंकी ने माँ के पांव छुए। माँ ने आशीर्वाद देते हुए पूछा कि नींद कैसी रही थी ? साथ ही उन्होंने यह भी पूछ लिया कि उसके घर में सब लोग कितने बजे जाग जाते थे ? माँ का दिमाग चल रहा था। असल में वह तो केवल उसी के सुबह उठ जाने का समय जानना चाहती थी और उसे यह भी बता देने चाहती थी कि उनके घर में इतनी देर तक सोया रहना स्वीकार न था। उन्होंने कहा, ' मोनप्रीत, कल रात तो विलम्ब हो गया था.. तुम थकी हुई भी थी..यहाँ सब समय से बिस्तर छोड़ देते हैं..' पिंकी को माँ के मुख से मनप्रीत शब्द को बंगाली ध्वनि में सुनना अच्छा लगा होगा। वह मुस्कुरा दी थी। उसने कहा, ' मम्मी जी, मैं तो घर में सबसे पहले उठ जाती हूँ.. मैं तो जॉगिंग के लिए भी जाती हूँ.. यहाँ भी तो वाकिंग और जॉगिंग के लिए लोग जाते होंगे, कोई आसपास पार्क तो होगा ही ? माँ ने बताया कि कुछ ही दूर पर एक सुन्दर लेक है जहाँ लोग जाते हैं और वह भी वहाँ जा सकती थी। माँ ने कहा, ' गोवा घूम आओ, मैं सब व्यवस्था कर दूंगी..' एक ओर होने पर उसने मुझसे पूछा, ' अभिजीत, मम्मी जी कौन सी व्यवस्था के बारे में कह रहीं थी ? मैंने तो जॉगिंग पर जाने के लिए कहा था.. ' मैंने उसे समझाया कि वह शायद सुबह तुम्हारे साथ जाने के लिए किसी को कहेंगी, उन्हें पता है कि मैं तो भोर में उठकर कहीं नहीं जाऊंगा। पिंकी मुस्कुरा दी, ' जॉगिंग के लिए मेरे साथ कोई ? ये क्या बात हुई ? मैं क्या बेबी हूँ ? मेरे साथ केवल तुम ही चलोगे.. वरना मैं अकेले ही जाऊँगी..' मैंने कहा कि देखा जायेगा क्योंकि मैं जानता था कि माँ शहर से अपरिचित इस लड़की को अकेले सुनसान से लेक क्षेत्र में नहीं जाने देना चाहेंगी। मैंने विषय को बदलते हुए उसे बताया कि हमें लंच के बाद ही निकल जाना होगा क्योंकि साढ़े पांच बजे की फ्लाइट थी। उसने अपना सामान पैक करना आरम्भ किया और मुझे कहा कि मैं भी अपना सब कुछ ठीक से रख लूँ। साथ ही उसने याद से स्विमऔर ट्रैक्किंग सूट रख लेने के लिए भी कहा था।
दोपहर का खाना खा हम दोनों एयरपोर्ट जाने के लिए तैयार थे। मैंने कहा, ' अभी कुछ समय रुक सकते हैं.. दिन के इस समय अधिक समय न लगेगा .. सड़कें खाली होती हैं.. ' पिंकी मुझे चलने के लिए उकसाती जा रही थी। मैंने जानना चाहा तो उसने कहा, ' मम्मी कह रही थी कि यहाँ का गुरुद्वारा बहुत अच्छा है..क्यों न वहां मत्था टेकते हुए जायें ? मैंने मुंह बना दिया और मन में सोचा कि मैं माँ के साथ मंदिर और आश्रम आदि जगहों पर जाने से कतराता रहा हूँ और अब ये गुरुद्वारा और मत्था टेकना ? क्या एक नया झमेला तो नहीं होने जा रहा मेरे जीवन में ? मेरा रूखापन देख पिंकी ने कहा, ' कोई बात नहीं.. तुम्हारा मन नहीं है तो नहीं जाते..' अब मैंने सूटकेस उठाया और कहा, ' नहीं..नहीं ऐसी बात नहीं है .. चलो चलते हैं..' मैंने बिशाखा को नीचे जाकर एक टैक्सी को रोकने के लिए कहा। मेरी यह बात पिंकी को खटकी। उसने अंग्रेजी में कहा, 'अरे, उन्हें क्यों टैक्सी के लिए भेज रहे हो, खुद ही जाओ न..' उसने यह वाक्य अंग्रेजी में इसलिए कहा था कि बिशाखा को समझ न आये लेकिन कुछ बातें जिस अंदाज़ कही जानती हैं, वे शब्दों की मोहताज़ नहीं होती, वे अर्थ स्वयं से स्पष्ट कर देती हैं। बिशाखा को हमारे घर में हर छोटे-बड़े काम के लिए यहाँ-वहाँ दौड़ाया जाता था। कभी उसकी सुविधा-असुविधा की ओर नहीं देखा जाता था। आज शायद पहली बार किसी ने उसके बारे में सोचा था। बिशाखा बात समझ गयी थी। उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी जो कह रही थी, कोई तो आया मेरा मन पढ़ने वाला। मैं टैक्सी लाने के लिए आगे बढ़ा ही था कि पिंकी बोल पड़ी, ' वैसे टैक्सी लाने की क्या जरुरत है, दो सूटकेस हैं.. एक-एक सूटकेस लेते हैं और बाहर जाकर टैक्सी ले लेते हैं .. ' मैं किसी निक्कमा सा, हूँ.. हूँ.. ही कहता रह गया और वह दोनों सूटकेस खींच लायी थी। हमने माँ को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लिया और सीढ़ी से नीचे उतर घर से बाहर निकल आये थे।
कलकत्ता की ये पीलिया टैक्सी यूँ तो आवारा छोकरों सी यहाँ-तहाँ भटकती रहती हैं पर उस पहले दिन न जाने कहाँ किसी षड्यंत्र की तरह छिप गयी थीं। मानों बाहर से आयी लड़की को अपनी असलियत बता रही हों। मैंने पिंकी को यह बात बतायी तो उसने कहा कि कलकत्ता की टैक्सियों की हालत के बारे में उसने सुन रखा था। उसने कोई नाराजगी न दिखाई बल्कि मेरे साथ-साथ, हाथ हिलाकर, आती-जाती टैक्सियों को रोकने की कोशिश करने लगी। कई टैक्सियां दाएं-बाएं हो गुजर गयी परन्तु खाली टैक्सी एक भी न दिखी। मैं निराश हो रहा था परन्तु पिंकी हर टैक्सी को रोकने का प्रयास कर रही थी। अंततः वह सफल हुई और एक टैक्सी के रुकते ही उस में अपना सामान चढ़ाने लगी। मैंने कहा, ' पहले उससे पूछ तो लो..जायेगा या नहीं..' वह हैरान हो मुझे देखने लगी, ' अरे, टैक्सी है.. जायेगा क्यों नहीं..टैक्सी वाला नो नहीं कर सकता ..' मेरे मन में आया कि कहूं ' ये तुम्हारा चण्डीगढ़ नहीं है ..यह कलकत्ता है ..' पर चुप रह गया था और टैक्सी ड्राइवर से बात करने लगा था। वह राजी था और हमें ले गुरुद्वारे की ओर निकल गया। गुरूद्वारे के सामने पहुँच मैंने पिंकी को कहा कि मैं टैक्सी में रहूँगा और वह जल्दी से प्रणाम कर आ जाये। उसने कहा कि दोनों ही गुरूद्वारे के भीतर जायेंगे। मैंने उसे समझाया कि टैक्सी में सामान था और उसे छोड़ना उचित न था। उसने कहा कि टैक्सी का नंबर नोट कर लेते हैं। फिर एक बार मन में आया कि कहूँ, ' ये तुम्हारा चंडीगढ़ नहीं है.. कलकत्ता है..' परन्तु एक बार फिर से मैं चुप रह गया था और टैक्सी वाले से कहा. ' पांच मिनिट में आते हैं..' कनखियों से मैंने टैक्सी का नंबर देख लिया था। हम तुरंत ही लौट आये थे, वहां बैठे नहीं थे और समय से एयरपोर्ट पहुँच गए और रात को गोवा के होटल में। गोवा एयरपोर्ट पर होटल की ओर से स्वागत किया गया था। किसी भी असुविधा का प्रश्न ही न था।
गोवा में चार दिन कैसे बीत गए थे, पता ही न चला था। मैं बहुत ही खुश था। पिंकी का आकर्षणीय व्यक्तित्व मुझ पर और उसके संपर्क में आने वाले सभी पर छा रहा था। इन चार दिनों में ही वह होटल के स्टाफ के बीच प्रिय बन गयी थी। सभी हमारा मुस्कुरा कर स्वागत करते थे। हम दोनों यहाँ के गुरूद्वारे में भी गए थे। यह बहुत सुन्दर गुरुद्वारा बेटिम फेरी के पास ही था। होटल के कर्मचारियों में एक सिख लड़का भी दिखा था। पिंकी ने उससे बात की थी। वह लुधियाना का था। उस लड़के ने ही इस गुरूद्वारे के बारे में बताया था। इसका उद्घाटन राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह द्वारा किया गया था। पिंकी को गुरूद्वारे में सिख धर्म से सम्बंधित एक अंग्रेजी पुस्तक मिल गयी थी। उसने मुझे देते हुए कहा, ' इसे पढ़ना.. बुक शेल्फ में सजाकर न रख देना ..'( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को, यहीं पर .. )
Wednesday, December 9, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -49
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )
( ४९ ) बहूभात वाली पार्टी में माँ ही छायी हुई थी। सभी देख रहे थे कि वह दुलाल चक्रवर्ती के साथ-साथ रहने की फ़िराक में थीं। मेरे बाबा ने संकेत भी दिए थे कि उन्हें सभी अतिथियों की ओर देखना चाहिये और नई बहू का परिचय सबसे करवाना चाहिए। परन्तु, माँ ने हाँ-हूँ कहकर उन्हें एक ओर कर दिया था। उनसे जो भी मिलने आता, वह उससे एक ही बात सुनना चाहती थी कि वह नए पद पर सफल हों। कोई उन्हें बेटे के विवाह की बधाई देता तो वह अपनी ओर से बे वजह कहती कि उन्होंने सदैव ही भाषा और प्रान्त के बारे में कभी नहीं सोचा था। उन्होंने अपने घर में एक तरह के स्वनिर्णय का माहौल बनाया हुआ था इसीलिए उन्होंने बेटे की पंजाबी पसंद को स्वीकार किया था। वह अपने पिता यानि मेरे नाना का नाम भी बात-बात में ले लेती थीं कि कैसे उन्होंने देश के लिए कितने साल जेल में गुजारे थे और अपना जीवन आज़ादी के कार्यों हेतु झोंक दिया था। दुलाल बाबू ने एक बार उनकी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा कि वह अपने स्वतंत्रता सेनानी पिता की सच्ची विरासत थीं और उन्होंने अपने लिए एक पंजाबी बहू का चुनाव कर यह सिद्ध कर दिया था कि वाम फ्रंट की सहयोगी उनकी पार्टी ने उन्हें महिला आयोग का अध्यक्ष बनाने का सही निर्णय लिया था। वह सच में इस पद के लिए उचित और सक्षम प्रत्याशी थी। वह समाज का हित करने में सफल होने वाली थी। इसी तरह की बातें इधर-उधर हो रहीं थीं। कभी-कभी मुझे और पिंकी को और साथ ही मेरे बाबा को अकेलापन सा महसूस होने लगता था हालाँकि पार्टी में काफी लोग थे। अपने लोगों के बीच में लगने वाली नीरवता एक तरह का अस्पष्टीकृत कष्ट ही होता है।
संध्या से आरम्भ हुई पार्टी कुछ घंटों में ही क्षीण होने लगी थी। पिंकी ने पूछा, ' क्या बात है, लोग घर लौट रहे हैं ? मैंने कहा, ' यह चंडीगढ़ या दिल्ली नहीं है.. जो देर रात तक खाना-पीना चलता रहे .. ये बंगाल के संस्कार हैं कि समय से घर पर लौट आया जाये ..' पिंकी ने कुछ आश्चर्य के साथ मेरी बात सुनी थी। उसे देख मैं मुस्कुरा दिया था और कहा, ' ये घरेलू कार्यक्रम है, इसलिए.. वैसे देर रात तक चलने वाली पार्टियाँ तो कलकत्ता में भी जम कर होती हैं..' ग्यारह बजे तक सब लोग जा चुके थे। परिवार के लोग और कुछ सम्बन्धी ही रह गए थे। इन्द्राणी भी हमारे पास आकर बैठ गयी थी। मैंने उनसे पूछा कि सब कैसा रहा था ? वह मुस्कुरायी और कहा कि ठीक ही था किंतु उसे दिल्ली वाली पार्टी में अधिक मज़ा आया था। पिंकी ने उसकी बात सुनी तो कहा, ' हमारे अभिजीत साहब को तो दिल्ली की पार्टी बहुत लंबी लगी थी.. इन्हें तो समय से घर पहुँच जाना पसंद है..' मैंने सफाई देते हुए कहा, ' ये बात नहीं है..बस यूँ ही कहा था कि कलकत्ता में लोग समय से पार्टी में खा कर घर लौट जाते हैं..' इन्द्राणी ने हँसते हुए पिंकी को देखा और कहा, ' अरे, पार्टी का अर्थ केवल खाना थोड़ा ही होता है ..कौन समझाए, अब तुम ही इस लड़के को तैयार करना.. हम तो फेल हो चुके हैं..' बाबा और माँ भी हमारे पास आ बैठे थे। बाबा ने और विलम्ब न कर घर जाने की बात उठाई तो मैंने पिंकी की ओर देखा और मुस्काया। वह भी मुस्कुरा दी। हम दोनों समझ गए थे कि सच में बंगाली लोग समय से घर आ जाने में विश्वास रखते हैं।
माँ ने यहाँ अंतिम क्षणों में भी अपनी ही बात उठायी थी। उन्होंने कहा कि दुलाल बाबू काफी मददगार हो रहे थे। वह उनकी प्रशंसा किये जा रही थी। उन्होंने बताया कि दो-तीन दिन के भीतर ही उन्हें ने पद ग्रहण कर लेने की उम्मीद थी। मैंने कहा, ' परन्तु हम तो यहाँ होंगे नहीं.. हम तो कल संध्या की फ्लाइट से गोवा निकल जायेंगे और पांच दिन बाद लौटेंगे..' माँ ने कहा कि इससे कुछ अंतर नहीं पड़ेगा। हमें तो गोवा जाना ही होगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा, ' लेकिन इस अवसर पर यदि मनप्रीत यहाँ होती तो वह अपनी मम्मी जी का सम्मान होते देख लेती..उसके हमारे घर में प्रवेश के साथ ही तो यह शुभ समाचार आया था..भाग्यवान बहू है, मेरी ..' उन्होंने पिंकी को स्नेह से दुलारा था। पिंकी ने मुस्काते हुए कहा, ' मम्मी जी, ऐसा करते हैं, मैं अपनी टिकट कैंसल करवा देती हूँ.. ये अकेले घूमकर आ जाएं.. मेरा तो गोवा देखा हुआ भी है..' उसका शरारतीपन झलक रहा था। इन्द्राणी ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ' टिकट कैंसल करवाने की आवश्यकता नहीं है मनप्रीत, तुम्हारी टिकट पर मैं चली जाती हूँ..' इस बात पर सब हँस पड़े थे। पिंकी ने इन्द्राणी की ओर देखते हुए कहा, ' आईडिया बुरा नहीं है.. कैंसलेशन के पैसे भी नष्ट नहीं होंगे..' उन दोनों की इन बातों में मैं झेंप रहा था। बाबा ने पुनः घर की ओर निकल जाने की उत्सुकता दिखाई थी। उन्होंने कहा, ' इस जगह की बुकिंग साढ़े दस बजे तक की है, अब ग्यारह बज चुके हैं..वे लोग एक्स्ट्रा चार्ज लगा देंगे..' माँ ने कहा, ' छोड़ो..एक्स्ट्रा चार्ज ..लगाएंगे तो लगाने दो..बहुभात है, समय तो लगेगा ही..' माँ की बात सुन पिंकी ने प्रतिक्रिया दी, ' अरे ! अब तो मम्मी जी तो वीमेन कमीशन की चेयरमैन हैं.. किसी की एक्स्ट्रा चार्ज करने की हिम्मत ही न होगी..' इन्द्राणी ने कहा, ' चेयरमैन नहीं, चेयर वूमेन..' माँ को भी इस बात पर उत्सुकता जगी। उन्होंने अपने पति की ओर देखा। मेरे बाबा ने कहा, ' ऐसे में अंग्रेजी में चेयर पर्सन कहते हैं.. कुछ भी कहते हों, पद तो पद है, अब चलो.. बहू को भी नींद आ रही होगी..' हम लोग घर आ गए थे। यहाँ फिर से बातें आरम्भ हो गयी थीं। माँ को अपने नए कार्यालय की चिंता हो रही थी। बाबा ने कहा कि जहाँ सरकार कार्यालय देगी वहीं से काम करना होगा। माँ ने हूँ कर दिया, ' ऐसे कैसे ? मुझे अपनी कार्य सुविधा देखनी होगी.. जब तक मुझे मेरे हिसाब से कार्यालय नहीं मिलेगा, मैं पदभार ग्रहण नहीं करुँगी..' बाबा ने चुटकी लेते हुए कहा, ' अधिक नखरे मत दिखाओ ..वरना वो अभिनेत्री इंतज़ार में बैठी है, उसे पद दे दिया गया तो हाथ मलती रह जाओगी..' इस बात पर माँ चौंक गयी थी, ' ठीक है, तब तक मैं घर से ही काम करुँगी.. कल ही दुलाल दा से बात करुँगी ..' पिंकी चुपचाप एक ओर बैठी बातें थी। मैंने ही उसे कहा, ' चलो, सोने चलते हैं ..' हम दोनों अपने कमरे में आ गए। मैंने देखा, कमरा कुछ अधिक ही सुव्यस्थित सा दिख रहा था। मैंने आश्चर्य जताया और पूछा, ' पिंकी, यह हमारा कमरा इतना अच्छा कैसे हो गया ..' उसने तड़ाक से उत्तर दिया, ' पहली बात मुझे पिंकी नहीं बुलाओगे, मेरा नाम मनप्रीत है.. दूसरे हमारे पास एक जादू है जिससे काम चुटकी बजाते ही हो जाते हैं..' मैंने कहा, ' मेरे लिए तो तुम पिंकी ही हो.. हाँ, दूसरों के सामने तुम्हें मनप्रीत कहूंगा..खुश.. अब बताओ, कमरा ठीक कैसे किया ? उसने कहा, 'खुद सोचो..' फिर उसने कहा, ' पार्टी कुछ ढीली सी रही..' मैंने भी उसी के अंदाज़ में कहा, ' पहली बात ये कोई पार्टी नहीं थी, यह एक पारम्परिक अनुष्ठान था जिसे बहुभात कहते हैं ..' वह मुस्कुरा दी, ' मेरे लिए तो यह रिसेप्शन पार्टी थी.. हाँ, सबके सामने मैं बहुभात ही कहूँगी.. अब खुश ? हम दोनों हँस पड़े थे। ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर ..)
Wednesday, December 2, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 48
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )
( ४८ ) रात के खाने के समय माँ और बाबा दोनों पिंकी का ही ख्याल रखे हुए थे। बंगाली भोजन था। उन्हें चिंता थी कि नई दुल्हन को असुविधा न हो रही हो। माँ बार-बार पिंकी से पूछ रही थी कि उसे हमारे घर का खाना कैसा लग रहा था। माँ और बिशाखा ने अपने हिसाब से सुरुचिपूर्ण ही बनाया था परन्तु मैं समझ पा रहा था कि उसे कुछ तो परेशानी हो रही थी जो स्वाभाविक थी। पिंकी अपनी ओर से सहज हो रही थी। हम लोगों को हाथ से खाता देख वह वह कुछ पल को सहमी थी। मैं जानता था इसलिए उसे सहज करने के लिए कहा, ' हम बंगाली लोग घर में हाथ से ही खाते हैं, तुम बे झिझक स्पून ले लो..' उसने कहा, ' नहीं, मुझे तो अच्छा लग रहा है.. सिर्फ ये मछली बहुत काँटे वाली है..' बाबा ने तुरंत बिशाखा को बुला एक मछली का नाम बताया जिसमे काँटे कम होते हैं और कहा कि कल वही मछली बनाना। ये सब चल ही रहा था कि टेलीफ़ोन की घंटी सुनाई दी। मैं उठा ही था कि माँ ने मुझे रोक दिया और खुद उठ गयी थी। माँ कुछ देर बाद वापिस आयी तो चुपचाप बैठ गई थी। मैंने पूछा, 'क्या हुआ ? किसका फोन था ? उन्होंने कहा कि खाना खा लो फिर बताती हूँ। हम लोग तो लगभग खा ही चुके थे। मीठा खा रहे थे। इन बंगाली मिठाइयों को देख और इनके स्वाद से पिंकी अभिभूत थी। वह बार बार यम्मी यम्मी कह रही थी। मैंने और बाबा ने माँ से फिर एक बार टेलीफ़ोन के बार में पूछा। अब माँ के चेहरे पर एक छिपी सी मुस्कान, धीरे से खिलने लगी थी। उन्होंने कहा कि पार्टी के अध्यक्ष का फोन था। उन्होंने माँ को सूचना दी थी कि उनका नाम राज्य की महिला आयोग की अध्यक्षा के लिए चुना गया था। मैंने यह सुन सबसे पहले जोर से ताली बजायी थी । फिर सभी ताली बजाने लगे थे। अब तक माँ की ख़ुशी खुलकर सामने आ गयी थी। उन्होंने कहा, ' ये बहुत ज़िम्मेदारी का पद है..और उनके साथ उनके पिता का सु-नाम जुड़ा है..' पिंकी ने भी कहा कि यह बहुत बड़ी खबर थी। अब माँ उठी और उन्होंने पिंकी के पास जाकर स्नेह से उसका माथा चूम लिया, ' तुमने हमारे घर में कदम रखा और आते ही ये बड़ी खबर आ गई.. शुभ कदम हैं हमारी बहू के ..'
पिंकी ने उत्साहित होते हुए कहा, 'मैं अपने पापा को बताती हूँ..' माँ ने उसे रोक दिया क्योंकि पार्टी की ओर से अभी किसी को बताने से मना किया गया था। कल तक समाचार आ जायेगा तब बताना उचित होगा। मैं सचमुच बहुत खुश हो रहा था। मैंने कहा, ' माँ तुम्हें तो अब ड्राइवर के साथ गाड़ी मिलेगी .. लाल बत्ती वाली ..' माँ ने कहा, ' गाड़ी दिखाई दे रही है.. साथ में जो भारी ज़िम्मेदारी आ रही है वह दिखाई नहीं दे रही..' माँ ने बताया कि एक अन्य महिला जिसका फिल्म उद्योग से सम्बन्ध था, इस पद के लिए उसका नाम भी आ रहा था। अगले दिन बैठक थी, उसमें ही सब कुछ स्पष्ट हो जाना था। माँ ने कहा कि हमें प्रतीक्षा करनी चाहिए और हम सब को ऊपर जाकर बाबा लोक नाथ जी के सामने हाथ जोड़कर बैठना चाहिए कि सब कुछ ठीक से हो जाये। हम सभी माँ के कमरे में गए और उनके मंदिर के सामने बैठ गए। अचानक पिंकी उठी और अपने सूट केस से एक फोटो फ्रेम निकालकर लायी और उसे मंदिर में रख दिया। यह बाबा गुरु नानक का सुन्दर चित्र था। हम सब ध्यान मुद्रा में बैठ गए। मैं मन ही मन सोच रहा था कि यह माँ और हमारे परिवार के लिए एक बहुत बड़ा सम्मान था। माँ ध्यान मुद्रा में अवश्य थी परन्तु बेचैनी उनके चेहरे पर झलक रही थी। उन्होंने शीघ्रता में अपनी प्रार्थना की और हाथ जोड़ कर उठ खड़ी हुई थी। वह उठकर फोन करने बैठ गयी थी। उन्होंने एक नंबर घुमाया और आदर से प्रणाम करते हुए बात आरम्भ की। मैं समझ गया कि दूसरी ओर नाना के एक पुराने साथी थे जिन्हें माँ काका कहकर संबोधित कर रही थी। माँ ने कुछ समय पूर्व मिली सूचना की खबर उन्हें दी थी परन्तु जिनसे वह बात कर रही थी उन्हें पहले से ही यह बात मालूम थी। माँ की बातों से हम दूसरी ओर की बात का अंदाज़ा लगा रहे थे। मैं और बाबा एक ओर खड़े थे। पिंकी अनजान सी दूर रखी कुर्सी पर बैठी थी। माँ, हाँ-न ही कह रही थी। माँ ने कहा कि अच्छा होता यदि उन्हें इस दायित्व से मुक्त रखा जाता। परन्तु माँ के आग्रह में सत्यता वाला जोर न था। उन्होंने तो एक बार यह भी कहा कि विधानसभा का एक पद जो विधायक की अकस्मात मृत्यु के कारण रिक्त हुआ था, उसके लिए उन्हें चुना जाना अधिक उपयुक्त होता। कुछ समय तक बातचीत होती रही थी। माँ ने फोन रखा तो बताया कि दुलाल काका ने ही उनका नाम प्रस्तावित किया था। दुलाल काका पार्टी में विशेष प्रभाव रखते थे। उन्हें मेरे नाना ही राजनीति में लाये थे और वह नाना एवं हमारे परिवार का बहुत सम्मान करते थे। वह चाहते थे कि माँ, इस महिला आयोग वाले पद को अवश्य स्वीकार करें क्योंकि यह एक गरिमामय पद था और इसमें राजनैतिक झमले अपेक्षाकृत कम थे। मैंने भी कहा कि दुलाल दादू ठीक ही कह रहे थे। वह अक्सर नाना के पास आया करते थे और मैं उन्हें दादू कहा करता था। माँ ने एक बार फिर कहा कि हमें कल की पार्टी की बैठक में लिए जाने वाले निर्णय को देखना चाहिए। वैसे दुलाल दादू से बातचीत के बाद माँ निश्चिंत सी थी कि उनका नाम ही स्वीकार किया जायेगा। मैं भी खुश हो रहा था कि नाना के जाने बाद अब मेरी माँ पार्टी में स्थान लेने जा रही थी। अगले दिन बहूभात का कार्यक्रम था। मैं जानता था कि शाम तक माँ के आयोग की अध्यक्षा होने का निर्णय आ चुका होगा और यह समाचार वहाँ हमारे उत्सव में चर्चा का मुख्य विषय होगा।
अगली सुबह माँ सामान्य से पहले उठ गयी थी। वह स्नान और पूजा-पाठ कर चुकी थी। मैं जब नीचे आया तो उन्होंने पिंकी के बारे में पूछा। पिंकी सो रही थी। माँ कुछ चिंतित सी थी। एक तो आज शाम का समारोह था और दूसरे पार्टी की बैठक का निर्णय। बहूभात के लिए सारी व्यवस्था एक व्यावसायिक संस्था को दी गयी थी, हमें कुछ न करना था। दक्षिण कलकत्ता के एक बैंक्वेट हॉल को संध्या के लिए ले लिया गया था और साज-सज्जा और खाने-पीने की व्यवस्था वहीं होनी थी। जो छोटे-मोटे काम थे, उनका दायित्व बाबा ने ले रखा था। पिंकी सो कर उठी तो माँ के पास गयी थी। माँ ने उसे स्नेह से गले लगाया और कहा कि आज का दिन बहुत व्यस्त होने वाला था। उन्होंने वह साड़ी दिखाई जो उसे संध्या को को पहननी थी। पिंकी को साड़ी तो पसंद आयी पर उसने कहा,' इतनी भारी ? मैं तो संभाल ही न पाऊँगी.. मुझे तो वैसे भी साड़ी का बहुत अनुभव नहीं है..' माँ ने कहा, ' इन्द्राणी है न, वह तुम्हें तैयार कर देगी.. आज तो सब हमारी बहू को देखते ही रह जायेंगे..यह साड़ी खास आज के लिए ही बनवाई है, बाजार में ऐसी साड़ी दूसरी न मिलेगी..' दिन यूँ ही व्यस्तता में बीतता जा रहा था। पिंकी संध्या वाले कार्यक्रम के लिए उत्साहित थी। मैंने उसे बताया कि इन्द्राणी उसे एक ब्यूटी पार्लर ले जायेंगी। मैं माँ के समाचार की भी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहा था। माँ भी अधीर हो रही थी। चार बजे के आसपास दुलाल दादू का फोन आया। उन्होंने माँ को बधाई दी कि वह राज्य के महिला आयोग की अध्यक्षा होने जा रही थी। मैंने माँ को बाहों में ले लिया था। अब फोन का ताँता लग गया था। रोबी दा का भी फोन आया था। उन्होंने मुझे बधाई दी और कहा कि संध्या में तो मिलेंगे ही। सच, संध्या में पिंकी को सब देखते ही रह गए थे। पंजाब की सुंदर लड़की, बंगाली साड़ी में अभूतपूर्व सौंदर्य बिखेर रही थी। माँ को दो ओर से बधाइयाँ मिल रही थी। सुन्दर बहू के लिए एवं महत्वपूर्ण पद पाने के लिए। राजनैतिक हलकों के कई लोग आये हुए थे। दुलाल दादू की सलाह पर मेरे नाना की एक बड़ी फोटो भी एक ओर लगायी गयी थी। दुलाल दादू इन दिनों काफी सुर्ख़ियों में थे। राज्य की वामपंथी सरकार की ओर से केंद्र की सरकार के साथ समन्वय के कार्यों के लिए उन्हें ही चुना जाता था। ऐसा माना जाता था कि कई केंद्रीय मंत्रियों के साथ उनके अच्छे सम्बन्ध थे। वे मझे हुए राजनैतिक खिलाड़ी के रूप में उभरकर आ रहे थे। माँ ये सब जानती थी। वह उनसे धीरे-धीरे घनिष्टता बढ़ा रही थी। आज का दिन माँ के पास एक सुअवसर के रूप में आया था। घर के आयोजन में, माँ की भूमिका से अधिक वह महिला आयोग की अध्यक्षा अधिक नज़र आ रही थी। मैंने पिंकी से पूछा,' पिंकी, कैसा लग रहा हैं, यहाँ ..' उसने कहा, ' अच्छा लग रहा है, पर मुझे हमेशा पिंकी ही बुलाओगे या कभी मनप्रीत भी कहोगे ? मैंने कहा, ' पिंकी ही अच्छा लगता है..' वह मुस्कुरा दी। उसने कहा, ' मम्मी जी तो पूरी मिनिस्टर जैसी लग रही हैं..' मैंने कहा, ' सच बताऊँ, उनका तो एक छिपा सपना है.. मंत्री सभा में जाने का.. '( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को, यहीं पर ...)
Wednesday, November 25, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी : Two States - A New Story - 47
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
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( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )
( ४७ ) दिल्ली एयरपोर्ट पर पिंकी की मम्मी का रोना रुक ही न रहा था। उसके पापा और मामा की भी आंखे नम थी। भावुक तो मैं भी हो रहा था। मैं खुद को दोषी मान रहा था। मैंने आंटी से कहा, ' मम्मी, चिन्ता न करें, हम सब उसका ख्याल रखेंगे.. सब कुछ ठीक रहेगा..' उन्होंने मुझे गले लगा लिया, ' हाँ बेटा, मुझे मालूम है, तुम सब हो, मेरी बेटी को कभी अकेलापन न लगेगा..फिर भी बेटा, लड़की की विदाई है..माँ-बाप के दिल का एक टुकड़ा अलग हो रहा है..' मेरी तो कोई बहन न थी परन्तु मैं इस विदाई का अहसास समझ पा रहा था। मैं कल्पना कर रहा था कि यदि मेरी बहन की विदाई हो रही होती तो मैं भी ऐसे ही रो रहा होता और मेरे माता-पिता भी चिंतित और दुखी हो रहे होते। मैंने कई बार बेटी की विदाई का यह दृश्य देखा था और प्रत्येक बार मैं भावुक होता रहा था। यहाँ तो कुछ ही लोग थे, मेरी ओर से अकेला मैं ही था। मेरे साथ अपने घर को छोड़ जो लड़की जा रही थी, वह मेरी मित्र थी और हम दोनों एक-दूसरे को समझते थे। वह भी जानती थी कि वह किसी अपरिचित के साथ न थी परन्तु माता-पिता और पिता तुल्य मामाजी से बिछुड़ना उसे भी कष्ट दे रहा था। मैं चाहता था कि जल्द से जल्द हम आगे बढ़ जाएं और इस भावुक होती जा रही स्थिति से दूर हो जायें। हम सुरक्षा क्षेत्र में आये तो संतोष सा लगा। पिंकी अभी भी दूर तक अपने लोगों को ताके जा रही थी। उसकी आँखें अभी भी भीगी हुई थीं। फ्लाइट के ऊपर उठते ही उसने अपनी आँखें बंद की और ध्यान की मुद्रा में आ गयी। वह निश्चय ही अपने नानक बाबा से संवाद कर रही थी, ' बाबा, मैं एक नए संसार को उड़ चली हूँ.. मेरा साथ देना .. आप साथ हो तो मैं क्यों फ़िक्र करूँ..' मैं उसका मुख देखता रह गया था। एक दिव्य प्रकाश था जो मुझे अभिभूत कर रहा था। कुछ समय बाद उसने आँखें खोली तो मैंने पूछा, ' क्या माँगा ? उसने कहा, 'मैं कभी कुछ माँगती नहीं..केवल चाहती हूँ वे मेरा हाथ पकड़े रहें..'
हम इस दो-अढ़ाई घंटे के सफर में एक-दूसरे को आश्वस्त ही करते रहे थे। अचानक घोषणा हो गयी कि हम कलकत्ता पहुँच चुके थे। एयरपोर्ट से बाहर आये तो माँ-बाबा को इंतज़ार करते पाया था। पिंकी ने दोनों के पांव छुए थे। मैंने भी उसका साथ दिया था। माँ ने पिंकी को गले लगा लिया था। हमारा सामान देख माँ मुझ से बोली, ' अब तुम भी इतना कुछ ले आये ..' मैंने कुछ न कहा, बस पिंकी की ओर देख मुस्कुरा दिया था। मैंने वो लड्डू का डिब्बा माँ को थमाया और कहा, ' ये केवल मेरे लिए है..मम्मी जी ने खास मेरे लिए दिया है..' मेरे मुख से निकला मम्मी शब्द माँ को चौंका गया था। उन्हें कुछ क्षण लगे यह समझने में कि अब माँ के साथ-साथ एक मम्मी जी भी आ चुकी थी, मेरे जीवन में। वह कुछ कहना चाहती थी परन्तु रुक गयी थी, न जाने क्या सोचकर। मैं जानता था मेरे मुख से मम्मी शब्द उन्हें भीतर कहीं बींध गया था। मैं विवश था। मैं तो केवल पिंकी को जताना चाहता था कि उसकी मम्मी अब मेरी भी थी।
घर पर माँ ने नयी बहू के लिए खास व्यवस्थाएं की हुई थी। घर अच्छे से सजाया हुआ था। मुख्य कमरे के चारों कोनों पर बड़े-बड़े फूल दान रखे थे। कमरा फूलों से महक रहा था। साफ सफाई भी हुई थी। लगता था, बिशाखा पूरा दिन जुटी रही होगी। मैंने अलग से बिशाखा से अपने कमरे के बारे में पूछा तो वह हंसने लगी, ' सब ठीक कर दिया है..ऊपर जाकर अपनी आँख से देख लो..' पिंकी थोड़ा बहुत शरमा रही थी। यह स्वाभाविक था। उसने मुझे अपने कमरे में ले जाने की इच्छा जाहिर की। माँ, चाय की तैयारी कर रही थी। मैंने कहा कि चाय पीकर ऊपर अपने कमरे में चलते हैं। बिशाखा चाय लेकर आ गयी। साथ में मिठाई थी और कुछ कटलेट आदि थे। मैं जानता था की ये सब कौन सी दुकान से लाये गए थे। मैं क्रॉकरी आदि देख कर थोड़ा विचलित हुआ। मुझे पिंकी के घर की व्यवस्था याद आ रही थी। मुझे लगा कि हम वैसा क्यों नहीं कर पाते। मैंने मन ही मन में सोचा कि कल ही कुछ नयी क्रॉकरी लेकर आऊँगा। मैंने पिंकी से पूछा कि क्या खाओगी ? वह धीमे से मुस्कुरायी। उसने कहा, ' फ्लाइट में तो इतना कुछ खा लिया था .. अब मन नहीं है ..' मैंने कहा, ' ये चॉप यहाँ का मशहूर है..खाकर देखो..' उसने कोने से छोटा सा टुकड़ा तोड़ लिया और कहा, ' अच्छा है..' मैंने भी मुँह में रखा और बिशाखा को आवाज़ लगायी, ' ये कब का लाकर रखा हुआ है ? एक दम ठंडा हो चुका है..' बिशाखा ने बताया कि वह शाम को ही लेकर आयी थी क्यों कि विलम्ब से जाने पर यह समाप्त हो चुका होता था। मुझे बिशाखा पर गुस्सा आ रहा था। माँ ने सुना तो मेरे हाथ से वह कटलेट लिया और कहा,' ठीक ही तो है..' मैं झुंझला गया, ' माँ ये चीज तो गरम ही खायी जाती हैं ..' माँ, हूँ .. कह आगे बढ़ गयी थी । पिंकी ने बात संभाली, ' अरे लाओ, मैं माइक्रो में गर्म कर देती हूँ ..' ये माइक्रो तो उन दिनों हमारे घर में न था। पिंकी मुस्कुराने लगी। उसने बिशाखा का हाथ पकड़ा और उसे ले रसोई की ओर बढ़ गयी। उसने कहा, 'तवे पर गर्म कर लाती हूँ..' माँ दौड़ी आयी, ' अरे नहीं.. मुझे दो.. तुम बैठो.. अभी ही तो आयी हो ..' उन्होंने यह भी कहा कि मैं ऐसा ही खाता था, आज न जाने क्यों मुझे गर्म खाने का भूत चढ़ गया था।
मैं पिंकी को लेकर ऊपर अपने कमरे में आ गया था। पिंकी ने यहाँ-वहाँ देखा और कहा कि उसे कमरा ठीक करने में बहुत परिश्रम करना पड़ेगा। उसने कहा कि कमरे को एक ओर से बढ़ाना होगा। मैंने कहा, ' जो कुछ करना हो, कर लेना.. अभी तो आराम करो ..' पिंकी ने अपना सामान खोलना आरम्भ किया। उसने कहा कि सामान सेट करने से पहले दिल्ली में फोन कर लेना चाहिए। मैंने हाँ कहा और उसे बताया कि फोन माँ के कमरे में था। वह मुस्कुरा दी और उसने अपने बैग से मोबाइल निकाला। उसने कहा कि अब तो इसे काम में लाना चाहिए। उसने दूसरे बड़े बैग से एक और मोबाइल का डिब्बा निकाल कर मुझे दिया और कहा, ' आपका भी तो है.. अब तो कहीं से भी मुझ से बात कर सकते हो..' मैंने कहा, ' हाँ, बात तो ठीक है परन्तु मोबाइल का बिल बहुत अधिक आता है..' उसने कहा, ' ये बिल-विल की बातें बाद में सोचेंगे..' उसने अपने मामाजी के घर का नंबर लगाया। मामाजी, अपने मम्मी पापा और लवली से लम्बी बातचीत की। मैं अपना नया मोबाइल फोन देखने में लगा रहा परन्तु मेरा मन उसकी ओर भी था। मैं जानता था कि इतनी लम्बी बात का बिल भी वैसा ही आएगा। जोगेन्दर अंकल ने मुझ से भी बात करनी चाही तो मैंने पिंकी को इशारे से कहा कि कह दो कि मैं बाद में करूँगा। असल में मैं नए मोबाइल पर खुद को सहज न समझ रहा था और माँ के कमरे में जाकर अपने पुराने फोन से ही बात करना चाहता था। पिंकी सामान और कपड़े आदि सजाने-गुजाने में लग गयी थी। मैं माँ के कमरे में गया और दिल्ली फोन लगाया। वो सब लोग एक-एक कर मुझसे बात करने लगे थे। सब की एक सी बात थी, ' हमारी पिंकी का ध्यान रखना..कोई भूल हो जाये तो अनदेखी कर देना .. ' मैं क्या कहता, यही दोहराता रहा कि चिंता न करें, सब ठीक रहेगा। जोगेन्दर अंकल ने अगले दिन हमारी ओर से होने वाली रिसेप्शन पार्टी के बारे में पूछा। मैंने उन्हें भी वही कहा जो पिंकी को कहा था, ' अंकल, हम लीग इसे बहू भात कहते हैं, यह आयोजन नयी बहू को सबसे परिचित करवाने के लिए किया जाता है ..' उन्होंने कहा कि वह भी इसमें भाग लेने के लिए आते परन्तु अपने काम-धंधे के कारण अधिक दिन तक दूर नहीं रह सकते थे। उन्होंने हमारे चंडीगढ़ आने की बात भी उठाई थी और कहा, ' बेटा, जल्दी यहाँ आने का कार्यक्रम बनाना ..' पिंकी अपने काम में व्यस्त थी। उसने कहा कि इस कमरे से जुड़ा हुआ एक और कमरा होता तो अच्छा होता। उसने इसकी गुंजाईश देख ली थी और बताया कि छत की एक ओर सरलता से एक कमरा निकाला जा सकता था। मैंने कहा, ' बाद में कभी देखा जायेगा ..इस बारे में माँ से बात करनी होगी.. बिना उनकी स्वीकृति के इस घर में कुछ भी नहीं होता..'
( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर .. )
Wednesday, November 18, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 46
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II- चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )
( ४६ ) उस रात मामाजी के घर रहना भारी लग रहा था। जोगेन्दर अंकल, सुखबीर अंकल और उनके साथ आये परिवार जन के साथ-साथ कनाडा से आये बंटी का परिवार वहां था और धमा चौकड़ी मचाये हुए था। मैं पूरी तरह से इस माहौल में खुद को मिस फिट महसूस कर रहा था। पिंकी का गैर पंजाबी और बंगाली पति होने के कारण, सभी मेरे ओर घेरा सा बनाये हुए थे। ' इनके लिए रसगुल्ला लाओ जी .. ' चितरंजन पार्क से फिश लाकर खिलाओ जी..' मैं चुपचाप खिसिया रहा था कि रसगुल्ला और मछली से आगे भी बंगाल है। संकोच और अकेलापन था जो मुझ पर दबाव डाल रहा था कि पिंकी मेरे साथ ही बैठी रहे। इस भीड़भाड़ में केवल वह और उसकी बहन ही थे जिनके साथ मैं सहज हो सकता था। लवली तो अपने अंग्रेजी बंटी भैय्या के साथ चहकती फिर रही थी। मैंने एक-दो बार उसे अपने पास बुलाने का प्रयास किया किंतु वह 'जीजाजी, आपको तो दीदी मिल गयी है, अब हम क्या करें ..' कहकर भाग गयी थी। उधर बंटी अपनी और से न जाने क्या-क्या कार्यक्रम बनाता जा रहा था। मामाजी का भव्य आवास शादी घर के लिए बहुत सुंदरता के साथ सजाया हुआ था। वह इस तरह से कामकाज में जुटे हुए थे मानों उनकी ही लड़की की शादी थी। वैसे पिंकी के प्रति उनके प्यार को देखें तो सच में उनकी बेटी की ही तो शादी थी। जोगेन्दर आंटी स्वयं कह चुकी थी कि सब दायित्व उनके भाई ने अपने कंधे पर लिया हुआ था। दिल्ली में शादी हुई थी तो चंडीगढ़ वाले तो कुछ अधिक कर पाने की स्थिति में न थे। देर रात बंटी ने कहीं घूम कर आने का विचार सुझाया। पिंकी -लवली तो चहक उठी थी। मैं केवल ना नुकुर ही करता रह गया था। बस तुरंत एक बड़ी गाड़ी निकाली गयी और हम चार न जाने किस ओर निकल गए थे। यहाँ वहाँ भटकते किसी होटल के कॉफ़ी बार पहुंचे थे। मैं आश्चर्य में था कि आधी रात के समय भी वहां भीड़भाड़ और रौनक थी। ये समाज के किस वर्ग के लोग थे जो दुनिया से बेफिक्र और बेखौफ अपने में ही मस्त थे। मेरा वामपंथी विचारधारा की ओर झुका दिमाग बे चैन और क्षुब्ध था। मुझे लगा यह क्या हो रहा है हमें ? हम भारत जैसे देश में किस दिशा की ओर बढ़ रहे हैं ? पिंकी ने मुझे खामोश देखा तो कहा, ' ठीक तो हो न, क्या बात है चुपचाप हो ? मैंने कहा कि सब ठीक था, बस रात अधिक हो चुकी थी सो थोड़ी थकावट सी थी। उसने पूछा कि क्या घर चलें ? मैंने कहा कि नहीं सब ठीक था। उधर बंटी था जो मस्ती के मूड में था और यहाँ कुछ समय बिताना चाहता था। पिंकी मेरी मन स्थिति भाँप चुकी थी। उसने बंटी को कहा कि अब चलना चाहिये। बंटी ने बदले में मुझ से पूछा, ' क्यों जीजाजी, यहाँ सबके साथ मन नहीं लग रहा, वाइफ के साथ एकांत चाहिए ? लवली भी हँसने लगी। पिंकी ने कहा, ' जीजा जी को नहीं, तेरी दीदी को तेरे जीजाजी अकेले में चाहिये.. समझे, अब यहाँ से निकलो..' घर पहुंचे तो देखा,स्थानीय मेहमान जा चुके थे। मामाजी और दोनों अंकल एक ओर बैठे थे। उनके हाथों में गिलास थे और सामने एक बोतल और कुछ ड्राई फ्रूट रखे थे। मैं हैरान था कि रात के इस पहर भी ये सब चल रहा था। मामाजी ने इशारे से मुझे भी उनके साथ जुड़ने की दावत दी। मैंने मुस्कुराते हुए न का इशारा करते हुए थैंक्स कहा था।
हम अपने कमरे में गए तो लगा किसी बड़े नामी होटल का विशेष कमरा हो। सब कुछ पांच सितारा स्तर का था। मैंने पिंकी से पूछा, ' ये कमरा तो बहुत शानदार है ? उंसने बताया कि उसके मामाजी को अपने घर को शानदार रखने का बहुत शौक था। उसने यह भी बताया कि हमारी शादी के लिए उन्होंने इस कमरे को नया रंग रूप दिया था। मैंने कहा कि वह बहुत सफल कारोबारी थे और अपने पैसे को इस तरह खर्च कर सकते थे, 'अमीर लोग धन खर्च नहीं करते, लुटाते हैं..' मेरी इस बात पर उसने कोई प्रतिक्रिया न दी थी। हम आने वाले दिनों की बातें करते रहे थे। मैं मुग्ध था उसके सौंदर्य, उसकी लावण्यता और उसकी सबको अपना बना लेने की दक्षता पर। उसे छुआ तो प्रतीत हुआ कि कुछ था जो मुझे सबसे अलग कर कहीं दूर उड़ा ले जाना चाहता था। वह रात थी जो तितली के पंखों सी कोमलता लिए, इस पुष्प से उस पुष्प को छूती हुई, वाटिका में शुभगन्ध उड़ाती चली जा रही थी।
सुबह हंसी-ख़ुशी के माहौल में सबसे मुलाकात हुई। बंटी और लवली ने मेरी खिंचाई शुरू कर दी। ये जीजाजी शब्द न जाने क्यों असहज सा लग रहा था। मेरा मन कहीं बाहर निकल जाने का हो रहा था। इधर घर के बड़े लोग थे जो हर क्षण मुझे कुछ न खुश खिलाये जाने की फ़िराक में थे। मैं अब जल्दी से जल्दी अपने कलकत्ता पहुँच जाना चाहता था। मेरी निगाहें पिंकी को खोज रही थी पर वह थी कि अपने स्वजनों में घिरी हुई थी। वह आते-जाते मेरा हालचाल पूछ जाती और कह जाती, ' कुछ खाने को लाऊँ ? दोपहर का खाना लगाया गया था तो मैं देखकर दंग रह गया था। इतना कुछ ? नौकर-चाकर लगे हुए थे, सबकी फरमाइश को पूर्ण करने में। मामाजी के दिल्ली में रह रहे सम्बन्धियों के साथ साथ मित्रगण भी आये हुए थे। उन सब का एक ही कथन था, ' आज तो मनप्रीत ससुराल चली जाएगी.. इसलिए मिलना तो था ही..' मेरे पास कोई आकर बैठता तो कलकत्ता के बारे में ही पूछता था, जैसे मेरी रूचि सिर्फ कलकत्ता और बंगाल हो। जो लोग कभी कलकत्ता गए हुए थे, वे वहां की भीड़ और वहां की मिठाई की ही बातें करते। मैं ससुराल की इन बातों खिन्न हो रहा था और इन बेकार सी बातों से मुक्ति चाहता था। मैं खिन्न होते हुए भी मुस्कुराने और सरदारों की बातों में रूचि दिखाने को विवश था। अचानक किसी ने हमारी फ्लाइट का समय जानना चाहा और सुनते ही कहा कि आज एयरपोर्ट की ओर के ट्रैफिक में समस्या थी और हमें समय से निकल जाना चाहिए था। ट्रैफिक समस्या का सुन, मैं खुश हो गया था कि कहीं तो हमारे कलकत्ता जैसी बात हुई थी। मैंने पिंकी को इशारे से बुलाया और उसे कहा कि अंकल कह रहे कि हमें एयरपोर्ट के लिए निकल जाना चाहिए वर्ना फ्लाइट मिस हो सकती थी। उसने अपने मम्मी-पापा से बात की और मैंने देखा कि हमें विदा करने की तैयारियाँ होने लगी थी। चार बड़े बड़े सूट केस थे। साथ ही कुछ बैग छोटे बैग भी। पिंकी की मम्मी मेरे हाथों में एक बड़ा सा मिठाई का डिब्बा दे गयी थी। मैंने पूछा कि यह क्या था तो उन्होंने मुस्काते हुए कहा,' आप कह रहे थे न दिल्ली के लड्डुओं के बारे में, खास आपके लिए है मंगवाए हैं..' मुझे याद आया कि किसी क्षण बातों-बातों में मैंने कहा था कि दिल्ली के लड्डू तो बहुत मशहूर होते हैं।
कुछ समय बाद हम लोग एयरपोर्ट के लिए निकल आये थे। एक गाड़ी में मैं, पिंकी, लवली और बंटी थे। गाड़ी बंटी चला रहा था। दूसरी गाड़ी में पिंकी के मम्मी-पापा और मामाजी-मामीजी थे। उस गाड़ी का स्टेयरिंग मामाजी के हाथ में था। मैं अभी से ही अपने नगर कलकत्ता और बंगाल में था। मैं खास अवसरों पर की जाने वाली ईश्वर स्तुति को नापसंद करता हूँ और इन्हें एक कमज़ोरी मानता रहा हूँ परन्तु उस दिन न जाने क्यों, गाड़ी में बैठते हुए, बंगाली परंपरा को निर्वाह करते हुए, मैंने धीमे स्वर में, दुर्गा-दुर्गा कहा था। साथ ही पास बैठी पिंकी को ऐसे देखा था कि कहीं उससे कुछ चुराया हो । ( आज यही तक, आगे यहीं पर, अगले गुरुवार को..)
Wednesday, November 11, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -45
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II- चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )( ४५ ) अब हमारी कलकत्ता की वापसी थी। सामान बहुत बढ़ गया था। माँ सूटकेसों को देख परेशान थी या प्रसन्न, समझ न पा रहा था। मैं और पिंकी तो अगले दिन शाम को फ्लाइट से पहुँचने वाले थे। माँ को यही चिंता थी कि मैं उनके साथ न लौट रहा था। जोगेन्दर अंकल ने माँ को आश्वस्त किया था कि वह सब व्यवस्था करवा देंगे और कोई दिक्कत न होने देंगे। इन्द्राणी का मन भी एक दिन रुक, हमारे साथ ही फ्लाइट से लौटने का था परन्तु उसे अपना मन मारना पड़ा क्योंकि यह संभव न था। पिंकी और मैं एक दिन के लिए उसके मामा के घर रुकने वाले थे। मैं अपनी ख़ामोशी के साथ खुश था। पिंकी, मामाजी.. मामाजी कहती रहती थी। मुझे धीरे से गर्दन हिलाकर उसकी हाँ में हाँ करना होता था। मामाजी ने हमें एक कार दे दी थी। उन्होंने कहा था, ' खूब घूमो-फिरो..ये एक दिन दिल्ली के लिए है..' रात उस पांच सितारा होटल में कटी थी। देर रात तक हम परिवार के खास लोग एक ही कमरे में जमे रहे थे। मेरे माँ-बाबा बहुत खुश थे। लगता था उनका पंजाबी लड़की को लेकर जो भ्रम था, वह धीरे-धीरे धुंधलाता जा रहा था। हम दोनों जब अपने कमरे में गए, तब तक भोर के चार बज चुके थे। दोनों थक कर चूर थे। होटल की तरफ से हमारे कमरे को भली भांति सजाया गया था। चारों ओर फूल सजे थे। टेबल पर फ्रेम में सजी हम दोनों की फोटो रखी थी। ये फोटो हमारे विवाह की ही थी। इसके साथ ही हमें वैवाहिक जीवन की शुभ कामनाएं देता एक बहुत ही सुन्दर कार्ड भी रखा हुआ था जो होटल के मुख्य प्रबंधक की ओर से था। मैं हैरान था, होटल वालों ने इस अल्प समय में ही कैसे इस फोटो का प्रबंध कर लिया था। यह हमारे नव जीवन की प्रथम रात थी। हम दोनों मौन, संकुचित और एक-दूसरे के प्रति आभार से भरे हुए थे। शब्द थे किन्तु कहीं खो से गए थे। इस मौन को तोड़ते हुए पिंकी ने अपने बैग में से एक फोटो फ्रेम निकाला। यह गुरुनानक देव जी का चित्र था। उसने हम दोनों की फोटो के पास इसे रखते हुए, प्रणाम किया और मुझे भी ऐसा करने को कहा। मैंने हँसते हुए कहा, ' अरे यहाँ भी ईश्वर की स्तुति ? उसने कहा, ' हम एक नया संसार बसाने जा रहे हैं, परमात्मा का आशीष तो लेना ही होगा ..' मैंने कहा, हाँ और आगे बढ़ प्रणाम किया। हम दोनों एक-दूसरे के हाथ थामे, मुस्कुराते जा रहे थे। यह पहली रात नहीं एक नई सुबह थी। एक दूसरे के प्रति निशब्द से कुछ आश्वासन, कुछ वादे और कुछ उड़ते से सपने थे।
वही राजधानी एक्प्रेस ट्रैन थी जो दो दिन पहले हमें लेकर आयी थी। तब रोमांच था, आज एक संतुष्टि थी। भीड़ भाड़ वाले नयी दिल्ली स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर, हमारा बंगाली दल अलग सी पहचान दिखा रहा था। पिंकी थी जो सब में घुलमिल गयी थी। वह नवनवेली, शरमा तो रही थी परन्तु प्रयत्नशील थी कि सब उसे अपना ही जाने । वह माँ-बाबा की सुविधा-असुविधा को देख रही थी। उसके प्रयासों को देख, मेरे माँ-बाबा दोनों बहुत खुश थे। ट्रैन चलने को हुई तो उसके प्रति माँ का स्नेह उमड़-उमड़ पड़ा था। एक बार फिर से दुर्गा दुर्गा स्वर उठा था। इन्द्राणी हँसते हुए मेरे कानों में कह गयी, ' बहूरानी को ज्यादा परेशान मत करना..' अब माँ की आंखें नम हो रही थी। मैं कुछ कहता इससे पहले पिंकी, माँ को सहज करते हुए बोल उठी, ' मम्मी जी, चिन्ता न करें.. आप कल सुबह पहुँच रही हैं और हम शाम को..मेरे लिए मछली बनवा कर रख्नना.. मिलकर डिनर करेंगे..' फिर वह बिशाखा को देख बोली, ' दीदी, आप मेरे लिए मीठा दही लाकर रखना..' बिशाखा शरमाते हुए हंसने लगी थी। उसने बांग्ला में कुछ कहा था। सब लोग उसकी बात पर हँस पड़े थे। हम दोनों ट्रैन से नीचे उतर आये थे और धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म से बाहर की ओर खिसकती ट्रैन को देखते जा रहे थे। स्टेशन से बाहर आ, पिंकी ने कहा कि आज की शाम ही हम दोनों के पास थी। अगले दिन तो कलकत्ता के लिए निकल जाना था। उसका विचार था कि यह जो समय मिला है उसे अपने हिसाब से बिताया जाना चाहिए था। मुझे क्या एतराज़ हो सकता था। वैसे भी मामाजी के घर पर बाहर से आये हुए सभी सम्बन्धी रुके हुए थे। उनके सरदारों वाले ठहाकों के बीच में, मैं तो मुरझाई हुई कविता की एक पंक्ति सा बन के रह जाने वाला था। मैं अधिक से अधिक समय बाहर ही बिताना चाहता था। मैं चाहता था, देर रात घर पहुंचे और सीधे अपने बिस्तर में घुस जाएं। मैंने सुझाव रखा, ' ठीक है, पर खाना भी बाहर ही कहीं खाते हैं..' पिंकी ने हाँ कहा। गाड़ी में बैठते ही, उसने ड्राइवर को किसी जगह का नांम बताया। ड्राइवर सुन हैरान हो गया था। उसने पंजाबी में कुछ कहा तो पिंकी ने अंग्रेजी में जवाब दिया ' नो वरी ' मैंने पूछा तो उसने बताया कि ड्राइवर चिन्ता कर रहा था कि उस जगह आने-जाने में तीन घंटे लग जायेंगे क्यों कि ट्रैफिक का समय था। वो मुस्कुरा रही थी। उसने अपने बैग से मोबाइल निकाला। मैं हैरान हो देखने लगा। मोबाइल उन दिनों कुछ खास लोगों के पास ही हुआ करता था। उसने कहा, ' नया है, मम्मी से मिला है..आपके लिए भी है ..घर जाकर मिल जायेगा..' उसने अपनी मम्मी को फोन लगाया और कहा कि हम लोग देर से घर लौटेंगे और डिनर कर के ही आएँगे। मैंने उसका मोबाइल फोन देखना चाहा था । ये नोकिआ का फोन था। मैंने कहा, ' अरे, ऐसा ही तो मैं भी लेना चाहता था.. ' वह हँस पड़ी, ' लो, मन ही मन में आपने चाहा और आज मिल भी गया..' मैंने उस दिन उसे आप से तुम पर आ जाने का निवेदन किया था। उसने कहा कि पंजाबियों में पति को आप ही कहा जाता है। ये उसके परिवार के संस्कार थे परन्तु वह कोशिश करेगी कि मेरे लिए आप से तुम पर आ जाये। हमारी कार दिल्ली की सड़कों पर दौड़ी चली जा रही थी। कनॉट प्लेस, विदेशी दूतावासों के क्षेत्र चाणक्यपुरी से होती हुई। पिंकी मुझे किसी गाइड की तरह, दाएं-बाएं दिखा रही थी। मैं हैरान था कि चंडीगढ़ की लड़की को दिल्ली के बारे में इतना सब कुछ कैसे पता था ? उसने स्वयं से मेरी शंका का निराकरण कर दिया था। उंसने कहा, ' बचपन से ही दिल्ली आ रही हूँ.. दो-चार दिन मिले नहीं कि दिल्ली में मामाजी के पास..मुझे तो चंडीगढ़ से अधिक दिल्ली अपना लगता है.. बहुत पहले मामाजी दिल्ली कैंट एरिया में रहते थे..वहां का गुरुद्वारा मुझे बचपन से अच्छा लगता है.. मामाजी इस गुरूद्वारे में लाया करते थे.. ये मिलिट्री एरिया है..इस गुरूद्वारे में सेना के बहुत लोग आते हैं..' फिर उसके चेहरे पर एक मुस्कान बिखर आयी थी, वह बोली, ' यहाँ गोपीनाथ मार्किट है..वहां एक होटल है.. बहुत अच्छा खाना है.. छोटा सा होटल है परन्तु खाना..एक नंबर.. बचपन में तो खूब खाते थे वहां..' मैं उसकी ख़ुशी देखता रह गया था। मैं कहा, ' चलो, आज तुम्हारी बचपन की यादें ताज़ा कर लेते हैं..वहीं डिनर करते हैं.. ' वह उत्साहित हो गयी, ' सच ..पर वह छोटा सा होटल है और सभी तरह के लोग आते हैं..' मैंने कहा कि इसमें क्या बात है.. वहीं चलते हैं..गुरूद्वारे में मत्था टेक कर, वहीं खाना खाएंगे ..देखें तो हमारी मनप्रीत का बचपन का होटल..' मेरा गुरूद्वारे जाकर, मत्था टेकने का सुझाव, उसे अच्छा लगा था। ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर ..)
Wednesday, November 4, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -44
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II- चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ) ( ४४ ) मैं पिंकी से मिलने को बे चैन हो रहा था परन्तु मिलने का कोई पथ नहीं सूझ रहा था। लंच हो जाने के बाद इन्द्राणी दी ने शायद मेरे मन की सुन ली थी और वो बात कह दी जो जिसकी चाह मैं शर्माते हुए छिपा रहा था। उन्होंने सुझाव दिया कि कोई जरूरी सामान खरीदने के बहाने से निकल जाते हैं और पिंकी से मिल आते हैं। मैंने कहा, ' ठीक है..' मेरा उतावलापन देख वह हंसने लगी थी। उसने कहा, ' अरे कल तो सज धज कर मिलने जा ही रहे हो.. एक दिन की ही तो बात है, प्रतीक्षा करो..' मैंने कहा, ' चलो ना, शादी से पहले एक बार तुम भी लड़की से मिल लो.. ' मैंने पिंकी को फोन किया। उसने एक खास रेस्टोरेंट में पहुँचने की बात कही थी। मैं और इन्द्राणी दी एक गाड़ी ले निकल गए। ये दिल्ली के कैलाश क्षेत्र का एक रेस्टोरेंट था। हमारे पहुँचने से पहले ही वह वहाँ आ गयी थी। कोने की एक टेबल पर वह और लवली बैठे हुए थे। उनके साथ एक और सिख लड़का भी था। मुझे देखते ही लवली दौड़ते हुए आयी और जीजाजी कह लिपट गयी थी । वह एक निर्मल हृदया साली थी। उसका इस तरह मिलना, मुझे अच्छा लगा था। टेबल पर बैठते ही मैंने कहा, ' ये मेरी कजिन इन्द्राणी हैं..' पिंकी तो कुछ न बोली परन्तु लवली ने हँसते हुए पास बैठे सिख युवक की ओर इशारा कर कहा, ' और ये हमारे कजिन बँटी साहब हैं, ये कनाडा से आये हैं..' बंटी ने अपना हाथ मेरी ओर बढ़ाया और गर्मजोशी से हेलो कहा। वह अच्छी कदकाठी वाला स्मार्ट युवक था। वह अंग्रेजी में ही बात कर रहा था। बाद में पता चला कि बचपन में ही उसके माता-पिता कनाडा चले गए थे। वहां उन्होंने अपना अच्छा खासा कारोबार बना लिया था। बंटी उनका इकलौता बेटा था। बातों-बातों में पता चला कि उसने पढाई-लिखाई अमेरिका में की थी और अब वह वहीं किसी कम्पनी में काम करता था और कनाडा में अपने माता-पिता के पास आता-जाता रहता था। उसकी भी तमन्ना थी कि अपना कारोबार बसाया जाये। कॉफी चल रही थी और इधर-उधर की बातें भी। बंटी पूरी तरह से महफ़िल पर छाया हुआ था। लवली और बंटी खूब खिलखिला रहे थे। मैं और पिंकी बे वजह हर बात पर मुस्कुरा रहे थे। इन्द्राणी समझ ही न पा रही थी कि क्या किया जाये ? कुछ समय बाद बंटी ने सुझाव रखा कि लड़के-लड़की यानि मुझे और पिंकी को एकांत दिया जाना चाहिए। हम दोनों को वहीँ छोड़ वे लोग बाहर निकल गए थे। बाहर जाने से पूर्व बंटी ने सेवा कर रहे वेटर को कुछ और ऑर्डर दिया और कहा कि हम दोनों का हर तरह से ख्याल रखा जाये। उसकी आवाज़ में एक तरह का आदेश और प्रभाव था। उसका व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि धनाढ्यता साफ झलकती थी। वेटर उसकी हर बात पर मुस्कुरा रहा था और यस सर .. यस सर.. ही उसके मुख से निकल रहा था। इन्द्राणी बाहर जाते जाते मेरे कानों में कह गयी, ' मैं तो अकेले फंस गयी.. इस अमेरिकन सरदार जी के साथ..'
अब हम दोनों ही थे और दोनों शांत। विवाह से पूर्व यह हमारी अंतिम मुलाकात थी। पिंकी ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ' कैसा लग रहा है, बाबू मोशाय ? ' मैं मुस्कुरा दिया। मैंने कहा, ' मुझे तो अच्छा लग रहा है.. हमारी पंजाबी कुड़ी को कैसा लग रहा है ? वह हंसने लगी। उसने कहा कि चलो मैंने एक पंजाबी शब्द तो सीख लिया था। मैंने कहा, ' अरे नहीं, मैंने तो आओजी, सत श्रीकाल और बहुत कुछ सिख लिया है ..' पिंकी ने पूछा कि मेरे घर में और परिवारजनों में इस अंतर्जातीय विवाह को कैसे लिया गया था ? मैंने उसे आश्वस्त किया कि सब ने सामान्य और समय के साथ होने वाली बात के रूप में लिया था। पिंकी, इन्द्राणी से प्रभावित लगी थी। उसने कहा कि वह बहुत सुन्दर और आकर्षित कर लेने वाली शख्सियत थी। फिर उसने पूछा कि उसने अब तक शादी क्यों नहीं की थी ? मैंने कहा कि उनकी मर्जी, जब चाहेगी कर लेगी। पिंकी ने भी हाँ करते हुए कहा कि उसे लड़कों की कमी थोड़े ही होगी। ऐसे ही न जाने क्या क्या बात होती रही थी। अचानक मुझे लगा कि अब वो तीन लोग किसी भी क्षण आ सकते थे। मैंने कहा, ' तुमने हिम्मत कर बंगाली परिवार में आने का निर्णय किया है, किसी तरह का संशय तो नहीं है ? उसने कहा, ' तुमने भी तो सिख परिवार से नाता जोड़ने का साहस दिखाया है.. अगर हम जुड़े रहेंगे तो सब कुछ ठीक रहेगा..' मैंने आगे बढ़ उसका हाथ अपने हाथ में लिया ही था कि उधर इन्द्राणी, बंटी और लवली आते दिख गए थे। एक बार फिर से बंटी छा गया था। वह मेरे लिए कुछ लाया था। उसने कहा कि बाहर घूमते हुए कुछ चीजें पसंद आ गयी थी तो एक अपने जीजू के लिए और एक अपनी बहन के लिए खरीद ली थी। ख़ुशी ख़ुशी हम सब रेस्टोरेंट से निकल आये थे। पिंकी ने मुझे हल्के से कहा, ' चलो अब कल मिलते हैं .. ऑल द बेस्ट..'
अगले दिन सुबह से हम सब के बीच शादी की तैयारियों की बातें होने लगी थी। हम सब कलकत्ता वालों के लिए यह शायद पहला अवसर था कि दिन की शादी में भाग ले रहे थे। सभी नाराज़ से थे कि सजने-संवरने का समय नहीं मिल रहा था। माँ सभी को समझाने की कोशिश करती फिर रही थी कि गुरुद्वारे की शादी में अधिक समय नहीं लगेगा। रात की पार्टी के लिए बहुत समय मिलेगा। वह हर किसी से कह रही थी कि गुरुद्वारा एक पवित्र स्थान है वहां नियम से हम सभी को समय पर पहुँच जाना चाहिए। कुछ विलम्ब से हम गुरुद्वारे पहुंचे थे। कुछ लोग हमें लेने आये थे। द्वार पर हमें सिर ढकने के लिए स्कार्फ़ दिए गए थे। मुझे और मेरे बाबा को सिख परंपरा की पगड़ी पहनाई गई थी। मुझे पगड़ी में देख इन्द्राणी मुस्कुराने लगी थी। माँ ने उसे इशारे से शांत और संयम में रहने को कहा था। इन्द्राणी ने इस अवसर के लिए एक विशेष पंजाबी ढंग का सूट बनवाया था। सलीके से सिर ढक वह पूरी तरह से पंजाबी महिला दिख रही थी। हमारी ओर से वही सबसे प्रभावित कर रही थी। अत्यंत आदर के साथ हमारा स्वागत किया गया था। भीतर हॉल में बहुत लोग थे। सुखबीर अंकल और जोगेन्दर अंकल आगे बढ़ सारी व्यवस्था को देख रहे थे। भजन की आवाज़ से माहौल पवित्र बना हुआ था। हम बंगालियों के लिए यह सब नया था। हम पंक्तिबद्ध हो मत्था टेक रहे थे। जोगेन्दर अंकल ने बताया कि पहले कुड़माई की रस्म की जाएगी। मुझे एक कड़ा पहनाया गया था। मैंने अमृतसर में एक कड़ा खरीदा था। स्टील का वो कड़ा मेरी कलाई पर था। अब जो पहनाया गया वह सोने का था। मुझे एक छोटी सी करपान भी दी गयी थी। हम शांत हो अरदास सुन रहे थे। सब कुछ अत्यंत पावनता के साथ हो रहा था। पिंकी ने मुझे धीरे से बताया था कि यह आनंद कारज था जो बहुत शुभ माना जाता है। हम बंगाली लोगों के लिए यह एक अपरिचित सा अनुभव था। हमें आशीर्वाद दिए गए थे। बधाइयाँ दी गयी थी। मुझे कहीं न कहीं यह सब अच्छा लगा था। बाद में हमें लंगर के लिए आमंत्रित किया गया था। पिंकी को उसके परिवार वाले नयी पोशाक पहनाने के लिए ले गए थे। कुछ समय बाद वह मेरी माँ की दी हुई साड़ी में वापस आयी थी। उस पर सुनहरी गहने सजे हुए थे। बंगाली साड़ी और पंजाबी लड़की, सभी उसे ताकते रह गए थे। मुझे अपनी किस्मत पर गर्व हुआ कि ऐसी सुन्दर लड़की मेरी पत्नी बन चुकी थी। मैं किसी दूसरे ही संसार में उड़ रहा था।
संध्या में पार्टी का नज़ारा अलग ही था। पांच सितारा होटल था। होटल वालों का ही सब प्रबंध था। हम तो कुछ ही लोग थे परन्तु दूसरी ओर से बहुत थे। मेरे लिए यह अनूठा अनुभव था। पूरा हॉल जगमगा रहा था। पंजाबी लोग और उनकी महिलाएं महंगे-महंगे परिधान और आभूषणों में सजी, हँसते-खिलखिलाते बधाई दे रहे थे। मेरे प्रति उनका स्नेह उमड़ रहा था। पिंकी और मेरे साथ, जोगेन्दर अंकल-आंटी खड़े थे। उपहारों और नगदी से भरे लिफाफों का ढेर जमता चला जा रहा था। फोटग्राफर्स और वीडियो वाले कुछ ऐसा अंदाज़ दिखा रहे थे मानों किसी राजकुमार की दावत हो। हम कलकत्ता वाले इस पांच सितारा चकाचोंध में दबे-दबे से तो जरूर थे परन्तु खाने-पीने का आनंद भी ले रहे थे। माँ बहुत गर्व से भरी दिख रही कि उसके सुपुत्र को ऐसी सुन्दर और धनवान परिवार की लड़की ने पसंद किया था। वह अपनों में कहती घूम रही थी कि कुछ ऐसा न कर देना जिससे हमें लज्जित हो जाना पड़े। सिख सम्बन्धियों में वह बहनजी बनी हुई, आदर और सम्मान पा रही थी। मैं दूर मंच से देख रहा था। इन्द्राणी थी जो यहाँ-वहाँ चहकती घूम रही थी। वह सरदारों की भीड़ में खुद को आकर्षण का केंद्र बनाये हुए थी। मैंने सोचा चलो हमारी ओर से एक तो है जो प्रभाव जमा रही थी। वह कभी कभी हमारे पास मंच पर भी आती और कुछ न कुछ कह जाती थी। एक बार उसने कहा कि पार्टी बड़ी शानदार थी और वह बहुत लुत्फ़ ले रही थी। उसने यह भी बताया कि उसने कुछ दोस्त भी बना लिए थे। पार्टी देर रात तक चल रही थी। हम नव दम्पति विश्राम और एकांत के लिए प्रतीक्षारत, हर मिलने वाले अतिथि को देख, लगातार चेहरे पर मुस्कराहट की लकीरें बनाये जा रहे थे। ( आज बस, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर.. )
Wednesday, October 28, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -43
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II- चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )
( ४३ ) दिन यूँ ही बीतते जा रहे थे। पिंकी से बात होती तो समाप्त होने को न आती थी। इधर रोबी दा मुझे संगठन के कामों में व्यस्त कराते जा रहे थे। मेरी माँ थी जो हर दिन यहाँ-वहाँ ख़रीददारी में लगी हुई थी। बाबा भी अपने ही तरीके से व्यस्त थे। वह अपनी डायरी में न जाने क्या-क्या हिसाब -किताब लिखते रहते थे। वह आते-जाते माँ को कह जाते कि बजट बढ़ता चला जा रहा था। माँ उनकी बात की अनदेखी कर देती और कहती, ' एक ही तो बेटा है, उसकी शादी में ख़र्चा न करोगे तो कब करोगे ? बाबा झुंझला जाते थे। वह खुश तो थे परन्तु न जाने क्यों शंकित और चिंतित रहते थे। बेटे के विवाह-आयोजन में माता-पिता दोनों व्यस्त थे। परंतु दोनों की चिंता में एक तरह का मूलभूत अंतर था जो स्त्री और पुरुष के आध्यात्मिक असहमति को दर्शा रहा था और मुझे पिता के सांसारिक दायित्व भाव के प्रति शिक्षित किये जा रहा था। मैं इन दोनों के मध्य में था। माँ की तरह मुझे भी लगता कि हमें पिंकी के घर वालों को प्रभावित करना चाहिए और विवाह आयोजन में किसी तरह की कमी नहीं दिखानी चाहिए। साथ ही मैं पिता की तरह सोचता कि हमें शानो-शौकत और दिखावे से बचना चाहिए और ख़र्चों को बांध कर रखना चाहिए। एक बार इन्द्राणी से इस विषय पर बात हुई थी। उसने भी माना कि मेरा विवाह धूमधाम से किया जाना चाहिए, विशेष कर इसलिए कि यह सम्बन्ध एक धनाढ्य पंजाबी परिवार से होने जा रहा था। उसने हँसते हुए यह भी कहा कि हम बंगालियों की प्रतिष्ठा दाव पर थी।
एक दिन पिंकी ने बताया कि उसके मामा ने हम दोनों के गोवा यात्रा का प्रबंध कर दिया था। कलकत्ता में होने वाले रिसेप्शन के अगले दिन हमारी फ्लाइट बुक कर दी गयी थी। वहां पांच दिन रहने का कार्यक्रम था। उसने यह भी बताया कि मामा के एक मित्र जिनका गोवा में बड़ा व्यापारिक सम्बन्ध था, सारी व्यवस्था कर रहे थे। मैंने उसे फिर से बताया, ' रिसेप्शन नहीं बहुभात कहो..' उसने दिन गिनकर बताया कि मात्र दस दिन ही रह गए थे। मैंने कहा कि इतने दिन न जाने कैसे फुर्र से निकल गए थे परन्तु अब एक-एक दिन भारी होता जा रहा था। पिंकी अपने घर और सम्बन्धियों में चल रही हलचल का बताती थी। उसने कहा कि उसके मम्मी-पापा बहुत खुश थे कि एक पढ़ा-लिखा, सुशील लड़का उनका दामाद बनने जा रहा था। उसने लवली के बारे में भी बताया कि वह अपने जीजा से वसूल की जाने वाली चीजों की लिस्ट लंबी करती जा रही थी। मैंने दो-तीन बार लवली से भी बात की थी और मैं जान चुका था कि एक अत्यंत चंचल चरित्र मेरे जीवन में आने वाला था। एक दिन तो उसने अपना नटखटपना दिखाते हुए कहा था कि दीदी तो शादी के बाद ही कलकत्ता आ पायेगी, तब तक मेरा दिल बहलाने के लिए वह आ सकती थी। मैं सामान्यतः ऐसी बातों को सहजता से नहीं ले पाता और संकोच कर जाता हूँ परन्तु उस दिन मैंने उसे कहा चिढ़ाते हुए कहा था कि उसे इतनी दूर आने का कष्ट करने की आवश्यकता न थी क्योंकि दिल बहलाने के लिए कलकत्ता में बहुत लोग थे। वह हूँ.. हूँ.. कहकर मुझे चिढ़ाने लगी, ' दीदी को बताती हूँ.. ये दिल बहलाने वाले लोगों की बात..' मैं भी हँस दिया था। पिंकी के पापा ने उनकी और से सम्बन्धी-मित्रों में बाटें गए निमंत्रण पत्र हमें भी भेजे गए थे। ये उनकी ओर से हमारे सम्बन्धियों को निमंत्रण था। मैं निमंत्रण पत्र देखता ही रह गया। इतना महँगा, इतना आकर्षक .. माँ ने ये कार्ड्स कुछ खास सम्बन्धियों को भिजवा दिए थे। इन्द्राणी के घर तो मैं स्वयं ही देने गया था। उसने देखा तो मेरी ही तरह आश्चर्यचकित रह गयी थी। वह तो सीधे ही इसके दाम पर आ गयी थी, ' बहुत महँगा होगा न, यह कार्ड.. ' साथ ही उसने इस तरह के महंगे कार्ड को बेकार का खर्चा भी बताया।
अंततः वह दिन भी आ गया जब हमें दिल्ली के लिए राजधानी एक्सप्रेस पकड़नी थी। सुबह से ही घर में चहल-कदमी थी। जो लोग साथ जा रहे थे उनके फोन आ रहे थे। बाबा हमेशा की तरह झुंझलाये हुए थे। वह सबको सीट नंबर और बोगी नंबर बताये जा रहे थे। उनका निर्देश था कि पांच बजे की ट्रैन थी तो दो बजे तक हावड़ा स्टेशन के लिए निकल जाना चाहिए था। उन्होंने कौन किस सीट पर बैठेगा, इसका एक चार्ट भी बना रखा था। माँ यह सब देख चिढ़ जाती और कहती, ' क्या स्कूल के बच्चों का ट्रिप लेकर जा रहे हों ? बाबा तो हर छोटी-बड़ी बात का ख्याल रख रहे थे। उन्होंने आपात काल के लिए एक फ़र्स्ट-एड टाइप का डिब्बा भी बना लिया था। जब मैंने कहा कि इसकी आवश्यकता नहीं थी तो उनका उत्तर था कि जब हम लेकर जा रहे थे तो ज़िम्मेदारी भी हमारी थी, सफर में किसी की तबियत बिगड़ गयी तो प्रबंध होना ही चाहिए। मैं अपने बाबा को जानता था। मुझे मालूम था कि हमारी कोई कोशिश काम न आएगी। वह अपने हिसाब से यात्रा की व्यवस्था को पुख्ता करते रहेंगे। धीरे धीरे सभी सम्बन्धी स्टेशन पर पहुँच गए और गाड़ी में अपना स्थान लेने लगे। सभी बहुत खुश थे और मुझ पर अपना स्नेह दिखा रहे थे। मेरे चाचा ने कहा कि बंगाली तो हमेशा से वीर रहे हैं और अभी तक हैं। उन्होंने हँसते हुए कहा, ' देखो, हमारे इस वीर पुरुष को, कैसे इसने पंजाबी सिख लड़की को फँसाया है और अपनी ज़िंदगी को एक तरह के खतरे में डाल दिया है..' उनकी इस बात पर सभी की ओर से एक जोर का ठहाका लगा था। माँ ने बात को हल्के में उड़ाने का प्रयास किया, ' हाँ, वीर तो है.. इसके नाना भी तो वीर थे, उन्होंने तो देश को एक समझा था..' हंसी -मज़ाक और पिकनिक जैसा माहौल था। ट्रैन समय से छूटी तो एक और बैठी मेरी छोटी दादी ने जोर थे प्रार्थना करते हुए दुर्गा..दुर्गा.. कहा और सभी ने उनका साथ दिया। इन्द्राणी बहुत आनंदित थी। उसने तो मुख में ऊँगली घुमाते हुए अशुद्धता को दूर करने वाली परंपरागत ध्वनि निकाली थी।
पूरा सफर आनंद से बीतता चला गया था। यहाँ-वहाँ की बातें होती रही थी। माँ सभी से कुशलता पूछती। ट्रैन में दिए गए भोजन को कुछ ने संतोषजनक कहा तो कुछ ने एकदम बेकार। सालों से बेचारी राजधानी ट्रैन के भोजन के साथ उसके अतिथियों का यही व्यवहार होता चला आ रहा है। कुछ के लिए अच्छा, कुछ के लिए एकदम बेकार। रात देर तक सभी बातचीत में लगे रहे थे और न जाने कब जाने सो गए थे। सुबह आराम से उठे। बाबा ने सबसे पहले जानने की कोशिश की कि क्या ट्रैन समय से तो चल रही थी ? उन्हें संतोष हुआ कि ट्रैन विलम्ब से तो थी परन्तु भारतीय समय के हिसाब से ठीक ही थी। हमारे देश में यदि ट्रैन मिनटों में देरी से चल रही हो तो उसे समय से माना जाता है। विलम्ब की श्रेणी में आने के लिए उसे घंटो की देरी करनी होती है।
नाश्ता आदि से निवृत हो सभी तैयार होकर बैठे थे। दिल्ली अब कुछ मिनटों की दूरी पर थी। मैं सबसे घुलने-मिलने का प्रयास तो कर रहा था परन्तु सत्य यह था कि मैं बेचैन था। मैं बार बार इन्द्राणी के पास जाकर बैठ जाता था। मेरी बेचैनी उसे दिख रही थी और वह मुझे देख मुस्कुरा देती थी। वह हमेशा की तरह आकर्षित दिख रही थी। माँ उसे प्रोत्साहित कर रही थी कि दिल्ली में उसे ही सबसे आगे रहना था और सब कुछ संभालना था। स्टेशन पर उतरने पर हमने देखा की पिंकी के मम्मी-पापा, मामा-मामी के साथ साथ कुछ और लोग भी आये हुए थे। एक स्वागत का बोर्ड था जिस पर बड़े आकर में अंग्रेजी में वेलकम लिखा था और उसके नीचे मेरा और मनप्रीत का नाम था। जो लोग साथ में आये थे, वे सहायक थे। उन्होंने हम सबका सामान संभाल लिया था। मैंने जोगेन्दर अंकल-आंटी के साथ साथ मामा-मामी के पाँव छुए। उन्होंने मुझे गले से लगाया और आशीर्वाद दिया। स्टेशन के बाहर गाड़ियाँ लाइन से लगी हुई थी। हर गाड़ी पर मनप्रीत-अभिजीत के विवाह की सूचना थी और जिस होटल में हमारे रहने की व्यवस्था थी, उसका नाम था। गाड़ियों का काफिला तेजी से कनॉट प्लेस से होता हुआ, एक नामी होटल में पहुँच गया था। होटल में बारातियों का तिलक और पुष्प गुच्छ से स्वागत किया गया था। भीतर लॉबी में बैठते ही शरबत सर्व किया गया और सब को अपने अपने कमरे की चाबी दे दी गयी थी। सभी कमरे एक ही फ्लोर पर साथ साथ थे। हम सभी व्यवस्था से अभिभूत थे। मामा जी ने मेरे बाबा को एक कागज़ देते हुए बताया कि ये पाँच गाड़ियों के नंबर थे जो तीन दिनों तक हमारे पास ही रहने वाली थीं। जोगेन्दर अंकल ने माँ से कहा, ' बहन जी, अभी आराम करो जी, सारा प्रबंध यही होटल में है.. लंच, डिनर सब.. कहीं घूमने-फिरने का मन हो तो गाड़ियाँ बाहर लगी हुई हैं..' वे हाथ जोड़कर खड़े थे। उन्होंने कहा कि वे तो लड़की वाले थे जो भी आवश्यकता हो, हुक्म करें। मुझे ये हम तो लड़की वाले हैं, बात सुन अच्छा न लगा था। ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर )
Wednesday, October 21, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -42
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )
( ४२ ) हर दिन पिंकी से बात होती थी, हर दिन बाकि बचे दिन गिने जाते थे। इस बीच रोबी दा थे, जो हर दिन कुछ नया बता जाते थे और मुझे कुछ कागज़ात पढ़ने को दे जाते थे। वह मुझे तीन-चार बैठकों में भी ले गए थे। एक बैठक तो संगठन के नाम पर राजनैतिक दल की बैठक थी। मेरे नाना के दो-तीन परिचित वहां मिले थे। उन्होंने मेरे प्रति स्नेह दिखाया था। उन्होंने भी कहीं न कहीं वही बातें कही थी जो रोबी दा कहते रहते थे कि मेरे जैसे युवकों को आगे आना चाहिए और संगठन को सुदृढ़ करना चाहिए। मुझे अच्छा लगता कि नाना का सम्मान किया जाता था हालाँकि कहीं न कहीं मुझे ऐसा भी लगता था कि यह आदर का भाव मात्र औपचारिकता थी क्योंकि नाना को गए अभी अधिक समय न हुआ था और वक्त के साथ सब धूमिल होता चला जायेगा। मैंने जब पिंकी से इन बैठकों में अपने उपस्थित होने का जिक्र किया तो वह तुरंत तो कुछ न बोली पर बाद में उसने एक बात कही थी कि सब काम सोच-समझ के साथ करना ही उचित होता है।
इन दिनों इन्द्राणी भी फोन करती रहती थी और घर भी आती रहती थी। उसने बताया कि कैसे वह मेरी शादी की तैयारी में जुटी हुई थी। उसने शादी वाले दिन के लिए विशेष साड़ी खरीद ली थी परन्तु उस शाम को होने वाली पार्टी के लिए पसंद की साड़ी नहीं मिल रही थी। एक दिन उसने मेरे साथ हिंदी पिक्चर देखने की योजना बनायी। उसने बताया कि इस फिल्म का रिव्यू टेलीग्राफ में पढ़ा था। वह प्रभावित थी। मैंने हां कर दी और कहा कि मैं ऑफिस से पहुँच जाऊंगा। उसने कहा कि उस शाम का खर्चा उसी के नाम था। मैं उसकी इस बात पर मुस्कुरा दिया था। मैं जानता था कि इस तरह के ख़र्चों में वह मितव्ययी न थी और पहले भी कई बार मेरे लिए खर्च कर चुकी थी। वास्तव में मुझे अपराध बोध सा होता था कि मुझे अपनी पॉकेट हल्की करनी चाहिए थी परन्तु वह हर बार मुझे रोक देती थी और न जाने क्यों मैं रुक भी जाता था। इधर माँ और बाबा भी शादी की तैयारियों में जुटे हुए थे। बाबा ने राजधानी ट्रैन से जाने-आने की सीट्स बुक कर दी थीं। वह सुबह-शाम माँ को याद दिला जाते थे कि जो-जो साथ जा रहे थे उन्हें टिकट का पैसा दे देना चाहिए था और जो नहीं जा पा रहे थे उन्हें समय से बता देना चाहिए ताकि टिकट रद्द करवा सकें और कोई नुकसान न हो। उनकी इन बातों से माँ चिढ़ जाती थी और कहती, ' सबसे पैसे नहीं लिए जा सकते.. हम लोग साथ ले जा रहे हैं तो हमें ही खर्चा वहन करना होगा..' बाबा बुड़बुड़ाते हुए, दूसरी ओर निकल जाते थे। मुझे भी लगता कि इस तरह से पैसे लेना उचित नहीं था परन्तु मैंने माँ को कहा कि कोई रिश्तेदार यदि खुद से दे तो ले लेना चाहिए। मैंने यह भी कहा कि यदि इन्द्राणी दें, तो भी मत लेना। माँ ने मेरी बात में सहमति दिखाई और कहा कि वह तो अपने ही घर की सदस्य जैसी थी।
एक दिन बाद इन्द्राणी दी का फोन आया कि फिल्म की टिकट ले ली गयी थी और उसी शाम का शो था। मैंने कहा कि ठीक था मैं पहुँच जाऊँगा, सीधे ऑफिस से। मैंने घर में फोन कर माँ को बताया और फिर पिंकी को भी। अभी फोन रखा ही था कि रोबी दा की तरफ से सूचना आयी कि आज ऑफीस के बाद एक बैठक रखी गयी थी। मैंने उन्हें अपना कार्यक्रम बताया तो उन्होंने कहा कि अच्छा ठीक है, साथ ही यह भी कहा कि अब मुझे संगठन के प्रीति अपनी ज़िम्मेदारी को गंभीरता से लेना चाहिए और सिनेमा आदि से ऊपर उठना चाहिए। वह हल्के से ना खुश दिखे थे। मैंने उन्हें संतुष्ट करने के लिए कह दिया कि यदि पहले से बैठक की खबर मिल गयी होती तो मैं इन्द्राणी को मना कर देता। इस पर उन्होंने प्रतिक्रिया दी कि संगठन के कार्य ऐसे ही होते हैं। वे किसी पिक्चर रिलीज़ की तरह नहीं होते कि पहले से मालूम हो कि अमुक शुक्रवार को रिलीज़ होना है। मैं उनकी बात पर क्षुब्ध तो अवश्य हुआ परन्तु मुझे लगा कि वे भी तो अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा संगठन के कार्यों पर खपा रहे थे।
शाम को सिनेमा हॉल पैदल ही चलकर पहुँच गया था। मेरे ऑफिस से अधिक दूर न था। मैं इन्द्राणी की प्रतीक्षा करने लगा था। उसको न आता देख, सामने पान की दुकान से एक सिगरेट खरीदी और सुलगाई। मैं सामने की ओर देख रहा था कि पीछे से इन्द्राणी ने आकर, चौंका दिया था। मैंने सिगरेट छुपाने की कोशिश की तो वह हंसने लगी, ' अरे, शरमाओ मत.. जवान हो.. अच्छा खासा जॉब करते हो..सिगरेट तो बनती है..वैसे भी सिगरेट के साथ लड़कों की पर्सनल्टी बढ़ जाती है ..' मैंने कहा, ' ऐसी बात नहीं है दीदी.. आप बड़ी हैं, इसीलिए ..' उन्होंने इतराते हुए अंदाज़ में कहा, ' ये बड़ा-छोटा छोड़ो.. हम उम्र हैं.. और हाँ, मैंने पहले भी कहा था ये मुझे दीदी-दीदी कहना बंद करो और अब अंदर चलो.. फिल्म शुरू हो चुकी होगी..' वह आगे बढ़ गयी थी। अब अचानक मैंने ख्याल किया कि वह बहुत आकर्षित लग रही थीं। भीड़ में लोगों की निगाहें उन पर थी। वह साँवली सी, अच्छी कदकाठी और सुन्दर नाक-नक्शे वाली लड़की थी। पिक्चर हॉल में मैंने उन्हें यह बात बताई तो वह खुश हो गयी थी, ' अच्छा है यदि मैं लोगों को आकर्षित करती हूँ..यह तो एक तरह का कॉम्पलिमेंट है, किसी भी लड़की के लिए..' पूरी फिल्म में वह बहुत आनंद लेती हुई लगी। फिल्म की कहानी नायक के इर्दगिर्द घूमती है जिसे दो बहनें प्यार करती हैं परन्तु वह अपने पारिवारिक पृष्ठभूमि और उसके पिता की हत्या के मानसिक तनाव के कारण बदले की भावना से ग्रस्त होते हुए, उन लड़कयों में से एक की हत्या कर देता है। वह अपने इस कार्य को उचित मानता है क्योंकि लड़की के पिता ने वर्षो पूर्व उसके परिवार के साथ अन्याय किया था और उसके पिता की हत्या कर, उनका सब कुछ हड़प लिया था। इन्द्राणी को फिल्म अच्छी लगी थी। उसे फिल्म के नायक की भूमिका प्रभावशाली लगी थी। साथ ही वह दोनों नायिकाओं की भी प्रशंसा कर रही थी जो इस फिल्म से पहली बार हिंदी फिल्म जगत में प्रवेश कर रही थीं। वो कह रही थी कि उन्हें बहुत आनंद आया था । फिल्म समाप्त होने पर बाहर आये तो इन्द्राणी ने खुद को स्थिर करने का प्रयास किया। एक अद्भुत सी चमक उसके मुख पर बिखरी जा रही थी जो उनके मन में उठ रही चंचलता को साफ प्रदर्शित कर जाती थी। रात का खाना पार्क स्ट्रीट के एक मशहूर चाइनीस रेस्टोरेंट में किया था। वह बहुत खुश थी। उसने चुटकी लेते हुए कहा,' आज तो सच में मज़ा आ गया..पिक्चर भी अच्छी थी, डिनर भी अच्छा रहा और सबसे बड़ी बात, साथी भी अच्छा था.. कॉलेज के दिन याद आ गए '
टैक्सी ने पहले उसे घर उतारा था और बाद में मैं अपने घर पहुंचा था। उस ने उतरने से पहले कहा कि अब तो मेरी शादी हो जाएगी और मैं अपनी पत्नी के साथ व्यस्त हो जाऊँगा इसलिए हमें ये जो कुछ दिन हैं, साथ साथ बिताने चाहियें। जैसे ही मैंने मुस्कुराते हुए हाँ कहा तो उसने अगले रविवार के लिए एक नया कार्यक्रम बना दिया, ' अगले सप्ताह इसी नायक की एक नयी फिल्म आ रही है..ये एक बड़े बैनर की फिल्म है और लगता है कि इसमें नए अंदाज़ की कहानी है.. मैं टिकट बुक करा देती हूँ.. ' इन्द्राणी एक साँस में कह गयी और ओके कह, हाथ हिलाते हुए घर में घुस गयी। ( आज यहीं तक, अगले गुरुवार आगे, यहीं पर )
Wednesday, October 14, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-41
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II- चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )( ४१ ) मैंने सोचा अब ये किस झमेले में मुझे फंसा रहे हैं, रोबी दा ? मैं तो एक ही जगह फंसना चाहता था और वह था विवाह। मैं सब कुछ भूल अपने ऑफिस के कार्य से जूझना चाहता था परन्तु मेरा मन स्थिर न हो पा रहा था। टेलीफ़ोन की ओर दृष्टि जाती, हाथ बढ़ता और रुक जाता था। ऐसा कुछ समय तक होता रहा था। अंततः मैंने चंडीगढ़ का नंबर घूमा ही दिया था। पिंकी भी अपने ऑफिस में मेरी ही तरह बे चैन सी थी। हालाँकि उसने कहा कि वह सामान्य थी। मैंने उससे पूछा कि शादी के बाद कहाँ जायेंगे ? वह हंसने लगी, ' अरे ! तुम्हें तो हनीमून कहने में भी शर्म आ रही है ? मैंने कहा कि हाँ वही। वह हँसे जा रही थी। उसने कहा,' कहीं न कहीं चले जायेंगे, क्या फर्क पड़ता है, वैसे मामा जी कहीं विदेश जाने की बात कर रहे थे, कुआलालंपुर या बैंकॉक..' मैं चौंका, ' अरे नहीं,यहीं कहीं भारत में ही जायेंगे, बहुत अच्छी-अच्छी जगह हैं.. दार्जिलिंग ? वह जोर से हंसी, 'अपने बंगाल से बाहर नहीं निकलोगे क्या ? दार्जिलिंग तो कभी भी जा सकते हैं.. गोवा कैसा रहेगा ? मैंने कहा कि गोवा ठीक था। हम दोनों इसी तरह की बातें करते जा रहे थे। पिंकी ने कहा कि ऑफिस का फोन था इसलिए हमें गपशप के लिए इस पर चिपके नहीं रहना चाहिए था। मैंने कहा, ' छोड़ो इस बात को, फोन मिला है तो लाभ उठाना चाहिए.. वैसे भी हमें सैलरी हमारे काम के हिसाब से कहाँ मिलती है.. ' फोन कॉल समाप्त करने से पहले मैंने उससे वायदा लिया कि प्रतिदिन एक बार मुझे फोन अवश्य किया करेगी। मैं काम में जुट गया। मैं खुश था और अनायास एक प्रसिद्द फ़िल्मी गाने को गुनगुनाए जा रहा था। कहा जाता है कि यदि गृहिणी रसोई में और अधिकारी अपने कार्यालय में गाना गाते हुए काम करते दिखें तो समझ लेना चाहिए कि वे संतुष्ट हैं।
मैं काम में लगा रहा। संध्या होते और ऑफिस के बंद होने से पहले रोबी दा का सन्देश आया कि आज मुझे उनके साथ कहीं जाना होगा। उन्होंने कहा कि मुझे अपनी माँ को सूचित कर देना चाहिए कि आज घर लौटने में कुछ विलम्ब हो सकता था। मैंने माथा पकड़ लिया किंतु बाद में सोचा कि रोबी दा भी तो संगठन के लिए अपना इतना समय देते थे तो हमें भी उनका साथ देना चाहिए। मैंने माँ को फोन कर बता दिया था। माँ कुछ नाराज़ हुई परन्तु मान गयी कि रोबी कुछ कहे तो मानना ही होगा, वह भी तो मेरे नाना की हर बात मानते रहे थे। शाम को रोबी दा के साथ संगठन की एक बैठक में जाना पड़ा। यह नगर के संगठनों की समन्वय समिति की बैठक थी। करीब बीस लोग होंगे। मैं चुपचाप एक ओर बैठा था। अधिकांश बुजुर्ग लोग थे और बातचीत कुछ ही लोगों के मध्य ही हो रही थी। मुझे जो समझ आया वो ये था कि केंद्र की सरकार कुछ ऐसी नीतियों पर कार्य कर रही थी जहाँ समस्त व्यवस्था नष्ट हो जाने वाली थी और इसका विरोध किया जाना आवश्यक हो चुका था। मैंने देखा कि रोबी दा की बात को महत्व दिया जा रहा था। रोबी दा ने युवा शक्ति को प्रोत्साहित किये जाने की बात की और फिर मेरी ओर इशारा कर मेरा परिचय दिया था। मुझे अचानक खड़ा हो जाना पड़ा और मुस्कुराते हुए, सभी को नमस्कार करना पड़ा था। यह बैठक लगभग दो घंटे तक चली थी। इस बीच प्लास्टिक के कप में चाय और बिस्कुट बांटे गए थे। थकावट के कारण ये चाय-बिस्कुट एक तरह का आराम दे गए थे। बाहर आने पर रोबी दा ने बताया कि वरिष्ठ लोगों पर मेरा प्रथम परिचय प्रभावशाली रहा था। मैं क्या समझता ? बस उनकी बात पर मुस्कुरा दिया था। ये वो दिन थे जब वामपंथी विचार धारा की लहर अपने उफान पर थी। पश्चिम बंगाल में तो विशेष रूप से इसका प्रभाव था। इस विचार धारा के राजनैतिक दल संयुक्त हो एक मोर्चा बना, राज्य की बागडोर संभाले हुए थे। शिक्षण संस्थानों, कर्मचारी और व्यापारिक संगठनों में इन्हीं का वर्चस्व था। बसों, ट्रकों और अन्य वाहनों, यहाँ तक कि रिक्शाओं पर भी लाल झंडे लहराते दिखते थे। मौसम की मार झेलते-झेलते अधिकांश झंडे चीथड़ों में बदल जाते थे। उन्हें केवल किसी बड़े आयोजन के अवसर पर ही बदला जाता था। इस राजनैतिक परिवर्तन से मैं भी, बहुत से बंगाली युवाओं की तरह प्रभावित था और मुझे लगता था कि राज्य में एक नया युग आने को था और सब कुछ बदल जाने वाला था। कॉलेज में, मैं वामपंथी विद्यार्थी संघ का सदस्य रह चुका था। आज की इस बैठक में मैंने महसूस किया था कि रोबी दा सही कह रहे थे कि परिवर्तन की इस लहर को सशक्त करने हेतु युवा लोगों को आगे आना चाहिए।
घर पहुँचते पहुँचते काफी विलम्ब हो गया था। माँ-बाबा दोनों प्रतीक्षा में थे। मुझे देखते ही वे दोनों बोल उठे, ' चलो हाथ धो लो और खाना खा लो.. हम लोग भी इंतज़ार में भूखे बैठे हैं..' मैं उनके साथ बैठ गया था। भूख तो मुझे भी लगी ही थी। बैठते ही मैंने पूछा, ' किसी का फोन तो नहीं आया था ? माँ मुस्कुरा दी और कहा कि किसी का फोन नहीं आया था। खाना खाते हुए कुछ अधिक बात नहीं हुई थी। बाबा ने हलके से सलाह देते हुए कहा, ' संगठन आदि के साथ जुड़ना ठीक है परन्तु अपना लक्ष्य सामने रख, आगे बढ़ना चाहिए..कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जिन पर चलने से, वापिस लौटना असंभव सा हो जाता है..' मैं चुपचाप खाता रहा। मुझे पता था कि माँ-बाबा खाना खा, लगभग दो घंटे तक नीचे ही रहते थे। यही समय था जब मैं ऊपर उनके कमरे में जा पिंकी को फोन कर सकता था। मैं ऊपर चला आया और चंडीगढ़ का नंबर घुमाया। आंटी ने फ़ोन उठाया और बेटा-बेटा कह बात करने लगी। वह मेरी माँ के बारे में बार-बार पूछ रही थी। कुछ समय बाद पिंकी ने फोन संभाला। उसने कहा कि वह शाम से ही प्रतीक्षा में थी। मैंने उसे दिन भर का वृतांत बताया। वह चुपचाप सुनती रही और अंत में कहा कि मुझे इन सब राजनैतिक और यूनियनबाजी की बातों से अलग रहना चाहिए था। फिर इधर-उधर की बातें हुई। हम दोनों ही आने वाले दिनों के प्रति उत्सुक थे और न जाने क्या-क्या सपने बुन रहे थे।
अगले दिन फिर बात होगी कह, फोन रखा ही था कि वह फिर बज उठा। यह इन्द्राणी का फोन था। उन्होंने बात कुछ इस तरह से आरम्भ की, ' ये क्या अभी तो सिर्फ मिनी सगाई ही हुई है और हमें भूल भी गए ? मैंने कहा, यह मिनी सगाई क्या होती है ? ' अरे वही तुम्हारा पंजाबी रोका न ठाका ..' वह हंसने लगी। उन्होंने फिर से पिंकी की फोटो, उसकी सुंदरता और आकर्षित कर देने वाली भाव-भंगिमा की बात की थी और कहा कि वह जल्दी-से जल्दी पिंकी से मिलना चाहती थी। उन्होंने कुछ दिन गिने और कहा कि अब भी बत्तीस दिन बचे थे। अचानक मुझे भी लगा कि इतने दिन कैसे कटेंगे ?( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर .. )
Wednesday, October 7, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 39 & 40
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II- चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )( ३९ - ४० ) रात के खाने पर फिर से वही बातें शुरू हो गयी थीं। मुख्य बात यह थी कि कलकत्ता से कौन-कौन दिल्ली जायेगा ? अब जो नाम आये वे सब मिलाकर पंद्रह हो रहे थे। इन्द्राणी अपनी एक सहेली को भी साथ ले जाना चाहती थी। बाबा ने तो साथ ही साथ हाँ कर दी थी परन्तु माँ ने बात को बनाते हुए, ' बाद में देखेंगे ' कहकर लगभग इसे निरस्त ही कर दिया था। एक बात यह भी आड़े आ रही थी कि अमीर लोगों से सम्बन्ध बन रहा था, इसी हिसाब से, वर पक्ष वाले लोगों को तय किया जाना चाहिए था। ये बात बाबा के एक पुराने मित्र को साथ ले जाने के साथ उठी थी। मैं उनको जानता था और काका कहकर बुलाता था। वह बाबा के स्कूल के दिनों के साथी थे। बाबा को वह और उनका परिवार बहुत प्रिय था। वह विद्वान किंतु अपने में ही सिमटे रहने वाली प्रकृति के व्यक्ति थे। उनका बाहरी व्यक्तित्व, आजकल के प्रचलन के हिसाब से प्रभावित करने वाला न था। माँ उन्हें अधिक पसंद नहीं करती थी। मैं भी प्रारम्भ में माँ की ही तरह सोचा करता था परन्तु जब से मैंने उनसे बातचीत करना शुरू किया था, मैं उनसे धीरे-धीरे प्रभावित होता चला गया था। बांग्ला साहित्य पर उनकी बहुत अच्छी पकड़ थी। वह कविता भी लिखा करते थे। यदाकदा उनकी कविता प्रकाशित भी होती थी। उनका लेखन प्रभावशाली था परन्तु उनका नाम न हो पाया था। उनका नाम हो जाता तो शायद उनके प्रति माँ का नज़रिया भी बदल जाता। मैंने बाबा का साथ देते हुए कहा, ' बाबा चाहते हैं तो उन्हें ले ही जाना चाहिए..' माँ ने कुछ न कहा था, बस मेरी बात को अनसुनी कर कमरे से निकल गयी थी। किसी बात को अस्वीकार करने का यह माँ का अपना तरीका था। मेरे बाबा भी चुपचाप अपनी डेस्क पर रखी पुस्तक के पन्ने पलटने लग गए थे। अपनी नाराज़गी और निराशा दर्शाने का यह उनका भी यही तरीका था। इंद्राणी ने एक सुझाव रखा कि सभी संभावित नामों का रेल रिजर्वेशन करवा लेना चाहिए और बाद में आवश्यकता अनुसार रद्द करना सरल होगा। इस प्रकार बीस लोगों के नाम लिस्ट में रखे गए थे।
अगली सुबह ऑफिस जाने का मन न हुआ था। मैंने माँ को कहा कि मेरा लंच पैक न करें। माँ हैरान हो गयी थी। वह हमेशा मुझे घर का खाना ही खाने की सलाह दिया करती थी। वह कहने लगी कि घर से ही ले जाओ। मैंने जब बताया कि आज छुट्टी ले रहा था तो वह मुस्कुराने लगी। माँ जब नीचे उत्तरी तो मैंने तुरंत उनके कमरे में जाकर फोन घुमाया। अभी सुबह के साढ़े सात ही बजे थे परन्तु मैं उतावला हो रहा था क्यों कि रात को दोबारा फोन न कर पाया था। साथ ही मुझे पता था कि दोनों बहनें इस समय तक जॉगिंग करके घर आ चुकी होंगी। पिंकी ने ही फोन उठाया। वह नाराज़गी दिखाने लगी कि वह रात को फोन का इंतज़ार करती रही थी। मैंने उसे रात की सारी घटना बताई। उसने कहा,' मम्मी को तुम्हारे घर पर बहुत अच्छा लगा, तुम्हारी मम्मी भी बहुत स्वीट लगी.. और पापा तो लगता है वहां पर लंच खाकर मस्त हो गए.. ऐसा क्या खिलाया था ? मैंने कहा, ' यहाँ का एक मशहूर होटल है जिसे पंजाबी ढाबा कहते हैं, वहीं से खाना आया था..' उसने तुरंत कहा कि उसे भी वहां का खाना खिलाना पड़ेगा। मैंने कहा, ' जरूर.. तुम आओ.. और क्या कहा मम्मी-पापा ने ? उसने कहा, ' कुछ खास नहीं, यही कि सब ठीक था और तुम बहुत शरमा रहे थे..' इस बात पर मैंने कुछ उत्तर नहीं दिया।
मैंने ऑफिस से छुट्टी ले ली थी तो घर पर मानों सभी छुट्टी पर थे। बिशाखा आराम से थी, माँ अपनी आरती-पूजा धीरे-धीरे कर रही थी। मैंने मन में सोचा, ' देखो, मेरे छुट्टी लेने से ईश्वर को भी आराम मिल गया है, उनका भोग आदि भी ठीक से लगाया जा रहा है..' अपने बिस्तर पर सुस्ताया सा मैं, कल्पना जगत में भ्रमण कर रहा था और अपने आसपास पिंकी की चहल कदमी महसूस कर रहा था। कल शाम से ही मुझे ऐसा लग रहा था कि वह हमारे घर आ चुकी थी। सोचा कुछ समय बाद उसके ऑफिस में फोन करूँगा और उसे अपने मन की स्थिति बताऊंगा। दो घंटे यूँ ही कट गए। बाहर कुछ समय के लिए आस-पड़ोस का चक्कर लगा आया था। एक सिगरेट भी फूंकी थी। घर आ सीधे पिंकी के ऑफिस का नंबर घुमाया। पता चला वह आज ऑफिस आई ही न थी। अब घर का नंबर घुमाया। पिंकी ही थी दूसरी ओर। इससे पहले कि मैं कुछ कहता, वह ही बोली,' आज ऑफिस क्यों नहीं गए ? मैंने कहा, ' तुम्हें कैसे पता चला ? ' अरे, अभी-अभी तुम्हारे ऑफिस के नंबर पर कॉल किया था ..' उसने कहा। मैं हंसने लगा। उसने हंसने की वजह पूछी। मैंने बताया कि मैंने भी उसके ऑफिस के नंबर पर फोन किया था। अब वह भी हंसने लगी। दोनों ओर एक सा ही हाल था। दोनों काफी देर तक बतियाते रहे थे। माँ ने आकर लंच के लिए बुलाया। फोन पर मुझे देखा तो कहा, ' इतना भी ज्यादा फोन नहीं किया करते.. इतनी आतुरता दिखाओगे तो बाद में संभाल न पाओगे..' मैं माँ की बात में छिपे संकेत को समझने का प्रयास करने लगा।
लंच हो जाने के बाद, मैं घर के भीतर ही इधर से उधर होता रहा था। कभी सोफे पर, कभी बिस्तर पर, कभी बालकनी पर, कभी रसोई घर में। एक असंतुलित सी स्थिति हो रही थी। मैं अपने घर में तो अवश्य था परन्तु मेरा मन एक अस्थाई से बंजारापन से गुजर रहा था। मैं समझ न पा रहा था कि मैं प्रसन्न था या अधीर हो रहा था ? मैंने देखा कि माँ नीचे के कमरे में ही विश्राम कर रही थी। उसकी आँखे नींद से बोझिल हुई जा रही थी। मुझे मालूम था, वह अब नींद से लगभग एक घंटे बाद ही उठेगी और बिशाखा को चाय हेतु आवाज़ लगाएगी। मैं ऊपर गया और फोन उठाया। फिर न जाने क्या सोच रख दिया। माँ के बिस्तर पर, यूँ ही लेटा रहा। एक बार पुनः फोन की ओर हाथ बढ़ा और रुक गया। शायद माँ की कही बात का दबाव बन रहा था। अचानक फोन की घंटी बजी। मैं फोन के लिए लपका, लगा जिसे मैं फोन करना चाहता था, उस ही का फोन होगा। मैंने हेलो कहा तो उधर से रोबी दा की आवाज़ सुनाई दी। मैंने खिन्न होते हुए कहा, ' हाँ, रोबी दा.. आज मन नहीं हुआ ऑफिस आने का..' उन्होंने चिंता का भाव दिखाया कि मेरे न आने से वह चिंतित हो गए थे। उन्होंने कहा, ' घर में सब ठीक है न ? इससे पहले कि मैं उन्हें कुछ बताता उन्होंने मुझे आश्वस्त करना आरम्भ कर दिया कि वह मेरी माँ का समझायेंगे और मेरी समस्या को सुलझा देंगे। मैं कहता रह गया कि सब ठीक था। उन्होंने यह कह कर फोन रख दिया कि वह आज शाम को मेरे घर आएंगे। मैंने सोचा, ' लो अब ये घर आकर न जाने क्या-क्या बात करें..'
शाम को वह समय से आ ही गए। माँ से बात करते हुए उन्होंने इस तथ्य पर जोर दिया कि बच्चों को अपने माता-पिता की सलाह को अवश्य मानना चाहिए। उनका कहना था कि माता-पिता बच्चों का भला ही चाहते हैं। माँ, उनकी हाँ में हाँ मिलाती रही परन्तु कहा कि आजकल के बच्चे खुद में बहुत समझदार हैं और उनकी बात को ना कारा नहीं जा सकता। फिर उन्होंने बताया कि उन्होंने मेरी पसंद की पंजाबी लड़की को अपनी बहु बनाने की स्वीकृति दे दी थी। इस पर रोबी दा मेरी ओर देखते हुए कहा, ' इनकी ख़ुशी ही हमारी ख़ुशी है..' रोबी दा मामले के ऐसे सरल से अंत के लिए तैयार न थे। वह संभवत: एक प्रभावशाली मध्यस्थ की भूमिका के लिए तैयार होकर आये थे। उन्हें आशा थी कि वह, मेरे और माँ के बीच होने वाले कुछ गरम तर्क-वितर्क में एक निर्णायक की भूमिका निभाएंगे। उनके चेहरे पर निराशा के भाव थे। उन्हें कर्मचारी यूनियन के नेता होने के कारण समस्या का सरलता से समाप्त होना या किया जाना, आघात सा दे गया। वह जाने को उठे और मेरी ओर कुछ ऐसे अंदाज़ में देखा मानों कह रहे हों, ' मुझे अनभिज्ञ रख, तुमने ठीक नहीं किया..'
रोबी दा माँ को प्रणाम कर घर से निकल गए। एक तरह की हताशा उनके चेहरे पर दिखाई दे रही थी। मैं उन्हें नीचे तक छोड़ने आया था। उन्होंने कुछ अधिक बात नहीं की थी। हँसते हुए मुझसे पूछा, ' कल तो ऑफिस आ रहे हो न ? मैंने हाँ कहा तो उन्होंने कहा, 'ठीक है, कल मिलना..' उनकी कार निकल गयी। मैं सोचने लगा कि अब इनकी बे वजह की नाराज़गी को दूर करना होगा। मैं कर ही क्या सकता था। सब कुछ ऐसी सरलता से होता चला जायेगा, यह तो मैंने कभी सोचा ही न था। घर में शायद विरोध हो, इसलिए रोबी दा और इन्द्राणी को बताकर रख दिया था। मुझे ऐसा लगा था कि आवश्यकता होने पर ये दोनों मेरी तरफदारी करेंगे और मेरी माँ को राजी करवा लेंगे।
रात को एक बार फिर से चंडीगढ़ में फोन किया। इस बार लवली ने उठाया और वह खिलखिलाते हुए मज़ाक करने लगी। वह जीजाजी - जीजाजी कर रही थी। उसने मज़ाक में कहा कि वह तो सोचती ही रह गयी और बिग सिस्टर हाथ मार गयी। लवली एक साली की तरह पेश आ रही थी। उसने फोन छोड़ने से मना कर दिया था। मैं बार-बार कहता रहा, ' पिंकी को फोन दो..' और वह हँसते हुए इधर-उधर की बातें किये जा रही थी। अंत में मैंने कहा, ' मैं फोन रख रहा हूँ..' अब उसने पिंकी को बुलाया और उसे फोन दिया। मैंने उसे दिन भर की बातें बताई। रोबी दा के बारे में सुन वह हंसने लगी। उसने कहा कि ऐसे लोग सब जगह होते हैं। उसने यह भी कहा कि वह उन्हें रोबी दा नहीं कहेगी और मिस्टर रवि कहेगी। रोबी शब्द उसे धोबी जैसा लग रहा था। मैंने कहा कि यदि उसे हर रोबी शब्द में धोबी शब्द दिखेगा तो यह अच्छी बात न होगी। बातों बातों में मैंने उसे कहा कि मैं एक सीधा-सादा विवाह चाहता था, आडम्बर भरा नहीं। उसने कहा कि चाहती तो वह भी थी कि दिखावों से दूर रहा जाये परन्तु उसके मामा ने बहुत से सपने सजा रखे थे। उनके लिए यह उनकी अपनी ही बेटी का विवाह था। इसीलिए इसे चंडीगढ़ की जगह दिल्ली में आयोजित किया जा रहा था जहाँ सब कुछ उनकी इच्छानुसार ही होने वाला था। उसने ये भी बताया कि दिन में गुरूद्वारे में विवाह की रस्म के बाद, शाम को एक पांच सितारा होटल में पार्टी का कार्यक्रम निश्चित किया गया था। मैं ना-ना कहता रहा परन्तु मेरे भीतर कहीं उत्साह भी था। मैंने उसे बताया कि शादी के बाद कलकत्ता आने पर, हमारी ओर से भी एक प्रीतिभोज का कार्यक्रम रखा जायेगा। उसने पूछा, ' रिसेप्शन ? मैंने कहा, ' हाँ वही समझो.. हम बंगाली उसे बहुभात कहते हैं..यह लड़के वालों का आयोजन होता है.. यह कार्यक्रम भी अच्छे स्तर पर किया जायेगा..' मैंने उसे बताया कि इस आयोजन में उसे एक परंपरागत बंगाली दुल्हन के रूप में उपस्थित होना होगा और मेरी माँ ने अपनी पुत्रवधू के लिए, इस अवसर हेतु, एक खास साड़ी बहुत पहले से खरीद ली थी। पिंकी की ओर से भी ख़रीददारी शुरू हो चुकी थी। वह मेरे लिए एक सूट खरीदने वाली थी। मैंने फिर एक बार न-न कहा परन्तु उसके उत्साह से मैं प्रसन्न तो हो ही रहा था। मैंने भी अपनी ओर से कहा कि मैं भी उसके लिए एक पंजाबी स्टाइल का सूट खरीदने वाला था। वैसे ये विचार मेरे मन में ताज़ा ताज़ा ही आया था परन्तु बात को रंग देने के लिए मैंने एक कहानी बना दी और कहा कि चंडीगढ़ में किसी को पहने देखा था। तुम्हें देखा तो लगा था कि तुम पर बहुत फबेगा। वो हंसने लगी। उसने कहा कि गहरे रंग का न खरीदना क्यों कि उसे गहरे रंग पसंद नहीं थे। यूँ ही बातें होती रही।
अगले दिन ऑफिस में पहुँचते ही मुझे रोबी दा का स्मरण हो आया था। मुझे मालूम था कि कुछ ही समय में वह मुझे बुला भेजेंगे या खुद ही चले आएंगे। वही हुआ, वह मुस्कुराते हुए चले आये थे। उन्होंने हँसते हुए कहा, ' और सुनाओ.. हमारे पंजाबी सरदार जी के जमाई बाबू..' मैं खड़ा हो गया था। कुर्सी खींच वह बैठे और उन्होंने ख़ुशी दिखाई कि मेरे माता-पिता ने इस इंटर कास्ट विवाह में रूकावट नहीं की थी। उन्होंने कहा कि ऐसा ही होना ही चाहिए था। फिर उन्होंने आश्वस्त होते हुए कहा कि ये वैवाहिक रिश्ता पूरी तरह से सफल रहेगा क्यों कि हमारे परिवार के गैर-बंगालियों से अच्छे सम्बन्ध रहे थे। माँ ने घर में आयी मिठाई में से एक डिब्बा मुझे ऑफिस के मित्रों के लिए दिया था। उसे खोल रोबी दा के सामने किया। उन्होंने कहा कि ये सब क्या था ? मैंने उन्हें सारा वृतांत बताया। वह चौंक गए, ' अच्छा तो सगाई कर गए हैं वे पंजाबी लोग ? मैंने उन्हें बताया कि सगाई जैसी कोई बात न थी। ये उनका सम्बन्ध बनाने का तरीका था। वह बहुत विचित्र सी स्थिति में थे। हैरान थे परन्तु स्वाभाविक दिखना चाहते थे। उनके मुख पर स्पष्ट दिख रहा था कि कह रहे हों, ' इतना सब कुछ हो गया और मुझे पता ही न चला..' अपने को स्थिर करते हुए उन्होंने कहा, ' तुमने एक खुश खबर दी है तो एक खुश खबर मेरी ओर से तुम्हें भी है.. हमारे संगठन की ओर से राज्य स्तर पर गठित परिषद में मैंने तुम्हारा नाम रखा है..ये बहुत दायित्व पूर्ण कार्य है और मैं चाहता हूँ कि कोई युवा इसमें मेरे साथ रहे.. और धीरे-धीरे पूरी ज़िम्मेदारी संभाल ले..तुम पढ़े-लिखे हो और बहुत अच्छी पारिवारिक पृष्ठभूमि से हो.. देखना तुम बहुत आगे जाओगे..' मैं असमंजस में था। मैंने कहा कि मुझे क्षमा किया जाये। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता था। युवा शक्ति को संगठन हेतु आगे आना ही होगा। मैंने कहा कि मैं मानसिक रूप से भी इस तरह के कार्य के लिए तैयार नहीं था। परन्तु वह तो जैसे पक्के होकर आये थे। उन्होंने कहा, ' अरे, तुम चिंता मत करो, अपनी शादी-वादी की तैयारी करो.. अभी तो मैं हूँ.. सब कुछ मैं ही करूँगा.. तुम केवल साथ रहना और कार्य-पद्धति को देखना.. ' उन्होंने अपनी फाइल से टाइप किया हुआ एक कागज निकाल, मुझसे हस्ताक्षर कर देने को कहा। मैंने पूछा कि यह क्या था। वे मुस्कुराने लगे, ' ये तुम्हारी ओर से एक छोटा सा सर्टिफ़िकेट है कि तुम इस कार्य के लिए राजी हो.. एक औपचारिकता है..' क्या लिखा था, मैं पढ़ भी न पाया था और उन्होंने मेरे हस्ताक्षर ले लिए थे। उन्होंने कुर्सी से उठते हुए व्यंग्यात्मक भाव में कहा, ' अच्छा चलता हूँ, मुझे बहुत काम हैं.. तुमने चुपचाप सगाई तो कर ली है, अब बिना बताये शादी मत कर लेना..' ( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को, यहीं पर )
Wednesday, September 30, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -38
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II- चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( ३८ ) उन लोगों के वहां से निकल जाने के साथ ही मैं दौड़ता हुआ ऊपर के कमरे में आया। मैं हाँफ रहा था। मैंने चंडीगढ़ का नंबर मिलाया। कुछ गड़बड़ हो गया था। शायद चंडीगढ़ का कोड ही भूल हो गया था। दोबारा मिलाया। अब उधर से हेलो की आवाज़ आई तो मैंने कोई उत्तर न दिया। मैं जानता था कि उस तरफ पिंकी ही थी। वह हेलो.. हेलो.. कह रही थी और मैं खुद में ही मुस्कुराता जा रहा था। अंत में मैंने कहा, ' हेलो.. क्या मैं मनप्रीत जी से बात कर सकता हूँ..' उधर से किसी ने कहा, ' जी वो तो घर पर नहीं हैं..आप कौन बोल रहे हैं..' मैंने सोचा ये तो गड़बड़ हो गया। फोन शायद उसकी बहन ने उठाया था। मैंने कहा, ' कब तक आएँगी .. मैं बाद में फोन कर लूंगा ..' अब उधर से हंसी की आवाज़ आयी, ' अरे, मैं मनप्रीत ही बोल रही हूँ, अभिजीत साहब.. मैं झुंझला गया, मैंने कहा, ' मुझे तो अभी दस मिनट पहले ही तुम्हारा नाम पता चला है, मनप्रीत.. परन्तु तुम्हें मेरा नाम कैसे पता चल गया...' वह हंसती ही जा रही थी, ' अरे, तुम्हारी कलकत्ता की फ्लाइट तो मैंने ही बुक की थी मिस्टर अभिजीत रॉय..' अब मैं भी हंसने लगा। मैंने उसे दिन भर जो-जो हुआ था सब विस्तार से बताया। मैंने बताया कि सब कुछ ठीक से हो गया था। उसके मम्मी-पापा और मामा जी कुछ समय पहले ही हमारे घर से निकले थे। मैंने कहा, ' दो महीने बाद नवंबर में उसे मिसेज मनप्रीत रॉय बनकर कलकत्ता आना था। वह बहुत खुश लग रही थी। उसने कहा, ' मनप्रीत रॉय नहीं मनप्रीत कौर रॉय..' मैंने कहा, ' हाँ..बिलकुल सही कहा.. तुम्हारा कौर तुम्हारे साथ ही रहेगा..' हम लोग काफी देर तक बातें करते रहे। दोनों ही रोमांचित थे। अचानक माँ की आवाज़ आयी। वह मुझे बुला रही थीं। मैंने फोन रखते हुए कहा कि रात में एक बार फिर से बात होगी।
नीचे आया तो देखा भेंट में आयी सभी चीजों को खोलकर देखा जा रहा था। इनमें ड्राई फ्रूट्स के पैकेट्स थे। बादाम,अखरोट, काजू, किशमिश,पिस्ता आदि। जो टोकरे थे वे बहुत खूबसूरत ढंग से सजाये हुए थे और इनमें तरह-तरह के फल थे। कुछ फल तो वे थे जो सामान्य फल की दुकानों पर नहीं मिलते। अचानक मुझे टोकरों के ऊपर लगे स्टीकर दिखे। ये सभी कलकत्ता की एक प्रसिद्द मार्किट से आये थे। मैं समझ गया कि इन सभी की व्यवस्था पहले कर ली गयी थी और आज सुबह इन्हें हमारे घर के पते पर डिलीवरी करा दिया गया था। माँ बहुत खुश थी कि इतना सब कुछ मिला था। इन्द्राणी दीदी भी हैरान थी। माँ ने कहा कि वे लोग रोका के नाम पर सगाई ही करके गए थे। अब जो सगाई होगी वह मात्र औपचारिकता होगी। इन्द्राणी दीदी को एक बात परेशान कर रही थी कि शादी दिन में होगी। माँ ने उसे बताया कि रात में पार्टी भी होगी। बाबा ने कहा अब उनकी बात तो माननी ही होगी। हम लोग बारात लेकर दिल्ली जा रहे थे, वहां जैसा प्रबंध वे लोग करेंगे, हमें स्वीकार कर लेना होगा। बाबा तो दिल्ली जाने की व्यवस्था में लग चुके थे। उनका कहना था कि तुरंत ही सब कुछ कर लेना होगा। उन्होंने अपनी डायरी में कुछ नाम भी लिख लिए थे, जिन्हें बाराती के रूप में दिल्ली लेकर जाना था। ये करीब बारह लोगों की लिस्ट थी। उनका मानना था कि बहुत अधिक लोगों को ले जाना उचित न होगा। उन्होंने बताया कि ये सभी जानकारी दिल्ली में जोगेन्दर के साले को देनी थी जिससे कि वह रहने आदि की व्यवस्था कर सकें। बाबा हर समय रेल रिजर्वेशन फॉर्म्स अपने पास रखते थे। उन्होंने अपनी टेबल की कुर्सी पर बैठते हुए कहा, ' एक फॉर्म में छह लोगों के नाम आ सकते हैं, मैं राजधानी ट्रैन के दो फॉर्म भर रहा हूँ.. नवंबर की तारीख बताओ.. देर कर दी तो बुकिंग नहीं मिलेगी..' माँ उनकी इस बात पर परेशान हो गयी थी। उन्होंने कहा कि अभी तुरंत तारीख नहीं बताई जा सकती थी। उन्होंने आदेश के स्वर में कहा, ' कल तक रुको.. इस तरह की जल्दबाज़ी मत करो.. सब कुछ सोचना-समझना पड़ेगा..' बाबा निराश हो गए थे। उन्होंने खिन्न होते हुए माँ से कहा, ' जो करना है करो, विलम्ब किया तो ट्रैन के टिकट नहीं मिलेंगे और दिल्ली में लड़की वालों को भी अच्छी जगह ठहराने की मुश्किल होगी ..' माँ ने कुछ नहीं कहा परन्तु ऐसा संकेत अवश्य दिया कि एक-दो दिन में कुछ फर्क नहीं पड़ता था। माँ ने बिशाखा को कहा कि सब सामान ठीक से ऊपर के उनके कमरे में रख दे। इधर इन्द्राणी दी और उनकी माँ घर जाने की मुद्रा में आ गए थे। माँ ने उन्हें रोक लिया कि दोपहर का बहुत खाना बचा हुआ था सो उन्हें रात को खाकर ही अपने घर जाना होगा। मैंने भी इन्द्राणी दी को रुकने को कहा। हम दोनों ऊपर छत पर चले गए। इन्द्राणी दी के पास वो फोटो वाला लिफाफा था। उन्होंने एक कोने में बैठते हुए कहा, ' चलो, अब आराम से सब फोटो देखते हैं..' उन्होंने एक फोटो निकाली और घूमा-घूमा कर देखने लगी। उन्होंने वो फोटो मुझे दी और दूसरी निकाली। पहली फोटो अब मेरे हाथ में थी। मैं देखता ही रह गया। इन्द्राणी दी एक-एक कर फोटो मुझे दे रही थी। आज मैं पहली बार पिंकी को इतने करीब से देख रहा था। इन्द्राणी दी ने कहा, ' भई, बहुत सुन्दर है..एकदम किसी फ़िल्मी नायिका सी दिखती है..' मैंने कहा, ' ऐसी कोई बात नहीं है, बस ठीक है..' उन्होंने मुझे चिढ़ाते हुए कहा कि मुझे इतना भी सरल नहीं बनना चाहिए। फिर उन्होंने कहा कि लड़की एक तो सुन्दर थी फिर पढ़ी-लिखी और अमीर परिवार की भी। उनका कहना था कि मैंने कोई बड़ी लाटरी जीत थी। वह फोटो को बहुत गौर से देख रही थीं। एक फोटो पर वह बार-बार चली जाती थीं। ये फोटो अमृतसर की थी। इसमें मैं एक ओर था और दोनों बहनें मेरे दायीं ओर। पृष्ठभूमि में पवित्र स्वर्ण मंदिर था। ऑन्टी ने यह फोटो खींची थी। हम तीनों इसमें बहुत श्रद्धावान दिख रहे थे। पिंकी बहुत आकर्षित दिख रही थी। मैंने उनसे पूछा, ' इसमें सबसे अच्छा कौन लग रहा है ? इन्द्राणी दी ने तुरंत कहा, जिस पर तुम फ़िदा हो गए वही..' उन्होंने कहा इस फोटो से ऐसा लगता है कि अमृतसर जाकर ही मेरा मन इस लड़की पर आ गया होगा। मैं मुस्कुरा दिया, ' हाँ..आप ठीक कह रही हैं.. ' अब इन्द्राणी दी हंसने लगी, ' देखा हमारे तज़ुर्बे .. तुम्हारे चेहरे पर साफ दिख रहा है कि तुम क्या सोच रहे हो..और ये दीदी-दीदी क्या है ? मैं तुमसे बहुत बड़ी नहीं हूँ..हम तो दोस्त की तरह हैं..वो वाली बात याद नहीं है ? अब से मुझे नाम से ही बुलाओगे और मेरे संग एक दोस्त की तरह पेश आओगे.. ' मैंने कहा, ' ठीक है.. दोस्त इन्द्राणी या इसे भी और भी छोटा कर दूँ.. इंदु..' वह जोर से हंसने लगी। माँ की आवाज़ आई। शायद मेरे लिए किसी का फोन आया था।
हम दोनों नीचे आ गए। मैंने फोन उठाया। रोबी दा का फोन था। वह जानना चाहते थे कि मेरे क्या हालचाल थे। मैंने कहा कि सब ठीक था। उन्होंने ऑफिस की एक दो बात कही कि कैसे ऊपर के अधिकारी हमारे कार्यालय को बर्बाद करने पर तुले हुए थे और कैसे वे लोग कर्मचारियों के हित को नकार रहे थे। मैं चुपचाप सुनता जा रहा था। उन्होंने बताया कि इन्हीं सभी उलझनों के कारण वह उन दिनों बहुत व्यस्त चल रहे थे। उनकी पत्नी बीमार थी फिर भी वह रविवार के दिन वह ऑफिस गए हुए थे। उन्हें इस सप्ताह नगर के अन्य संघों के साथ बैठक आयोजित करनी थी। उन्होंने कहा कि अब उनका स्वास्थ्य बहुत ज्यादा भागदौड़ करने में आड़े आ रहा था। अब किसी युवा को उनका हाथ बाँटना चाहिए था। अचानक उन्होंने फिर से मेरा हालचाल पूछा, ' घर में सब ठीक है न ? मुझे लग रहा है, कुछ ठीक नहीं है और तुम कुछ संकोच कर रहे हो ..' मैंने कहा, ' नहीं दादा, सब ठीक है..' न जाने क्यों उन्हें मुझ पर विश्वास नहीं हो रहा था। मैं तो इस समय उनसे अधिक बात करने के मिज़ाज में न था। मैंने उन्हें आश्वस्त करने का प्रयास किया कि सब ठीक था और उनसे जब मिलूंगा तो सब बताऊंगा। इस पर तो वह और पक्का हो गए कि कुछ तो था जिसे मैं छिपा रहा था। उन्होंने अपनी ओर से कहा कि चिन्ता की कोई बात नहीं थी। उन्होंने कहा कि वे मेरे घर आकर मेरी माँ से मिलेंगे और सब ठीक करा देंगे। मैं अपने में ही मुस्कुराए जा रहा था। सब कुछ तो माँ के बाबा लोकनाथ की कृपा से सरलता से पहले से ही ठीक हो चुका था। अब ये क्या ठीक करेंगे। ( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को, यही पर .. )
Wednesday, September 23, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 37
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
( हफ्ते वार साझा किये जाने वाली इस लम्बी कहानी का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )
( ३७ ) मुझे सब के बीच में बिठाया गया। जोगेन्दर आंटी ने स्नेह से मेरे सिर पर अपना हाथ फेरा और मुझे एक लिफाफा थमा दिया। मेरी माँ ने देखा तो कहा कि ये तो आप कल दे चुकी थीं। आंटी ने तुरंत उत्तर देते हुए कहा, ' शगुन तो देना ही होता है, जी..' इसके बाद उन्होंने सब के हाथ में एक-एक लिफाफा पकड़ाया। माँ को, बाबा को, इन्द्राणी दीदी को और सभी को जो भी वहां मौजूद थे। उन्होंने एक कोने में खड़ी बिशाखा को अपने पास बुलाया और उसे भी एक लिफाफा दिया। मैंने देखा कि ये लिफाफे तीन रंगों के थे। सबको दे देने के बाद भी, आंटी के हाथ में अतिरिक्त लिफाफे थे। शायद वे अधिक बनाकर लायीं थीं। अंकल ने मेरे बाबा से जो टोकरियाँ और बक्से थे, उन्हें भीतर रखवाने का आग्रह किया। माँ ने आंटी का हाथ पकड़ा और उन्हें अपने कमरे में बने छोटे से मंदिर में ले गयी। माँ ने मंदिर को सुबह फूलों से अच्छे से सजा दिया था। लोक नाथ बाबा की मूर्ति के ऊपर नीला बल्ब जल रहा था और उसका प्रकाश संगमरमर की प्रतिमा को एक तरह की दिव्यता दे रहा था। माँ ने उन्हें बाबा के बारे में बताया कि कैसे वे दयानिधान हैं और कैसे उनका आशीर्वाद परिवार पर है। दोनों महिलाएं मंदिर के सामने हाथ जोड़, ध्यान की मुद्रा में बैठ गयी। कुछ समय बाद वे उठी। माँ अपने नित्य वाले मंत्रोचारण कर रही थी। आंटी ने कहा कि उनका मंदिर बहुत सुन्दर था। यह बात सुनते ही माँ अभियोग वाली मुद्रा में आ गयी, ' घर में मैं ही हूँ जो पूजा और मंदिर को बनाये रख रही हूँ..किसी के पास इस ओर देखने का समय नहीं है.. सबके पास अन्य बहुत कुछ करने का समय है, बस मंदिर के लिए समय नहीं है..' आंटी मुस्कुराने लगी जैसे वे समझ रही हों कि ये तो घर-घर की बात थी। उन्होंने कहा, ' मेरी दोनों बेटियां इस दिशा में बहुत अच्छी हैं..नित्य नियम से पूजा-पाठ करती हैं ..' फिर अचानक उन्हें क्या याद आया, ' सुना है यहाँ का गुरुद्वारा बहुत सुन्दर है.. आज का दिन बहुत शुभ है..चलो जी मत्था टेक कर आते हैं..' माँ को उनकी बात साथ-साथ समझ न आयी परन्तु कुछ क्षण बाद उन्होंने हाँ कहा, ' हाँ खाने में तो अभी समय है.. गुरुद्वारा पास ही है..चलो आप को दिखा लाते हैं .. ' माँ ने मेरे बाबा से कहा। गाड़ी तो नीचे खड़ी ही थी। माँ, आंटी, इन्द्राणी दी और मैं वहां जाने के लिए निकल आये। बाबा और अंकल घर पर ही रुक गए। बाबा ने माँ से विलम्ब न करने का निर्देश दिया क्योंकि होटल से लंच पहुँचने ही वाला था। हमारे घर की दो दिशाओं में दो गुरूद्वारे हैं। दोनों ही लगभग समान दूरी पर हैं। इन्द्राणी दी, जो रास बिहारी चौराहे के पास था, वहां जाना चाहती थी किन्तु मेरा मन हरीश मुख़र्जी रोड वाले गुरूद्वारे का था। मैं ऑफिस आते-जाते इसके सामने से ही गुजरता था। मैंने ड्राइवर को वहीँ चलने को कहा। लगभग दस मिनिट में हम वहां पहुँच गए। गुरूद्वारे में लोग आ-जा रहे थे। मुझे मालूम था कि रविवार को यहाँ रौनक रहती थी। गुरूद्वारे के पास ही दो चाय की दुकाने हैं जो बहुत प्रचलित हैं। दिन भर यहाँ चाय पीने वालों का आना-जाना लगा रहता है। इन्द्राणी दी ने गाड़ी से उतरते ही पहले चाय पी लेने की इच्छा जाहिर की। माँ ने उसे हल्का सा डाँट दिया, ' पहले अंदर जाकर पूजा तो करो..' मुझे भी उनका इस तरह से चाय-चाय करना अच्छा न लगा था वह भी पंजाब से आयी आंटी के सामने। इन्द्राणी दी कुछ ज्यादा ही चुलबुली हो रही थी। मैंने अब ध्यान दिया था, वह उस दिन अपने मेकअप आदि में भी कुछ ज्यादा ही शोख़ दिख रही थीं। उनका ब्लाउज भी कुछ अधिक ही प्रदर्शनकारी और नटखट हो रहा था। वैसे हमारे परिवार में इन्द्राणी दी की आकर्षण करने की क्षमता और जिंदादिली को सभी पसंद करते थे। परन्तु मुझे न जाने क्यों ऐसा लगा था कि आज उन्हें बंगाली पारम्परिक लड़की के रूप में दिखना चाहिए था। अक्सर बंगाली लड़कियां जब सौम्यता प्रदर्शित करना चाहती हैं तो साड़ी की सहायता लेती हैं और इसी तरह जब किसी को लुभाना या बहकाना चाहती हैं तब भी वे साड़ी पर ही भरोसा करती हैं। साड़ी एक ऐसा परिधान है जो पहनावे के स्वरूप से अपना रंग बदल लेता है।
हम गुरूद्वारे के अंदर गए। माँ तो यहाँ पहले भी आ चुकी थी। इन्द्राणी दी के लिए शायद पहला अवसर था । मुझे उन्हें सिर पर पल्लू लेने के नियम का बताना पड़ा था। मैंने देखा, पल्लू से सिर ढकने पर वह स्वयं से गंभीर हो गयी थी। जोगेन्दर आंटी को भी उनका ये रूप अच्छा लगा था और उन्होंने मुस्कुराकर इसका इशारा दिया था। हम लोग वहां कुछ समय के लिए शांत हो, ध्यान मुद्रा में बैठे रहे। बाहर आने पर एक बार फिर से वहां की प्रसिद्ध चाय की बात उठी परन्तु माँ ने समय नहीं है कहकर सबको गाड़ी में बैठ जाने का आदेश दिया। इन्द्राणी दीदी कुछ नाराज़ हुई थी। उन्होंने कहा कि मेरी शादी हो जाने दो फिर देखना वह कैसे मेरी पत्नी को यहाँ की चाय की लत लगवायेंगी। ऑन्टी कलकत्ता के गुरूद्वारे से बहुत प्रभावित थी। उन्होंने वहां एक अच्छी खासी धनराशि का दान भी दिया था।
घर पर खाने की तैयारी हो रही थी। बाबा के साथ पंजाब से आये दोनों अंकल लोग न जाने कौन कौन से विषयों पर चर्चा में लगे हुए थे। माँ ने वहां पहुँच कर अपना रौब दिखाना शुरू कर दिया था। वह हमेशा ऐसा ही करती थीं। खाने की टेबल पर सब आ गए थे। बिशाखा ने इस तरफ का मोर्चा संभाला हुआ था। पंजाबी खाना देख, जोगेन्दर अंकल निराश हो गए। उन्होंने कहा कि वह तो बंगाली खाने का मूड बनाये बैठे थे। बाबा ने कहा, ' पंजाबी खाना है परन्तु इसमें बंगाली टच है.. इसके बाद बंगाल की विश्व प्रसिद्ध मिठाई और दोई भी है.. आपको वाह करने पर मजबूर कर देंगी.. ' जो भी हो सब बहुत स्वाद लेकर खा रहे थे। पिंकी के मामा ने कहा, ' ऐसा स्वादिष्ट पंजाबी खाना तो दिल्ली में भी नहीं मिलता..' वह जिसे कहते हैं, उँगलियाँ चाट-चाट कर खाना, वैसे खा रहे थे। मामाजी से मैं दिल्ली में थोड़े ही समय के लिए मिला था, आज उनका व्यवहार देखा तो बहुत अच्छा लगा। वह बहुत हंसमुख स्वभाव के व्यक्ति लगे। हमारा घर आज मस्ती के मूड में था। खाना निपट जाने के बाद सब एक तरफ आकर बैठ गए। बाबा ने कहा, ' अब आगे का क्या कार्यक्रम है ? मामा जी ने अपने अंदाज़ में कहा, ' अब पंजाब क्लब जायेंगे, अपना सामान लेंगे और एयरपोर्ट रवाना हो जायेंगे.. रात को नौ बजे दिल्ली में उतरेंगे और अपने घर जायेंगे.. ' बाबा भी हंसने लगे। उन्होंने कहा, ' मेरा मतलब शादी के कार्यक्रम से था.. सगाई और शादी..' पिंकी के पापा कुछ कहने ही वाले थे कि मामाजी ने कहा, ' ओये जी..जब आप कहो जी.. आप तो हुकुम करो.. अगले हफ्ते ही कर देते हैं.. ' अब माँ सामने आयी, ' मुझे तो अपनी बेटी लानी है.. कहो तो मैं लेने आ जाऊँ या फिर आप ही उसे छोड़ने आ जाओ.. ' माँ चालाकी से कह रही थी कि शादी चंडीगढ़ में होगी या कलकत्ता में ? मैं अपनी माँ की राजनैतिक तरीके से बात करने की प्रतिभा को जानता था। अब जोगेन्दर अंकल ने कहा कि जैसा हम लोग चाहें वैसा ही होगा। हंसी मज़ाक में गंभीर बातें होती चली गयीं। इस बीच मामा ने कहा, ' न चंडीगढ़ न कलकत्ता.. बीच में आता है दिल्ली, तो शादी दिल्ली में करते हैं.. पिंकी तो मेरी भी लड़की है..' मैं एक ओर बैठा सबकी सुन रहा था। मुझे लगा, पिंकी के मामा और पापा पहले से ही दिल्ली का तय कर चुके थे। माँ को भी दिल्ली वाला सुझाव सही लगा। यही तय हुआ कि शादी में विलम्ब नहीं किया जाना चाहिए। शादी वाले दिन ही सगाई की रस्म भी की जाएगी। मैं हैरान था कि कैसी आसानी से सब काम होता जा रहा था। मुझे एक बार को लगा कि माँ जो सुबह-शाम बाबा लोकनाथजी का पूजन करती थीं, सच में यह उन्हीं की कृपा थी। वैसे तो मैं इसे माँ का आडम्बर ही मानता रहा था। इन्द्राणी दीदी दूसरे कोने में बैठी मुस्कुरा रही थी। मेरी माँ और जोगेन्दर ऑन्टी बहुत खुश दिख रही थी। वे न जाने क्या क्या बातें कर रही थीं। अचानक माँ ने मुझे अपने पास बुलाया। उन्होंने मुझे नवंबर माह के बारे में पूछा, ' ऑफिस में कोई समस्या तो न होगी.. छुट्टी तो मिल जाएगी न ? मैंने कहा कोई समस्या नहीं थी परन्तु वह किसलिए पूछ रही थीं ? माँ हँसने लगी, ' अरे तुम्हारी शादी की तारीख तय कर दी है .. ' मैंने कहा, ' इतनी जल्दी ? मुझे आश्चर्य हुआ था क्यों कि नवम्बर एक महीने बाद ही था। अब मेरी बात का आंटी ने उत्तर दिया, ' अरे, देरी क्यों ? पिंकी को भी नवंबर सूट करता है..' उन्होंने विषय को विराम देते हुए कहा, ' चलो सब पक्का, नवंबर दिल्ली में ..डेट्स जो तीन आयी हैं उनमें से कौन सी है, ये आप एक-दो दिन में बता देना..'
कुछ समय बाद पिंकी के मामा चलने की आतुरता दिखाने लगे। उन्होंने कहा कि क्लब से चेक आउट करना था और कलकत्ता से कुछ खरीदना भी था। वह बार बार कह रहे थे कि उन्हें हमारा घर और लंच बहुत अच्छा लगा था। पिंकी के पापा भी अब उठ खड़े हुए थे। माँ ने अपनी ओर से तीनों को गिफ्ट के पैकेट दिए। कलकत्ता के मशहूर रसगुल्ले के टिन भी आये हुए थे, वे भी दिए। सब घर से निकलने वाले ही थे कि माँ ने ऊँची आवाज़ में कहा,' सिर्फ पिंकी-पिंकी सुन रहे हैं, ये तो डाक नाम यानि घर का नाम है.. अरे, हमारी बहू का असली नाम क्या है, वह तो बताओ..' सभी हंसने लगे। आंटी ने कहा, ' हमारी बेटी तो मन से प्यार करती है, वह तो मनप्रीत है जी.. मनप्रीत कौर.. ' अब अंकल ने ठहाका लगाते हुए कहा, ' जोड़ी बहुत अच्छी रहेगी जी .. मनप्रीत और अभिजीत .. वाह क्या बात है..रब दी बनाई जोड़ी है जी .. वाहे गुरु..'( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर .. )
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